Thursday, August 30, 2007

बदलते बाजार के साथ बदलते शहर

बाजार अब लोगों को नए जमाने के साथ रहने की तमीज सिखा रहा है। छोटे शहरों में पहुंचते बड़े बाजार ये सिखा-बता रहे हैं कि अब कैसे रहना है, कैसे खाना है, क्या खरीदना है, कहां से खरीदना है, कितना खरीदना है और क्या किसके लिए खरीदना जरूरी है। बस एक बार बाजार तक पहुंचने की जरूरत है। छोटे शहरों के लोग बाजार पहुंचने में लेट न हो जाएं। इसके लिए छोटे शहरों तक खुद ही बड़ा बाजार पहुंच रहा है। घर की जरूरत का हर सामान करीने से वहां लगा है। इतने करीने से कि, काफी ऐसा भी सामान वहां जाने के बाद जरूरी लगने लगता है जो, अब तक घर में किसी जरूरत का नहीं था। हमारे शहर इलाहाबाद में भी बड़ा बाजार पहुंच गया है।
अब इलाहाबाद छोटा शहर तो नहीं है लेकिन, बाजार के मामले में तो, छोटा ही है। कम से कम मैं तो, ऐसा ही मानता हूं। लेकिन, बड़ा बाजार वालों को यहां के बड़ा बाजार की समझ हो गई। इससे सस्ता और कहां का नारा लेकर बड़ा बाजार ने अपनी दुकान इलाहाबाद में खोल ली। बड़ा बाजार पहुंचा तो, 40 रुपए के खादी आश्रम के तौलिए से हाथ-मुंह पोंछने वाले इलाहाबादियों को एक बड़ा तौलिया, महिलाओं के लिए एक नहाने का तौलिया, दो हाथ पोंछने के तौलिए और दो मुंह पोंछने के छोटे तौलिए का सेट बेचने के लिए। गिनती के लिहाज से ये 6 तौलिए का पूरा सेट है 599 रुपए का, जिसकी बड़ा बाजार में कीमत है सिर्फ 299, ऐसा वो लिखकर रखते हैं। इलाहाबादी खरीद रहे हैं महिलाओं के नहाने वाले तौलिये से भी पुरुष ही हाथ मुंह पोंछ रहे हैं क्योंकि, अभी भी इलाहाबाद में महिलाएं बाथ टॉवल लपेटकर बाथरूम से बाहर आने के बजाए पूरे कपड़े पहनकर ही बाहर आती हैं। लेकिन, बड़ा बाजार इलाहाबादियों के घर में बाथ टॉवल तो पहुंचा ही चुका है।

इलाहाबादी परिवार का कोई सदस्य सुबह उठकर गंगा नहाने गया तो, घाट के पास दारागंज मंडी से हरी सब्जी, आलू-मिर्च सब लादे घर आया। गंगा नहाने नहीं भी गया तो, अल्लापुर, बैरहना, फाफामऊ, तेलियरगंज, कीडगंज, मुट्ठीगंज, सलोरी, चौक जैसे नजदीक की सब्जी मंडी से दो-चार दिन की सब्जी एक साथ ही उठा लाता था। चार बार मोलभाव करता था। झोला लेकर जाता था। सब एक साथ भरता जाता था। सुबह सब्जी लेने गया तो, साथ में जलेबी-दही भी बंधवा लिया। लेकिन, अब बड़ा बाजार आया तो, सब सलीके से होने लगा। आलू भी धोई पोंछी और पॉलिथीन में पैक करके उसके ऊपर कीमत का स्टीकर लगाकर मिलने लगी है। बाजार ने नाश्ते का भी अंदाज बदल दिया है। नाश्ते में इलाहाबादी दही-जलेबी, खस्ता-दमालू की जगह सॉस के साथ सैंडविच खाने लगा है।

बच्चों के लिए कार्टून कैरेक्टर बनी टॉफी के लिए भी इलाहाबादी बड़ा बाजार जाने लगा है। टॉफी का बिल देने के लिए लाइन में लगा है। पीछे से किसी ने मजे से बोला क्या एक टॉफी के लिए इतनी देर लाइन में लगे हो- ऐसही लेकर निकल जाओ। लाइन में ठीक पीछे खड़ा आलू की पॉलिथीन वाला जो, शायद मजबूरी में सलीके में था, खीस निपोरकर बोला-- चेकिंग बिना किए नए जाए देतेन, पकड़ जाबो। और नए तो, अइसे जाइ दें तो, सब भर लइ चलें।

इलाहाबाद का बिग बाजार तीन मंजिल के कॉम्प्लेक्स में खुला है। तीसरी मंजिल से खरीदारी के लिए जाते हैं। पहली मंजिल पर बिल जमा करके जेब हल्की करके और हाथ में बिग बाजार का भारी थैला लेकर बाहर निकलते हैं। इन तीन मंजिलों के चढ़ने-उतरने में और बिग बाजार की लाइन में लगे-लगे इलाहाबादी बदल रहा है। इलाहाबादी लाइन में लगने लगा है। सलीके से अपनी बारी आने का इंतजार कर रहा है। 55 साल का एक इलाहाबादी बाजार के साथ सलीका सीखती-बदलती अपनी 18-19 साल की बिटिया के साथ सॉफ्टी खा रहा है, बड़ा बाजार के भीतर ही। बड़ा बाजार जिस कॉम्प्लेक्स में खुला है उसके ठीक सामने शान्ती कुल्फी की दुकान है। शांती की कुल्फी-फालूदा इलाहाबादियों के लिए कूल होने की एक पसंद की जगह थी (जब तक कूल शब्द शायद ईजाद नहीं हुआ रहा होगा)। लेकिन, कुल्फी-फालूदा अब इलाहाबादियों को कम अच्छा लग रहा है, होंठ पर लगती सॉफ्टी का स्वाद ज्यादा मजा दे रहा है।

बड़ा बाजार के ही कॉम्प्लेक्स में मैकडॉनल्ड भी है, हैपी प्राइस मेन्यू के साथ। सिर्फ 20 रुपए वाले बर्गर का विज्ञापन देखकर इलाहाबादी अंदर जा रहा है और 100-150 का फटका खाकर मुस्कुराते हुए बाहर आ रहा है। इलाहाबादी पैकेट का आटा लाने लगा है, पैकेट वाले ही चावल-चीनी की भी आदत पड़ रही है। सलीके से रहने-खाने-पहनने को बाजार तैयार कर रहा है। घर का आटा-दाल-चावल खरीदकर बिल काउंटर पर आते-आते इलाहाबादी फिर ठिठक रहा है, अमूल कूल कैफे का टिन भूल गया था। लाइन लंबी थी, नंबर आते तक अमूल कूल कैफे के 2 चिल टिन भी बिल में शामिल हो चुके हैं।

बाजार सलीका सिखा रहा है! बाजार में सलीके से रहने के लिए ब्रांड का सबसे अहम रोल है। जितनी ज्यादा ब्रांडेड चीजें, उतना ही ज्यादा सलीका (अब माना तो ऐसे ही जाता है)। किसी भी बड़े से बड़े बाजार में मिल रहे ब्रांड का नाम लीजिए। इलाहाबादी उस ब्रांड से सजा हुआ है। बाजार आया तो, अपने साथ बिकने की गुंजाइश भी बनाता जा रहा है। होली-दीवाली, कपड़े-जूते और साल भर-महीने भर का राशन एक साथ खरीदने वाला इलाहाबादी भी हफ्ते के सबसे सस्ते दिन का इंतजार कर रहा है। और, सबसे सस्ता बुधवार आते ही बड़ा बाजार में लाइन में लग जाता है।

मुझे याद है 5-7 साल पहले वुडलैंड का कोई खास मॉडल का जूता सिविल लाइंस के कपूर शूज, खन्ना शूज और ऐसी ही कुछ और बड़ी दुकानों के चक्कर लगाने पर भी मिल जाए तो, मजा आ जाता था। अब वुडलैंड के हर मॉडल से बाजार सजा हुआ है। दूसरे बदलते इलाहाबादियों की ही तरह मैकडॉनल्ड, बिग बाजार और दूसरे ऐसे ही खास ब्रांड्स को समेटने वाले मॉल में गया तो, छोटे भाई ने कहा गाड़ी आगे लगाइए, यहां पार्किंग मना है। सिविल लाइंस में जहां कहीं भी गाड़ी खड़ी कर देने का सुख था। कार की खिड़की से झांकते रास्ते में लोगों से नमस्कारी-नमस्कारा करते निकलने वाले इलाहाबादियों का ये सुख बाजार ने उनसे छीन लिया है। अब इलाहाबादी सिविल लाइंस में पार्किंग खोजता है। पार्किंग खाली नहीं दिख रही थी तो, छोटा भाई गाड़ी में ही बैठा, मैं इलाहाबाद को बदल रहे बाजार के दर्शनों के लिए चल पड़ा। खैर अच्छा-बुरा जैसा भी सही बाजार उन शहरों के लोगों को बदल रहा है जो, बाजार के नाम से ही बिदक जाते हैं। बाजार लोगों को चलने-दौड़ने के लिए तैयार कर रहा है।

Friday, August 24, 2007

हमारा इंडिया मेड इन चाइना हो गया है!

नोकिया की BL-5C बैटरी की खराबी ने एक बार फिर चीनी माल की घटिया क्वालिटी के बारे में दुनिया को बता दिया। नोकिया जैसी बड़ी कंपनी थी, उसे अपनी प्रतिष्ठा की परवाह थी इसलिए 8 करोड़ रुपए से ज्यादा का खर्च झेलकर भी नोकिया ने इस सिरीज की 30 करोड़ बैटरियों में से 4 करोड़ 60 लाख वो बैटरियां वापस ले लीं। जो, नोकिया को जापानी कंपनी मात्सुशिता ने बनाकर दी थीं। आपको लगता होगा कि जापानी कंपनियां तो क्वालिटी के मामले में समझौता नहीं करतीं। फिर ये कैसे हो गया। दरअसल ये सारी बैटरियां मात्सुशिता के चीन के प्लांट में लगी हुई थीं। भारत में इन बैटरियों ने बिना फटे ही खूब हल्ला किया। दूसरा एक मामला है अमेरिकी खिलौना कंपनी मटेल टॉयज के जहरीले खिलौनों का। इन खिलौनों से बच्चों को तरह-तरह की बीमारियां होने के खतरे की बात सामने आई तो, कंपनी ने अपने कई खिलौने बाजार से वापस ले लिए। ये कंपनी भले ही अमेरिकी थी लेकिन, ये खिलौने कंपनी के चीन के प्लांट में ही बन रहे थे।
चीन के घटिया सामानों के ये उदाहरण भर हैं। चीन हमसे तेज रफ्तार से तरक्की कर रहा है। और, कई मामलों हमारे देश के नीति-नियंता भी चीन का ही उदाहरण देकर विकास की गाड़ी चीन से भी तेज रफ्तार से दौड़ाना चाहते हैं। तेज रफ्तार से विकास करते चीन का यही हल्ला आज भारत के विकास को बट्टा लगा रहा है। अब आप सोच रहे होंगे, इससे भारत के विकास पर कैसे असर पड़ सकता है। दरअसल चीनी सामानों ने कुछ इस तरह से हमारे आसपास घर कर लिया है कि अब तो, मेड इन चाइना के ठप्पे पर नजर भी नहीं जाती। चीनी सामानों की घटिया क्वालिटी के बारे में जानने के बाद भी लोग जाने-अनजाने भारत के लोग इसे खरीद रहे हैं और चीन के विकास की रफ्तार और तेज कर रहे हैं।
भारत में कंज्यूमर नाम का प्राणी सबसे तेजी से बढ़ा है। यानी वो खर्च करने वाले जिनकी जेब में पैसा है जो, मॉल में शॉपिंग करता है, मल्टीप्लेक्स में फिल्में देखता है। कंज्यूमर नाम का ये प्राणी कंज्यूम करना जानता है, इसे इस बात की ज्यादा परवाह नहीं होती कि खरीदा हुआ सामान कितना चलेगा। कंज्यूमर के पास पैसे हैं तो, उस पैसे को खींचने के लिए हर मॉल में माल ही माल भरा पड़ा है। देश में ऑर्गनाइज्ड रिटेल क्रांति की बात जोर-शोर से सुनाई दे रही है। और, ये भी कहा जा रहा है कि यही रिटेल देश में लाखों लोगों को रोजगार के नए मौके देगा। भारतीय कंपनियों की तरक्की का भी रास्ता खुलेगा। लेकिन, कुछ छोटे आंकड़े हैं जिससे साफ होता है कि भारत में हो रही रिटेल क्रांति के फायदे से चीन के विकास की गाड़ी भारत के ही विकास को मात देगी।
भारत के जितने भी बड़े ऑर्गनाइज्ड रिटेल स्टोर आ रहे हैं उसमें जिन सामानों को आप ये समझकर खरीदते हैं कि ये पैसे भारतीय कंपनियों के पास जा रहे हैं वो, पैसे चीन की कंपनियों के पास जाते हैं। ग्रॉसरी और फर्नीचर आइटम्स का 65 प्रतिशत चीनी कंपनियों का ही माल भरा पड़ा है। फैशन-कॉस्मेटिक्स-बनावटी गहने इसके 75 प्रतिशत पर चीनी कंपनियों का ही कब्जा है। मॉल से खिलौने खरीदने वाले करीब 15 प्रतिशत बच्चे ही देसी खिलौने के साथ अपना बचपन बिता पाते हैं।
चीनी सामानों का ये कब्जा सिर्फ भारत के मॉल के माल में ही नहीं है। सड़कों पर होने वाला व्यापार जिसे अनऑर्गनाइज्ड रिटेल कहा जा रहा है। वहां चीन का कब्जा और मजबूत है। सड़क किनारे बिकने वाले अजीब-अजीब से खिलौने, टॉर्च, बैटरी, कॉस्मेटिक्स, कैलकुलेटर, डिजिटल डायरी- सब कुछ चाइनीज है। सामान बेचने वाला चिल्ला-चिल्लाकर पहले ही बता देता है कि सामान मेड इन चाइना है कोई गारंटी नहीं है। फिर भी मोलभाव कर खरीदने वाले की लाइन लगी है। सड़क किनारे लगे इस बाजार में तो, 90 प्रतिशत सामान मेड इन चाइना ही है। और, देश के रिटेल बाजार में अनऑर्गनाइज्ड रिटेल का हिस्सा 95 प्रतिशत है।
अभी जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे भारत में हैं। भारत-जापान के साथ अरबों डॉलर के व्यापार की बात हो रही है। दोनों देश हर मसले पर एक दूसरे के साथ खड़े हैं। लेकिन, जापानी प्रधानमंत्री के भारत आने से पहले अखबारों-टीवी चैनलों पर जो स्टोरीज सामने आईं उससे ये साफ था कि जापान में भारतीय कंपनियों को पकड़ बनाने में पसीने छूटेंगे। भारत की तरह जापान के हर मॉल में जापानी में मेड इन चाइना लिखे सामान भरे पड़े हैं। मेड इन इंडिया का एक भी ब्रांड अब तक वहां के बाजार में जगह नहीं बना पाया है।
चीनी सामान किस तरह से हमारे घरों में जगह बना लेता है और हमें पता ही नहीं चलता। मैं चाइनीज सामान जाबूझकर तो, नहीं ही खरीदना चाहता। लेकिन, जिस लेनोवो के लैपटॉप पर मैं ये लिख रहा हूं वो, चीन में बना है। मैंने रिलायंस से नेट कनेक्शन लिया। लेकिन, जब मैं कनेक्शन की डिवाइस लेकर लौटा तो, USB मोडम पर असेंबल्ड इन चाइना की मोहर लगी थी। CAS नोटीफाइड एरिया में रहने की वजह से मुझे सेट टॉप बॉक्स लेना पड़ा। देसी कंपनी WWIL का कनेक्शन लिया। लेकिन, एक दिन रिमोट पर नजर गई तो, वो मेड इन चाइन था। सेट टॉप बॉक्स भी वहीं का बना था। यानी हमारी तरक्की को दिखाने वाले सारे प्रतीक चिन्हों पर चीन ने कब्जा कर रखा है।
चीन की तरक्की की वजह भी साफ पता चल जाती है। दुनिया जिन सामानों को आगे इस्तेमाल करने वाली हो, उसे बनाने में आगे निकलो। दुनिया के बाजार को अपने माल से पाट दो, जब तक दुनिया को ये समझ में आएगा कि ये सामान कहां से आ रहा है तब तक दुनिया उन्हीं सामानों की आदी हो जाएगी। ये बात भारतीय कंपनियों के लिए समझने की है। भारतीय कंपनियां दुनिया में झंडे गाड़ रही हैं। लेकिन, देश की जरूरत के सामान बनाने में पीछे हैं। वीडियोकॉन के अलावा दूसरी भारतीय टेलीविजन बनाने वाली कंपनी का नाम भी याद नहीं आता। टाटा का वोल्टास का एसी बढ़िया होने के बावजूद मार्केटिंग और समय के साथ न बदल पाने की वजह से सैमसंग और एलजी से रफ्तार में पीछे छूट रहा है वैसे, अभी दूसरा सबसे ज्यादा बिकने वाला एसी वोल्टास का ही है। कार-मोटरसाइकिल के मामले में भारतीय कंपनियां अभी आगे हैं लेकिन, विदेशी कंपनियां तेजी से ये हिस्सा कम कर रही हैं।
दुनिया भर के लोगों को सॉफ्टवेयर ज्ञान भारतीय दे रहे हैं लेकिन, एक भी ऐसी भारतीय कंपनी लैपटॉप या कंप्यूटर नहीं बना रही है जो, डेल और लेनोवो को थोड़ा भी मुकाबला दे सके। हाल ये है कि कभी-कभी तो, पूरे इंडिया पर ही मेड इन चाइना का ठप्पा सा लगा दिखने लगता है। अच्छा ये है कि अभी पूरा देश इंडिया नहीं बना है, भारत का बड़ा हिस्सा इंडिया बनने से बचा हुआ है, इसीलिए मेड इन चाइना के ठप्पे से अभी देश का बड़ा हिस्सा बचा है। यही बचा हुआ भारत का बड़ा हिस्सा भारतीय कंपनियों के लिए बड़ा बाजार बन सकता है।

Monday, August 20, 2007

सेक्युलरिज्म नहीं देश बचाइए

तसलीमा की हत्या करके कोई भी कितने भी पैसे कमा सकता है। ये फतवा जारी किया है कोलकाता के एक मस्जिद के इमाम ने। मौलाना मानते हैं कि तसलीमा ने इस्लाम का अपमान किया है, जिसकी कीमत तसलीमा की जान से कम नहीं हो सकती। देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतें तसलीमा के बचाव में भी खुलकर नहीं आ रही हैं। वैसे अगर एमएफ हुसैन की भारत माता या किसी देवी-देवता को गलत तरीके दिखाने वाली पेंटिंग पर किसी हिंदू संगठन ने कुछ कहा होता तो, अब तक देश की सभी धर्मनिरपेक्ष ताकतें मिलकर हुसैन की तरफदारी में अभिव्यक्ति की आजादी के कसीदे पढ़ने लगतीं। वो, सिर्फ इसलिए हो पाता है क्योंकि, किसी उग्र हिंदू संगठन या लोगों का विरोध करके उन्हें भारत के उस धर्मनिरपेक्ष जमात में शामिल होने का मौका मिल जाता है जो, भारत में सेक्युलर नाम से बड़ा सम्मान पाती है।
आखिर क्या वजह है ऐसे ही मामले में तोगड़िया का विरोध करने वाले तसलीमा के खिलाफ फतवा जारी करने वाले मौलाना के खिलाफ कुछ न बोलकर अपनी बात कहने वाली तसलीमा के ही विरोधी हो जाते हैं। और, ये मौलाना कोलकाता की एक मस्जिद के हैं जिस राज्य पश्चिम बंगाल में पिछले तीस सालों से सेक्युलर लेफ्ट पार्टियों की सरकार है। वैसे सेक्युलरिज्म के नाम पर एक खास तरह का विद्वेष फैलाने का लेफ्ट पार्टियों का ये पहला उदाहरण नहीं है। इससे पहले तसलीमा के ही उपन्यास लज्जा को भारत में अकेली पश्चिम बंगाल सरकार ही थी, जिसने प्रतिबंधित कर दिया था। मामला सिर्फ इतना ही नहीं है। इससे कुछ दिन पहले ही हैदराबाद में मुस्लिम संगठन MIM के विधायकों ने तसलीमा के ऊपर हमला कर दिया था। आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है और सिर्फ सेक्युलरिज्म ही है जिसके नाम पर अल्पमत की कांग्रेस दूसरे सेक्युलर दलों के साथ मिलकर सरकार में आ जाती है। फिर कांग्रेस की सरकार तसलीमा के मामले में सेक्युलर क्यों नहीं रह पाई।

दरअसल देश में सेक्युलर ताकतों का यही असली चरित्र है। मुस्लिम कट्टरपंथियों के मामले में वो शांत रहकर ही सेक्युलर हो पाते हैं। काफी दबाव के बाद हैदराबाद पुलिस ने तसलीमा पर हमला करने वाले विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया। लेकिन, सेक्युलरिज्म फिर हावी हो गया और तसलीमा के खिलाफ भी सरकार ने धार्मिक भावनाएं भड़काने और उसका अपमान करने का मामला दर्ज कर लिया। ऐसी ही सेक्युलर कारगुजारियों की वजह से तोगड़िया की बात सुनने वाले और उसे सुनकर कुछ करने वाले बढ़ते जाते हैं।

वैसे ये मामला सिर्फ आंध्र प्रदेश या पश्चिम बंगाल तक ही सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश में भी ऐसे कई वाकये हुए हैं जब, सरकार मुस्लिम समाज से जुड़े होने की वजह से आतंकवादियों या फिर बदमाशों पर कार्रवाई नहीं कर पाई। उत्तर प्रदेश में तो, एक मंत्री हाजी याकूब कुरैशी ने कथित तौर पर मोहम्मद साहब का गलत चित्र बनाने पर दानिश कार्टूनिस्ट के सिर पर 51 लाख रुपए का इनाम जारी कर दिया था। खुलेआम ऐलान के बाद भी कुरैशी के खिलाफ कुछ नहीं हो पाया। इससे पहले इलाहाबाद के फूलपुर में कुछ आतंकवादियों को पकड़ने के लिए जब पुलिस ने छापा मारा तो, पुलिस को लोगों की पत्थरबाजी का सामना करना पड़ा। इस पत्थरबाजी के पीछे इलाहाबाद के ही एक बड़े माफिया का हाथ था। लेकिन, पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। बाद में जब आतंकवादी पकड़ा गया तो, उसके तार अंडरवर्ल्ड और उग्रवादी संगठन सिमी से जुड़े निकले।

सरकारों का हाल ये है कि हैदराबाद में हमले के बाद 14 अगस्त को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में तसलीमा का कार्यक्रम कैंसिल कर दिया गया। कुलपति प्रोफेसर आर जी हर्षे चाहते थे कि तसलीमा का कार्यक्रम हो लेकिन, राज्य सरकार से ये निर्देश मिला कि कानून व्यवस्था की मुश्किल हो सकती है। इसलिए ये कार्यक्रम निरस्त कर दिया जाए। तसलीमा के विचार सुनने का मौका इलाहाबाद के लोगों के हाथ से निकल गया। सवाल यही है कि क्या सेक्युलर यानी धर्मनिरपेक्ष होने के मायने यही है। क्या ऐसी घटनाएं हिंदू और मुस्लिम दोनों ओर कट्टरपंथियों की जमात बड़ी करने का मौका नहीं देती हैं। क्या किसी मौलाना या मुस्लिम मंत्री के फतवा जारी करने के बाद भी कोई कार्रवाई न करने से धर्मनिरपेक्षता बचेगी। मुझे तो यही लगता है कि अब जरूरत इस बात की है कि धर्मनिरपेक्षता शब्द और इससे जुड़ी जमात की बात खत्म हो। धर्मनिरपेक्ष होने की वकालत ही कट्टरता बढ़ा रही है। सभी धर्मों का आदर करने की बात ज्यादा अच्छे से समझ में आती है। और, कहीं भी कानून धर्म देखकर एक्शन में नहीं आना चाहिए।

वैसे अच्छी बात ये है कि तसलीमा का वीजा बढ़ गया है। बांग्लादेश से कट्टरपंथियों के हमले से बचने के लिए भागी तसलीमा तब से भारत में ही रह रही हैं। ये इस देश की सभी धर्मों और मानवता का आदर करने की सबसे बड़ी मिसाल है। लेकिन, बांग्लादेश में जिन कट्टरपंथियों से भागकर तसलीमा भारत आई हैं, वही भारत में तसलीमा पर हमला करने में सफल होते हैं तो, इससे देश को ही नुकसान होगा।

Friday, August 17, 2007

शूटआउट एट सिविल लाइंस!

बीसों पुलिस वाले निहत्थे-निरीह आदमी पर गोलियां चला रहे थे। खून से लथपथ दुबला-पतला सा दिखने वाला आदमी टीवी पर चिल्ला रहा था। मुझे बचा लो, मैं सरेंडर करना चाहता हूं। आजादी के साठ साल पूरे होने के एक दिन पहले से लेकर एक दिन बाद तक एक टीवी चैनल के कैमरे पर पहली बार लाइव शूटआउट के उदघोष के साथ शुरू हुआ वीडियो लगातार लाइव चलता रहा। कैमरे पर चीख रहा एंकर बार-बार ये बताना नहीं भूल रहा था कि ये एक्सक्लूसिव वीडियो सिर्फ उसी के पास है। यहां तक कि 15 अगस्त को जब सभी चैनलों के पास ये वीडियो पहुंच गया, तब भी। आखिर, शूटआउट एट लोखंडवाला फिल्म से भी बेहतर दृश्य जो थे।
चैनल पर काफी देर तक देखने के बाद ही ये रहस्य खुल पा रहा था कि टीवी पर खून से लथपथ अपनी जान की गुहार लगाने वाला कोई सामान्य आदमी नहीं था। उसने कुछ देर पहले ही पुलिस के एक सिपाही के सिर पर बम मारकर उसकी जान ले ली थी। उसने और उसके साथियों ने मिलकर एक इंस्पेक्टर का पैर भी गोली मारकर खराब कर दिया था। इतनी जानकारी देने के बाद टीवी एंकर या उससे फोनलाइन पर जुड़ा संवाददाता फिर चीखने लगता था... ये सही है कि पिंटू मिश्रा नाम के इस बदमाश ने एक पुलिस वाले की हत्या कर दी थी। बावजूद इसके हमारा सवाल यही है कि क्या पुलिस को इस बात का हक है कि वो किसी ऐसे आदमी पर गोली चलाए जो, निहत्था है और लगातार सरेंडर करने की बात कह रहा हो। वीडियो में बदमाश सरेंडर के लिए गुहार लगाता दिख रहा था। मौत सामने थी, इसलिए निरीह भी दिख रहा था। और, इसलिए देखने वाले लोगों को भी पुलिस आतंकवादी से कम नहीं लग रही थी। इसी बात को टीवी चैनल वालों ने जमकर भुनाया भी। हद तो तब हो गई, जब टीवी चैनलों पर इस वीडियो को साठ साल के भारत की आजादी के सच की तरह दिखाया जाने लगा। साठ साल के आजाद भारत की पुलिस का सच। ऐसे बिकने वाले कैप्शंस के साथ वीडियो लाइव चलता रहा। फिर किसी चैनल ने ये भी बताया कि मरने वाले बदमाश ने पहले भी कई अपराध किए हैं। जिसमें हत्या भी शामिल है। फिर ये भी कि वो और उसके साथी किसी की हत्या के ही मकसद से बम और गोलियां लेकर निकले थे। लेकिन, जागरूक टीवी पत्रकारों के सामने फिर वही सवाल मुंह बाए खड़ा था कि क्या किसी सरेंडर करने के लिए चिल्लाते निहत्थे आदमी को पुलिस गोली मार सकती है।

बीच-बीच में टीवी चैनल ये भी बता दे रहे थे कि ये वीडियो करीब एक साल पहले यानी सितंबर 2006 का है। ये वो घटना थी जिसके बाद तीन-चार घंटे तक इलाहाबाद शहर के सबसे पॉश रिहायशी और व्यवसायिक इलाके सिविल लाइंस में लोग दहशत में रहे थे। दो बदमाशों ने एक पुलिस सिपाही की हत्या की। एक इंस्पेक्टर पर गोली चलाई। इसके बाद जब पुलिस ने उन्हें चारों तरफ से घेरा तो, वो भागते हुए सिविल लाइंस की गलियों में छिपने की कोशिश करने लगे। जब तक बदमाशों के पास बम-गोलियां बची रहीं वो, बीच-बीच में उसका भी लगातार इस्तेमाल करते रहे। वीडियो में भी ये साफ दिख रहा था कि पुलिस के जवान भी डर रहे थे कि कहीं से कोई बम या गोली आकर उन्हें लग ना जाए। वीडियो में एक पुलिस वाला जो, सिर्फ डंडा लिए हुए था। रिवॉल्वर वाले दरोगा का साथ ही नहीं छोड़ रहा था।

सिविल लाइंस इलाके के तीन से चार हजार लोग बंधक से बने हुए थे। जब बदमाशों के पास गोली-बम खत्म हो गया तो, उन्होंने सरेंडर करने की गुहार लगाई। अब सवाल यही है कि क्या जब किसी बदमाश के पास गोलियां बची रहें और पुलिस उसे मार गिराए तभी वो सही एनकाउंटर है। क्या कोई भी बदमाश पहले किसी की गोली मारकर (वो भी पुलिस वाले की) हत्या कर दे और उसके बाद सरेंडर करके अदालत से जमानत लेकर दहशत की मिसाल बन जाए। पुलिस एनकाउंटर को किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन, जब लोगों की रक्षा करने वाले पुलिस वालों को ही अपनी जान पर खतरा बन आए तो, क्या उन्हें हथियार सिर्फ इसलिए मिलते हैं कि बदमाश गोली चलाए तो, उससे सिर्फ बचाव किया जा सके। टीवी चैनलों ने एक बदमाश को हीरो बनाने की कोशिश की। सिवाय एक टीवी चैनल के किसी ने भी पुलिस वालों की जान की कीमत नहीं समझी। जो, पुलिस वाला बदमाश के बम से मरा, उसके परिवार वालों के मानवाधिकार का सवाल नहीं उठाया।

सवाल ये भी है कि साल भर बाद ये वीडियो टीवी चैनलों के पास कैसे आया। ये किसी कछार या सूनसान इलाके में पुलिस ने किसी को ले जाकर हत्या नहीं की थी। ये एक बदमाश की पुलिस की हत्या के बाद पुलिस की जवाबी कार्रवाई थी जिसक गवाह हजारों वो लोग थे, जिनकी जान पर बन आई थी। फिर ये वीडियो एक्सक्लूसिव के नाम पर किस नीयत से बेचा गया। वैसे मुझे जो उड़ती खबरें मिली हैं कि इस वीडियो को बनाने वाले ने एक चैनल को ये वीडियो 18 लाख रुपए में बेचा। दूसरे चैनलों को भी मु्फ्त में तो नहीं ही मिला होगा। टीवी चैनलों के लाइव विजुअल का दबाव था कि मायावती सरकार ने इस मामले में जांच के आदेश दे दिए हैं। डीजीपी विक्रम सिंह भी दहाड़ रहे हैं कि किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वो कितनी भी ऊंची पोस्ट पर क्यों न हो। मानवाधिकार के लोग भी झंडा-बैनर पुलिस वालों के खिलाफ तान चुके हैं। मैं बस इतना ही कहना चाहूंगा कि निश्चित तौर पर पुलिस किसी को भी गोली मारे ये बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। लेकिन, इस मामले में जब पुलिस को अपनी ही जान गंवानी पड़ी हो, ऐसे मामले में अगर गलत कार्रवाई हुई तो, आगे कोई अपने परिवार के लोगों को पुलिस में क्यों भर्ती कराएगा, बदमाश ही बनाएगा ना। जो, गोलियां चलाकर जान लेगा-दहशत फैलाएगा। उसके बाद गोलियां खत्म होने के बाद सरेंडर कर देगा।

Thursday, August 16, 2007

जवान भारत के जवानों नेता बनो

दुनिया के सबसे जवान देशों में से भारत के जवान तरक्की कर रहे हैं। इंजीनियर बन रहे हैं, डॉक्टर बन रहे हैं, बीपीओ में रात-रात भर जागकर अंग्रेजी बोलने की नौकरी कर रहे हैं। मैनेजमेंट कोर्स कर रहे हैं, मीडिया में किस्मत आजमा रहे हैं। सरकारी नौकरी के लिए आधा जीवन बिता दे रहे हैं। बड़े-बड़े बिजनेस कर रहे हैं। यानी वो सबकुछ कर रहे हैं जिससे उनको लग रहा है कि तरक्की की जा सकती है। लेकिन, शायद ही कोई लड़का या लड़की नेता बनना चाहता है। चाहता भी है तो, सोचता है और फिर उस रास्ते की दुश्वारियां देखकर रास्ते से ही लौट आता है।
सवाल ये कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में जहां चुने हुए लोग ही देश चलाते हैं। कायदे-कानून बनाते हैं देश में रहने वालों के लिए शर्तें तय करते हैं। सरकार, इंडस्ट्री, किसी भी बिजनेस के लिए पॉलिसी बनाते हैं, वहां कोई युवा नेता क्यों नहीं बनना चाहता है। और, ये तब है जब देश की हर समस्या के लिए नेता ही जिम्मेदार माना जाता है। यहां तक कि हर कोई ये भी दुहाई देता मिल जाता है कि अगर नेता सुधर जाएं तो, देश सुधर जाएगा। फिर कोई लड़का-लड़की नेता क्यों नहीं बनना चाहता। सुधार में खुद शामिल क्यों नहीं होना चाहता। साठ साल के आजाद भारत में आधे से भी ज्यादा नौजवान हैं यानी 30 साल से कम उम्र के हैं। इसलिए ये और भी जरूरी हो जाता है कि ये नई उम्र के लोग राजनीति में जाएं। लेकिन, शायद ही नेतागिरी करने वाले किसी लड़के-लड़की की हिम्मत घरवाले, रिश्तेदार, समाज के लोग बढ़ाते हैं।
राजनीति की शुरुआत करने वाले हर युवा को घर वालों से लेकर आसपास के लोग पहले ही एक ऐसा प्राणी घोषित कर देते हैं जिसका कोई भविष्य नहीं है। दरअसल राजनीति में किसी को तरक्की का रास्ता नहीं दिखता। इसलिए लोग तरक्की वाले करियर तो अपना लेते हैं, राजनीति में नहीं जाना चाहते हैं। मैं भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान राजनीति से जुड़ा रहा। आंदोलन भी किए, छात्र संगठन से जुड़कर हर तरह के रचनात्मक काम किए। सेमिनार कराए। लेकिन, इसके बावजूद आसपास के लोग सिर्फ ये कहकर कि ठीक है थोड़ा बहुत लोगों से जान पहचान के लिए ठीक है, किसी ने इसी में करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया। यहां तक कि लोगों को यही लगता था कि अब तो ये लड़का क्या कर पाएगा। इसका दबाव घर पर मेरे पिताजी पर भी पड़ता रहा होगा। ये अलग बात है कि मुझे आज भी ये लगता है कि मेरे व्यक्तित्व का बेहतर विकास छात्र राजनीति के दौरान ही हुआ।

यही समाज की वो मानसिकता है जिसकी वजह से शायद युवा पीढ़ी एकदम से ही राजनीति से दूर होती चली गई है। देश के दूसरे राज्यों के लोग तो, यूपी-बिहार के लोगों का इसलिए भी मजाक उड़ाते हैं कि इन दोनों राज्यों के लड़के-लड़कियों का राजनीति से कुछ न कुछ रिश्ता होता ही है। इसकी एक बड़ी वजह ये है कि देश में इंदिरा सरकार के खिलाफ आंदोलन में जय प्रकाश नारायण के साथ इन राज्यों के लोगों ने पूरी शिद्दत से हिस्सा लिया। और, इंदिरा की सत्ता उलट देने से इन राज्यों के युवाओं को कुछ ज्यादा भरोसा भी है कि इस रास्ते से भी बहुत कुछ हो सकता है। लेकिन, जब इंदिरा की सत्ता उलटने के बाद सत्ता में आए जेपी आंदोलन के लोग ही युवाओं को रास्ते दिखाने में असफल हो गए तो, युवाओं का राजनीति से नैतिक मनोबल टूट गया। इसके अलावा उन लोगों ने भी छात्रों-युवाओं के राजनीति में आने का रास्ता बंद कर दिया जो, इस रास्ते से लोकप्रिय हुए लेकिन, छात्र संघ की राजनीति को आगे की राजनीति का जरिया न मानकर उसे ही पैतृक व्यवसाय समझने लगे।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय की राजनीति के दौरान मैंने देखा है कि 40-42 साल की उम्र तक चुनाव
लड़ना तो, अधिकार ही समझा जाता था। और, इस कैंपस में बुढ़ाते युवा नेता को पाला पोसा,
विधानसभा-लोकसभा में बैठे उन नेताओं ने। जिनको डर था कि अगर ये ताकतवर नेता विश्वविद्यालय परिसर से बाहर निकलकर विधानसभा-लोकसभा का रास्ता देखने की सोचने लगा तो, उनकी ताकत खत्म हो जाएगी। और, अगर कम उम्र में ही ये कायदे-कानून बनाने वाली जगह पहुंच गया तो, शायद सत्ता के विरोध वाली उसकी आदत की वजह से चुपचाप चल रहे सहूलियत वाले भ्रष्ट सिस्टम पर भी चोट होने लगेगी।
विश्वविद्यालयों से निकले नेताओं में से कुछ भले ही बुढ़ाते-बुढाते कुछ ऊपर की राजनीतिक पायदान पर पहुंचे। लेकिन, ज्यादातर असफल होकर आसपास समाज में असफलता की मिसाल बन गए। जमाना बदल रहा था, जरूरतें बदल रही थीं। और, युवा पीढ़ी के पास इतना समय भी नहीं कि वो, सफल होने के लिए 40-50 साल का होने का इंतजार करे। वो, मार्केटिंग मैनेजमेंट का कोर्स करके झोला उठाकर चार हजार की नौकरी करने लगा, रात-रात भर जागकर जुबान टेढ़ी-मेढ़ी करके विदेशियों से बात करके तरक्की करने लगा। लेकिन, राजनीति के जरिए तरक्की के लिए उसका धैर्य-साहस मर गया।

वैसे आजकल कहा जा रहा है जवान भारत की संसद लोकसभा में भी आने वाले जवान बढ़े हैं। प्रिया दत्त, सचिन पायलट, उमर अब्दुल्ला, मानवेंद्र सिंह, राहुल गांधी जैसे ढेरों चमकते चेहरे वाले सांसदों का नाम गिनाकर चर्चा की जाती है कि देश बदल रहा है, राजनीति बदल रही है, युवा राजनीति में दिलचस्पी ले रहा है। लेकिन, क्या ये वो युवा है जिसकी राजनीति में जरूरत है। इनके आने से किसी को गुरेज नहीं है। लोकिन, ये वो सारे नाम हैं जिनके लिए राजनीति कुछ समझने-करने का नहीं पैतृक व्यवसाय को चलाना भर है। राजनीति का ये पैतृक व्यवसाय अच्छे से चला तो, राजनीतिक विरासत आगे भी मजबूती से जाएगी नहीं तो, उसके बाद वाली पीढ़ी को थोड़ी मुश्किल झेलनी पड़ेगी। अब राजनीति में इन युवाओं की टोली कितना बदलाव कर पाएंगे जिनके लिए पिता-माता की राजनीतिक विरासत को संभालना ही सबसे बड़ी काबिलियत है।
भारत में जिन भी क्षेत्रों में बदलाव हुए हैं। वहां पैतृक घरानों के अलावा नए लोगों ने आगे बढ़कर नए क्षेत्र में जोखिम उठाया। नारायण मूर्ति, धीरूभाई अंबानी, किशोर बियानी ऐसे ही लोग थे। इन लोगों ने जिस उम्र में अपने-अपने क्षेत्रों में कुछ करने की कोशिश की थी। वहां इनके लिए कुछ नहीं था। ऐसा युवा वर्ग राजनीति में क्यों नहीं आ रहा है। कॉलेज में किसी छात्र संगठन के सदस्य छात्रों की संख्या क्यों लगातार कम होती जा रही है।वैसे बिना किसी पृष्ठभूमि के राजनीति में आना इतना आसान भी नहीं है।

उत्तर प्रदेश में आईआईटी के कुछ छात्रों ने मिलकर लोक परित्राण नाम से राजनीतिक दल भी बनाया। कुछ सीटों पर चुनाव भी लड़ा। लेकिन, सफलता हाथ नहीं लगी। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में ही बीजेपी ने भी कई सीटों पर ABVP से निकले कई युवा नेताओं को टिकट दिया था। जिनके पास कोई भी राजनीतिक विरासत नहीं थी। इन युवाओं ने अच्छे से चुनाव लड़ा। ये अलग बात है कि बीजेपी की जमीन पहले से ही खिसक चुकी थी। और, उत्तर प्रदेश में मायावती के जादुई समीकरण के आगे आईआईटी से निकले युवाओं की ही तरह बीजेपी के टिकट पर लड़े युवाओं को भी सफलता नहीं मिल पाई लेकिन, इनमें से ज्यादातर ऐसे थे जो, राजनीति को विश्वविद्यालय के दिनों से ही करियर की तरह संवार रहे हैं। बेईमान नहीं हैं। अब आगे इनका क्या भविष्य होगा मैं नहीं जानता। मुझे नहीं पता आईआईटी से निकले छात्रों की पार्टी अब क्या कर रही है। और, कितनी गंभीरता से अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है। लेकिन, इसी तरह की कोशिश की जरूरत है। आजादी के साठ साल बाद जवान भारत के लिए ये भी जरूरी है कि वो राजनीति को भी उसी गंभीरता से ले।
जिस गंभीरता से आईटी, बीपीओ, मैनेजमेंट या फिर दूसरे किसी सेक्टर में अपना करियर बनाने की कोशिश करता है। नेताओं पर जिस तरह से लोगों का भरोसा उठ रहा है, उसमें ये और भी जरूरी हो जाता है। क्योंकि, भारत को कोई तो दिशा दे ही रहा होगा। और, अगर ये दिशा देने वाले अब भी आजादी के समय की आजाद भारत के बचपन वाली सोच के लोग ही रह गए तो, फिर देश का लोकतांत्रिक ढांचा भी कमजोर होगा।
किसी भी पार्टी में पार्टी के ही बड़े नेताओं के बेटे-बेटियों-बहुओं को छोड़ दें तो, शायद ही एक भी चमकता चेहरा ऐसा मिले जिसकी उम्र 50 साल से कम हो। इस जवान देश के लिए इस बात की सबसे ज्यादा जरूरत है। और, कैंपस में राजनीति में शामिल होने वाले दूसरे क्षेत्रों में असफल हो जाते हैं, ये मिसाल देने वालों को मैं बस इतना ही बताना चाहूंगा कि देश में बैंकिंग की सूरत बदल देने वाले ICICI बैंक के चेयरमैन के वी कामत खुद भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान यूनियन के सेक्रेटरी थे।

Wednesday, August 15, 2007

मनमोहन जी कैसे करिएगा शिक्षा क्रांति

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आजाद भारत के साठ साल पूरे होने पर लाल किले से देश में शिक्षा क्रांति की बात कही है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने शिक्षा पर खर्च करने के लिए 11वीं पंचवर्षीय योजना में 80,000 करोड़ रुपए मांगे हैं। निश्चित तौर पर अगर अगले बीस सालों में भारत को अपने मानव संसाधन यानी काबिल लोगों का इस्तेमाल दुनिया में अपनी साख बढ़ाने के लिए करना है तो, शिक्षा क्रांति बहुत जरूरी है। क्योंकि, भारत के लिए यही सबसे आसान जरिया है दुनिया पर राज करने का। लेकिन, क्या प्रधानमंत्री को इस बात का अंदाजा है कि भारत में शिक्षा क्रांति के रास्ते की असली रुकावटें क्या हैं।
हर किसी को शिक्षा जो, सबसे जरूरी है। अब भारत में इसके दो एक दूसरे एक एकदम विपरीत चेहरे जो, मैंने खुद भी देख लिए। गांव के सरकारी स्कूलों में पढ़ने के लिए बच्चे और पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं मिलते। तो, मुबंई जैसे शहर में स्कूलों में दाखिले के फॉर्म लेने के लिए सुबह चार बजे से ही लाइन लगती है। मुंबई वाला अनुभव मुझे पिछले साल ही हुआ जब मैं दोपहर में ऑफिस पहुंचा तो, रात से ही लाइन में अभिभावकों की लाइन के विजुअल के साथ खुला पैकेज मुझे चलाने को मिला।

बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। सरकारी रिपोर्ट एलीमेंट्री एजुकेशन इन इंडिया की रिपोर्ट कहती है कि देश के 32,000 स्कूलों में एक भी छात्र नहीं पढ़ते। ये बताने की जरूरत नहीं है कि ये गांव के इलाके के सरकारी स्कूल हैं। और, उसमें भी करीब आधे 15,791 स्कूल गांव के सरकारी प्राइमरी स्कूल हैं। ऐसे सबसे ज्यादा 7,945 स्कूल कर्नाटक में हैं जहां एक भी बच्चे नहीं हैं। देश के करीब सात परसेंट यानी 69,353 स्कूल ऐसे हैं जिसमें 25 से कम छात्र पढ़ते हैं और 1,70,888 स्कूल ऐसे हैं जिसमें पढ़ने वाले छात्रों की संख्या 25 से 50 के बीच है। बीमारू राज्यों के अगुवा बिहार और उत्तर प्रदेश दूसरे मामले में भले ही पिछड़े हों। एक स्कूल में सबसे ज्यादा छात्रों के मामले में उनके आसपास सिर्फ दिल्ली और केरल ही हैं। और, शिक्षा क्रांति की यही असली चुनौती है कि जरूरत जहां पर वहां सबको कैसे पढ़ने-बढ़ने का मौका मिले।

परेशानी सिर्फ बच्चों के स्कूल न आने तक ही नहीं है। देश के 23,000 स्कूलों में शिक्षक ही नहीं हैं। तो, 1,30,000 स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। बच्चों के स्कूल न आने और स्कूलों के लिए शिक्षक न मिलने की वजह भी साफ ही है कि देश में 1,02,227 बिना एक भी कमरे के चलने वाले स्कूल हैं। लेकिन, सिर्फ ऐसा ही नहीं है कि स्कूल में सुविधा न होने, शिक्षक न होने और बच्चों के लिए पढ़ने न आने की ही परेशानी है। भारतीय शिक्षा तंत्र में घुसा भ्रष्टाचार भी मनमोहन सिंह के लिए बहुत बड़ी चुनौती है।

UNESCO की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय शिक्षा तंत्र में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार है और इस भ्रष्टाचार को बढ़ाने में सबसे ज्यादा योगदान स्कूल के शिक्षकों का है। UNESCO की करप्शन इन एजुकेशन की इस स्टडी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय स्कूलों के शिक्षक स्कूल से गायब रहने में सबसे आगे हैं। एक युगांडा ही ऐसा देश है जहां के शिक्षक इस मामले में भारतीय शिक्षकों को मात दे पाते हैं। दुनिया में 100 में से औसतन बीस शिक्षक ही स्कूल से गायब रहते हैं जबकि, भारत के 100 में 25 शिक्षक स्कूल आना पसंद नहीं करते। इसमें भी बीमारू राज्य बिहार और यूपी के शिक्षक सबसे आगे हैं। बिहार में हर पांच में से दो शिक्षक गायब रहते हैं तो, उत्तर प्रदेश में तीन में एक शिक्षक स्कूल के रास्ते से भटक जाता है।

यही शिक्षकों का स्कूल न आना शिक्षा तंत्र में भ्रष्टाचार बढ़ाता है। शिक्षा पर खर्च होने वाली रकम का साढ़े बाइस परसेंट इन शिक्षकों के गायब रहने से बरबाद हो जाता है। इतना ही नहीं ये शिक्षक महोदय स्कूल में तो नहीं पढ़ाते लेकिन, घर पर ट्यूशन करने वाले छात्र के लिए इनके पास समय ही समय होता है। ट्यूशन से शुरू हुआ भ्रष्टाचार नकल पर जाकर खत्म होता है। UNESCO की इसी रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि भारत में अच्छे इंस्टिट्यूट्स में कंप्यूटर साइंस, मेडिकल और इंजीनियरिंग विषयों में गलत तरीके से दाखिले के लिए 3000 रुपए से लेकर 8 लाख रुपए तक दिए जाते हैं। ये बानगी भर है देश की शिक्षा क्रांति के रास्ते में आने वाली मुश्किलों की। तो, मनमोहन जी अब बताइए कैसे करिएगा शिक्षा क्रांति।

Tuesday, August 14, 2007

60 साल के आजाद भारत के नेता

कल दिल्ली के टाउनहॉल में बीजेपी और बीएसपी के सभासद (पार्षद) एक दूसरे से भिड़ गए। बीजेपी के सभासद संख्याबल में ज्यादा थे। इसलिए उन्होंने बीएसपी के सभासदों को पीट दिया।2009 में दिल्ली में विधानसभा के चुनाव होने हैं। उसकी ये एक बानगी भर थी। दरअसल अब नगर निगम से लेकर लोकसभा तक ऐसे नेता (बहुतायत में) चुनाव लड़ते-जीतते हैं जिनके लिए समाजसेवा कभी कोई मकसद ही नहीं होता है। उनके लिए नगर निगम, विधानसभा या फिर लोकसभा तक पहुंचना सिर्फ और सिर्फ अपनी उस हैसियत (दबंगई) को बनाए रखने या फिर उसे और बढ़ाने के लिए होता है। और, फिर जब इस हैसियत पर कोई उनकी बिरादरी की भी हमला करता है। तो, फिर वो हमलावर हो जाते हैं।ये कोई पहला मामला नहीं है। जब किसी लोकतांत्रिक संस्था के भीतर लोकतंत्र के पहरेदारों ने ही लोकतंत्र की अस्मिता पर हमला किया हो। इससे पहले उत्तर प्रदेश और बिहार के ही नेता बदनाम थे कि वहां के नेता गुंडे, लुच्चे लफंगे होते हैं। और, विधानसभा तक एक दूसरे से गाली-गलौज-मारपीट पर आमादा हो जाते हैं। वैसे हाथापाई और मारपीट का दिल्ली के टाउन हॉल से कुछ मिलता-जुलता नजारा देश की राजधानी में पहले भी हो चुका है।

लोकसभा में साधु यादव और जनता दल यूनाइटेड के सांसद प्रभुनाथ सिंह के बीच मारपीट होते होते ही बची थी। लोकसभा का मामला था। दूसरे नेताओं ने शर्माशर्मी बचाव किया। अभी कुछ ही दिन बीते हैं जब आंध्र प्रदेश की विधानसभा में कांग्रेसी मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी ने पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को मां की ऐसी गाली दी जो, शायद संभ्रांत परिवारों में गलती से भी सुन लिए जाने पर बच्चे या फिर बड़े के कान लाल कर दिए जाते हैं। लेकिन, जब राज्य के मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री का मामला हो तो, फिर भला सजा कौन देगा। हल्की-फुल्की प्रतिक्रियाओं के अलावा इस पर न तो, कांग्रेस न ही विपक्षी दलों ने संसदीय मर्यादा को लेकर हो-हल्ला किया। शायद सबको डर था कि कल उनके पार्टी ने ऐसा किया तो, दूसरे ज्यादा हल्ला मचाएंगे।
मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री के बीच इस हद तक गिरने का मामला ये पहला नहीं है। इससे पहले यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अब की मुख्यमंत्री मायावती के साथ एक जमाने में वीवीआईपी गेस्ट हाउस में जो घिनौना कृत्य करने की कोशिश की थी। वो, आज भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक कलंक की ही तरह है। मायावती के साथ दुर्व्यवहार किया गया वो तो, भला हो कि बीजेपी के कुछ नेता पहुंच गए और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर एक गहरी कालिख पुतने से बच गई। लेकिन, यही बीजेपी के नेता भी उत्तर प्रदेश की विधानसभा में हुई मारपीट शामिल हुए। माइक तोड़े गए, विधानसभा अध्यक्ष तक की कुर्सी पर माइक फेंके गए। अब तो नगर निगमों, विधानसभाओं और लोकसभा में ऐसे लोग पहुंचने लगे हैं। जिनको इन लोकतंत्र की संस्थाओं के बाहर छोड़ने या फिर लेने ले जाने के लिए बंदूकधारियों का एक पूरा अमला आता-जाता है। ऐसे में अगर लोकतंत्र की इन संस्थाओं के भीतर भी इस तरह की गुंडागर्दी शुरू हो गई तो, फिर कोई कैसे काले कारनामे करने वाले सफेदपोश नेताओं की करतूत के खिलाफ लोकतंत्र में आवाज उठा पाएगा। ये वो लोग हैं जो, कानून और नियम कायदे बनाते हैं। और, ये जिस जगह चुनकर भेजे जाते हैं मकसद यही होता है कि कम से कम वहां तो कायदे-कानून-नियमों का पालन होगा।

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों के ठीक पहले राज्य के ही गृह विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक तिहाई से ज्यादा वर्तमान विधायक अपराधी चरित्र वाले थे। उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव के पहले मैंने उत्तर प्रदेश के गृह विभाग की रिपोर्ट के बाद ये लिखा था कि पांच साल में एक ही दिन होता है जब, बैलट बुलेट पर भारी होता है। उत्तर प्रदेश, बिहार में राज तो बदला है लेकिन, बाहुबली कहे जाने वाले अपराधी विधायक अभी भी विधानसभा तक पहुंच ही रहे हैं। सभी दल इनको पाल पोस रहे हैं। 60 साल का आजाद भारत हर क्षेत्र में तरक्की पर है। दुनिया में नाम कमा रहा है। लेकिन, 60 साल के आजाद भारत के इन नेताओं की करतूतें देखकर ये समझ में आ जाता है कि भारत की कद्र को बट्टा क्यों लग जाता है। 60 साल बाद भी अगर सब कुछ होते हुए भी देश तरक्की की राह से भटक जाता है तो, उसके लिए जिम्मेदार कौन है। जरूरत इस बात की है कि सभी दलों के वो नेता जो अभी भी इससे बचे हैं वो, मिलकर इसके खिलाफ मोर्चाबंदी करें। बीजेपी और बीएसपी दोनों को ही चाहिए कि मारपीट करने वाले अपने सभासदों को पार्टी से निकाल बाहर करें। लेकिन, राजनीतिक पार्टियों के अब तक के चरित्र को देखते हुए ये मुश्किल ही लगता है। इसलिए ये काम आजाद भारत की जनता को ही करना होगा। क्योंकि, जो खुद ही कानून तोड़ने की हरसंभव कोशिश करते रहते हैं उनके हाथ देश के लोगों के लिए कानून बनाने और उन्हें न्याय देने का काम कैसे सौंपा जा सकता है।

Monday, August 13, 2007

60 साल का बूढ़ा या 60 साल का जवान देश

ये किसी च्यवनप्राश का विज्ञापन नहीं है। ये भारत के लोगों के लिए दुनिया में मौके की राह दिखाने वाली लाइन है। 2020 तक दुनिया के सभी विकसित देशों में काम करने वाले लोगों की जबरदस्त कमी होगी। यहां तक कि भारत से ज्यादा आबादी वाले देश में भी बूढ़े लोग ज्यादा होंगे। दुनिया के इन देशों में आबादी बढ़ने की रफ्तार पर काबू पाया जा चुका है। और, अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं की वजह से विकसित देशों में लोग ज्यादा उम्र तक जियेंगे। तब दुनिया के विकसित देशों को अपने यहां काम की जरूरतों को पूरा करने के लिए विकासशील कहे जाने वाले देशों की ही तरफ देखना होगा। और, इसमें भी भारत को सबसे ज्यादा फायदा होगा। क्योंकि, यहां पर अभी 60 प्रतिशत लोग 30 साल से कम उम्र के हैं। यानी जिन्होंने अभी काम करना कुछ पांच-आठ साल पहले ही शुरू किया है। अगर भारत के 45 साल के लोगों की उम्र तक जोड़ ली जाए तो, ये लोग कुल मिलाकर देश की जनसंख्या के 70 प्रतिशत हो जाते हैं।
दरअसल आजादी के साठ सालों में भारत अभी जवान हुआ है। और, इसी जवानी के बूते पर दुनिया भर में अपनी ताकत का लोहा मनवाने लायक भी हो गया है। लोकतंत्र और मजबूत हुआ है। लालफीताशाही खत्म हुई है। हर संस्था पर सामाजिक दबाव बढ़ा है। कुछ भी छिपाकर नहीं किया जा सकता। विकास सिर्फ राजनीतिक नारा नहीं, राजनीति की जरूरत भी बन गया है। हर कोई विकसित होते भारत में अपना भी हिस्सा देने की जी-तोड़ कोशिश कर रहा है। लेकिन, असली चुनौती अगले करीब दो दशकों की है। जब भारत के पढ़े-लिखे-जानकार लोगों की कद्र दुनिया में और बढ़ेगी। पिछले करीब दो दशकों में आईटी और बीपीओ सर्विसेज के बूते दुनिया में झंडा गाड़ने वाले भारत के काबिल युवाओं को हर क्षेत्र में दुनिया बुला रही है। 2020 में भारत में काम करने वाले करीब 5 करोड़ लोग ज्यादा होंगे। यानी ये दुनिया की जरूरतों को करीब-करीब पूरा करने के लायक होंगे। इनमें से ज्यादातर मौके नॉलेज प्रॉसेस आउटसोर्सिंग के ही होंगे। यानी बीपीओ में काम करने वाले सिर्फ अंग्रेजी बोलने वाले और दुनिया के लोगों को सिर्फ कस्टमर सपोर्ट देने वाले नहीं चलेंगे। चलेंगे वो, जो काम जानते हैं, जिनका दिमाग अच्छा चलता है, कुछ नया करके दे सकते हैं। इसके अलावा ऑटो, मैन्युफैक्चरिंग, फार्मा, रिसर्च, इंजीनियरिंग, मीडिया इन सभी क्षेत्रों में भारत की बढ़त की रफ्तार अगले दो दशकों में सबसे तेज रहने वाली है।

दुनिया के विकसित देशों के शहरों के मुकाबले भारत के शहर अभी भी सस्ते हैं और यहां के काम करने वाले लोग भी काफी सस्ते हैं। लेकिन, ये लोग उत्पादन क्षमता के मामले में दूसरों को मात देते हैं। यही वजह है कि दुनिया की बड़ी कार कंपनियां, बड़ी कंप्यूटर-लैपटॉप बनाने वाली कंपनियां, दुनिया के बड़े रिटेलर, दुनिया की बड़ी फार्मा कंपनियां- सब भारत के दरवाजे पर लाइन लगाए खड़ी हैं। हर कोई भारत को अपना हब बनाना चाहता है। डेल और लेनोवो भारत में अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगा रही हैं। भारतीयों की जरूरत के लिहाज से लैपटॉप और पर्सनल कंप्यूटर बन रहे हैं। कभी सिर्फ आयात होकर आने वाली कारें आपके शहर के बगल में ही बन रही हैं। जो, नहीं बन रही हैं उन्होंने किसी न किसी राज्य में यूनिट लगाने की अर्जी दे रखी है। साफ है सस्ते में अच्छे काम करने वाले भारत से बेहतर शायद ही धरती के किसी कोने में मिल पा रहे हैं। बात ये भी है कि ये भारतीय जवान भी धरती के दूसरे कोनों में ज्यादा महंगे हो जाते हैं। इसलिए कंपनियां भारत में ही भारतीयों के हुनर का फायदा लेना चाहती हैं।

एविएशन और टेलीकॉम ऐसे क्षेत्र हैं। जिसमें अब दुनिया की सभी कंपनियों को भारत में ही सबसे ज्यादा मौके दिख रहे हैं। भारत में एयरलाइंस के एक दूसरे में विलय से कुछ लोग बेवजह ये अंदाजा लगाने लगे थे कि फिर 90 के दशक की तरह एयरलाइंस की लैंडिंग न शुरू हो जाए। लेकिन, भारतीय आसमान में तो रास्ते अब साफ हो रहे हैं। भारत में संभावनाएं बढ़ेंगी तो, हवाई सफर करने वाले और बढ़ेंगे। वर्जिन ग्रुप भारत के आसमान में उड़ना चाहा है और भारतीयों को वर्जिन मोबाइल पर बात भी कराना चाहता है। वर्जिन ग्रुप के चेयरमैन रिचर्ड ब्रैनसन ने तो यहां तक कहा है कि वो साल भर में ही वर्जिन मोबाइल भारत में शुरू कर देंगे। हां, एयरलाइंस आने में थोड़ा समय लग सकता है। दुनिया की बड़ी मोबाइल कंपनी वोडाफोन पहले ही हिंदुस्तान आ चुकी है।
भारत इन सबके लिए तैयार भी हो रहा है। सरकारी नीतियों में भले ही कुछ गड़बड़ियों की वजह से SEZ के अच्छे के बजाए बुरे परिणाम ही मिलते दिख रहे हैं। लेकिन, सच्चाई यही है कि देश आगे जा रहा है और इसमें सरकार ज्यादा दखल देने की हालत में नहीं है। सब कुछ इस जवान देश के कामकाजी जवानों के हाथ में है। सरकार के हाथ में सिर्फ इतना है कि वो कहीं रोड़ा नहीं बने तो, देश के जवानों को थोड़ा कम मेहनत करनी पड़ेगी। आजाद भारत के साठ साल पूर होने पर ये बातें इसलिए भी ज्यादा महत्व की हैं। क्योंकि, चाइनीज ड्रैगन भी बुढ़ा रहा है।

2020 तक चीन में दुनिया के सबसे ज्यादा बूढ़े होंगे। यानी दुनिया में हमारी विकास की संभावनाओं को चुनौती देने वाला अकेला देश भी तब तक हांफने लगेगा। इसलिए जरूरी है कि अगले दो दशकों में हम जवानी की तेज रफ्तार का पूरा फायदा उठा लें। क्योंक, दो दशकों के बाद आज का साठ साल का ये जवान देश साठ साल के बू़ढ़े देश में बदल जाएगा।

Saturday, August 11, 2007

ये फर्क इंडिया और भारत का है

दो दिन पहले मैंने हांगकांग की एक कंसल्टेंसी फर्म के सर्वे के लिहाज से लिखा था कि किस तरह देश के शहर तेजी से महंगे हो रहे हैं। लेकिन, इसके बाद भी दुनिया के कामकाजी लोगों के लिहाज भारत अभी एशिया के ही शहरों में भी सबसे सस्ता ही है। इस पर उम्दा सोच की टिप्पणी आई कि यहां आमदनी कम है वरना तो, दुनिया के दूसर शहरों के लिहाज से भारत के शहर अभी भी बहुत सस्ते हैं। इस पर अनिल रघुराज की टिप्पणी आई जो, ज्यादा वाजिब थी कि इस लिहाज से दुनिया के दूसरे शहरों में रहना ज्यादा सुखकर है। और, मुझे लगता है कि कहीं भी महंगाई का पैमाना वहां रहने वालों कमाई के लिहाज से ही तय होता है।
मैंने क्यों कहा कि मुंबई और दूसरे मेट्रो शहरों में रहना मुश्किल होता जा रहा है। इसको नेशनल कमीशन फॉर इंटरप्राइजेज इन अनरिकॉगनाइज्ड सेक्टर (NCEUS) का ताजा सर्वे भी पुख्ता करता है। इस सर्वे के मुताबिक, देश में 83 करोड़ 60 लाख लोग ऐसे हैं जो, हर रोज बीस रुपए यानी सिर्फ 600 रुपए महीने की कमाई कर पाते हैं। वैसे देश में गरीबी रेखा की परिभाषा में ये सभी लोग गरीबी रेखा के ऊपर ही आते हैं। क्योंकि, गरीबी रेखा के नीचे उन्हीं लोगों को रखा जाता है जो, हर रोज 12 रुपए से भी कम की कमाई करते हैं, यानी इतनी ही रकम जितने में हम-आप जैसे मेट्रोज में रहने वाले लोग प्यास लगने पर पानी पी जाते हैं। उनती ही रकम में पूरा दिन चलाने वाले ही इस देश में गरीबी रेखा के नीचे आते हैं।
अब आपको लग रहा होगा कि ये कैसे संभव है कि, देश के 77 प्रतिशत लोग सिर्फ बीस रुपए रोज कमा रहे हों जबकि, हर रोज देश और तेज रफ्तार से तरक्की कर रहा है। मनमोहन-चिदंबरम की जादुई जोड़ी मनमोहक 10 प्रतिशत की विकास दर की बात कर रही है। वैसे इसी मनमोहक आंकड़े से विश्व बैंक भी प्रभावित जो, कहता है कि भारत में एक व्यक्ति की सालाना कमाई करीब एक हजार डॉलर यानी करीब चालीस हजार रुपए है। दरअसल एक व्यक्ति की कमाई का विश्व बैंक का आंकड़ा इतना खाया पिया इसलिए दिखता है। क्योंकि, द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास और दुनिया को मुट्ठी में करते भारतीय उद्योगपतियों की जेब में इतना पैसा बढ़ गया है कि वो देश के गरीबों को भी अमीर दिखा देता है। लेकिन, जब उन अमीरों और अमीर होते लोगों को हटाकर सिर्फ खेती या फिर दूसरी ऐसी जगहों पर बिना तय रकम के काम करने वाले लोगों का सर्वे किया गया तो, निकलकर आया कि वो तो, जितना कमाते हैं उससे ज्यादा खा जाते हैं। दरअसल वो कमाते ही इतना कम हैं कि खाने को भी पूरा नहीं होता।
नेशनल कमीशन फॉर इंटरप्राइजेज इन अनरिकॉगनाइज्ड सेक्टर (NCEUS) के ही आंकड़ों के मुताबिक, देश के किसानों में से 84 प्रतिशत किसान हर महीने सिर्फ 2115 रुपए कमा पाते हैं जबकि, उनका खेती पर खर्च हर महीने करीब 2770 रुपए होता है। और, यहीं से शुरू होती है किसान के कर्ज के जाल में फंसने और आतमहत्या की। ऐसा नहीं है कि सरकार ये सब जानती नहीं है। ये सर्वे सरकार से जुड़ी संस्था ने ही कराया है सरकार में बैठे लोगों को ये असलियत अच्छे से मालूम है। लेकिन, उन्हें मर्सिडीज में जाने वाला किसान ही दिखता है। जो, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कर रहा है। और, बड़े-बड़े व्यापारियों को भी पीछे छोड़ रहा है। वो, एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की संपत्ति के मालिक मुकेश अंबानी के रिलायंस फ्रेश को सीधे सब्जी, अनाज बेच रहा है। उसके पास देश की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी के मालिक सुनील भारती मित्तल के नुमाइंदे सौदे के लिए आ रहे होते हैं। टाटा-बिड़ला-मित्तल-गोदरेज सब बियानी के दिखाए रास्ते पर रिटेल में कूदे जा रहे हैं। और, इसलिए ज्यादातर को कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का धंधा ज्यादा मुनाफे वाला दिख रहा है। इसलिए हर जगह बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर ही दिखती है। लेकिन, ये भी समझना जरूरी है कि बावजूद इसके खेती में क्यों ढाई प्रतिशत की भी विकास दर नहीं मिल पा रही है।
कुल मिलाकर मामला यही है कि देश में एक वर्ग बना है जो, अचानक मेट्रो में कारों में घूमने लगा है। जो, मॉल में खरीदारी करता है और मल्टीप्लेक्स में फिल्में देखता है। लेकिन, बड़ा वर्ग अभी भी इन लोगों को अचरज से ही देखता है। उसको लगता है कि ये कहीं दूसरे देश के लोग तो नहीं हैं। शायद उसकी समझ कुछ ठीक भी है क्योंकि, कमाई शाइनिंग इंडिया में रहने वालों की ही बढ़ रही है। भारत और इंडिया में बढ़ते फर्क की ही वजह से ही देश किसी शहर-गांव-कस्बे में 20 रुपए रोज कमाने वाला भी गरीबी रेखा के ऊपर है। और, मुंबई-दिल्ली जैसे मेट्रो में रहने वाला हर रोज 2000 रुपए की कमाई के बाद भी अमीरों के बीच में अपने को गरीबी रेखा के आसपास ही पाता है।

Thursday, August 09, 2007

हम महंगाई से मरे जा रहे हैं औ विदेशियों के लिए सबसे सस्ता भारत

दुनिया भर में घूमने वाले कामकाजी विदेशियों के लिए रहने-खाने-मस्ती करने के लिए लिहाज से भारत सबसे सस्ता है। और, ये हम पूरी दुनिया की बात नहीं कर रहे हैं। महंगाई के लिहाज से अभी तो हम एशिया के ही दूसरे कई देशों से पीछे चल रहे हैं। वैसे भारतीय शहर इस बात के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं कि वो दुनिया के महंगे शहरों में शामिल होकर जरा तो इज्जत कमा सकें। उन्हें इसमें कुछ सफलता भी हासिल हुई है। मुंबई (यहां मैं रहता हूं, जानता हूं कि यहां रहना कितना मुश्किल है), दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद और बैंगलोर के साथ पुणे भी महंगे शहरों की लिस्ट में एक से तीन नंबर तक आगे बढ़ गए हैं। ये सब बातें कही गई हैं हांगकांग की एक कंसल्टेंसी फर्म ECA इंटरनेशनल के अभी की सर्वे रिपोर्ट में। दरअसल ये सर्व ये भी जानने की कोशिश थी कि प्रोफेशनल्स के लिए अच्छी लाइफस्टाइल (जीवन शैली ) वाले शहर कौन से हैं। जाहिर है कि अच्छी लाइफस्टाइल वहीं मिल सकती है, जहां सुविधाएं-विलासिता होंगी। और, आज की सुविधा बिना महंगाई के मिलती नहीं।

दुखद ये रहा कि काफी दौड़ लगाने के बाद भी भारत के सबसे महंगे सात शहर एशिया के 41 महंगे शहरों को लिस्ट में नीचे से आधे तक भी नहीं पहुंच पाए। दक्षिण कोरिया का सियोल शहर सबसे महंगे शहर का तमगा पा रहा है। और, भारत का सबसे महंगा शहर मुंबई इस लिस्ट में 24वें और दुनिया के महंगे शहरों की लिस्ट में 192वें नंबर पर है। और, ये हाल तब है जब 50 हजार महीने की कमाई करने वाले लोग भी ये सोचते हैं कि 11 महीने का करार खत्म होने के बाद अगला कमरा कितना महंगा मिलेगा। दिल्ली भी मेहनत करके मुंबई के ठीक पीछे ही है। चेन्नई एशिया का 30वां, हैदराबाद 32वां, कोलकाता 35वां, पुणे 36वां और बैंगलोर 40वां सबसे महंगा शहर है। इतनी मेहनत के बाद भी ये महंगे भारतीय शहर बेचारे दुनिया में महंगाई के मामले मेंबहुत पीछे हैं। अब भारतीय शहरों में लाइफस्टाइल अच्छी (महंगाई ज्यादा नहीं है!) नहीं है इसलिए यहां काम करने वालों को कंपनियां विदेशी शहरों के लिहाज से पैसे भी कम देती हैं। सर्वे कहता है कि भारत के महंगे शहरों में भी रहना काफी सस्ता है। अब इन सर्व वालों को कौन बताए कि मुंबई जैसे शहरों में रहने वाले जोड़े बड़ा घर न ले पाने की वजह से दिन में सड़क किनारे या पार्क में जिंदगी बिता देते हैं। वैसे सर्वे कह रहा है कि भारतीय शहरों में महंगाई की रफ्तार अच्छी है। और, जल्दी ही वो दुनिया के नहीं तो, एशिया के शहरों को तो मात दे ही देंगे। चलिए हम भी उम्मीद करते हैं कि जब तक महंगाई इस रफ्तार तक पहुंचे। हम भारत के सबसे महंगे शहर से कुछ सस्ते शहर में आसियाना तलाश सकें। हाल ये है कि हमें महंगाई मारे डाल रही है और दुनिया वाले ये कहके हमें नीचा दिखा रहे हैं कि विदेशीशहरों के लिहाज से भारत में अभी अच्छी लाइफस्टाइल (महंगाई) नहीं है।

Thursday, August 02, 2007

मैं मुन्नाभाई के जेल जाने से दुखी नहीं हूं

संजय दत्त को जेल हो गई है। इससे देश-समाज में बहुत लोग दुखी हो गए हैं। सबको लगता है कि संजू बाबा, अब ज्यादातर लोग उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं, ने इधर तो कोई ऐसा अपराध किया नहीं है। जिसके लिए उन्हें जेल भेज दिया जाए। वैसे इनमें से ज्यादातर लोग ऐसे होंगे, जिन्हें बंबई 93 धमाकों के सभी अभियुक्तों के लिए फांसी की सजा भी कम लगती होगी। फिर संजय दत्त को सजा मिलने से लोग दुखी क्यों हैं।
दरअसल लोग संजय दत्त को नहीं मुन्नाभाई को सजा मिलने से दुखी है। वो मुन्नाभाई जो, बॉक्स ऑफिस पर अच्छे बिजनेस की गारंटी बन गया। वो, मुन्नाभाई जो, गांधीजी के मरने के करीब पांच दशकों के बाद गांधीवाद को गांधीगिरी में बदलकर नए जमाने के लोगों को भी हंसाता है, रुलाता है और वो गांधीगिरी से ही एक सुंदर सी गर्लफ्रेंड भी पा लेता है।

लोगों को उस मुन्नाभाई के जेल जाने से दुख है जिसके ऊपर अभी कम से कम फिल्म इंडस्ट्री की 100 करोड़ रुपए दांव पर लगा हुआ है, 100 करोड़ सिर्फ उन फिल्मों की कीमत है, जिनकी शूटिंग अधर में लटक गई है।
मुन्नाभाई के जेल जाने से वो लोग भी दुखी हैं। जो, ज्यादातर मुन्नाभाई की स्टाइल में ही जिंदगी आगे बढ़ाने की ख्वाहिश रखते हैं। यानी पहले दादागिरी, उससे हासिल रुतबा, फिर जब मामला अंटकता दिखे तो, फिर सहारा गांधीगिरी का। और, फिर सबका चहेता मुन्नाभाई बन जाना।

मुन्नाभाई के जेल जाने से वो भी दुखी हैं। जो, फिल्मी स्टाइल की ही जिंदगी जीना चाहते थे। कुछ इस अंदाज वाले भी दुखी हैं, जो सोचते हैं कि बदनाम भी हुए तो, क्या नाम न होगा। लेकिन, बदनाम होकर नाम मिलना तो तभी सही है ना, जब उस नाम के दम पर दुनिया से कुछ हासिल हो सकेगा। जेल में रहकर तो कुछ हासिल होने से रहा।

मुन्नाभाई के जेल जाने से समाज का वो रुतबे वाला तबका भी दुखी है। जिसका प्यारा सा मासूम बच्चा कम उम्र में शराब पीकर सड़क के किनारे फुटपाथ पर सो रहे गरीब लोगों को कुचल देता है।
मुन्नाभाई के जेल जाने से वो भी दुखी हैं जिनके बच्चे जवानी के जोश में आकर किसी कमजोर महिला के साथ बलात्कार कर देते हैं।

मुन्नाभाई के जेल जाने से वो लोग भी दुखी हैं जो, जरा से मजे के लिए जंगल में गैरकानूनी तरीके से जानवरों का शिकार करते हैं।

दरअसल मुन्नाभाई के जेल जाने से हर वो तबका दुखी है। जिसको किसी न किसी वजह से लगता है कि अगर वो कोई गलती करेगा तो, कानून का ही कोई न कोई रास्ता उसे बचाने में काम आ जाएगा।
संजय दत्त को सजा सुनाए जाने के दिन से पहले जिस तरह से मीडिया के जरिए टाडा स्पेशल कोर्ट के जज पी डी कोडे पर भावनात्मक तौर पर दबाव बनाने की कोशिश की गई। उससे साफ था कि समाज का प्रभावशाली तबका किस तरह से काम करता है। संजय दत्त ने अपने बचाव में ये तक दलील दे डाली कि उन्हें डर था कि उनकी बहनों के साथ बलात्कार हो सकता है, इसलिए उन्होंने ए के 56 राइफल रख ली थी। सजा सुनाए जाते समय भी संजय दत्त ने सारे भावनात्मक हथकंडे अपनाए। कहा- उनकी बहन मां बनने वाली है, इसलिए उन्हें सरेंडर करने के लिए समय दिया जाए। वैसे जज साहब इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने ऐसी कोई दलील नहीं सुनी जो, कानूनी तौर पर सही नहीं हो।

वैसे संजय दत्त के मामले में 14 साल की देरी ने भी ढेर सारे लोगों को संजय दत्त (मुन्नाभाई) के पक्ष में खड़ा कर दिया था। जिस मामले में 14 साल पहले ही संजय को जेल जाना था। संजय दत्त के साथ इस मामले के ज्यादातर आरोपी जो, पकड़ में आए वो, 14 सालों से अपने घर-परिवार-समाज से कटे जेल की रोटी खा रहे थे। जज ने फैसला सुनाते हुए कहा भी कि पिछले 14 सालों में बाहर रहकर संजय दत्त मे पैसा, प्रतिष्ठा, बेहतर जिंदगी सबकुछ पाई। लेकिन, अब करनी की भरपाई का समय आ गया है।

सुनील दत्त जैसे सम्मानित और एक बेहतर जिंदगी वाले शख्स का बेटा होने से भी संजय दत्त के जेल जाने से दुखी लोगों की कतार बढ़ गई।

संजय दत्त की बहन प्रिया दत्त के मुंबई से सांसद बनने ने भी मुन्नाभाई के साथ सहानुभूति रखने वालों की गिनती बढ़ा दी।

एक अच्छे एक्टर के तौर पर संजय दत्त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं। मुन्नाभाई का किरदार भी मुझे बहुत अच्छा लगा। फिल्म की मैंने जमकर तारीफ की, वैसे सभी कर रहे थे, मेरे करने न करने से कुछ नहीं होता। लेकिन, संजय दत्त के जेल जाने से मैं दुखी नहीं हूं। क्योंकि, अगर इन वजहों से कोई अपराध करके कानून से बचने लगा तो, इस देश में बढ़ते करोड़पतियों की तरह अपराध करके मुन्नाभाई बनने वाले भी बढ़ते चले जाएंगे। इसलिए मैं मुन्नाभाई के जेल जाने से दुखी नहीं हूं। मैं इसलिए दुखी नहीं कि अगर मुन्नाभाई जेल न गया होता तो, लोगों को लगता कि मेमन परिवार के सदस्यों को बलि का बकरा बना दिया गया। और, संजय दत्त को हीरो बनाकर बाहर निकाल लिया गया।

आधुनिक समाज में क्रिया-प्रतिक्रिया की बात करने से बड़ी बेअदबी क्या होगी ?

 हर्ष वर्धन त्रिपाठी सिंघू सीमा पर जिस तरह तालिबानी तरीके से निहंगों ने एक गरीब दलित युवक की हत्या कर दी, उसने कई तरह के प्रश्न खड़े कर दिए ...