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Friday, April 28, 2017

नेता बदले गांधी परिवार, लौटता दिख रहा कांग्रेस का आधार

पूर्ण बहुमत लोकतंत्र में स्थिरता के लिए जरूरी होता है। लेकिन, कई बार पूर्ण बहुमत की वजह से चुनावी विश्लेषण में कई जरूरी मुद्दों पर बात ही नहीं हो पाती है। कुछ ऐसा ही दिल्ली नगर निगम के चुनाव में भी हुआ है। चर्चा सिर्फ पूर्ण बहुमत वाली बीजेपी और दूसरे स्थान पर रहने वाली आम आदमी पार्टी की हो रही है। कांग्रेस की कोई चर्चा करने को ही तैयार नहीं है। कांग्रेस की चर्चा हो भी रही है तो, सिर्फ इसलिए कि अजय माकन ने इस्तीफे की पेशकश की है। कांग्रेस की बात मैं क्यों कर रहा हूं, इसे समझने की जरूरत है। दिल्ली नगर निगम में अपने सारे उम्मीदवारों को निकम्मा मानकर उन्हें बदलने की रणनीति बीजेपी के लिए ब्रह्मास्त्र बन गई। 2012 से भी ज्यादा सीटें दिल्ली के तीनों निगमों में बीजेपी को मिल गए। ये साफ है कि दिल्ली नगर निगम का चुनाव नगर निगम के मुद्दों पर लड़ा ही नहीं गया। 270 में से 183 सीटें साफ बता रही हैं कि भारतीय जनता पार्टी के पास नरेंद्र मोदी जैसी एक पॉलिसी जो कम से कम 2019 तक तो बीजेपी को बाकायदा लाभांश देती रहेगी। लाभांश कम-ज्यादा हो सकता है लेकिन, मिलता रहेगा, इतना पक्का है। 5 साल की इस पक्की पॉलिसी को जनता अगले 5 साल के लिए फिर से लेती है या नहीं, ये देखने वाली बात होगी। फिलहाल तो बीजेपी विजय रथ पर सवार है। आंकड़ों के लिहाज से 270में से 183 सीटों वाली बीजेपी के बाद आम आदमी पार्टी को सिर्फ 47 सीटें मिल सकी हैं। कांग्रेस के हिस्से सिर्फ 29 सीटें आई हैं। 2012 के चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस की आमने-सामने की टक्कर थी। बीजेपी को तीनों निगमों में मिलाकर 142 सीटें मिली थीं और कांग्रेस को 77। इस आधार पर कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत बुरा रहा। 77 से घटकर 29। इस आधार पर प्रथम दृष्टया अजय माकन का नैतिक आधार पर इस्तीफा देना बनता है।
ये सीधे-सीधे किया गया विश्लेषण है, जिसमें निगम चुनावों में तीसरे स्थान पर चले जाने और पिछले चुनाव से बहुत कम सीटें पाने की वजह से कांग्रेस की चर्चा नहीं की जानी चाहिए। और उसके प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन का इस्तीफा पक्के तौर पर बनता है। लेकिन, ये विश्लेषण करते हम ये भूल जा रहे हैं कि 2012 और 2017 के बीच में 2013, 2014 और 2015 भी आया था। 2013 के विधानसभा चुनावों में पहली बार दिल्ली में चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी तेजी से उभरी और 40% मतों पर कब्जा जमा लिया। आम आदमी पार्टी को 28 सीटें मिलीं थीं। बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। बीजेपी को 45.7% मत मिले और सीटें मिलीं 32। कांग्रेस एकदम से गायब हो गई। कांग्रेस को सिर्फ 11.4% मत मिले थे और सिर्फ 8 विधायक चुनकर पहुंचे। 8 विधायक चुनकर आए थे लेकिन, कांग्रेस के खात्मे की भविष्यवाणी राजनीतिक विद्वानों ने करना शुरू कर दिया था। उसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव हुए और नरेंद्र मोदी की लहर पर सवार बीजेपी ने 46.4% मत हासिल करके दिल्ली की सातों लोकसभा सीटें जीत लीं। आम आदमी पार्टी को 32.9% मत मिले लेकिन, सीट एक भी नहीं मिल सकी। लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का मत प्रतिशत भी थोड़ा बढ़ा। कांग्रेस को 15.1% मत मिले। यहां एक बात समझने की थी कि मोदी की लहर और केजरीवाल के दिल्ली में तत्कालीन करिश्मे के बीच भी कांग्रेस का मत प्रतिशत विधानसभा चुनावों के मुकाबले बढ़ा। इसके बाद केजरीवाल की सरकार गिरने की वजह से हुए चुनाव में केजरीवाल के पक्ष में सहानुभूति लहर ऐसी चली कि सब साफ हो गए। 2015 विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी 54.3% मतों के साथ 67 विधानसभा सीट जीतने में कामयाब रही। बीजेपी को 32.2% मत मिले लेकिन, सीट मिली सिर्फ 3 और कांग्रेस को मत मिले 9.7% लेकिन, सीट के मामले में खाली हाथ रह गई।
अभी नगर निगम के चुनाव में जो मत प्रतिशत दिख रहा है। उस पर नजर डालिए। पूर्वी दिल्ली में बीजेपी को 38.61% मत मिले हैं। आम आदमी पार्टी को 23.4% और कांग्रेस को 22.84%। दक्षिणी दिल्ली में बीजेपी को 34.87% मत मिले हैं। आम आदमी पार्टी को 26.44% और कांग्रेस को 20.29% मत मिले हैं। उत्तरी दिल्ली में भी कमोबेस यही स्थिति है। बीजेपी को 35.63% मत मिले हैं। आम आदमी पार्टी को 27.86% और कांग्रेस को 20.73%। कुल मिलाकर अगर तीनों नगर निगमों के ताजा चुनाव की बात की जाए तो बीजेपी को 36.08% मत मिले हैं। आम आदमी पार्टी को 26.23% और कांग्रेस को 21.09% मिले हैं। दरअसल यही समझने की बात है। कांग्रेस पार्टी अपना खोया हुआ आधार वापस हासिल कर रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन के गुबार में खड़ी हुई आम आदमी पार्टी पर लोगों का भरोसा तेजी से घट रहा है। ये बात पंजाब और गोवा के चुनावी नतीजों से साफ हो गई थी। पंजाब में बड़ी आसानी से कांग्रेस ने सरकार बना ली। और गोवा में कांग्रेस के चुनाव प्रबंधकों की गलती और लापरवाही का फायदा बीजेपी ने उठा लिया। मणिपुर में भी लगभग यही रहा कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व हताशा से उबर ही नहीं पा रहा है और भारतीय जनता पार्टी अपनी मजबूती का फायदा लगातार उठा रही है। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की प्रचण्ड जीत के सामने कांग्रेस के अपने आधार मत को वापस पाने की चर्चा लगभग ना के बराबर हुई। और अब यही दिल्ली नगर निगम के चुनाव नतीजों पर भी हो रहा है। जिस पार्टी का पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ठीक चुनाव के बीच विरोधी पार्टी में चला जाए और बड़े-बड़े नेता पार्टी छोड़ने की कतार में लग जाएं, अगर उस पार्टी का मत प्रतिशत 2015 के विधानसभा चुनावों से करीब ढाई गुना बढ़ गया हो तो इसकी चर्चा होनी चाहिए। और इसका श्रेय भी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन को देना चाहिए। इसलिए अजय माकन को इस्तीफा देने की कतई जरूरत नहीं है। हां, इतना जरूर है कि कांग्रेस राज्यों में अपना खोया आधार वापस पाने की लड़ाई मजबूती से लड़ रही है और दिल्ली जैसी जगह में तो एक बार अरविन्द की छवि कमजोर होने लगी तो बड़ी आसानी से कांग्रेस उसी जगह पर खड़ी हो जाएगी। लेकिन, राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को अपना नेता तलाशना होगा, वरना 2019 में ये सारी बढ़त फिर गायब हो जाएगी।
 (ये लेख QuintHindi पर छपा है)

Friday, April 22, 2016

एक चुकी विरासत का शहजादा

राहुल गांधी को लेकर बार-बार ये कहा जाता है कि इतनी शानदार विरासत को वो संभाल नहीं पा रहे हैं। ये बात इतनी बार और इतने तरीके से कही जा चुकी है कि देश को राहुल गांधी पर अब नेता के तौर पर भरोसा हो ही नहीं पाता है। क्योंकि, देश के लोगों को लगने लगा है कि राहुल गांधी ही दरअसल नाकाबिल हैं। जबकि, कांग्रेस की और गांधी परिवार की विरासत बहुत समृद्ध है। इससे राहुल गांधी की नेतृत्व की क्षमता पर सवाल और गंभीर होता जाता है। अब सवाल यही है कि क्या राहुल गांधी को सचमुच इतनी शानदार विरासत मिली है। जिसे वो आगे नहीं ले जा पा रहे हैं। या दरअसल सच्चाई ये है कि राहुल गांधी को एक चुकी हुई विरासत मिली थी। एक पार्टी के तौर पर भी और एक परिवार के तौर पर भी।

राहुल गांधी की सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि राजनीतिक विश्लेषक और देश की जनता आज के समय में उनकी काबिलियत की तुलना उनके पिता राजीव गांधी से कर रही है। भले ही भारतीय जनमानस में राजीव गांधी की छवि एक गजब के नेता के तौर पर बनी हुई है। जिसने सीधे प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली और देश का सबसे नौजवान प्रधानमंत्री बन गया। लेकिन, विश्लेषक ये भूल जाते हैं कि दरअसल राजीव गांधी के अंदर भी नेतृत्व का कतई कोई गुण नहीं था। होता तो वो ब्रिटेन से पढ़ाई करके भारत लौटने के बाद अपनी मां इंदिरा के साथ राजनीति के गुर सीखते और देश को राजनीतिक तौर पर आगे ले जाने की कोशिश करते। लेकिन, राजीव गांधी ने ऐसा कतई नहीं किया। राजीव गांधी लौटकर सरकारी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए। और ये कोई बताने की जरूरत तो है नहीं कि जिस सत्ताधारी परिवार से वो आते थे। उसमें पायलट बनने की उनमें भले सारी योग्यता रही हो। दरअसल योग्यता की कोई जरूरत थी नहीं। 1980 में अगर संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मृत्यु न हुई होती, तो शायद राजीव गांधी चुपचाप विमान उड़ाते रहते और देश शायद ही उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर याद कर पाता। राहुल गांधी पर अकसर ये आरोप लगता है कि वो अपनी पारिवारिक अमेठी सीट से बाहर शायद ही चुनाव जीत सकें। लेकिन, ये कहने वाले भूल जाते हैं कि राजीव गांधी भी 1980 में संजय गांधी की मृत्यु के बाद उनकी पारिवारिक सीट से ही जीतकर आए थे। हालांकि, उस समय देश में जो स्थिति थी, उसमें राजीव गांधी कहीं से भी चुनाव लड़ते और जीत जाते। राजीव गांधी की उपलब्धि के तौर 1982 के एशियन खेलों को कराना भी बताया जाता है। उस समय राजीव गांधी कांग्रेस पार्टी के महासचिव थे। लेकिन, क्या राजीव गांधी ने कोई ऐसी विरासत दी थी, जिसे लेकर ये कहा जाए कि गांधी परिवार या कांग्रेस की समृद्ध विरासत राहुल गांधी को मिली थी, लेकिन, वो इसे संभाल नहीं पाए। राजीव गांधी अगर प्रधानमंत्री बन सके तो उसके पीछे इंदिरा गांधी की हत्या की बुनियाद पर मिला जबर्दस्त बहुमत था। अगर ऐसे प्रधानमंत्री बनना होता, तो सोनिया गांधी 2009 में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना सकती थीं। और कल्पना करके देखिए कि कभी-कभी ही सही लेकिन, राहुल जब बांहें चढ़ाते, कुछ चुने मुद्दों पर गुस्साते नजर आते, तो क्या जनता के बीच उनकी छवि मनमोहन सिंह से बेहतर होती या नहीं। ये बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि राहुल गांधी जब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर होते, तो निश्चित तौर पर इस देश की जनता में एक बड़ा वर्ग और खासकर सत्ता से चिपके रहने वाले कांग्रेसी नेताओं का एक बड़ा वर्ग तो निश्चित तौर पर राहुल गांधी को महानतम प्रधानमंत्री बनाने के सैकड़ों नुस्खे खोजकर उसे अमल में ला देता। क्योंकि, प्रधानमंत्री के तौर पर राजीव गांधी ने कुछ ऐसा नहीं किया था। जो खास हो। लेकिन, राजीव गांधी की बात होते ही नए भारत का निर्माता टाइप विशेषण राजीव गांधी के लिए कहा जाता है।


राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते ही भोपाल गैस कांड हुआ था। ये इतना बड़ा धब्बा है कि किसी भी नेता के सारे जीवन को कलंकित करने के लिए काफी था। लेकिन, भोपाल गैस कांड के बाद भी राजीव गांधी की छवि बेदाग नेता की ही रही। बोफोर्स घोटाला भी राजीव गांधी के समय में ही हुआ। उसी की वजह से 1989 में वी पी सिंह सत्ता में आए। ये राजीव गांधी ही थे जिनके समय में शाहबानो का मामला सामने आया। ये 542 में से 411 सीटें पाकर प्रचंड बहुमत वाली कांग्रेस थी। सोचिए इतने प्रचंड बहुमत वाली सरकार के मुखिया होने के बावजूद राजीव गांधी देश के लिए क्या खास कर पाए। फिर भी राजीव गांधी को भारत रत्न से नवाज दिया गया। दरअसल इसी सब वजह से राहुल गांधी पर ये दबाव बनता है कि वो इतनी बड़ी विरासत संभाल नहीं पाए। राहुल गांधी की डिग्रियों पर कई बार सुब्रमण्यम स्वामी सवाल उठा चुके हैं। लेकिन, शायद ही कभी इस बात की चर्चा हुई हो कि राजीव गांधी 1965 तक ट्रिनिटी कॉलेज, कैंब्रिज में पढ़ने के बावजूद अपनी डिग्री पूरी नहीं कर सके। विकीपीडिया पर अभी भी ये साफ लिखा हुआ दिखता है। ये राजीव गांधी ही थे जिन्होंने एक बयान दिया था कि बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती हिलती ही है। राजीव गांधी का वो बयान अगर आज के समय में आया होता, तो 24 घंटे के टीवी चैनल और सोशल मीडिया ने राजीव गांधी को क्या से क्या बना दिया होता। राजीव गांधी का वो वीडियो अब उपलब्ध है। उसे देखकर साफ लगता है कि राहुल गांधी दरअसल उसी विरासत को संभाल रहे हैं। जो उन्हें मिली थी। लेकिन, मीडिया आंदोलन के इस समय में राहुल गांधी नाकाम साबित हो रहे हैं। जबकि, सच्चाई यही है कि राहुल गांधी राजनीति में आने के अनिच्छुक होने के बावजूद अपनी हर कोशिश कर रहे हैं कि वो कांग्रेस के नेता बन सकें। दिक्कत बस इतनी है कि उनके पिता को प्रचंड बहुमत वाली सरकार मिल गई थी। उनके पिता के समय में मीडिया ऐसा नहीं था जो छोटी-छोटी बातों पर किसी नेता को धूल में मिला देता है। या फिर आसमान में खड़ा कर देता है। दरअसल राजीव गांधी उस समय के नेता थे, जब कांग्रेस के निष्ठावान लोगों का देश भारत हुआ करता था। उसमें सबसे बड़ी सेंध लगाने का काम विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किया था। लेकिन, लिट्टे ने जिस तरह से राजीव गांधी की निर्मम हत्या कर दी। उससे राजीव गांधी पर लगे सारे दाग धुल गए। राजीव गांधी के समय से स्थितियां एकदम उलट हैं। दरअसल राहुल गांधी को विरासत में पाने के लिए खास बचा नहीं है और राहुल गांधी की परवरिश ऐसी हुई नहीं है कि वो कांग्रेस को नए सिरे से लोगों के करीब पहुंचा सकें। इस समय न कांग्रेस के प्रति देश के लोगों में कोई उत्साह सम्मान बचा है ना गांधी परिवार के प्रति। इसीलिए मुझे लगता है कि राजनीतिक विश्लेषकों और देश की जनता को राहुल गांधी की समीक्षा एक समृद्ध विरासत वाले राजकुमार की बजाए एक चुकी हुई विरासत के शहजादे के तौर पर करनी चाहिए। तब शायद ज्यादा बेहतर समीक्षा राहुल गांधी की हो सकेगी। 

Friday, May 02, 2014

असल जादू या कांग्रेसी हाथ की सफाई

प्रियंका गांधी चर्चा में हैं। हर बार चुनावों के समय होती ही होती हैं। कमाल ये है कि त्यागी छवि के बावजूद रायबरेली गांधी परिवार का निर्बाध किला बना रहे इसके लिए प्रियंका गांधी को ही रायबरेली में जाकर डेरा डालना पड़ता है। मीडिया इसे कभी सोनिया गांधी की काबिलियत पर सवाल के तौर पर नहीं देखता हैवो इसे प्रियंका गांधी की लोगों से जुड़ने की अद्भुत क्षमता के तौर पर देखता है। ऐसी क्षमता जो अगर आगे आ जाए तो देश के सारे नेताओं को हिंद महासागर में डब मरने के हालात बना देगा। हालांकि, देश के दूसरे नेताओं के लिए अच्छी बात ये है कि प्रियंका गांधी का ये करिश्माई व्यक्तित्व कभी भी रायबरेली और अमेठी के आगे नहीं दिखा। अब बताइए रायबरेली और अमेठी तो वैसे ही राजीव, संजय और इंदिरा गांधी के समय से कांग्रेस का ही है। ये अलग बात है कि अपने बूते बीजेपी में रहकर भी खुद की नेता की छवि बनाने वाले वरुण गांधी को उतनी तवज्जो नहीं मिल पाती। कांग्रेस कार्यकर्ता और मीडिया बिना किसी बहस के ये भी मानता है कि ये खुद प्रियंका जी नहीं चाहती हैं कि वो राजनीति में सीधे तौर पर उतरें इसीलिए वो सिर्फ गांधी परिवार की संसदीय सीटों के राजनीतिक प्रबंधक के तौर पर काम करती रहेंगी। इस लिहाज से देखें तो प्रियंका गांधी की भूमिका दरअसल कैप्टन सतीश शर्मा या किशोरी लाल शर्मा से ज्यादा की नहीं है। लेकिन, इस तुलना से शायद ढेर सारे गांधी परिवार भक्त कांग्रेसी मेरी शक्ल बिगाड़ने की कल्पना भी करने लगेंगे। ये तुलना करना मेरे लिए भी मुश्किल काम था कि बताइए देश की सबसे करिश्माई नेता को मैं सतीश और किशोरी लाल शर्मा जैसे लोगों के साथ तौल रहा हूं। लेकिन, मैं पत्रकार हूं। तर्कों पर बात करता हूं। मेरे तर्क उससे अच्छे तर्क से काटे जा सकते हैं। मैं उससे खुश होता हूं। लेकिन, जरा सोचिए ना कि पिछले कई सालों से प्रियंका के करिश्माई व्यक्तित्व ने सिवाय इसके क्या किया है कि रायबरेली और अमेठी में पंजा का कब्जा है। क्या प्रियंका गांधी नहीं होतीं तो ये कब्जा नहीं होता। मैं निजी तौर पर मानता हूं जरूर होता। बिना प्रियंका गांधी के भी ये कब्जा होता। अब ये भी देखिए वही कांग्रेसी और मीडिया राहुल को योग्य साबित करने के हर पैमाने पर कसता है लेकिन, चुनावी समय में अमेठी में राहुल गांधी के दस साल से बने रहने को प्रियंका गांधी के सिर माथे मढ़ देता है। मुझे लगता है कि कांग्रेस के रणनीतिकारों ने ये मायावी जाला जानबूझकर तैयार किया है। क्योंकि, जितने सालों कांग्रेस पार्टी सरकार में रही है और गांधी परिवार के ही जरिए जितने साल रही है। फिर भी देश अपेक्षित गति से तरक्की नहीं कर सका है। इसका लोगों में जो गुस्सा है वो फूटेगा और तबके लिए कोई न करिश्मा बचाकर रखना जरूरी है। ये दरअसल इसलिए भी था कि कांग्रेस की बुरी दशा होनी ही होनी है ये अंदेशा कांग्रेस की रणनीति गांधी परिवार के इर्द गिर्द बनाए रखने वालों को बहुत पहले से था। लेकिन, कांग्रेस के उन रणनीतिकारों को ये बेहद अच्छे से पता है कि वो चाहे जो कर लें कि गांधी के दिए इस नाम को जोड़कर ही कोई कांग्रेस पार्टी के लिए फेवीक्विक का काम कर सकता है। यही गांधी फेविकोल कांग्रेस कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी ताकत है। अब राहुल गांधी तो सारी ताकत लगाने के बाद भी नेता ही नहीं बन पा रहा है तो क्या करें। खबरें ये है कि प्रियंका गांधी को चुनावों के तंरत बाद नतीजे जो भी आएं सोनिया गांधी की जगह दे दी जाएगी। मतलब साफ है कि सोनिया गांधी की सेहत अब वैसी नहीं है कि वो एक जड़ हो चुकी पार्टी को गति दे सकें। इसीलिए ऊर्जावान और कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और मीडिया के एक बड़े वर्ग में पक्के तौर पर करिश्मे के तौर पर देखी जा रही प्रियंका की ताजपोशी कर दी जाएगी।


राहुल गांधी तो राजनीतिक तौर पर किस कदर खत्म हो गए हैं इसका अंदाजा तो न्यूयॉर्क टाइम्स की कांग्रेस के भविष्य पर ताजा टिप्पणी करने वाली इस रिपोर्ट से ही लग जाता है। और इस रिपोर्ट के सिर्फ शुरुआती दो पैराग्राफ पढ़ने का समय निकालिए, सब समझ आ जाएगा। इसीलिए अब राहुल को चुका मानकर कांग्रेस के रणनीतिकार सलीके से प्रियंका को ही नेता बनाने पर तुल गए हैं। प्रियंका की छवि को पहले ही इंदिरा गांधी की छवि से बड़े सुनियोजित तरीके से जोड़ दिया गया है। अब मुझे पता नहीं है कि इंदिरा गांधी सिर्फ राजनीतिक रैलियों दौरों पर ही साड़ी पहनती थीं या प्रियंका तरह उदारमना थीं। सिर्फ चुनावी सभाओं, बैठकों के लिए साड़ी और बाकी समय जरूरत के लिहाज से आधुनिक परिधान। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। लेकिन, सिवाय उसी अंदाज में साड़ी पहनने, इंदिरा की तरह ही शक्ल दिखने को छोड़ दें तो इस प्रियंका में कौन सा करिश्मा है। ये मेरे जैसा पत्रकार तो नहीं समझ पा रहा है। सोचिए कि कांग्रेस जब सबसे बुरे हाल में है। जब नरेंद्र मोदी जैसी ताकतवर चुनौती कांग्रेस के सामने पहली बार खड़ी है तब भी प्रियंका सिर्फ रायबरेली और अमेठी में दूरदर्शन के वाद-संवाद जैसे आयोजन कर रही हैं। हालांकि, कांग्रेस कार्यकर्ता और मीडिया का बड़ा वर्ग चूंकि पहले से प्रियंका का करिश्मा मान रहा है तो उनके दो चार सौ की भीड़ के साथ वाद संवाद को भी नरेंद्र मोदी की मेहनत करके लाई, जुटाई या खुद आई भीड़ के बराबर की कवरेज दे रहा है। कांग्रेस के रणनीतिकार के तौर पर ही पहचाने जाने वाले जनार्दन द्विवेदी जैसे लोग शायद इस करिश्मे का कुछ असर इसी चुनाव में देखना चाहते थे। इसीलिए खबरें आ गईं कि राजीव गांधी प्रियंका को ही अपनी विरासत संभालते देखना चाहते थे। ये शायद प्रयोग का तरीका था। लेकिन, इससे गांधी नाम लगाए दोनों करिश्मे एक साथ एक ही चुनाव में ध्वस्त हो जाते। खैर मैं कह रहा है कि गांधी नाम लगाए दोनों करिश्मे यानी राहुल और प्रियंका गांधी। लेकिन, अब बात आगे निकल चुकी है। प्रियंका के नाम के आगे गांधी लगाने पर विवाद, बहस है तो ये तो तय हो ही गया है कि गांधी नाम का करिश्मा ध्वस्त हो चुका है। क्योंकि, प्रियंका अब राजनीति में आएंगी तो प्रियंका वाड्रा ही कहलाएंगी। रॉबर्ट वाड्रा के कर्मकांड की फाइल उनके खुलकर राजनीति में आने से पहले ही खुलने लगी है। प्रियंका गांधी की जादू वाली राजनीति अंदर से कितनी कमजोर है अंदाजा लगाइए कि जब वरुण गांधी सुल्तानपुर पहुंच गए तो प्रियंका वाड्रा का करिश्मा ऐसा हिला कि वो बिना मेकअप वाली हीरोइन हो गईं। प्रियंका वरुण गांधी को भटका हुआ और जाने क्या-क्या बताने लगीं। रायबरेली, अमेठी के बीच की सुल्तानपुर सीट पर गांधी तो आ रहा है कि स्थापित गांधी परिवार का कब्जा हट रहा है। इलाहाबाद की पहचान होने के बावजूद आनंद भवन, स्वराज भवन और कमला नेहरू अस्पताल भी प्रियंका गांधी को ये साहस नहीं दे पा रहा कि वो कहतीं कि रायबरेली से लेकर इलाहाबाद तक की हर सीट पर पंजे का ही कब्जा होगा। तो प्रियंका की जादूगरी हुई या कांग्रेसी हाथ की सफाई। इसीलिए मेरे दिमाग में ये सवाल बड़ा होता जा रहा है कि प्रियंका का ये जादू असल है या राजनीति में कांग्रेसी हाथ की सफाई भर है। 

Wednesday, October 28, 2009

ये पूरा बेड़ा गर्क करके ही मानेंगे

अब सोचिए कि क्या होगा। ये कुछ समझने-मानने को तैयार ही नहीं हैं। वैसे ये मान ही लेते तो, इस हाल में थोड़े न पहुंचते। इतनी गंभीर बीमारी है और इनके शुभचिंतकों से लेकर आलोचक तक अलग-अलग तरीके से इन्हें आगाह कर रहे हैं। लेकिन, इनको क्यों फर्क पड़े आखिर पूरी तरह से स्वस्थ पार्टी को गंभीरमरीज जैसे हाल में पहुंचाने में इनके जैसे बड़े लोगों की पूरी टोली के सत्कर्मों का तो बड़ा योगदान रहा है।


ये हैं बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह जो, ये मानने को तैयार ही नहीं हैं कि भारतीय जनता पार्टी को भारतीय जनता की पार्टी बने रहने के लिए बड़े इलाज की जरूरत है। पार्टी के पेस्ट कंट्रोल की जरूरत हम जैसे लोग तो बहुत पहले से कह रहे हैं। अब तो, ये बात खुद - कम से कम भारतीय जनता पार्टी के तो, सबसे बड़े समाजविज्ञानी- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहनराव भागवत भी कह रहे हैं। पत्रकारों के सवाल पूछने पर भागवत जी ने कहा बीजेपी हमसे सलाह मांगेगी तो, हम देंगे। लेकिन, बिन मांगे सलाह दे ही दी कि भाजपा को बड़ी सर्जरी या कीमोथेरेपी तक की जरूरत है।


लेकिन, अभी करीब डेढ़-2 महीने तक और बीजेपी के ठेकेदार रहने वाले राजनाथ से जब पत्रकारों ने भागवत जी इस सलाह पर प्रतिक्रिया मांगी तो, उन्होंने कहा ये कौन कह रहा है कि बीजेपी का बुरा हाल है। अब पता नहीं राजनाथ सिंह अपने प्रदेश में चार लोगों से मिल बैठके बतियाते भी हैं या नहीं। क्योंकि, अगर जरा भी बतियाते रहते तो, उन्हें पता लग जाता कि उनकी पार्टी की बीमारी इतनी बड़ी हो गई है कि अब लोग पार्टी में रहने वाले लोगों को इस छूत से दूर रहने की सलाह देने लगे हैं। मैं अभी चार दिन पहले इलाहाबाद से लौटा हूं और कांग्रेस के लिए ये सुखद है कि लोग बीजेपी में पड़े अपने नजदीकियों को सलाह देने लगे हैं कि राहुल गांधी से कोई जुगाड़ खोजो ना। क्योंकि, ढंग की राजनीति करने वालों के लिए सपा-बसपा में तो पहले ही जगह नहीं बची है।

Monday, July 27, 2009

जो कुछ किया सिर्फ हमने किया

करगिल भारतीय इतिहास का ऐसा पड़ाव है जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। इस महान विजय दिवस को 10 साल पूरे हो गए और मीडिया ने जिस तरह से करगिल के शहीदों, जवानों पर खास कार्यक्रम पेश किए उससे निश्चित ही देश में देशप्रेम की भावना उफान मार रही होगी। मीडिया ने तो अपना काम बखूबी किया। लेकिन, मैंने कल और आज (26 और 27 जुलाई) के सारे अखबार देख डाले उसमें कहीं भी एक छोटा सा भी विज्ञापन सरकार की ओर से शहीदों की याद करने वाला नहीं दिखा।


अखबारों में आधे से ज्यादा पेज पर रविवार, सोमवार दोनों ही दिन करगिल के शहीदों की याद दिलाने वाली खबरें छपी थीं। टीवी चैनलों (हिंदी-अंग्रेजी दोनों ही) पर तो शनिवार से ही करगिल के हर पहलू को याद दिलाने वाले खास शो चल रहे हैं। जिन्हें करगिल कम याद होगा। वो, भी उससे जुड़ गए होंगे। फिर क्या वजह है कि सरकार इसे याद करने से भी बच गई। हमें क्या सबको ही ये अच्छे से दिखता होगा कि कैसे गांधी परिवार में किसी की भी पुण्यतिथि हो तो, जाने कितने मंत्रालयों की तरफ से विज्ञापनों की कतार लगी होती है।



अरे छोटी सी उपलब्धि किसी मंत्रालय की होती है तो, एकाध पेज का विज्ञापन तो ऐसे ही चला जाता है। फिर देश को, देश के सम्मान को बचाने वाले इस दिन को सरकार कैसे भूल गई। क्या सिर्फ इसलिए कि ये महान विजय बीजेपी के शासनकाल में आई थी। क्या अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते जो कुछ भी देश के लिए हासिल किया वो, इतिहास में दर्ज नहीं होगा। क्या कांग्रेस ये तय करके बैठी है कि देश में आने वाली पीढ़ी को यही पता लगेगा कि आजादी से लेकर आज तक देश में जो कुछ हुआ है वो सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस की सरकार ने किया है।


अगर ऐसा न होता तो, क्या वजह है कि करगिल विजय दिवस मनाने से सरकार डर रही है। अब तो चुनाव भी 5 साल बाद हैं। क्या वजह है कि अटल बिहारी वाजपेयी के समय शुरू हुई स्वर्णिम चतुर्भुज योजना की रफ्तार बहुत कम कर दी गई है। ऐसा नहीं है कि यूपीए के समय सड़कें नहीं बन रही हैं। खूब बन रही हैं कि लेकिन, उस योजना की कामयाबी लोगों के जेहन से मिटाने की हर कोशिश ये सरकार कर रही है।


अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने ही देश के सभी किनारों को जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क योजना की ही तरह नदियों को जोड़ने की योजना का भी प्रस्ताव लाया था। अब उस पर कोई चर्चा ही नहीं है जबकि, अगर ये काम हो जाए तो, देश के एक हिस्से की बाढ़ और दूसरे हिस्से के सूखे के असंतुलन को बहुत कम किया जा सकता है। ऐसे ही चुनाव के समय चिदंबरम और प्रधानमंत्री तक बता रहे थे कि देश के पैसे को काला धन बनाकर जितना भी पैसा विदेश ले जाया गया है उसे सरकार हर हाल में वापस ले आएगी। लेकिन, अब उस पर कुछ सुनाई इसलिए नहीं दे रहा कि बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने ये मुद्दा जोर-शोर से उठाया था। बताइए न मैं गलत कह रहा हूं क्या ...

Wednesday, April 01, 2009

ये पिछले 62 सालों से अप्रैल फूल बन रहे हैं

बीजेपी का घोषणापत्र अब तक जारी नहीं हुआ है। लेकिन, ये कांग्रेस दो हाथ आगे दिखेगा। आखिर घोषणापत्र होता तो सिर्फ कहने के लिए ही होता है। इसलिए कांग्रेस ने पहले जो कहा उससे कुछ आगे तो बीजेपी वालों को कहना ही होगा। बानगी दिख गई है- गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी आडवाणी के लोकसभा क्षेत्र गांधीनगर में पहली चुनावी रैली में ही ये कह गए कि चावल 2 रुपए किलो मिलेगा।



नरेंद्र मोदी का 2 रुपए किलो चावल/गेहूं का फॉर्मूला शायद ही गुजरात में ज्यादा असर करता हो। लेकिन, देश भर में तो जमकर असर करता ही है। गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान राजकोट से 22 किलोमीटर दूर एक गांव राजसमढियाला गया। इस गांव की सालाना कमाई है करीब पांच करोड़ रुपए। 350 परिवारों वाले इस गांव के ज्यादातर लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन खेती ही है। लेकिन, इस गांव की कई ऐसी खासियत हैं जिसके बाद शहर में रहने वाले भी इनके सामने पानी भरते नजर आएं। 2003 में ही इस गांव की सारी सड़कें कंक्रीट की बन गईं। 350 परिवारों के गांव में करीब 30 कारें हैं तो, 400 मोटरसाइकिल।



इस गांव में कांग्रेस के 3 रुपए किलो और नरेंद्र मोदी के 2 रुपए किलो चावल का कोई खरीदार नहीं है। और, इस गांव में न तो गरीबी मुद्दा है न वोट बैंक है। क्योंकि, गांव में अब कोई परिवार गरीबी रेखा के नीचे नहीं है। इस गांव की गरीबी रेखा भी सरकारी गरीबी रेखा से इतना ऊपर है कि वो अमीर है। सरकारी गरीबी रेखा साल के साढ़े बारह हजार रुपए कमाने वालों की है। जबकि, राजकोट के इस गांव में एक लाख रुपए से कम कमाने वाला परिवार गरीबी रेखा के नीचे माना जाता है।



गांव में विकास के नाम पर नेता वोट मांगने से डरते हैं। विकास में ये सरकारों की भागीदारी अच्छे से लेते हैं। यही वजह है कि चुनावों के समय भी इस गांव में कोई भी चुनावी माहौल नजर नहीं आता। न किसी पार्टी का झंडा न बैनर। गांव बाद में एक साथ बैठकर तय करते हैं कि वोट किसे करना है। लेकिन, जागरुक इतने कि अगर किसी ने वोट नहीं डाला तो, पांच सौ रुपए का जुर्माना भी है।



लेकिन, ये तो गुजरात के एक गांव की अपनी इच्छाशक्ति है कि वहां गरीब नहीं है और गरीबी मुद्दा नहीं है इसलिए गरीबों का वोटबैंक भी नहीं है। लेकिन, पूरे देश में गरीबों का ये वोटबैंक- जाति, धर्म, कम्युनल, सेक्युलर सबसे ज्यादा बड़ा है और आसानी से पकड़ में भी आ जाता है। दरअसल ये 2 रुपए-3 रुपए किलो चावल/गेहूं सरकारी खजाने को भले ही जमकर चोट पहुंचाता हो और जिनको ये दिया जाता है उन लोगों को अगले चुनाव तक फिर उसी हाल में रहने का आधार तैयार कर देता है कि वो तथाकथित सरकारी गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवार यानी BPL परिवारों में शामिल रहें। इस तरह के एलानों से वोट थोक में मिलते हैं और चुनाव के बाद चूंकि इन BPL परिवारों की चर्चा न तो मीडिया में होती है न तो, राजनीतिक पार्टियों में तो, कोई अलोकप्रिय होने का खतरा भी नहीं होता है।


कांग्रेस तो, पिछले करीब 35 सालों से हर चुनावी घोषणापत्र में गरीबी हटाने की बात कर रही है। कांग्रेस है तो, गांधी परिवार की विरासत कैसे भूल सकती है। इंदिरा गांधी को गरीबी हटाओ के नारे ने ही प्रधानमंत्री बना दिया था। इसलिए कांग्रेस के घोषणापत्र पर हाय गरीब-हाय गरीबी हावी हो गई। कांग्रेस ने कहा कि उनकी सरकार बनती है तो, गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को 3 रुपए किलो गेहूं, चावल दिया जाएगा। यानी देश पर सबसे ज्यादा समय तक राज करने वाली कांग्रेस ने लगे हाथ ये मान लिया कि गरीबी की रेखा के नीचे इतने लोग हैं कि वो, वोट देकर उसे चुनाव जिता सकते हैं वो, भी सिर्फ तीन किलो चावल-गेहूं के लिए।



कांग्रेस एक फूड सिक्योरिटी एक्ट की भी बात कर रही है जिसमें सबको खाना देने का वादा है। इसके लिए नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट बनेगा। कांग्रेस को लगता है कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना उसकी सबसे बड़ी यूएसपी है। इसीलिए वो, नरेगा योजना में लोगों को 100 दिन रोजगार के साथ 20 रुपए ज्यादा रोजाना की मजूरी यानी 100 रुपए की मजूरी का भी पक्का वादा कर रही है। जाहिर है ये फूड सिक्योरिटी एक्ट से खाना, नरेगा की मजदूरी वही लोग करेंगे जिनका जीवनस्तर आजादी के 62 सालों बाद भी इस लायक नहीं हो पाया है कि वो अपने अगल-बगल खुले चमकते डिपार्टमेंटल स्टोरों, मॉल से खरीदारी न कर सकें।



रहमान की जय हो धुन को जब ऑस्कर सम्मान मिला तो, कांग्रेस को लगा कि इससे बेहतर स्लोगन चुनाव जीतने के लिए हो ही नहीं सकता। आखिर, ये धुन तो दुनिया जीतकर लौटी है तो, इसके बूते कांग्रेस को देश का राज जीतने में भला क्यों मुश्किल होगी। लेकिन, स्लमडॉग मिलिनेयर फिल्म के बच्चों से मिलने की तस्वीरें जब टीवी चैनलों पर झुग्गी वाले भारत की कहानी दिखाने लगीं तो, कांग्रेस को लगा शायद थोड़ी गलती हो गई है। तब से कांग्रेस ने जय हो गाने की धुन जरा धीमी कर दी है।


कांग्रेस कह रही है कि उसका राज आया तो, सबको शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं मिलेंगी। महंगाई कम करने और तेज विकास का वादा भी किया गया है। छोटे उद्योगों को मदद दी जाएगी। नौजवान बेरोजगार नहीं रहेगा इसका भी भरोसा दिलाने की कोशिश है।

सोनिया के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भाषण दे रहे हैं कि देश से गरीबी हटाने में अभी 15-20 साल लगेंगे। यानी अगले करीब चार लोकसभा चुनावों तक चुनावी घोषणापत्रों में सस्ते गेहूं-चावल और 100 रुपए की मजूरी पर जनता को लुभाया जाता रहेगा। क्योंकि, दुनिया के अमीरों में हमारे अमीरों के जब और आगे बढ़ने की खबर आती है तो, दूसरी सच्चाई जो थोड़ा धीरे से सुनाई जाती है जिससे फीलगुड कम न हो वो, ये है कि भारत की एक बड़ी आबादी अभी रोजाना एक बिसलेरी की बोतल यानी 20 रुपए से भी कम में गुजारा करती है।

मुद्दों की बात होती है तो, किसी भी सर्वे में अब गरीबी जैसा मुद्दा होता-दिखता ही नहीं है। लेकिन, दरअसल ये गरीब और गरीबी इस देश का सबसे बड़ा वोटबैंक है जो, चुनावों तक पार्टियों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा होता है। लेकिन, जैसे ही वोट बैलट बॉक्स में गए गरीबों की किस्मत और उनकी चर्चा भी अगले चुनाव तक ताले में ही चली जाती है। भारतीय लोकतंत्र में गरीबों का वोट जय हो। चुनाव तक गरीबों की भी जय हो ...

Tuesday, March 03, 2009

पिटते राष्ट्रीय मुद्दे और राष्ट्रीय पार्टियां

लोकसभा चुनाव का एलान हो गया है। देश भर से चुने गए सांसद अपनी पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के लिए एक दावेदार पेश करेंगे जो, देश चलाने का दावा करेगा। लेकिन, चुनावी महासमर से पहले इतना तो साफ हो गया है कि प्रधानमंत्री भले ही दोनों राष्ट्रीय पार्टियों (कांग्रेस या बीजेपी) में से किसी का किसी तरह से बन जाए। देश पर राज अब क्षेत्रीय पार्टियां ही करेंगी। क्षेत्रीय पार्टियों का दबाव होगा, स्थानीय मुद्दे हावी होंगे। राष्ट्रीय मुद्दों पर भाषण खूब होंगे लेकिन, वोट नहीं मिलेंगे।


मैं अगर कह रहा हूं कि सब कुछ क्षेत्रीय-स्थानीय हो गया है। राष्ट्रीय मुद्दा, राजनीति पीछे छूट रहे हैं तो, ऐसे ही नहीं कह रहा हूं। कल जब गोपालस्वामी चुनाव की तारीखों का एलान कर रहे थे तो, देश की दोनों बड़ी पार्टियां राज्यों में अपने सांसद बढ़ाने के लिए स्थनीय-क्षेत्रीय दलों को साष्टांग प्रणाम कर रहीं थीं। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस, लेफ्ट का गढ़ ढहाने के लिए ममता के सहारे थी तो, उत्तर प्रदेश में उसे मुलायम-अमर की जोड़ी का सहारा है जिन्होंने साम-दाम-दंड-भेद से यूपीए सरकार को परमाणु समझौते के मुद्दे पर बचा लिया था।



मामला सिर्फ इतना ही नहीं है कि कांग्रेस का हाथ इन क्षेत्रीय पार्टियों से मिलने के लिए बेकरार है, असल बात तो कांग्रेस को क्षेत्रीय पार्टियों का पिछलग्गू बनने से गुरेज नहीं है। बंगाल में कांग्रेस के संकटमोचक प्रणव मुखर्जी प्रदेश अध्यक्ष हैं। लेकिन, राष्ट्रीय पार्टी के इस अंतराष्ट्रीय संकटमोचक के पास अपनी पार्टी की राष्ट्रीय उपस्थिति बनाए रखने का कोई नुस्खा नहीं है।


लेकिन, संकटमोचक महाराज पर ही सवाल क्यों खड़ा किया जाए? जब त्यागी सोनिया माता के साथ देश भर में कांग्रेस को खड़ा करने की अनोखी योजना तैयार करने का दावा करने वाले राहुल भइया और नौजवान आंधा-प्रियंका गांधी अपनी खानदानी विरासत वाले राज्य उत्तर प्रदेश में ही कोई ढंग की योजना नहीं दे पा रहे हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के समय दिल्ली में गांधी परिवार के एक निकट व्यक्ति ने मुझसे कहाकि राहुल भइया की नजर लोकसभा चुनाव पर है। विधानसभा चुनाव तो सिर्फ रिहर्सल भर है।


योजना ये थी कि राहुल के विदेशों में पढ़ी नौजवानों की एक टीम लोकसभा चुनाव का खाका तैयार करेगी। विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए मजबूत सीटों को तलाशा जाएगा और पुराने-नए चेहरों को मिलाकर 15-20 सांसद उत्तर प्रदेश से भेजने को कोशिश होगी। अब वो कोशिश कहां तक पहुंची है ये तो मुझे नहीं पता। लेकिन, कांग्रेस का हाल ये है कि 80 सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में मुलायम उसे 17 से ज्यादा देने को तैयार नहीं हैं। वो, भी तब जब बहनजी के प्रकोप से मुलायम डरे-डरे से घूम रहे हैं। अब 17 सीटं लड़ने को ही मिलेंगी तो, 15-20 सांसद जीतेंगे कैसे ये गणित तो, किसी चमत्कार से ही सिद्ध हो पाएगा।


राष्ट्रीय पार्टियों का हाल कितना बुरा है। इसका सही-सही अंदाजा उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के अभी हुए विधानसभा चुनावों से मिल जाता है। इन दोनों ही राज्यों में सत्ता में काबिज बसपा और लेफ्ट फ्रंट को अभी हुए विधानसभा चुनावों में करारी हार झेलनी पड़ी है। दोनों ने ही पूरा दम लगा रखा था। लेकिन, सब टांय-टांय फिस्स हो गया। काबिलेगौर बात ये कि इसका फायदा मिला दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों को- उत्तर प्रदेश में सपा और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस। दोनों ही जगह कांग्रेस-बीजेपी बहुत पिछड़ी हुई दिखीं।


पश्चिम बंगाल की विश्णुपुर (पश्चिम) विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने सीपीएम प्रत्याशी को 30 हजार वोटों के भारी अंतर से हरा दिया। लेकिन, राजनीति की नब्ज बताने वाली हार थी उत्तर प्रदेश की भदोही विधानसभा सीट से बहनजी की बसपा की। भदोही सीट मई 2007 में बसपा ने 5000 वोटों से जीती थी। अब करी इतने ही वोटों से सपा ने ये सीट जीत ली है।


भदोही विधानसभा सीट जीतने के लिए मायावती ने पूरी ताकत झोंक दी थी। 80 हजार दलित, 55 हजार मुस्लिम और इतने ही ब्राह्मण मतदाताओं वाली सीट पर बहनजी के पक्ष में सारे समीकरण दिख रहे थे। लेकिन, सब उल्टा हो गया। बावजूद इसके लिए मायावती की रैली हुई। ब्राह्मण-दलित एकता फॉर्मूले को अग्रदूत सतीश चंद्र मिश्रा और उनके खास ब्राह्मण सिपहसालारों – नकुल दुबे, अनंत मिश्रा, राकेशधर त्रिपाठी (सारे मंत्री)- और मायावती सरकार के ताकतवर मुस्लिम चेहरे नसीमुद्दीन सिद्दिकी ने पूरी ताकत झोंक दी थी।


यहां जो वोट मिले हैं वो, राष्ट्रीय पार्टियों की हैसियत को देश के इस सबसे बड़े सूबे में आइना दिखाते हैं। भदोही उपचुनाव में सपा की मधुबाला पासी को 60,507 वोट मिले। दूसरे नंबर पर रहे बसपा के अमर सिंह सरोज को 55,487 वोट मिले। अब जरा दोनों राष्ट्रीय पार्टियों का हाल देखिए। बीजेपी के दीनदयाल सोनकर बसपा, सपा से बहुत पीछे – हां, तीसरे नंबर पर ही- 14,693 वोट ही जुटा पाए। अब आपको लग रहा होगा कि चौथे नंबर पर तो कांग्रेस ही होगी। जी नहीं, कांग्रेस प्रत्याशी को यहां सिर्फ 2,275 वो मिले हैं। जो, क्षेत्रीय में क्षेत्रीय किसी प्रगतिशील मानव समाज पार्टी के प्रत्याशी के 4,258 वोटों से भी कम हैं।


यही वजह है कि लौह पुरुष आडवाणी को अजीत की राष्ट्रीय लोकदल को 7 सीटें देना फायदे का सौदा लग रहा है। लेकिन, ये भी काफी हद तक तय है कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को गाजियाबाद सीट से लोकसभा में पहुंचने का फायदा भले इस गठजोड़ से हो जाए। ज्यादा फायदा अजीत सिंह को ही मिलना है।


ये हाल सिर्फ उत्तर प्रदेश बंगाल का नहीं है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और 7 लोकसभा सीटों वाली दिल्ली को छोड़ दें तो, पूरे देश में राष्ट्रीय पार्टियां क्षेत्रीय पार्टियों के पीछे कदमताल कर रही हैं। यही वजह है कि दिल्ली में बैठे नेताओं का पुराना दंभ – कि लोकसभा चुनाव में तो राष्ट्रीय मुद्दों पर बात होती है- टूट गया है। मुझे क्षेत्रीय पार्टियों के उत्थान से समस्या नहीं है। मुझे समस्या ये है कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग क्षेत्रीय पार्टियों के पीछे जैसे राष्ट्रीय पार्टियां चल रही हैं। वैसे ही हर राज्य में क्षेत्रीयता ही लोकसभा चुनाव पर हावी होती दिख रही है।



राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे रैली में झंडा-बेनर लगाने वाले कार्यकर्ता की तरह दरी पर किनारे बैठाए गए हैं। सजे मंच पर क्षेत्रीयता, जातिवाद, सांप्रदायिकता हावी है। इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार वैसे दोनों राष्ट्रीय पार्टियां ही हैं। आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा, महंगाई, परमाणु करार पर अखबारों, टीवी चैनलों पर बहस तो चलेगी। कोई 4-6-10 हजार लोगों को लेकर मीडिया घरानों के सर्वे में इस पर 50-60 प्रतिशत लोग चिंता भी जताएंगे। लेकिन, देश की दिशा तय करने वाला एक और चुनाव पूरी तरह से क्षेत्रीय हो गया है। ये एक संप्रभु देश का चुनाव नहीं, अलग-अलग छोटे-छोटे देशों की सहमति से बने एक समूह का चुनाव हो रहा है। ये स्थिति थोड़ी बहुत बदल सकती है तो, हमारे-आपके वोट से। लेकिन, इसके लिए बहुत प्रयत्न करना होगा।


(ये लेख अमर उजाला के संपादकीय पृष्ठ पर छपा है)

Tuesday, April 08, 2008

राहुल बाबा के आह्वान के बाद राजनीति में युवाओं को तवज्जो मिली

राहुल के डिस्कवर इंडिया कैंपेन में उन्हें कुछ मिला हो या न मिला हो। विरासत में कांग्रेसी राजनीति के खासमखास परिवारों के दो ‘बाबा लोगों’ को आखिर ‘बड़का लोगों’ की राजनीति में जगह मिल ही गई। ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद को चुनावी साल के पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिल गई है। चुनावों को ध्यान में रखकर कुछेक और छोटे-छोटे मंत्रिमंडलीय परिवर्तन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मैडम सोनिया के इशारे पर किए लेकिन, खास बदलाव यही दोनों हैं।

सोनिया गांधी, राहुल को ठीक उसी तरह से गद्दी संभालने के लिए तैयार कर रही हैं। जैसे, महाराजा-महारानी युवराज को गद्दी के लायक बनाते थे। राजशाही और लोकतंत्र में फर्क सिर्फ इतना ही है कि तब 14 साल का युवराज भी खास दरबारियों के भरोसे गद्दी संभाल लेता था। अब, लोकतंत्र में कम से कम 25 साल की उम्र तो होनी ही चाहिए। और, दरबारियों से ज्यादा हैसियत हासिल करनी ही होती है। ये दिखाता है कि जो, वो कह रहा है वो किसी भी वरिष्ठ दरबारी से ज्यादा सुना जा रहा है। वो, काम सोनिया ने राहुल के लिए धीरे-धीरे पूरा कर दिया है।

राहुल ने डिस्कवर इंडिया कैंपेन में कहा कि देश की राजनीति में युवाओं को कम मौका मिल रहा है। फिर जब उन्होंने अपनी पार्टी कांग्रेस पर भी यही आरोप लगाया तो, लोगों को लगा कि भारतीय राजनीति में गजब का ईमानदार नेता सामने आ रहा है। लेकिन, ये ईमानदारी कम थी और राजनीति ज्यादा। इसका अंदाजा इससे साफ लग जाता है कि मंत्रिमंडल में जो परिवर्तन कए गिए हैं वो, परिवर्तन कहीं से भी चुनाव को बहुत प्रभावित नहीं करेंगे। हां, राहुल के युवाओं को मौका न दिए जाने की बात उठाने पर दो युवाओं को मौका दे दिया गया। पहले राहुल के साथ के लिए राष्ट्रीय कांग्रेस में खानदानी कांग्रेसियों के घर के बच्चों को एक साथ मौका दिया गया था।

मीडिया में भले ही ये बात कही जा रही हो कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में आधार बढ़ाने के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद को केंद्रीय राज्य मंत्री बनाया गया है। लेकिन, उत्तर प्रदेश की राजनीति को थोड़ा भी जानने वाला ये बात अच्छे से जानता है कि जितिन प्रसाद को कितने ब्राह्मण अपना नेता मानते हैं और ग्वालियर से बाहर ज्योतिरादित्य की कितनी ताकत है। कुल मिलाकर राहुल बिना प्रधानमंत्री बने ही मंत्रिमंडल का फैसला करने लगे हैं। तो, कांग्रेस की ओर से अगले चुनाव में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित करने की जरूरत अब भी है क्या। क्योंकि, त्याग की प्रतिमूर्ति सोनिया गांधी दुबारा विदेशी मूल का मुद्दा तो विरोधियों को देना भी नहीं चाहेंगी। त्यागी सोनिया ने ये भी बता दिया कि राहुल ने मंत्री बनने से इनकार कर दिया है।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...