Saturday, December 31, 2022

2022 के संकेत, 2023 की योजना से तय होंगे 2024 के परिणाम

हर्ष वर्धन त्रिपाठी Harsh Vardhan Tripathi



 

नया वर्ष जिस तरह से कब शुरू होकर खत्म हो जाता है, वैसे ही भारत में चुनावी राजनीति में एक राज्य के चुनाव से दूसरे राज्य का चुनाव होते कब अगले लोकसभा चुनाव की वक्त जाता है, पता ही नहीं लगता, लेकिन राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के परिणामों से लोकसभा चुनाव के परिणामों का पता अवश्य लगने लगता है। 2014 में नरेंद्र मोदी प्रचंड बहुमत से जीतकर आए तो हर तरह की पारंपरिक राजनीतिक परिभाषाएँ परिवर्तित होती दिखीं और अब जब 2022 बीतते देश में दो बार प्रचंड जनादेश पाने वाले नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात में भारतीय जनता पार्टी ने अब तक के सारे पुराने मारकों को ध्वस्त कर दिया तो अगला वर्ष राजनीतिक दृष्टिकोण से बड़ा रोचक दिखने लगा है। 2023 में 9 राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं। जम्मू कश्मीर में भी चुनाव कराने को लेकर राज्य की पार्टियाँ खूब दबाव बना रही हैं। 2023 के शुरुआती महीनों से आख़िरी महीनों तक होने वाले चुनाव में हिंदी भाषी राज्य मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान हैं तो पूर्वोत्तर के राज्यों के साथ ही दक्षिण भारत में भाजपा के प्रवेश द्वार कर्नाटक में भी चुनाव होना है। और, जब तक इन राज्यों के विधानसभा चुनाव संपन्न होंगे, 2024 के लोकसभा चुनाव की आहट तेज हो जाएगी। इसलिए 2023 भारतीय राजनीति के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण होने वाला है। गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव के साथ ही कई उपचुनाव हुए और देश की राजधानी दिल्ली के नगर निगम के चुनाव भी हुए। एक साथ हुए इन चुनावों के परिणामों के आधार पर 2024 के लोकसभा चुनावों के परिणामों की चर्चा होने लगी है। स्पष्ट दिख रहा है कि, दो राज्यों के विधानसभा चुनावों, कई उपचुनावों और दिल्ली नगर निगम के परिणामों ने 2024 के राजनीतिक समीकरण को पूरी तरह से परिवर्तित कर दिया है। अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि, क्या राजनीतिक समीकरण में दिख रहे इस बड़े परिवर्तन से देश की राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन भी होता दिख रहा है।

2022 में एक बड़ी राजनीतिक घटना भारत जोड़ो यात्रा भी रही, जो 2023 में संपन्न होगी। हालाँकि, कांग्रेस पार्टी की तरफ से राहुल गांधी की अगुआई में चल रही इस यात्रा को हमेशा ही गैर राजनीतिक बताया गया। यह अलग बात है कि, राजनीतिक समीकरणों का सलीके से ध्यान रखते हुए कांग्रेस पार्टी ने दूसरे विपक्षी दलों को इसमें शामिल होने के लिए तो पहले से आमंत्रित किया और ही राहुल गांधी के के अलावा दूसरे किसी भी नेता को इस यात्रा में जरा सा भी महत्व दिया। उत्तर प्रदेश पहुँचते यह यात्रा विपक्ष के राजनीतिक अंतर्द्वंद का सबसे बड़ा उदाहरण बन गई। कांग्रेस की तरफ से कहा गया कि, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, बसपा प्रमुख मायावती, राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी सहित सभी विपक्षी दलों को इस यात्रा में राहुल गांधी के साथ शामिल होने के लिए न्योता गया है, लेकिन अखिलेश यादव ने इस यात्रा का न्योता मिलने से इनकार करते हुए कांग्रेस की राजनीतिक हैसियत ही समाप्त सी बता दी। अखिलेश यादव ने भारत जोड़ो यात्रा में शामिल होने के प्रश्न का उत्तर एक प्रश्न से दिया। अखिलेश यादव ने पूछा- भाजपा को कौन हराएगा। दरअसल, अखिलेश यादव का यह प्रश्न कांग्रेस के शुतुरमुर्गी व्यवहार को उजागर कर देता है। साथ ही, नरेंद्र मोदी के सामने विपक्ष के नेता के तौर पर राहुल गांधी की दावेदारी पर भी बड़े प्रश्नचिन्ह लगा देता है। कांग्रेस पार्टी ने जिस तरह से बिना विपक्षी पार्टियों को भरोसे में लिए सिर्फ राहुल गांधी को नेता बनाए रखने के लिए यह यात्रा निकाली है, उसे कांग्रेस से ही निकले या दूसरे परिवारवादी क्षेत्रीय दल अच्छे से समझ रहे हैं। उनको यह पता है कि, कांग्रेस उन्हीं दलों से अपना खोया हुआ आधार वापस लेना चाह रही है। इसीलिए, सभी क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस को यात्रा को भावनात्मक समर्थन तो दिया, लेकिन उसकी गंभीरता बन पाए, इसके लिए हरसंभव प्रयास करते रहे। महाराष्ट्र में शरद पवार और उद्धव ठाकरे ने स्वयं जाकर अपने पुत्र-पुत्रियों को यात्रा में शामिल होने के लिए भेज दिया। दरअसल, इसे इस संदेश के तौर पर भी देखा जा सकता है कि, राहुल गांधी को शरद पवार या उद्धव ठाकरे अपने नेता के तौर पर केंद्रीय राजनीति में बर्दाश्त नहीं करते। यही संदेश उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव भी देने का प्रयास कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ही भारतीय जनता पार्टी के सामने बड़े दल के तौर पर लड़ रही है, ऐसे में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव अगर राहुल गांधी के साथ यात्रा में शामिल होते हैं तो उससे कांग्रेस को लाभ हो सकता है, लेकिन समाजवादी पार्टी को मत देने वाले वर्ग में भ्रम हो सकता है। इसे अधिक स्पष्टता से ऐसे भी समझ सकते हैं कि, मुस्लिम मतदाताओं के बहुतायत वर्ग में समाजवादी पार्टी और उसके बहुजन समाज पार्टी ही भाजपा के विरोध में विकल्प के तौर पर दिखती है। उसी मुस्लिम मतदाता समूह  में हिस्सेदारी के लिए कांग्रेस भी जूझ रही है। और, 2023 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के पक्ष में एक अच्छी बात यही है कि, अधिकतर चुनावी राज्यों में भाजपा और कांग्रेस का सीधा मुकाबला है। कोई क्षेत्रीय दल कांग्रेस के सेक्युलर मतों में हिस्सा बाँटने की स्थिति में नहीं है। इसमें कर्नाटक एक अपवाद है। अब यहाँ एक बड़ा प्रश्न है। इसका उत्तर 2023 में मिल सकता है। 2022 में दिल्ली नगर निगम भाजपा से छीनने और गुजरात में भाजपा विरोधी बड़े मतदाता समूह को अपने पक्ष में करने में कामयाब आम आदमी पार्टी हिंदी भाषी राज्यों- राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के अलावा दक्षिणी राज्य कर्नाटक को लेकर क्या योजना बना रही है। गुजरात विधानसभा चुनावों के बाद आम आदमी पार्टी ने इस बात को जोर शोर से प्रचारित किया कि, आम आदमी पार्टी अब राष्ट्रीय पार्टी बन चुकी है। ऐसे में राजनीतिक लिहाज से इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि, ढलान पर लुढ़क रही कांग्रेस को आम आदमी पार्टी चुनावी राज्यों में धकेलकर उसका हिस्सा हथियाने की कोशिश करेगी। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस जीत भले गई हो, लेकिन उसका उत्साह कांग्रेस पार्टी के भीतर बहुत दिखता नहीं है। उसकी एक बड़ी वजह यह भी रही है कि, गुजरात में राहुल गांधी प्रतीकात्मक तौर पर गए भी थे, लेकिन हिमाचल प्रदेश से राहुल गांधी ने पूरी तरह दूरी बनाए रखी। कांग्रेस में यह चर्चा बारंबार होती रही है कि, प्रियंका गांधी वाड्रा को गलती से भी राहुल गांधी से बड़ा नहीं बनने देना है। प्रियंका गांधी वाड्रा के नजदीकी लोग निजी बातचीत में कहते भी हैं कि, 2019 में कांग्रेस के बुरी तरह से हारने के बाद राहुल गांधी ने त्यागपत्र देते जिस तरह से कह दिया कि, गांधी परिवार का कोई भी अध्यक्ष की कुर्सी पर नहीं बैठेगा, उसे प्रियंका को कांग्रेस के शीर्ष पद पर बैठने की तरकीब के तौर पर भी बहुत से लोग देखते हैं। हालाँकि, कांग्रेस अध्यक्ष पद पर सोनिया गांधी हो, राहुल गांधी हों या अभी मल्लिकार्जुन खरगे, इससे कांग्रेस का राजनीतिक स्थिति में सुधार होता नहीं दिख रहा है। उत्तर प्रदेश के प्रभारी महासचिव के तौर पर कांग्रेस की लोकसभा में दो से सीटें घटकर एक ही रह गईं। इसे प्रियंका की आलोचना के तौर पर भी राहुल के खेमे के लोग बताते हैं। खैर, यह कांग्रेस के भीतर का मसला है, इससे राष्ट्रीय राजनीति या नरेंद्र मोदी के विकल्प के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं मिलने वाला है, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव परिणामों से अवश्य तय होगी। विशेषकर चार राज्यों के परिणामों के लिहाज से 2024 के राजनीतिक चित्र अपनी तरह से तैयार करने के गर्क राजनीतिक विश्लेषक तैयार कर लेंगे। मध्य प्रदेश और कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और राजस्थान, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है। मध्य प्रदेश और कर्नाटक की पीड़ा कांग्रेस को इसलिए भी बहुत अधिक है क्योंकि, इन दोनों ही राज्यों में कांग्रेस के विधायकों ने पाला बदलकर कांग्रेस की सरकार गिराई और भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, जीता और भाजपा की सरकार बनवा दी। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान अभी भी मुख्यमंत्री बने हुए हैं जबकि, कर्नाटक में भाजपा ने येदियुरप्पा को बदलकर बासवराज बोम्मई को कुर्सी सौंप दी है। येदियुरप्पा की नाराजगी दूर करने के लिए उन्हें पार्टी की सर्वोच्च संसदीय समिति में स्थान दे दिया है। कर्नाटक में भाजपा की डगर मुश्किल करने में जनार्दन रेड्डी भी लग गए हैं। अपनी पार्टी बनाकर भाजपा के मतों को काटने का प्रयास कर रहे हैं। हालाँकि, बेल्लारी वाले जनार्दन रेड्डी की पार्टी बहुत कुछ कर पाएगी, इसमें संदेह है। उसकी बड़ी वजह यह भी है कि, जनार्दन रेड्डी के दोनों विधायक भाई और कर्नाटक की भाजपा सरकार में मंत्री बी श्रीरामुलू बमुश्किल भाजपा का साथ छोड़कर रेड्डी के साथ जाएँगे। कर्नाटक के इस चुनाव में टीपू सुल्तान और हिजाब का मुद्दा निश्चित तौर पर प्रभावी रहने वाला है। भाजपा और कांग्रेस, दोनों के लिए राह कठिन है। मध्य प्रदेश में शिवराज के स्थान पर नरोत्तम मिश्रा और ज्योतिरादित्य सिंधिया में से किसी को कमान देने की बात लगातार चलती रहती है, लेकिन मध्य प्रदेश के मामाजी का विकल्प भाजपा को नहीं मिल रहा। राजस्थान में कांग्रेस के अशोक गहलोत और सचिन पायलट एक दूसरे से लगातार जूझ रहे हैं, लेकिन यहाँ भाजपा की भी अंदरूनी लड़ाई कम नहीं है। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल छवि के मामले में बेहतर दिख रहे हैं। उनके सामने भाजपा अभी तक किसी एक चेहरे को पुख्ता तौर पर आगे नहीं बढ़ा सकी है। इसके अलावा पूर्वोत्तर के राज्यों में गठजोड़ के सहारे ही भाजपा है, लेकिन त्रिपुरा में वामपंथी किले को ढहाने के बाद दोबारा जीतकर इस राज्य को अपना किला बना पाएगी, यह बड़ा प्रश्न है। बिप्लब देब को मुख्यमंत्री पद से हटाकर मानिक साहा को भाजपा ने मुख्यमंत्री बना दिया है, लेकिन वहाँ भाजपा विधायकों का विद्रोह भाजपा के लिए बड़ी समस्या है। भाजपा के हर समस्या के समाधान के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा दिखता है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए राज्यों के चुनावों में भी एक वर्ग भाजपा की तरफ अतिरिक्त झुकाव ले लेता है, लेकिन कांग्रेस की मुश्किल यह है कि, उसके सबसे बड़े नेता के तौर पर स्थापित राहुल गांधी राजनीतिक लड़ाई लड़ने तक से बचते हैं। 2022 में महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों के बीच राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को इसी तरह देखा जा रहा है और, अब आम आदमी पार्टी भी कांग्रेस का खेल खराब करने के लिए अधिक उत्साहित हो गई है। इन समीकरणों में संतुलन जिसके पक्ष में जाएगा, उसी के पक्ष में अगले लोकसभा चुनाव के समीकरण स्वयमेव बनते दिखेंगे। 

(यह लेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपा है )

रंचमात्र भी सूट बूट की सरकार नहीं दिखना चाहती है मोदी सरकार

हर्ष वर्धन त्रिपाठी Harsh Vardhan Tripathi   अमृत काल के बजट में सब एकदम साफ दिख रहा है वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का यह प...