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Showing posts from October, 2007

वाह क्या आइडिया है!

मैं सोच रहा था आजकल के विज्ञापनों जैसी दुनिया हो जाए तो क्या बात हो। ऐसे-ऐसे विज्ञापन दिखते हैं कि लगता है कि शायद इसीलिए विज्ञापन बनाने वाले बेहद क्रिएटिव माने जाते हैं। कुछ दिनों पहले तक विज्ञापन बनाने वाले इतने क्रिएटिव हो जाते थे कि विज्ञापन का आम लोगों की दुनिया से कोई वास्ता ही नहीं रह जाता था। लेकिन, अब विज्ञापन हमारे-आपके बीच के आदर्श समाज की खाली जगह भरते नजर आते हैं। सबसे जोरदार विज्ञापन है आइडिया का। पहले दिन ये विज्ञापन तेजी में आया और निकल गया मुझे समझ में ही नहीं आया। शायद इस तरह के किसी समाज की हममें कोई सोच ही नहीं बची है। शुरुआत ध्यान से देखा तो, लगा कि विज्ञापन कांग्रेस पार्टी ने गुजरात चुनाव में बीजेपी के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए बनाया है। विज्ञापन थोड़ा आगे बढ़ा तो, लगा यूपी के कुर्मियों और भूमिहारों की लड़ाई हो रही है। बाद में जब अभिषेक बच्चन कमाल का आइडिया लेकर आए कि अब यहां कोई अपनी जाति, धर्म और यहां तक कि नाम से भी नहीं जाना जाएगा। तब समझ में आया क्या विज्ञापन हैं। काश हमारा समाज ऐसा हो पाता। समाज में जो बातें बन नहीं पा रही हैं, उन पर चोट करने वाले विज्ञ

महाराष्ट्र में महा "माया" की आहट

उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा के कब्जे के बाद मुंबई में जगह-जगह नीले निशान नजर आने लगे। फ्लाईओवर और चौराहों पर नीले रंग से उत्तर प्रदेश के बाद अब दिल्ली-महाराष्ट्र की बारी है, लिखा दिखने लगा। वैसे तो, ये अकसर होता है कि किसी राज्य में पार्टी का मुख्यमंत्री बनने पर दूसरे राज्यों में भी उस पार्टी के कार्यकर्ता अपनी थोड़ी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। लेकिन, इस बार मामला थोड़ा अलग है। उत्तर प्रदेश से सटे होने की वजह से दिल्ली मे बसपा के झंडे लगी गाड़ियां अब घूमती हुई मिल भी जाती हैं। लेकिन, मायावती की असल नजर महाराष्ट्र पर है और मायावती ने इसकी तैयारी भी शुरू कर दी है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने के बाद से मायावती ने महाराष्ट्र के लिए अपनी जमीन मजबूत करनी शुरू कर दी थी। यही वजह थी कि रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडाय यानी RPI के अध्यक्ष रामदास अठावले के बुलाने पर भी मायावती उनके सम्मेलन में नहीं आईं। मायावती का इरादा साफ है दलित नेता के तौर पर देश में वो किसी और के साथ मंच साझा नहीं करना चाहतीं। सत्ता के लिए दूसरी जातियों के साथ समीकरण बिठाने का उत्तर प्रदेश का आजमाया दांव वो महाराष्ट्र में

सिगरेट पीने वाले कुंआरे रह जाएंगे!

अभी जॉन अब्राहम और आयशा टाकिया की एक फिल्म आई है नो स्मोकिंग। फिल्म में जॉन अब्राहम को जबरदस्त सिगरेटबाज दिखाया गया है। जिसकी कोई भी बात सिगरेट के बिना पूरी नहीं होती। फिल्म का मकसद सिगरेट के खिलाफ मुहिम में शामिल होना है। फिल्म के विज्ञापन में भी वैधानिक चेतावनी दी गई है कि सिगरेट पीना कान, उंगली, परिवार, दिमाग और आत्मा के लिए नुकसान देह है। फिल्म की नसीहत कितने लोगों को समझ में आई होगी ये पता नहीं। लेकिन, तिरुवनंतपुरम के कॉलेज की लड़कियों के दिखाए रास्ते पर अगर दूसरी लड़कियां भी चल पड़ी तो, सिगरेट के धुंए में जिंदगी का मजा तलाशने वालों को जिंदगी अकेले ही बितानी पड़ेगी। तिरुवनंतपुरम के सेंट थेरस वूमेन्स कॉलेज की सभी लड़कियों ने रविवार को ये शपथ ली कि वो किसी सिगरट पीने वाले से शादी नहीं करेंगी। साफ है कि 1,500 सिगरेट न पीने वाले लड़के ही यहां की लड़कियों से शादी कर पाएंगे। शपथ भी सुनेंगे तो, सिगरेट पीने वालों की तो आत्मा ही कांप जाएगी। प्रसिद्ध गायक येशुदास ने ये शपथ दिलाई। लड़कियों ने शपथ दिलाई कि सिगरेट पीने वाले शैतान हैं। उनसे मानवता को बड़ा खतरा है। इसलिए हम ऐसे लोगों के साथ

सरकारी देरी की कीमत देश भर चुका है 24,000 करोड़ रु, आगे कितना भगवान जाने?

मैं मुंबई से इलाहाबाद के सफर में रेलगाड़ी की 2-3 घंटे की देरी पर गुस्साता हूं। चिढ़ भी आती है, जब अच्छी भली चली आ रही रेलगाड़ी अचानक किसी आउटर पर लाल सिगनल के आगे बेबस खड़ी हो जाती है और देरी पर देरी होने लगती है। मुझे लगता था मेरे जैसे इस रेलगाड़ी में बैठे कितने लोगों का समय बरबाद हो रहा है। लेकिन, सिर्फ समय बरबाद हो रहा है ऐसा नहीं है। इस तरह की सरकारी देरी की वजह से देश के लोगों का 24,000 करोड़ रुपया अब तक बरबाद हो रहा है। और, सरकारी प्रोजेक्ट में देरी कितनी बढ़ेगी और आपकी जेब पर कितना बोझ बढ़ेगा, इसका सही-सही अंदाजा लगा पाना कौन बनेगा करोड़पति के सवाल के जवाब देने जैसा ही है। मुझे अकसर अपनी रेलगाड़ी की देरी की चिंता सताती रहती है। लेकिन, आज मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इंप्लीमेंटेश की एक रिपोर्ट देखने के बाद समझ में आया कि इस तरह की छोटी-छोटी सरकारी देरियों की हमें कितनी कीमत चुकानी पड़ रही है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, रेलवे के 32 प्रोजेक्ट देरी से चल रहे हैं। यानी इनकी शुरुआत मे जो, समयसीमा तय की गई थी वो, पूरी नहीं हो पा रही है। शायद यही वजह है कि लालू के चमत्कारी म

18 घंटे का सफर 26 घंटे में क्यों पूरा होता है?

अक्सर लालू पुराण चर्चा में रहता है। सब कह रहे हैं कि लालू ने कमाल कर दिया है। लालू ने रेलवे को पटरी पर ला दिया है। घाटा कम कर दिया है, मुनाफा ही मुनाफा हो रहा है। रेलवे आधुनिक होती जा रही है। रेलगाड़ियां, एयर लाइंस से टक्कर लेने लगी हैं। अभी मैं इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में मीडिया पर हुई एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में शामिल हो कर लौटा तो, ये सब लालू की पब्लिक रिलेशन एक्सरसाइज भर लगी। जाते और आते दोनों समय रेलगाड़ी दो घंटे से ज्यादा की देरी से पहुंच पाई। मुंबई से इलाहाबाद मैं महानगरी एक्सप्रेस से गया। महानगरी एक्सप्रेस में नए बने डिब्बे लगे हैं। तृतीय श्रेणी की वातानुकूलित बोगियों में भी बढ़िया चार्जिंग प्वाइंट लगे थे। लेकिन, अब तक इस गाड़ी में पैंट्री कार नहीं लग पाई है। मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल से चली गाड़ी जबलपुर तक बड़े मजे से सफर तय करती रही लगा कि गाड़ी समय से कुछ पहले ही पहुंच जाएगी। लेकिन, मानिकपुर पहुंचते-पहुंचते उम्मीदें धूमिल होने लगी। मानिकपुर तक समय से कुछ पहले ही पहुंची गाड़ी ने इलाहाबाद स्टेशन तक पहुंचते-पहुंचते 2 घंटे की देरी कर दी। मानिकपुर और नैनी के बीच

कौन बनाएगा मीडिया का कोड ऑफ कंडक्ट

(मैं इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के फोटो जर्नलिज्म और विजुअल कम्युनिकेशंस डिपार्टमेंट की ओर से कराई गई राष्ट्रीय संगोष्ठी में शामिल हुआ था। उसमें मुझे पहले सत्र में कौन बनाएगा मीडिया का कोड ऑफ कंडक्ट विषय पर बोलने के लिए बुलाया गया था। ये लेख उसी भाषण का हिस्सा है) मीडिया के लोग इस समय सबसे ज्यादा किसी बात से परेशान हैं तो, वो ये कि सरकार उनकी स्वायत्तता या यूं कह लें कि स्वतंत्र सत्ता पर हमला करने की तैयारी में है। हफ्ते भर में एक बार तो किसी न किसी बहाने सूचना प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी मीडिया के लिए एक कोड ऑफ कंडक्ट की बात कर ही देते हैं। मुंशीजी का प्रस्तावित कोड ऑफ कंडक्ट ऐसा है कि आज की तारीख में काम कर रहे ज्यादातर न्यूज चैनलों पर कभी भी किसी जिलाधिकारी के डंडे की चोट पड़ सकती है। अभी चुनावों की आहट से मुंशीजी का मीडिया को काबू करने का प्रिय प्रोजेक्ट भले ही पीछे चला गया हो। लेकिन, देर-सबेर ये होना ही है। अब सवाल ये है कि क्या मीडिया को सरकारी कोड ऑफ कंडक्ट से चलाया जा सकता है। लेकिन, साथ ही जुड़ा हुआ सवाल ये है कि क्या मीडिया इतनी जिम्मेदारी से अपना काम कर पा रहा

बाजार ने दिया सुपरहिट फिल्म का मसाला

बॉलीवुड को आज शेयर बाजार से सुपरहिट फिल्म का एक जोरदार फॉर्मूला मिल गया होगा। जिसके बॉक्स ऑफिस तोड़ देने की पूरी गारंटी है। चिदंबरम जैसा हीरो जिसने खुद ही फिल्म की पटकथा लिखी हो। दामोदरन जैसा बेहतरीन निर्देशक, जिसने पटकथा को परदे पर खूबसूरती से उतार दिया। और, फिल्म में FII कलाकार के रोल में थे तो पी नोट जैसा आइटम सांग भी था। कुछ ऐसा ही आज बाजार में देखने को मिला। सेंसेक्स फिर 19,000 के करीब पहुंच गया है। करीब 300 प्वाइंट नीचे रह गया है। दरअसल आज सुबह बाजार में जो बरबादी शुरू हुई थी। उससे तो यही लग रहा था कि आज सेंसेक्स-निफ्टी गिरने के मामले में सारे रिकॉर्ड तोड़ देंगे। लेकिन, मुस्कुराते हुए चिदंबरम का बयान आया कि शाम तक सब सामान्य हो जाएगा, ठीक वैसा ही हुआ। यानी, सुबह खुलते ही 1,500 प्वाइंट से ज्यादा गिरने वाला सेंसेक्स और करीब 10 प्रतिशत तक गिरने वाला निफ्टी में थोड़ी गिरावट ही बची रह गई। 19,000 पर पहुंचे सेंसेक्स और 5,000 के ऊपर पहुंचे सेंसेक्स निफ्टी के लिए 300 और 100 प्वाइंट के आसपास की गिरावट अब मामूली ही रह गई। खैर, अगर कल रात से आज यानी मंगलवार रात से बुधवार रात तक का घटनाक्र

बौराया बाजार किसका भला कर रहा है?

बाजार हम पर बुरी तरह से हावी हो गया है। इतना कि सेंसेक्स की सरपट चाल किसी की समझ में न आने के बाद भी सेंसेक्स सोमवार को 19,000 पार कर गया। देश तरक्की कर रहा है। भारतीय कंपनियां दुनिया भर में नाम कमा रही हैं। भारत के अमीर, दुनिया के अमीरों के नाक-कान काट रहे हैं। आम आदमी सेंसेक्स में पैसा लगाकर खूब कमा रहा है। बाजार के विद्वानों का ज्ञान सुनें तो, लगता है पूरा देश सेंसेक्स की तरक्की से संपन्न हो गया है। लेकिन, देश क्या सोचता है, इसका अंदाजा एक निजी टेलीविजन चैनल पर पूछे गए सवाल से काफी हद तक पता लग जाता है। टीवी चैनल पर सवाल पूछा गया था कि सेंसेक्स 19,000 के पार, इसे आप क्या मानते हैं। सवाल का जवाब देने वालों में से सिर्फ 15 प्रतिशत लोग इसे देश की तरक्की का आइना मानते हैं। 50 प्रतिशत लोग मानते हैं कि सेंसेक्स और सट्टे में खास फर्क नहीं है, शेयर बाजार सट्टे की तरह इस्तेमाल हो रहा है। 35 प्रतिशत को सेंसेक्स-निफ्टी की तेजी में जो दिखता है वो, और भी खतरनाक है। ये 35 प्रतिशत लोग मानते हैं कि शेयर बाजार में आ रहे अनाप-शनाप पैसे से देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। यानी बाजार के साथ छेड़छाड

भूलभुलैया से कुछ लोगों की प्रेत बाधा तो दूर हुई ही होगी

अच्छा हुआ प्रियदर्शन ने इस बार सिर्फ कॉमेडी नहीं बनाई। ज्यादातर फिल्म समीक्षक भूलभुलैया को एक ऐसी फिल्म बता रहे हैं जो, कॉमेडी और थ्रिलर के बीच फंसी है। किसी ने इसे 2 से ज्यादा रेटिंग देना भी ठीक नहीं समझा। लेकिन, मुझे लगता है कि लोगों को हंसाने की गारंटी देने वाली प्रियदर्शन की फिल्मों में भूलभुलैया एक अलग किस्म की सार्थक फिल्म की श्रेणी में शामिल हो जाएगी। फिल्म की कहानी की अच्छी बात ये है कि शुरुआत से आप इस फिल्म की कहानी का बहुत साफ-साफ अंदाजा नहीं लगा सकते। फिल्म दर्शकों को अच्छे से बांधे रखती है। कहीं हंसाती है, कहीं-कहीं डराती भी है। फिल्म के कई चरित्रों पर दर्शकों का संदेह बार-बार पुख्ता करती रहती है। लेकिन, फिल्म की जो, सबसे अच्छी बात मुझे लगी, वो ये कि फिल्म ने बड़े सलीके से भूत-प्रेत-ओझा-बाबा को खारिज किया है। शाइनी आहूजा और विद्या बालन के महल में पहुंचने से लेकर महल के भूत को भगाने के लिए आने वाले आचार्य तक हर जगह फिल्म ने वहम को दूर करने की कोशिश की है। अंधविश्वास को तोड़ने की कोशिश की है। कहानी में हर मोड़ पर लगता था कि ये कहानी किसी राजमहल में सत्ता हासिल करने के लिए

मां का दूध बच्चे का पहला अधिकार

आपको लग रहा होगा ये कौन सी नई बात है। लेकिन, अब ये कानून बनने जा रहा है, बच्चे के पैदा होते देश का नागरिक होने के नाते उसे जो, पहला अधिकार मिलेगा वो, होगा मां के दूध का। नेशनल कमीशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स इसे कानून बनाने के लिए पूरी तैयारी कर चुका है। कमीशन 6 साल से छोटे बच्चों के अधिकारों के लिए ऐसे कानून बनाने का प्रस्ताव कर रहा है। दरअसल सरकार के पास जो रिपोर्ट है उसके मुताबिक, भारत में पैदा होने वाले सिर्फ 23 प्रतिशत बच्चों को ही पैदा होने के घंटे भर में मां का दूध मिल पाता है। और, 46 प्रतिशत ही बच्चे होते हैं जिनको पहले छे महीने तक मां का दूध पीने को मिल पाता है। नेशनल कमीशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स चाहता है कि बच्चे को ज्यादा से ज्यादा समय तक मां का दूध पीने को मिले। क्योंकि, बाहर का दूध बच्चे की सेहत के लिए बहुत अच्छा नहीं होता है। वैसे अभी के कानून के मुताबिक भी गर्भवती महिला को शिक्षित करने के लिए बच्चे के मां के दूध के फायदे बताना जरूरी है। साथ ही बच्चे को पैदा होने के घंटे भर के भीतर मां का दूध पिलाने की जिम्मेदारी नर्स की होगी। कानून में बदलाव के जर

सादगी से शादी!

दिल्ली की मशहूर शादियों की रौनक कुछ कम हो सकती है। खासकर पंजाबी शादियों की। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने शादियों की सीजन शुरू होने से पहले सिख धर्म मानने वालों को सादगी से शादी करने की सलाह दी है। कमटी का तो, यहां तक कहना है कि लोग रात की बजाए दिन में ही शादियां करें। साथ ही ये शादियां गुरुद्वारे से ही की जाए। लोग गुरुद्वारे की सलाह मान भी रहे हैं। लेकिन, ज्यादा से ज्यादा लोगों को गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का शादियों पर बना कोड ऑफ कंडक्ट पता चल सके इसके लिए शहर में 400 से ज्यादा बोर्ड लगाए जा रहे हैं। साथ ही कमेटी के लोग भी अलग-अलग सर्कल में शादियों पर ध्यान देंगे कि वो सादगी से हो रही हैं या नहीं। ज्यादातर लोग इस बात के लिए तो मान ही गए हैं कि शादियों में शराब नहीं बहाई जाएगी। लेकिन, गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी कुछ ज्यादा ही कड़े मूड में दिख रही है। कमेटी का साफ कहना है कि जो, कोड ऑफ कंडक्ट नहीं मानेगा उसे गुरुद्वारे से शादी का प्रमाणपत्र नहीं दिया जाएगा। वैसे गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का कहना है कि मोरल कोड ऑफ कंडक्ट कोई कानून नहीं है। ये सिर्फ सलाह है और गुरुद्वारा में तो,

कांग्रेस लोकसभा चुनाव अभियान शुरू कर चुकी है

लेफ्ट-कांग्रेस के बीच परमाणु समझौते पर भले ही मोहलत-धमकी के खेल में 22 अक्टूबर तक की मोहलत मिल गई हो। लेकिन, कांग्रेस ने अपनी चुनावी तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेसी मंत्रियों के सुर बदल गए हैं। आर्थिक सुधार के अगुवा वित्त मंत्री पी चिदंबरम को किसानों के कर्ज की सुध आ रही है तो, अब तक सिर्फ इंडस्ट्री के हितों की खातिर आवाज बुलंद करने वाले वाणिज्य मंत्री कमलनाथ कह रहे हैं कि विकास का असली मतलब तभी है जब गांवों तक इसका हिस्सा पहुंचे। गुरुवार को कैंबिनेट की नियमित प्रेस ब्रीफिंग में सूचना प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी के तेवर किसी सरकार के बजाए किसी पार्टी के प्रवक्ता की तरह लग रहे थे। लग रहा था कांग्रेस पार्टी अपना चुनावी एजेंडा पेश कर रही हो। अचानक रेलवे कर्मचारियों के लिए 70 दिन के बोनस का ऐलान कर दिया गया। मुंशीजी ने ये भी साफ कर दिया कि फिलहाल मार्च तक तो, पेट्रोल-डीजल के दाम बिल्कुल भी नहीं बढ़ने वाले हैं। घाटे से थोड़ी राहत के लिए तेल कंपनियों को ऑयल बांड जारी करने की इजाजत भले ही मिल गई है। इससे पहले सरकार ने गेहूं का समर्थन मूल्य भी 850 रुपए से बढ़ाकर 1000 रुपए क्विंटल कर

भ्रष्टाचार, अपराध से बरबाद हुआ राज्य उत्तर प्रदेश

किसी राज्य में भ्रष्टाचार और अपराध की जड़ें मजबूत होने से किस तरह का नुकसान होता है, इसका उत्तर प्रदेश से बेहतर उदाहरण शायद ही कोई और राज्य है। वैसे तो, उत्तर प्रदेश पिछले दो दशकों से किसी मामले में शायद ही तरक्की कर पाया हो लेकिन, पिछले पांच सालों में रही-सही कसर भी पूरी हो गई। अपराध-भ्रष्टाचार इस राज्य में इस तरह से सिस्टम का अंग बन गए कि सरकार और अपराधियों में अंतर कर पाना मुश्किल हो गया। और, इसका सीधा असर पड़ा राज्य के विकास पर। उत्तर प्रदेश ऐसा पिछड़ गया है कि रफ्तार पकड़ने में जाने कितने साल लगेंगे। देश की 16 प्रतिशत आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश अपराध के मामले अव्वल है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, देश के 24 प्रतिशत हिंसक अपराध उत्तर प्रदेश के ही हिस्से में आ रहा है। ऐसे में प्रति व्यक्ति के आधार पर देखें तो, ज्यादा बदनाम राज्य बिहार भी इससे पीछे छूट चुका है। इस सबका असर ये है कि जब 1990 के बाद देश में तरक्की की रफ्तार सबसे तेजी है, जब ये कहा जा रहा है कि पैसा बरस रहा है कोई भी बटोर ले, उत्तर प्रदेश में व्यापार करना ज्यादातर मामलों में घाटे का सौदा साबित हो रहा है

क्यों मर रहा है जवान भारत?

साठ साल का आजाद भारत दुनिया का सबसे जवान देश है। इस पर हम सबका सीना चौड़ा है। बीच-बीच में आते सर्वे ये भी बताते हैं कि जवान भारत दुनिया में सबसे ज्यादा खुश है। सबसे ज्यागा तरक्की जवान भारत ही कर रहा है। लेकिन, स्वास्थ्य मंत्रालय की एक रिपोर्ट पढ़कर मेरी भी जान निकल सी गई। स्वास्थ्य मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट बता रही है कि देश में साल भर में एक लाख से ज्यादा लोगों ने खुद ही अपनी जान ले ली। दुनिया के सबसे खुश देशों में शामिल भारत के लोगों को क्या हो गया है। रिपोर्ट और भी ज्यादा डराती है। इसके मुताबिक, चार लाख लोगों ने अपनी जान गंवाने की कोशिश की थी जो, समय से इलाज मिल जाने से बच गए। जान गंवाने की कोशिश करने वाले 90 प्रतिशत लोग मानसिक असंतोष, डिप्रेशन और किसी तरह की बदसलूकी की वजह से जान गंवा रहे हैं। भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देश की कुल आबादी के 7.5 प्रतिशत मानसिक समस्या से जूझ रहे हैं। मानसिक तनाव से जूझ रहे लोगों को सलाह देने वाले डॉक्टरों की भी जबरदस्त कमी है। देश को आबादी के लिहाज से 32,000 मानसिक रोग चिकित्सक चाहिए जबकि, सिर्फ 3,300 मानसिक रोग चिकित्सक ही मौजूद

सब कुछ विदेशी मांगता है!

मुंबई को शंघाई बनाने का मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख का सपना अब तक पूरा नहीं हो सका है। लेकिन, महाराष्ट्र में ज्यादातर योजनाएं विदेशों की ही तर्ज पर बन रही हैं। शायद यहां की सरकार को भरोसा हो गया है कि किसी विदेशी शहर का नाम लेकर कोई योजना शुरू करने पर उसको मीडिया में पब्लिसिटी तो मिलती है। भारत जैसे देश में जहां अभी भी विदेश घूमना ज्यादातर लोगों के लिए सबसे बड़े सपने जैसा होता है, अपील भी ज्यादा करता है। सबसे पहले विलासराव देशमुख ने मुंबई को शंघाई बनाने का सपना दिखाया। जबसे सपना दिखाया है तब से दो बार शहर ठीक-ठाक बाढ़ जैसे हालात से गुजर चुका है। कहां तक पहुंची है ये योजना इसका कुछ ठीक-ठीक पता शायद मुख्यमंत्रीजी को भी नहीं होगा। अभी ये योजना अंटकी ही है कि अब यहां के मंदिरों का संचालन भी विदेशी धर्मस्थलों की तर्ज पर करने की तैयारी है। अखबार में छपी खबर के मुताबिक, शिरडी के साई बाबा का स्थान अब इसाई धर्म शहर वेटिकन सिटी की तरह बेहतर बनाया जाएगा। शिरडी में 300 करोड़ की बिल्ड ऑन ट्रांसफर वाली योजना सरकार ने तैयार कर रखी है। यहां पर MSRDC हवाई सड़कें (स्काईवॉक), बहुमंजिला कार पार्क, पैदल

सबका सपना मनी-मनी, लेकिन कितना?

अब पैसे का कोई मतलब ही नहीं रहा। पैसा बढ़ना बस प्रतीकों के तौर पर इस्तेमाल करने लायक शब्द रह गया है। पैसे क्या रुपए का भी कोई मतलब नहीं रह गया है। खासकर तब जब इसी देश में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो, हर मिनट चालीस लाख रुपए कमा रहे हैं। आपको लग रहा होगा मैं मजाक कर रहा हूं। लेकिन, ये मजाक नहीं है। रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी की कमाई पिछले तीन महीने से लगातार चालीस लाख रुपए हर मिनट बढ़ी है। हाल ये है कि मुकेश अंबानी आज 2,20,463 करोड़ रुपए के मालिक हो गए हैं। डॉलर में ये कमाई होती है 5580 करोड़ डॉलर। आज तो, शेयर बाजार गिरा है। लेकिन, हो सकता है कि कल सेंसेक्स-निफ्टी की एक और तेज उछाल बड़े अंबानी को ढाई लाख करोड़ रुपए का मालिक बना दे। अमीरों की जेब में बढ़ते पैसे का आलम ये है कि देश के दस सबसे ज्यादा अमीर लोगों के पास साल भर में 6530 करोड़ डॉलर बढ़ गया है रुपए में ये रकम हो जाती है 2,57,739 करोड़। मुकेश अंबानी को अब तक ज्यादा कमाई के मामले में उनके ही छोटे भाई अनिल अंबानी चुनौती दे रहे थे। लेकिन, अब इन दोनों भाइयों के बीच में आ गए हैं, देश का सबसे बड़ा IPO लाने वाले रियल एस्टेट

क्या अखबारों में एक ब्लॉगर का कॉलम पूरे ब्लॉग जगत की तरक्की माना जा सकता है?

प्रिंट से टीवी- टीवी से इंटरनेट- इंटरनेट से फिर प्रिंट में। ब्लॉगिंग संसार में कुछ ऐसी ही धारा बह रही है। हिंदी ब्लॉग जगत के मंजे खिलाड़ी आजकल किसी न किसी पत्रिका-अखबार में ब्लॉग पर कुछ न कुछ लिख रहे हैं। कादंबिनी में बालेंदु शर्मा का ब्लॉग जगत की हलचल पर छपा लेख आजकल ब्लॉग्स पर सबसे ज्यादा चर्चा में है। उससे लगे-लगे कुछ और चिट्ठे भी लिखे गए जिसमें, बताया गया कि कौन सी पत्रिका- ब्लॉग पर केंद्रित कॉलम शुरू कर रही है। कौन सी पत्रिका-अखबार में कौन से ब्लॉगर की दिहाड़ी पक्की होने वाली है। ब्लॉग पर तरह-तरह के तरीके भी बताए जा रहे हैं कि कैसे अपने ब्लॉग को ज्यादा से लोगों की नजर में लाया जा सकता है। कैसे ब्लॉग पर गूगल एड सेंस के विज्ञापन या फिर दूसरे विज्ञापन लगाकर हिट के जरिए कमाई की जा सकती है। कुल मिलाकर स्वांत: सुखाय के लिए शुरू हिंदी ब्लॉग धीरे-धीरे व्यवसाय की ओर बढ़ रहा है। अच्छी बात है कि हिंदी ब्लॉगिंग करने वाले भी धीरे-धीरे कुछ कमाई करना शुरू कर रहे हैं। लेकिन, इसमें एक चीज जो अच्छी नहीं हो रही है वो, ये कि ज्यादातर ब्लॉगर जो किसी पत्रिका-अखबार में कॉलम लिखने जा रहे हैं। वो, कहीं

बाप-बेटे ने मिलकर बीजेपी की बैंड बजा दी

भारतीय राजनीति से ज्यादा अवसरवाद शायद ही कहीं और देखने को मिलेगा। अवसरवाद इतना कि लेफ्ट पार्टियां कांग्रेस को धमकाते-धमकाते यूपीए सरकार को महीने-महीने भर की मोहलत देती रहती हैं। और, अवसरवाद ऐसा भी कि कर्नाटक में सत्ता की वरमाला जब बीजेपी के येदुरप्पा के गले में डालने का मौका आया तो, पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा और अब के कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी एक हो गए। और, साफ कह दिया कि बीजेपी को सत्ता की दुल्हन नहीं मिल सकती। इन देवगौड़ा और कुमारस्वामी के 6 महीने पहले के बयानों को कोई पढ़े तो, यकीन ही नहीं होगा कि ये दोनों बाप-बेटे हैं। खैर, अब देवगौड़ा और कुमारस्वामी का बाप-बेटे का रिश्ता फिर से पक्का हो गया है। और, जब दोनों मिल गए तो, बाहर वाले यानी बीजेपी को चिरमिटी लग गई। बीजेपी ने कुमारस्वामी को याद दिलाने की कोशिश की कि हमारे तुम्हारे बीच हुए समझौते के मुताबिक, अब मुख्यमंत्री बीजेपी का होगा। कुमारस्वामी को अचानक याद आ गया कि भारतीय जनता पार्टी तो सांप्रदायिक पार्टी है। उन्होंने कहा कि भाजपा सांप्रदायिकता से पीछा छुड़ाए तभी उसे सत्ता सौंपी जा सकती है। अब कोई कुमारस्वामी से पू

हम आदिवासी युग में लौट रहे हैं?

अंग्रेज जब हमें आजाद करके गए तो, पूरी दुनिया में उन्होंने भारत की छवि एक ऐसे देश की बनाई जो, बाबा-ओझा-जादू-टोना-नाग-नागिन का देश था। आजादी के बाद भारत ने तेज तरक्की की। दुनिया में भारत से निकले दिमाग का लोहा माना जाने लगा। अंग्रेजों को हम भारतीयों ने उनकी अंग्रेजी में भी मात दे दिया। दुनिया में भारत की छवि एक ऐसे देश की बनी जहां, तेज दिमाग वाले लोग हैं। दुनिया के सबसे तेजी से तरक्की करते देशों में भारत शामिल हो गया। हमारी छवि बदल ही रही थी कि टीवी की टीआरपी फिर से हमें आदिवासी युग में लौटाने की कोशिश में लग गई है। अगर अंग्रेज या दुनिया के दूसरे हिस्से में रहने वाले भारतीय हिंदी टेलीविजन चैनल को देखकर भारत के बारे में अंदाजा लगाना चाहें तो, वो फिर से भारत को बाबा-ओझा-जादू-टोना-नाग-नागिन का देश मान लेंगे। ऐसे करतब जिसे मोहल्ले में दिखाकर लोग मुश्किल से ही अपनी रोजी जुगाड़ पाते थे। आजकल टीवी के हीरो बने हुए हैं। कुछ भी थोड़ा सा अलग कर जाइए। टीवी पर कम से कम 2-4 मिनट की फुटेज के हकदार तो हो ही जाएंगे। टीआरपी की रेस के साथ विज्ञापनों की रेस में इंडिया टीवी पिछड़ा तो, उसे अपने को रेस मे

तारीख पर तारीख लेकिन, कब तक?

सभी टीवी चैनलों पर एक विज्ञापन आजकल खूब चल रहा है। किसी मामले में आरोपी (सजा सुनाए जाने तक अभियुक्त नहीं कह सकते) को पेश किया जाता है। और, सरकारी वकील के कुछ बोलने से पहले ही बचाव पक्ष का वकील खड़ा होकर कहता है कि गलती बैल की है। अदालत में बैल को बुलाया जाए और इसी पर जज साहब अदालत अगली सुनवाई तक के लिए मुल्तवी कर देते हैं। ये अगली सुनवाई तब तक चलती रहती है जब तक, दोनों वकील, आरोपी और खुद जज बूढ़े नहीं हो जाते हैं। वैसे आखिर में भी फैसला नहीं सुनाया जा पाता। पहली नजर में मुझे ये विज्ञापन भारतीय न्याय व्यवस्था में लंबित पड़े मामलों पर बनाया हुआ लगा। लेकिन, अंत में पता चलता है कि ये ग्रीन प्लाई का विज्ञापन है। सच्चाई यही है कि, ग्रीन प्लाई का विज्ञापन भारतीय न्याय व्यवस्था में खिंच रहे मामलों की उदाहरण ही लगता है। मुंबई में फुटपाथ पर सोते लोगों को कुचल देने वाले एलिस्टर परेरा को छोड़ देने के मामले पर काफी हो हल्ला के बाद मामला फिर चला। लेकिन, परेरा को फिर से जमानत मिल गई है। 14 साल तक विशेष टाडा अदालत बनाकर मुंबई बम धमाकों में आरोपियों को फैसला सुनाया गया। लेकिन, फैसले की कॉपी न मिलने

पतियों औकात में आ जाओ, पत्नियां पीट रही हैं!

पति पिट रहे हैं। सरे आम पिट रहे हैं। चौराहे पर पिट रहे हैं। शादी के मंडप में पिट रहे हैं। जयमाल के स्टेज पर पहुंचते-पहुंचते पिट रहे हैं। अपने ही बच्चे के सामने पिट रहे हैं। पत्नियां पीट रही हैं। पत्नियों के साथ वो साले भी पीट रहे हैं जो, अब तक पैर छूते थे। कोई बचाने वाला भी नहीं है। पति का परमेश्वर का दर्जा तो काफी पहले ही खत्म हो गया था। हाल के दिनों में मटुकनाथ शैली के बढ़ते प्रेमी टाइम पतियों की वजह से पति निशाने पर आ गए हैं। मटुकनाथ तो, अपनी नई-नवेली कम उम्र की प्रेमिका पाकर हीरो बन गए। दशहरे की झांकियों से लेकर टीवी स्टूडियो तक मटुकनाथ अपनी प्रेमिका के साथ रासलीला को जायज ठहरा रहे हैं। और, उनके चक्कर में जो, पति गलती से भी फंसा। पत्नी तो, गई ही, प्रेमिका के साथ सामूहिक चप्पल चटकन का अच्छा ड्रामा भी मोहल्ले वालों के साथ सबको देखने को मिल रहा है। पिटते पति टीआरपी बढ़ाने का जरिया बन रहे हैं। आज एक निजी टीवी चैनल पर लूप में (यानी एक ही दृश्य कई बार घुमा-घुमाकर दिखाना) एक पति और उसकी प्रेमिका की पिटाई टीवी की टीआरपी बढ़ाने में आधे घंटे तक मदद कर गई। पूरा फिल्मी ड्रामा था। पति अपनी प

आस्था पर हमले के बिना भी तो बात बन सकती है

राम का अस्तित्व था या नहीं, इसे जानने का इन दिनों भारत में महाअभियान चल रहा है। राम को भगवान मानने वाले और उनके अस्तित्व को ही नकारने वाले, दोनों ही जल्दी से जल्दी राम के होने न होने का तर्क खोज रहे हैं। और, जिससे जितना कुछ बन पड़ रहा है वो, लोगों को बता दे रहा है। इस सबके बीच में सबसे ज्यादा फंसे वो लोग हैं जो, तटस्थ हैं यानी न तो अंधभक्त हैं और न ही वो इस बात को सिरे से खारिज करते हैं कि राम थे ही नहीं। मेरी निजी राय ये है कि भगवान राम का होना न होना एक ऐसा विषय है जो, तर्क के परे हैं। ये उस विज्ञान के आगे की आस्था जैसा ही है। विज्ञान शरीर जानता है लेकिन, ये नहीं पता लगा पाया कि शरीर का प्राण कहां से निकल जाता है। अब तर्क के परे मैं क्यों कह रहा हूं। इसकी भी खास वजह है। अब तक हम ये जान नहीं सके हैं कि आखिर हमारे जन्म से पहले और मृत्यु के बाद क्या है। मैंने देखा है कि जो, जोर-जोर से चिल्लाते हैं कि भगवान होते ही नहीं। अकेले में जब घबराते हैं तो, भदवत्भजन ही कल्याण का रास्ता दिखता है। अब मैं अपनी ही बात करूं तो, मुझे कभी-कभी मंदिर जाना अच्छा लगता है। थोड़ी पूजा कर लेने से भी मन साफ

ज्यादा सम्मान मिलने का खामियाजा है भारतीय टीम की बुरी हार

भारत कोच्चि वनडे ऑस्ट्रेलिया से 84 रनों से हार गया। धोनी के सारे धुरंधर फ्लॉप हो गए। नए-पुराने सारे खिलाड़ी फुस्स हो गए। आज धोनी को एक कप्तानी पारी खेलने की जरूरत थी। लेकिन, खुद धोनी भी वो नहीं कर पाए। हां, धोनी के धुरंधर मैदान पर गुस्से में इतने थे जैसे किसी विश्व विजेता को किसी पिद्दी ने ललकार दिया हो। जबकि, सच्चाई यही थी कि सामने कई सालों से निर्विवाद विश्व विजेता ऑस्ट्रेलिया के सामने गलती से 20-20 का विश्व चैंपियन बना भारत था। ऑस्ट्रेलियाई टीम जब भारत की धरती पर उतरी थी तो, ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग से किसी भारतीय पत्रकार ने अति उत्साह में पूछ लिया कि वो धोनी की यूथ ब्रिगेड को किस तरह से आंकते हैं। रिकी पोंटिंग ने ऑस्ट्रेलिया की पुरानी क्रिकेट स्ट्रैटेजी के तहत जवाब दिया कि भारत की टीम एक 20-20 का विश्व कप जीतकर आई है। जबकि, ऑस्ट्रेलिया की टीम ने जो, क्रिकेट में किया है, उसे करने के लिए भारतीय टीम को अभी बहुत लंबा सफर तय करना है। मैच से पहले विरोधी टीम पर दबाव बनाने के लिए ये ऑस्ट्रेलिया की चिर परिचित रणनीत थी। वैसे, इस बार भारत के क्रिकेट खिलाड़ी पहले के खिलाड़ियों की

हम 100 मीटर की रेस में गोल्ड मेडल क्यों नहीं ला सकते ?

जब ओलंपिक खेलों में दुनिया के खिलाड़ियों को लंबी-लंबी, मजबूत टांगों पर गोल्ड मेडल की तरफ लपकते हुए देखता हूं तो, हमेशा लगता है कि हमारे खिलाड़ी इन खेलों में चैंपियन क्यों नहीं हो सकते। बार-बार दुनिया के तर्क-कुतर्क आते रहते हैं। एक बड़ा सुंदर कुतर्क है कि वहां के खिलाड़ी जलवायु के लिहाज से बेहतर स्थिति में हैं जिससे उनकी मांसपेशियां ज्यादा मजबूत होती हैं। अच्छी जलवायु की ही वजह से विदेशी खिलाड़ियों के ज्यादा क्षमता होने की बात भी बार-बार कही जाती है। लेकिन, इसकी असली वजह आज मुझे ऑफिस पहुंचने पर पता चली जब मैंने कहा कि विश्वनाथन आनंद शतरंज का विश्व चैंपियन बन गया है। मेरी एक वरिष्ठ सहयोगी ने मुझसे पूछा- शतरंज से कितनी कमाई होती है। ये मैं आंकलन लगाने में जुटा ही था कि उन्होंने तर्क का हथौड़ा जड़ दिया। अपनी बुद्धि से दुनिया जीतने वाले शतरंज चैंपियन विश्वनाथन आनंद के पास सिर्फ एक ब्रांड का विज्ञापन है। जबकि, आंख मूंदकर चौके-छक्के लगाने वाले कल ही क्रिकेट खेलना शुरू करने वाले छोकरे भी जब चैंपियन बने तो, दो-चार ब्रांड्स को उनके नाम पर बिकने का भरोसा हो गया। दरअसल यही असली वजह है कि जो, ह