Tuesday, October 30, 2007

वाह क्या आइडिया है!

मैं सोच रहा था आजकल के विज्ञापनों जैसी दुनिया हो जाए तो क्या बात हो। ऐसे-ऐसे विज्ञापन दिखते हैं कि लगता है कि शायद इसीलिए विज्ञापन बनाने वाले बेहद क्रिएटिव माने जाते हैं। कुछ दिनों पहले तक विज्ञापन बनाने वाले इतने क्रिएटिव हो जाते थे कि विज्ञापन का आम लोगों की दुनिया से कोई वास्ता ही नहीं रह जाता था। लेकिन, अब विज्ञापन हमारे-आपके बीच के आदर्श समाज की खाली जगह भरते नजर आते हैं।
सबसे जोरदार विज्ञापन है आइडिया का। पहले दिन ये विज्ञापन तेजी में आया और निकल गया मुझे समझ में ही नहीं आया। शायद इस तरह के किसी समाज की हममें कोई सोच ही नहीं बची है। शुरुआत ध्यान से देखा तो, लगा कि विज्ञापन कांग्रेस पार्टी ने गुजरात चुनाव में बीजेपी के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए बनाया है। विज्ञापन थोड़ा आगे बढ़ा तो, लगा यूपी के कुर्मियों और भूमिहारों की लड़ाई हो रही है। बाद में जब अभिषेक बच्चन कमाल का आइडिया लेकर आए कि अब यहां कोई अपनी जाति, धर्म और यहां तक कि नाम से भी नहीं जाना जाएगा। तब समझ में आया क्या विज्ञापन हैं। काश हमारा समाज ऐसा हो पाता।

समाज में जो बातें बन नहीं पा रही हैं, उन पर चोट करने वाले विज्ञापन भी हैं। ग्रीनप्लाई का, मुजरिम जीवनदास को सजा दिलाने में बूढ़े होते वकील, आरोपी और जज को दिखाने वाला विज्ञापन अदालतों में घिस-घिसकर मिलते न्याय पर की गई चोट है। हमसे आपसे जुड़ते दूसरे विज्ञापन भी हैं। ICICI प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस की जीते रहो सीरीज भी कुछ ऐसी है। पति-पत्नी की मीठी नोंक-झोंक में भविष्य बच्चे का करियर सुरक्षित रखने का संदेश बेहद खूबसूरती से दिया गया है। ऐसा ही एक और विज्ञापन है बैंक ऑफ बड़ौदा में सीनियर सिटिजंस के ख्याल रखने से जुड़ा। इसमें बहुत दिनों तक जब एक बुजुर्ग अपने अकाउंट का पता करने नहीं आता तो, बैंक का कर्मचारी खुद ही उनके घर पहुंच जाता है। ये लाइन की बैंक की सुविधाएं बढ़ जाने का ये मतलब थोड़े ना है कि आप ब्रांच में हमारा हालचाल लेने भी न आएं।

एमडीएच मसाले के विज्ञापन में युवा जोड़े मस्ती में झूम रहे होते हैं कि बुजुर्ग सामने आ जाते हैं। लड़की तुरंत सिर पर दुपट्टा डालकर बुजुर्ग का पैर छूती है। पीछे से आवाज आती है, हमारे संस्कार ही हमारी पहचान हैं। भारतीय संस्कारों को ही दिखाने वाला हमारा बजाज का विज्ञापन आजकल कुछ कम दिखता है। लेकिन, इसकी भी जबरदस्त अपील थी। बाइक पर घूमता नौजवान रास्ते में धार्मिक निशान देखकर बाइक उस पर जाने से बचाने में कामयाब होता है तो, खुश हो जाता है। बाइक पर लड़के से सटकर बैठी लड़की एक अधेड़ उम्र दंपति को देखकर लड़के की कमर से अपना हाथ हटा लेती है। रिलायंस का बोल इंडिया बोल सीरीज तो, कमाल की है ही। हम भारतीयों की आदत कुछ ज्यादा बोलने की, दूसरों को मौका मिलते ही ज्ञान देने की होती है। लेकिन, पैसा फूंकना अब भी हम भारतीयों की आदत में कम ही है। इसे रिलायंस के विज्ञापन में अच्छे से पकड़ा गया है। एयरटेल में दादाजी और पोते की मोबाइल के जरिए शतरंजबाजी भी कुछ ऐसी ही है। गहनों के तो, सारे ब्रांड गहने बेचने से ज्यादा जोर भावनाएं दिखाने में करते हैं।

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का सिर्फ बैंकिंग और कुछ नहीं। स्प्राइट का सिर्फ प्यास बुझाए यार, बाकी सब बकवास। अपनी खास खूबी को बताने वाले विज्ञापन हैं। ये दोनों विज्ञापन ज्यादा समझ में इसलिए आते हैं कि अगर आपमें कोई खूबी तो उसी का इस्तेमाल कीजिए फालतू की हवा-हवाई बातों से बात बनती कम है, बिगड़ती ज्यादा है। ऐसे ढेर सारे विज्ञापन हैं। मुझे तो, बस यही सूझता है काश ऐसे आइडिए हमारी जिंदगी में भी काम कर पाते। हमारी दुनिया भी विज्ञापनों जितनी हसीन हो पाती।

महाराष्ट्र में महा "माया" की आहट

उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा के कब्जे के बाद मुंबई में जगह-जगह नीले निशान नजर आने लगे। फ्लाईओवर और चौराहों पर नीले रंग से उत्तर प्रदेश के बाद अब दिल्ली-महाराष्ट्र की बारी है, लिखा दिखने लगा। वैसे तो, ये अकसर होता है कि किसी राज्य में पार्टी का मुख्यमंत्री बनने पर दूसरे राज्यों में भी उस पार्टी के कार्यकर्ता अपनी थोड़ी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। लेकिन, इस बार मामला थोड़ा अलग है। उत्तर प्रदेश से सटे होने की वजह से दिल्ली मे बसपा के झंडे लगी गाड़ियां अब घूमती हुई मिल भी जाती हैं। लेकिन, मायावती की असल नजर महाराष्ट्र पर है और मायावती ने इसकी तैयारी भी शुरू कर दी है।

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने के बाद से मायावती ने महाराष्ट्र के लिए अपनी जमीन मजबूत करनी शुरू कर दी थी। यही वजह थी कि रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडाय यानी RPI के अध्यक्ष रामदास अठावले के बुलाने पर भी मायावती उनके सम्मेलन में नहीं आईं। मायावती का इरादा साफ है दलित नेता के तौर पर देश में वो किसी और के साथ मंच साझा नहीं करना चाहतीं। सत्ता के लिए दूसरी जातियों के साथ समीकरण बिठाने का उत्तर प्रदेश का आजमाया दांव वो महाराष्ट्र में भी खेलने जा रही हैं। फर्क सिर्फ इतना होगा कि महाराष्ट्र में मायावती ब्राह्मण-दलित के साथ अन्य पिछड़ी जातियों को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश करेंगी। यहां मुलायम जैसा पिछड़ों का कोई एक नेता न होने का लाभ मायावती लेना चाहती हैं। और, मायावती पिछड़ी जातियों में भी जो ज्यादा दबी हुई जातियां हैं, उन्हें पटाने की है। क्योंकि, पिछड़ी जातियां शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस में बंटी हुई हैं। खैरलांजी हत्याकांड जैसे मामले मायावती के राज्य में आने की अच्छी जमीन तैयार कर चुके हैं। उत्तर प्रदेश के कानपुर में अंबेडकर की मूर्ति का सिर टूटने के बाद उत्तर प्रदेश से ज्यादा तगड़ी प्रतिक्रिया महाराष्ट्र में हुई थी। जिससे एक बात तो, साफ है दलितों को नेता मिलने भर की देर है जो, शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के क्षत्रपों को उन्हीं की भाषा में जवाब दे सके। और, मायावती इस काम में माहिर हैं, इसमें किसी को शक नहीं होना चाहिए।

साथ ही मायावती के खेल में बिहार-उत्तर प्रदेश से आकर महाराष्ट्र में आकर बस गए लोग भी अच्छे से फिट हो रहे हैं। मराठियों के अलावा बाहर से आकर राज्य में बसने वाले करीब 10 प्रतिशत हैं। उत्तर प्रदेश में सत्ता आने के बाद वहां से आए हुए परिवारों में आसानी से बसपा की वकालत करने वाले लोग भी मिल जाएंगे। बाहर से आए लोग जिस तरह से शिवसेना-महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के निशाने पर रहते हैं, उससे मायावती को इन्हें इकट्ठा करने में आसानी होगी। मायावती अपनी शुरुआत उन दस लाख दलितों-बौद्धों से करना चाह रही हैं। जो, अभी उहापोह की स्थिति में हैं। रामदास अठावले की RPI का कैडर मायावती के लिए ही मजबूत आधार बनता दिख रहा है। पंचायत चनावों में बसपा के पक्ष में ये बदलाव साफ दिखा। कई जिला परिषद और पंचायत समितियों में भी लाल झंडा लहरा रहा है। बसपा अकेले लड़कर म्युनिसिपल काउंसिल की 24 सीटें जीतने में कामयाब हुई है। म्युनिसिपल कॉरपोरेशन में भी उसे 20 सीटें मिली हैं। हालांकि, सीटों के लिहाज से ये कोई खास संख्या नहीं हैं। लेकिन, शून्य से मायावती के लिए विधानसभा चुनाव के लिए अच्छे संकेत माने जा सकते हैं।

मायावती ने सामाजिक जोड़तोड़ भी शुरू कर दी है। महाराष्ट्र में ब्राह्मण और ऊंची जातियां चार प्रतिशत से कुछ ज्यादा ही हैं लेकिन, मायावती ने इनके बड़े हिस्से को पटाने की मुहिम शुरू कर दी है। मायावती ब्राह्मणों की एक बड़ी रैली दिसंबर में करने वाली हैं। नासिक के एक प्रभावी ब्राह्मण महंत सुधीरदास बसपा के लिए रणनीति तैयार करने में लगे हैं। कुल मिलाकर मायावती ने अपनी तरफ से महाराष्ट्र में एक नए ध्रुवीकरण की मजबूत तैयारी कर ली है। लेकिन, मायावती के लिए महाराष्ट्र में आने वाले विधानसभा चुनाव में बहुत अच्छे परिणाम की उम्मीद इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि, यहां उत्तर प्रदेश की तरह ध्रुवीकरण नहीं है। सामाजिक समीकरण भी वहां से बहुत अलग हैं। लेकिन, इतना तो तय है कि ये चुनाव महाराष्ट्र में ‘माया’ के आने वाले समय के संकेत तो दे ही जाएंगे।

Monday, October 29, 2007

सिगरेट पीने वाले कुंआरे रह जाएंगे!

अभी जॉन अब्राहम और आयशा टाकिया की एक फिल्म आई है नो स्मोकिंग। फिल्म में जॉन अब्राहम को जबरदस्त सिगरेटबाज दिखाया गया है। जिसकी कोई भी बात सिगरेट के बिना पूरी नहीं होती। फिल्म का मकसद सिगरेट के खिलाफ मुहिम में शामिल होना है। फिल्म के विज्ञापन में भी वैधानिक चेतावनी दी गई है कि सिगरेट पीना कान, उंगली, परिवार, दिमाग और आत्मा के लिए नुकसान देह है।
फिल्म की नसीहत कितने लोगों को समझ में आई होगी ये पता नहीं। लेकिन, तिरुवनंतपुरम के कॉलेज की लड़कियों के दिखाए रास्ते पर अगर दूसरी लड़कियां भी चल पड़ी तो, सिगरेट के धुंए में जिंदगी का मजा तलाशने वालों को जिंदगी अकेले ही बितानी पड़ेगी। तिरुवनंतपुरम के सेंट थेरस वूमेन्स कॉलेज की सभी लड़कियों ने रविवार को ये शपथ ली कि वो किसी सिगरट पीने वाले से शादी नहीं करेंगी।
साफ है कि 1,500 सिगरेट न पीने वाले लड़के ही यहां की लड़कियों से शादी कर पाएंगे। शपथ भी सुनेंगे तो, सिगरेट पीने वालों की तो आत्मा ही कांप जाएगी। प्रसिद्ध गायक येशुदास ने ये शपथ दिलाई। लड़कियों ने शपथ दिलाई कि सिगरेट पीने वाले शैतान हैं। उनसे मानवता को बड़ा खतरा है। इसलिए हम ऐसे लोगों के साथ अपनी जिंदगी नहीं जोड़ेंगे।
सेंट थेरस कॉलेज की प्रिंसिपल को जब एक एनजीओ ने इसके लिए संपर्क किया तो, समाज में सिगरेट पीने वालों को एक कड़ा संदेश देने के लिए वो मान गईं। और, अच्छी बात ये रही कि सभी 1,500 लड़कियां इसमें उत्साह से शामिल हुईं। अब अगर इन लड़कियों का रास्ता कुछ और लड़कियों को पसंद आ गया तो, लड़कों को कुछ और ही रास्ता तलाशना होगा।

सरकारी देरी की कीमत देश भर चुका है 24,000 करोड़ रु, आगे कितना भगवान जाने?

मैं मुंबई से इलाहाबाद के सफर में रेलगाड़ी की 2-3 घंटे की देरी पर गुस्साता हूं। चिढ़ भी आती है, जब अच्छी भली चली आ रही रेलगाड़ी अचानक किसी आउटर पर लाल सिगनल के आगे बेबस खड़ी हो जाती है और देरी पर देरी होने लगती है। मुझे लगता था मेरे जैसे इस रेलगाड़ी में बैठे कितने लोगों का समय बरबाद हो रहा है। लेकिन, सिर्फ समय बरबाद हो रहा है ऐसा नहीं है। इस तरह की सरकारी देरी की वजह से देश के लोगों का 24,000 करोड़ रुपया अब तक बरबाद हो रहा है। और, सरकारी प्रोजेक्ट में देरी कितनी बढ़ेगी और आपकी जेब पर कितना बोझ बढ़ेगा, इसका सही-सही अंदाजा लगा पाना कौन बनेगा करोड़पति के सवाल के जवाब देने जैसा ही है।
मुझे अकसर अपनी रेलगाड़ी की देरी की चिंता सताती रहती है। लेकिन, आज मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इंप्लीमेंटेश की एक रिपोर्ट देखने के बाद समझ में आया कि इस तरह की छोटी-छोटी सरकारी देरियों की हमें कितनी कीमत चुकानी पड़ रही है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, रेलवे के 32 प्रोजेक्ट देरी से चल रहे हैं। यानी इनकी शुरुआत मे जो, समयसीमा तय की गई थी वो, पूरी नहीं हो पा रही है। शायद यही वजह है कि लालू के चमत्कारी मैनेजरों! ने 178 प्रोजेक्ट की कोई समयसीमा ही नहीं तय की है। साफ है जब समयसीमा ही नहीं होगी तो, रेल बजट में लालू को कोई देरी पर उंगली नहीं उठा पाएगा। और, ये नुस्खा सिर्फ लालू का ही मंत्रालय नहीं आजमा रहा है। दूसरे मंत्रालयों ने 218 से ज्यादा प्रोजेक्ट की कोई समयसीमा नहीं रखी है।
रेलवे जैसे देश के लोगों की दूसरी जरूरी जरूरतों के प्रोजेक्ट भी लगातार पिछड़ रहे हैं। रोड ट्रांसपोर्ट यानी सड़क-पुल-फ्लाईओवर के 93 प्रोजेक्ट देरी से चल रहे हैं। रेलवे, सड़क देरी से बन रही हैं तो, तेजी से बढ़ते एविएशन सेक्टर की बुनियाद की शुरू में ही बुरा हाल है। अभी एविएशन के 12 प्रोजेक्ट देर हो चुके हैं। बुनियादी जरूरतों में जगह बना चुके टेलीकॉम का भी यही हाल है। टेलीकम्युनिकेशन के 36 प्रोजेक्ट देरी से चल रहे हैं। बिजली जैसी दूसरी बड़ी जरूरत के 27 प्रोजेक्ट समय से बहुत पीछे चल रहे हैं। हर गरमी में बिजली पर सरकारें राजनीति खूब कर लेती हैं। लेकिन, समय से प्रोजेक्ट पूरा कराने की दिशा में कोई खास कदम नहीं उठा पाती।
पेट्रोलियम और कोयला के 25 और शिपिंग के 22 प्रोजेक्ट अपने तय समय से काफी पीछे चल रहे हैं। शहरी विकास मंत्रालय का भी हाल अच्छा नहीं है। शहरी विकास के 11 प्रोजेक्ट समय से पूरे होते नहीं दिख रहे। और यही हाल स्टील मंत्रालय का भी है।
हाल ये है कि 1,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के 63 से ज्यादा प्रोजेक्ट देरी से पूरे हो रहे हैं। 100 करोड़ रुपए से कम वाले तो, 426 प्रोजेक्ट पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं। ये प्रोजेक्ट एक महीने से 16 साल तक की देरी से चल रहे हैं। यही वजह है कि अटल बिहारी बाजपेयी की एनडीए सरकार के समय में शुरू हुई स्वर्णिम चुतुर्भुज योजना अभी कई जगह आपस में जुड़ ही नहीं सकी है।
अब जब इतने बड़े-बड़े प्रोजेक्ट में देरी पर सरकार को कोई चिंता नहीं होती है। तो, मेरे जैसे कुछेक हजार खर्च कर रेलगाड़ी से घर जाने वालों के समय की चिंता सरकार को भला क्यों होगी।

18 घंटे का सफर 26 घंटे में क्यों पूरा होता है?

अक्सर लालू पुराण चर्चा में रहता है। सब कह रहे हैं कि लालू ने कमाल कर दिया है। लालू ने रेलवे को पटरी पर ला दिया है। घाटा कम कर दिया है, मुनाफा ही मुनाफा हो रहा है। रेलवे आधुनिक होती जा रही है। रेलगाड़ियां, एयर लाइंस से टक्कर लेने लगी हैं। अभी मैं इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में मीडिया पर हुई एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में शामिल हो कर लौटा तो, ये सब लालू की पब्लिक रिलेशन एक्सरसाइज भर लगी। जाते और आते दोनों समय रेलगाड़ी दो घंटे से ज्यादा की देरी से पहुंच पाई।

मुंबई से इलाहाबाद मैं महानगरी एक्सप्रेस से गया। महानगरी एक्सप्रेस में नए बने डिब्बे लगे हैं। तृतीय श्रेणी की वातानुकूलित बोगियों में भी बढ़िया चार्जिंग प्वाइंट लगे थे। लेकिन, अब तक इस गाड़ी में पैंट्री कार नहीं लग पाई है। मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल से चली गाड़ी जबलपुर तक बड़े मजे से सफर तय करती रही लगा कि गाड़ी समय से कुछ पहले ही पहुंच जाएगी। लेकिन, मानिकपुर पहुंचते-पहुंचते उम्मीदें धूमिल होने लगी। मानिकपुर तक समय से कुछ पहले ही पहुंची गाड़ी ने इलाहाबाद स्टेशन तक पहुंचते-पहुंचते 2 घंटे की देरी कर दी।

मानिकपुर और नैनी के बीच गाड़ी करीब चार जगह 20-20 मिनट के लिए रुकी। नैनी पर भी गाड़ी को ज्यादा समय तक रुकना पड़ा। नैनी पार करने के बाद भी बात बनी नहीं और गाड़ी को 5 मिनट तक प्लेटफॉर्म खाली होने का इंतजार करना पड़ा। 12 बजे पहुंचने वाली महानगरी इलाहाबाद 1.45 बजे पहुंची।
इलाहाबाद से वापसी का टिकट बनारस सुपरफास्ट एक्सप्रेस में था। गाड़ी इलाहाबाद स्टेशन से एकदम सही समय पर छूटी। लेकिन, मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनल यानी कुर्ला स्टेशन तक पहुंचते-पहुंचते फिर 2 घंटे देर हो गई। बनारस सुपरफास्ट की रफ्तार भुसावल से पहले ही टांय-टांय फिस्स हो गई थी। रही-सही कसर नासिक के बाद पूरी हो गई। इगतपुरी से कुर्ला पहुंचने में करीब ढाई घंटे लग गए। गाड़ी जब-जब रुकी ज्यादातर बार यही होता था किसी गाड़ी के पास होने का इंतजार किया जा रहा है। अब सवाल ये है कि अगर लालू यादव की रेल ने 20 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का मुनाफा कमाया है तो, पटरी इतनी क्यों नहीं लग पा रही है कि गाड़ी उस पर अपनी रफ्तार से दौड़ सके।

बार-बार बुलेट ट्रेन और तेज रफ्तार वाली रेलगाड़ियों की योजना बनती-बिगड़ती रहती है। लेकिन, पहले अपनी रेलगाड़ियों की अभी जो ताकत है, उसी पर उनको पूरी रफ्तार से दौड़ाने की कोशिश क्यों नहीं हो पा रही। मेरे जैसे लोग जिनको बड़ी मुश्किल से इलाहाबाद (घऱ) जाने की छुट्टी मिल पाती है। अगर, सफर में दोनों तरफ 26 की बजाए 20 या 18 घंटे लगें तो, इतना लंबा सफर शायद कुछ कम पीड़ादायक लगे। ये गाड़ियां आसानी से 4-6 घंटे दोनों तरफ बचा सकती हैं। बस इन्हें पटरियां खाली मिलें। तभी ये कहना सही होगा कि लालू की रेल पटरी पर आ गई है। वैसे ये सिगनल न मिलने वाली रुकावट सिर्फ मुंबई-इलाहाबाद रूट पर ही नहीं है। मैं दिल्ली से इलाहाबाद एक बार प्रयागराज एक्सप्रेस से आ रहा था। सुबह 6.45 बजे आने वाली प्रयागराज समय से आधे घंटे पहले ही सूबेदारगंज के आउटर पर आकर खड़ी हो गई। मतलब दिल्ली से इलाहाबाद से प्रयागराज एक्सप्रेस के समय में भी आधे-आधे घंटे दोनों तरफ से हर रोज बचाए जा सकते हैं।
अभी बहुत सी एक्सप्रेस रेलगाड़ियां हैं जो, 24 घंटे से ज्यादा की दूरी तय करती हैं लेकिन, उनमें बमुश्किल ही मोबाइल या लैपटॉप के चार्जिंग प्वाइंट लग पाए हैं। साफ-सफाई का ठेका यूरेका फोर्ब्स को देने के बाद भी 27 अक्टूबर को मुंबई आ रही बनारस सुपरफास्ट एक्सप्रेस की सफाई के लिए 2 बार अनाउंसमेंट कराने पर भी कोई सफाई कर्मचारी नहीं आ पाया। इस ट्रेन के वातानुकूलित डिब्बे घुटन का सा अहसास देते रहते हैं। और, लालू यादव इसको बेहतर करने के बजाए उन्हीं डिब्बों में और सीटें जोड़ने की जुगत बना रहे हैं।
मुझे खबर पढ़ने को मिली थी कि इलाहाबाद से मानिकपुर एक ही ट्रैक की वजह से देरी होती है। और, 2 ट्रैक करने के इसके एक हिस्से का काम पूरा हो गया है, दूसरे हिस्से का काम दिसंबर तक पूरा हो जाएगा तो, डेढ़ से दो घंटे बचाए जा सकेंगे। लेकिन, भुसावल से कुर्ला पहुंचने में हुई देरी की वजह मैं नहीं समझ पाया। उम्मीद करता हूं की अगली बार इलाहाबाद के लिए टिकट बुक कराऊंगा तो, टाइम टेबल में 24 घंटे का समय घटकर 22 घंटे तो, हो ही जाएगा और इतने समय में ट्रेन पहुंच भी जाएगी। मेरा भरोसा कितना पूरा होगा इस पर कुछ प्रकाश तो, ज्ञानदत्तजी डाल ही सकते हैं। और, मेरे जैसे लोगों की पीड़ा कुछ ऊपर तक पहुंचा भी सकते हैं।

Friday, October 26, 2007

कौन बनाएगा मीडिया का कोड ऑफ कंडक्ट

(मैं इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के फोटो जर्नलिज्म और विजुअल कम्युनिकेशंस डिपार्टमेंट की ओर से कराई गई राष्ट्रीय संगोष्ठी में शामिल हुआ था। उसमें मुझे पहले सत्र में कौन बनाएगा मीडिया का कोड ऑफ कंडक्ट विषय पर बोलने के लिए बुलाया गया था। ये लेख उसी भाषण का हिस्सा है)
मीडिया के लोग इस समय सबसे ज्यादा किसी बात से परेशान हैं तो, वो ये कि सरकार उनकी स्वायत्तता या यूं कह लें कि स्वतंत्र सत्ता पर हमला करने की तैयारी में है। हफ्ते भर में एक बार तो किसी न किसी बहाने सूचना प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी मीडिया के लिए एक कोड ऑफ कंडक्ट की बात कर ही देते हैं। मुंशीजी का प्रस्तावित कोड ऑफ कंडक्ट ऐसा है कि आज की तारीख में काम कर रहे ज्यादातर न्यूज चैनलों पर कभी भी किसी जिलाधिकारी के डंडे की चोट पड़ सकती है।

अभी चुनावों की आहट से मुंशीजी का मीडिया को काबू करने का प्रिय प्रोजेक्ट भले ही पीछे चला गया हो। लेकिन, देर-सबेर ये होना ही है। अब सवाल ये है कि क्या मीडिया को सरकारी कोड ऑफ कंडक्ट से चलाया जा सकता है। लेकिन, साथ ही जुड़ा हुआ सवाल ये है कि क्या मीडिया इतनी जिम्मेदारी से अपना काम कर पा रहा है कि उसे किसी कोड ऑफ कंडक्ट की जरूरत न पड़े या कोड ऑफ कंडक्ट बने तो, उसे कौन तय करेगा।

हाल के दिनों की दिल्ली की दो घटनाएं- एक दिल्ली की स्कूल टीचर के खिलाफ जनमत से लाइव इंडिया बने चैनल का स्टिंग ऑपरेशन। और, दूसरा कुछ तथाकथित पत्रकारों का एक सांसद से स्टिंग की धमकी देकर वसूली की कोशिश- ये दोनों ऐसी घटनाएं हैं, जिसके बाद मीडिया के लिए कोड ऑफ कंडक्ट की वकालत करने वालों का पक्ष मजबूत होता है। लाइव इंडिया को इस फर्जी स्टिंग ऑपरेशन की वजह से ऑफ एयर भी कर दिया गया था। और, ये सिर्फ इत्तफाक नहीं है कि इस बार देश के प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका एक्सलेंस इन जर्नलिज्म अवॉर्ड के मौके पर हुए पैनल डिस्कशन में सबने एक-दूसरे से यही सवाल पूछा या यूं कहें कि खुद को कसौटी पर कसने की कोशिश की।

उस मंच पर एक साथ बड़े-बड़े पत्रकार बैठे हुए थे। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों को चलाने वाले लोग थे। कुछ ऐसे थे जो, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों में ही अपनी अच्छी छाप छोड़ चुके हैं। अखबारों-टीवी चैनलों की सुर्खियां बनने वाले बड़े-बड़े नेता बहस को सुनने वालों में थे। बहस की शुरुआत ही इसी से हुई कि क्या बाजार टीवी चैनलों या पूरे मीडिया को ही इस तरह से चला रहा है कि उसमें इस बात की कोई जगह ही नहीं बची है कि एक्सलेंट जर्नलिज्म किया जा सके। या फिर बदलते जमाने के साथ जर्नलिज्म के पैमाने भी बदल रहे हैं और इसी दौर की वजह से मीडिया भटका हुआ दिख रहा है।

यही भटकाव है कि टीवी चैनल शुरू करने के साथ चैनल का नया-नया एडिटर पहला काम जो सोचता है वो, टीआरपी बढ़ाने के लिए किसी बढ़िया स्टिंग ऑपरेशन का। स्टिंग ऑपरेशन में सेक्स स्कैंडल या फिर कहीं किसी को पैसे लेते-देते दिखाने को मिल जाए तो, फिर तो मजे ही आ जाते हैं। लेकिन, इस स्टिंग ने अगर टीवी के जरिए कई बड़े खुलासे देश के लोगों के सामने रखे तो, यही स्टिंग ऑपरेशन अब मीडिया को कोड ऑफ कंडक्ट में बांधने की बात मजबूत करते हैं।

वैसे रामनाथ गोयनका एक्सलेंस इन जर्नलिज्म अवॉर्ड के पैनल से उस समय के राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम ने एक सवाल पूछा जो, कोड ऑफ कंडक्ट लागू करने की वजह तो बता ही देता है। कलाम ने मीडिया के दिग्गजों से सिर्फ एक ही सवाल पूछा कि क्या वो देश के लोगों को ऊपर उठाने में कोई मदद कर रहे हैं। क्या वो गरीब रेखा के नीचे बसने वाले देश के बाइस करोड़ लोगों को ऊपर उठाने के लिए भी कोई खबर दिखाते हैं। कलाम ने A+B+C पर मीडिया को काम करने की सलाह दी। A यानी देश की जीडीपी, देश के विकास में मीडिया का योगदान, B यानी देश की बाइस करोड़ जनता जो, गरीबी रेखा से नीचे है, उनके लिए मीडिया क्या कर सकता है और C जो, कलाम ने सबसे जरूरी बताया वो, ये कि देश में वैल्यू सिस्टम को बनाए रखने में मीडिया की भूमिका।

सवाल जायज था लेकिन, मीडिया के दिग्गजों में से किसी से भी इस बात का जवाब देते नहीं बना। अब अगर हम कलाम साहब की इस बात को समझ सकें तो, ये भी समझ में आ जाएगा कि मीडिया में किस तरह के कोड ऑफ कंडक्ट की जरूरत है। मीडिया समाज को आगे बढ़ाने में मदद करता है तो, मीडिया की विश्वसनीयता और मीडिया का सम्मान बढ़ता है और इस सम्मान पर खरा उतरने का दबाव ही मीडिया के लिए सबसे बढ़िया कोड ऑफ कंडक्ट हो सकता है।

कोड ऑफ कंडक्ट का सवाल सिर्फ स्टिंग ऑपरेशन से ही नहीं आ रहा है। भूत-प्रेत-ओझा-बाबा-अजब-गजब दिखाने की टीवी चैनलों की होड़ ने भी मीडिया को कोड ऑफ कंडक्ट के दायरे में बांधने की राय मजबूत की है। हाल ये है कि गाल में भाला घुसेड़ने वाला आधे घंटे तक लगातार टीवी की टीआरपी बढ़ाता रहता है। टीआरपी के भय से ही कभी भी कोई भी हिंदी चैनल लगातार चार-पांच घंटे तक या शायद फिर दिन भर भूत-प्रेत-आत्मा-हवेली में घुंघरू की झनकार-हत्यारा प्रेमी/प्रेमिका-हिला देना वाला खुलासा-टीवी की अब तक की सबसे सनसनीखेज खबर-टेलीविजन इतिहास में पहली बार-14 साल के गांव के बच्चे में अमेरिकी वैज्ञानिक की आत्मा, जैसे शीर्षकों से खुद को बेचने की कोशिश करता रहता है।

इसी टीआरपी की वजह से टीवी इस्तेमाल भी हो रहा है। कोई राखी सावंत और मीका कई हफ्तों तक टीवी की सबसे बड़ी सुर्खी बने रहते हैं। और, साफ है कि दोनों ने पब्लिसिटी के लिए ये काम किया नहीं तो, एक दूसरे के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के बजाए हर सार्वजनिक मंच पर उसी बात को उछालने की कोशिश क्यों करते। उदाहरण एक नहीं है। ताजा उदाहरण है टीवी एक्ट्रेस श्वेता तिवारी और उसके पति राजा का। दोनॆ ने मारपीट की और मीडिया में खूब दिखने के बाद कहा- मीडिया को उल्लू बन दिया। हमें तो, सिर्फ पब्लिसिटी चाहिए थी।

मीडिया का इस्तेमाल और इसके प्रति लोगों की राय का अंदाजा सुपर स्टार शाहरुख खान के एक बयान से अच्छे से लगाया जा सकता है। शाहरुख मानते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बहुतों को नहीं पता कि उन्हें क्या करना चाहिए। उनका कहना है कि उनका रिश्ता मीडिया के सिनर्जी का है वो, मीडिया का इस्तेमाल करते हैं और मीडिया उनका।

वैसे कुछ इस्तेमाल करने के चक्कर में टीवी पत्रकार बेकार भी बन रहे हैं। किसी भी बिकाऊ वीडियो पर न्यूजरूम में सिर्फ एक ही आवाज आती है सीधे चला दो। इसमें करना ही क्या है। चैनलों पर तो, आधे-एक घंटे तक देश के किसी भी हिस्से में लोगों को हंसा रहे राजू श्रीवास्तव या फिर कोई दूसरा कॉमेडी कलाकार लाइव कटा रहता है। उससे छूटे तो, कहीं कोई सुंदर बाला देह दर्शना नृत्य या कृत्य कर रही हो तो, उसे लाइव काट दीजिए।

कुछ एक न्यूज चैनल में तो, कुछ प्रोड्यूसर इसीलिए रखे जाते हैं कि उन्होंने एंटरटेनमेंट चैनलों को ध्यान से देखा उसको रिकॉर्ड कराया। उसके बीच-बीच में तीस-चालीस सेकेंड के कुछ लच्छेदार एंकर लिंक डाले और 9 मिनट का ब्रेक मिलाकर तीस मिनट का बढ़िया टीआरपी वाला बुलेटिन तैयार कर डाला। शायद इसके लिए भी किसी न किसी कोड ऑफ कंडक्ट की जरूरत है।

लेकिन, क्या मीडिया में सरकारी कोड ऑफ कंडक्ट के दबाव में एक्सलेंट जर्नलिज्म हो पाएगा। जाहिर है अखबार या टीवी चैनल ऐसा होना चाहिए जिसमें रोटी-दाल-चावल-सब्जी-अचार-मसाला सबकुछ हो। लेकिन, क्या कभी भी किसी खाने की थाली में अचार या मसाला सबसे ज्यादा हो सकता है। तीखा से तीखा खाने वाले भी दो-तीन मिर्च या छोटी कटोरी में अचार से ज्यादा नहीं पचा पाते। लेकिन, रोटी-दाल-चावल तो सबको पेट भरके चाहिए ही।

एक्सलेंस जर्नलिज्म के लिए टाइम्स ऑफ इंडिया सचमुच एक बड़ा उदाहरण है जो, बाजार और पढ़ने वालों की जरूरतों के लिहाज से खुद को लगातार एक्सलेंट बनाता जा रहा है। लेकिन, अंग्रेजी और अग्रेजी बिजनेस जर्नलिज्म (द इकोनॉमिक टाइम्स) में बेहतर काम करने वाला टाइम्स ग्रुप भी हिंदी (नवभारत टाइम्स) में ये काम नहीं कर पा रहा है।

देश के सबसे बड़े हिंदी अखबारों दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर को अग्रेजी के टाइम्स ऑफ इंडिया से सबक लेना चाहिए। टाइम्स ऑफ इंडिया भी ज्यादातर इसी बात के लिए चर्चा में रहता है कि उसके दिल्ली या मुंबई टाइम्स या फिर सप्लीमेंट के रंगीन पन्नों पर सुंदर फोटो होते हैं। लेकिन, इसी के बीच जैसे-जैसे अखबार मजबूत(सर्कुलेशन के लिहाज से) और कमाऊ (विज्ञापनों के लिहाज से) बनता गया। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबरों की गुणवत्ता बेहतर होती गई। अब तो, शनिवार-रविवार के टाइम्स के अतिरिक्त पन्ने इंडियन एक्सप्रेस को भी कई बार मात देते दिखते हैं।

इसलिए जरूरत इस बात की है कि हिंदी में भी टीवी न्यूज चैनल और अखबार इस दबाव से बाहर निकलें कि टीआरपी के लिए अपना मन मारकर शो चलाना ही पडेगा नहीं तो, मुकाबले में नहीं रह पाएंगे। क्योंकि, अगर टीआरपी और सर्कुलेशन के दबाव में टीवी-अखबार कुछ भी भौंडा सा चलाकर ये तर्क देकर बचते रहे कि लोग यही पसंद करते हैं। तो, फिर मीडिया में काम करने वालों को लोकतंत्र का चौथा खंभा समझने की गलती कोई क्यों करे। कोई क्यों मीडिया के लोगों का सम्मान करे। प्रियरंजन दासमुंशी जैसे लोग क्यों मीडिया को कोड ऑफ कंडक्ट के सरकारी डंडे से हांकने का मन न बना लें।

वैसे, भूत-प्रेत और टीआरपी की खबरें दिखाने वाले टीवी चैनलों को चलाने वाले और उसमें काम करने वाले भी इससे ऊब चुके हैं और इस वजह से टीवी चैनलों में आई एक बड़ी जमात इससे भागने की भी तैयारी में है। 100 करोड़ से ज्यादा का देश है। टीवी चैनल और अखबार हिम्मत तो, करें देश में भूत-प्रेत-अपराध, स्टिंग ऑपरेशन पसंद करने वाले टीवी देखने और अखबार पढ़ने वालों से कई गुना ज्यादा लोग अभी एक्सलेंट जर्नलिज्म को गुड बिजनेस बनाने के लिए तैयार हैं।

मीडिया पर भरोसा रखने वाले और इसे गाली देने वाले दोनों ही वर्गों के लोग ये मानते हैं कि मीडिया में किसी को भी आदर्श और भ्रष्ट बना देने की ताकत है। इसलिए कोड ऑफ कंडक्ट तो जरूरी है। लेकिन, मीडिया के लिए कोड ऑफ कंडक्ट जनता का भरोसा बचाए रखने के दबाव से आना चाहिए। इस्तेमाल होने और इस्तेमाल करने की मानसिकता से बाहर निकलने से।

Wednesday, October 17, 2007

बाजार ने दिया सुपरहिट फिल्म का मसाला

बॉलीवुड को आज शेयर बाजार से सुपरहिट फिल्म का एक जोरदार फॉर्मूला मिल गया होगा। जिसके बॉक्स ऑफिस तोड़ देने की पूरी गारंटी है। चिदंबरम जैसा हीरो जिसने खुद ही फिल्म की पटकथा लिखी हो। दामोदरन जैसा बेहतरीन निर्देशक, जिसने पटकथा को परदे पर खूबसूरती से उतार दिया। और, फिल्म में FII कलाकार के रोल में थे तो पी नोट जैसा आइटम सांग भी था। कुछ ऐसा ही आज बाजार में देखने को मिला।
सेंसेक्स फिर 19,000 के करीब पहुंच गया है। करीब 300 प्वाइंट नीचे रह गया है। दरअसल आज सुबह बाजार में जो बरबादी शुरू हुई थी। उससे तो यही लग रहा था कि आज सेंसेक्स-निफ्टी गिरने के मामले में सारे रिकॉर्ड तोड़ देंगे। लेकिन, मुस्कुराते हुए चिदंबरम का बयान आया कि शाम तक सब सामान्य हो जाएगा, ठीक वैसा ही हुआ। यानी, सुबह खुलते ही 1,500 प्वाइंट से ज्यादा गिरने वाला सेंसेक्स और करीब 10 प्रतिशत तक गिरने वाला निफ्टी में थोड़ी गिरावट ही बची रह गई। 19,000 पर पहुंचे सेंसेक्स और 5,000 के ऊपर पहुंचे सेंसेक्स निफ्टी के लिए 300 और 100 प्वाइंट के आसपास की गिरावट अब मामूली ही रह गई।
खैर, अगर कल रात से आज यानी मंगलवार रात से बुधवार रात तक का घटनाक्रम देखें तो, सब कुछ फिल्मी ड्रामे जैसा लगता है। चिदंबरम की लिखी पटकथा (स्क्रिप्ट) के मुताबिक ही सब कुछ हुआ। बाजार डरा, FII सहमे, छोटे निवेशक बरबादी के कगार पर खड़े नजर आए, बुधवार को बाजार में बवंडर उठता दिखा लेकिन, अचानक हिंदी फिल्मों की तरह परदे पर फिल्म के नायक यानी चिदंबरम ने एंट्री ली और सब कुछ बढ़िया होने लगा।
फटेहाल दिख रहे सेंसेक्स-निफ्टी के घर की चूती दीवारों पर नेरोलक पेंट लग गया। बढ़िया जेपी सीमेंट की मजबूत दीवार बन गई। निवेशकों का भरोसा लौटा और फिर सें सेंसेक्स-निफ्टी में भेड़ की जगह सांड़ दौड़ने लगे। सेंसेक्स के 11,000 पर पहुंचने के साथ ही ये बात RBI गवर्नर रेड्डी बार-बार कह रहे थे कि ये बिना पहचान बताए शेयर बाजार में पैसा लगाने वालों पर रोक जरूरी है। लेकिन, तब मनमोहन-चिदंबरम की जादुई जोड़ी के सामने 10 प्रतिशत की विकास दर के नजदीक पहुंचने की चिंता थी। इसलिए बाजार की रफ्तार भी जरूरी थी।
भले ही बाजार में लगने वाले पैसे के बारे में किसी को कुछ पता ही न हो। अब अगर शेयर बाजार में ओसामा बिन लादेन या दाउद इब्राहिम भी पैसा लगाना चाहें तो, धीरे से लगा सकते हैं सरकार को पता भी नहीं चलेगा। हो, सकता है लगा ही हो। शेयर बाजार में ऐसे पैसे से देश की सुरक्षा को खतरे के बारे में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नारायणन पहले कई बार चिंता जता चुके हैं।
दरअसल आज एक इशारे से बाजार को तबाह करने वाले पार्टिसिपेटरी नोट्स के जरिए बाजार में पैसा लगाने वाले विदेशी निवेशकों के लिए अपनी पहचान बताना भी जरूरी नहीं होता है। साफ है फिर ये रास्ता काली कमाई के लिए सबसे आसान है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तीन साल पहले FII के जरिए शेयर बाजार में 31,000 करोड़ से कुछ ज्यादा पैसे बाजार में लगे थे। इस समय 3,50,000 करोड़ से भी ज्यादा बाजार में FII’s का है।
अब आप समझ सकते हैं कि शेयर बाजार की इस तेजी में देसी निवेशकों को कितना फायदा हो रहा है। वैसे, एक बात और सामने आ रही है कि देश की काली कमाई FII’s के जरिए शेयर बाजार में लग रही है। ज्यादातर जानकार पी-नोट के जरिए FII’s के बाजार में पैसा लगाने पर लगाम के सेबी के फैसले को बाजार के लिए बेहतर बता रहे थे फिर चिदंबरम को और दामोदरन को सफाई क्यों देनी पड़ी।
मंगलवार देर रात सेबी को ऐसा फैसला लेने की क्या जरूरत थी जिस पर प्रतिक्रिया देने के लिए बाजार के सट्टेबाजों को पूरा समय मिल गया। दामोदरन ने मंगलवार रात को ही ये सफाई क्यों नहीं दी। डेढ़ हजार प्वाइंट से ज्यादा की गिरावट के बाद कहां से इतनी खरीद हुई कि सूख गए सेंसेक्स में फिर हरियाली लौट आई।
वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने पहले से ही 10.30 बजे की प्रेस कांफ्रेंस तय कर रखी थी। प्रेस कांफ्रेंस करते समय चिदंबरम के चेहरे पर चिंता के कोई भाव नहीं थे। चिदंबरम ने कहा शाम तक सब ठीक हो जाएगा और ठीक हो गया। इससे क्या संकेत माने जाएं। वैसे, एक और बात जो आज दिन भर सबसे ज्यादा चर्चा में रही कि इस समय बाजार में सीधे और FII’s के जरिए बड़े नेताओं के करोड़ो लगे हुए हैं। यानी फिल्म अभी पूरी नहीं हुई है। इसका पार्ट-2 भी जल्द ही देखने को मिलेगा।

Monday, October 15, 2007

बौराया बाजार किसका भला कर रहा है?

बाजार हम पर बुरी तरह से हावी हो गया है। इतना कि सेंसेक्स की सरपट चाल किसी की समझ में न आने के बाद भी सेंसेक्स सोमवार को 19,000 पार कर गया। देश तरक्की कर रहा है। भारतीय कंपनियां दुनिया भर में नाम कमा रही हैं। भारत के अमीर, दुनिया के अमीरों के नाक-कान काट रहे हैं। आम आदमी सेंसेक्स में पैसा लगाकर खूब कमा रहा है। बाजार के विद्वानों का ज्ञान सुनें तो, लगता है पूरा देश सेंसेक्स की तरक्की से संपन्न हो गया है।
लेकिन, देश क्या सोचता है, इसका अंदाजा एक निजी टेलीविजन चैनल पर पूछे गए सवाल से काफी हद तक पता लग जाता है। टीवी चैनल पर सवाल पूछा गया था कि सेंसेक्स 19,000 के पार, इसे आप क्या मानते हैं। सवाल का जवाब देने वालों में से सिर्फ 15 प्रतिशत लोग इसे देश की तरक्की का आइना मानते हैं। 50 प्रतिशत लोग मानते हैं कि सेंसेक्स और सट्टे में खास फर्क नहीं है, शेयर बाजार सट्टे की तरह इस्तेमाल हो रहा है। 35 प्रतिशत को सेंसेक्स-निफ्टी की तेजी में जो दिखता है वो, और भी खतरनाक है। ये 35 प्रतिशत लोग मानते हैं कि शेयर बाजार में आ रहे अनाप-शनाप पैसे से देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। यानी बाजार के साथ छेड़छाड़ हो रही है। क्योंकि, इतना पैसा कहां से और क्यों आ रहा है। इसका सही गणित वो भी नहीं बता पाते जो, दिन भर बाजार की ही बकवास करते रहते हैं।

वैसे बड़ी मजेदार बात होती है कि इस सेंसेक्स के बारे में किसी को कोई अंदाजा नहीं होता है। ठीक वैसे ही जैसे लॉटरी या कसिनो में किसी को ये पता नहीं होता कि किस नंबर पर लाखों फोकट में जेब में आ जाएंगे। यहां भी कुछ ऐसा ही है इतनी तेजी के बाद भी कई कंपनियां लाल निशान से उबर नहीं पा रही हैं। फोकट में पैसा आया तो, वो ईमानदारी के पैसे की तरह तो, खर्च होने से रहा। शायद यही वजह है कि एक बार हराम की कमाई यानी लॉटरी, सट्टे और शेयर बाजार से पैसा कमाने की लत लगी तो, फिर मुश्किल से ही जाती है। और, कभी-कभी तो जान भी ले जाती है।

ये सेंसेक्स 17,000 से 18,000 सिर्फ 8 दिनों में पहुंच गया तो, 18,000 से 19,000 सिर्फ 4 दिनों में पहुंच गया। अब क्या उम्मीद करें कि अगले दो दिन में सेंसेक्स 20,000 पर होगा। अभी मैंने कुछ दिन पहले लिखा था कि किसी तरह से अंबानी भाई, डीएलएफ के के पी सिंह, भारती के सुनील भारती मित्तल और दूसरे अमीरों का पैसा बेतहाशा बढ़ गया है। तो, उस पर कई टिप्पणियां जो मिली थीं। उसमें से एक ये भी थी कि क्या आपको पता है ये बदलते भारत की पहचान हैं। टिप्पणी में कुछ लोगों ने कहा कि ये मेहनत से तरक्की कर रहे हैं। अब कोई मुझे ये बताए कि सेंसेक्स के भागने से महीने में 22-25 हजार करोड़ रुपए जो, इनकी जेब में पहुंचे वो, किस मेहनत का नतीजा है।

वैसे बौराए बाजार की तेजी की ये चिंता सिर्फ आम लोगों को ही नहीं है। खुद वित्त मंत्री पी चिदंबरम भी शुक्रवार को ये बोल पड़े कि मुझे सेंसेक्स की ये तेजी चौंकाती है, कभी-कभी डराती है। ये वो, वित्त मंत्री हैं जो, मानते हैं कि सेंसेक्स-निफ्टी की तेजी देश की तरक्की का आइना है। साफ है उन्हें भी डर लग रहा है कि कहीं ये पैसा ऐसा तो नहीं है जो, देश को अपने तरीके से चलाने की कोशिश करेगा। वित्त मंत्री ने RBI और SEBI को शेयर बाजार में आने वाले पैसे पर नजर रखने को कहा है। अब महीने भर के बजाए बाजार में आने वाले पैसे के स्रोत का पता लगाने के लिए 15 दिन में बैठक करेंगे। वैसे एक छोटा सा आंकड़ा और है जो, मुझे पता है, अच्छा भी लगता है, डराता भी है। अकेले मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज का देश की GDP में 3 प्रतिशत का हिस्सा है। सरकार पर अंबानी भाइयों के दबाव के किस्से इससे आसानी से जोड़े जा सकते हैं। अब अगर देश के 10 अमीर एक साथ आ जाएं तो, कौन सी सरकार होगी जो, इनके कहे को टाल पाएगी।

इन सब बातों से हो सकता है आपको लग रहा हो कि मैं क्या बेवकूफी कर रहा हूं। लेकिन, ये सोचने की गलती इस समय आम निवेशक भी कर रहा है, उसे बाजार डराने लगा है। उसे ये रफ्तार अलग से तेल-पानी देकर आई लगती है। बिना कोई काम शुरू किए ही अंबानी भाई जैसे लोग बाजार से हजारों करोड़ जुटा लेते हैं।
अब बात ये कि इस व्यवस्था पर सवाल उठाने की वजह क्या है। जब दुनिया के सारे देशों की तरक्की का रास्ता यही है। हम हमेशा कहते हैं कि चीन 10 प्रतिशत की विकास दर पा रहा है और हमें 10 प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार के लिए जरूरी है कि हमारे बाजार में ढेर सारा पैसा आए और कंपनियों की तेजी की गवाही देने वाले सूचकांक सेंसेक्स-निफ्टी बस बढ़ते ही जाएं। लेकिन, अगर चीन की तरक्की की बात करें तो, उसकी वजह साफ दिखती है। चीन के बनाए सामान दुनिया में ऐसे बिक रहे हैं कि उनमें खराबी की खबरें बार-बार आने के बाद भी उससे कोई नाता नहीं तोड़ पा रहा। भारत, जापान जैसे देशों की तरक्की की कमाई में से करीब 25 प्रतिशत चीन इसी वजह से झटक ले जा रहा है। हम आईटी, बीपीओ सेक्टर को छोड़ दें तो, जरा याद कर बताइए हमारी कौन सी कंपनी का प्रोडक्ट पूरी दुनिया में धड़ल्ले से बिक रहा है। अब सवाल ये कि इतने बड़े-बड़े विद्वान इस सबकी चिंता के लिए लगे हैं तो, मैं क्यों इसकी चिंता में बौरा रहा हूं। वजह ये कि देश की तरक्की में मैं भी शामिल हूं। मैं एक आम भारतीय हूं। और, मैं भी निवेशक बनना चाहता हूं, डीमैट अकाउंट खोलना चाहता हूं।

Sunday, October 14, 2007

भूलभुलैया से कुछ लोगों की प्रेत बाधा तो दूर हुई ही होगी

अच्छा हुआ प्रियदर्शन ने इस बार सिर्फ कॉमेडी नहीं बनाई। ज्यादातर फिल्म समीक्षक भूलभुलैया को एक ऐसी फिल्म बता रहे हैं जो, कॉमेडी और थ्रिलर के बीच फंसी है। किसी ने इसे 2 से ज्यादा रेटिंग देना भी ठीक नहीं समझा। लेकिन, मुझे लगता है कि लोगों को हंसाने की गारंटी देने वाली प्रियदर्शन की फिल्मों में भूलभुलैया एक अलग किस्म की सार्थक फिल्म की श्रेणी में शामिल हो जाएगी।
फिल्म की कहानी की अच्छी बात ये है कि शुरुआत से आप इस फिल्म की कहानी का बहुत साफ-साफ अंदाजा नहीं लगा सकते। फिल्म दर्शकों को अच्छे से बांधे रखती है। कहीं हंसाती है, कहीं-कहीं डराती भी है। फिल्म के कई चरित्रों पर दर्शकों का संदेह बार-बार पुख्ता करती रहती है। लेकिन, फिल्म की जो, सबसे अच्छी बात मुझे लगी, वो ये कि फिल्म ने बड़े सलीके से भूत-प्रेत-ओझा-बाबा को खारिज किया है।
शाइनी आहूजा और विद्या बालन के महल में पहुंचने से लेकर महल के भूत को भगाने के लिए आने वाले आचार्य तक हर जगह फिल्म ने वहम को दूर करने की कोशिश की है। अंधविश्वास को तोड़ने की कोशिश की है। कहानी में हर मोड़ पर लगता था कि ये कहानी किसी राजमहल में सत्ता हासिल करने के लिए रची गई साजिश की कहानी भर रह जाएगी। लेकिन, प्रियदर्शन सबको बार-बार चौंकाते रहे।
विद्या बालन को मानसिक बीमारी और उसके इलाज के लिए आचार्य की मदद, अनूठा प्रयोग सिर्फ फिल्म में अक्षय कुमार ने ही नहीं किया है। उससे बड़ा प्रयोग प्रियदर्शन ने इस विषय पर फिल्म बनाकर की है। परेश रावल और असरानी को महल में भूत दिखने से लेकर फिल्म के अंत तक सब साफ-साफ दिख रहा था कि कम से कम भूत प्रेत तो कुछ होते ही नहीं हैं। भूत भगाने आए आचार्य भी मनोचिकित्सा पर अमेरिका में लंबे-चौड़े भाषण देकर लौटे हैं।
कुल मिलाकर भूलभुलैया अंधविश्वास पर एक तगड़ी चोट है। साथ ही इस फिल्म में परंपरा-आस्था बचाते हुए ये सब प्रियदर्शन ने किया है जो, ज्यादा बड़ी चुनौती थी। ढोल जैसी पकाऊ कॉमेडी के बाद प्रियदर्शन का ये अच्छा प्रयास है। मैं तो, सभी को ये सलाह दूंगा कि ये फिल्म जरूर देखकर आएं। क्योंकि, मुझे पूरी उम्मीद है कि इस फिल्म को देखने के बाद अंधविश्वास कुछ तो कम होगा ही। भूत-प्रेत मानने वाले कई लोगों की प्रेत बाधा भी दूर होगी।

Saturday, October 13, 2007

मां का दूध बच्चे का पहला अधिकार

आपको लग रहा होगा ये कौन सी नई बात है। लेकिन, अब ये कानून बनने जा रहा है, बच्चे के पैदा होते देश का नागरिक होने के नाते उसे जो, पहला अधिकार मिलेगा वो, होगा मां के दूध का। नेशनल कमीशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स इसे कानून बनाने के लिए पूरी तैयारी कर चुका है। कमीशन 6 साल से छोटे बच्चों के अधिकारों के लिए ऐसे कानून बनाने का प्रस्ताव कर रहा है।

दरअसल सरकार के पास जो रिपोर्ट है उसके मुताबिक, भारत में पैदा होने वाले सिर्फ 23 प्रतिशत बच्चों को ही पैदा होने के घंटे भर में मां का दूध मिल पाता है। और, 46 प्रतिशत ही बच्चे होते हैं जिनको पहले छे महीने तक मां का दूध पीने को मिल पाता है। नेशनल कमीशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स चाहता है कि बच्चे को ज्यादा से ज्यादा समय तक मां का दूध पीने को मिले। क्योंकि, बाहर का दूध बच्चे की सेहत के लिए बहुत अच्छा नहीं होता है।

वैसे अभी के कानून के मुताबिक भी गर्भवती महिला को शिक्षित करने के लिए बच्चे के मां के दूध के फायदे बताना जरूरी है। साथ ही बच्चे को पैदा होने के घंटे भर के भीतर मां का दूध पिलाने की जिम्मेदारी नर्स की होगी। कानून में बदलाव के जरिए मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट 1961 में बदलाव करके मैटरनिटी लीव 3 महीने से बढ़ाकर 6 महीने करने का भी प्रस्ताव है। वजह ये कि बच्चे को नियमित तौर पर 6 महीने तक मां का दूध पीने को मिलेगा। ज्यादातर डॉक्टर भी बच्चे को 6 महीने तक मां का दूध पिलाने की सलाह देते हैं।
वैसे मां-बच्चे के रिश्ते में कानून की दखलंदाजी ठीक तो नहीं लगती। लेकिन, जिस तरह से आज के भागमभाग वाले युग में मां बच्चे को जन्म देने के 15 दिन बाद फिर से ऑफिस के काम में जुट जाती है। हफ्ते-हफ्ते भर मां-बाप व्यस्तता की वजह से बच्चे को समय नहीं दे पाते। बच्चे को माता-पिता की संयुक्त भारी कमाई से मोटा जेब खर्च तो मिल जाता है लेकिन, समय नहीं मिल पाता। ऐसे में शायद इस कानून की वजह से ही कम से कम 6 महीने तक मां-बच्चे का भावनात्मक रिश्ता और मजबूत होगा। साथ ही जवान भारत भी मजबूती से दुनिया का मुकाबला कर सकेगा। और, दुनिया किसी भारतीय के बच्चे को ये चैलेंज तो नहीं ही कर सकेगी कि मां का दूध पिया है तो, सामने आ जा।

Friday, October 12, 2007

सादगी से शादी!

दिल्ली की मशहूर शादियों की रौनक कुछ कम हो सकती है। खासकर पंजाबी शादियों की। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने शादियों की सीजन शुरू होने से पहले सिख धर्म मानने वालों को सादगी से शादी करने की सलाह दी है। कमटी का तो, यहां तक कहना है कि लोग रात की बजाए दिन में ही शादियां करें। साथ ही ये शादियां गुरुद्वारे से ही की जाए।

लोग गुरुद्वारे की सलाह मान भी रहे हैं। लेकिन, ज्यादा से ज्यादा लोगों को गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का शादियों पर बना कोड ऑफ कंडक्ट पता चल सके इसके लिए शहर में 400 से ज्यादा बोर्ड लगाए जा रहे हैं। साथ ही कमेटी के लोग भी अलग-अलग सर्कल में शादियों पर ध्यान देंगे कि वो सादगी से हो रही हैं या नहीं। ज्यादातर लोग इस बात के लिए तो मान ही गए हैं कि शादियों में शराब नहीं बहाई जाएगी। लेकिन, गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी कुछ ज्यादा ही कड़े मूड में दिख रही है। कमेटी का साफ कहना है कि जो, कोड ऑफ कंडक्ट नहीं मानेगा उसे गुरुद्वारे से शादी का प्रमाणपत्र नहीं दिया जाएगा।

वैसे गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का कहना है कि मोरल कोड ऑफ कंडक्ट कोई कानून नहीं है। ये सिर्फ सलाह है और गुरुद्वारा में तो, सादगी से शादी करनी ही होगी। बाहर वो जो चाहें कर सकते हैं। वैसे तो भारतीय शादियां भव्यता के लिए खूब जानी जाती हैं। यहां तक कि आर्थिक रुप से कमजोर भी अपने बेटे-बेटी की शादी में दिल खोलकर खर्च करते हैं। कई बार सचमुच पैसा पानी की तरह बहता दिखता है।

राजधानी दिल्ली में सबसे ज्यादा धूम पटाखे के साथ पंजाबियों की ही शादियां होती हैं। शादियों के सीजन में बड़े शहरों में हालात ये हो जाते हैं कि महीनों पहले बुकिंग न हो तो, शादी के लिए जगह मिलना भी मुश्किल हो जाता है। शादी के पूरे सीजन ज्यादातर शहरों में ट्रैफिक जाम का नजारा आम तौर पर देखने को मिल जाता है।
शादी के धूम धड़ाके में लोग अपनी शान के साथ दबंगई भी दिखाने की कोशिश करते हैं। शादियों में अनजाने में गोली लगने से हर साल कई शादियों में मातम छा जाता है। शादी खुशी का बड़ा मौका होती है लेकिन, खुशी के मौके को जिंदगी भर यादगार बनाने के लिए शराब बहाना, गोलियां चलाना, अनाप-शनाप पैसे खर्च करना तो कहीं से भी समझदारी नहीं है। ऐसे में गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की ये सलाह सबको रास्ता दिखा सकती है।

कांग्रेस लोकसभा चुनाव अभियान शुरू कर चुकी है

लेफ्ट-कांग्रेस के बीच परमाणु समझौते पर भले ही मोहलत-धमकी के खेल में 22 अक्टूबर तक की मोहलत मिल गई हो। लेकिन, कांग्रेस ने अपनी चुनावी तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेसी मंत्रियों के सुर बदल गए हैं। आर्थिक सुधार के अगुवा वित्त मंत्री पी चिदंबरम को किसानों के कर्ज की सुध आ रही है तो, अब तक सिर्फ इंडस्ट्री के हितों की खातिर आवाज बुलंद करने वाले वाणिज्य मंत्री कमलनाथ कह रहे हैं कि विकास का असली मतलब तभी है जब गांवों तक इसका हिस्सा पहुंचे।

गुरुवार को कैंबिनेट की नियमित प्रेस ब्रीफिंग में सूचना प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी के तेवर किसी सरकार के बजाए किसी पार्टी के प्रवक्ता की तरह लग रहे थे। लग रहा था कांग्रेस पार्टी अपना चुनावी एजेंडा पेश कर रही हो। अचानक रेलवे कर्मचारियों के लिए 70 दिन के बोनस का ऐलान कर दिया गया। मुंशीजी ने ये भी साफ कर दिया कि फिलहाल मार्च तक तो, पेट्रोल-डीजल के दाम बिल्कुल भी नहीं बढ़ने वाले हैं। घाटे से थोड़ी राहत के लिए तेल कंपनियों को ऑयल बांड जारी करने की इजाजत भले ही मिल गई है।

इससे पहले सरकार ने गेहूं का समर्थन मूल्य भी 850 रुपए से बढ़ाकर 1000 रुपए क्विंटल कर दिया है। इससे पहले किसान लगातार रोते-चिल्लाते रहे लेकिन, सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। विदेशों से महंगा घटिया गेहूं और किसानों को कम कीमत देने का हल्ला बार-बार होता रहा। अब जब चुनाव सिर पर आते दिखे तो, जल्दी से गेहूं का समर्थन मूल्य बढ़ा दिया गया। धान के लिए भी सब्सिडी का ऐलान है। लगातार मार खा रहे चीनी उद्योग के लिए भी आनन-फानन में राहत पैकेज का ऐलान कर दिया गया।

अब तक सिर्फ GDP, BULLISH MKT ECONOMY GROWTH PROSPECT का बाजा बजाने वाले वित्त मंत्री को भी गांवों किसानों की सुध आने लगी है। वित्त मंत्री 500-500 करोड़ रुपए के दो फंड बनान का ऐलान कर दिया जो, उन लोगों तक आसानी से वित्तीय सुविधाएं पहुंचाएंगे जो, अब तक बैंकिंग-फाइनेंशियल इंस्टिट्यूट्स से दूर थे। वित्त मंत्री ने सरकारी बैंकों को तो, हिदायत तक दे डाली कि सभी को कर्ज आसानी से दिया जाए। पता नहीं अब तक सरकार के ढाई साल से भी ज्यादा समय बीत जाने पर चिदंबरम बाबू को ये बात ध्यान में क्यों नहीं आई।

SEZ से लेकर दूसरे कई मुद्दों पर वित्त मंत्रालय को लंगड़ी मारने की कोशिश करने वाले वाणिज्य मंत्री कमलनाथ भी बदले-बदले से दिख रहे हैं। दून स्कूल से पढ़े कमलनाथ कहते हैं कि विकास का असली मतलब तभी है जब इसका फायदा गांवों को मिले। एक्सपोर्टर्स को मजबूत रुपए की आदत के साथ कारोबार की सलाह दे रहे कमलनाथ का सुर कुछ धीमा पड़ा है। सरकार ने 9 आइटम्स पर सर्विस टैक्स रिफंड भी लागू कर दिया है। SEZ में जिन किसानों की जमीन जा रही है उनके लिए भी पुनर्वास पैकेज का ऐलान कर दिया गया है।
लेकिन, कांग्रेस अच्छे से बताना चाहती है कि उसे गांव-गरीब-आम आदमी की इंदिराजी के समय से सोनिया गांधी के मालिकाना यानी आज तक सुध है। इसीलिए इसके लिए बाकायदा प्रचार अभियान की तैयारी कर ली गई है। एनडीए के समय में प्रचार में इंडिया शाइनिंग का नारा था तो, काग्रेस के प्रचार अभियान में भारत निर्माण और सर्व शिक्षा अभियान की उपलब्धियां चमकती दिखाई देंगी। जनता के लिए कांग्रेस ने कितना कुछ किया है, सिर्फ इसे बताने वाले प्रचार अभियान पर 70-80 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे।

Thursday, October 11, 2007

भ्रष्टाचार, अपराध से बरबाद हुआ राज्य उत्तर प्रदेश

किसी राज्य में भ्रष्टाचार और अपराध की जड़ें मजबूत होने से किस तरह का नुकसान होता है, इसका उत्तर प्रदेश से बेहतर उदाहरण शायद ही कोई और राज्य है। वैसे तो, उत्तर प्रदेश पिछले दो दशकों से किसी मामले में शायद ही तरक्की कर पाया हो लेकिन, पिछले पांच सालों में रही-सही कसर भी पूरी हो गई। अपराध-भ्रष्टाचार इस राज्य में इस तरह से सिस्टम का अंग बन गए कि सरकार और अपराधियों में अंतर कर पाना मुश्किल हो गया। और, इसका सीधा असर पड़ा राज्य के विकास पर। उत्तर प्रदेश ऐसा पिछड़ गया है कि रफ्तार पकड़ने में जाने कितने साल लगेंगे।

देश की 16 प्रतिशत आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश अपराध के मामले अव्वल है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, देश के 24 प्रतिशत हिंसक अपराध उत्तर प्रदेश के ही हिस्से में आ रहा है। ऐसे में प्रति व्यक्ति के आधार पर देखें तो, ज्यादा बदनाम राज्य बिहार भी इससे पीछे छूट चुका है। इस सबका असर ये है कि जब 1990 के बाद देश में तरक्की की रफ्तार सबसे तेजी है, जब ये कहा जा रहा है कि पैसा बरस रहा है कोई भी बटोर ले, उत्तर प्रदेश में व्यापार करना ज्यादातर मामलों में घाटे का सौदा साबित हो रहा है। देश जब आठ प्रतिशत से ज्यादा की रफ्तार से तरक्की कर रहा है तो, उत्तर प्रदेश सिर्फ 5 प्रतिशत की ही रफ्तार मुश्किल से पकड़ पा रहा है।

CII यानी कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री के एक आंकड़े के मुताबिक, 2004 में देश में जब घरेलू खपत प्रति व्यक्ति 18.912 रुपए थ तो, उत्तर प्रदेश में प्रति व्यक्ति घरेलू खपत करीब आधी यानी सिर्फ 9,900 रुपए थी। साफ है इंडस्ट्री तो बरबाद हुई ही लोगों की जेब में भी पैसा नहीं है। इसकी वजह भी साफ है उत्तर प्रदेश में 2005 में हिंसक अपराध 38 प्रतिशत बढ़ गए। व्यापार करने के लिए सरकारी तंत्र के साथ ही माफियाओं-बदमाशों से भी “नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट” लेना पड़ता है। बौद्धिक-धार्मिक नगरी इलाहाबाद में ही सिर्फ 2005 में 100 से ज्यादा हत्याएं दर्ज की गई हैं जबकि 60 अपहरण के मामले पता चले।

ऐसे माहौल में कोई और व्यापार चले न चले। लोगों को सुरक्षा देने का धंधा खूब चल रहा है। सिर्फ एक एजेंसी उत्तर प्रदेश पूर्व सैनिक कल्याण निगम के 12,000 सिक्योरिटी गार्ड लोगों की निजी सुरक्षा में लगे हैं। जबकि, इस एजेंसी के पास 1999 में सिर्फ 250 सिक्योरिटी गार्ड थे। ये हाल तब है जब उत्तर प्रदेश में ज्यादातर इलाकों में निजी असलहे रखना फैशन स्टेटमेंट माना जाता है। इस राज्य में इंडस्ट्री कैसे आगे बढ़ सकती है। इसका बड़ा उदाहरण सिर्फ इसी से लगाया जा सकता है कि इस राज्य में 2 राज्य राजमार्गों की हालत 20 साल पहले जैसी ही बुरी बनी हुई है। मुझे याद है कि एक बार मैं उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बस से इलाहाबाद से गोरखपुर गया था। इस सफर के बाद मुझे अंदाजा लग गया कि जौनपुर में रहने वाले मेरे दोस्त अपने घर जाने से पहले ये क्यों कहते थे कि कॉम्बीफ्लाम (दर्द दूर करने की दवा) ले लिया है ना।

इलाहाबाद से जौनपुर का रास्ता करीब साल भर से तो, चौड़ा होने के लिए खुदा हुआ है। ऐसा ही हाल है इलाहाबाद से सुल्तानपुर को जोड़ने वाले रास्ते में प्रतापगढ़ से सुल्तानपुर का। समझ में नहीं आता कि ये रास्ते क्या किसी नेता की विधानसभा-लोकसभा में नहीं आते। आखिर इन्हीं रास्तों से तो नेताजी-अधिकारी लोगों को भी तो आना जाना पड़ता है। मायावती ने राज्य की सत्ता संभालते ही राज्य को भ्रष्टाचार मुक्त, अपराध मुक्त करने का भरोसा दिलाया था। लेकिन, तीन महीने में तो कुछ तस्वीर बदलती नहीं दिखी है। अब उम्मीद यही कर सकते हैं कि अपनी सत्ता बचाए रखने और लोकसभा चुनावों में सीट बढ़ाने के लिए विधानसभा चुनाव के समय किए गए वादे मायावती पूरा करेंगी।

क्यों मर रहा है जवान भारत?

साठ साल का आजाद भारत दुनिया का सबसे जवान देश है। इस पर हम सबका सीना चौड़ा है। बीच-बीच में आते सर्वे ये भी बताते हैं कि जवान भारत दुनिया में सबसे ज्यादा खुश है। सबसे ज्यागा तरक्की जवान भारत ही कर रहा है। लेकिन, स्वास्थ्य मंत्रालय की एक रिपोर्ट पढ़कर मेरी भी जान निकल सी गई।
स्वास्थ्य मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट बता रही है कि देश में साल भर में एक लाख से ज्यादा लोगों ने खुद ही अपनी जान ले ली। दुनिया के सबसे खुश देशों में शामिल भारत के लोगों को क्या हो गया है। रिपोर्ट और भी ज्यादा डराती है। इसके मुताबिक, चार लाख लोगों ने अपनी जान गंवाने की कोशिश की थी जो, समय से इलाज मिल जाने से बच गए। जान गंवाने की कोशिश करने वाले 90 प्रतिशत लोग मानसिक असंतोष, डिप्रेशन और किसी तरह की बदसलूकी की वजह से जान गंवा रहे हैं।

भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देश की कुल आबादी के 7.5 प्रतिशत मानसिक समस्या से जूझ रहे हैं। मानसिक तनाव से जूझ रहे लोगों को सलाह देने वाले डॉक्टरों की भी जबरदस्त कमी है। देश को आबादी के लिहाज से 32,000 मानसिक रोग चिकित्सक चाहिए जबकि, सिर्फ 3,300 मानसिक रोग चिकित्सक ही मौजूद हैं। इनमें से भी 3,000 सिर्फ 4 महानगरों में हैं। इन्हीं में एक आंकड़ा ये भी है कि देश की 9 लाख से ज्यादा महिलाएं किसी न किसी मानसिक बीमारी से जूझ रही हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में हर 40 सेकेंड में कोई न कोई आत्महत्या कर लेता है। लेकिन, इसमें भी भारत जैसे देशों में इस बात का खतरा सबसे ज्यादा है। क्योंकि, 15 से 44 साल के लोगों की मौत के तीन कारणों में से सबसे बड़ी वजह आत्महत्या ही है। जवानों में तनाव का खतरा भी सबसे ज्यादा है। खुद की जान गंवा रहा जवान भारत अगर अपनी परेशानियों से निजात न पा पाया तो, ये बड़ी मुश्किल बन सकती है।

Wednesday, October 10, 2007

सब कुछ विदेशी मांगता है!

मुंबई को शंघाई बनाने का मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख का सपना अब तक पूरा नहीं हो सका है। लेकिन, महाराष्ट्र में ज्यादातर योजनाएं विदेशों की ही तर्ज पर बन रही हैं। शायद यहां की सरकार को भरोसा हो गया है कि किसी विदेशी शहर का नाम लेकर कोई योजना शुरू करने पर उसको मीडिया में पब्लिसिटी तो मिलती है। भारत जैसे देश में जहां अभी भी विदेश घूमना ज्यादातर लोगों के लिए सबसे बड़े सपने जैसा होता है, अपील भी ज्यादा करता है।

सबसे पहले विलासराव देशमुख ने मुंबई को शंघाई बनाने का सपना दिखाया। जबसे सपना दिखाया है तब से दो बार शहर ठीक-ठाक बाढ़ जैसे हालात से गुजर चुका है। कहां तक पहुंची है ये योजना इसका कुछ ठीक-ठीक पता शायद मुख्यमंत्रीजी को भी नहीं होगा। अभी ये योजना अंटकी ही है कि अब यहां के मंदिरों का संचालन भी विदेशी धर्मस्थलों की तर्ज पर करने की तैयारी है। अखबार में छपी खबर के मुताबिक, शिरडी के साई बाबा का स्थान अब इसाई धर्म शहर वेटिकन सिटी की तरह बेहतर बनाया जाएगा। शिरडी में 300 करोड़ की बिल्ड ऑन ट्रांसफर वाली योजना सरकार ने तैयार कर रखी है। यहां पर MSRDC हवाई सड़कें (स्काईवॉक), बहुमंजिला कार पार्क, पैदल चलने वालों के लिए अलग रास्ते के साथ चौड़ी सड़कें बनाएगा। खबर के मुताबिक, ये सब कुछ वेटिकन सिटी के आधार पर ही तैयार किया जाएगा। शिरडी का ब्लूप्रिंट बनाने से पहले MSRDC के अधिकारी वेटिकन, जेरुशलम और मक्का मदीना के तीर्थस्थलों की व्यवस्था का जायजा लेंगे।

मंदिर ही नहीं, मुंबई की ट्रैफिक व्यवस्था लंदन मॉडल पर चलाने की तैयारी हो रही है। लंदन की ही तरह किसी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए MMRDA लाइनलाइन रोड प्लान तैयार कर रही है। करीब 200 किलोमीटर लंबी कुल मिलाकर तीन लाइफलाइन रोड बनाई जाएगी। प्लान के मुताबिक, पहली 60 किलोमीटर लंबी लाइफलाइन रोड नरीमन प्वाइंट से वर्ली और बांद्रा होते हुए वसई तक जाएगी। दूसरी 65 किलोमीटर लंबी लाइफलाइन रोड मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक से मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे के जरिए करजत तक जाएगी। और, तीसरी 60 किलोमीटर लंबी आउटर लाइफलाइन रिंग रोड करजत और वसई-विरार को जोड़ेगी।
मामला सिर्फ मंदिर और ट्रांसपोर्टेशन का ही नहीं है। मुंबई की पुलिस को भी विदेशी तर्ज पर ज्यादा चाक चौबंद करने की तैयारी है। महाराष्ट्र के एक मंत्री चाहते हैं कि मुंबई पुलिस शिकागो पुलिस की तर्ज पर काम करे। वो कह रहे हैं कि मुंबई पुलिस अधिकारियों के पास लैपटॉप पर माफिया-बदमाशों की फोटो हो। जो, पूरी तरह से नेटवर्क से कनेक्टेड होगा। पुलिस टीम को हेलीकॉप्टर दिए जाएं, रात में देखने वाले कैमरे दिए जाएं। गाड़ियों की स्पीड जांचने वाली मशीन हर दूसरे चौराहे पर होगी।

अब मंत्रीजी को कौन बताए कि शिकागो में अपराध करने के तरीके और मुंबई में अपराध करने के तरीके में काफी फर्क है। इसके अलावा मुंबई में बहुत बड़े माफियाओं को छोड़कर मोबाइल के अलावा शायद ही कोई अपराधी अत्याधुनिक सुविधाओं का इस्तेमाल करता हो। रात के अंधेरे में देखने वाले कैमरे के साथ हेलीकॉप्टर से पुलिस वाले क्या किसी फिल्मी माफिया से जंग लड़ेंगे। शिरडी की व्यवस्था बेहतर करने, मुंबई की सड़कों को सुधारने और पुलिस को अत्याधुनिक बनाने पर किसी को कोई ऐतराज नहीं है। लेकिन, क्या सारे के सारे मॉडल विदेशों में ही मिलते हैं। यही मुंबई पुलिस है जिसने थोड़ी सी अत्याधुनिक सुविधाओं, असलहों और गाड़ियों के साथ माफियाओं को मार भगाया। देश में ही तिरुपति ट्रस्ट की व्यवस्था का उदाहरण कहीं भी कारगर हो सकता है। दिल्ली में पिछले 5-7 सालों में बनी रेड सिग्नल फ्री सड़कें और एक दूसरे को जोड़ते प्लाईओवर मुंबई की ट्रैफिक व्यवस्था बेहतर करने का अच्छा उदाहरण हो सकते हैं। लेकिन, शायद महाराष्ट्र को कोई भी देसी प्लान (उदाहरण) समझ में नहीं आता जब तक प्लान के साथ लंदन, शंघाई या शिकागो न जुड़ा हो।

Monday, October 08, 2007

सबका सपना मनी-मनी, लेकिन कितना?

अब पैसे का कोई मतलब ही नहीं रहा। पैसा बढ़ना बस प्रतीकों के तौर पर इस्तेमाल करने लायक शब्द रह गया है। पैसे क्या रुपए का भी कोई मतलब नहीं रह गया है। खासकर तब जब इसी देश में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो, हर मिनट चालीस लाख रुपए कमा रहे हैं। आपको लग रहा होगा मैं मजाक कर रहा हूं। लेकिन, ये मजाक नहीं है। रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी की कमाई पिछले तीन महीने से लगातार चालीस लाख रुपए हर मिनट बढ़ी है। हाल ये है कि मुकेश अंबानी आज 2,20,463 करोड़ रुपए के मालिक हो गए हैं। डॉलर में ये कमाई होती है 5580 करोड़ डॉलर। आज तो, शेयर बाजार गिरा है। लेकिन, हो सकता है कि कल सेंसेक्स-निफ्टी की एक और तेज उछाल बड़े अंबानी को ढाई लाख करोड़ रुपए का मालिक बना दे।

अमीरों की जेब में बढ़ते पैसे का आलम ये है कि देश के दस सबसे ज्यादा अमीर लोगों के पास साल भर में 6530 करोड़ डॉलर बढ़ गया है रुपए में ये रकम हो जाती है 2,57,739 करोड़। मुकेश अंबानी को अब तक ज्यादा कमाई के मामले में उनके ही छोटे भाई अनिल अंबानी चुनौती दे रहे थे। लेकिन, अब इन दोनों भाइयों के बीच में आ गए हैं, देश का सबसे बड़ा IPO लाने वाले रियल एस्टेट के दिग्गज DLF के के पी सिंह। कुशल पाल सिंह की हैसियत है 3290 करोड़ डॉलर यानी 1,29,856 करोड़ रुपए। इसके बाद अनिल अंबानी की हैसियत है 3240 करोड़ डॉलर यानी 1,27,882 करोड़ रुपए की।
इन लोगों के बाद हैं, देश की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी के मालिक सुनील भारती मित्तल। इनके पास 2090 करोड़ डॉलर यानी 82,493 करोड़ रुपए की संपत्ति है। और, विप्रो के मालिक अजीम प्रेमजी कुल कमाई है 1360 करोड़ डॉलर जो, रुपए में होगी 53,679 करोड़ रुपए। करोड़ो की कमाई करने वाले ऐसे लोगों की भारत में कमाई करोड़ो में ही बढ़ती जा रही है। इन लोगों की संपत्ति देखने के बाद मैं तो, बस इतना ही सोच पाता हूं कि सबका सपना मनी-मनी लेकिन, कितना।

Sunday, October 07, 2007

क्या अखबारों में एक ब्लॉगर का कॉलम पूरे ब्लॉग जगत की तरक्की माना जा सकता है?

प्रिंट से टीवी- टीवी से इंटरनेट- इंटरनेट से फिर प्रिंट में। ब्लॉगिंग संसार में कुछ ऐसी ही धारा बह रही है। हिंदी ब्लॉग जगत के मंजे खिलाड़ी आजकल किसी न किसी पत्रिका-अखबार में ब्लॉग पर कुछ न कुछ लिख रहे हैं। कादंबिनी में बालेंदु शर्मा का ब्लॉग जगत की हलचल पर छपा लेख आजकल ब्लॉग्स पर सबसे ज्यादा चर्चा में है। उससे लगे-लगे कुछ और चिट्ठे भी लिखे गए जिसमें, बताया गया कि कौन सी पत्रिका- ब्लॉग पर केंद्रित कॉलम शुरू कर रही है। कौन सी पत्रिका-अखबार में कौन से ब्लॉगर की दिहाड़ी पक्की होने वाली है।

ब्लॉग पर तरह-तरह के तरीके भी बताए जा रहे हैं कि कैसे अपने ब्लॉग को ज्यादा से लोगों की नजर में लाया जा सकता है। कैसे ब्लॉग पर गूगल एड सेंस के विज्ञापन या फिर दूसरे विज्ञापन लगाकर हिट के जरिए कमाई की जा सकती है। कुल मिलाकर स्वांत: सुखाय के लिए शुरू हिंदी ब्लॉग धीरे-धीरे व्यवसाय की ओर बढ़ रहा है। अच्छी बात है कि हिंदी ब्लॉगिंग करने वाले भी धीरे-धीरे कुछ कमाई करना शुरू कर रहे हैं। लेकिन, इसमें एक चीज जो अच्छी नहीं हो रही है वो, ये कि ज्यादातर ब्लॉगर जो किसी पत्रिका-अखबार में कॉलम लिखने जा रहे हैं। वो, कहीं से भी हिंदी ब्लॉगिंग की बढ़त में तो शामिल नहीं ही किए जा सकते। इसे किसी ब्लॉग लेखक के लिए ब्लॉग से अलग एक जरिया तलाशना भर मानें तो, मुझे कोई ऐतराज नहीं लगता।

कुल मिलाकर ये चलन कुछ पुनर्मूषको भव जैसा ही दिख रहा है। हिंदी ब्लॉगिंग में अभी सक्रिय लोगों का एक बड़ा हिस्सा मीडिया से ही है। ये, ऐसे लोग हैं जिन्हें लगता है कि मीडिया बाजार के द्वारा नियंत्रित हो रहा है जिससे मीडिया बहुत सी वो बातें लोगों के सामने नहीं रख पा रहा है। इसी सोच वाले ज्यादातर लोग हिंदी ब्लॉगिंग संसार में लिखते-पढ़ते नजर आ रहे हैं। मेरे जैसे, जो अखबार के जरिए टीवी और फिर टीवी में काम करते-करते हिंदी ब्लॉगिंग में घुस गए, हिंदी के ब्लॉगर्स भी ढेर सारे हैं।

अब फिर से हाल ये हो रहा है कि प्रिंट से टीवी और टीवी से इंटरनेट पर स्वांत: सुखाय के बाद फिर से लोग अखबारों में लिखने का जरिया तलाश रहे हैं। कोई ब्लॉगिंग पर लिख रहा है तो, कोई दूसरे जरिए से अपने को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना चाह रहा है। लेकिन, मुझे ये बात इसलिए अच्छी नहीं लग रही है कि ब्लॉगर्स अगर अखबारों में ब्लॉग जगत पर कॉलम लिखकर ही पूरे ब्लॉग जगत की वाहवाही लूट ले गए तो, फिर ब्लॉग के एक संपूर्ण मीडिया के तौर पर शायद कुछ रुकावटें आने लगेंगी।

हिंदी ब्लॉगिंग की बढ़त तो तभी होगी जब, ब्लॉग्स पर अलग-अलग विषयों पर लिखे लेखों को ही उनकी गुणवत्ता के लिहाज से पैसे मिलने लगें। हिंदी ब्लॉगिंग की बढ़त कुछ एक अखबारों और पत्रिकाओं में ब्लॉग जगत की हलचल में हिंदी ब्लॉग से जुड़े कुछ लोगों की चर्चा से तो नहीं होने वाली। वैसे, थोड़ा सलीके से देखें तो, ये साफ दिखता है कि ये अखबारों में छपने की इच्छा ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने की है। तो, इसमें मुझे लगता है कि ब्लॉग को ही ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश ज्यादा बेहतर होगी। आज मैं अलग-अलग ब्लॉग्स पर सिर्फ टिप्पणी करने के मकसद से गया तो, समीर भाई उड़न तश्तरी के ब्लॉग पर एक-एक लेख पर 40-50 के बीच में टिप्पणियां मिलीं। आज मैंने भी करीब 10 टिप्पणियां कीं। ये एक दिन में मेरे द्वारा की गई सबसे ज्यादा टिप्पणी है। मुझे लगता है कि यही जरिया है जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग हिंदी ब्लॉगिंग में आएंगे। टिप्पणी से प्रोत्साहन और ज्यादा पाठक संख्या।

और मुझे तो, अच्छा तब लगेगा जब, अखबारों का नियमित कॉलम लिखने वाला लेखक और टीवी की बहसों में अपना ज्ञान पेलने वाला किसी ब्लॉग पर अपना लेख लिखवाने के लिए अर्जी लगाएगा। खैर, उन सभी लोगों के लिए शुभकामनाएं जो, ब्लॉग को अखबारों के जरिए आम लोगों तक पहुंचा रहे हैं। ये अच्छी बात है। लेकिन, माफ कीजिएगा इसे ब्लॉग संसार की तरक्की में मैं शामिल नहीं कर सकता। क्योंकि, अगर ऐसा मान लिया गया तो, बरसों से हिंदी ब्लॉगिंग को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अपने संसाधन, समय और पैसे खर्च करने वाले ब्लॉगर्स की कोशिशों पर पानी फिर जाएगा।

Saturday, October 06, 2007

बाप-बेटे ने मिलकर बीजेपी की बैंड बजा दी

भारतीय राजनीति से ज्यादा अवसरवाद शायद ही कहीं और देखने को मिलेगा। अवसरवाद इतना कि लेफ्ट पार्टियां कांग्रेस को धमकाते-धमकाते यूपीए सरकार को महीने-महीने भर की मोहलत देती रहती हैं। और, अवसरवाद ऐसा भी कि कर्नाटक में सत्ता की वरमाला जब बीजेपी के येदुरप्पा के गले में डालने का मौका आया तो, पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा और अब के कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी एक हो गए। और, साफ कह दिया कि बीजेपी को सत्ता की दुल्हन नहीं मिल सकती। इन देवगौड़ा और कुमारस्वामी के 6 महीने पहले के बयानों को कोई पढ़े तो, यकीन ही नहीं होगा कि ये दोनों बाप-बेटे हैं।

खैर, अब देवगौड़ा और कुमारस्वामी का बाप-बेटे का रिश्ता फिर से पक्का हो गया है। और, जब दोनों मिल गए तो, बाहर वाले यानी बीजेपी को चिरमिटी लग गई। बीजेपी ने कुमारस्वामी को याद दिलाने की कोशिश की कि हमारे तुम्हारे बीच हुए समझौते के मुताबिक, अब मुख्यमंत्री बीजेपी का होगा। कुमारस्वामी को अचानक याद आ गया कि भारतीय जनता पार्टी तो सांप्रदायिक पार्टी है। उन्होंने कहा कि भाजपा सांप्रदायिकता से पीछा छुड़ाए तभी उसे सत्ता सौंपी जा सकती है। अब कोई कुमारस्वामी से पूछे कि आपको पहले नहीं पता था क्या कि भाजपा सांप्रदायिक है। और, अभी भी अगर कुमारस्वामी को भाजपा मुख्यमंत्री रहते हुए समर्थन देती रहती तो, शायद ही उन्हें याद आता कि भाजपा सांप्रदायिक है।

देखने में ये एक राजमीतिक समझौते का टूटना भर लगता है। लेकिन, इसके पीछे देखें तो, दो बातें एकदम साफ नजर आती है। एक तो, बीजेपी को अभी भी सत्ता चलाना और उसे संभालना नहीं आता। उसे ऐसे मामलों में अभी कांग्रेस के चिंतन शिविर में जाने की जरूरत पड़ती दिख रही है। कांग्रेस आसानी से जम्मू-कश्मीर में ऐसे ही समझौते पर संतुलन बनाए हुए है। जबकि, मायावती के साथ इसी तरह के समझौते पर भाजपा पहले भी पटरा हो चुकी है। और, भाजपा के नेता लाख ये कहें कि उनके साथ धोखा हुआ है। जनता इसका जवाब देगी। भाजपा नेता भी ये अच्छी तरह जानते हैं कि न तो उत्तर प्रदेश में उन्हें धोखा खाने का फायदा मिला था और न ही कर्नाटक में मिलेगा। क्योंकि, जनता ये अच्छी तरह से जानती है कि राजनीति में ये सिर्फ पावरगेम होता है।

और, दूसरा ये कि कर्नाटक के रास्ते दक्षिण भारत में पैठ बनाने की बीजेपी की कोशिश कुछ कमजोर पड़ गई है। खैर, अब भाजपा के अनंत कुमार और येदुरप्पा के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये होगी कि वो किस तरह से कर्नाटक में सिर्फ उत्तर भारत की पार्टी कहलाने वाली बीजेपी की वकालत दोबारा कर पाते हैं। कर्नाटक में बीजेपी का झंडा लहराने से मुश्किल सिर्फ जेडी एस की ही नहीं थी। कांग्रेस, चंद्रबाबू नायडू, करुणानिधि और जयललिता खांटी दक्षिण भारतीय नेताओं के माथे पर भी बल पड़ रहे थे। कर्नाटक के जरिए बीजेपी दक्षिण के राज्यों में अपनी पैठ बनाने की जो, कोशिश कर रही थी वो, फिलहाल तो कुछ टूटती सी दिख रही है।
रामसेतु (सेतुसमुद्रम परियोजना) पर आंदोलन की कमान भले ही विश्व हिंदू परिषद ने संभाल रखी हो। असल में इसी बहाने बीजेपी दक्षिण के दूसरे राज्यों में अपनी हैसियत ठीक करने की जुगत में लगी है। इसीलिए कई बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बड़े पदाधिकारी जयललिता के शासनकाल की तारीफ भी करते रहे। लेकिन, कर्नाटक में सत्ता हाथ न आने से शायद बीजेपी को अब दक्षिण में पैठ बनाने के लिए कुछ नया फॉर्मूला तलाशना होगा।

हम आदिवासी युग में लौट रहे हैं?

अंग्रेज जब हमें आजाद करके गए तो, पूरी दुनिया में उन्होंने भारत की छवि एक ऐसे देश की बनाई जो, बाबा-ओझा-जादू-टोना-नाग-नागिन का देश था। आजादी के बाद भारत ने तेज तरक्की की। दुनिया में भारत से निकले दिमाग का लोहा माना जाने लगा। अंग्रेजों को हम भारतीयों ने उनकी अंग्रेजी में भी मात दे दिया। दुनिया में भारत की छवि एक ऐसे देश की बनी जहां, तेज दिमाग वाले लोग हैं। दुनिया के सबसे तेजी से तरक्की करते देशों में भारत शामिल हो गया। हमारी छवि बदल ही रही थी कि टीवी की टीआरपी फिर से हमें आदिवासी युग में लौटाने की कोशिश में लग गई है।

अगर अंग्रेज या दुनिया के दूसरे हिस्से में रहने वाले भारतीय हिंदी टेलीविजन चैनल को देखकर भारत के बारे में अंदाजा लगाना चाहें तो, वो फिर से भारत को बाबा-ओझा-जादू-टोना-नाग-नागिन का देश मान लेंगे। ऐसे करतब जिसे मोहल्ले में दिखाकर लोग मुश्किल से ही अपनी रोजी जुगाड़ पाते थे। आजकल टीवी के हीरो बने हुए हैं। कुछ भी थोड़ा सा अलग कर जाइए। टीवी पर कम से कम 2-4 मिनट की फुटेज के हकदार तो हो ही जाएंगे।

टीआरपी की रेस के साथ विज्ञापनों की रेस में इंडिया टीवी पिछड़ा तो, उसे अपने को रेस में लाने का यही फॉर्मूला नजर आया। फिर क्या था बिहार के किसी पिछड़े इलाके में भाला गाल के आर पार करने की खबर हो या फिर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के पास के इलाके में छोटे बच्चों को एक ब्लेड से काटकर देवी को खून चढ़ाने की खबर हो, सब चैनल पर धड़ल्ले से एक्सक्लूसिव के नाम पर चलने लगा। इंडिया टीवी का ये फंडा काम करने लगा तो, आपकी अदालत लगाने वाले शर्माजी की हिम्मत भी बढ़ने लगी। फिर क्या था, इंडिया टीवी पर हर पांचवें-दसवें मिनट में नाग-नागिन का बदला, 5 किलो दूध पीने वाला बच्चा, शेर के बच्चे के साथ रहता बिल्ली का बच्चा, गरम सलाख से रोग दूर करने वाला बाबा जैसी खबरें अवतरित होने लगीं। कुछ ही दिनों में टीआरपी की रेस और विज्ञापन के मामले इंडिया टीवी सबसे तेज आजतक को टक्कर देने लगा।
फिर क्या था। सब जुट पड़े, ऐसे अजूबे की खोज में जो, पहले किसी ने न दिखाया हो। टीवी चैनल गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड का देसी संस्करण नजर आने लगे। अजब-गजब, पहले कभी देखा नहीं होगा, देखेंगे तो दंग रह जाएंगे जैसे कार्यक्रमों की टीवी चैनलों पर बहार आ गई है। अब तो हाल ये हो गया है कि साइकिल चलाते-चलाते नहाने-धोने-कपड़े बदलने का करतब दिखाने वाला भी मशहूर हो रहा है। इतने से बात नहीं बनी तो, मोटरसाइकिल पर ये सारे करतब करने वाले को टीवी के धुरंधर रिपोर्टर खोजकर ले आए।

तीन किलो मिर्ची खाने वाला, घंटों शंख बजाने वाला, दो जीभ वाली गाय, नाक-कान से गुब्बारा फुलाने वाला, दिन भर में पचासों लीटर पानी पीने वाला, पैर की बजाए हाथ से चलने वाला, पेट पर से मोटरसाइकिल गुजारने वाला सब टीआरपी बढ़ाने का जरिया बन गए। वैसे ये टीवी चैनल बार-बार लोगों को सावधान करते रहते हैं लेकिन, सवाल ये है कि ये सब दिखाकर टीवी चैनल साबित क्या करना चाहते हैं। अब इसमें ये दलील कि यही लोग देखना चाहते हैं तो, ये तर्क तो मुझे हीं पचता। बचपन में मुझे याद है कि मोहल्ले में घंटों बिना साइकिल से उतरे अजीबो गरीब करतब दिखाने वाले को लोग दस मिनट से ज्यादा नहीं देखते थे। कुछ बच्चे जरूर ताली बजाने के लिए मिल जाते थे। और, उसे मुश्किल से ही कुछ 10-20 चवन्नियां मिल पाती थीं। अब ये करतब इन चैनल वालों को हजारों-लाखों के विज्ञापन कैसे दिला रही है ये तो, भगवान ही जाने। लेकिन, इन चैनलों को देखकर इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि आदिवासी युग में क्या-क्या होता रहा होगा। इतनी तरक्की के बाद फिर से हमें पूर्वजों के यानी आदिवासी युग के दर्शन कराने के लिए हमें टीवी चैनलों का शुक्रगुजार होना होगा।

Friday, October 05, 2007

तारीख पर तारीख लेकिन, कब तक?

सभी टीवी चैनलों पर एक विज्ञापन आजकल खूब चल रहा है। किसी मामले में आरोपी (सजा सुनाए जाने तक अभियुक्त नहीं कह सकते) को पेश किया जाता है। और, सरकारी वकील के कुछ बोलने से पहले ही बचाव पक्ष का वकील खड़ा होकर कहता है कि गलती बैल की है। अदालत में बैल को बुलाया जाए और इसी पर जज साहब अदालत अगली सुनवाई तक के लिए मुल्तवी कर देते हैं। ये अगली सुनवाई तब तक चलती रहती है जब तक, दोनों वकील, आरोपी और खुद जज बूढ़े नहीं हो जाते हैं। वैसे आखिर में भी फैसला नहीं सुनाया जा पाता। पहली नजर में मुझे ये विज्ञापन भारतीय न्याय व्यवस्था में लंबित पड़े मामलों पर बनाया हुआ लगा। लेकिन, अंत में पता चलता है कि ये ग्रीन प्लाई का विज्ञापन है।

सच्चाई यही है कि, ग्रीन प्लाई का विज्ञापन भारतीय न्याय व्यवस्था में खिंच रहे मामलों की उदाहरण ही लगता है। मुंबई में फुटपाथ पर सोते लोगों को कुचल देने वाले एलिस्टर परेरा को छोड़ देने के मामले पर काफी हो हल्ला के बाद मामला फिर चला। लेकिन, परेरा को फिर से जमानत मिल गई है। 14 साल तक विशेष टाडा अदालत बनाकर मुंबई बम धमाकों में आरोपियों को फैसला सुनाया गया। लेकिन, फैसले की कॉपी न मिलने के बहाने संजय दत्त और दूसरे कई सजा पाए लोग जमानत पर है। आगे सुप्रीमकोर्ट में कब तक मामला चलेगा पता नहीं।

सलमान खान चिंकारा मामले में कुछ दिन की जेल काटकर जमानत पर फिर से लौट आए हैं। लोगों के लिए और ज्यादा हीरो बन चुके हैं। ऐसे हजारों हाई प्रोफाइल मामले अदालतों में तारीख पर तारीख पाते जा रहे हैं। लेकिन, ऐसा नहीं है कि ऐसा सिर्फ हाई प्रोफाइल मामलों में ही हो रहा है। आम लोगों के लिए भी अदालत से न्याय लेने के लिए औसतन 10-15 साल का इंतजार करना पड़ रहा है।

एक मोटे अनुमान के मुताबिक, इन सभी मामलों को अभी की रफ्तार में निपटने में करीब सवा तीन सौ साल लग जाएंगे। सुप्रीमकोर्ट में हाल के दिनों में फैसले आने में थोड़ी जल्दी हुई। और, लंबित मामले जो, एक लाख से ज्यादा थे अब, घटकर कुछ बीस हजार ही रह गए हैं। लेकिन, हाईकोर्ट और उससे नीचे की अदालतों में हाल और बुरा है। राज्यों की हाईकोर्ट में 32 लाख से ज्यादा मामलों पर फैसला अंटका हुआ है। तो, निचली अदालतों में 2 करोड़ से ज्यादा मामले फैसले का इंतजार कर रहे हैं।

संवेदनशील और ऐसे मामले जो, आम लोगों और मीडिया की सीधी नजर में रहते हैं। उन पर फैसले आने में भी सालों लग जाते हैं। जेसिका लाल, प्रियदर्शनी मट्टू और नीतीश कटारा हत्याकांड जैसे मामले इसके बड़े उदाहरण हैं। दिल्ली के उपहार सिनेमा हॉल में आग लगने से 59 लोग मारे गए थे। इस मामले की सुनवाई जिस रफ्तार से चल रही है, इसमें फैसला मिलने तक कम से कम बीस साल तो लग ही जाएंगे।
यहां तक कि आतंकवादियों के मामले में भी अदालतें इतने समय तक फैसला लटकाए रखती हैं कि देश को इंडियन एयरलाइंस के हाईजैक जैसा दाग झेलना पड़ा। जिसके बदले में पांच साल से जेल में बंद खूंखार आतंकवादी को छुड़ा लिया गया।

वैसे आजकल अदालतें कुछ ज्यादा ही सक्रिय हैं। मीडिया पर, जनता पर, नेताओं पर, केंद्र और राज्य सरकारों पर, पुलिस पर अपने से ही संज्ञान लेकर फैसले फटाफट सुना रही हैं। बंद से लेकर खराब सड़कों तक और आरक्षण से लेकर अतिक्रमण तक अदालत जागृत है। लेकिन, सवाल यही है कि खुद संज्ञान लेकर फैसला सुनाने में दो-चार दिन का समय लेने वाली अदालतें एक ही मामले में दस से बीस साल का समय क्यों लगा दे रही हैं।

अदालतों से फैसले निकलने में देरी का आलम ये है कि 1994 में गोपालगंज के डीएम जी कृष्णैया की गोली मारकर की गई हत्या के मामले में आरोपियों को पटना की स्थानीय अदालत से अब सजा सुनाई गई है। पूर्व सांसद आनंद मोहन को इस मामले में फांसी और उनकी पत्नी लवली आनंद को उम्र कैद की सजा सुनाई गई है। लेकिन, मामला अभी भी अदालत में ही रहेगा। क्योंकि, लवली आनंद ने इस फैसले के खिलाफ पटना हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दी है। अब अगले कितने सालों में ये मामला हाईकोर्ट से सुप्रीमकोर्ट पहुंचेगा और सुप्रीमकोर्ट से फैसला निकलने में कितना समय लगेगा, ये पता नहीं।

मारे गए डीएम जी कृष्णैया की पत्नी ने फैसला आने के बाद मीडिया में कहा कि फैसला आने में इतना समय लगा कि अब न्याय नहीं लगता। अदालतों की वजह से इस समय समाज में बहुत कुछ अच्छा चल रहा है। लेकिन, अदालतों से फैसले आने में हो रही देरी देश में कई बड़ी परेशानियों की वजह भी बन गई है। उम्मीद यही की जा सकती है कि अदालतें समाज की भलाई के लिए जल्दी और सही फैसले लेंगी जिससे किसी और कृष्णैया की पत्नी को न्याय व्यवस्था से निराशा न हो।

Thursday, October 04, 2007

पतियों औकात में आ जाओ, पत्नियां पीट रही हैं!

पति पिट रहे हैं। सरे आम पिट रहे हैं। चौराहे पर पिट रहे हैं। शादी के मंडप में पिट रहे हैं। जयमाल के स्टेज पर पहुंचते-पहुंचते पिट रहे हैं। अपने ही बच्चे के सामने पिट रहे हैं। पत्नियां पीट रही हैं। पत्नियों के साथ वो साले भी पीट रहे हैं जो, अब तक पैर छूते थे। कोई बचाने वाला भी नहीं है। पति का परमेश्वर का दर्जा तो काफी पहले ही खत्म हो गया था। हाल के दिनों में मटुकनाथ शैली के बढ़ते प्रेमी टाइम पतियों की वजह से पति निशाने पर आ गए हैं। मटुकनाथ तो, अपनी नई-नवेली कम उम्र की प्रेमिका पाकर हीरो बन गए। दशहरे की झांकियों से लेकर टीवी स्टूडियो तक मटुकनाथ अपनी प्रेमिका के साथ रासलीला को जायज ठहरा रहे हैं। और, उनके चक्कर में जो, पति गलती से भी फंसा। पत्नी तो, गई ही, प्रेमिका के साथ सामूहिक चप्पल चटकन का अच्छा ड्रामा भी मोहल्ले वालों के साथ सबको देखने को मिल रहा है।

पिटते पति टीआरपी बढ़ाने का जरिया बन रहे हैं। आज एक निजी टीवी चैनल पर लूप में (यानी एक ही दृश्य कई बार घुमा-घुमाकर दिखाना) एक पति और उसकी प्रेमिका की पिटाई टीवी की टीआरपी बढ़ाने में आधे घंटे तक मदद कर गई। पूरा फिल्मी ड्रामा था। पति अपनी प्रेमिका के साथ प्रेम तरंगों में फंसा हुआ था कि पत्नी अपने पूरे परिवार को लेकर पति का हाल देखने आ गई। दूसरी औरत के साथ प्रेम तरंगों में पति को फंसा पाया तो, उन तरंगों से बाहर निकालने के लिए पति को पहले चप्पलों से पत्नी ने पीटा।

फिर, दूसरों को भी पति को इस प्रेमिका की प्रेत बाधा से बाहर निकालने का अवसर दे दिया। अचानक पत्नी की नजर प्रेत बाधा की जड़ पति की प्रेमिका पर पड़ी। फिर क्या था। पत्नी ने प्रेमिका के बाल खींचकर उसे घर से बाहर निकाला। और, फिर जैसे कोई ओझा भूत भगाने की कोशिश में बाल खींचता है, डंडे से पीटता है (यहां चप्पलों का अच्छा इस्तेमाल हुआ), बाल पकड़कर सिर गोल-गोल घुमाता है, वो सब पत्नी ने पति की प्रेमिका के साथ किया। शायद प्रेमिका को अपने आशिक की पत्नी के इस पौरुष (अब तक ये शब्द पुरुषों के लिए ही इस्तेमाल होता था) का पता होता तो, वो कोई दूसरा आशिक खोजना ही श्रेयस्कर समझती। पति बेचारे ने सोचा चलो प्रेमिका भी तो, उसकी साथी थी। अब वो बच गया। लेकिन, अब तक तो पत्नी रणचंडी बन चुकी थी। पति को सड़क पर पत्नी के किसी घरवाले ने पकड़ा और फिर शुरू हो गई, चप्पलों से धुनाई। इस बार पापा को पिटता हुआ तीन साल का उनका बच्चा भी देख रहा था। मम्मी ने पापा की ज्यादा पिटाई की तो, बच्चा रोने लगा तो, किसी और ने उसे गोद में ले लिया।

इन सारे दृश्यों को दिखाने के बाद टीवी चैनल ने पत्नी को धोखा देकर किसी और से प्रेम करने वाले प्रेम के महारथी मटुकनाथ से सवाल-जबाव शुरू कर दिया। वैसे मटुकनाथ के चक्कर में फंसकर पत्नी से पिटने वाले ये पहले पति नहीं थे। इससे पहले लखनऊ में दूसरा निकाह करने के लिए स्टेज पर पहुंचे पति को भी पत्नी का ऐसा ही गुस्सा झेलना पड़ा था। पत्नी समझदार थी पति की पिटाई के लिए कुछ नेताओं के साथ टीवी कैमरे वालों को भी लेकर गई थी। लखनऊ जैसा ही मामला भोपाल में भी हुआ था। तो, पतियों अब संभल जाओ, सुधर जाओ। एक पत्नी के साथ दूसरी औरतों से प्यार की पींगें बढ़ाने से अब मर्दानगी नहीं बढ़ती, सिर पर चप्पलें चटकने का जरिया बन जाती हैं। पत्नियों को अब परमेश्वर के आशीर्वाद की जरूरत नहीं है। पत्नियों को अब सिर्फ पति चाहिए। ऐसा पति जो, अपनी पत्नी के अलावा किसी और को परमेश्वर बनकर आशीर्वाद देने की कोशिश न कर रहा हो। तो, पतियों विकल्प खुला हुआ है। देखिए टीवी के लिए अच्छी टीआरपी का जरिया अगला कौना सा पति और उसकी प्रेमिका बनती है।

Wednesday, October 03, 2007

आस्था पर हमले के बिना भी तो बात बन सकती है

राम का अस्तित्व था या नहीं, इसे जानने का इन दिनों भारत में महाअभियान चल रहा है। राम को भगवान मानने वाले और उनके अस्तित्व को ही नकारने वाले, दोनों ही जल्दी से जल्दी राम के होने न होने का तर्क खोज रहे हैं। और, जिससे जितना कुछ बन पड़ रहा है वो, लोगों को बता दे रहा है। इस सबके बीच में सबसे ज्यादा फंसे वो लोग हैं जो, तटस्थ हैं यानी न तो अंधभक्त हैं और न ही वो इस बात को सिरे से खारिज करते हैं कि राम थे ही नहीं।

मेरी निजी राय ये है कि भगवान राम का होना न होना एक ऐसा विषय है जो, तर्क के परे हैं। ये उस विज्ञान के आगे की आस्था जैसा ही है। विज्ञान शरीर जानता है लेकिन, ये नहीं पता लगा पाया कि शरीर का प्राण कहां से निकल जाता है। अब तर्क के परे मैं क्यों कह रहा हूं। इसकी भी खास वजह है। अब तक हम ये जान नहीं सके हैं कि आखिर हमारे जन्म से पहले और मृत्यु के बाद क्या है। मैंने देखा है कि जो, जोर-जोर से चिल्लाते हैं कि भगवान होते ही नहीं। अकेले में जब घबराते हैं तो, भदवत्भजन ही कल्याण का रास्ता दिखता है।
अब मैं अपनी ही बात करूं तो, मुझे कभी-कभी मंदिर जाना अच्छा लगता है। थोड़ी पूजा कर लेने से भी मन साफ सा होता दिखता है। लेकिन, अब मुंबई में सिद्धिविनायक मंदिर जाने पर पूजा के बाद मंदिर में दो चूहे के कान में अपनी मुराद को पूरी करने के लिए भगवान से अर्जी लगाना तो, मुझे भी अंधविश्वास लगता है। लेकिन, चूहे के कान में पूरे मन से मुराद मांगने पर बीबी से मैं तर्क मांगकर घर में कलह करूं ये तो, बिल्कुल ही ठीक नहीं है। ठीक है ये अपनी-अपनी आस्था का विषय है। लेकिन, सेतुसमद्रम प्रोजेक्ट पर कुछ ऐसा ही देश में हो रहा है।

छोटी-छोटी बातें हैं। 2000-2001 के महाकुंभ के दौरान मैं रिपोर्टिंग कर रहा था। मेरे घर से सभी लोग कम से कम अमावस्या और दूसरे सभी प्रमुख स्नान पर्व पर गंगा स्नान करके मुक्ति की तलाश कर रहे थे। लेकिन, पूरे तीन महीने वहीं रहने के बावजूद शायद ही एक-दो दिन मैंने गंगा में स्नान किया होगा। वजह ये कि गंगा का पानी इतने लोगों के एक साथ नहाने और जिन शहरों से गंगा गुजरती हैं, वहां के नालों का पानी मिलने से, गंदा हो गया है। गंगाजल को घरों में बोतल में अलग से रखा जाता है। और, महीनों उसमें किसी तरह की खराबी नहीं आती है। अब गंगा गंदी हो गई तो, स्वाभाविक है कि गंदे नाले से मिल रहे गंगा के पानी को बोतल में रखने पर कीड़े आएंगे ही। अब साफ है कि गंगा के पानी में तो कोई गड़बड़ तो है नहीं, गड़बड़ी तो, उसे गंदा करने वाले हम-आप में ही है। उसके बाद तो ये कुतर्क ही हुआ ना कि इतनी गंदी गंगा में स्नान करने से मुक्ति कैसे मिल सकती है।

कुंभ मेले में भी मैंने नजदीक से देखा है कि भगवान से भक्तों को मिलाने का दावा करने वाले ज्यादातर साधु सिर्फ अपनी दुकान चला रहे हैं। लेकिन, ये भी सच्चाई है कि इन ढोंगी-पाखंडी बाबाओं-साधुओं के साथ-साथ समाज कई ऐसे संत भी हैं जो, समाज कल्याण और भगवान के भजन में ही मस्त रहते हैं। और, इनके प्रभाव में समाज का एक बड़ा तबका अच्छे काम करने की कोशिश करता है। जहां तक राम को भगवान मानने वालों की बात है। राम को भगवान मानने वाले इस बहाने कोई गलत काम नहीं कर रहे हैं। राम को भगवान मानने वाले उनके नाम पर अच्छे काम ही करते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम का उदाहरण देकर कुछ मर्यादित रहने की कोशिश करते हैं। अब अगर राम के अस्तित्व को सिर्फ तर्कों के आधार पर नकार दिया गया तो, समाज के उस तबके को रास्ता दिखाने के लिए कौन सा आदर्श महापुरुष होगा। जो, तर्कों के आधार पर खरा उतरता है। इतिहास के आधार पर और तर्कों से सिद्ध किया जाने वाला कोई महापुरुष तो बड़ी मुश्किल से ही दिखाई देता है।

महातमा गांधी और विवेकानंद ही ऐसे महापुरुष हैं, जिनके इतिहास हैं और जिनकी लोग मंदिर बनाकर भी पूजा करते हैं। शून्य पर विवेकानंद के दिए भाषण का हवाला मैं कई बार सुन चुका हूं लेकिन, ये भाषण क्या था ये मुझे आज तक पढ़ने को नहीं मिल सका। इनके ऊपर भी सवाल उठते है। तर्क-कुतर्क भी होते हैं। लेकिन, सवाल ये है कि किसी की आस्था पर चोट की राजनीति कैसे की जा सकती है। भारत जैसे देश में जहां सभी धर्मों-समुदायों के लिए बराबर सम्मान की बात संविधान में कही गई है। वहां किसी को भी दूसरे की आस्था पर चोट करने को क्यों कानून के दायरे से बाहर रखा जा सकता है।

राम के नाम पर देश भर में आंदोलन कर रही विश्व हिंदू परिषद और भारतीय जनता पार्टी हो या राम का होना
ही नकार रहे करुणानिधि हों। सब सिर्फ अपनी राजनीति कर रहे हैं। करुणानिधि राम को झुठलाकर दक्षिण भारत में अपने उस वोटबैंक को और मजबूत करना चाहते हैं जो, पेरियार के समय से किसी भी ऐसी बात का विरोधी हो गया है जो, ब्राह्मणों या ऊंची जातियों से जुड़ी हुई है। तो, विश्व हिंदू परिषद के राम विलास वेदांती जैसे नेता राम के खिलाफ बोलने वाले करुणानिधि का सिर लाने वाले को सोने से तौलने की बात करते हैं। जिससे फिर से उन्हें कुछ ज्यादा लोग पूछने लगें। बाद में वेदांती गीता का गलत हवाला पलट गए।
एक की आस्था पर चोट करने वाले में दूसरे की आस्था हो जाती है। मुसलमानों के खिलाफ उल्टे-सीधे बयान देकर तोगड़िया जैसे नेताओं की हिंदू समाज ज्यादा सुनने लगता है तो, एम एफ हुसैन देवी-देवताओं की गलत तस्वीरें बनाकर दुनिया में मशहूर हो जाते हैं। सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट पूरा हो या नहीं। इस पर विवाद हो सकता है। लेकिन, राजनीति के बहाने आस्था पर चोट करना तो किसी भी तर्क से सही साबित नहीं किया जा सकता। आज जब मैं ये लिख रहा था, उसी समय टीवी चैनल पर सीपीएम के मुखपत्र के संपादक प्रोफेसर एम एन विजयन की प्रेस कांफ्रेंस करते-करते मौत की खबर चल रही थी। अब विजयन के किए को अच्छा मानने वाले कहेंगे कि हंसते-हंसते विजयन को मिली मौत, उनके अच्छे कर्मों का फल है। और, विजयन के विरोधी कहेंगे कि कोर्ट ने भले ही विजयन को बरी कर दिया हो लेकिन, भगवान सब देखता है। उसे सजा मिल गई। कुल मिलाकर आस्था का ही विषय है। वैसे हर बात को तर्क पर कसने वाले तर्क से बता सकते हैं क्या कि अच्छे भले विजयन की प्रेस कांफ्रेंस करते-करते मौत कैसे हो गई।

Tuesday, October 02, 2007

ज्यादा सम्मान मिलने का खामियाजा है भारतीय टीम की बुरी हार

भारत कोच्चि वनडे ऑस्ट्रेलिया से 84 रनों से हार गया। धोनी के सारे धुरंधर फ्लॉप हो गए। नए-पुराने सारे खिलाड़ी फुस्स हो गए। आज धोनी को एक कप्तानी पारी खेलने की जरूरत थी। लेकिन, खुद धोनी भी वो नहीं कर पाए। हां, धोनी के धुरंधर मैदान पर गुस्से में इतने थे जैसे किसी विश्व विजेता को किसी पिद्दी ने ललकार दिया हो। जबकि, सच्चाई यही थी कि सामने कई सालों से निर्विवाद विश्व विजेता ऑस्ट्रेलिया के सामने गलती से 20-20 का विश्व चैंपियन बना भारत था।

ऑस्ट्रेलियाई टीम जब भारत की धरती पर उतरी थी तो, ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग से किसी भारतीय पत्रकार ने अति उत्साह में पूछ लिया कि वो धोनी की यूथ ब्रिगेड को किस तरह से आंकते हैं। रिकी पोंटिंग ने ऑस्ट्रेलिया की पुरानी क्रिकेट स्ट्रैटेजी के तहत जवाब दिया कि भारत की टीम एक 20-20 का विश्व कप जीतकर आई है। जबकि, ऑस्ट्रेलिया की टीम ने जो, क्रिकेट में किया है, उसे करने के लिए भारतीय टीम को अभी बहुत लंबा सफर तय करना है। मैच से पहले विरोधी टीम पर दबाव बनाने के लिए ये ऑस्ट्रेलिया की चिर परिचित रणनीत थी।

वैसे, इस बार भारत के क्रिकेट खिलाड़ी पहले के खिलाड़ियों की तरह चुप नहीं रहे। धोनी की यूथ ब्रिगेड ने मीडिया के जरिए रिकी पोंटिंग को करारा जवाब दिया। लेकिन, मैदान पर उतरते ही सब साफ हो गया। भारतीय टीम के खिलाड़ी गुस्से में कुछ ऐसे ही हो गए थे जैसे, किसी कमजोर को गुस्सा आने पर उसके मुंह से झाग निकलने लगता है। शरीर कांपने लगता है। आंखें चढ़ जाती हैं और शरीर में रही-सही ताकत भी खत्म हो जाती है।

श्रीशांत, हरभजन और टीम के दूसरे खिलाड़ियों को देखकर तो ऐसा ही लग रहा था। श्रीशांत को तो, देखकर कई बार लगा कि वो कहीं ब्लड प्रेशर की बीमारी का शिकार तो नहीं हो गया है। पहले मैच में बारिश ने भारतीय टीम की इज्जत बचा ली थी। उसके बाद भी भारतीय टीम के खिलाड़ियों को असली विश्व विजेता ऑस्ट्रेलिया की ताकत का अहसास नहीं हो सका। दरअसल ये कुछ ऐसी ही बात हो गई कि काबिलियत से ज्यादा सम्मान मिल जाने पर कोई मानसिक तौर पर गड़बड़ हो जाए। फटाफट क्रिकेट में विश्व विजेता बनने के बाद भारत में मिले सम्मान के बाद शायद भारतीय टीम की हालत कुछ ऐसी ही है। अब भारतीय टीम को अपनी और देश की जरा सी भी इज्जत बचानी है तो, मैदान पर गुस्सा और मीडिया में भड़काऊ बयान देने के बजाए मैदान पर अपना खेल ऑस्ट्रेलिया से बेहतर करे। क्योंकि, पोंटिंग ने भड़काऊ बयान दिया, साथ ही मैदान पर भी उसे साबित कर दिया।

Monday, October 01, 2007

हम 100 मीटर की रेस में गोल्ड मेडल क्यों नहीं ला सकते ?

जब ओलंपिक खेलों में दुनिया के खिलाड़ियों को लंबी-लंबी, मजबूत टांगों पर गोल्ड मेडल की तरफ लपकते हुए देखता हूं तो, हमेशा लगता है कि हमारे खिलाड़ी इन खेलों में चैंपियन क्यों नहीं हो सकते। बार-बार दुनिया के तर्क-कुतर्क आते रहते हैं। एक बड़ा सुंदर कुतर्क है कि वहां के खिलाड़ी जलवायु के लिहाज से बेहतर स्थिति में हैं जिससे उनकी मांसपेशियां ज्यादा मजबूत होती हैं। अच्छी जलवायु की ही वजह से विदेशी खिलाड़ियों के ज्यादा क्षमता होने की बात भी बार-बार कही जाती है। लेकिन, इसकी असली वजह आज मुझे ऑफिस पहुंचने पर पता चली जब मैंने कहा कि विश्वनाथन आनंद शतरंज का विश्व चैंपियन बन गया है।

मेरी एक वरिष्ठ सहयोगी ने मुझसे पूछा- शतरंज से कितनी कमाई होती है। ये मैं आंकलन लगाने में जुटा ही था कि उन्होंने तर्क का हथौड़ा जड़ दिया। अपनी बुद्धि से दुनिया जीतने वाले शतरंज चैंपियन विश्वनाथन आनंद के पास सिर्फ एक ब्रांड का विज्ञापन है। जबकि, आंख मूंदकर चौके-छक्के लगाने वाले कल ही क्रिकेट खेलना शुरू करने वाले छोकरे भी जब चैंपियन बने तो, दो-चार ब्रांड्स को उनके नाम पर बिकने का भरोसा हो गया। दरअसल यही असली वजह है कि जो, हमारे खिलाड़ी क्रिकेट के अलावा सारे खेल हार जाते हैं।
क्रिकेट के बहाने ब्रांड तो बिकते ही हैं। हमारे देश में क्रिकेट खिलाड़ियों के बहाने वोट भी आते हैं। आलम ये होता है कि दस से ज्यादा ब्रांड्स को क्रिकेट के नाम पर बेचकर कमाई करने वाले धोनी धुरंधर की टीम आती है तो, मुंबई में एयरपोर्ट से वानखेड़े के रास्ते में तिल रखने की जगह नहीं मिलती। बड़े-बड़े नेता अपना झंडा बैनर लेकर धोनी की टीम की अगुवाई को खड़े थे। लेकिन, किसी को याद है कि एशिया कप जीतकर लौटी भारतीय हॉकी टीम देश के किस एयरपोर्ट पर उतरी थी। वो भी तब जब हॉकी राष्ट्रीय खेल है। लेकिन, क्रिकेट बिजनेस का नेशनल गेम बन गया है।

फिर जब धोनी की टीम पर इनामों की बौछार होने लगी तो, हॉकी खिलाड़ियों को लगा कि हमें तो, कुछ मिला ही नहीं। भूख हड़ताल की धमकी दी और टीवी चैनलों पर दनादन फोनर होने लगे तो, दो-दो लाख रुपए के इनाम का ऐलान हुआ। जोगिंदर की ये गेंद इतिहास बन गई है-----इसी के साथ टीवी के ज्यादातर पैकेज खुले लेकिन, इन चैनलों में भी शायद ही ये किसी को पता होगा कि एशिया कप में जीतने वाला गोल किस भारतीय खिलाड़ी ने दागा था। पूरी टीम के नाम तो, बस टीम के खिलाड़ी ही जानते होंगे। क्रिकेट दुनिया के 12-14 देश खेलते हैं। वो, भी अब बढ़े हैं पहले 6-8 देश मिलकर ही क्रिकेट के नाम पर दुनिया भर लोगों को बनाते रहते थे। उसके फटाफट अवतार यानी 20-20 का विश्व चैंपियन बनकर भारतीय टीम लौटी थी। जबकि, विश्वनाथन आनंद उस शतरंज के विश्व चैंपियन बन गए हैं जो, दुनिया के 161 देशों में खेला जाता है। अच्छा ये रहा कि ताजा-ताजा चके दे इंडिया सीरीज में अखबारों-टीवी चैनलों में विश्वनाथन आनंद को भी जगह मिल गई। अब देखिए आनंद के लौटने पर कैसा स्वागत करते हैं देश के खेल प्रेमी।

क्रिकेट के अलावा जिस खेल को थोड़ी बहुत जगह देश के लोगों के दिल में और मीडिया में मिल पाती है वो, है टेनिस। लेकिन, टेनिस को तवज्जो मिलने के पीछे बड़ी वजह सनसनी का इसमें शामिल होना है। जीहां, टेनिस सनसनी सानिया मिर्जा- इसी नाम से मीडिया और सानिया के चाहने वाले उसे पुकारते हैं। लिएंडर पेस और महेश भूपति के अलावा सानिया मिर्जा ही एक ऐसा नाम है जिसने लॉन टेनिस में विदेशी खिलाड़ियों को धूल चटाई है। ओलंपिक में कांस्य पदक से दशमलव में सेकेंड से पीछे रह गई पी टी ऊषा के बाद कोई खिलाड़ी क्यों नहीं ओलंपिक के ट्रैक पर तिरंगे की इज्जत बचाने के लिए तेज रफ्तार भागता नजर आया। सबका जवाब बस एक ही है कि इन खिलाड़ियों के भरोसे ब्रांड नहीं बिकते हैं। लेकिन, दुनिया में तो, बड़े-बड़े ब्रांड ट्रैक के बादशाहों के नाम पर खूब बिकते हैं। रीबॉक टीम इंडिया के ज्यादातर खिलाड़ियों का स्पॉन्सर है। लेकिन, पी टी ऊषा के रीबॉक क्या किसी दूसरे ब्रांड ने भी एक ढंग का जूता तक नहीं दिया था ।

हाल ये है कि चार साल में होने वाले एक 50-50 वर्ल्ड कप, अब 20-20 वर्ल्ड कप और कुछ दूसरी सीरीज के कुछ दो-चार कप साल में जीतने के लिए करोड़ो दांव पर लग जाते हैं। और, एक साथ एक ओलंपिक मैच में सैकड़ो गोल्ड, सिल्वर और ब्रांज मेडल जीतने के मौके में हमारे भारतीय खिलाड़ी स्टैंड के आसपास नजर भी नहीं आते। हे प्रभु, चमत्कार करो नाम दूसरे खेलों में भी किसी उद्योगपति को प्रसारण अधिकार कैंसल करवा दो। जिससे वो, फुटबॉल लीग, हॉकी लीग, रेस लीग और दूसरे खेलों की लीग शुरू करे। बार-बार ये कहा जा रहा है कि चक दे इंडिया स्पिरिट में भारतीय खिलाड़ी रंगे हुए हैं। लेकिन, असली चक दे स्पिरिट तो तभी होगा जब ओलंपिक खेलों में 100 मीटर के ट्रैक पर कोई खिलाड़ी तिरंगे की इज्जत रख पाए।

कर्तव्य पथ से क्या क्या दिखने लगा है

हर्ष वर्धन त्रिपाठी Harsh Vardhan Tripathi  आठ सितंबर 2022, भारत के इतिहास की एक महत्वपूर्ण तिथि के तौर पर इतिहास में दर्ज हो...