Wednesday, November 30, 2016

बच्चों के लिए बड़ों का बहुत बड़ा आंदोलन

नोबल पुरस्कार के लिए जब कैलाश सत्यार्थी का नाम घोषित किया गया, तो हम जैसे लोगों के लिए सबसे बड़ी बात यही थी कि एक भारतीय को दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार दिया जा रहा है। ये पुरस्कार इसलिए भी अहम हो गया क्योंकि, भारत की गरीबी, मुश्किलें और असमानता को दूर करने के काम में जब भी कोई काम होता हुआ दिखता है या कहें कि अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जब ऐसे किसी काम की चर्चा होती है, तो वो ज्यादातर कोई विदेशी संस्था ही कर रही होती है। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि भारत की धरती पर भारतीय व्यक्ति और संस्थाओं के किए काम को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कम ही महत्व मिल पाता है। इसीलिए जब नोबल पुरस्कार के लिए कैलाश सत्यार्थी को चुना गया, तो भारत के लिए ये बड़ी उपलब्धि रही। कैलाश सत्यार्थी ने बच्चों का जीवनस्तर सुधारने के लिए जिस तरह का काम किया और जिस तरह से बिना किसी साधन, संसाधन के लम्बे समय तक उसे जिया, वो काबिले तारीफ है। लेकिन, ये सब शायद दूर से अहसास करने जैसा ही रह जाता, अगर एक दिन कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउन्डेशन के कन्टेंट एडिटर अनिल पांडे का बुलावा न आता। बुलावा भी बहुत खास था। उन्होंने कहाकि कैलाश जी पत्रकारों, वेब पर काम करने वाले लोगों से मिलना चाहते हैं। कैलाश सत्यार्थी से निजी तौर पर मिलने की इच्छा भर से मैं वहां चला गया। लेकिन, वहां जाना मेरे लिए कैलाश सत्यार्थी के जीवन भर चलाए गए आंदोलन का अहसास करने का शानदार मौका बन गया। कमाल की बात ये कि अभी भी कैलाश जी पहले जैसे ही सहज, सरल हैं। एक सवाल जो मेरे मन में था कि अब नोबल पुरस्कार तो मिल ही गया। किसी भी सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति के लिए इससे बड़ा क्या यानी अब कैलाश सत्यार्थी आगे क्या करेंगे?

ये सवाल मेरे मन में था। लेकिन, हम ये सवाल पूछते उससे पहले खुद कैलाश जी ने कहाकि नोबल पुरस्कार पाने के बाद इतनी रकम और प्रतिष्ठा मिल जाती है कि कुछ न भी करे तो जीवन चल जाएगी और लगने लगता है कि आगे क्या? लेकिन, मुझे लगता है कि बच्चों के लिए अभी बहुत काम करना बचा है। और इसी बहुत काम करना बचा है वाली कैलाश जी की ललक ने भारत की धरती से दुनिया के लिए एक अनोखी मुहिम शुरू की है। वो बच्चे जिन्हें जीवन में किसी तरह से सामान्य बच्चों की तरह जीवन जीने का अवसर नहीं मिल पा रहा है। वो बच्चे जो अभी भी किसी मजबूरीवश शोषित हो रहे हैं। ऐसे दुनिया के हर बच्चे को दूसरे बच्चों की तरह जीवन देने के लिए कैलाश सत्यार्थी एक बड़ी मुहिम शुरू कर रहे हैं। नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी की इस मुहिम को मजबूत करने के लिए दूसरे ढेर सारे नोबल पुरस्कार विजेता और दुनिया के बड़े नेता शामिल होंगे। इसके जरिये दुनिया भर के बच्चों के हक में आवाज बुलंद की जाएगी। साथ ही बच्चों की प्रति करुणा, सहृदयता की भावना बढ़ाने की अपील भी होगी।

 राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी इस अभियान को शुरू करेंगे। 10-11 दिसंबर, 2016 को राष्ट्रपति भवन में Laureates and leaders For Children Summit का आयोजन कर कैलाश सत्यार्थी जी बच्चों के हित में दुनियाभर के नोबेल पुरस्कार विजेताओं और विश्व के प्रमुख नेताओं का एक नैतिक मंच तैयार करने जा रहे हैं। 100 Million For 100 Million Campaign की शुरुआत यहीं से होगी। जैसा नाम से ही जाहिर है ये अभियान दुनिया के उन 10 करोड़ बच्चों के लिए है, जिनको वो सब नहीं मिल सका, जिसके वो हकदार हैं और उन्हें ये हक दिलाने के लिए दुनिया के 10 करोड़ नौजवानों ने मन बनाया है। 10 देशों से शुरू करके अगले 5 सालों में ये अभियान दुनिया के 60 देशों में चलाने की योजना है। कैलाश सत्यार्थी कहते हैं कि दुनिया के हर बच्चे को शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान का अधिकार दिलाने के लिए ये अभियान चलाया जा रहा है। हम सबको कैलाश जी की इस मुहिम का हिस्सा बनना चाहिए। मैं इस मुहिम में कैलाश जी के साथ हूं।

Tuesday, November 22, 2016

महंगाई पर काबू रखने के लिए जीएसटी की 5 दरें

आखिरकार लंबी जद्दोजहद के बाद केंद्र सरकार ने जीएसटी की दरों पर सहमति बनाने में कामयाबी हासिल कर ली। जीएसटी परिषद की बैठक में चार कर दरें लागू करने पर सहमति बनी है। जीएसटी को लेकर सबसे बड़ी आशंका इसी बात की जताई जा रही थी कि जीएसटी लागू होने के बाद उसके अच्छे परिणाम तो देर से दिखेंगे लेकिन, बुरे परिणाम पहले नजर आने लगेंगे। और उन बुरे परिणामों में सबसे बड़ा महंगाई का तुरंत बढ़ना था। अब अच्छी बात ये है कि जीएसटी परिषद की हुई बैठक ने जिस तरह से जीएसटी की दरों को 4 श्रेणी में बांटा है, उससे जरूरी सामानों की महंगाई तो कतई नहीं बढ़ने वाली। सेवाओं पर कर बढ़ेगा। जिससे सेवाएं महंगी होंगी। लेकिन, इसे लेकर सरकार बहुत ज्यादा चिंतित नहीं दिखती। क्योंकि, सरकार ने जरूरी कई सामानों को तो करमुक्त तक कर दिया है। इस लिहाज से जीएसटी परिषद ने 5 दरें तय की हैं। शून्य, 5, 12, 18 और 28 प्रतिशत की कर दरें समझने से साफ होता है कि सरकार की प्राथमिकता में महंगाई पर काबू रखना कितना ऊपर है। उसके पीछे सबसे बड़ी वजह संभवत: ये भी होगी कि बड़ी मुश्किल से कर्ज पर ब्याज दरें काफी नीचे आई हैं। और इस बात पर सरकार और रिजर्व बैंक के बीच सहमति सी बनती दिखी है कि ब्याज दरें कम रहनी चाहिए, जिससे लोगों और कॉर्पोरेट को आसानी से सस्ता कर्ज मिल सके। रघुराम राजन पर रिजर्व बैंक का गवर्नर रहते सबसे बड़ा आरोप यही लगता रहा कि महंगाई दर को लेकर वो इतने ज्यादा सशंकित रहे कि ब्याज दरों को उस अनुपात में नहीं घटाया जितना उसे घटाया जाना चाहिए था। इसीलिए केंद्र सरकार जीएसटी की दरों को तय करने में इस बात पर खास ध्यान दे रही है कि किसी भी तरह से महंगाई के बढ़ने के संकेत नहीं मिलने चाहिए। और जीएसटी परिषद के दरें तय करने के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली की बातों से इसकी गंभीरता आसानी से समझी जा सकती है।
वित्त मंत्री अरुण जेटली जीरो टैक्स रेट के बारे में बताते हैं कि जीरो टैक्स रेट उन सामानों पर रखा गया है, जिनकी कीमत बढ़ने-घटने से कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स बास्केट का पचास प्रतिशत तय होता है। जेटली जोर देकर कहते हैं कि हम इनके मुक्त कर वाले सामान नहीं कह रहे हैं। हम इनको जीरो टैक्स आइटम कह रहे हैं।
दरअसल सरकार की मल्टिपल जीएसटी रेट तय करने में अगर कोई एक सबसे बड़ी बात ध्यान में रही है, तो वो है महंगाई। अनाज और दूसरे आम लोगों पर सीधे असर डालने वाले सामानों की कीमतों पर जीरो टैक्स लगेगा। इतना ही नहीं लोगों की रोज की जरूरत चीजों पर 5 प्रतिशत टैक्स लगेगा। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने ये बताया कि प्रस्ताव 6 प्रतिशत का था। लेकिन, अंत में 5 प्रतिशत पर ही सहमति बनी। दरअसल जीरो और 5 प्रतिशत टैक्स रेट जिन सामानों पर लगने वाला है, वही सामान हैं, जिनसे महंगाई दर के घटने-बढ़ने पर सबसे ज्यादा असर होता है। यही वो सामान हैं जिससे सीधे रसोई से लेकर आम लोगों के घर का खर्च बढ़ता-घटता है। इसीलिए केंद्र सरकार ने देश के सबसे बड़े टैक्स सुधार को लागू करते वक्त दरें तय करने में इस बात का ध्यान रखा है कि गलती से भी इसका दुष्परिणाम महंगाई बढ़ाने के तौर पर न दिखे। सरकार ने इसके बाद दो स्टैंडर्ड रेट तय किए हैं। 12 प्रतिशत और 18 प्रतिशत। केंद्र सरकार ने दो स्टैंडर्ड दरें तय करके कांग्रेस की 18 प्रतिशत का स्टैंडर्ड रेट रखने की मांग को खारिज कर दिया है। इसके पीछे वित्त मंत्री अरुण जेटली का तर्क बड़ा साफ है। उनका कहना है कि कई अनाज और रोजमर्रा के जरूरी सामानों के अलावा के सामानों में कई सामान ऐसे हैं, जिस पर अभी 11 प्रतिशत का टैक्स लग रहा है। सीधे 18 प्रतिशत का कर उन सामानों पर लगाने पर महंगाई के बढ़ने का खतरा होगा। इसलिए ऐसे आइटम पर 12 प्रतिशत का कर लगेगा। और जिन सामानों पर पहले से ही 18 प्रतिशत के आसपास या उससे ऊपर का टैक्स लग रहा है, उन पर 18 प्रतिशत का टैक्स लगेगा। इस तरह 18 प्रतिशत के स्टैंडर्ड रेट की जगह 12-18 प्रतिशत का स्टैंडर्ड रेट तय हुआ है।      
रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन जैसे ज्यादातर होम अप्लायंसेज की श्रेणी में आने वाले सामानों पर कर की दरों को 28 प्रतिशत रखा गया है। उद्योग जगत कंज्यूमर ड्यूरेबल्स पर 28 प्रतिशत की टैक्स दरों से खुश नहीं है। उद्योग को उम्मीद है कि ऐसे कंज्यूमर ड्यूरेबल्स जो लोगों की रोज की जरूरत का हिस्सा बन गए हैं, उन्हें 18 प्रतिशत कर की श्रेणी में रखा जाएगा। 4 श्रेणियां तय होने के बाद भी अभी सामान विशेष पर लगने वाले टैक्स को लेकर सफाई नहीं आ पाई है। वो श्रेणियों के लिहाज से सामानों की सूची आने के बाद ही पक्का हो पाएगा। लेकिन, इतना तो तय दिख रहा है कि सरकार हर हाल में ऐसे सामानों पर ज्यादा कर लगाने के पक्ष में नहीं है, जिससे महंगाई दर बढ़े। खासकर आम लोगों के रोज के इस्तेमाल में आने वाले सामानों पर महंगाई। यही वजह रही कि राज्यों को उनके राजस्व की भरपाई के लिए दी जाने वाली रकम का इंतजाम करने के लिए जीएसटी परिषद ने सेस लगाने को मंजूरी दी है। हालांकि, जानकार कह रहे हैं कि सेस लगने से जीएसटी पर टैक्स के ऊपर टैक्स लगता ही रहेगा। इस पर सरकार का साफ कहना है कि सेस जीएसटी लागू होने के बाद से 5 साल तक के लिए ही है। महंगी लग्जरी कारों और तंबाकू-पान मसाला जैसे उत्पादों पर ही सेस लगाने की बात है। इससे इन उत्पादों पर कर की दर 40 प्रतिशत 65 प्रतिशत तक होगी।
वित्त मंत्री अरुण जेटली की मानें, तो किसी भी उत्पाद पर पहले से ज्यादा कर या सेस नहीं लगने वाला है। उन्होंने कहाकि राज्यों को राजस्व नुकसान की भरपाई के लिए 50 हजार करोड़ रुपये की जरूरत पहले साल होगी, जो सेस के जरिए वसूला जाएगा। कुल मिलाकर सरकार तेजी से अप्रैल 2017 की समयसीमा तक जीएसटी लागू करने के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रही है। शायद यही वजह है कि सरकार ज्यादातर मसलों पर आम सहमति बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन, अभी भारत जैसे विशाल देश में जीएसटी लागू होने के बाद सामानों पर अलग-अलग राज्य में किस सामान पर कितना कर लगेगा, इसे बता पाना बेहद मुश्किल है। इसके पीछे सिर्फ कर की 4 श्रेणियां होना ही नहीं है। बल्कि, सबसे बड़ी बात ये भी है कि कहां, कौन सा सामान बिक रहा है। साथ ही अभी जीएसटी परिषद को सामान विशेष के लिहाज से श्रेणी तय करके सूची बनानी होगी। इसके बाद ही पूरी तरह से समझा जा सकेगा कि देश के इस सबसे बड़े सुधार से कर ढांचे में कितना सुधार होने वाला है। और इससे आम लोगों से लेकर उद्योगों तक को कितनी सहूलियत मिलने वाली है। लेकिन, प्रथम दृष्टया जीरो टैक्स और 4 टैक्स स्लैब को देखकर ये पक्की टिप्पणी है कि सरकार किसी भी हाल में महंगाई दर बढ़ाने वाली दरों को नहीं लागू करेगी, खासकर आम लोगों के रोज के सामान की महंगाई।

अभी भी आशंकित है उद्योग जगत
जीएसटी लागू करने में सरकार जिस तेजी से आगे बढ़ रही है, उस पर उद्योग जगत खुश नजर आ रहा है। हालांकि, मल्टिपल जीएसटी दरों को लेकर उद्योग जगत थोड़ा आशंकित दिखता है। लेकिन, ज्यादातर लोग जीएसटी लागू करने के सरकार के तरीके की तारीफ करते नजर आ रहे हैं। हां, ये सलाह जरूर है कि ज्यादातर कंज्यूमर गुड्स पर 18 प्रतिशत का ही कर लगना चाहिए।
उद्योग संगठन फिक्की के प्रेसिडेंट हर्षवर्धन नेवतिया ने जीएसटी की 4 दरों पर सहमति बनाने के लिए जीएसटी परिषद की तारीफ की है।
सीआईआई अध्यक्ष नौशाद फोर्ब्स का कहना है कि मॉडल जीएसटी कानून हर राज्य में सामान और सेवाओं की आपूर्ति पर अलग-अलग कर की बात कर रहा है, इससे कर संरचना के और कठिन होने की आशंका है। फोर्ब्स का सुझाव है कि सरकार को अधिकतम 2 दरें रखनी चाहिए। 


Friday, November 11, 2016

जीएसटी लागू करने में दुनिया की मुश्किलों से भारत के लिए सबक

दुनिया में 193 देश हैं, जो संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य हैं। और दुनिया के 160 देश हैं, जो कर कानून के तौर पर जीएसटी लागू कर चुके हैं। 160 में से 8 देश ऐसे भी हैं, जो भले ही संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य नहीं हैं। लेकिन, उन्होंने भी अपने देश में कर सुधारों के तौर पर जीएसटी कानून को लागू किया है। दरअसल इस जानकारी से शुरुआत करने से ये आसानी से समझ आ जाता है कि जीएसटी कर सुधार के तौर पर कितना बड़ा और जरूरी है। और साथ ही ये भी हिन्दुस्तान के राजनीतिक दलों ने सारी सहमति होने के बाद भी सिर्फ श्रेय दूसरे को न मिल जाए, इस लड़ाई में जरूरी कर सुधार लागू करने में कितना पीछे कर दिया। ये कहना सही होगा कि दुनिया भर में जीएसटी आसान कर प्रक्रिया के तौर पर लागू किया जा चुका है। फ्रांस ने सबसे पहले 1954 में जीएसटी लागू किया था। इसकी सबसे बड़ी वजह यही थी कि अलग-अलग स्तरों पर लगने वाले कर की वजह से ज्यादातर लोग करों से बचने की कोशिश करते थे। एक विकसित अर्थव्यवस्था होने की वजह से फ्रांस के लिए कर वसूली में आने वाली मुश्किलों को खत्म करने के लिए जीएसटी की जरूरत हुई। जिससे हर स्तर पर किसी सामान या सेवा को लेने वाले को उसी आधार पर कर देना होता है। इसीलिए इसे दुनिया भर में सबसे बड़े कर सुधारों के तौर पर देखा जाता है। जिन देशों में कर वसूली का दायरा बढ़ाने की कोशिश हुई और औद्योगीकरण तेजी से बढ़ा, उन सभी देशों ने एक-एक करके जीएसटी को अपनाया है। यही वजह है कि आज दुनिया के 160 देशों में जीएसटी कर सुधार के तौर पर देखा जाता है। हालांकि, कई देशों में संघीय ढांचे में असंतुलन की भी स्थिति बनी है। भारत में जीएसटी के सर्वसहमति से लागे होने के बावजूद राज्यों को अपने अधिकार और राजस्व में हिस्सेदारी को लेकर आशंका बनी हुई है।
जीएसटी कर प्रक्रिया में सुधार कैसे है?
जीएसटी यानी गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स वसूलने की प्रक्रिया पारदर्शी है। और सबसे बड़ी बात ये कि कर किसी भी सामान या सेवा पर होने वाले वैल्यू एडिशन या मूल्य संवर्धन के आधार पर ही लिया जाता है। वैल्यू एडिशन या मूल्य संवर्धन पर लगने वाले कर की ही वजह से दुनिया के कई देशों में इसे वैट यानी वैल्यू ऐडेड टैक्स के तौर पर भी जाना जाता है। यानी इसका सीधा सा मतलब हुआ कि किसी भी सामान या सेवा में हर स्तर पर जैसे ही उसमें कोई मूल्यवर्धन होता है, उस पर कर लग जाता है। इससे आसानी से कर वसलूने वाले अधिकारियों के साथ ही कारोबारियों को भी पता होता है कि कहां, कब और कितना कर लगना है या वसूला जाना है। जीएसटी को अंतिम पड़ाव पर लगने वाले रिटेल टैक्स के तौर पर भी समझा जा सकता है। ग्राहक जब कोई सामान या सेवा लेता है, तो उसी आधार पर उसे कर देना होता है।

भारत में जीएसटी कैसे काम करेगा?
दुनिया के ज्यादातर देशों में जीएसटी एक कर के तौर पर लागू है। लेकिन, कई देशों में संघीय ढांचे में असंतुलन को रोकने के लिए दोहरी जीएसटी प्रणाली लागू की गई है। इससे राज्यों के पास भी कर वसूलने का अधिकार बना रहता है। कनाडा और ब्राजील जैसे देशों ने डुअल जीएसटी ही लागू किया है। भारत जैसे बड़े देश में जटिल लोकतांत्रिक प्रक्रिया और केंद्र और राज्य सरकार के बीच राजस्व और अधिकारों की जटिलता की वजह से दोहरी जीएटी पर ही सहमति बनी है। दोहरी जीएसटी में मूल रूप से सीजीएसटी यानी सेन्ट्रल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स और एसजीएसटी यानी स्टेट गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स है। सामान या सेवा पर केंद्रीय सरकार के हिस्से के वसूले जाने वाले कर को सीजीएसटी कहा जाएगा। और जब सम्बन्धित राज्य सरकारें अपने राज्य में किसी सेवा या सामान पर कर वसूलेंगी, तो वो एसजीएसटी होगा। लेकिन, इस व्यवस्था में ही एक और कर व्यवस्था की गई है। जिसे आईजीएसटी यानी इंटर स्टेट गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स कहा गया है। ये कर केंद्र सरकार वसूलेगी जहां कर वसूली में दो राज्यों के बीच कारोबार हुआ है। केंद्र सरकार द्वारा वसूले गए आईजीएसटी को जीएसटी परिषद की तय व्यवस्था के आधार पर दोनों या जितने भी राज्यों के बीच वो कारोबार हुआ है, उनके बीच बांटा जाएगा।
दुनिया के दूसरे देशों से भारत के लिए जीएसटी के सबक
भारतीय संविधान के 122वें संशोधन के साथ ही भारत भी गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स लागू करने के लिए पूरी तरह से तैयार हो गया है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद अब जीएसटी काउंसिल इस सबसे बड़े कर सुधार की बारीकियों के नियम तैयार कर रही है। ढेर सारे कर अब भारत में इतिहास की बात हो जाएंगे। सरकार हरसंभव कोशिश कर रही है कि जीएसटी 1 अप्रैल 2017 से लागू कर दिया जाए। दुनिया के जिन देशों में पहले से जीएसटी लागू हैं, उनको भी ध्यान में रखा जा रहा है। अभी हाल में मलेशिया ने जीएसटी लागू किया है। 2009 में मलेशिया ने जीएसटी लागू करने की बात कही थी। लेकिन, इसे मलेशिया में पिछले साल यानी 2015 में लागू किया जा सका है। ताजा जीएसटी लागू करने वाले देश मलेशिया का उदाहरण भारत के लिए एक पक्का सबक हो सकता है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ये कि इतने बड़े कर सुधार को लागू करने के लिए लोगों में जानकारी और सरकारी मशीनरी के पूरी तरह से तैयार न होने से मलेशिया में कारोबारियों को बड़ी मुश्किलें हुईं और इसकी वजह से कारोबारियों और सरकारी अधिकारियों के बीच बड़े विवाद हुए। मलेशिया की सरकार को छोटे कारोबारियों के बड़े विरोध का सामना करना पड़ा था। क्योंकि, छोटे कारोबारियों को जीएसटी की बारीकियां समझने में जबर्दस्त मुश्किलें हुई थीं। खासकर कौन कर वसूलने का अधिकारी होगा। किस स्तर पर किस तरह से जीएसटी लगेगा। इसकी वजह से किसी भी सेवा या सामान पर लगने वाले कर की गणना सबसे कठिन काम हो गया था। साथ ही कारोबारियों को रिफंड में बहुत सी मुश्किलें हुईं थीं। उस पर मलेशिया में विपक्षी दलों ने भी इस मौके पर आग में घी डालने का काम किया था। अच्छी बात ये है कि ढेर सारी मुश्किलों के बाद हिन्दुस्तान में अब कम से कम सभी राजनीतिक दलों के बीच पूरी तरह से सहमति बनी है। राज्यों की विधानसभा में रिकॉर्ड समय में जीएसटी बिल पारित हुआ। लेकिन, इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि अगर केंद्र सरकार, जीएसटी परिषद जीएसटी की बारीकियों को कारोबारियों खासकर, छोटे कारोबारियों को समझा न सकी, तो यहां भी ढेर सारे विवाद की स्थिति बन सकती है। ताजा-ताजा जीएसटी लागू करने वाले देश मलेशिया का सबक भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि, लगभग मलेशिया जैसा ही मल्टिपल जीएसटी भारत भी लागू करने जा रहा है। हालांकि, मलेशिया में दुनिया का सबसे कम जीएसटी रेट 6% लगाया गया है।
मलेशिया से सबक लेते हुए सरकार को जीएसटी लागू करने में हड़बड़ी दिखाने से बचना ठीक रहेगा। क्योंकि, राजस्व सचिव हसमुख अधिया के मुताबिक, इसके लागू करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार के 60000 से ज्यादा अधिकारियों को प्रशिक्षित करने की जरूरत है। दरअसल जीएसटी पूरी तरह से कर वसूलने और देने की प्रक्रिया में एक ऐतिहासिक बदलाव है, जिसमें कर उत्पादक की बजाए ग्राहक के स्तर पर लगेगा। इसके अलावा देशभर में तकनीकी तौर पर भी कर वसूली का तंत्र पूरी तरह से दुरुस्त करने की जरूरत है। क्योंकि, इतना बड़ा कर सुधार बिना मजबूत तकनीकी जमीन तैयार किए सलीके से लागू करना संभव नहीं होगा। मलेशिया के उदाहरण से भारत को एक और जरूरी सबक ये मिलता है कि जीएसटी परिषद को अलग-अलग कारोबार के लिए बाकायदा अलग गाइडेंस पेपर तैयार करना होगा। जिससे हर अलग-अलग क्षेत्रों के कारोबारियों की मुश्किलों को उनके लिहाज से समझा जा सके और उसी आधार पर कर वसूलने की व्यवस्था तैयार की जा सके। पहले से अलग-अलग क्षेत्रों के कारोबारियों की समस्या के लिहाज से समाधान तैयार न कर पाने की वजह से जीएसटी लागू होने के 2 साल तक मलेशिया सरकार को कारोबारियों को होने वाली अलग-अलग तरह की समस्या का समाधान लगातार खोजने में जूझना पडा। भारत में ये समस्या इसलिए भी हो सकती है क्योंकि, भारत एक विशाल देश है। नए-नए कारोबार बन रहे हैं, खड़े हो रहे हैं। साथ ही केंद्र सरकार ने 1 अप्रैल 2017 से जीएसटी लागू करने का मन बनाया है। इससे काफी कम समय में केंद्र और राज्य सरकारों के कर वसूलने वाले अधिकारियों को तैयार करना होगा।
भारत के लिए सिंगापुर का सबक भी महत्वपूर्ण हो सकता है। क्योंकि, सिंगापुर का उदाहरण दिखाता है कि जीएसटी लागू करने के बाद वहां शुरुआती सालों में तेजी से महंगाई बढ़ी थी। हालांकि, सिंगापुर पूरी तरह से शहरी देश हैं। इसलिए वहां महंगाई उतना बड़ा मुद्दा नहीं बन सकी। साथ ही कुछ वर्षों में धीरे-धीरे महंगाई पर काबू भी पा लिया गया। लेकिन, भारत जैसे देश में महंगाई को लेकर सरकार को खास सतर्क रहना होगा। उसकी सबसे बड़ी वजह ये कि भारत में खेती के उत्पादों पर कर है नहीं या ना के बराबर है। इसलिए जीएसटी लागू होने से कई खेती के उत्पाद मूल्यवर्धन के बाद महंगे होंगे। और खाने-पीने की सामानों की महंगाई भारत में बेहद संवेदनशील मुद्दा है। हालांकि, अच्छी बात ये है कि भारत में अभी तक टैक्स रेट बहुत ज्यादा है। माना जा रहा है कि 18-19 प्रतिशत के जीएसटी के बाद ढेर सारे सामान और सेवा पर कर घटेगा। इससे कई सेवा, सामान सस्ते भी हो सकते हैं। कुल मिलाकर इस मोर्चे पर केंद्र सरकार को राज्यों के साथ बेहतर समन्वय करके महंगाई असंतुलन को रोकना होगा। सिंगापुर के अनुभव से भारत ये भी सबक ले सकता है कि खुदरा बाजार में कारोबारियों को बहुत ज्यादा लाभ लेने से हतोत्साहित किया जाए, जिससे ग्राहकों पर महंगाई का ज्यादा असर न पड़े। सिंगापुर ने एक और काम किया, जिससे भारत सबक ले सकता है। सिंगापुर ने जीएसटी दर 1994 में 3% से धीरे-धीरे 7% तक कर दी है। लेकिन, साथ ही साथ सरकार ने आयकर में कटौती भी की। आम करदाता और कॉर्पोरेट को सीधे आयकर में बड़ी छूट दी गई। भारत सरकार को इसके साथ कम आमदनी वाले वर्ग और पेंशन पर आश्रित लोगों के लिए भी एक बेहतर व्यवस्था बनाने की तरफ गंभीरता से सोचना होगा।
भारत जिस तरह की जीएसटी कर व्यवस्था लागू करने जा रहा है। लगभग वैसी ही जीएसटी कर व्यवस्था कनाडा में भी लागू है। कनाडा ने 1991 में ही इस सबसे बड़े कर सुधार को लागू कर दिया था। जब भारत, दुनिया के लिए अपनी अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोल ही रहा था। कनाडा में उस समय जीएसटी का काफी विरोध हुआ था। और इसकी सबसे बड़ी वजह राज्यों के राजस्व को होने वाला नुकसान था। भारत में भी इसी मसले पर ढेर सारा विरोध हुआ है। तमिलनाडु तो अंतिम समय तक इस कर सुधार के विरोध में रहा। और सिर्फ तमिलनाडु ही नहीं ज्यादातर ऐसे राज्य जहां मैन्युफैक्चरिंग होती है, उनको जहां बिक रहा है, वहां कर लगने वाली इस व्यवस्था से नुकसान उठाना पड़ रहा है। हालांकि, केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को अगले 5 सालों तक होने वाले राजस्व नुकसान की भरपाई का आश्वासन दिया है।

इसीलिए जरूरी है कि जीएसटी परिषद राज्यों के हितों का ख्याल रखे। कनाडा में तो तीन राज्य- अलबर्टा, ओन्टारियो और ब्रिटिश कोलंबिया- संवैधानिक अधिकारों के हनन के खिलाफ कनाडा की संघीय सरकार के खिलाफ अदालत में चले गए थे। लेकिन, समय के साथ कनाडा ने कई तरह की जीएसटी व्यवस्था को लागू किया। इसमें राज्यों को संघीय जीएसटी के साथ अपना भी मूल्यवर्धन कर वसूलने का अधिकार दिया गया। साथ ही राज्य के अधिकारियों को ढेर सारे अधिकार भी दिए गए। जिसमें अपना कर वसूलने के साथ संघीय जीएसटी वसूलने के लिए एक निश्चित फीस का भी प्रावधान किया गया। 

Sunday, November 06, 2016

मीडिया के लिए सवाल पूछने के अधिकार से ज्यादा साख की चिन्ता का वक्त

प्रधानमंत्री @narendramodi के फ़ीडबैक तंत्र पर मुझे बड़ा भरोसा है। इसीलिए लिख रहा हूँ। हालाँकि जरूरी नहीं है मेरी ये बात भी उन तक पहुँचे। लेकिन मुझे लगता है कि @ndtvindia पर प्रतिबंध का फ़ैसला वापस लेना चाहिए और NBSA को इस मसले पर पूछा जाना चाहिए कि स्वनियंत्रण के तहत इस पर आप लोग क्या कार्रवाई करेंगे। ये जरूरी इसलिए भी है कि किसी भी सरकार पर मीडिया की स्वतंत्रता पर लगी रोक- कई बार बेहद जायज़ वजहों से भी लगी हो तो भी- सीधे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला और तानाशाही की ओर बढ़ते क़दम की तरह देखी जाती है/जाएगी। इसीलिए प्रधानमंत्री जी एनडीटीवी पर लगाए गए प्रतिबंध की वजहों को देश के सामने रखिए और स्वनियंत्रण में बुरी तरह से फ़ेल रहे सम्पादकों की संस्था के ही ज़िम्मे इसे कर दीजिए। ये देश को पता चलना जरूरी है कि आखिर किस खबर को दिखाने की वजह से देश में सरोकारी चैनल की छवि रखने वाले एनडीटीवी को एक दिन के बंद करने का कड़वा सरकारी आदेश जारी करना पड़ा। वरना भला सरकार को क्या पड़ी थी कि ढेर सारी छद्मधर्मनिरपेक्ष जमात के सरकार के हर अच्छे काम को भी बुरा बताने के दौर में एक नई आफत मोल लेते। लेकिन, ये खतरनाक था, जो हुआ। जो एनडीटीवी ने दिखाया। अच्छा हुआ कि आतंकवादी को इस खबर से उस तरह की मदद नहीं मिल सकी, जैसी मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के दौरान टीवी चैनलों- खासकर एनडीटीवी- पर दिखाई खबर से मिली थी। मुंबई के ताज होटल में बैठे आतंकवादी और पड़ोसी देश में बैठे उनके हैंडलर भारतीय टीवी चैनलों पर खबर देखकर निर्देश जारी कर रहे थे और उसी के लिहाज से हरकत कर रहे थे। यही वजह थी कि इतना लंबा ऑपरेशन चलाना पड़ा, सेना/कमांडो को मुश्किलें आईं। वैसा ही खतरा पठानकोट के समय भी था। खतरा कितना बड़ा था। इसका अंदाजा पठानकोट हमले के समय एनडीटीवी पर चली खबरों से लगाया जा सकता है।
अपनी लाइव रिपोर्ट में एनडीटीवी बता रहा था कि आतंकवादी आयुध भंडार के बेहद नजदीक हैं और एनएसजी कमांडो के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यही है कि अगर दोनों जिन्दा आतंकवादी आयुध भंडार तक पहुंचे गए, तो उनको खत्म करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। इतना ही नहीं रिपोर्ट में कहा गया कि आतंकवादी आयुध भंडार से 100 मीटर की दूरी पर पहुंच चुके हैं, जहां से दक्षिण में मिसाइल और रॉकेट रखे हुए हैं। वायुसेना का हेलीकॉप्टर उड़ान भर चुका है और किसी भी आतंकवादियों के छिपे हुए स्थान पर गोलियां बरसा सकता है। एनडीटीवी पर एक दिन के प्रतिबंध की सिफारिश करने वाले सरकारी पैनल के मुताबिक, रिपोर्ट में ये भी बताया गया कि तीन तरफ से एनएसजी कमांडो आतंकवादियों को घेर चुके हैं और दक्षिण का एरिया जंगल का है शायद इस वजह से उस तरफ घेराबंदी नहीं की गई है।
अब इन खबरों को देखकर कोई भी ये समझ सकता है कि 26/11 का तरह ये कितना बड़ा खतरा बन सकती थीं। केबल टेलीविजन नेटवर्क नियंत्रण अधिनियम का नियम 6(1)(P) ये साफ कहता है कि किसी भी भारतीय समाचार चैनल को आतंकवादियों के साथ चल रही मुठभेड़ की लाइव कवरेज की इजाजत नहीं है। ये पूरी तरह से गैरकानूनी है। साथ ही इसमें साफ लिखा है कि सिर्फ सेना के अधिकारिक प्रवक्ता का ही बयान इस्तेमाल किया जाएगा। लेकिन, इसके बावजूद कई बार इस तरह की गलतियां भारतीय चैनलों ने की हैं। और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इतने संवेदनशील मुद्दे पर भी सरकारों ने सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ दिया है। ज्यादातर समाचार चैनलों के मुद्दे पर स्वनियंत्रण का कवच काम आता रहा है। और एनडीटीवी ने चैनल के तौर पर एनडीटीवी के पत्रकारों ने लगातार ये भी साबित करने की कोशिश की कि सिर्फ वही हैं, जो पत्रकारिता कर रहे हैं। इसीलिए बड़े सलीके से एक बेहद गम्भीर मसले पर हुई एक कार्रवाई को पूरी पत्रकारिता पर बंदिश जैसा बताने की कोशिश हो रही है। जबकि, सच्चाई ये भी है कि एनडीटीवी पर कोई हमेशा वाला प्रतिबंध नहीं लगा है। ये देश की सुरक्षा से संबंधित संवेदनशील जानकारी पहुंचाने वाली रिपोर्टिंग पर की गई दंडात्मक कार्रवाई है। लेकिन, इसे आपातकाल जैसा बताने की कोशिश हो रही है। आपातकाल में तो हर खबर सरकार के अधिकारी से मंजूर हुए बिना न छप सकती थी, न सुनाई जा सकती थी। अभी जब 9 तारीख के एक दिन के बंद के पहले एनडीटीवी प्रतिबंध के विरोध की खबरों को ही अपनी टॉप 10 की दसों खबरों में शामिल करता है, तो समझा जा सकता है कि सरकारी प्रतिबंध एक दिन की दंडात्मक कार्रवाई है या फिर आपातकाल। सिर्फ एनडीटीवी ही नहीं, उसके बहाने सब जमकर सवाल पूछ रहे हैं। उससे पहले भी पूछ रहे थे और आगे भी पूछेंगे ही। हिन्दुस्तान में किसी सरकार की औकात नहीं है कि वो सवाल पूछने से रोक सके। किसी ने रोकने की कोशिश भी की, तो वो बहुत छोटा दौर होगा। ऐसे में इस बात को स्थापित करने की कोशिश करना कि देश में सवाल पूछने का अधिकार ही किसी को नहीं रहा, दरअसल असली गलती से ध्यान भटकाने की कोशिश है।  

सवाल पूछने का अधिकार मांगने वाले रवीश कुमार की बड़ी चर्चा है। सच्चाई ये है कि पक्षपात रवीश की रिपोर्टिंग का मूल आधार रहा है। पक्षपाती सवाल और पक्षपाती जवाब। मोदी और मोदीराज से रवीश कुमार की खुन्नस पुरानी है। 2007 में मैं सीएनबीसी आवाज के लिए और रवीश कुमार एनडीटीवी के लिए गुजरात चुनाव की रिपोर्टिंग कर रहे थे। दोनों लगभग एक ही दिन राजकोट में थे। मैंने कारोबारी चैनल के लिए रिपोर्ट तैयार की और मेरी रिपोर्ट राजकोट का एक मुस्लिम सब ब्रोकर बता रहा था कि मोदी राज में मौके सबके लिए बराबर हैं। रवीश ने टीवी की रिपोर्ट में तो क्या बोला होगा, ये मुझे ध्यान में नहीं है। ब्लॉग पर लिखा गुजरात में कारोबार करना मुसलमानों के लिए आसान नहीं। इसलिए रवीश कुमार वही सवाल पूछने के महारथी हैं, जिसका उन्हें मनमाफिक जवाब मिलता है। इसलिए सवाल पूछते जाना है, वाली बात सिवाय मनमाफिक सवाल-जवाब की तय कड़ी के कुछ नहीं है। ये सवाल पूछते जाना है वाली बात इस कदर मनमाफिक सवाल वाली है कि एनडीटीवी ने अपने प्राइम टाइम में खुद ही स्क्रीन काली कर ली थी। और उसमें बार-बार यही दोहराया गया था कि हमें अंत-अंत तक सवाल पूछते जाना है। दरअसल उसमें साफ ध्वनि थी कि सवाल पूछने का प्रमाणपत्र सिर्फ हमारे पास है। ये दंभ इस कदर कि स्क्रीन काली करके रवीश कुमार ने दूसरे चैनलों के एंकरों को ये जताने की कोशिश की कि पत्रकारिता सिर्फ हमारी वाली है। और जो हमारे जैसी पत्रकारिता नहीं कर रहा वो, दरअसल पत्रकार ही नहीं। और इसीलिए ये बड़ा जरूरी हो जाता है कि सरकार एक दिन के प्रतिबंध की पूरी वजह को देश के सामने रखे। एक पत्रकार होने के नाते मैं किसी भी हाल में पत्रकार स्वतंत्रता पर रंचमात्र भी बंदिश के विरोध में खड़ा हूं। लेकिन, हमारा ये पत्रकारिता के साथ खड़ा होना किसी भी हाल में देश के विरोध में और एनडीटीवी के साथ खड़ा होना नहीं है। इसीलिए जरूरी है कि सरकार इसे साफ करे। सिर्फ साफ न करे, टीवी चैनलों पर स्वनियंत्रण के ठेकेदार सम्पादकों की संस्थाओं से जवाब मांगे कि आपके स्वनियंत्रण के पैमाने क्या हैं और उस पैमाने पर खरा न उतरने पर आपने क्या-क्या कार्रवाई की है। ये दरअसल सरकार की साख के साथ मीडिया की साख के लिए भी जरूरी है। गोवा में हुए इंडिया आइडिया कॉन्क्लेव 2016 में फिल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री ने बड़ी समझने वाली बात कही है। उन्होंने कहाकि आज के दौर में मीडिया सत्ता-सरकार हो गई है और सोशल मीडिया विद्रोही। ये बहुत बड़ी बात है। इसलिए सवाल पूछने के अधिकार पर हमले के बहकावे में आने से मीडिया को बचना चाहिए। मीडिया को सवाल पूछने के अधिकार की साख की चिन्ता करनी चाहिए। 

टाटा का “मॉडल” बदलने के चक्कर में लगे “मिस्त्री” बदल दिए गए

टाटा समूह के बारे में आम धारणा ये है कि टाटा हिन्दुस्तान की सबसे प्रतिष्ठित कंपनी है और रतन टाटा इस देश के सबसे प्रतिष्ठित कारोबारी। इसकी पक्की बुनियाद भी रही है। कंपनी के इतिहास में मुनाफे से ज्यादा साख कमाने पर जोर रहा। इसीलिए भले ही मुकेश अंबानी देश के सबसे अमीर उद्योगपति हों, लेकिन जब साख की बात आती है, तो रतन टाटा के आसपास देश का कोई भी कारोबारी नहीं नजर आता। समूह की साख और समूह का संस्कार ही टाटा समूह में ऐसे तख्तापलट की वजह बन गया, जो कंपनी की साख पर भारी पड़ता नजर आ रहा है। दुनिया के कारोबारी जगत में इस तरह का तख्तापलट कभी नहीं हुआ। हां, इस तख्तापलट की बुनियाद बड़ी उल्टी है। तख्तापलट आमतौर पर सैन्य या राजनीतिक स्थिति में नीचे के कमांडर करते हैं। लेकिन, टाटा समूह में समूह में 4 साल पहले मार्गदर्शक की भूमिका में आ गए रतन टाटा ने खुद सेनापति को ही हटा दिया। ये सेनापति ऐसा था जिस पर न सिर्फ रतन टाटा को बल्कि पूरे टाटा ट्रस्ट को भरोसा था। वो रतन टाटा और दोराबजी टाटा ट्रस्ट जो दरअसल टाटा समूह का असल मालिक है। 66% से ज्यादा हिस्सेदारी के साथ। और इस भरोसे की कई बड़ी वजहें थीं। ये सही बात थी कि टाटा समूह किसी गैर टाटा को पूरे समूह का चेयरमैन बनाने का इतना बड़ा भरोसा कैसे कर सकता था। लेकिन, टाटा और मिस्त्री परिवार के नजदीकी रिश्ते, इसकी बड़ी वजह थे ही। साथ ही रतन टाटा का साइरस मिस्त्री पर भरोसा टाटा समूह में हर कोई जानता था। इसीलिए जब रतन टाटा ने 2011 में इस बात का एलान किया कि साइरस मिस्त्री अगले साल से टाटा समूह के चेयरमैन होंगे, तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। फिर सिर्फ 4 साल में ऐसा क्या हो गया कि टाटा समूह के चेयरमैन से खुद इस्तीफा देकर साइरस को कमान सौंपने वाले रतन टाटा ड्राइविंग सीट पर आ गए। ऐसा नहीं है कि 24 अक्टूबर को अचानक टाटा संस के बोर्ड ने साइरस मिस्त्री को हटाने का फैसला कर लिया। दरअसल साइरस मिस्त्री की कार्यप्रणाली से रतन टाटा और टाटा संस की नाराजगी लगातार बढ़ रही थी। कुछ समय पहले ही टाटा संस के बोर्ड में टीवीएस चेयरमैन वेणु श्रीनिवासन और बेन कैपिटल के मैनेजिंग डायरेक्टर अमित चंद्रा के आने को इस फैसले तक पहुंचने की प्रक्रिया के तौर पर ही देखा जा रहा है। इन दोनों लोगों के बोर्ड में शामिल होने की जानकारी तक मिस्त्री को नहीं थी। इसीलिए जब साइरस मिस्त्री को हटाने का फैसला टाटा संस के बोर्ड ने लिया, तो इसकी खबर टाटा समूह के बड़े अधिकारियों को भी टीवी चैनलों के जरिये ही मिली। टाटा संस के 9 में से 6 डायरेक्टरों ने मिस्त्री को हटाने के पक्ष में वोट किया। जबकि, दो डायरेक्टर बैठक से बाहर रहे। खुद मिस्त्री इस बैठक में नहीं थे।

साइरस मिस्त्री को हटाए जाने के पीछे की वजहों की ढेर सारी कहानियां बांबे हाउस के इर्द गिर्द घूम रही हैं। लेकिन, सबसे बड़ी वजह यही कि साइरस मिस्त्री लंबे समय टाटा समूह में काम करने के बाद भी शायद टाटा समूह को आत्मसात नहीं कर सके थे। और इसीलिए टाटा समूह को साइरस टाटा समूह के बजाए दूसरे समूहों के मुकाबले चलाने की कोशिश करने लगे। टाटा समूह का कारोबारी मॉडल बदल देने की यही कोशिश साइरस मिस्त्री पर भारी पड़ गई और टाटा ट्रस्ट ने बहुमत के फैसले से मिस्त्री को ही बदल दिया। संदेश साफ है कि फिलहाल टाटा समूह अपने उसूलों को बदलने वाला नहीं। टाटा समूह के पारंपरिक संस्कार और साइरस मिस्त्री के संस्कारों को फर्क समझने के लिए दो बड़े समझौते देखने की जरूरत है। रतन टाटा ने रतन टाटा ने चेयरमैन रहते कोरस का अधिग्रहण किया था और चेयरमैन साइरस मिस्त्री ने डोकोमो के साथ हाथ मिलाया था। दरअसल यही दोनों कारोबारी समझौते टाटा समूह के संस्कार के साथ साइरस मिस्त्री के टा-टा कर दिए जाने की कहानी बयां कर देते हैं। कॉर्पोरेट गलियारे में ये कहानी आम हो चुकी है कि टाटा ने उस समय कोरस को खरीदने के लिए क्रेडिट सुइस के साथ समझौता किया था। क्रेडिट सुइस ने टाटा को एक फाइनेंशियल पैकेज का प्रस्ताव दिया था। टाटा ने उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और इसी बीच दो और अंतर्राष्ट्रीय बैंकों ने टाटा स्टील को 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर बचाने वाले फाइनेंशियल पैकेज का प्रस्ताव दे दिया। टाटा स्टील को ये प्रस्ताव बेहतर लगा और उन्होंने क्रेडिट सुइस के बजाए नए प्रस्ताव स्वीकार कर लिए। इस पर क्रेडिट सुइस ने टाटा स्टील को चिट्ठी लिखकर 120 मिलियन डॉलर देने को कहा। इसके साथ वो समझौता भी था, जिसमें साफ लिखा था कि टाटा स्टील फाइनेंस ले या न ले, उसे ये रकम देनी होगी। टाटा स्टील के अधिकारी क्रेडिट सुइस को इतनी बड़ी रकम बेवजह देने को तैयार नहीं थे। लेकिन, जब ये मामला टाटा समूह के चेयरमैन रतन टाटा के पास पहुंचा, तो उन्होंने कहाकि अगर हमने एक बार किसी को कोई वादा किया, तो उसे पूरा करेंगे। टाटा स्टील ने क्रेडिट सुइस को 120 मिलियन डॉलर दिया और दूसरे बैंक से सस्ते कर्ज का समझौता किया। ये टाटा समूह का संस्कार था। जिसे आगे बढ़ाने में नए चेयरमैन साइरस मिस्त्री नाकाम रहे। मूलत: विशुद्ध ठेकेदारी कारोबारी घराने से आए साइरस मिस्त्री हर लगाई रकम पर मुनाफा कमाने की रणनीति बनाने लगे। और इसी रणनीति की वजह से टाटा का जापानी कंपनी के साथ समझौता टूट गया। डोकोमो के साथ समझौता भर नहीं टूटा, टाटा समूह के स्थापित संस्कारों पर भी चोट पहुंची। जापानी कंपनी ने लड़ाई जीती और टाटा समूह पर जानबूझकर शर्तों को तोड़ने का आरोप लगाया। ये टाटा समूह से साइरस मिस्त्री के जाने की सबसे पक्की बुनियाद थी।

डोकोमो के साथ हुए समझौते के गलत तरीके से टूटने और इसकी वजह से टाटा समूह की छवि को ठेस पहुंचना सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है। साइरस मिस्त्री के चेयरमैन रहते समूह कानूनी झगड़ों में उलझती जा रही थी। डोकोमो से कानूनी लड़ाई हारे। साथ ही समूह की चमकदार कंपनियों में से एक टीसीएस भी अमेरिका में एक बड़े कानूनी झगड़े में फंस गई। सिर्फ 4 साल के ही साइरस के कार्यकाल में टाटा समूह ढेर सारे बड़े कानूनी झगड़ों मं फंस गया। लेकिन, साइरस मिस्त्री के जाने की और भी दूसरी वजहें इसके साथ थीं। साइरस मिस्त्री ने टाटा समूह की उन कंपनियों को भी बेचना शुरू कर दिया था, जो रतन टाटा ने खुद कंपनी की साख बढ़ाने के लिए खरीदी थीं। लंदन में स्टील कारोबार को बेचने का साइरस मिस्त्री का फैसला टाटा संस के निदेशकों के गले नहीं उतरा। 2007 में कोरस खरीदकर रतन टाटा ने टाटा समूह के साथ भारत की इज्जत दुनिया में बढ़ाई थी। कोरस और जैगुआर-लैंड रोवर की खरीद ने टाटा समूह का नाम दुनिया में ऊंचा किया था। इसलिए यूनाइटेड किंगडम में स्टील कारोबार बेचने के फैसले को टाटा संस स्वीकार नहीं कर सका। मिस्त्री ने इसके अलावा समूह का परंपरागत खाद कारोबार भी बेच दिया।
साइरस मिस्त्री पूरी तरह से टाटा समूह को अपनी शैली में चलाना चाह रहे थे। ये बात भी सही है कि मिस्त्री ने टाटा समूह की कंपनियों के सीईओ को खुली छूट दी थी कि वो नए-नए तरीके खोजें और कंपनी को आगे बढ़ाएं। लेकिन, इस खुली छूट में जोर कंपनी का मुनाफा बढ़ाने को लेकर ज्यादा था। समूह के कंपनियों के सीईओ की हैसियत उसी आधार पर तय होने लगी थी। इस बात का साफ अंदाजा टाटा संस के निदेशक वी आर मेहता की बातों से लग जाता है। मेहता ने टीवी चैनल से बातचीत में कहाकि साइरस मिस्त्री के काम करने का तरीका सही नहीं थी। और कई बार बोर्ड ने मिस्त्री को चेताया भी। लेकिन, मिस्त्री समझने को तैयार नहीं थे। मेहता ने कहाकि, टाटा समूह की कंपनियों के कारोबार पर इसका असर पड़ रहा था। टाटा संसस का पूरा मुनाफा सिर्फ टीसीएस और जेएलआर पर ही निर्भर होता जा रहा है। दरअसल टाटा संस बोर्ड, समूह की दूसरी कंपनियों के साथ समन्वय की जिम्मा जिस ग्रुप एक्जिक्यूटिव काउंसिल पर था। उस काउंसिल के सदस्यों का बोर्ड और सीईओ के साथ बेहतर सम्बन्ध नहीं बन रहा था। टाटा समूह के फैसलों में अपनी पूरी छाप छोड़ने की गरज से साइरस मिस्त्री ने ग्रुप एक्जिक्यूटिव काउंसिल का गठन किया, जिसमें पूरी तरह से मिस्त्री के ही लोग थे। जीईसी सदस्यों- मधु कन्नन, निर्मल्य कुमार और एन एस राजन- की नियुक्ति को लेकर भी टाटा संस बोर्ड असहज था। माना जाता है कि जीईसी सदस्यों ने साइरस को इस बात के लिए तैयार किया कि ये सही समय है कि जब मिस्त्री अपने तरीकों से टाटा समूह को आगे बढ़ाने का फैसला ले सकते हैं। इन लोगों की ही सलाह पर मिस्त्री ने राजनीतिक गलियारों में अपनी आमदरफ्त बढ़ा दी। मिस्त्री ने अपनी कार्यशैली के बारे में खुलकर ताजा साक्षात्कार में बताया है। समूह का चेयरमैन बनने के बाद मिस्त्री का ये पहला साक्षात्कार है, जो समूह की पत्रिका में छपा है। इसमें मिस्त्री ने साफ कहा है कि वो कंपनी के पोर्टफोलियों में कटाई-छंटाई में जरा भी नहीं हिचकेंगे। साथ ही मिस्त्री ने कहा कि हर कंपनी को बढ़ने का अधिकार खुद हासिल करना होगा। टाटा रिव्यू पत्रिका में सितंबर महीने में छपे इस साक्षात्कार के बाद ही मिस्त्री का जाना तय हो गया था। ये जल्दी में लिया गया फैसला कतई नहीं है। टाटा समूह की साख और संस्कारों के साथ खिलवाड़ की कीमत मिस्त्री को चुकानी पड़ी है। अगर सिर्फ कंपनी की बढ़ती ताकत के लिहाज से देखें, तो साइरस मिस्त्री की अगुवाई में टाटा समूह ठीकठाक आगे बढ़ रहा था। चेयरमैन बनते समय साइरस मिस्त्री को 5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की कंपनी मिली थी। जिसे साइरस ने साढ़े 8 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की कंपनी बना दिया है। इस वैश्विक मंदी के दौर में किसी कंपनी का ये प्रदर्शन अच्छा ही कहा जाएगा। लेकिन, साइरस भूल गए कि टाटा साख के लिए जाना जाता है, संपत्ति के लिए नहीं।

कौन होगा टाटा समूह का नया चेयरमैन
टाटा समूह के नए चेयरमैन का चुनाव 4 महीने के भीतर होना है। इसके लिए बाकायदा एक पैनल बनाया गया है। अंतरिम चेयरमैन रतन टाटा खुद भी इस पैनल के सदस्य हैं। रतन टाटा के अलावा इस पैनल में रोनेन सेन, वेणु श्रीनिवासन और अमित चंद्रा शामिल हैं। ये सभी टाटा संस के बोर्ड में हैं। रतन टाटा ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी भेजकर भी इस बदलाव की जानकारी दी है। और कर्मचारियों को भेजी चिट्ठी में कहा है कि उन्होंने समूह में स्थिरता बनाने के लिए अंतरिम चेयरमैन बनना स्वीकार किया है। अब टाटा समूह का नया चेयरमैन कौन होगा, इसका अनुमान हर कोई लगाने की कोशिश कर रहा है। गोयनका समूह के हर्ष गोयनका ने अपने ट्विटर खाते पर कुछ नामों में से ही नया चेयरमैन होने का अनुमान लगाया है। वो नाम हैं- एन चंद्रशेखरन, रवि वेंकटेशन, संजय कुमार झा, शांतनु नारायण और नंदन नीलेकणि। टीसीएस के सीईओ नटराजन चंद्रशेखरन मेरी नजर में सबसे प्रबल दावेदार हैं। टीसीएस टाटा समूह की सबसे महत्वपूर्ण कंपनियों में से एक हैं। रवि वेंकटेशन बैंक ऑफ बड़ौदा के नॉन एक्जिक्यूटिव चेयरमैन हैं। संजय कुमार झा ग्लोबल फाउंड्रीज के सीईओ हैं। शांतनु नारायण अभी एडोबी सिस्टम के सीईओ हैं और नंदन नीलेकणि इंफोसिस के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं। लेकिन, जिस तरह से टाटा संस के बोर्ड में टीसीएस के सीईओ नटराजन चंद्रशेखरन और जेएलआर के सीईओ राल्फ स्पेथ को शामिल किया गया है, वो पक्का संकेत देता है। और इसीलिए टीसीएस के सीईओ नटराजन चंद्रशेखरन के टाटा समूह का नया चेयरमैन होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

टाटा सन्स में किसका कितना मालिकाना हक
टाटा ट्रस्ट- 66%
शापूरजी पालूनजी मिस्त्री समूह- 18.5%
टाटा समूह की कंपनियां, टाटा समूह के बड़े अधिकारी - 15.5%

Saturday, November 05, 2016

मुलायम-अखिलेश की लड़ाई अपनी-अपनी जमीन बचाने की है

भला ऐसा भी कभी होता है कि भाई के लिए कोई अपने बेटे का ही राजनीतिक भविष्य चौपट करने पर तुल जाए। वो भी ऐसा भाई जिसकी छवि बहुत अच्छी न हो, उस पर अच्छी छवि वाले बेटे की बलि चढ़ाने की कोशिश करे। लेकिन, जब राजनीति में कुछ इस तरह का हो, तो इसके मायने ठीक से समझने की जरूरत बन जाती है। इसीलिए मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की इस लड़ाई को सलीके से समझने की जरूरत दिखती है। दरअसल मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव एक दूसरे से लड़ने से ज्यादा अपनी-अपनी हासिल की गई जमीन को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और जातियों में गजब तरीके से बंटे राज्य में  जमीन बचाने की लड़ाई इतनी कठिन है कि लग रहा है कि बेटा-बाप एक दूसरे के खिलाफ तलवार भांज रहे हैं। दरअसल इस तलवारबाजी के पीछे एक दूसरे का नुकसान करने से ज्यादा बाप-बेटे की चिंता इस बात की है कि दोनों की जमीन बची रह जाए और समाजवादी पार्टी से छिटककर दूसरी पार्टियों को जाने वाले वोट थम जाएं।

पहले बात करते हैं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बगावती तेवर के पीछे के राजनीतिक गणित की। 2012 में समाजवादी पार्टी पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने में कामयाब रही और भले ही मुलायम सिंह यादव ये कहें कि जनादेश उनके नाम पर मिला था। लेकिन, सच्चाई ये भी है कि अखिलेश यादव को नौजवानों ने वोट दिया था। इसको पुख्ता करता है समाजवादी पार्टी को मिला मत। आमतौर पर सामान्य धारणा यही रही कि उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणों ने बहनजी को छोड़ दिया और वापस बीजेपी की तरफ चले गए। लेकिन, सच्चाई ये है कि बीएसपी और समाजवादी पार्टी दोनों को ही 2012 में ब्राह्मण और राजपूतों के मत 2007 से ज्यादा मिले हैं। 2007 में पड़े हर 100 ब्राह्मण मतों में से बहुजन समाज पार्टी को 16 मत मिले थे। जबकि, 2012 में 100 में से 19 ब्राह्मण मत हाथी चुनाव चिन्ह पर पड़े थे। और यही ट्रेंड राजपूत और वैश्य मतों में भी बरकरार रहा। हर पड़े 100 मतों में 12 से बढ़कर 14 और वैश्य मत 14 से बढ़कर 15 बीएसपी के खाते में आ गए। इसी तरह समाजवादी पार्टी को हर 100 ब्राह्मण मतों में से 10 मत 2007 में मिले, जो 2012 में बढ़कर 19 मत हो गए। और राजपूतों के भी 2007 में मिले 20 मत 2012 में बढ़कर 26 हो गए। दरअसल यही वो मत हैं, जिन्हें बीजेपी में जाने से रोकने के लिए अखिलेश यादव पिता-चाचा के खिलाफ बगावती तेवर अपनाए हुए हैं। क्योंकि, ये मत मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव के नाम पर कतई नहीं मिलने वाले। और, इसीलिए अखिलेश यादव इस लड़ाई में कमजोर पड़ते दिखे, तो सवर्ण मत पूरी तरह से भागकर बीजेपी में वापस जा सकते हैं। 

ग्राफिक्स – स्रोत- सीएसडीएस
एसपी- कुल डाले गए वोटों में पार्टी की हिस्सेदारी

जाति        2007        2012

ब्राह्मण      10          19

राजपूत      20          26


मामला सिर्फ सवर्ण मतों का ही नहीं है। दूसरी सामान्य धारणा ये है कि यादव किसी भी हाल में अपने नेता यानी मुलायम सिंह यादव से दूर नहीं जाता है। इसीलिए जब 2012 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनी, तो ये माना गया कि यादवों का पूरा ही मतदान एसपी के पक्ष में हुआ। लेकिन, सच ये है कि यादवों के भरोसे तो अखिलेश यादव की पूर्ण बहुमत की सरकार कतई न बनती। क्योंकि, 2007 में 100 में से 72 यादवों ने समाजवादी पार्टी के पक्ष में मतदान किया था। जबकि, 2012 में 100 में से सिर्फ 66 यादवों ने ही साइकिल की सवारी की। कमाल ये कि 2007 में 100 में से 5 यादव मत ही बीजेपी के खाते में आए थे। लेकिन, 2012 में हर 100 में से 9 यादव मत बीजेपी के खाते में आ गए। और सिर्फ बीजेपी ही नहीं बीएसपी के खाते में भी 2012 में यादव मत बढ़े हैं। 2007 में हर 100 में से सिर्फ 7 यादव मत ही बीएसपी को मिले थे, जो 2012 में बढ़कर 11 हो गए। इसलिए ऐसा भी नहीं है कि यादव अब आंख मूंदकर साइकिल की सवारी करने को तैयार है। नया यादव मतदाता मुलायम के यादववाद से धीरे-धीरे ही सही लेकिन, नाराज होता दिख रहा है। इस नए यादव मतदाता को भी अखिलेश ही लुभाते हैं। लेकिन, ये भी सच है कि समाजवादी पार्टी की सरकार बनाने के लिए इतने से काम नहीं चलने वाला। ये छिटपुट मत हैं।
मुलायम सिंह यादव जानते हैं कि जो एकमुश्त चुनाव जिताऊ मत समाजवादी पार्टी को मिलता है, वो मत अभी भी यादव और मुसलमान का ही है। और ये एकमुश्त वाला यादव, मुसलमान विकास और साफ छवि के बजाए भाजपा विरोध और जातीय दंभ पर ही वोट करता है। इसलिए ये वोट काफी हद तक मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव को ही मिलने वाले हैं। इन्हीं मतों के बूते मुलायम सिंह यादव अच्छी छवि वाले अपने मुख्यमंत्री बेटे को कार्यकर्ताओं के सामने चुनौती दे देते हैं कि तुम्हारी हैसियत ही क्या है। दरअसल मुलायम सिंह यादव को पता है कि अखिलेश की विकास और स्वच्छ वाली ब्रांडिंग बहुत ज्यादा मत नहीं खींच सकेगी। विकास और स्वच्छ छवि के मामले में बीजेपी बाजी मार सकती है। और फिर समाजवादी पार्टी बीजेपी के सामने सीधी लड़ाई में नहीं रही, तो मुसलमान मत बीएसपी की तरफ जा सकता है। और ये होता भी दिख रहा है। समाजवादी पार्टी को 2007 में हर 100 में से 45 मुसलमान मत मिले थे, जो 2012 में घटकर 39 रह गए। 2012 में बीएसपी के खाते में मुसलमान मत 17 से बढ़कर 20 हो गए। कमाल की बात ये है कि 2007 के मुकाबले 2012 में मुसलमानों का भरोसा कांग्रेस पर भी बढ़ा। कांग्रेस को 2012 में हर 100 मतों में 4 मत 2007 से ज्यादा मिले।

एसपी- कुल डाले गए वोटों में पार्टी की हिस्सेदारी

जाति        2007        2012

यादव        72          66

मुस्लिम      45          39 

मुसलमानों का बीएसपी और दूसरी पार्टियों में जाने का खतरा मुलायम सिंह यादव समझ रहे हैं। इसीलिए वो मुसलमानों की बात करते हिन्दू विरोधी दिखने में भी गुरेज नहीं करते हैं। पिछले 3 विधानसभा चुनावों- 2002, 2007, 2012- में मुसलमान मत साइकलि से उतरकर मायावती के साथ हाथी पर सवार होते दिखे। बीएसपी को 2002 में 100 में से सिर्फ 9 मुसलमान मत मिले थे, जो 2012 में बढ़कर 20 हो गए। जबकि, 2002 में 100 में से 52 मुसलमानों का मत पाने वाली समाजवादी पार्टी के पास 2012 में सिर्फ 39 मत ही बचे।

 मुसलमान जीत की चाभी

साल         मुस्लिम मत सपा    मुस्लिम मत बसपा

2002        52                9      
2007        45                17     
2012        39                20               



इसलिए अगर समाजवादी पार्टी का झगड़ा सलीके से नहीं सुलझा, तो इसका सबसे बड़ा फायदा बीजेपी को होता दिख रहा है। क्योंकि, बीजेपी ने सवर्ण जातियों के परंपरागत बंधन से निकलकर पिछड़ी और गैर जाटव दलित जातियों में पहले से ही काफी असर बना लिया है। दूसरा सबसे बड़ा फायदा बीएसपी को हो सकता है। क्योंकि, बीजेपी के लड़ाई में सीधे आने का असर ये होगा कि मुसलमान आपस में लड़ रही समाजवादी पार्टी के बजाए मायावती के साथ जाना पसंद करेगी। और इसकी संभावना सबसे कम है लेकिन, इस तरह की भ्रम की स्थिति में थोड़ा बहुत फायदा कांग्रेस को भी मिल सकता है। दरअसल इन्हीं संभावनाओं को बनने से रोकने की कोशिश में बाप-बेटे झगड़ रहे हैं। लेकिन, ये झगड़ा इतना आगे बढ़ गया है कि समाजवादी पार्टी के आधार मतों में 2017 में सेंध सलीके से लगती दिख रही है। 

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