Tuesday, September 25, 2012

विरोध FDI का नहीं सरकार शून्यता का करिए

गजब का भ्रमित भारत है। किसी को कुछ पता नहीं। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा। एक FDI किसी को सभी रोगों का इलाज लग रहा है तो, वही FDI किसी को सभी नई बीमारियों की वजह बन रहा है। सरकार में रहते ये FDI सब अच्छा, सरकार से बाहर जाते ही यही FDI सबसे खराब। FDI के विरोध में सब वॉलमार्ट को अभी से गरिया रहे हैं। जबकि, सच्चाई ये है कि उससे भी गंभीर समस्या ये है कि यही काम बिग बाजार भी पिछले काफी समय से कर रहा है। वॉलमार्ट अगर सही-सही आ गया तो, भी कम से कम डेढ़ साल लग जाएगा। और, मेरा खुद का शोध है कि 2004 में जब मुझे मुंबई में रहने के दौरान बिग बाजार की आदत लगी थी और अब- जब बिल देखता हूं तो, साफ दिखता है कि बेवजह का ज्यादा, कभी-कभी बिना जरूरत का सामान ले लेता हूं और बचत शून्य है। तो, ये दिक्कत वॉलमार्ट के आने भर से नहीं होगी। बिग बाजार भी यही कर रहा है। मूल समस्या FDI आने की नहीं है, मूल समस्या है कि ये सरकार शून्य देश होता जा रहा है। किसी पर कोई नियंत्रण नहीं है। सब मुक्त है।

Saturday, September 22, 2012

सरकार! नंगा होने के अलावा कोई विकल्प बचा है क्या?

 
आर्थिक विकास पर प्रधानमंत्री के भाषण के समय विरोध प्रदर्शन
संतरी लूटे तो, जाए जेल-प्रधानमंत्री लूटे तो, कानून फेल
 
ये लिखा है प्रधानमंत्री के खिलाफ शर्ट उतारकर विरोध प्रदर्शन करने वाले वकील संतोष कुमार सुमन के फेसबुक प्रोफाइल पर।
 
( इस विरोध प्रदर्शन के तुरंत बाद ये लाइनें लिखी हैं। दिल से निकली हैं इसलिए इसे लिखने भर का समय लगा। दिमाग नहीं लगाना पड़ा)
 
बात जब हद से गुजर जाती है
 
जब किसी बात पर मन का गुस्सा तिलमिलाहट में बदल जाता है
 
जब हमको लगता है कि हमारी बात सत्ता सुनेगी नहीं
 
जब हजारों इराकियों के मरने पर भी इराकी कुछ कर नहीं पाते हैं
 
तो, दुनिया के सर्वशक्तिमान अमेरिका के राष्ट्रपति पर जूता चल जाता है
 
 
बात जब हद से गुजर जाती है
 
जब किसी बात पर मन का गुस्सा तिलमिलाहट में बदल जाता है
 
जब हमको लगता है कि हमारी बात सत्ता सुनेगी नहीं
 
जब हजारों सिखों की जान की कीमत किसी नेता की मौत के बदले में जायज हो जाती है
 
जब सालों के बाद भी देश की न्याय प्रक्रिया गुनहगारों को खुला छोड़े रहती है
तो, एक सिख को गृहमंत्री से डर लगना बंद हो जाता है
 
फिर जूता चल जाता है
 
 
 
बात जब हद से गुजर जाती है
 
जब किसी बात पर मन का गुस्सा तिलमिलाहट में बदल जाता है
 
जब हमको लगता है कि हमारी बात सत्ता सुनेगी नहीं
 
जब सरकारी प्रवक्ता कुछ भी बोलकर चला जाता है
 
जब उसकी बात को जायज ठहराना ही नियति बनने लगती है
 
तो, फिर जूता चल जाता है
 
 
बात जब हद से गुजर जाती है
 
जब किसी बात पर मन का गुस्सा तिलमिलाहट में बदल जाता है
 
जब हमको लगता है कि हमारी बात सत्ता सुनेगी नहीं
 
जब देश के प्रधानमंत्री बताने लगते हैं कि पेड़ों पर पैसे नहीं उगते
 
जब प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार, महंगाई को जायज ठहराने लगते हैं
जब प्रधानमंत्री देश की हर समस्या का इलाज विदेशी नुस्खे से करने को जायज ठहराने लगते हैं
जब न बोलने वाले प्रधानमंत्री ऐसा बोलते हैं कि आम आदमी जख्म पर मिर्ची जैसा लगता है
तो, जूता नहीं चलता, आम आदमी नंगा हो जाता है
देश का हाल तो, प्रधानमंत्री जानें, बता ही चुके हैं कि सोना गिरनी रखने की नौबत आ चुकी है
लेकिन, अगर ऐसे ही देश सुधारते रहे
तो, आम आदमी के तन बदन पर कपड़ा भी नहीं बचने वाला
लोकतंत्र में क्या आम आदमी अपना असल हाल भी देश के मुखिया के सामने बता नहीं सकता
फिर बताइए विरोध का और तरीका क्या होगा

पिताजी कहे - घर के बाहर से बात करके चले जाने वाले दोस्त नहीं हो सकते

हर्ष वर्धन त्रिपाठी पिताजी का घर - परिवार - गांव - समाज से अद्भुत लगाव रहा। लगाव ऐसा रहता था कि , लगकर रिश्ता निभाते थे। हमें...