Tuesday, August 25, 2015

आरक्षण पर आखिरी बहस का आंदोलन

अब तो आंदोलन के मंच वाली तस्वीर आ रही है। उससे पहले की हार्दिक पटेल की तस्वीर यही वाली है। जिसमें वो बंदूक कंधे पर रखे नजर आ रहे हैं। इससे समझा जा सकता है कि इस पटेल को आरक्षण की कितनी जरूरत है। गुजरात में भाजपा के 120 में से 40 विधायक पटेल हैं। मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल सहित सात मंत्री पटेल हैं। खेती तो कहने को पटेलों की है। टेक्सटाइल, डायमंड और फार्मा की बड़ी-छोटी कंपनियों पर पटेल ही काबिज हैं। कुल मिलाकर एक नौजवान पटेल नेता की राजनीतिक जमीन की वजह बन रहा है ये आरक्षण आंदोलन और बुढ़ाई आनंदीबेन पटेल के अलावा सौरभ और नितिन पटेल जैसे पटेल नेताओं की विफलता की कहानी भी कह रहा है ये पटेल आरक्षण आंदोलन। तथ्य ये भी है कि हार्दिक पटेल के पिता बीजेपी नेता हैं। और तथ्य ये भी है कि केशुभाई पटेल ने नरेंद्र मोदी को पलटने के लिए जाने कितने साल पटेलों का स्वाभिमान जगाने की कोशिश की। लेकिन, असफल रहे। अब केशुभाई कहां हैं ये भी पता नहीं चल रहा। लेकिन, वो खुश हो रहे होंगे। और खुश तो लोग दिल्ली से लेकर बिहार तक हो रहे होंगे। देखिए किसकी खुशी कब तक टिकती है।

वैसे सबसे बेहतर इस आरक्षण के आंदोलन का नतीजा यही हो कि इसी बहाने आरक्षण किसे और कितना और कब तक। इसकी पक्की वाली बहस हो। पक्की वाली बहस के बाद, पक्का वाला नियम भी बन जाए। यूपी-बिहार का यादव और गुजरात का पटेल आरक्षण लेगा तो सच में मुख्य धारा में आने के लिए घिसट रहा समाज कब सहारा पाएगा। देश बात करे। जेपी आंदोलन में बिहार की भूमिका की बात बार-बार होती है। गुजरात के छात्रावास में मेस फीस पर हुआ आंदोलन कम याद रहता है। मौका बढ़िया है। बिहार का चुनाव है और गुजरात में पटेलों के लिए आरक्षण का आंदोलन है। देश का भला करने के लिए ये बेहतर समय, आधार है। 

Tuesday, August 18, 2015

ये अच्छे दिन नहीं तो क्या हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पीछे सबकुछ वही पलटकर आ रहा है। जो उन्होंने खुद लोगों को बताया समझाया था। अच्छे दिनों की चाहत तक दस साल के मनमोहन राज में शायद लोगों को खत्म हो गई थी। लेकिन, जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के लिए चुनावी रैलियों में अच्छे दिन आने वाले हैं का नारा बुलंद कराया तो, लोगों को ये अहसास हुआ कि अरे अच्छे दिन भी इस देश में आ सकते हैं। अहसास हुआ तो उस अहसास से भरे लोगों ने अच्छे दिन का नारा देने वाले नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बना दिया। और सिर्फ प्रधानमंत्री नहीं बनाया। पूर्ण बहुमत वाला प्रधानमंत्री बनाया। इसीलिए अब दूसरे पंद्रह अगस्त के प्रधानमंत्री के भाषण के साथ ये समीक्षा बनती है कि देश में अच्छे दिन आए या नहीं। समीक्षा के लिए अच्छी बात ये रही है कि खुद नरेंद्र मोदी ने पिछले पंद्रह अगस्त पर किए वादों की भी रिपोर्ट खुद पेश कर दी है। पिछले पंद्रह अगस्त से इस पंद्रह अगस्त के बीच हुए सरकार के काम से ये समझने की कोशिश करते हैं कि देश में अच्छे दिन आए या नहीं। वो अच्छे दिन जिसका भरोसा दिलाकर नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन गए।

अच्छे दिन की बात चुनावी रैली में नरेंद्र मोदी करते थे। चुनावी रैलियों में नरेंद्र मोदी महत्वपूर्ण तरीके से काला धन पर अंकुश, महंगाई, भ्रष्टाचार से मुक्ति, गुड गवर्नेंस यानी अच्छी सरकार का होना- इन्हीं सब बातों को अच्छे दिन की पहचान बताते थे। जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो पहले पंद्रह अगस्त पर उन्होंने इसमें सबसे बड़े अभियान के तौर पर स्वच्छ भारत को जोड़ दिया। पहले पंद्रह अगस्त को उन्होंने पीड़ा जताई कि बच्चों को स्कूलों में शौचालय की सुविधा तक नहीं है। जहां है भी वहां लड़के, लड़कियों को एक ही शौचालय में जाना होता है। इस पीड़ा से उबरने के लिए प्रधानमंत्री ने देश के दो लाख से ज्यादा विद्यालयों में लड़कों, लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय बनाने का लक्ष्य रखा। * I salute our brave freedom fighters today

* This is the Team that makes the nation and takes our nation to new heights

* Be it casteism or communalism, there is no place for them. In no way can they be tolerated

*'Jan Bhagidari' is the biggest asset of our democracy. "Be it MyGov, letters from citizens, Mann Ki Baat, communication with people...daily Jan Bhagidari is increasing", the PM said.

* The poor want to move away from poverty and that is why, all our programmes must be for the poor- PM Modi

*Bank accounts are essential for integrating poor into the financial system, 17 crore people opened accounts under Jan Dhan Yojna.

*All our programmes and institutions should be helpful to the poor; have to empower them through financial inclusion.

* Last time from the Red Fort I spoke about toilets and cleanliness. People wondered what kind of PM is he, talking about these issues.

*If there is something that has touched every person, it is the movement towards cleanliness.

*Almost 4.25 lakh toilets were built in 2.62 lakh schools nationwide in one year; this gives self-confidence that we can do what we want.

* Who has given maximum strength to Swachh Bharat Abhiyaan? It is the children of India.

* We have been very successful in our campaign to make toilets, especially for girls in schools across India.

* We introduced Shrameva Jayate Yojana. It is an effort to chage the way we look at the workers of India.

* Dignity of labour has to be our national duty, it has to be a part of our nature.

* India can be free of corruption but we need lots of measures. We have to start from top.

* Some people like to remain in 'Nirasha'. And they are not satisfied till they have spoken about it to other people.

*20 lakh Indians have given up LPG subsidy

*Coal block auction has been undertaken by the govt, national exchequer will get Rs 3 lakh crore.

* On the issue of black money, we took a lot of steps within such a short time. We formed a SIT under the SC's guidance the day we took over.

*Some people are worried about tough law on black money. it has ensured that nobody dares to take black money out of the country.

* PM makes disclosure that Rs 6500 crores disclosed under compliance window of black money and foreign assets law.

*CBI has registered 1800 corruption cases after we formed government. * I salute our brave freedom fighters today

* This is the Team that makes the nation and takes our nation to new heights

* Be it casteism or communalism, there is no place for them. In no way can they be tolerated

*'Jan Bhagidari' is the biggest asset of our democracy. "Be it MyGov, letters from citizens, Mann Ki Baat, communication with people...daily Jan Bhagidari is increasing", the PM said.

* The poor want to move away from poverty and that is why, all our programmes must be for the poor- PM Modi

*Bank accounts are essential for integrating poor into the financial system, 17 crore people opened accounts under Jan Dhan Yojna.

*All our programmes and institutions should be helpful to the poor; have to empower them through financial inclusion.

* Last time from the Red Fort I spoke about toilets and cleanliness. People wondered what kind of PM is he, talking about these issues.

*If there is something that has touched every person, it is the movement towards cleanliness.

*Almost 4.25 lakh toilets were built in 2.62 lakh schools nationwide in one year; this gives self-confidence that we can do what we want.

* Who has given maximum strength to Swachh Bharat Abhiyaan? It is the children of India.

* We have been very successful in our campaign to make toilets, especially for girls in schools across India.

* We introduced Shrameva Jayate Yojana. It is an effort to chage the way we look at the workers of India.

* Dignity of labour has to be our national duty, it has to be a part of our nature.

* India can be free of corruption but we need lots of measures. We have to start from top.

* Some people like to remain in 'Nirasha'. And they are not satisfied till they have spoken about it to other people.

*20 lakh Indians have given up LPG subsidy

*Coal block auction has been undertaken by the govt, national exchequer will get Rs 3 lakh crore.

* On the issue of black money, we took a lot of steps within such a short time. We formed a SIT under the SC's guidance the day we took over.

*Some people are worried about tough law on black money. it has ensured that nobody dares to take black money out of the country.

* PM makes disclosure that Rs 6500 crores disclosed under compliance window of black money and foreign assets law.

*CBI has registered 1800 corruption cases after we formed government.
स्वच्छ भारत अभियान अच्छे दिन का साफ संकेत दे रहा है। पिछले पंद्रह अगस्त का लक्ष्य सरकार ने लगभग पूरा किया है। वो भी राज्य सरकारों के साथ मिलकर। प्रधानमंत्री बार-बार टीम इंडिया को ही सारा श्रेय दे रहे थे। देश के दो लाख बासठ हजार स्कूलों में चार लाख सत्रह हजार सात छियानबे शौचालय बनाए गए हैं। ये कितनी बड़ी बात है। इसका अंदाजा लगाइए। तरुण होती तेईस प्रतिशत बच्चियां सिर्फ इसीलिए स्कूल छोड़ देती हैं क्योंकि, वहां लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं है। बाकी लड़कियां भी इसी वजह से महीने में कम से कम पांच दिन स्कूल नहीं आती हैं। अच्छे दिन के पैमाने पर ये कितना बड़ा काम है कि देश जीडीपी का करीब साढ़े छे प्रतिशत इसी वजह से गंवा देता है। मतलब हर साल शौचालय की समस्या से देश को करीब साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। सबसे बड़ी बात ये है कि ये पूरा काम पंद्रह अगस्त दो हजार चौदह से पंद्रह अगस्त दो हजार पंद्रह के बीच ही पूरा किया गया है। मतलब सिर्फ एक साल में सवा चार लाख से ज्यादा शौचालय का अट्ठानबे प्रतिशत, वो भी राज्य सरकारों के साथ मिलकर। अच्छे दिन का मतलब ये भी होता है कि समयसीमा में काम करना। केंद्र और राज्य सरकार के साथ मिलकर काम करने के साथ प्रधानमंत्री ने जनभागीदारी के महत्व की भी बात की है। और उसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि बीस लाख से ज्यादा लोगों ने सब्सिडी छोड़ दी है। ये छोटी बात नहीं है। पचास रुपये गैस सिलिंडर की कीमत बढ़ने पर निराश में डूब जाने वाला बीस लाख भारतीय अगर स्वेच्छा से हर महीने करीब दो सौ रुपये सिलिंडर पर ज्यादा देने को तैयार हो रहा है तो, इसका सीधा सा मतलब है कि उसे अच्छे दिन के संकेत मिल रहे हैं। कम से कम निजी तौर पर उसके जीवन में इतने अच्छे दिन तो हैं ही।

पिछले पंद्रह से अगस्त से इस पंद्रह अगस्त के बीच अब बात कर लेते हैं एक और जरूरी पैमाने भ्रष्टाचार से मुक्ति के मामले में अच्छे दिन के आने का। मध्य प्रदेश के व्यापम, सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे के ललित मोदी से संबंधों के बाद मोदी सरकार पर इस पैमाने पर जबर्दस्त सवाल उठने लगे थे। हालांकि, पूरी तरह साफ हो गई संसद के सत्र के खत्म होने से एक दिन पहले सुषमा स्वराज ने और फिर सुषमा के बहाने अरुण जेटली ने कांग्रेस को पूरी तरह धोकर इस मुद्दे पर बढ़ ले ली। लेकिन, फिर भी ललित मोदी पर सवाल तो खड़ा ही है। और ललित मोदी से रिश्ते रखने वालों पर भी। इसलिए असल जवाब भ्रष्टाचार से मुक्ति का इसी से मिलेगा कि सरकार ने भ्रष्टाचार के मामलों में क्या कार्रवाई की है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तो बड़े-बड़े विज्ञापन देकर बताते रहते हैं कि उनकी सरकार ने कितने अफसरों, कर्मचारियों को भ्रष्टाचार की वजह से जेल भेजा। लेकिन, पंद्रह अगस्त पर पता चला कि अठारह सौ से ज्यादा अफसरों के खिलाफ सीबीआई ने भ्रष्टाचार के मामले दर्ज किए। भ्रष्टाचार से मुक्ति का दूसरा उदाहरण कोयला खदानों की नीलामी का है जिसमें सरकार को तीन लाख करोड़ रुपये से ज्यादा मिले हैं। इस पैमाने पर भी संपूर्ण न सही तो आंशिक अच्छे दिन की बात तो मानी ही जा सकती है। अभी समय भी साल ही हुआ है। भ्रष्टाचार से मुक्ति की बात करते ही काला धन भी सामने आने लगता है। और ये सवाल भी खड़ा हो जाता है कि क्या काला धन पर सरकार सचमुच कुछ कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मानें तो काला धन पर कड़े कानून को लचीला बनाने वाले लोग उन तक संदेश पहुंचा रहे हैं कि इस कानून का साइड इफ्केट हो सकता है। लोग डर रहे हैं। सच है कि अगर लोग इस कानून से डर रहे हैं तो, वो कारगर है। इस पर चर्चा बहुतायत होती रही है कि आखिर इस सरकार ने सुप्रीमकोर्ट के निर्देश पर एसआईटी बनाने के अलावा काला धन पर क्या किया है। ऐसा कुछ जिसका उल्लेख हो सके। वो प्रधानमंत्री ने पंद्रह अगस्त के भाषण में बता दिया। नरेंद्र मोदी ने बताया कि पैंसठ करोड़ रुपये का काला धन सरकारी खजाने में आ चुका है।

अच्छे दिन के ये ढेर सारे पैमाने हैं जिस पर सवाल खड़े होते हैं। लेकिन, लोगों के लिए अच्छे दिन आने का सबसे बड़ा सवाल होता है महंगाई घटी क्या। अगर इसका जवाब हां में है तो अच्छे दिन आए ये माना जा सकता है। बारिश के हर मौसम की तरह इस साल भी प्याज की तेजी के अलावा दाल की कीमतें इस कदर लोगों को परेशान कर रही हैं कि उनको जरा सा भी अंदाजा नहहीं हो पा रहा है कि महंगाई कितनी घट गई है। आंकडों में बात करें तो थोक सामान की महंगाई दर उन्नीस सौ छिहत्तर के बाद सबसे कम है। नरेंद्र मोदी की सरकार को सत्ता में आए कुल जमा पंद्रह महीने ही हुए हैं। और पिछले नौ महीने से महंगाई दर निगेटिव में है। वो भी तब जब दाल की महंगाई इसी दौरान करीब छत्तीस प्रतिशत बढ़ी है। अब अगर ये अच्छे दिन नहीं हैं तो क्या हैं। इसीलिए अच्छे दिन तो आए हैं, आ रहे हैं। थोड़ा समय दीजिए अच्छे दिन और अच्छे से दिखने लगेंगे। 

Monday, August 17, 2015

सिर्फ विज्ञापनों में उत्तम है उत्तर प्रदेश

सरकारें भूल जातीं हैं कि विज्ञापन अगर सिर्फ विज्ञापन है और धरातल पर वैसा नहीं है। जैसा सरकार विज्ञापन में जनता को बताने की कोशिश कर रही है तो, फिर सरकारें नहीं रहती हैं। सरकारों के लिए अच्छी बात ये हो सकती है कि जनता की याददाश्त बहुत लंबी नहीं होती है। लेकिन, सरकारों को को कम से कम पुरानी गलतियों से सबक तो लेना ही चाहिए। तब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री हुआ करते थे। और महानायक अमिताभ बच्चन अगर किसी एक राज्य के लिए समर्पित थे। तो, वो राज्य था उत्तर प्रदेश। अमिताभ बच्चन तब के विज्ञापन में पर्दे पर आते थे। और मुस्कुराते हुए कहते थे। यूपी में दम है, क्योंकि, जुर्म यहां कम है। अब अमिताभ बच्चन बोल रहे थे तो, जनता ने और गंभीरता पूर्वक देखना शुरू कर दिया कि आखिर जुर्म कितना कम है। जब जनता पता लगाने लगी तो, उसके साथ घटी घटनाओं ने बता दिया कि जुर्म तो कम नहीं यहां सबसे ज्यादा है। अब सरकार बदल चुकी है। हालांकि, सरकार फिर से समाजवादी पार्टी की ही है। लेकिन, अब पिता की जगह पुत्र अखिलेश यादव ने ले ली है। नौजवान मुख्यमंत्री से लोगों को बड़ी अपेक्षाएं थीं। लगा कि ये नौजवान मुख्यमंत्री पहले की समाजवादी पार्टी के हर बार के बुरे अनुभव को इस बार बदल देगा। लेकिन, इस नौजवान मुख्यमंत्री ने भी वहा रास्ता अपनाया जो, उनके पिता ने अपनाया था। समाजवादी सरकार उत्तर प्रदेश में चल रही है। लेकिन, विज्ञापन का तरीका अखिलेश ने बदल दिया है। मुलायम ने बुजुर्ग अमिताभ की साख का विज्ञापन में इस्तेमाल करना चाहा था। अब नौजवान अखिलेश नौजवानों की भावना अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाह रहे हैं। रेडियो पर बजते सुमधुर गानों के बीच अचानक एक लड़की की आवाज आती है। हम कहीं वॉशिंगटन में तो नहीं आ गए हैं। फिर दूसरी आवाज बताती है कि नहीं हम उत्तर प्रदेश में हैं। फिर वो सवाल करती है कि फिर ये आधुनिक इनोवा कारें हमारी पुलिस के पास। जवाब आता है। हमारी सरकार ने पुलिस को अतिआधुनिक बना दिया है। इंटरनेट पर ही एफआईआर लिखी जा रही है। और ऐसे ढेर सारे दावे जिससे लगने लगता है कि उत्तर प्रदेश तो लगभग अपराध शून्य हो गया है। फिर विज्ञापन में ये भी आता है कि नौजवान मुख्यमंत्री के काम करने की तरीका सबसे अलग है।

ये तो यूपी में दम है क्योंकि, जुर्म यहां कम है कि तर्ज पर विज्ञापन की बात थी। अब जरा सच्चाई की तरफ बढ़ें। उत्तर प्रदेश में ऑनलाइन एफआईआर तो छोड़िए। थाने में जाकर अपने साथ हुई घटना की शिकायत दर्ज कराना कितना मुश्किल काम है। ये उत्तर प्रदेश के लोगों से समझा जा सकता है। पत्रकारों की हत्या से लेकर दर्जनों ऐसे उदाहरण हैं जो, उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था का हाल बताते हैं। लेकिन, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े ज्यादा भयावह तस्वीर पेश करते हैं। यहां ये समझना बेहद जरूरी है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो भले ही गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है। लेकिन, ये रिपोर्ट राज्यों के दिए उनके आंकड़े के आधार पर ही तैयार होती है। ये आंकड़े बता रहे हैं कि देश में अपराध के मामले में सबसे खराब है उत्तर प्रदेश। 2012 में अखिलेश सिंह यादव की सरकार आने के बाद अपराध तेजी से बढ़े हैं। एनसीआरबी के ताजा आंकड़े 2013 तक के हैं। इससे ये साफ है कि उत्तर प्रदेश में हर तरह के अपराध बढ़े हैं। सामान्य अपराध के मामले में उत्तर प्रदेश देश में दूसरा सबसे ज्यादा अपराध वाला राज्य है, देश भर के अपराधों के साढ़े आठ प्रतिशत से ज्यादा अपराध सिर्फ उत्तर प्रदेश में हुए हैं। देश के किसी एक शहर में सबसे ज्याद अपराध बढ़े हैं तो वो है हमारे उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ। हिंसक अपराधों के मामले में देश में सबसे बुरे हाल में उत्तर प्रदेश ही है। उत्तर प्रदेश में 2013 में 38779 मामले दर्ज हुए हैं। देश में सबसे ज्यादा हत्याएं भी उत्तर प्रदेश में ही हुई हैं। देश भर में कुल 33201 हत्याएं हुईं जिसमें से 5259 हत्याएं सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही हुई हैं। उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था का हाल कितना बुरा है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अपहरण, बंधक बनाने के मामले में सबसे बुरा हाल उत्तर प्रदेश का ही है। 2012 में अखिलेश यादव की सरकार आने के साल भर में ही प्रदेश में कानून का राज पूरी तरह से ध्वस्त हो गया। उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार आने के एक साल बाद अपहरण, बंधक बनाने के मामले में करीब बीस प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। अपहरण, बंधक बनाने के 9737 मामले दर्ज हुए हैं। महिलाओं की सुरक्षा के मामले में उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार पूरी तरह से नाकाम है। महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में उत्तर प्रदेश देश में दूसरे नंबर पर है। महिलाओं के खिलाफ अपराध के 32546 मामले दर्ज किए गए हैं। उत्तर प्रदेश में सिर्फ 2013 में 2335 दहेज हत्या के मामले सामने आए हैं।

महिलाओं की सुरक्षा का हाल बुरा है। तो बच्चे भी समाजवादी पार्टी के जंगलराज में डरकर जी रहे हैं। देश में सबसे ज्यादा बुरे हाल में बच्चे उत्तर प्रदेश में ही हैं। बच्चों के खिलाफ सबसे अपराध उत्तर प्रदेश में ही हो रहे हैं। अखिलेश यादव के राज में जाति संघर्ष किस तरह से समाज में जहर घोल रहा है ये सब जानते हैं। लेकिन, अखिलेश सरकार के सत्ता में आते ही अनुसूचित जाति के खिलाफ अत्याचार के मामले किस तेजी से बढ़े इसका अंदाजा शायद ही आप लोगों को हो। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, देश भर में 2013 में अनुसूचित जाति के खिलाफ सबसे ज्यादा अत्याचार उत्तर प्रदेश में ही हुआ है। देश भर में कुल 39408 मामले हुए। इसमें से 7078 मामले सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही हुए। इस सरकार में गंभीर अपराधों के मामले में हमारे प्रदेश का नाम खराब हुआ है। हत्या, अपहरण, दहेज हत्या, महिलाओं के खिलाफ अत्याचार, बलात्कार जैसे मामलों में तो पुलिस जैसे अनदेखा ही कर देती है। गाड़ियों की चोरी के मामले में भी उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। 2013 में 23916 गाड़ियां चोरी हुई हैं। यानी हर दिन करीब सत्तर गाड़ियां यूपी में चोरी हो जाती हैं। इसको ऐसे समझें कि शायद ही कोई दिन ऐसा होता है जब उत्तर प्रदेश के किसी जिले में एक भी गाड़ी चोरी ना होती हो। ऑटो चोरी के भी सबसे ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश में ही हुए हैं। अखिलेश सरकार आने के बाद चोरों-डकैतों के हौसले खूब बढ़ गए। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, 2013 में यानी अखिलेश सरकार के आने के तुरंत बाद अपराध तेजी से बढ़े। उत्तर प्रदेश का मुजफ्फरनगर जिला सबसे ज्यादा डकैती वाला जिला रहा। जिले में 317 डकैती के मामले सामने आए। मतलब लगभग हर रोज जिले में कहीं न कहीं डकैती हो जाती है।

विज्ञापन के लिए अखिलेश सरकार नए-नए तरीके इस्तेमाल कर रही है। लेकिन, हकीकत बदलने के लिए शायद ही कुछ हो रहा है। एक निजी एफएम चैनल के साथ यूपी सरकार ने हाथ मिलाया है। इस समझौते में उस रेडियो स्टेशन पर अलग-अलग कहानियों के जरिये यूपी की छवि सुधारने की कोशिश हो रही है। यूपी की कहानियां सुनते आपको कतई नहीं लगेगा कि ये पूरी तरह से प्रायोजित है। लेकिन, अगर आप लगातार कहानियां सुनते रहे तो, कहीं न कहीं आपको यूपी की हकीकत और इन मायावी कहानियों के बीच का फासला साफ दिख जाएगा। अखिलेश यादव से उम्मीद थी कि वो कुछ धरातल बदलेंगे लेकिन, आसमानी तस्वीर बदलकर ही यूपी पर राज करने की जुगत में लगे हैं। यूपी में जुर्म कम है से लेकर इंडिया शाइनिंग तक के विज्ञापनों का इतिहास गवाह है कि ऐसा हो नहीं पाता है।



Wednesday, August 12, 2015

ये नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं है

ये पूरा सत्र साफ होता दिख रहा है। देश में भले ही कुछ ही इलाकों में बारिश से बाढ़ के हालात बने हों। लेकिन, अगर संसद की बात करें तो, पूरा का पूरा सत्र बाढ़ में बहता दिख रहा है। बड़े सुधारों को कानून का रूप देने की बात तो सोची भी नहीं जा सकती है। हालात ये हैं कि बमुश्किल बातचीत हो जाए यही बहुत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। 282 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत से आई सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। पार्टी के भीतर भी वो सर्वोच्च नेता हैं। संगठन में नरेंद्र मोदी के सिपहसालार अमित शाह कमान संभाले हैं। ऐसे में किसी भी तरह के दबाव की बात मानना संभव नहीं है। फिर क्या है कि ये नरेंद्र मोदी की सरकार लग नहीं रही है। अभी तक ऐसा मानने वाले मन ही मन ये बात कर रहे थे। लेकिन, अब ये खुली चर्चा का विषय है कि क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है, जिसे जनता ने पूर्ण बहुमत देकर मई 2014 में सत्ता में बिठाया था। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है जिसे जनता ने ये सोचकर सत्ता दी थी कि ये प्रधानमंत्री पहले के एक दशक के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह व्यवहार नहीं करेगा। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है जिसके आने की आहट से भारतीय शेयर बाजार बल्लियों उछल गया था। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है जिसके आने की आहट भर से दुनिया भर की रेटिंग एजेंसियों ने भारत को लेकर अपना रूख सकारात्मक कर लिया था। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है जो, दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को अपना दोस्त करता था। जिससे भारतीयों को गजब का गर्व बोध हुआ था। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है जिसके राज में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सपत्नीक आते हैं और अहमदाबाद के रिवरफ्रंट पर बैठकर भारत की बढ़ती ताकत स्वीकारते हैं। साथ चलने की बात करते हैं। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है जिसके आने भर से ये माना जा रहा था कि पाकिस्तान की नापाक हरकतों पर साबित लगाम लगेगी। इन सब सवालों का जवाब खोजेंगे तो, जवाब सीधे तौर पर आएगा कि नहीं ये नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं है। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं। और वही वाले नरेंद्र मोदी हैं। लेकिन, फिर भी ये नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं है।

अपने मन की बात बोलने के लिए जाने जाने वाले उद्योगपति राहुल बजाज ने जब कहा कि ये नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं है तो, ये सवाल और बड़ा हो गया। क्योंकि, राहुल बजाज उन उद्योगपतियों में से रहे हैं जो, यूपीए के शासन में रहते ही नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने की वकालत करते थे। सिर्फ नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की वकालत ही नहीं करते थे। राहुल बजाज साफ साफ कहते थे कि यूपीए के शासन के भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए मोदी का आना जरूरी है। वही राहुल बजाज अभी भी ये मान रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निजी तौर पर बेहद ईमानदार हैं। लेकिन, इस राज में भी बिना पैसे दिए काम नहीं हो रहा है। हां, ये बात खुलकर बोलने में सब डर रहे हैं। जब नरेंद्र मोदी सरकार की एक साल के कामकाज की समीक्षा हो रही थी तो, मोदी ने छाती ठोंककर एक बात कही थी कि और कुछ भी हुआ हो। लेकिन, एक बात पर तो कोई बहस नहीं है कि इस सरकार में कोई घोटाला नहीं हुआ। इस सरकार का कोई मंत्री दागदार नहीं है। ये आज भी सच्चाई है। लेकिन, इस सच्चाई पर नरेंद्र मोदी की सरकार से बिना वास्ते वाली बातें ऐसे चिपकी कि लग रहा है जैसे मोदी राज में सिर्फ और सिर्फ घोटाले हो रहे हैं। मध्य प्रदेश के व्यापम से लेकर सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे तक का मसला ऐसा ही है। इसमें कहीं भी नरेंद्र मोदी का न तो व्यक्ति के तौर पर या प्रधानमंत्री के तौर पर कोई योगदान है लेकिन, शक के दायरे में सीधे नरेंद्र मोदी आ जाते हैं। क्योंकि, उन्होंने कार्रवाई नहीं की। विरोधी छोड़िए, नरेंद्र मोदी के घोर समर्थक भी कार्रवाई करने में आड़े आने वाले राजनीतिक समीकरणों को जरा सा भी मानने को तैयार नहीं हैं। और जब नरेंद्र मोदी कार्रवाई नहीं करते हैं तो, ये सवाल खड़ा हो जाता है कि क्या ये नरेंद्र मोदी की सरकार है। जबकि, सच्चाई आज भी यही है कि खुद प्रधानमंत्री से लेकर उनके महत्वपूर्ण मंत्रियों में से किसी पर भी कोई गंभीर आरोप बेईमानी के नहीं हैं। फिर वो वित्त मंत्री अरुण जेटली हों, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज हों, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर हों, रेल मंत्री सुरेश प्रभु हों। भूतल परिवहन और राष्ट्रीय राजमार्ग के मंत्री नितिन गडकरी को भले ही आरोपों के चलते अध्यक्ष का कार्यकाल फिर न मिल हो। लेकिन, अभी तक कोई भी आरोप उनके ऊपर साबित नहीं हो पाया है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज सिंह को लेकर भले ही नाना प्रकार की चर्चाएं मीडिया में आईं। और उसके बाद खुद गृह मंत्री को बयान देना पड़ा। लेकिन, गृह मंत्री के तौर पर राजनाथ सिंह पर भी कोई आरोप नहीं साबित हुआ है। तो, फिर आखिर क्यों प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी संसद में बैकफुट पर दिखने लगते हैं। क्यों कल तक अपने जीजा रॉबर्ट वाड्रा के ऊपर लगे आरोपों से दबे राहुल गांधी अचानक चिल्ला उठते हैं कि सुषमा स्वराज और उनके परिवार को ललित मोदी को बचाने के लिए कितने रुपये मिले। इसलिए लगता है कि ये नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं है।

फैसले लेने में कमजोरी का मामला सिर्फ पार्टी के बड़े नेताओं पर कार्रवाई भर का नहीं है। दरअसल नरेंद्र मोदी क प्रधानमंत्री बनाने वाली जनता लोकतांत्रिक तरीके से भले ही उन्हें चुनकर लाई हो। वो, जनता नरेंद्र मोदी से कई मामलों में तानाशाही रवैये की उम्मीद करती है। क्योंकि, उस जनता को लगता है कि लोकतंत्र और खासकर गठजोड़ के लोकतंत्र की मजबूरियों ने फैसले लेने में इस देश का बड़ा नुकसान कर दिया है। इसीलिए नरेंद्र मोदी को पूर्ण बहुमत से सत्ता देने वाली जनता मोदी से ऐसे तानाशाही फैसलों की उम्मीद रखती है जिससे देश का भला हो। वो डेफिसिट पूरा हो जो, गठजोड़ के लोकतंत्र की मजबूरियों की वजह से बहुत ज्यादा हो गया है। इसीलिए जब पाकिस्तान की तरफ से गोलीबारी की खबरें आती हैं। पाकिस्तान की तरफ से तैयार करके भेजे गए आतंकवादी सामने आते हैं। तो, वही जनता सवाल पूछने लगती है कि क्या ये नरेंद्र मोदी की सरकार है। ऊफा में बातचीत के दरवाजे खोलने से हिंदुस्तान की जनता को बिल्कुल एतराज नहीं है। बल्कि, बहुतायत जनता इसी पक्ष में है कि बातचीत हो। पाकिस्तान के साथ बेहतर संबंध बनें। लेकिन, वही बहुतायत जनता ये भी चाहती है कि दाऊद, शकील और दूसरे ऐसे भारत विरोधी गुंडों, आतंकवादियों को पाकिस्तानी जमीन या दूसरी जगह पर मारा जाए। या उनको भारत लाकर उन पर कार्रवाई की जाए। यहां वही जनता मोदी को इजरायल और अमेरिका के राष्ट्राध्यक्षों की तरह व्यवहार करते देखना चाहती है। और जब ये नहीं होता है। तो, फिर वही सवाल खड़ा हो जाता है कि क्या ये नरेंद्र मोदी की सरकार है।

मामला सिर्फ इतना नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार के पुराने आरोपों पर उचित कार्रवाई कर पा रहे हैं या नहीं। मामला इतना भर भी नहीं है कि पाकिस्तान पर मोदी ने हमला क्यों नहीं कर दिया। इस मामले में भी ये नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं दिखती कि देश आर्थिक तरक्की का सपना जस का तस अंटका हुआ है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने वाली जनता गुजरात के उस मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री बना रही थी जिसके राज में तरक्की बिना प्रयास हो रही थी। दस प्रतिशत की तरक्की का आंकड़ा उद्योगों में तो था ही। कृषि क्षेत्र की तरक्की की दर भी दस प्रतिशत के आसपास की थी। इसीलिए जब नरेंद्र मोदी की सरकार आई तो, उनको वोट देने वालों से लेकर दुनिया भर के लोगों को भारत में फिर से दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार का आधार तैयार होता दिखने लगा। एफडीआई, एफआईआई के आंकड़ों ने तैयार होती बुनियाक को पक्का करना शुरू कर दिया। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जब कहा कि 2016 में जीएसटी लागू हो जाएगी तो, ये भरोसा और मजबूत हुआ। रेल मंत्री ने बजट में एक भी नई योजना का एलान न करके जब कहाकि पहले रेलवे की सुरक्षा, पुरानी योजनाओं का क्रियान्वयन तेजी से होगा। तो, भी भरोसा मजबूत हुआ। लेकिन, वित्त मंत्रालय से पहले साल के तेजी में लिए गए फैसलों के अलावा नए फैसले होते नहीं दिख रहे। सबसे बड़े आर्थिक सुधार भूमि अधिग्रहण बिल तो लगभग पुनर्मूषको भव वाली स्थिति में आ गया है। जीएसटी तक ये सरकार लागू नहीं करा पा रही है। आर्थिक सुधारों पर इतनी सांसत में तो एक दशक की मनमोहन सरकार भी नहीं दिखी।

अगर कांग्रेस की सरकार सुधारों पर इतनी सांसत में नहीं दिखी तो, इसकी सबसे बड़ी वजह यही थि कि वो दूसरे दलों को साधने में कामयाब रही। भले ही उस पर केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग से लेकर दूसरे कई तरह के आरोप लगते रहे। राजनीति में भला ये बात कहां कुछ मायने रखती है कि राजनीतिक संतुलन कैसे साधा गया। पूर्ण बहुमत की सरकार और राज्यों के लिहाज से ज्यादातर क्षेत्रीय दलों के समीकरण कांग्रेस से उलट होने के बावजूद बीजेपी की सरकार क्षेत्रीय दलों को साधने में पूरी तरह से नाकाम रही है। संसद का फ्लोर मैनेजमेंट पूरी तरह से फेल रहा है। क्षेत्रीय विपक्षी दलों की तो छोड़िए खुद अपने एनडीए के साथी भी सरकार का साथ नहीं देते दिख रहे। इस सत्र के खत्म होते होते मुलायम सिंह यादव का साथ थोड़ी उम्मीद जगाता है। लेकिन, जिस तरह से ये पूरा सत्र साफ होता दिख रहा है। उसमें ये सवाल उठना लाजमी है कि क्या ये नरेंद्र मोदी की सरकार है। और इस सवाल का जवाब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जल्द से जल्द खोजना होगा। क्योंकि, ये बड़ी उम्मीदों की सरकार है। ये उम्मीद टूटी तो, राजनीतिक घालमेल की स्थिति इस देश के लिए नियति बन जाएगी।  

Tuesday, August 11, 2015

ये उम्मीद से हैं

@narendramodi की सरकार अगले कम से कम दो कार्यकाल न हट पाने की आहट से जो, वैचारिक मैथुन करने वाले बंधु नरेंद्र मोदी में बहुतायत खूबियां देख पाए थे। अब फिर उनकी आंखों के चश्मे का नंबर बदल गया है। अब उन्हें नजदीक की मोदी सरकार धुंधली दिखने लगी है। दूर की राहुल गांधी की सरकार बहुत साफ-साफ। वजह ये कि कुछ आहट आई कि मोदी के लिए तो यही पांच साल असफलता के साबित हो जाएंगे। वैचारिकों के तर्क की टाइमलाइन सलीके से देख लीजिए। मेरी बात साबित हो जाएगी। दिक्कत उनकी आंखों की है लेकिन, वो कह रहे हैं कि आंख के चश्मे का नंबर नहीं बदलवाएंगे। जो दिख रहा है वही बदलिए।

Tuesday, August 04, 2015

बजरंगी भाईजान से सबक

सलमान खान ने अभी दो कमाल किए हैं। एक कमाल ये कि फिल्म में पाकिस्तानी मुसलमान बच्ची के मुंह से जय श्रीराम कहलवा दिया। पूरे पाकिस्तान को हिंदुस्तानी पवन चतुर्वेदी को वापस हिंदुस्तान अवैध तरीके से पहुंचाने के लिए सीमा पर लाकर खड़ा कर दिया। और दूसरा कमाल ये कि लगे हाथ ये भी सवाल खड़ा कर दिया कि टाइगर मेमन की गलती के लिए उसके भाई याकूब मेमन को फांसी क्यों दी जा रही है। हालांकि, दूसरे कमाल के साथ ही उनके पिता सलीम खान ने तुरंत उससे भी बड़ा कमाल करके तुरंत ये कह दिया कि सलमान को मामले की जानकारी नहीं है। इसलिए सलमान खान के याकूब मेमन पर दिए गए बयान को गंभीरता से न लिया जाए। सलमान खान ने भी संस्कारी पुत्र की तरह पिता का हवाला देते हुए अपनी गलती स्वीकार करके बयान वापस ले लिया। ये कमाल ही था कि जिस दौर में साफ-साफ हिंदू-मुसलमान की रेखा खिंच गई थी। उस समय भी सलमान खान यानी बजरंगी भाईजान के लिए उतनी कटुता हिंदू-मुसलमान दोनों तरफ से नहीं दिखी। न तो बजरंगी भाईजान फिल्म में पाकिस्तानी मुसलमान बच्ची के मुंह से जय श्रीराम कहलाने पर बहुतायत मुसलमानों ने लाहौल विला कुव्वत कहकर भारत में उनकी फिल्म के कारोबार में जरा सा भी कमी आने दी। न ही बहुतायत हिंदुओं ने याकूब पर उनके बयान के बाद भी उनको देश के दूसरे हिंदू धर्मनिरपेक्षों की तरह गालियां दीं। दरअसल ये बहुत बड़ा उदाहरण है। ये सलमान खान की अपनी छवि, प्रतिष्ठा है कि सलमान खान और उनके पिता सलीम खान को बहुतायत हिंदू भी अच्छी नजर से देखता है। सलमान खान भी फिल्मी अभिनेता हैं। हर तरह की पिक्चरें करते हैं। हिंदू-मुसलमान सब बनते हैं। ये फर्क अपने बयानों, व्यवहारों से बनाई छवि भर का ही है। ये फर्क है मौके की संवेदनशीलता को समझने का। किसी को फांसी दिए जाने से कुछ लोगों को छोड़कर ज्यादातर संवेदनशील हिंदुस्तानी दुखी ही होता है। लेकिन, इस समय देश के खिलाफ युद्ध जैसी स्थिति बना देने वाला एक शख्स फांसी पर चढ़ रहा हो तो, विचार व्यक्त करने में थोड़ा तो सोचना चाहिए। और वो बात कांग्रेसी सांसद शशि थरूर ने बोल देने के बाद समझ में आई। शशि थरूर ने ट्वीट किया कि एक मनुष्य को फांसी पर चढ़ाया जा रहा है। और सरकार हत्यारी हो गई है। इस पर शशि थरूर को जमकर विरोध झेलना पड़ा। हालांकि, बाद में मौके की नजाकत के लिहाज से शशि थरूर ने अपने बयान को गलत माना। उन्होंने कहाकि किसी को भी फांसी की सजा देने के वो सिद्धांत रूप से खिलाफ हैं। लेकिन, उन्हें याकूब की फांसी के समय ये मांग नहीं उठानी चाहिए थी। पता नहीं ये शशि थरूर ने स्वत: स्फूर्त किया या बजरंगी भाईजान यानी सलमान खान की समझदारी से समझ बनाई। लेकिन, ये बेहतर सबक था जो, उन्होंने तुरंत अमल में लिया।

सलमान खान यानी बजरंगी भाईजान से इस वक्त देश के लिए और देश में बहुतों के लिए सीखने को बहुत कुछ है। सचमुच ये फिल्म प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधाननमंत्री नवाज शरीफ को देखनी चाहिए। हालांकि, मैं ये भी मानता हूं ये दोनों रिश्ते बेहतर करने के लिए काफी कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तान के फौजियों को ये फिल्म जरूर देखकर सबक लेना चाहिए। इस फिल्म का सबसे बड़ा सबक दोनों देशों के लिए यही है कि दोनों देशों के बच्चों को ज्यादा से ज्यादा मिलने का इंतजाम करना होगा। भले ही ये फिल्म थी। जिसमें एक प्यारी सी बच्ची शाहिदा, जो पाकिस्तानी मुसलमान है। जमकर मांसाहार स्वाभाविक तरीके से करती है। एक हिंदुस्तानी हिंदू ब्राह्मण पवन चतुर्वेदी, जिसके लिए मांस छूना भी धर्म भ्रष्ट होने जैसा है। उसके लिए बंधन बन जाती है। लेकिन, सच्चाई भी यही है कि नफरत कम करने का काम सबसे आसानी से बच्चे ही कर सकते हैं। क्या इस तरह का कार्यक्रम दोनों देशों की सरकारें तैयार कर सकती हैं कि दोनों देशों के सर्वोच्च फौजी अफसर मिलें न मिलें। सचिव स्तर के अधिकारी मिलें न मिलें। हर महीने हिंदुस्तान-पाकिस्तान के स्कूली बच्चे एक दूसरे के स्कूल में जाकर कुछ समय बिताएं। ये गुरुमंत्र रामबाण साबित होगा।

मीडिया सिर्फ निगेटिव खबरों को ही दिखाता है। सिर्फ भारत-पाकिस्तान के बीच नफरत ही बेचता है। ये कहकर कि बिकती ही नफरत है। पाकिस्तानी संवाददाता चांद नवाब के पाकिस्तानी चैनल के मुखिया को बजरंगी भाईजान की खबर चलाने के लिए कहने पर संपादक का बयान कि हम खबर बेचते हैं, अनाथालय नहीं चलाते। ये हिंदुस्तान-पाकिस्तान दोनों के मीडिया के लिए बराबर लागू होता है। दिल्ली-मुंबई या फिर इस्लामाबाद में बैठा मीडिया असल पत्रकारिता का जरिया बन सकता है। अगर वो देश भर में फैले पत्रकारों को उचित सम्मान दे। टीवी न्यूज चैनल में सबसे ज्यादा बुरे हाल में अगर कोई है तो वो चांद नवाब जैसे छोटे शहरों, दूर दराज के इलाकों में काम कर रहे स्ट्रिंगर ही हैं। स्ट्रिंगर या संवाद सूत्र यानी वो जो चैनल की नौकरी पर नहीं है। खबर के लिहाज से भुगतान पाता है। उनकी पत्रकारिता को धार देने की जरूरत है। ज्यादातर चैनलों के संपादक या चैनल की रीति नीति तय करने की स्थिति में बैठे पत्रकार बजरंगी भाईजान फिल्म की ही तरह अच्छी, समाज को जोड़ने वाली नफरत कम करने वाली खबरों को नकार देते हैं। उसकी बुनियाद में पत्रकारिता की शुरुआती शिक्षा - कुत्ता आदमी को काटे ये खबर नहीं। आदमी कुत्ते को काटे ये खबर- की बड़ी भयानक भूमिका है। इससे मीडिया की खुद की प्रतिष्ठा भी बेहतर होगी। और समाज भी बेहतर होगा।

दोनों देशों की फौज भी बजरंगी भाईजान से काफी कुछ सबक ले सकती है। इस फिल्म में तो पवन चतुर्वेदी पाकिस्तानी शाहिदा को छोड़ने के इरादे से पाकिस्तान अवैध तरीके से घुसता है। लेकिन, भारत-पाकिस्तान की सीमाएं कई जगह ऐसी हैं। जहां इस तरह की दुर्घटनाएं अनजाने में हो जाती हैं। वो रास्ता जमीनी भी है, समुद्री भी। निश्चित तौर पर अपनी सीमा सुरक्षित रखने और दुश्मनी, आतंकवाद और गलत इरादे से घुसे लोगों को सबक देने के लिए फौज को अपना काम करना ही चाहिए। लेकिन, ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए कि गलती से सीमा के संकट में कोई न फंस जाए।

सबसे आखिरी सबक वही सबसे पहला वाला ही है। जो, याकूब के मामले में सलमान खान ने असल जीवन में दिया है। वो सबक है। किसी की संवेदनशीलता का सम्मान करना। और जब मामला देश का हो तो, ये संवेदनशीलता ज्यादा ही सम्मान मांगती है। इसलिए असल जीवन के सलमान खान और फिल्मी चरित्र बजरंगी भाईजान से अगर हम ये सबक ले सके तो काफी कुछ बेहतर हो सकेगा। धरती के जन्नत कश्मीर को लेकर जो कुछ हो रहा है। वो ठीक नहीं है। जन्नत का ज्यादा हिस्सा हम हिंदुस्तानियों के पास है तो थोड़ी जन्नत पाकिस्तान के पास भी है। अपनी जन्नत बनाए रखने के लिए हमें ये सबक लेना होगा। 

पिताजी कहे - घर के बाहर से बात करके चले जाने वाले दोस्त नहीं हो सकते

हर्ष वर्धन त्रिपाठी पिताजी का घर - परिवार - गांव - समाज से अद्भुत लगाव रहा। लगाव ऐसा रहता था कि , लगकर रिश्ता निभाते थे। हमें...