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Saturday, February 27, 2016

खतरनाक मिसाल कायम कर रहे हैं पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम

खतरनाक है ये। कितना खतरनाक इसका अंदाजा तो अभी लगाना मुश्किल है। आगे चलकर पता चलेगा। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में आतंकवादियों के साथ सहानुभूति रखने, देश की बर्बादी के नारे लगाने और देश की संसद पर हमला करने की साजिश रखने वाले आतंकवादी अफजल गुरू को शहीद बताने वाले छात्रों के समर्थन की राजनीति और आगे चली गई है। हालांकि, इसे राजनीति क्यों कहा जाना चाहिए। क्योंकि, राजनीति तो सत्ता पाने के लिए, सत्ता चलाने के लिए की जाने वाली नीति है। लेकिन, शायद कांग्रेस सत्ता पाने के लिए कहीं तक भी जाने को राजनीति का हिस्सा ही मानने लगी है। इसी तरह की राजनीति में यूपीए के शासनकाल में भ्रष्टाचार की सारी हदें पार हो गईं। और कांग्रेस, सत्ता बनी है, इसी से खुश रही। लेकिन, इसी राजनीति की ही वजह से मई 2014 में कांग्रेस के साथ वो हुआ, जो किसी ने कल्पना नहीं की थी। कांग्रेस के उस खराब दशा में पहुंचने के बाद कांग्रेस के महासचिव और कांग्रेस के पर्दे के पीछे के बड़े नेता जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि कांग्रेस से हिंदुस्तान को समझने में भूल हो गई है। जाहिर है कोई भूल हो, तो उसे सुधारने का काम होना चाहिए। लेकिन, हुआ उल्टा। इस स्वीकारोक्ति के बाद कांग्रेस में जनार्दन द्विवेदी की अहमियत और घट गई। अब पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम हिंदुस्तान को समझने में हुई गलती को और बड़ा कर रहे हैं। पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम ने एक साक्षात्कार में कह दिया कि अगर ईमानदारी से देखा जाए, तो शायद अफजल मामले पर सही फैसला नहीं हुआ। चिदंबरम ने और आगे जाते हुए साक्षात्कार में कहा है कि इस बात पर काफी संदेह है कि अफजल संसद पर हमले के मामले में कितना शामिल था।

किसी भी मसले पर अपनी राय निजी तौर पर रखने के लिए कोई भी स्वतंत्र है। लेकिन, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कोई सीमा तो तय करनी होगी। अभी के माहौल में, जब मैं राष्ट्रद्रोही हूं, कहकर ढेर सारे पत्रकार, बुद्धिजीवी जेएनयू में आतंकवादियों के समर्थन में छात्रों के उतरने को सिर्फ असहमति साबित करने की कोशिश कर रहे हों। ऐसे माहौल में जब देश का पूर्व गृहमंत्री अफजल गुरू को फांसी देने की न्यायिक प्रक्रिया पर ही संदेह जता दे, तो मामला सिर्फ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं रह जाता है। वो भी एक ऐसा कांग्रेसी गृहमंत्री जो कांग्रेस की सरकार में गृहमंत्री और वित्तमंत्री जैसे अहम ओहदों पर रह चुका हो। पी चिदंबरम का गृहमंत्री के तौर पर नक्सलियों से कड़ाई से निपटने के मामले में अपनी ही पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह से मतभेद खुले तौर पर सामने दिखा था। वो चिदंबरम अगर अब नक्सली से भी आगे आतंकवादी के समर्थन में आए छात्रों के खड़े होने को न्यायोचित ठहराने की कोशिश कर रहे हैं, तो खतरनाक मिसाल बनती दिख रही है। अफजल गुरू पर संसद पर हमले की साजिश में शामिल होने का आरोप है और सबसे बड़ी बात ये कि अफजल गुरू को न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद राष्ट्रपति के यहां से दया याचिका खारिज होने के बाद ही फांसी दी गई। अफजल गुरू के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया 2002 में शुरू हुई थी। लेकिन, 2004 से लेकर 2013 यानी अफजल गुरू को फांसी दिए जाने तक कांग्रेस की ही सरकार थी। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि कानूनी प्रक्रिया में अफजल गुरू के खिलाफ आरोप साबित करने, जुटाने का काम कांग्रेस की सरकार के दौरान ही हुआ। निश्चित तौर पर ये कतई नहीं माना जा सकता कि कांग्रेस ने बिना वजह अफजल गुरू को संसद पर हमले की साजिश में फंसाने का काम किया होगा। दिसंबर 2001 में हुए संसद हमले के लिए आतंकवादियों को छिपने की जगह देने के साथ ही दूसरी तरह की मदद का आरोप अफजल गुरू पर साबित हुआ है। संसद पर हुए हमले के ठीक पहले की कॉल डिटेल से ये साबित हुआ है कि अफजल गुरू इस मामले में पूरी तरह से शामिल रहा। 2002 में पोटा कोर्ट ने अफजल गुरू को हमले की साजिश का दोषी पाया। उसके बाद 2003 में दिल्ली उच्च न्यायालय और उसके बाद 2005 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी अफजल को दोषी ही पाया। यहां यह तथ्य भी बेहद जरूरी है कि अफजल को फांसी से बचाने के लिए हिंदुस्तान से लेकर दुनिया भर के सारे मानवाधिकारवादी लगे रहे। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय से भी फांसी की सजा बरकरार रहने के बाद अफजल गुरू की फांसी के खिलाफ अफजल की पत्नी ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका भी डाली। उस समय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी थे। प्रणब मुखर्जी ने अफजल गुरू की दया याचिका को खारिज कर दिया। यानी राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भी संसद हमले में अफजल की भूमिका लगी होगी। इसके बाद 9 फरवरी 2013 को अफजल गुरू को कांग्रेस की सरकार ने तिहाड़ जेल के भीतर ही फांसी दे दी। और सबसे गलत काम किया कि अफजल के परिवार को सूचना देना तक जरूरी नहीं समझा। हालांकि, तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे कहते हैं कि सूचना भिजवाई गई थी। सुशील कुमार शिंदे ने पी चिदंबरम के वित्तमंत्री बनने के बाद गृहमंत्री की कुर्सी संभाली थी। इस लिहाज से 2008 से 2012 तक यानी चार साल तक हर तरह से अफजल गुरू को न्याया दिलाने के लिए हरसंभव कोशिश करने का मौका पी चिदंबरम के पास था। अगर कहीं कोई गलती हो रही थी, तो उसको सुधारने का अवसर था। लेकिन, गृहमंत्री रहते चिदंबरम को भी अफजल गुरू की फांसी न्यायोचित लगी होगी।


फिर आज ऐसा क्या हो गया है कि अचानक पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम को ये लगने लगा कि अफजल गुरू के साथ शायद न्याय नहीं हुआ। कहीं ऐसा तो नहीं है कि इस मत परिवर्तन के पीछे सबसे बड़ी वजह आज का माहौल है। देश में माहौल कुछ इस तरह का है कि देशभक्त होने को भी तथाकथित बुद्धिजीवी गाली बना देने पर तुले हुए हैं। वहीं खुद को देशद्रोही कहकर ढेर सारे बुद्धिजीवी, पत्रकार सरकार को चुनौती दे रहे हैं। क्या इसी माहौल का फायदा उठाकर पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम सरकार को असहज करने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन, ये बेहद खतरनाक मिसाल होगी। जहां कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता और लंबे समय तक देश के गृहमंत्री रहे पी चिदंबरम देश विरोध की भावना का जानबूझकर समर्थन करते दिख रहे हैं। ये वही पी चिदंबरम हैं, जिन्होंने गृहमंत्री रहते 2010 में कहा था कि वामपंथी अतिवाद आतंकवाद से भी खतरनाक है। साक्षात्कार में नक्सली समस्या पर बात करते हुए पी चिदंबरम ने कहा – नक्सली राज्य और सेना को दुश्मन कह रहे हैं। सच तो ये है कि वो सेना को दुश्मन की सेना कह रहे हैं और इसे युद्ध बता रहे हैं। मैं ऐसे शब्दों को नापसंद करता हूं। गृहमंत्री रहते नक्सलियों के देश विरोधी, सेना विरोधी शब्दों को नापसंद करने वाले पी चिदंबरम आज विपक्ष के नेता के तौर पर उन्हीं को बढ़ावा दे रहे हैं। पिछले साल नवंबर महीने में पी चिदंबरम ने लिट्रेचर फेस्टिवल में, क्या भारत एक उदार गणराज्य है, विषय पर बोलते हुए कहा था कि राजीव गांधी सरकार का सलमान रुश्दी की किताब सैटेनिक वर्सेस को प्रतिबंधित करना गलत था। यहां ये भी जान लेना जरूरी है कि 1988 में जब ये पुस्तक भारत में प्रतिबंधित हुई, तो पी चिदंबरम गृह राज्यमंत्री थे। गलत किए हुए की स्वीकारोक्ति गलत नहीं है। लेकिन, सरकार में रहते हुए खुद के किए हुए को विपक्ष में रहते सिर्फ इसलिए गलत बताना कि इससे अभी की सरकार को असहज किया जा सकता है। खतरनाक मिसाल बन रहा है। नुकसान देश का हो रहा है।

Friday, May 21, 2010

सोनिया मैडम, ये कौन सी पॉलिटिक्स है

शासन चलाने के साथ विपक्षी भूमिका भी अपने पास रख लेने की कला कांग्रेस से बेहतर किसी के पास नहीं है। नक्सलियों से निपटने पर केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम का ताजा बयान कुछ इसी नीति को पुख्ता करता है। वैसे इस काम के लिए कांग्रेस अलग-अलग समय पर अलग-अलग नेताओं को इस्तेमाल करती रहती है जो, सरकार में न होकर पार्टी में होते हैं। और, UPA 1-2 में ये भूमिका मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह बखूबी निभा रहे हैं। लेकिन, नक्सल समस्या जैसे गंभीर मसले पर शायद कांग्रेसी पॉलिटिक्स सिर्फ दिग्विजय के बयानों से अपना काम नहीं साध पा रही थी इसलिए चिदंबरम को भी ये बयान देना पड़ा कि नक्सलियों के आतंक से निपटने के लिए धैर्य की जरूरत है।

ये वही चिदंबरम साहब हैं जो, नक्सलियों के खिलाफ बेहद कड़ी सैन्य कार्रवाई तक करने के पक्षधर होने की वजह से कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के निशाने पर भी आ गए थे। शायद और कोई रहा होता तो, वो अनुशासनात्मक कार्रवाई के दायरे में आ गया होता लेकिन, इकोनॉमिक टाइम्स में चिदंबरम की यानी अपनी ही सरकार की नक्सल से निपटने की रणनीति को जिस तरह से बेकार बताया था, उस पर भी सोनिया मैडम ने कुछ भी नहीं कहा। हां, चिदंबरम को जरूर अपनी कड़ी रीढ़ की हड्डी नरम करनी पड़ी। दरअसल अब कांग्रेस को ये लग रहा है कि जिस तरह से रमन सिंह आक्रामक हो रहे हैं अगर इस समय सैन्य कार्रवाई की इजाजत दी गई तो, आम लोगों में उस अभियान की सफलता का सेहरा बीजेपी के मुख्यमंत्री रमन सिंह के सिर बंध सकता है।

संसद में भी कड़े तेवर अपनाते हुए बहस के दौरान विपक्ष के नेता अरुण जेटली खुलेआम कह चुके हैं कि चिदंबरम के साथ हम हैं लेकिन, उनकी पार्टी ही नहीं है। चिदंबरम बेचारे अपनी कड़क मंत्री की छवि बनाए रखना चाहते हैं लेकिन, वो भूल गए कि कांग्रेस की पसंद गृह मंत्री पद के लिए शिवराज पाटिल जैसे ढुलमुल नेता रहे हैं वो, तो मुंबई हमले के बाद बहुत हल्ले की वजह से उनकी बलि लेना पड़ी। अब कांग्रेस को नक्सलियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने वाला गृह मंत्री नहीं चाहिए। वजह साफ है लालू प्रसाद यादव ने जिस तरह से बिहार चुनाव के मद्देनजर नक्सल नीति पर गंदा बयान जारी किया है उसने कांग्रेसी रणनीतिज्ञों के कान खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस को भी तो बिहार में अपना हाल थोड़ा ठीक करना है। उस पर बंगाल में ममता और कांग्रेस की बीच गठजोड़ में पड़ी दरार और ममता को माओवादियों का पूरा साथ इन सबने कांग्रेस को रणनीति थोड़ा बदलने पर मजबूर कर दिया है। हो, सकता है इसकी वजह से अब चिदंबरम के गृह मंत्रालय की ओर से जारी होने वाले नक्सल विरोधी बड़े-बड़े विज्ञापन भी बंद कर दिए जाएं। यही कांग्रेसी पॉलिटिक्स है।

एक नहीं कई नमूने हैं। संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु की फांसी की फाइल गृह मंत्रालय और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बीच गजब फंसी हुई है। और, जब मामला खुलने पर सरकार की किरकिरी होनी शुरू हुई तो, हमेशा कांग्रेस की ओर से मुस्लिमों के बड़े नेता बनने की कोशिश करते दिखने वाले परम धर्मनिरपेक्ष दिग्विजय सिंह ने बयान जारी कर दिया कि अफजल गुरु को जल्द फांसी हो। अब अगर ये सिर्फ बयान भर नहीं है तो, ये बात चिदंबरम, शीला दीक्षित को बतानी थी। राहुल गांधी के इस प्रमुख सलाहकार की बात टालने की हिम्मत भला कौन कांग्रेसी इस समय कर सकता है।

इससे पहले बाटला हाउस एनकाउंटर पर भी दिग्विजय सिंह आजमगढ़ जाकर आतंकी परिवारों तक में अपनी ही सरकार की रिपोर्ट को झुठलाकर आए थे। जांच का आश्वासन भी दिया था। ये अलग बात है कि दिल्ली आते-आते पलट गए। वाह रे कांग्रेसी पॉलिटिक्स।


Saturday, July 25, 2009

तुम लोग बेवकूफी की बात कब बंद करोगे

तुम लोगों के पास थोड़ी भी अकल है या नहीं। या पुराना फंसा हुआ रिकॉर्ड हो गए हो तुम मीडिया वाले। जहां अंटक गए उसके आगे बढ़ ही नहीं पाते। दरअसल तुम लोगों का दोष भी नहीं है। तुम लोग क्या जानो कानून के बारे में। लेकिन, मैं तो जानता हूं इसलिए मेरी बात सुनो।



और, अब तो मैं गृहमंत्री भी हूं। बड़ा वकील हूं बड़ा मंत्री हूं। अब दुबारा मत पूछना कि अफजल को फांसी देने में हमारी सरकार देर क्यों कर रही है। चलो तुम बेवकूफों को मैं समझा देता हूं। अफजल गुरु को जब फांसी की सजा सुनाई गई है। और, अभी तक कुल फांसी के 28 मामले हैं। उन 28 मामलों में अफजल का नंबर 22वां है। तो, जाहिर है हमारी सरकार कानून तोड़कर तो अफजल को फांसी देगी नहीं। पहले 21 लोगों को फांसी चढ़ने दीजिए फिर अफजल की बात करिएगा।



अब कसाब का भी ट्रायल चल ही रहा है। कसाब के कबूलनामे के बाद भी विशेष अदालत के न्यायाधीश महोदय पता नहीं क्यों कह रहे हैं कि फैसला अभी नहीं सुनाया जाएगा। फैसले के लिए कसाब का कबूलनामा रिकॉर्ड के तौर पर रखा जरूर जाएगा। बड़ा एहसान मुंबई हमले में कसाब और दूसरे उसके साथी आतंकवादियों की गोली से मारे गए लोगों के परिजनों पर। मारे गए लोगों की आत्मा को भी इतनी शांति तो मिल ही रही होगी तो, आज नहीं तो कल आंतकवादी अंजाम तक पहुंचेंगे।



अरे लेकिन, इसमें मुश्किल है। क्योंकि, कसाब का नंबर तो अगर तुरंत फांसी सुनाई जाए तो, 29वां हो जाएगा। तो, पहले 21 फिर, 22वां अफजल, फिर 29वां कसाब फांसी चढ़ेगा। और, अपने गृहमंत्रीजी तो बहुत दुखी हैं। कह रहे हैं कि तुम मीडिया के बेवकूफों को तो पता नहीं होता। फांसी चढ़ने से ज्यादा कष्ट वो झेल रहे होते हैं जो, फांसी दिए जाने का इंतजार कर रहे होते हैं। वाह रे समझदार सरकार और उसके समझदार गृहमंत्री ... लेकिन, हम तो भइया बेवकूफ ही भले

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...