Tuesday, June 30, 2009

पत्थर के सनम ... बड़ी भूल हुई

पत्थर के सनम तुझे हमने मुहब्बत का खुदा जाना ... बड़ी भूल हुई। फिल्म में ये गाना दो लोगों के निजी प्रेम संबंधों के उम्मीदों पर खरा न उतरने को बखूबी बयां करता है। लेकिन, गीत लिखने वाले को शायद ये अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि ये लाइनें किसी ऐसी शख्सियत पर बखूबी फिट बैठेगा जो, करोड़ो की उम्मीदों को तोड़ रही है। धूल-धूसरित कर रही है।


मनुवाद, ब्राह्मणवाद, पूंजीवाद की विरोधी मायावती की मूर्तियां लखनऊ में हर थोड़ी दूर पर नजर आने लगी हैं। मायावती शायद देश की पहली नेता होंगी जो, जीते जी ही खुद अपनी मूर्तियां लगाने पर जुटी हैं। गांव-समाज में एक देसी कहावत अकसर सुनने को मिल जाती है फलनवा बड़ा आदमी रहा। अपने जीते जी मरे के बादौ क इंतजाम कई गवा। काहे से कि केहु ओकरे करै वाला नहीं रहा। मायावती भी कुछ गांव-समाज के उसी बड़े आदमी जैसा बर्ताव कर रही हैं। लेकिन, मामला सिर्फ ये नहीं है कि मायावती ने किसी से प्रेम नहीं किया-शादी नहीं की तो, उनकी फिकर करने वाला भी कैसे होगा। दरअसल, ये मायावती तो, उन करोड़ों लोगों की उम्मीद थी जिन्हें लगता था कि ये हमारे लिए बहुत कुछ करने के लिए शादी-ब्याह नहीं कर रही। अपना जीवन-करियर सब त्याग दिया।


ये वो मायावती थी जिसकी मूर्ति कहीं नहीं थी लेकिन, यूपी का करोड़ो दबा-कुचला अधिकारविहीन पीछे डंडा-झंडा लिए गर्मी-पानी-जाड़ा में मायावती के नाम का झंडा बुलंद करता घूम रहा था। फिर मायावती को ये करने की क्यों सूझी। इन करोड़ो लोगों पर मायावती को भरोसा क्यों नहीं रहा कि ये उनके मरने के बाद भी उनका नाम उसी बुलंदी पर रखेंगे जहां आज बिठा रखा है।


ये वो लोग थे जो, मायावती के बनाए अंबेडकर पार्क में इकट्ठा होते हैं। एक दिन की रोजी-रोटी त्यागकर लखनऊ पहुंचते हैं। मनुवाद की खिलाफत में मायावती के साथ खड़े होने के लिए गंगा का किनारा छोड़कर लखनऊ के अंबेडकर पार्क में बनी नहर को भीमगंगा बना देते हैं। गंगा से पवित्र मानकर उसी पानी से आचमन करते हैं।

अब देखिए मायावती क्या कर रही हैं। मायावती इन अधिकार विहीन लोगों को अधिकार दिलाने की मृगमरीचिका दिखाकर सत्ता में आ गईं। अधिकार छीनने वालों की जिस टोली के मुलायम के साथ होने का ढिंढोरा पीटकर ये सत्ता में आईं सत्ता में आते ही उन्हीं लोगों को मंच पर खड़ा कर दिया। और, उन अधिकार विहीन लोगों से कहा- ये आपके मसीहा हैं इन्हें अधिकार दीजिए ये, आपके अधिकारों के लिए लड़ेंगे।


हाथी इन अधिकार विहीन लोगों की ताकत था। फटे पुराने नीले कपड़े पर हाथी लहराता देख इन्हें अपनी ताकत का अहसास होता था। अब लंबी-लंबी कारों पर साटन-मखमल के कपड़े पर हाथी लहरा रहा है। इन्हें लगता है कि जैसे ठगे गए हों। लखनऊ में खड़े 60 हाथी इन पर भार बन रहे हैं। बहनजी और उनके साथ दूसरे अधिकार विहीनों के लिए लड़ने वाले नेताओं की मूर्तियों पर सिर्फ लखनऊ में 2700 करोड़ रुपए खर्च हो गए। और, कहते हैं न कि हाथी पालने से ज्यादा उसे खिलाना भारी पड़ता है। कुछ ऐसा ही है। यूपी के अधिकार विहीनों की मेहनत की कमाई का 270 करोड़ रुपए हर साल सिर्फ इन पत्थर की मूर्तियों और हाथिय़ों को खिलाने में (मरम्मत) बरबाद होगा।


गांव-गिरांव में इन अधिकार विहीनों की जमीन का पट्टा नहीं हो पा रहा है। रत्ती-धूर जमीन में ये परिवार चला लेते हैं। जमींदार टाइप के लोग इनकी जमीन पर कब्जा कर लेते हैं। इनको गांव की जमीन दिलाने का वादा करने वाला मायावती अब यूपी की सबसे बड़ी जमींदार हो गई है। जमींदार है इसलिए जमींदारी भी कर रही है। सिर्फ लखनऊ में 413 एक़ड़ की इस जमींदारी कब्जे की जमीन पर पत्थर के हाथी, पत्थर की मायावती, पत्थर के कांशीराम और पत्थर के दूसरे नेता खड़े हैं जो, जमींदारी मिटाने की लड़ाई लड़ रहे थे। पूरा का पूरा वो आंदोलन पत्थर होता दिख रहा है जो, नोएडा के एक गांव की अधिकार विहीन सामान्य महिला को कुछ महीने पहले तक देश की प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने की जमीन बना चुका था।


और, ये आंदोलन खत्म होगा ऐसा नहीं है। सिर्फ अधिकार विहीनों की ही बात क्यों। मायावती की जिस सोशल इंजीनियरिंग ने यूपी में सारे समीकरण ध्वस्त कर दिए थे। वो, भी टूटेगा। सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय नारा भर बनकर रहा गया है। मायावती के नजदीकी हिताया और सिर्फ उन्हीं का सुखाय। और, सबको सिर्फ इन पत्थरों में ही अपना सुख खोजना होगा। 413 एकड़ जमीन और 2700 करोड़ रुपए इतनी बड़ी रकम तो, थी ही कि अधिकार विहीनों (5 करोड़ 90 लाख लोग इस प्रदेश में गरीबी रेखा के नीचे हैं) के अधिकार कुछ तो मिल ही जाते।

बात सिर्फ लखनऊ की ही नहीं है। मायावती अपने आखिरी निशान हर जगह छोड़ देना चाहती हैं। दिल्ली से नोएडा घुसते ही लखनऊ जैसे ही गुलाबी राजस्थानी पत्थरों की ऊंची दीवार दिखने लगती है। करीब 3 किलोमीटर का ये पूरा क्षेत्र जंगल था-हरा-भरा था। इन पत्थरों की ऊंची दीवारों के बीच में पत्थर के हाथी और मूर्तियां हैं जो, गर्मी की चिलचिलाती धूप में चिढ़ पैदा करते हैं। मेरा मन इन मूर्तियों को ढहाने का होता है।


नोएडा के दूर-दराज गांवों में भी लोगों के रहने के लिए घर मिलना मुश्किल है। इनता महंगा कि आम आदमी तो, सिर्फ देखते हुए जिंदगी बिता लेता है। ये पत्थर के जंगल वहां तैयार हो रहे हैं जहां, ठीक सामने की जमीन पर करोड़ो के बंगले हैं। मायावती का मनुवाद विरोध एक चक्र पूरा कर चुका है। करोड़पति बंगले वाले और मायावती और उनके पहले के मनुवाद विरोध नेता पत्थर के ही सही लेकिन, पड़ोसी हैं। आमने-सामने रहते हैं। खैर, मैं भी यूपी में ही रहता हूं इसलिए ज्यादा हिम्मत नहीं करूंगा लेकिन, मायावती के पीठ पीछे ये धुन जरा ऊंची आवाज में सुनने का मन करता है।

पत्थर की मायावती ... तुझे हमने दलितों का खुदा जाना ... बड़ी भूल हुई ...

पीछे से बैकग्राउंड स्वर – भूल हुई तो, भुगतो


और, सुना-पढ़ा कि सुप्रीमकोर्ट अब इन मूर्तियों के बनने, जनता के पैसे की बर्बादी पर सवाल पूछ रहा है –

ऑर्डर .. ऑर्डर .. ऑर्डर .. ये अदालत का मामला है चलता ही जाए

Wednesday, June 10, 2009

कलावती दिल्ली आई है

कलावती परशुराम बांडुरकर दिल्ली में है। आज उसका दिल्ली में दूसरा दिन है। इसको नहीं पहचान रहे हैं ऐसा तो हो ही नहीं सकता। अरे देश के सबसे ताकतवर परिवार के नए पावर सेंटर राहुल बाबा की कलावती। राहुल बाबा संसद में खड़े हुए थे परमाणु करार पर सरकार का पक्ष रखने और लगे बोलने कलावती के बारे में। वैसे तो संसद में हंसोड़ों की कमी नहीं है लेकिन, परमाणु करार के बीच आई कलावती पर किसी को भी हंसी आ सकती थी। लेकिन, राहुल गांधी ने सबकी हंसी बंद कर दी थी ये कहकर कि मैं जिस कलावती की बात कह रहा हूं वो, विदर्भ में रहती है। उसका किसान पति कर्ज के बोझ से खुदकुशी कर चुका है।


उस वक्त तो राहुल की कलावती मशहूर हो गई। कलावती के घर बिजली पहुंचाने की उम्मीद और उसके जैसी कलावतियों की बेहतर जिंदगी की उम्मीद जगाकर राहुल की पार्टी बड़े दिनों बाद पुरानी कांग्रेस जैसे अंदाज में सत्ता में आ गई। ये अलग बात है कि परमाणु करार से देश की कलावतियों के घर में बिजली और खुशहाली पहुंचाने की उम्मीद ठीक वैसी ही थी जैसी, अकबर-बीरबल के किस्से में ठंडे पानी में खड़े गरीब के लिए अकबर के महल में जल रहे दीपक की गरमी या फिर बांस की चढ़ी बीरबल की खिचड़ी की हांडी। अब अकबर को जगाने के लिए तो, चतुर बीरबल था। आज के राजा गांधी परिवार को जगाने के लिए बीरबल कहां से लाएं। क्योंकि, इस परिवार के सामने बीरबल बने तो, सारा बल चला जाएगा।


वैसे कलावती की उम्मीद में देश की सत्ता भले ही कांग्रेस और उनके साथियों को मिल गई हो। खुद कलावती के इलाके से कांग्रेस और उनकी साथी एनसीपी का बुरा हाल हुआ। अब कलावती फरियाद करने आई है राहुल बाबा से कि मेरे 9 बच्चे कैसे जिएंगे। राहुल के वादे के बाद भी न तो घर मिला, न बिजली, न खुशहाली। राहुल तो, कलावती के भरोसे हीरो हो गए कि राहुल आम आदमी का दर्द जानते हैं। बड़े आदमी से जुड़ने का कलावती को फायदा ये हुआ कि देश क्या दुनिया - अमेरिका में पक्का जान गए होंगे क्योंकि, विदेशी तो वैसे भी भारत नंगे-भूखों की ही फोटो अपने यहां भारत की पहचान के तौर पर लगाते हैं- में भी जहां-जहां राहुल गांधी का एतिहासिक भाषण पहुंचा होगा सब जाए गए। लेकिन, नुकसान ये कि उसके गांव-तहसील का छोटा सा सरकारी अफसर भी कहता है कि जाओ राहुल गांधी को कहो-बताओ अपनी परेशानी और सुलझा ले समस्या।


लेकिन, अफसरों के दुत्कारने से नहीं एक NGO के हिम्मत (दिल्ली का टिकट. दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस की व्यवस्था) देने से कलावती दिल्ली में है। दो दिन से अभी तो, उसे राहुल गांधी का समय नहीं मिला है। लेकिन, अब शायद एक कलावती की बात तो कुछ बन जाए। अभी तक कलावती के बारे में टीवी-अखबार में राहुल का बोला दिखा-छपा करता था। अब राहुल नहीं दिख रहे- अब कलावती का खुद का बोला टीवी-अखबार में दिख-छप रहा है। टीवी-अखबार में बड़ी ताकत होती है वो ऐसे समाज का कितना भला कर पा रहे हैं पता नहीं। लेकिन, कभी-कभी चमत्कार हो जाता है। बोरवेल में गिरा प्रिंस असली प्रिंस हो जाता है। अरे, लालू टीवी-अखबार में दिख-छपकर मंत्री तक बनने की कोशिश कर रहे हैं। कल भी तो संसद में --- देवी अर्ज सुन लो हमारी के अंदाज में -- सोनिया मैडम के सामने खड़े हो गए थे पुराने रिश्तों की याद दिलाने।



अब शायद टीवी-अखबार एक कलावती का भला करवा दे। राहुल को भी लगेगा कि इससे बढ़िया मौका क्या हो सकता है आम आदमी के साथ कांग्रेस के हाथ के नारे की मजबूती दिखाने का। दो-चार तसला मिट्टी फेंकते राहुल की टीवी पर चली तस्वीरों ने लाखों तसले मिट्टी राहुल के हाथों फेंकवा दी। टीवी-अखबारों में तो, तब से चुनाव तक तसला लिए मिट्टी फेंकते ही दिखते रहे। देखिए कब ये खबर आ जाती है कि राहुल बाबा कितने दयालु हैं कलावती के लिए खुद खड़े होकर घर बनवा रहे हैं।

Wednesday, June 03, 2009

देश हांफने न लगे

आज मीरा कुमार भारत की पहली महिला लोकसभा अध्यक्ष बन गईं। ये एतिहासिक घटना है। इसके बाद मीरा कुमार ने सबका धन्यवाद करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपने मंत्रिमंडल का सबसे परिचय कराने के लिए आमंत्रित किया। कई मायनों में ये लोकसभा एतिहासिक है। बरसों बाद कांग्रेस को फिर से इतनी सीटें मिली हैं। बरसों बाद फिर से राष्ट्रीय पार्टियां-क्षेत्रीय पार्टियों की दादागिरी का शिकार नहीं हुई हैं। दलित महिला लोकसभा स्पीकर के साथ आदिवासी डिप्टी स्पीकर भी बन गया।


लेकिन, जब प्रधानमंत्री अपने जंबो मंत्रिमंडल से सदन का परिचय करा रहे थे तो, वो भी एतिहासिक ही था। ये आजाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा मंत्रिमंडल है। यहां तक कि गठजोड़ के दबाव में बनी NDA और पिछली UPA सरकार से भी ज्यादा मंत्री। 78 मंत्री और उनका सरदार एक प्रधानमंत्री।


जब प्रधानमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के विभागों का नाम गिना रहे थे तो, वो लगभग हांफने से लगे थे। पूरा सदन हंस रहा था। मंत्री आनंद शर्मा भी हंस रहे थे लिस्ट सुनकर लेकिन, पता नहीं प्रधानमंत्रीजी और उनके मंत्रिमंडल को पता है या नहीं कि इतने बड़े बेवजह के मंत्रिमंडल पर देश हंस रहा है। छोटा मंत्रिमंडल बनाकर मिसाल बनने का बड़ा मौका गंवा दिया मनमोहनजी। मनमोहनजी आपके इतनेबड़े मंत्रिमंडल के तले दबा देश हांफ रहा है।

आधुनिक समाज में क्रिया-प्रतिक्रिया की बात करने से बड़ी बेअदबी क्या होगी ?

 हर्ष वर्धन त्रिपाठी सिंघू सीमा पर जिस तरह तालिबानी तरीके से निहंगों ने एक गरीब दलित युवक की हत्या कर दी, उसने कई तरह के प्रश्न खड़े कर दिए ...