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Showing posts from 2013

मोदी की आहट से मौज!

 

देवयानी खोब्रागड़े का अपमान या चुनाव की चिता ?

ज्यादातर भारतीयों का सीना इस वक्त 2 से 4 इंच चौड़ा हुआ दिख रहा है। हुआ हो न हो, लग ऐसा ही रहा है। और ये सीना चौड़ा होने की अद्भुत घटना रातोंरात हुई इसकी वजह हमारी मजबूत सरकार के फैसले हैं। जी, ठीक सुन रहे हैं आप मजबूत सरकार। पिछले करीब दस सालों से अमेरिका की पिछलग्गू, कमजोर विदेश नीति वाली सरकार के तमगे से हमारे ‘ सरकार ’ पक गए। इसलिए इस बार जब मौका मिला तो वो भला क्यों छोड़ते। खुद को मजबूत दिखाने का। वो भी सीधे मामला ये था पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश नहीं सीधे-सीधे दुनिया के दादा को ही उठाकर पटकने का मौका था। कोई मनमोहन सिंह बराक ओबामा की कुश्ती नहीं थी ये। दरअसल भारत सरकार गुस्से में अपने एक डिप्टी कांसुलर जनरल के साथ गलत व्यवहार से। देवयानी खोब्रागड़े नाम की महिला हैं। दो बच्चों की मां हैं। भारतीय विदेश सेवा की अधिकारी हैं। और इस सबके ऊपर चुनाव का समय है। अब कई लोग इस बात से मनमोहन सरकार की तरह गुस्सा हो सकते हैं कि इसमें चुनाव क्यों घुसेड़ रहे हो। हमारे देश की एक राजनयिक के साथ दुर्व्यवहार हुआ है और हमारी सरकार इसका कड़ा विरोध कर रही है। संयोग-दुर्योग से अमेरिका से एक

नए साल में अपने घर में जाइए

  घर खरीदने का सपना हर किसी का होता है। लेकिन, मुश्किल सबसे बड़ी यही कि महानगरों में लगातार बढ़ती कीमत से लोगों का ये सपना दूर होता जा रहा है। 2013 बीत गया। अब सवाल ये है कि क्या घर खरीदने का सपना नए साल में आसानी से पूरा हो पाएगा। या फिर घर की कीमतें कुछ घटेंगी। तो इसका जवाब थोड़ी उम्मीद की रोशनी दिखाने वाला है। साल के अंत में महानगरों के रियल एस्टेट मार्केट से जो खबरें आ रही हैं वो कुछ ऐसे ही संकेत दे रही हैं। मुंबई और दिल्ली-एनसीआर में फिलहाल रियल एस्टेट बाजार में सुस्ती साफ नजर आ रही है। मुंबई के कई इलाकों में तेजी से कीमतें गिरी हैं। कीमत बढ़ने की बात छोड़िए दक्षिण और मध्य मुंबई के कई इलाकों में घर की कीमतें दस प्रतिशत तक गिरी हैं। परेल, लोअर परेल और महालक्ष्मी जैसे इलाके में जहां घर खरीदने के लिए सोचना भी मुश्किल था वहां मांग गिरने की वजह से बिल्डरों पर दबाव है कि वो किसी भी तरह घरों को बेच सकें। प्रॉपर्टी कंसल्टेंसी नाइट फ्रैंक इंडिया की रिपोर्ट में ये बात सामने आई है कि सौदेबाजी करके सस्ते में घर खरीदने के लिए ये सबसे बेहतर समय है। इसकी वजह बड़ी साफ है। 2010 के बाद

प्रतीकों की राजनीति करते प्रतीक न बन जाएं अरविंद केजरीवाल

दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना के अनशन की एक तस्वीर प्रतीकों का इस देश में बड़ा महत्व है। एक धोती से पूरा शरीर ढंकने, सबकुछ त्याग कर देने और बिना लड़े (अहिंसक) लड़ाई के प्रतीक महात्मा गांधी ऐसे बने कि आज तक देश के राष्ट्रपिता बने हुए हैं। यहां तक कि मोहनदास करमचंद गांधी के प्रयोगों को भी प्रतीकों के तौर पर त्याग के प्रयोग मान लिया जाता है। ऐसे ही कांग्रेस भी प्रतीक बन गई। देश की आजादी की लड़ाई वाली पार्टी का। फिर नेता के तौर पर प्रतीक बन गए जवाहर लाल नेहरु, सोनिया गांधी यहां तक कि राजीव गांधी और अब सोनिया, राहुल गांधी भी। सोचिए कितने ताकतवर विचार, व्यवहार के रहे होंगे लोहिया, जयप्रकाश नारायण और अटल बिहारी वाजपेयी लेकिन, कितनी मुश्किल हुई इन्हें नेता के तौर पर प्रतीक बनने में। चूंकि नेता के तौर पर तो वही प्रतीक बन सके थे इस देश में जो कांग्रेसी नेता थे। ये प्रतीकों के हम भारतीयों के दिमाग में जम जाने का मसला तो कुछ ऐसा है कि मुझे ध्यान में है कि इलाहाबाद में एक भी विधायक कांग्रेस का नहीं जीतता था। सांसद होने का तो सवाल ही नहीं। लेकिन, फिर भी नेता कांग्रेस के ही शहर में बड़

राज'नीति' और विरोध'नीति' की मानसिकता

कांग्रेस ही क्यों देश में राज करती है। ऐसा तो है नहीं कि कांग्रेस का विरोध करने वाले आज ही अरविंद केजरीवाल की शक्ल में जन्म लिए हों। आजादी के बाद से ही कांग्रेस के भीतर नेहरू-गांधी परिवार का विरोध करने वाले और बाहर पार्टी की शक्ल में कांग्रेस पार्टी का विरोध करने वाले बहुतेरे रहे हैं। सामाजिक संगठन के तौर पर दुनिया में मिसाल बना राष्ट्रीय स्वयंसेवक कै पैदाइश ही कांग्रेस विरोध से हुई है। फिर सवाल ये है कि आखिर इतने विरोध , विरोधियों के बाद भी कांग्रेस ही राज कैसे करती रहती है। मुझे लगता है कि इसका जवाब ये है कि कांग्रेस सारी कमियों के बाद राजनीति करती है और विरोध करने वाले ढेर सारी अच्छाइयों के बाद भी विरोधनीति। ये विरोधनीति कई बार राजनीति पर हावी होती है और समय-समय पर देश में जेपी आंदोलन , अन्ना आंदोलन या फिर अंत में ' आप ' की अप्रत्याशित सफलता दिख जाती है। हर बार लगा है कि कांग्रेस खत्म हो गई। लेकिन , फिर वही सवाल खड़ा हो जाता है कि विरोध नीति से सरकार कैसे चल सकती है। उसके लिए तो राजनीति करनी होगी। आजादी के 65-66 सालों में लटपटाते , गिरते , पड़ते , कांग्रेस से

2014 में ‘आप’ क्या करेंगे ?

बड़ा सवाल है कि आखिर अरविंद केजरीवाल का करिश्माई आप पार्टी 2014 में क्या करेगी। सवाल इसलिए भी खड़े हो रहे हैं कि एक लंबे समय बाद कांग्रेस की एकदम से मिट्टी पलीद होती दिख रही है। और ये साबित कर रहा है कि देश की जनता ऊब गई है कांग्रेस के वादों और दावों से। लेकिन, सवाल इसी के साथ ये भी खड़ा होता है कि क्या नरेंद्र मोदी इतनी ऊंचाई तक जनभावना को ले जा पाएंगे कि लोगों को मतदान केंद्र में 2014 में कांग्रेस का हाथ दिखे ही नहीं। लेकिन, अब इससे भी बड़ा सवाल 2014 को लेकर 2013 में ही खड़ा हो गया है कि आखिर 2013 की करिश्माई जीत वाली पार्टी झाड़ू का निशान भी क्या मतदाताओं को देखने से रोक पाएंगे नरेंद्र मोदी। भारतीय राजनीति में जनभावनाओं को अपने पक्ष में करने और रणनीति से बुरे को भी अच्छे में बदल देने वाले दोनों नेताओं को जनता ने पसंद किया है। ये 2013 के चार राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों से साफ है कि भारतीय जनता को नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल दोनों ही खूब भा रह हैं। और एक बात अगर आप लोगों ने गौर की हो तो नरेंद्र मोदी भी आप पर या अरविंद केजरीवाल पर सीधा हमला करने से अब तक बचते रहे है