Sunday, January 17, 2010

गलत नीति से सही समाधान की उम्मीद

केंद्र सरकार ने राज्यों से कहा है कि वो, टीचरों के रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाकर 65 साल कर दें। साथ ही प्रोफेसरों को 70 साल तक पढ़ाने दिया जाए। केंद्र सरकार का ये निर्देश राज्यों को इस वजह से आया है कि देश के स्कूलों में पढ़ाने वालों की बेहद कमी है और अगर ऐसे में टीचरों, प्रोफेसरों की 58-60 उम्र वाले लोग रिटायर हो गए तो, विद्यालयों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वालों की समस्या और बढ़ जाएगी।

 पहली नजर में देखें तो, लगता है कि देश में जिस तरह से शिक्षकों के पद खाली हैं उसमें ये राहत की बात होगी। देश भर में आठवीं तक के विद्यालयों में ही करीब दस लाख शिक्षकों की कमी है। सरकार बरसों से शिक्षाकार्य में लगे इन बुजुर्ग शिक्षकों के जरिए गुणवत्ता बेहतर करने की भी बात कह रही है। अब सवाल ये है कि जहां लाखों नौजवान अपने बुजुर्गों से कई गुना ज्यादा प्रतियोगी माहौल में पढ़ाई करके नौकरी के लिए आवेदन करते घूम रहे हैं। और, उन्हें कोई नौकरी नहीं मिल रही है। वहां संन्यास की उम्र में पहुंच चुके लोगों से अपने परिवार के साथ आखिरी समय का बेहतर इस्तेमाल करने का ये मौका सरकार क्यों छीनना चाह रही है।

 पहले ही सरकार विश्वविद्यालय के शिक्षकों की सेवानिवृ्त्ति की आयु 65 साल कर चुका है। दिल्ली और कुछ दूसरे राज्यों में प्राइमरी से सेकेंडरी तक के अध्यापकों की सेवानिवृत्ति की उम्र 62 साल हो चुकी है। अब ऐसे में पहले से ही 58 साल की उम्र के बाद के हर साल की नौकरी पर बुजुर्ग किसी न किसी बेरोजगार को कुछ समय और बेरोजगार रहने का श्राप दे रहा है। ये श्राप हो सकता है कि वो अपने ही परिवार के किसी बच्चे को दे रहा हो। नौकरी मिलने में 25-26 साल के बाद जितनी भी देरी होती है एक नौजवान की पूरी सामाजिक स्थिति को वो उतना ही खराब करती जाती है।

मंदी की मार के बाद अभी तक निजी कंपनियों में भर्ती की प्रक्रिया तेज नहीं हुई है। ऐसे में सरकारी नौकरियां ही नौजवानों के लिए मुफीद दिख रही हैं। अब अगर इस नौकरी पर बुढ़ाता भारत अगले 5-7-10 सालों के लिए इस तरह से कुंडली मारकर बैठ गया तो, दुनिया के सबसे जवान देश भारत के नौजवान को कुंठा के गर्त में जाने से नहीं रोका जा सकेगा। हिंदू दर्शन के आश्रमों की व्यवस्था को आज के दौर में ज्यादा प्रासंगिक इसलिए भी हो जाती है कि आज रोजगार-कमाई से ही सारी सामाजिक व्यवस्था का निर्वहन हो रहा है।

सरकार को चाहिए तो, ये कि वो तेजी से विद्यालयों की भर्ती प्रक्रिया शुरू करे। ये नौजवान आज के लिहाज की शिक्षा पद्धति को बेहतर जान-समझ रहे हैं। नए जमाने के बच्चों को आगे बढ़ने के लिए किस तरह से तैयार करना है ये अभी ताजा-ताजा पढ़ाई से पढ़ाने का काम पाने वाला नौजवान ज्यादा अच्छे से समझेगा बनिस्बत पिछले 30-35 सालों से एक ही तरह का कोर्स पढ़ाते-पढ़ाते अपने जीवन के आखिरी दिनों में पहुंच चुके किसी बुजुर्ग अध्यापक से।

सरकार अकसर चिंता जाहिर करती रहती है कि विश्वविद्यालयों में रिसर्च में तो दाखिले न के बराबर हो रहे हैं। दरअसल यहां भी मसला वही आड़े आ जाता है कि किसी नौजवान को रिसर्च करने के बाद उसका सामाजिक स्थिति बेहतर करने में जब खास उपयोग नहीं दिखता तो, वो रिसर्च की तरफ क्यों जाएगा। शिक्षकों के पद खाली हैं तो, उसे भरने के लिए लोगों की कमी तो बिल्कुल ही नहीं है। उत्तर प्रदेश में प्राइमरी अध्यापकों के पचास हजार पदों के इंतजार में लाखों बेरोजगार नौजवान बैठे हैं। ये हाल हर राज्य का है।

सरकार बार-बार आंकड़ों में जवान भारत के दुनिया के सभी देशों से आगे निकलने की बात जोर-जोर से कहती रहती है। लेकिन, सरकारी नीतियों में नौजवान को देश को आगे बढ़ाने में जल्दी इस्तेमाल की गुंजाइश कम होती जा रही है। सरकारी नीति कुछ ऐसी हो गई है कि पहले नौजवान को आधा बुजुर्ग बना देंगे तब उससे गुणवत्ता की उम्मीद करेंगे। और, ये सिर्फ अध्यापन का ही मसला नहीं है। केंद्रीय कानून मंत्रालय भी इस बात पर गंभीरता से विचार कर रहा है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र 62 साल से बढ़ाकर 65 साल कर दी जाए। ये करके मंत्रालय उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र में समानता करना चाहता है। साथ ही लंबित मुकदमों की संख्या और बढ़ने से रोकना चाहता है।

यहां भी मसला वही है कि ढेर सारे न्यायाधीशों के पद खाली हैं लेकिन, उनकी भर्ती प्रक्रिया तेज नहीं हो पा रही है। देश के 21 उच्च न्यायालयों में 886 न्यायाधीश होने चाहिए लेकिन, 652 न्यायाधीश ही हैं। समझ में नहीं आता कि देश के विश्वविद्यालयों से कानून की डिग्रियां लेकर निकलते छात्रों में से क्या दो सौ लायक लोग भी नहीं हैं जो, देश के तीन करोड़ से भी ज्यादा लंबित मामलों को निपटाने में मददगार बन सकें। ऐसा इसलिए भी नहीं है कि इन्हीं छात्रों में से बड़ी जमात काला कोट पहनकर न्यायालयों में वकीलों के बैठने की जगह तक कम कर दे रही है।

साफ है सरकार समस्या के समाधान में जो कोशिश करती दिख रही है वो, और बड़ी समस्या तैयार कर रही है। नए लोगों पर भरोसा न करने की ये मानसिकता ही है कि अध्यापन से लेकर राजनीति तक बुढ़ाया नेतृत्व ही चाहिए। सरकार अध्यापकों की सेवानिवृत्ति की उम्र 65-70 कर देने के पीछे 6-14 साल तक के बच्चों को जरूरी शिक्षा देने का बहाना तर्क के लिए ले रही है। अच्छा है कि देश के हर बच्चे को उच्च शिक्षा का अधिकार सरकार लागू कर दे। लेकिन, साथ ही ये भी सरकार को तय करना होगा कि इतनी शिक्षा मिलने के बाद नौजवान भारत कुंठा के भंवर में न फंसे। उसकी योग्यता-शिक्षा के लिहाज से सरकार को उसे सही समय पर सही रोजगार का अधिकार भी देना होगा। सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाकर सारी समस्याओं का समाधान खोजने वाली सरकार को ये समझना होगा कि इससे समस्या बढ़ेगा, समाधान नहीं होगा। गलत नीति से सही समाधान की उम्मीद करना गलत होगा।



(ये लेख राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय पृष्ठ पर छपा है)

Friday, January 15, 2010

बेवजह नर्वस नहीं हैं शीला दीक्षित


ज्यादातर सरकारी नीतियां शहरों को ही ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं। पिछले बजट में सबसे ज्यादा पैसा जिन मदों में आवंटित किया गया, उनमें शहरों की बेहतरी प्रमुख है। देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रहते हुए लगता भी है कि सरकार शहरों की बेहतरी के लिए हर कोशिश कर रही है। ये अलग बात है कि अभी दिल्ली के वर्ल्ड क्लास बनने में अक्टूबर 2010 में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स की डेडलाइन का डर ज्यादा है।

 लेकिन, कॉमनवेल्थ गेम्स की डेडलाइन के डर में सरकार की पूरी ताकत लगा देने के बाद भी दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित बोल ही पड़ती हैं कि वो, कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों को लेकर नर्वस हैं। और, शीला दीक्षित का इस तरह से नर्वस होना देश के शहरी सिस्टम और सरकार के बेहतर शहर बनाने के फोकस पर काले धब्बे जैसा दिखता है। क्योंकि, दरअसल दिल्ली ही पूरे देश में ऐसा शहर हैराज्य भी कहा जाता हैजहां से शहर बनाने के सारे पैमानों का परीक्षण होकर ही देश के दूसरे शहरों में लागू किया जाता है। यही वजह है कि दूसरे शहरों से काफी ज्यादा चमकती दिल्ली में हर शहर से लोग आकर इस शहरी चमक के हकदार पहले बन जाना चाहते हैं। लेकिन, मुख्यमंत्री का डर दिखा रहा है कि दिल्ली इतना अच्छा शहर नहीं बन सका है कि कॉमनवेल्थ गेम्स में देश की इज्जत बचा सके। डर लग रहा है कि दुनिया भर से जो खिलाड़ी आएंगे वो, दिल्ली की सड़कों के जाम में कहीं फंस तो नहीं जाएंगे। डर लग रहा है कि दिल्ली का शहरी कहीं विदेशी महिला/पुरुष खिलाड़ियों के साथ ऐसी हरकत न कर दे कि असभ्य शहरी होने का दिल्ली पर ठप्पा लग जाए।

 डर सिर्फ जाम और लोगों के सिविक सेंस का नहीं है। देश के सबसे अच्छे शहर के पुलिस सिस्टम से भी दिल्ली सरकार डर रही है। वो, इस बात से भी डर रही है कि पिछले कई सालों से बिना मीटर के धड़ल्ले से चलने वाले ऑटो चालक कॉमनवेल्थ गेम्स के समय भी अनाप-शनाप मुनाफा कमाने के चक्कर में दिल्ली की इज्जत में पलीता तो नहीं लगा देंगे। दिल्ली की सड़कों पर चमकती लो फ्लोर बसें उतरीं तो लगा कि चलो एक मामला तो जम गया। लेकिन, महीने-सवा महीने में 10-12 लो फ्लोर बसों में लगी आग डराने लगी है कि कहीं कॉमनवेल्थ गेम्स के समय ये लो फ्लोर बसें डरावनी बसों में न तब्दील हो जाएं।

 दिल्ली की मेट्रो ने दुनिया भर में तारीफ पाई। सच्चाई भी यही है कि मेट्रो में यात्रा करके यकीन होने लगता है कि भारत में शानदार शहरी सिस्टम तेजी से अपनी जगह बना रहा है लेकिन, दुर्भाग्य देखिए कि जब दुनिया की नजर कॉमनवेल्थ गेम्स के समय हमारी इस शहरी तरक्की पर होगी उससे ठीक पहले मेट्रो के खंभे में दरार से लेकर मेट्रो के पटरी से उतरने तक की डरावनी खबरें आ गईं। शीला जी का नर्वसनेस बेवजह नहीं है।

 पटरियों पर तो रेड सिगनल के बिना काम नहीं चलने वाला। शीला जी जुट गईं कि कम से कम सड़कों को तो रेड सिगनल फ्री कर दिया जाए। दस साल पहले की दिल्ली और अभी की दिल्ली की तुलना की जाए तो, दिल्ली की सड़कें दोगुनी से ज्यादा हो गई होंगी। ITO चुंगी पास, धौलाकुआं, मूलचंद, DND के फ्लाईओवर देखकर विदेशी शहरों में होने का भ्रम होता है लेकिन, इन चौराहों-दस राहों से आगे बढ़ते ही रेंगती कारों की कतार में फंसी अपनी कार में घिसटते हुए सारा भ्रम टूट जाता है।

शीला दीक्षित इसीलिए नर्वस हैं। वो, नर्वस इसलिए भी हैं कि दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस में 8 सबवे बनाने का काम अब शुरू हो पाया है। अब इसके बनते-बनते 8-9 महीने का समय कैसे बीत जाएगा पता ही नहीं चलेगा। अब दिल्ली वालों को तो, इन सबवे के बनते तक कनॉट प्लेस में लिमिटेड एंट्री करके काम चला लेंगे। लेकिन, विदेशी खिलाड़ियों मेहमानों को दिल्ली का दिल देखने से कैसे मना कर सकेंगे। लुटियंस की दिल्ली में तो हर दूसरे चौराहे पर मिट्टी-धूल दिख रही है। एक फ्लाईओवर जाम से बचा रहा है तो, दूसरे फ्लाईओवर बनाने के लिए कार्य प्रगति पर है वाले बोर्ड गाड़ियों का शीशा खोलने तक की इजाजत नहीं दे रहे हैं। फ्लाईओवर पर चढ़ी कारों को और लंबी लाइन जाम में दिखती है और रहा-सहा देश के सबसे शानदार शहर में रहने का भ्रम भी टूट जाता है। हाल ये है कि 4-5 किलोमीटर में एक फ्लाईओवर से दूसरे फ्लाईओवर का सफऱ भी रेंगते हुए तय हो पाता है।

 शीला जी के नर्वस होने की एक वजह हो तो, चल भी जाए। दिल्ली से नोएडा को जोड़ने वाली यूपी लिंक रोड को चौड़ा करने के काम का श्रीगणेश भी ताजा-ताजा ही हुआ है। काम बड़ी तेजी में चल रहा है। लेकिन, बीच में एकाध फ्लाईओवर भी बनने हैं इस सड़क को भी रेड लाइट फ्री करने के लिए। सब मिलाकर इसके भी पूरा होने का समय वही कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू होने के ठीक पहले तक जा रहा है। उस रास्ते से आते-जाते नर्वस तो हम भी हुए जा रहे हैं। शीला जी तो, मुख्यमंत्री हैं उनको तो होना ही चाहिए।

 फिर इन सबके बाद सभ्य शहरी होने का सवाल तो सबसे ज्यादा नर्वसनेस की वजह है ही। पता नहीं कौन अचानक 135 किलोमीटर की रफ्तार से किसी को टक्कर मार दे। पता नहीं कौन सत्ता के रुआब में किसी को सरेराह पीटने लगे, पिस्टल लगा दे या फिर किसी पब-बार में अपनी बीवी-बहन की तथाकथित बेइज्जती का बदला लेने निकल पड़े।

 सरकार शहरों और शहरियों के भरोसे इंडिया ग्रोथ स्टोरी लिखना चाह रही है। लेकिन, देश के सबसे शानदार शहरी मॉडल में इतने छेद दिख रहे हैं कि दुनिया जब इस ओर तकने को तैयारी में है तो, इस शहरी मॉडल को चलाने-बनाने वाले नर्वस हैं। शीला जी की नर्वसनेस बेवजह नहीं है। ये सवाल भी खड़ा हो रहा है कि क्या हम आने वाले समय के लिहाज से शहर बना पा रहे हैं। 

Thursday, January 14, 2010

शहर तो हमने बनाए ही नहीं

सात साढ़े सात परसेंट की ग्रोथ का भरोसा हमारे प्रधानमंत्री-वित्त मंत्री को फिर होने लगा है। सब ठीक हो रहा है। शहरी अर्थव्यवस्था, शहरी उपभोक्ता पर फिर भरोसा जग रहा है। कंज्यूमर (जिसकी जेब में पैसे हैं और जो सबकुछ खरीद सकता है) फिर महत्व पाने लगा है। लेकिन, सारी तरक्की शहरों के जरिए होते देखने वाली सरकारों ने क्या सचमुच के शहर बनाए भी हैं।


 देश के महानगरों की बात आज मैं छोड़ रहा हूं। अगले लेख में देश का सबसे बड़ा शहर, दिल्ली कितना शहर हो पाया है इसकी बात करूंगा लेकिन, अभी बात देश के दूसरे शहरों की जो, किसी जिले के मुख्यालय होते हैं। कुछ समय पहले जौनपुर गया। वैसे तो, हमेशा ही जौनपुर में गाड़ी चलाना मौत के कुएं में कार चलाने जैसा होता है। जैसे मौत के कुएं में जरा सा चूके तो, जान गई वैसे ही जौनपुर में गाड़ी चलाते जरा सा सावधानी हटी कि बड़ा दुर्घटना घटी। सड़कें तो शहर जैसी हैं नहीं लेकिन, नरसिम्हाराव-मनमोहन की जोड़ी के करीब दो दशक पहले लाए गए उदारीकरण ने सबकी जेब में गाड़ी खरीदने लायक पैसे डाल दिए हैं।


इस बार जौनपुर के प्रशासनिक अधिकारियों ने शहर के तंगहाल ट्रैफिक को सुधारने का नया रास्ता निकाला है- बीच सड़क में पार्किंग। यानी पार्किंग सड़क के बीच डिवाइडर जैसा काम करे। और, दोनों तरफ ट्रैफिक बिना रुके चलता रहे। अब प्रशासनिक अधिकारियों के पास इतना बूता तो है नहीं कि तंग जौनपुर कस्बे की सड़कों को शहर की चौड़ी सड़कों में तब्दील करा सकें तो, बेचारे अपने बस भर का कर रहे हैं। अब इसमें हाल ये कि हमारी गाड़ी बस दोनों तरफ बमुश्किल ही रगड़ाते बच रही थी।


और लगभग जौनपुर जैसा ही हाल देश के सारे शहरों का है। अभी कुछ दिन पहले बालाजी मेंहदीपुर से लौटते समय मथुरा जाना हुआ। लगा बस नाम बदल गया है। वरना तो, गाड़ी चलाने में वैसे ही कौशल की जरूरत है जैसे जौनपुर में। अब देखिए ये साहब हमारी कार के आगे कितने शान से पाइप लादे चले जा रहे हैं। गलती इनकी नहीं है, कहां से ला जाएं।


मथुरा में हाईवे से घुसते ही मिलने वाला ट्रैफिक कृष्ण जन्मभूमि तक पहुंचते-पहुंचते दमघोंटू ट्रैफिक में बदल जाता है। और, कृष्ण जन्मभूमि की डीग गेट पुलिस चौकी के सामने से होली गेट की ओर जाने वाला रास्ता तो, बस सही में भगवान कृष्ण ही मालिक है। कृष्ण की नगरी है तो, यहां लड़ने-भिड़ने पर लोग राधे-राधे करके मुस्कुरा देते हैं। वरना तो, ये शहर और ये ट्रैफिक कब किसकी जान ले लें क्या पता। आजादी के 63 सालों में हमने कौन सा शहर बनाया ये तो, दिख ही रहा है। हां, गांव उजड़ जाएं इसका भरपूर बंदोबस्त हमारी सरकारी नीतियां करती जा रही हैं। देश का दिल दिल्ली सबको भाता है। इसकी चर्चा कल करूंगा कितना दिलवाला है ये दिल्ली शहर।



Sunday, January 03, 2010

हम कुछ जुगाड़ तो खोज ही लेंगे

सर्दी के मौसम में भी इस बार बिजली की काफी किल्लत हो रही है। दिल्ली से लेकर इलाहाबाद कुछ घंटे की बिजली कटौती पक्की रही। नोएडा में 1-2 घंटे गई तो, इलाहाबाद में 10-1 का बिजली कटौती का कोटा पक्का रहा। बिजली बनाई ही नहीं जा पा रही है लोगों की जरूरत भर का।

फिर एक आंकड़ा और सामने आता है कि डिस्ट्रीब्यूशन लॉस में ही करीब 30 प्रतिशत बिजली बेकार चली जाती है। यानी ये बिजली बिजलीघरों से चलती है लेकिन, खंभों, ट्रांसफार्मरों और बिजली चोरों के कटिया की भेंट चढ़ जाती है। अब इस बिजली को खास बिजलीचोरों के कटिया से बिजली की हत्या न हो इसका इंतजाम किया जा रहा है।
 
उम्मीद है कि ये हर जगह हो रहा होगा। हमने इलाहाबाद में देखा कि बिजली के खुले तारों की जगह नए तार आ रहे हैं जो लैमिनेटेड हैं। यानी पहले के खुले तारों की तरह अब इस तार पर कहीं से भी कटिया मारकर बिजली नहीं चुराई जा सकेगी। मैं बड़ा प्रसन्न था कि चलो अच्छा है कि जो, जितनी बिजली जलाएगा उतना बिल देगा। विभाग का रेवेन्यू बढ़ेगा। नए पावरहाउस बनाने में आसानी होगी।

इस नए तार का कमाल था कि जिस दिन तार बदला अचानक वोल्टेज ऐसा हो गया कि बल्ब, ट्यूब दिन जैसा रोशनी दे रहे थे। वजह ये कि बीच में कहीं से कटिया नहीं लगी थी और बिजली पूरी क्षमता के साथ आ रही थी। लेकिन, ये वोल्टेज कितने दिन रहेगा पता नहीं। नया तार लगते-लगते ही जुगाड़ डॉट कॉम से अपना जीवन बिताने वाले लोगों के शोधकार्यों के परिणाम सामने आने लगे थे। कटिया वाला तार गरम करके पहले तार का लैमिनेशन पिघलाएंगे उसके बाद उसी जगह कटिया मारेंगे। खंभे के पास ही तार में कटिया मारने की जगह बना लेंगे।


अब देखिए कितने दिनों तक ये नया कपड़ा पहना तार बिजली चोरों से अपनी आबरू बचा पाता है। दरअसल ये नंगई देखने के आदी ऐसे हो चले हैं कि अब सभ्य, सलीके वाले कपड़ा पहना तार इन्हें करेंट मार रहा है। और, भई बिजली विभाग वाले भी तो, बिजली के तार की पुरानी दशा का ख्याल रखेंगे। बहुत सी गलत बातें इस देश के सिस्टम में ऐसा घुस चुकी हैं कि वहीं सही लगने लगी हैं। बिजली की चोरी भी इसी में अव्वल है। वैसे, तो इस देश में कोई भी चोरी, भ्रष्टाचार मायने नहीं रखता है। तो, फिर बिजली चोरी की क्या बिसात।


Saturday, January 02, 2010

ये हाईवे तो तरक्की के हैं लेकिन, ...



तरक्की की कई नई इबारतें साफ दिखने लगी हैं। इबारतें अभी पूरी कॉपी में 2-4 पन्नों पर ही लिखी हैं। इसलिए इन इबारतों का असर अभी खास नहीं दिखता। लेकिन, ये इबारतें पूरी कॉपी भर दें तो, सचमुच तरक्की के हाईवे पर हमारी रफ्तार तेज हो जाएगी।

अटल बिहारी वाजपेयी जीवित हैं लेकिन, ज्यादा ध्यान देकर न सोचा जाए तो, ये तगड़ा भ्रम होगा कि वाजपेयी जी हमारे बीच हैं या नहीं। मैं जब भी किसी शानदार हाईवे पर गाड़ी दौड़ाता हूं तो, अनायास मुझे अटल बिहारी वाजपेयी याद आ जाते हैं। अभी दिल्ली से मथुरा और फिर भरतपुर के रास्ते कटकर आगरा जयपुर हाईवे पर जाना हुआ। अब मुझे ध्यान में नहीं आ रहा है कि इन दोनों में से किसी हाईवे की बेहतरी में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार का योगदान रहा है या नहीं। लेकिन, शानदार चमकते किसी भी हाईवे को देखकर अटल सरकार की स्वर्णिम चतुर्भुज योजना याद आ जाती है।

दिल्ली से बालाजी तक के रास्ते में दिल्ली से फरीदाबाद तक और मथुरा से आगरा-जयपुर हाईवे को मिलाने वाले रास्ते की दूरी को छोड़ दें तो, सफर शानदार था। गाड़ी में किसी तरह की थकान नहीं महसूस हो रही थी। मजे से 80-90 की रफ्तार पर बिना किसी तनाव के गाड़ी चल रही थी।

आगरा जयपुर हाईवे के रास्ते में एक जगह पहाड़ काटकर रास्ता बनाना पड़ा है। देखकर मन में आया इसके बनने से पहले कैसे लोग इस पहाड़ को लांघते रहे होंगे। अब अगर सिस्टम कुछ ऐसा बन जाए कि तरक्की इन हाईवेज के जरिए दिल्ली से जयपुर तक के रास्ते में पड़ने वाले गांवों में 80-90 की रफ्तार से चले तो, अगले 10-15 सालों में दिल्ली को भी बाहर से आने वाले लोगों से कुछ निजात मिल जाए। आगरा-जयपुर हाईवे के रास्ते के गांवों के लोगों की जेब में कुछ ज्यादा पैसे आ जाएं। करोड़ो के इंफ्रास्ट्रक्चर से दिल्ली संवारने के बाद भी कई किलोमीटर लंबे जाम में फंसने से दिल्ली के लोग बच जाएं। लेकिन, मुश्किल ये है कि ये हाईवे ज्यादा पैसे के कम पैसे को खींचने जैसे चुंबक का काम कर रहे हैं। छोटे शहरों से बड़े शहरों की ओर लोग सटासट खींचते चले आ रहे हैं।

बड़े शहरों-छोटे शहरों के बीच रास्ता तो, झमाझम जुड़ गया है। लेकिन, खाई बढ़ती जा रही है। खैर, छोड़िए न मैं बात शानदार हाईवे की कर रहा था। इतना बेहतरीन हाईवे। सबकुछ व्यवस्थित कि स्पीडोमीटर अगर सेट करके छोड़ दिया जाए तो, भी कहीं मुश्किल नहीं। लेकिन, हाईवे को दोनों तरफ सुरक्षा के लिए लगी एल्यूमीनियम की बाड़ आसपास के गांव के लोगों को जरा कम समझ में आती है। सो धीरे से वो, एल्यूमीनियम की बाड़ काटकर तरक्की वाले हाईवे में घुसने का इंतजाम करते जा रहे हैं।

कई किलोमीटर बाद यू टर्न लेने का समय कहां है। इसलिए ये गांव वाले धीरे से अपनी समझदारी का इस्तेमाल करके हाईवे के बीच के डिवाइडर को जगह-जगह साफ कर देते हैं। अब इस सफाई के बीच अगर गांववाले की बाइक को अगर हाईवे की स्पीड के लिहाज से चलती कार या दूसरी गाड़ी टक्कर मार दे तो, हाईवे पर बवाल की नई कहानी शुरू हो जाती है। तरक्की के हाईवे पर तरक्की के साथ कदमताल मिलाती कारें-ट्रकें-बसें फुंक जाती हैं।

ये तरक्की के हाईवे बड़ी कहानियां लिख रहे हैं। सचमुच की तरक्की की। शानदार सफर की। छोटे शहरों से बड़े शहरों की ओर पलायन की। बड़े शहरों से छोटे शहरों-कस्बों में थोड़ा बहुत बढ़ती कमाई की। तरक्की के हाईवे में जुगाड़ से घुसने की कोशिश की-शॉर्टकट की। बड़ी कहानियां हैंपरदेस फिल्म में शायद ये डायलॉग है कि असल भारत देखना है तो, रेलगाड़ी में स्लीपर में यात्रा करो। अब मुझे लगता है कि असल भारत देखने के लिए तरक्की के ये हाईवेज ज्यादा मुफीद हैं।


Friday, January 01, 2010

अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा



भारत देख समझ लिया जाए तो, जीवन सफल हो जाए। अभी मेंहदीपुर के बालाजी हनुमान के दर्शन के लिए गया था। आगरा-जयपुर के शानदार हाईवे से होकर वहां के लिए रास्ता जाता है। मथुरा से इसके लिए रास्ता कटता है।



आगरा-जयपुर हाईवे पर घुसने के कुछ ही देर में हमारी नजर अगल-बगल के गांवों के नाम वाले बोर्ड पर पड़ी। लगा ये सारे नाम कुछ अलग हैं। कम से कम उत्तर प्रदेश के गांवों-शहरों में ऐसे नाम तो हमें नहीं दिखे। यूं ही लिखता चला गया। दरअसल इनके अर्थ वैसे ही होंगे जैसे दूसरे राज्यों के गांवो-कस्बों के नाम होते हैं। बस ये नाम राजस्थान की बदलती भाषा के लिहाज से भी बदल गए होंगे।


विनउवा
बहुआ का नगला
छौंकरवाड़ी
लुधावई
सेवला
पहरसर
रैना
डेहरा
नदबई
महवा
हंतरा
वैर
अरोडा
हलैना
नया गांव माफी
नसवारा
तिलचिवी
झालाटाला
बछरैन
खेडाली
गदसिया
रौत हंडिया
हिंडौन
समलेटी
पडाली
पीपलखेड़ा
टिकरी जाफरानी
उलूपुरा
लुलहारा
सिनपिनी

राजस्थान के उसमें भी खासकर दौसा जिले के कुछ ब्लॉगर होंगे तो, शायद इन जगहों के नाम के पीछे की कुछ कहानी बता पाएंगे तो, जानकारी बढ़ेगी। थोड़ी बहुत राजस्थानी भी बैठे बिठाए सीखने को मिलेगी।



आधुनिक समाज में क्रिया-प्रतिक्रिया की बात करने से बड़ी बेअदबी क्या होगी ?

 हर्ष वर्धन त्रिपाठी सिंघू सीमा पर जिस तरह तालिबानी तरीके से निहंगों ने एक गरीब दलित युवक की हत्या कर दी, उसने कई तरह के प्रश्न खड़े कर दिए ...