देश की दशा-दिशा को समझाने वाला हिंदी ब्लॉग। जवान देश के लोगों के भारत और इंडिया से तालमेल बिठाने की कोशिश पर मेरे निजी विचार
Wednesday, September 07, 2011
Tuesday, September 06, 2011
बेईमानी से कुछ और लोग डरे होंगे
ईमानदार लोगों को अब भारत में थोड़ा बल तो मिल रहा होगा। अन्ना का भ्रष्टाचार के खिलाफ जोरदार आंदोलन और उसके सामने दंडवत सरकार। कल रेड्डी जेल में, आज अमर सिंह। कलमाड़ी से लेकर राजा तक पहले से हैं। बिहार में भ्रष्ट आईएएस का घर स्कूल बनेगा। मैं बेईमान बनने से पहले से डरता था। अब बेईमान भी डरने लगे होंगे।
जब अमर सिंह के जेल जाने की खबर मैंने सुनी तो, सचमुच मैं बहुत खुश हुआ। अमर सिंह से मेरी कोई निजी दुश्मनी नहीं है न ही दोस्ती। इत्तफाक से पत्रकारिता में होने के बाद भी कभी अमर सिंह नामक प्राणी से मिलने का अवसर नहीं मिला। लेकिन, पत्रकारिता में जो, जानने वाले कभी अमर सिंह के संपर्क में आए वो, अमर लीला बताते रहते हैं। किस तरह अमर सिंह हर किसी को दलाली के नाना प्रकार के तंत्र से वश में करने की क्षमता रखता-दिखाता रहता था ये कोई छिपी बात तो है नहीं। किसी ने कुछ बोला तो, उसके खिलाफ रुपए से लेकर रूपसियों तक का सचित्र विवरण अमर सिंह के लिए ब्रह्मास्त्र जैसा काम करता रहा। यही वजह रही कि मुलायम सिंह यादव का साथ छूटने के बाद भी यही लगता था कि ये अमर सर्वाइव कर जाएगा। अमर सिंह ने दलाली की सारी सीमाएं लांघ ली थीं। अमर सिंह की खूबी ही यही थी कि मुश्किल में फंसे बड़े आदमी को गलत तरीके से मदद करके उस मदद के अहसान के तले दबा दो। फिर चाहे वो, मुलायम सिंह यादव रहे हों, अमिताभ बच्चन या फिर अनिल अंबानी। वैसे, सच्चाई देखी जाए तो, जिसके साथ अमर सिंह जुड़े उसे बर्बाद ही किया। अमर प्रभाव में मुलायम की समाजवादी पार्टी सिर्फ अभिनेता और अभिनेत्रियों की पार्टी रह गई। हां, अमर प्रभाव से धन की कमी मुलायम को कभी नहीं हुई।
अमिताभ बच्चन का चाहे जितना जलवा रहा हो। अमर प्रभाव में उसका तेज भी खत्म नहीं तो, कम तो हुआ ही। अमिताभ चूंकि पुराने जमाने में कांग्रेसी हथकंडों से वाकिफ रहे हैं। इसलिए अमर प्रभाव से थोड़ा बच गए। और, अपनी जमीन बनाए-बचाए रहने में कामयाब रहे। लेकिन, छोटे अंबानी को कैसे अमर प्रभाव ने बर्बाद किया वो, तो सबको पता है। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में दादरी से गुजरते हर व्यक्ति को समझ में ये जरूर आता होगा। अमर सिंह जैसे लोग जिस तरह से नीचे से ऊपर पहुंच गए वो, सीध रास्ते से तो संभव ही नहीं था। इसीलिए एक बार मैंने भी लिखा कि आखिर अमर सिंह, मायावती ये न करें तो, क्या करें लेकिन, इन लोगों ने तो, ऐसा कर दिया कि सब पीछे छूट गया। और, अब पीछे छूटे लोग तो, ये भी करके आगे की कतार में पहुंचने लायक नहीं रहे।
कुछ ऐसा ही कर्नाटक में रेड्डी बंधुओं ने किया। दक्षिण में पहली भगवा सरकार के भ्रम में बीजेपी भी इस कदर उनके जाल में फंसती गई कि अंदाजा ही नहीं लगा कि कितनी तेजी से कांग्रेस बनने की कोशिश वो कर रहे हैं। हालांकि, बेल्लारी के बीजेपी वाले रेड्डी बंधुओं की कामयाबी के पीछे सारी ताकत कांग्रेस वाले दिवंगत वाईएसआर रेड्डी की ही है। यहां तक कि बेल्लारी के रेड्डी का धन आंध्र के रेड्डी के सहारे ही तेजी से बढ़ा। कांग्रेस वाले रेड्डी ने गुलामी की परंपरा ऐसे लोगों में भर दी थी कि वहां के लोग अभिमान के साथ रेड्डी के लिए जीवन देने को तैयार थे। बेटे जगनमोहन भी उसी फॉर्मूले को आजमा रहे हैं। और, बीजेपी वाले रेड्डी बंधुओं ने अनाप-शनाप पैसे की ताकत पर ऐसे सब कुछ ढेर कर दिया था कि हवाला डायरी में नाम भर आने से इस्तीफा देने वाले लालकृष्ण आडवाणी और बड़ी सी बिंदी लगाए हिंदुस्तानी महिला की ब्रांड सुषमा स्वराज भी बस इन्हें आशीर्वाद भर देने के ही लायक बचे रह गए।
लेकिन, एक बात जो, अभी होनी है कि अमर सिंह किसके लिए ये पैसे जुटाकर बीजेपी के सांसद खरीद रहे थे। मुलायम सिंह यादव को तो, उससे प्रधानमंत्री बनाया नहीं जा सकता था। जाहिर है सरकार कांग्रेस की ही थी और विश्वासमत भी उसी सरकार को जीतना था। फिर पैसा लेते-देते तो, समाजवादी के सांसद रेवती रमण सिंह ही दिखे थे। वो, जेल क्यों नहीं गए। कोई कांग्रेसी जेल जाने की लिस्ट में क्यों नहीं है। बीजेपी के सांसद रिश्वत लेकर घर तो गए नहीं। तो, उनके अभियान को भ्रष्टाचार मिटाने में सहयोग मानने के बजाए उन्हें भी दोषी क्यों माना गया। हो, सकता है कि आगे अदालत इस बात पर ध्यान दे। लेकिन, फिलहाल तो, मैं और मेरे जैसे लोग खुश इसीलिए होंगे कि बेईमान होने से अब ईमानदारों को ही बेईमानों को भी डर लगेगा।
जब अमर सिंह के जेल जाने की खबर मैंने सुनी तो, सचमुच मैं बहुत खुश हुआ। अमर सिंह से मेरी कोई निजी दुश्मनी नहीं है न ही दोस्ती। इत्तफाक से पत्रकारिता में होने के बाद भी कभी अमर सिंह नामक प्राणी से मिलने का अवसर नहीं मिला। लेकिन, पत्रकारिता में जो, जानने वाले कभी अमर सिंह के संपर्क में आए वो, अमर लीला बताते रहते हैं। किस तरह अमर सिंह हर किसी को दलाली के नाना प्रकार के तंत्र से वश में करने की क्षमता रखता-दिखाता रहता था ये कोई छिपी बात तो है नहीं। किसी ने कुछ बोला तो, उसके खिलाफ रुपए से लेकर रूपसियों तक का सचित्र विवरण अमर सिंह के लिए ब्रह्मास्त्र जैसा काम करता रहा। यही वजह रही कि मुलायम सिंह यादव का साथ छूटने के बाद भी यही लगता था कि ये अमर सर्वाइव कर जाएगा। अमर सिंह ने दलाली की सारी सीमाएं लांघ ली थीं। अमर सिंह की खूबी ही यही थी कि मुश्किल में फंसे बड़े आदमी को गलत तरीके से मदद करके उस मदद के अहसान के तले दबा दो। फिर चाहे वो, मुलायम सिंह यादव रहे हों, अमिताभ बच्चन या फिर अनिल अंबानी। वैसे, सच्चाई देखी जाए तो, जिसके साथ अमर सिंह जुड़े उसे बर्बाद ही किया। अमर प्रभाव में मुलायम की समाजवादी पार्टी सिर्फ अभिनेता और अभिनेत्रियों की पार्टी रह गई। हां, अमर प्रभाव से धन की कमी मुलायम को कभी नहीं हुई।
अमिताभ बच्चन का चाहे जितना जलवा रहा हो। अमर प्रभाव में उसका तेज भी खत्म नहीं तो, कम तो हुआ ही। अमिताभ चूंकि पुराने जमाने में कांग्रेसी हथकंडों से वाकिफ रहे हैं। इसलिए अमर प्रभाव से थोड़ा बच गए। और, अपनी जमीन बनाए-बचाए रहने में कामयाब रहे। लेकिन, छोटे अंबानी को कैसे अमर प्रभाव ने बर्बाद किया वो, तो सबको पता है। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में दादरी से गुजरते हर व्यक्ति को समझ में ये जरूर आता होगा। अमर सिंह जैसे लोग जिस तरह से नीचे से ऊपर पहुंच गए वो, सीध रास्ते से तो संभव ही नहीं था। इसीलिए एक बार मैंने भी लिखा कि आखिर अमर सिंह, मायावती ये न करें तो, क्या करें लेकिन, इन लोगों ने तो, ऐसा कर दिया कि सब पीछे छूट गया। और, अब पीछे छूटे लोग तो, ये भी करके आगे की कतार में पहुंचने लायक नहीं रहे।
कुछ ऐसा ही कर्नाटक में रेड्डी बंधुओं ने किया। दक्षिण में पहली भगवा सरकार के भ्रम में बीजेपी भी इस कदर उनके जाल में फंसती गई कि अंदाजा ही नहीं लगा कि कितनी तेजी से कांग्रेस बनने की कोशिश वो कर रहे हैं। हालांकि, बेल्लारी के बीजेपी वाले रेड्डी बंधुओं की कामयाबी के पीछे सारी ताकत कांग्रेस वाले दिवंगत वाईएसआर रेड्डी की ही है। यहां तक कि बेल्लारी के रेड्डी का धन आंध्र के रेड्डी के सहारे ही तेजी से बढ़ा। कांग्रेस वाले रेड्डी ने गुलामी की परंपरा ऐसे लोगों में भर दी थी कि वहां के लोग अभिमान के साथ रेड्डी के लिए जीवन देने को तैयार थे। बेटे जगनमोहन भी उसी फॉर्मूले को आजमा रहे हैं। और, बीजेपी वाले रेड्डी बंधुओं ने अनाप-शनाप पैसे की ताकत पर ऐसे सब कुछ ढेर कर दिया था कि हवाला डायरी में नाम भर आने से इस्तीफा देने वाले लालकृष्ण आडवाणी और बड़ी सी बिंदी लगाए हिंदुस्तानी महिला की ब्रांड सुषमा स्वराज भी बस इन्हें आशीर्वाद भर देने के ही लायक बचे रह गए।
लेकिन, एक बात जो, अभी होनी है कि अमर सिंह किसके लिए ये पैसे जुटाकर बीजेपी के सांसद खरीद रहे थे। मुलायम सिंह यादव को तो, उससे प्रधानमंत्री बनाया नहीं जा सकता था। जाहिर है सरकार कांग्रेस की ही थी और विश्वासमत भी उसी सरकार को जीतना था। फिर पैसा लेते-देते तो, समाजवादी के सांसद रेवती रमण सिंह ही दिखे थे। वो, जेल क्यों नहीं गए। कोई कांग्रेसी जेल जाने की लिस्ट में क्यों नहीं है। बीजेपी के सांसद रिश्वत लेकर घर तो गए नहीं। तो, उनके अभियान को भ्रष्टाचार मिटाने में सहयोग मानने के बजाए उन्हें भी दोषी क्यों माना गया। हो, सकता है कि आगे अदालत इस बात पर ध्यान दे। लेकिन, फिलहाल तो, मैं और मेरे जैसे लोग खुश इसीलिए होंगे कि बेईमान होने से अब ईमानदारों को ही बेईमानों को भी डर लगेगा।
Saturday, September 03, 2011
मायावती के दलित उत्थान की एक बानगी
मायावती की सरकार में दलित उत्थान हो रहा है। सचमुच काफी हद तक हुआ भी है। मायावती मनुवाद को गाली देतीं हैं। मायावती ने शादी नहीं की है। परिवारवाद का आरोप कम ही लगेगा। लेकिन, मायावती के खासमखास स्वामी प्रसाद मौर्य देखिए क्या मिसाल पेश कर रहे हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य प्रतापगढ़ जिले से हैं। अब बेटे को ऊंचाहार विधानसभा से चुनाव लड़ाना चाह रहे हैं। भतीजे को पहले ही प्रतापगढ़ जिला पंचायत का अध्यक्ष बना चुके हैं। हमें इस सबसे कोई एतराज नहीं है। लेकिन, देखिए लोकतंत्र में कितने ठसके से ऊंचाहार विधानसभा के लोगों से अपील कर रहे हैं। पूरी होर्डिंग पढ़िए सब साफ हो जाएगा। ये साहस तो सोनिया गांधी भी बेटे राहुल के लिए नहीं कर पाएंगी।
Tuesday, August 23, 2011
टीवी देखने से काफी कुछ साफ रहता है, दिमाग भी!
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| रामलीला मैदान पर अन्ना का एक मुस्लिम समर्थक |
इस आंदोलन में दलितों की हिस्सेदारी कितनी ज्यादा है। ये रामलीला मैदान में एक बार आंख खोलकर घूमने से पता चल जाएगा। कल करोलबाग के अंबेडकर टोले से 400 दलित आए थे। सबसे मैंने कैमरे पर ये पूछा कि क्या आप लोग सिर्फ भावनाओं में बहकर यहां चले आए हैं। जबकि, तथाकथित दलित नेता तो, कह रहे हैं ये शहरी, इलीट सवर्णों का आंदोलन है। तो, सबका जवाब था- अन्ना को गरियाने वाले बेवकूफ हैं।
मैंने उनसे नाम के साथ वो, क्या कर रहे हैं। ये सब पूछा है। कुछ भी भुलावे में रखकर नहीं। ये तथाकथित एक धर्म, वर्ग, जाति के नेताओं को दुकान बंद होने का खतरा हमेशा ही सताता रहता है। और, उसमें ये बेवकूफियां भी करते रहते हैं।
Friday, August 19, 2011
कमाल की बेहूदगी है!
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| इंडिया गेट पर भ्रष्टाचार के खिलाफ एक तस्वीर |
4 दिनों से मैं इस आंदोलन की कवरेज कर रहा हूं। और, मेरा ये आंकलन है कि ये जेपी से बड़ा आंदोलन है। क्योंकि, वो पूरी तरह से राजनीतिक आंदोलन था। ये सामाजिक, पूरी तरह से जनता का आंदोलन है। आप बताइए
Tuesday, August 16, 2011
अन्ना कैसे सुधारोगे भ्रष्ट भारत
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| इलाहाबाद के बक्शी बांध की शुरुआत पर अतिक्रमण |
कल ही इलाहाबाद से लौटा हूं। दिल्ली स इलाहाबाद जाते वक्त प्रयागराज में दो लड़कियों का टिकट कनफर्म नहीं था। या शायद एयरकंडीशंड कोच का टिकट ही नहीं था। लेकिन, उनकी किस्मत अच्छी थी। एक सीट खाली थी। दोनों लड़कियां उसी पर सो गईं। टीटी आया- एक लड़की ज्यादा समझदार थी। टीटी के नाराज होते ही उसने 100 का पत्ता पकड़ा दिया। पहले टीटी और नाराज हुआ। फिर, बोला - एक और दो। एक तो ये था सहूलियत का भ्रष्टाचार।
दूसरा इलाहाबाद में ही घर से निकला। इलाहाबाद के गंगा किनारे के इलाके दारागंज में हमारा घर है। वहां से शहर की तरफ निकला। दारागंज से बक्शी बांध से हम लोग एलेनगंज की तरफ चले। बांध खत्म होते-होते एक साईं मंदिर दिख गया। जिसके बगल में बड़ा सा बैनर भी लगा दिखा जो, बिना किसी डर-भय के चंदा देकर मंदिर बनाने की अपील कर रहा है। ये गजब का भ्रष्टाचार है। अब ये अतिक्रमण, अगर अभी ही इलाहाबाद विकास प्राधिकरण या फिर दूसरे संबंधित अधिकारियों को दिख जाए तो, शायद ये विवाद का विषय न बने। अभी तो, इस मंदिर के आसपास भी कोई इसका मालिकाना हक जताने वाला नहीं दिख रहा था। लेकिन, कल को जब ये मंदिर पक्का, बढ़िया बन जाएगा। कुछ दान नियमित आने लगेगा और मंदिर का कोई भ्रष्ट पुजारी भी जम जाएगा तो, ये आस्था का विषय हो जाएगा। इस भ्रष्टाचारी भारत को कैसे सुधारोगे अन्ना। उस पर ये सरकार !
मैंने ये फोटो फेसबुक पर भी डाली थी। उसकी प्रतिक्रियाएं भी डाल रहा हूं।
Shobhit Chauhan What a nice observation. Within few years this entire land will be a temple. And if the authorities try to break it, there will be communal riots. People will block the roads. They will cry for their religion. and many other things...
Saturday at 5:32pm · 1 personLoading...
Saturday at 5:35pm · · 1 personLoading...
Shobhit Chauhan Our authorities are in a habit of waiting for a blunder to happen and then show their disaster management skills.
Saturday at 5:38pm ·
Aar Ravi baba kee .........maar...hame to baba se achchhaa bhais lagtee hain...
Saturday at 6:03pm ·
Aar Ravi बीन भी ठीक हैं ...भैस कहते हैं बीन बजाने पर ज्यादा दूध देती हैं ..शनि महाराज भी खुश हो जायेगे ..
Saturday at 6:08pm · ·
Ravish Shukla jameen par logon ka aur sarkari babu ki pocket me paise ka atikraman hoo jaata hai..issliye hooti hai andekhi...
Saturday at 7:14pm ·
Arvind Rastogi babu ki pocket ke atrikraman ko to anna todne ke liye tayaar hai jamin ka kaun karega
Saturday at 7:16pm ·
Ravish Shukla sachhai ka majboot haath jab todega in logon ko..tabhi khatm hooga yee.
Saturday at 7:21pm ·
Monday, August 08, 2011
फूल रहा है दुनिया के दादा का दम
शुक्रवार को अमेरिकी शेयर बाजार जब बंद होने की तरफ बढ़ रहे थे। तो, दुनिया की जानी-मानी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी एस एंड पी यानी स्टैंडर्ड एंड पुअर के दफ्तरों में हलचल बढ़ गई। खबरें जो, निकलकर आईं कि दरअसल अमेरिकी कर्ज संकट को सुलझाने के लिए रेटिंग एजेंसी के तय फॉर्मूले के गणित में थोड़ी गड़बड़ हो गई थी। जिसकी वजह से कर्ज की सीमा बढ़ाने और खर्च घटाने के अमेरिकी सरकार की योजना के आधार पर अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग एएए प्लस पर ही बनी रही। लेकिन, शुक्रवार को अमेरिकी बाजार बंद होने से पहले ही स्टैंडर्ड एंड पुअर ने दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की साख पर संदेह खुलेआम जाहिर कर दिया। स्टैंडर्ड एंड पुअर ने अमेरिकी क्रेडिट रेटिंग एएए प्लस से घटाकर एए प्लस कर दिया। और, उस पर भी रेटिंग एजेंसी ने इसे निगेटिव आउटलुक के साथ जारी किया है। इसका मतलब ये हुआ कि अगले 12 से 18 महीने में एक बार फिर से अमेरिका की रेटिंग घटने का खतरा है। और, अमेरिकी रेटिंग का घटना इसलिए भी ऐतिहासिक है कि ये रेटिंग एजेंसी के अस्तित्व में आने के बाद पहली बार हुआ है।
अब सवाल ये है कि इस रेटिंग के घटने को अमेरिकी अर्थव्यवस्था और दुनिया के लिए कितने बड़े खतरे के तौर पर देखा जाना चाहिए। दरअसल अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए ये झटका 2008 में आई मंदी से भी बड़ा है। उसकी वजहें भी साफ हैं। 2008 में जो, मंदी आई थी उसमें अमेरिकी सरकार की साख को बट्टा नहीं लगा था। उस वक्त भी रेटिंग एजेंसियों ने अमेरिका की एएए प्लस की रेटिंग नहीं घटाई थी। क्योंकि, उस मंदी की वजह अमेरिका के रियल एस्टेट सेक्टर और खराब कर्जों को नए तरीके से पैकेजिंग करके बेचकर ज्यादा मुनाफा कमाने का बैंकों का लालच था। लेकिन, इस बार मामला ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि, इस बार तो, सरकारी खजाना ही खाली है। पिछली मंदी में बैंक दिवालिया हुए थे, इस बार तो, सरकार दिवालिया होती दिख रही है। सरकारी बिल के भुगतान में दिक्कत है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिकी कंगाली दुनिया के सामने खुलने का डर दिखाकर कर्ज लेने की सीमा बढ़ाने वाले बिल पर रिपब्लिकन और डेमोक्रैट्स दोनों को एक साथ आने के लिए मना लिया। लेकिन, अमेरिका की जो, योजना है खर्च घटाने की वो, दरअसल अभी भी संदेह के घेरे में है। वैसे तो, अमेरिका ने अगले दस सालों में वित्तीय घाटा 2.1 ट्रिलियन डॉलर घटाने का प्रस्ताव पारित किया है जो, 4 ट्रिलियन डॉलर से काफी कम है। लेकिन, 2.1 ट्रिलियन डॉलर घटाने की भी जो, योजना है वो, संदेह के घेरे में है।
ये संदेह बाजार में बवाल बनकर उभर रहे हैं। अमेरिकी शेयर बाजारों के लिए बीता हफ्ता पिछले दो सालों का सबसे खराब हफ्ता साबित हुआ है। अमेरिकी शेयर बाजार का एसएंडपी 500 सूचकांक पिछले दस कारोबारी दिनों में करीब ग्यारह प्रतिशत गिरा है। अमेरिका गिरा तो, पीछे-पीछे सारे यूरोपीय, एशियाई बाजार भी धड़ाम हो गए। अमेरिका का अपना बुरा हाल और उस पर यूरोप का बढ़ता कर्ज संकट। कुल मिलाकर एक बार फिर दुनिया भर के अर्थशास्त्री ये आशंका जताने लगे हैं कि अमेरिका फिर से मंदी के मुंह में जा रहा है। यस वी कैन का नारा देकर अमेरिकी बदलाव का प्रतीक बन गए बराक ओबामा के भाषणों का नशा अमेरिकी जनता के दिमाग से खत्म हो गया है।
मंदी से बाहर आए अभी अमेरिका को करीब साल का ही समय बीता है कि फिर से मंदी का भूत व्हाइट हाउस की छत पर मंडराने लगा है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के पांव उखड़ने लगे हैं। इस वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में अमेरिका की जीडीपी सवा परसेंट (1.3%) से भी कम बढ़ी है। हालांकि, पहली तिमाही से हालात सुधरे हैं। पहली तिमाही में अमेरिका की जीडीपी आधा परसेंट (1.3%) से भी कम बढ़ी है। अगर पहले छे महीने का हाल देखें तो, ये बढ़त मंदी के बाद रिकवरी की शुरुआत यानी जून 2009 के बाद सबसे कम है।
अर्थशास्त्रियों को डर है कि अमेरिका फिर से मंदी के मुंह में जा सकता है। और, अमेरिकी मंदी का मतलब हुआ- दुनिया भर में मंदी के बादल छाने का खतरा। क्योंकि, GDP की रफ्तार घटने से दूसरी तिमाही में GDP $13.27 ट्रिलियन रह गई है। ये आंकड़ा इसलिए भी डरा रहा है कि मंदी के ठीक पहले यानी 2007 की आखिरी तिमाही में अमेरिका की कुल जीडीपी $13.33 ट्रिलियन डॉलर ही थी। ये आंकड़े साफ बता रहे हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर अब लगा कोई भी एक धक्का इसे सीधे मंदी के मुंह में धकेल देगा।
और, वो धक्का लगता दिख रहा है अमेरिका के खाली सरकारी खजाने की वजह से। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने अमेरिका की कंगाली का वास्ता देकर अमेरिकी सीनेट से कर्ज लेने की सीमा तो बढ़वा ली। लेकिन, जानकार इसे कुछ समय की ही राहत मान रहे हैं। इसके अलावा भी बहुत से ऐसे कारण फिर से उभर रहे हैं जो, अमेरिकी अर्थव्यवस्था को फिर से मंदी की तरफ खींच रहे हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में पिछली तिमाही में जो, झटका लगा है। उसकी सबसे बड़ी वजह है अमेरिकियों ने अपने खर्चे घटा दिए। दरअसल, अमेरिका की पूरी अर्थव्यवस्था खर्च पर ही चलती है। खर्च करने पर ही अर्थव्यवस्था का सत्तर प्रतिशत निर्भर करता है। और, खर्च करने में माहिर माने जाने वाले अमेरिकियों ने घर, गाड़ी हो या फिर दूसरी रोज के इस्तेमाल की जरूरी चीजें- सबकुछ खरीदने में कंजूसी दिखाई है। पिछली तिमाही में अमेरिकियों ने सिर्फ 0.1 प्रतिशत घर ज्यादा खरीदे। ये अप्रैल-जून 2009 की तिमाही के बाद सबसे कमजोर बढ़त है। मंदी के संकेत कार और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स की खरीद के आंकड़ों में भी दिखने लगे हैं। पिछली तिमाही में अमेरिकियों ने करीब साढ़े चार परसेंट (4.4%) कम गाड़ियां और टीवी, फ्रिज खरीदे। दरअसल, अमेरिकियों की जेब में इतने पैसे ही नहीं बच रहे हैं कि वो, खर्च कर सकें। अमेरिकियों का फूड और एनर्जी का बिल बहुत बढ़ गया है। इसलिए खाने और आने-जाने पर खर्च के अलावा दूसरे खर्चों में अमेरिकियों को कटौती करनी पड़ी। मई महीने में गैसोलीन का एक गैलन 4 डॉलर महंगा हो गया। ये बढ़त पिछले तीन सालों में सबसे बड़ी है।
2008 की मंदी के पहले तक दुनिया में भारी जेब और नौकरी के बूते सबसे खुशहाल दिखने वाले अमेरिकी बेरोजगार हो रहे हैं। जिस अमेरिका में माना ये जाता था कि जिसे नौकरी चाहिए उसे मिलेगी। यहां तक कि दुनिया तो, ये समझती थी कि अमेरिकी 6 महीने नौकरी करके 6 महीने मौज में बिताते हैं। अब वो अमेरिका बदल गया है। नौकरियां गायब हो रही हैं। जून में बेरोजगारी की दर चढ़कर करीब दस प्रतिशत पर पहुंच गई। 8 जुलाई को अमेरिकी लेबर डिपार्टमेंट के ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि जून महीने में सिर्फ 18000 लोगों को नौकरी मिली। उस पर निराशाजनक बात ये है कि बड़ी-बड़ी अमेरिकी कंपनियों ने छंटनी का प्लान तैयार कर रखा है। अमेरिका की दूसरी सबसे बड़ी दवा कंपनी मर्क एंड कंपनी 2015 तक करीब 13000 कर्मचारी घटाएगी। सिस्को 6,500 लोगों को बाहर करेगी। LMT ने 6500 कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवत्ति लेने का प्रस्ताव दिया है। गोल्डमैन भी एक हजार लोगों को निकालेगी।
दुनिया में बढ़ती कमोडिटी कीमतों ने अमेरिकियों की कमर तोड़ दी है। दुनिया की सबसे बड़ी स्नैक-फूड बनाने वाली कंपनी पेप्सिको ने पहले ही कह दिया है कि इस साल मुनाफा पहले के अनुमान से कम होगा। वजह वही कि कमोडिटी की कीमतें बढ़ी हैं। और, कंज्यूमर की तरफ से कोई मांग नहीं है। कुल मिलाकर दुनिया के दादा का दम फूलता दिख रहा है। और, उसका बुरा असर दुनिया पर कुछ वैसे ही होता दिख रहा है जैसे, किसी बड़े जमींदार के दिवालिया होने की खबर से गांव में सुख चैन से दो जून की रोटी खाने वाले भी डर जाते हैं कि क्या होगा। भारत में भी निवेशकों को समझ में नहीं आ रहा कि वो क्या करें। अमेरिका की ये बदहाली विश्व अर्थव्यवस्था में अमेरिका, यूरोप की अगुवाई से एशिया की अगुवाई का मौका बनता दिख रहा है। लेकिन, मुश्किल यही है कि पिछले दो ढाई सालों में कुप्रबंधन की मिसाल बन चुकी हमारी सरकार क्या इसे मौके के तौर पर देखती है। क्योंकि, अर्थव्यवस्था में अगुवा सिर्फ बयानबाजी से नहीं बना जा सकता।
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आप लोगों में से कितने लोगों के यहां बेटियों का पैर छुआ जाता है। यानी, मां-बाप अपनी बेटी से पैर छुआते नहीं हैं। बल्कि, खुद उनका पैर छूते हैं...
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पुरानी कहावतें यूं ही नहीं बनी होतीं। और, समय-समय पर इन कहावतों-मिथकों की प्रासंगिकता गजब साबित होती रहती है। कांग्रेस-यूपीए ने सबको साफ कर ...






