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Wednesday, September 07, 2011

भारत में ये रुटीन है!


एक और धमाका। जगह वही दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर जहां 25 मई को कोई नहीं मरा था। अब कितने मरे, किस तरह से धमाका हुआ। सरकार की आपात बैठक। इस संगठन की चिट्ठी। अगले धमाके का इंतजार। बस ना कि और कुछ।

हां, जब धमाके न हों तो, बहस ये कर लें कि आतंकवादियों को भी फांसी देना क्या ठीक है। अब पूरा हो गया।

Thursday, July 14, 2011

एक बार थम क्यों नहीं जाता देश



मीडिया मजबूरी में या ये कहें कि और करे भी तो, क्या। अब यही चलाना-दिखाना है कि मुंबई के जज्बे को सलाम। आखिरकार जिंदादिल मुंबई के लोगों ने आतंक को फिर से मात दे दी। कुछ 22 प्वाइंट की मामूली सेंसेक्स की बढ़त ने एक और हेडलाइन ये भी दे दी कि आतंक को शेयर बाजार का करारा जवाब। लेकिन, क्या सचमुच ऐसा हुआ है। क्या सच्चाई यही है कि मुंबई या फिर शेयर ने आतंक को करारा जवाब दिया है। देश में अगर कश्मीर के बाद कहीं के लोगों के सीने में सबसे ज्यादा आतंकी घाव पक रहा है तो, वो मुंबई शहर ही है। देश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले इस शहर की मजबूरी को लोगों खासकर हम मीडिया वालों ने जबरदस्ती बहादुरी बनाने की कोशिश बार-बार की है। और, इसे आतंक से लड़ने के लिए जरूरी सकारात्मक सोच साबित कर दिया है।


11/7/2006 के ट्रेन धमाके हों या फिर 26/11/2008 के ताज और मुंबई के दूसरे अहम ठिकानों पर हुए आतंकी हमले हों। मीडिया में लाख ये बात साबित करने की कोशिश की जाए कि हमलों के तुरंत बाद मुंबई के जिंदादिल लोग उठ खड़े होते हैं। मुंबई कभी थमती नहीं, ये जज्बा दिखाते हैं। लेकिन, इन दोनों धमाकों के समय इन घटनाओं को नजदीक से महसूस करने और मुंबई के लोगों की हालत देखकर लगा कि ये मीडिया बार-बार तय तरीके से मुंबई के लोगों को अपने घाव का इलाज करने के बजाए उसे दबाने, घाव में मवाद बनने को मजबूर कर देता है। ये थोपी गई जिंदादिली ही है कि लोगों का गुस्सा बाहर आने पर एक सामूहिक सहमति की रोक हावी हो जाती है। 11/7 के सीरियल लोकल ट्रेन ब्लास्ट के काफी दिन बाद मैं लोकल से लोवर परेल स्टेशन से ठाणे जा रहा था। अचानक बीच के एक स्टेशन पर अफवाह फैली, ट्रेन में बम है। और, मीडिया में कभी थमती न दिखने वाले मुंबईकर ऐसे थमे कि 3 सेकेंड भी नहीं लगे होंगे और पूरी ट्रेन खाली हो गई। मैं खुद फुर्ती देखकर भी हैरान था कि इतनी तेजी से कैसे में लोकल के डिब्बे से स्टेशन पर आ गया।

26/11 के हादसे के समय और उसके बाद भी मुंबई के लोगों की सांसें थमी की थमी रह गईं थीं। लेकिन, डर, आतंक की बात करना तो, देश में निराशा फैलाना वाला माना जाता। और, जब झूठे साहसी बनना हो तो, भला कोई क्यों पीछे रहता। लोगों को गुस्सा तक दिखाने की इजाजत नहीं थी। पता नहीं कैसे समाचार चैनलों और अखबारों में बिना कहे ये सहमति बन जाती है कि इस समय लोगों का गुस्सा मत दिखाइए, पॉजिटिव स्टोरी दिखाइए। जिसने घायल लोगों को धमाके के बीच से निकालकर अस्पताल पहुंचाया हो, उसे हीरो बना दीजिए। एक-दो कॉमनमैन यानी आम आदमी को हीरो बना-दिखाकर मीडिया लोगों का गुस्सा दबा देती है। लोग हीरोइक स्टोरी में फंस जाते हैं और आतंकवादी फिर से ढेर सारे आम आदमियों को मौत के घाट उतारने की तैयारी करने में लग जाते हैं। हमें ऐसा बना दिया गया है कि अब कुछ दिन ही लगता है किसी आतंकी हमले को भूलने में। मीडिया में बरसी की खबरों से भले याद आ जाए।

गुस्सा बाहर न आने देने साजिश और लोगों की जिंदादिल बनाए रखने की साजिश ऐसी हावी होती है कि लोग मजबूरी में आंसू पीकर मुस्कुराने लगते हैं। फिर भावनात्मक कहानियां खोजी जाने लगती हैं। मोमबत्ती जलाए कुछ लोगों के शॉट्स दिखाकर ही आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की मजबूती मान ली जाती है। और, आतंकवाद के असली मुद्दे से लोगों का ध्यान ही भटक जाता है। कौन बताए-समझाए कि अरे, मजबूरी है भइया। इसलिए जिंदादिल नजर आते हैं। ऐसे जिंदादिल कि कांग्रेस के वही महासचिव राहुल गांधी जो, भट्टा-पारसौल में किसानों पर जमीन अधिग्रहण के मामले में मायावती सरकार के खिलाफ रात के अंधेरे में गांव में चुपचाप घुसकर लड़ाई का एलान कर देते हैं। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का एलान और उसके बाद कौन सी लड़ाई राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी ने लड़ी है। उस पर राहुल गांधी मुंबई हमलों पर बयान दे देते हैं कि एक-दो हमले रोके नहीं जा सकते। इराक-ईरान में तो, ऐसे हमे रोज होते रहते हैं। लेकिन, हम हिंदुस्तानियों पर तथाकथित जिंदादिली ऐसी हावी है कि हम राहुल गांधी के बयान पर भी गुस्सा नहीं होते। इस बात पर भी गुस्सा नहीं होते कि पूरी कांग्रेस पार्टी इस बयान को सही साबित करने में जुट जाती है।

इस बात पर भी हम हिंदुस्तानी अपनी जिंदादिली का त्याग नहीं कर पाते। मीडिया ये चिल्लाने लगता है कि मुंबई में धमाके के बाद हो रही बारिश से सारे सबूत धुल जाने के अंदेशा है। पता नहीं हम ये याद क्यों नहीं कर पाते कि आखिर अब तक सारे सबूत मिलने के बाद भी क्यों नहीं एक भी आतंकी को उसके किए की सजा हम दे पाए। कसाब, अफजल गुरू जैसे लोग हमारी जेल में होते हुए भी हमारे खास मेहमान से बढ़कर हैं। आंकड़े आते रहते हैं कि कसाब पर हर रोज करीब एक करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं। स्पेशल कोर्ट, फास्ट ट्रैक कोर्ट ये सब आतंकियों को सजा सुनाकर फांसी के फंदे तक क्यों नहीं पहुंचा पातीं। जवाब साफ है क्योंकि, कांग्रेस के युवराज को लगता है कि ऐसे एक दो हमले तो रोके नहीं जा सकते। एक दिन मुकर्रर करके सरकार देश की सभी जेलों में बंद आतंकवादियों को एक साथ क्यों फांसी के फंदे पर लटकाती।

लेकिन, ऐसा भला कैसे हो सकता है। मुंबई हमले के करीब 48 घंटे बाद आतंरिक सुरक्षा सचिव बयान दे देते हैं कि सभी आतंकी संगठनों पर साजिश का शक है। अब समझ लीजिए, किसी पर और कैसे कार्रवाई हो सकती है। फिर बात तो, वही है ना कि, जब ऊपर से संदेश आतंकवाद को राजनीतिक फायदे के रूप में इस्तेमाल करने का हो तो, कार्रवाई कौन और कैसे करेगा। खैर, इस सरकार का जो, अंदाज है वो, साफ कह रहा है कि हिंदुस्तानियों आदत डाल लो। मुंबईकरों आदत डाल लो। हम तुम्हारे न थमने वाले जज्बे की तारीफ करते रहेंगे। तुम अपने कुछ लोगों को खोकर, फिर से सुबह काम के लिए चल पड़ना। क्योंकि, मुंबई-दिल्ली में क्या उदारीकरण के बाद देश के किसी भी हिस्से में कितने भी बड़े हादसे के गम जो, रुक जाएगा-थम जाएगा। बगल वाला वैश्वीकरण वाले इंडिया में एक पायदान ऊपर चला जाएगा। काश एक बार आतंकवाद के दिए जख्म से मुंबई थम जाए, देश थम जाए तो, शायद इसका कुछ इलाज निकल सके। क्योंकि, अब तो देश के सबसे ताकतवर शख्स के तौर पर स्थापित राहुल गांधी भी ये साफ कह रहे हैं ऐसे हमले रोकने की क्षमता उनमें और उनकी सरकार में नहीं है।

Thursday, November 27, 2008

नपुंसक नेताओं के हाथ में कब तक रहेगा देश

खून खौल रहा है। इच्छा ये कि क्यों नहीं मैं भी किसी फोर्स में हुआ। और, क्यों नहीं ऐसा मौका मुझे भी मिला कि दो-चार आतंवादियों को मार गिराता। साथ में कुछ नपुंसक नेताओं को भी। हम टीवी वाले भले ही देश को न्यूज दिखाने के चक्कर में हर खबर को नाटकीय अंदाज में पेश करने वाले बन गए हैं। लेकिन, सच्चाई यही है कि कलेजा हमारा भी कांपता है। औऱ, खून हमारा भी खौलता है।


लगातार आतंकवादी चुनौती दे रहे हैं और जब आतंकवादी ऐसा धमाका करते हैं, सरेआम हिंदुस्तानियों की लाशें गिराते हैं, तब भले ही हम मीडिया वाले झकझोर कर देश को जगाने की कोशिश करते हों लेकिन, ये रात का धमाका सुबह की रोशनी के साथ डर भी खत्म कर देता है। और, आतंकवादियों के लिए सुबह फिर से नई तैयारी का रास्ता बना देती है। क्योंकि, हम नपुंसक नेता और उनके इशारे पर एक ही धमाके के लिए अलग-अलग मास्टरमाइंड पकड़ने वाली एटीएस और पुलिस के बताए भर से ही संतोष कर सकते हैं।


देश का आम आदमी मर रहा है। अब मैं ये सोच रहा हूं कि क्या कोई आम आदमी जागेगा नहीं। देश में घुन की तरह आतंकवादियों के हिमायती ऐसे भर गए हैं कि जाने कितने बुधवार की जरूरत है। मुझे नहीं समझ में आता कि जेल में बंद आतंकवादियों को किसके लिए बचाकर रखा हुआ है। क्या फिर किसी खूंखार आतंकवादी के लिए देश के कुछ लोगों को बंधक बनाया जाएगा तब। अब अगर मुंबई के ताज होटल, ओबरॉय होटल को कुछ घंटों के लिए ही सही बंधक बना सकते हैं। तो, साफ है कि देश बंधक है। औऱ, हमारे कमीने नेताओं को सिर्फ अपने वोटबैंक की चिंता सता रही है। उसको भड़का दूसरा इसका वोट ले लेता है। ये इसको भड़काकर उसका वोट ले लेता है।


संसद पर हमले के अलावा अब तक आतंकवादी चोरी-छिपे बम रखकर निर्दोष हिंदुस्तानियों की जान लेते थे। अब नपुंसक सरकार के राज में इनका साहस ऐसा बढ़ गया है कि ये दौड़ा-दौड़ाकर हमारी जान ले रहे हैं। इधर,हमारा नपुंसक गृहराज्य मंत्री शकील अहमद जानकारी देने के बजाए टेलीविजन चैनल पर एंकर से झगड़े कर रहा था। उधर, मुंबई में एंबुलेंस में हमारी लाशें लदकर हॉस्पिटल पहुंच रही थीं।

Wednesday, July 30, 2008

अब गांधी की शरण में मोदी

गुजरात सचमुच इस देश का अनूठा प्रदेश है। तरक्की गुजरातियों के स्वभाव में है। और, ये इस धरती का ही कमाल है कि बारूद के ढेर पर बैठने का अहसास होने के बाद भी यहां के कारोबार पर कोई असर नहीं पड़ा है। गुजरातियों की इसी नब्ज को नरेंद्र मोदी ने पकड़ लिया है। इसका अहसास मुझे और मजबूती से तब हुआ जब मैं अहमदाबाद धमाकों के बाद देर रात वहां पहुंचा। रात के करीब एक बजे हम एयरपोर्ट से निकलकर होटल के लिए जा रहे थे तो, मोदी का काफिला शहर से मणिनगर की ओर जा रहा था।

सबसे ज्यादा धमाके मणिनगर में ही हुए हैं जो, खुद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का विधानसभा क्षेत्र है। खैर, इतने भयानक हादसे के बाद मुझे उम्मीद थी कि इतनी रात में शायद ही सड़कों पर कोई नजर आएगा सिवाय पुलिस फोर्स के। पुलिस फोर्स तो हर जगह चौकस दिखी लेकिन, मुझे रात के एक बजे भी दो-तीन जोड़े मोटरसाइकिल पर और कई परिवार घर लौटते दिखे। फिर भी मुझे ये भरोसा था कि अगले दिन रविवार भी है और इतने बम धमाके भी हुए हैं शायद ही सड़कों पर सन्नाटे के सिवाय कुछ नहीं होगा। लेकिन, गुजरातियों ने मुझे इस बार भी झुठला दिया।

रविवार को सुबह सात बजे मैं होटल से निकला और सीधे रायपुर (पुराने शहर का संकरा बाजार जहां, शनिवार को दो धमाके हुए थे और 2 जानें गईं थीं।) बाजार पहुंचे। वहीं हमने नाश्ता किया। और, बाजार बंदी का दिन होने के बावजूद लोग बाहर सड़कों पर थे। और, जरूरी चीजों की दुकानें उस समय ही खुल गई थीं। वहां से मैं सिविल हॉस्पिटल पहुंचा तो, धमाके की जगह देखकर मेरी रूह कांप गई। धमाके से कारों, स्कूटर-मोटरसाइकिल के चीथड़े हो गए थे। लोगों का क्या हाल हुआ होगा धमाके के समय अंदाजा लगाया जा सकता है। हॉस्पिटल पर मदद करने वाले भी जमा थे। तमाशा देखने वाले थे।

शहर में धमाके की जगह पर भी ये अंदाजा लगाना मुश्किल हो रहा था कि यहां इतना भयानक हादसा हुआ है। नए शहर में तो गाड़ियां उसी रफ्तार से भाग रहीं थीं। सबकुछ उसी रफ्तार से चल रहा था जैसे आम दिनों में चलता है। इस रफ्तार की वजह का पता मुझे लगा जाइडस कैडिला के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर पंकज पटेल से मिलने के बाद। पंकज पटेल ने कहा- आतंकवादी देश की ग्रोथ स्टोरी ब्रेक करना चाहते हैं। और, गुजरात निशाना इसीलिए बना क्योंकि, देश की तरक्की में गुजरात सबसे अहम है। लेकिन, हम गुजराती, इन आतंकवादियों के जाल में नहीं फंसेंगे। हम आतंकवाद का जवाब गांधीजी के हथियार शांति से देंगे और दोगुनी तरक्की करके आतंक को मुंहतोड़ जवाब देंगे। वैसे ये बात मैंने गुजरात चुनाव कवरेज से लौटने के बाद भी कही थी कि गुजरात राज्य नहीं एक कॉरपोरेट हाउस की तरह चल रहा है।

पंकज ने कहा- तरक्की होगी तो, रोजगार होगा। सबकी जेब में ढेर सारा पैसा होगा और आतंकवाद नष्ट हो जाएगा। करीब-करीब ऐसी ही राय राज्य के ज्यादातर बड़े व्यापारियों की है। CII गुजरात चैंबर्स के चेयरमैन विमल अंबानी (मुकेश-अनिल अंबानी के चचेरे भाई) का कहना था कि इससे कुछेक दिनों के लिए भले निवेश पर पड़े उससे ज्यादा असर नहीं होगा। और, गुजरात इसी रफ्तार से तरक्की करता रहेगा।

अब मोदी को कोई लाख गाली दे। मोदी के गुजरात में तरक्की का जज्बा और मजबूत हुआ है। मुझे जो जानकारी मिली है मोदी ने विहिप और बजरंग दल को धमाकों के विरोध में रविवार को राज्य बंद की इजाजत नहीं दी। आपको याद हो तो, अमरनाथ जमीन विवाद में विहिप, बीजेपी के बंद में गुजरात शामिल नहीं था। अब ऐसे में कुछ लोगों का ये तर्क कि मोदी के गुजरात में लोगों की जान जा रही है। पता नहीं कहां रहते हैं जब देश के दूसरे राज्यों में आतंकवादी ऐसे हमले करते हैं। वैसे भी ये गुजरात की धरती है जो, गांधी, पटेल और अंबानी की धरती है। इस पर लोगों को ऐतराज हो सकता है लेकिन, मुझे लगता है कि मोदी पटेल और अंबानी के पदचिन्हों पर तो पहले भी चल रहे थे अब शायद गांधी की विरासत को सहेजने की कोशिश कर रहे हैं। क्योंकि, मोदी को अच्छे से पता है कि गांधी की शांति का रास्ता नहीं रहा तो, तरक्की के बूते गुजरात में घूम-घूमकर 36 इंच की छाती दिखाने का मौका मोदी को कैसे मिल पाएगा।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...