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Wednesday, September 07, 2016

सरपट भागते सेंसेक्स की बुनियाद

भारतीय शेयर बाजार को जैसे अचानक कोई संजीवनी सी मिल गई हो। इस साल अब तक सेंसेक्स 10.5% से ज्यादा चढ़ चुका है। 29000 को छूने के बाद सेंसेक्स थोड़ा सुस्ताता नजर आ रहा है। सेंसेक्स को 29000 छूने में करीब डेढ़ साल लग गए। दरअसल ये पिछले डेढ़ साल सरकार के लिए भी ढेर सारी मुश्किलों वाले रहे हैं। लेकिन, अब सरकार भी मजबूतत नजर आ रही है और शेयर बाजार में निवेशकों का भरोसा भी पक्का नजर आ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब अर्थव्यवस्था को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त नजर आ रहे हैं। इसकी ढेर सारी वजहें हैं और शेयर बाजार की मजबूती में दिल्ली से लेकर वॉशिंगटन तक की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। मौसम से लेकर महंगाई ने बाजार को मारक रफ्तार दे दी है। उन ढेर सारी वजहों में से सबसे अहम 5 वजहें ये रहीं।

GST कानून बनने की ओर
भारत में कर सुधारों का सबसे बड़ा कानून बनने जा रहा है। मोदी सरकार के दो साल होने के बाद संसद ने GST बिल को पास कर दिया। संसद से मंजूर होने के बाद तेजी से GST कानून बनने की तरफ बढ़ रहा है। 17 राज्यों की विधानसभा ने GST को मंजूर कर लिया है। जिस तेजी से राज्यों ने इसे मंजूर किया है। उससे सरकार के 1 अप्रैल 2017 से इसे कानून बनाने की राह आसान होती दिख रही है। सरकार ने GST काउंसिल की मदद के लिए GST सचिवालय बनाने पर चर्चा शुरू कर दी है। हालांकि, अभी भी कानून बनाने के लिए इसे लंबा सफर तय करना है।

काबू में आती महंगाई
इस साल रिकॉर्ड दाल की पैदावार का अनुमान है। अच्छे मॉनसून की वजह से कुल अनाज भी बेहतर होने का अनुमान है। इसकी वजह से भी महंगाई काबू में आती दिख रही है। इसका असर भी दिखने लगा है। 140 रुपये किलो बिक रही अरहर दाल 100 रुपये किलो के आसपास बिकने लगी है। हालांकि, महंगाई दर 6% प्रतिशत के ऊपर है जो, रिजर्व बैंक के 5% के लक्ष्य से ऊपर है। लेकिन, बेहतर मॉनसून से कम से कम खाने-पीने के सामानों की महंगाई और कम होने की उम्मीद दिख रही है। ग्रामीण क्षेत्र में अच्छी मांग होने से कंपनियों – खासकर कंज्यूमर ड्यूरेबल, मशीनरी- की बिक्री बढ़ने की उम्मीद है। इससे कंपनियों की बैलेंसशीट बेहतर होने के आसार हैं।  

उर्जित पटेल से मिली ऊर्जा
भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन को हटाने को लेकर दुनिया भर की एजेंसियां और आर्थिक विश्लेषक भारतीय मौद्रिक नीति को लेकर आशंका में थे। लेकिन, उर्जित पटेल का रिजर्व बैंक का गवर्नर बनना सभी आशंकाओं को खारिज करता है। रिजर्व बैंक गवर्नर उर्जित पटेल का अभी तक का रिकॉर्ड आश्वस्त करता है कि भारत की मौद्रिक नीति बदलने वाली नहीं हैं। साथ ही ये भी पटेल और मोदी सरकार के बीच विवाद भी नहीं होने वाला। शेयर बाजार का नए गवर्नर में भरोसा इसी बात से समझा जा सकता है कि उदारीकरण के बाद शेयर बाजार ने रघुराम राजन के बाद अब उर्जित पटेल का भी स्वागत इतने शानदार तरीके से किया है। 4 सितंबर को सेंसेक्स 1.6% चढ़ा है।

मैन्युफैक्चरिंग में जबर्दस्त तेजी
मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में जबर्दस्त तेजी देखने को मिल रही है। प्रधानमंत्री क मेक इन इंडिया का असर साफ नजर आ रहा है। ढेर सारी कंपनियां जो अभी तक असेंबलिंग करती थीं। अब भारत में ही मैन्युफैक्चरिंग कर रही है। मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर इंडेक्स 13 महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर है। मैन्युफैक्चरिंग की जीडीपी में हिस्सेदारी 25% है।

अमेरिका से मिले संकेत
अमेरिकी रिजर्व बैंक इस महीने के आखिर में ब्याज दरें नहीं बढ़ाएगा। रोजगार के ताजा आंकड़े आने के बाद ज्यादातर विश्लेषकों का ये मानना है। इसकी वजह से दुनिया भर के निवेशक विकासशील बाजारों में निवेश करने को लेकर उत्साहित हैं और भारत उसमें सबसे ऊपर है।

Thursday, April 09, 2015

भरोसा लौटने की राह पर भारतीय शेयर बाजार

भारतीय शेयर बाजार दुनिया के दूसरे बाजारों के मुकाबले बेहतर ही रहा है। जब भारतीय शेयर बाजार एक ही स्तर पर लगातार करीब तीन सालों तक बने रहे, तब भी सेंसेक्स और निफ्टी दुनिया के दूसरे बाजार सूचकांकों से बेहतर करते रहे। लेकिन, यूपीए दो में भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों का भरोसा बहुत बन नहीं सका। फिर वो विदेशी निवेशक हों या देसी निवेशक या फिर कहें रिटेल इनवेस्टर। विदेशी निवेशकों यानी एफआईआई को लुभाने के लिए यूपीए की सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में हरसंभव कोशिश की लेकिन, मामला बन नहीं सका। मल्टीब्रांड रिटल में एफडीआई को मंजूरी देने के सरकार के फैसले के बाद भी धरातल पर इसका असर नहीं दिखा। यहां तक वॉलमार्ट और दूसरे विदेशी मल्टीब्रांड रिटेलर की कोई बड़ी रिटेल दुकान भारत के किसी कोने में चमकती नहीं दिख सकी। इस सबका असर ये रहा कि भारतीय शेयर बाजार में विदेशी और देसी निवेशक प्रवेश करने से बचते रहे। उस पर दुनिया की रेटिंग एजेंसियों ने भी भारत और भारतीय शेयर बाजार की साख बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। तीन साल से स्थिर शेयर बाजार से विदेशी निवेशक भाग रहे थे। साथ ही 2008 में बुरी तरह से मार खाए देसी निवेशक तो दलाल स्ट्रीट के रास्ते की तरफ से गुजरना भी मुनासिब नहीं समझ रहे थे। लेकिन, अब एक बार फिर से शेयर बाजार में निवेशकों का भरोसा वापस लौटता दिख रहा है। विदेशी और देसी निवेशक दोनों ही फिर से शेयर बाजार में प्रवेश कर रहे हैं। विदेशी निवेशक तो पूरी तरह से वापस आ गया है। लेकिन, देसी निवेशक अभी तोड़ी हिचक दिखा रहा है। हालांकि, ताजा डीमैक खाता खोलने के आंकड़े इस बात को पुख्ता कर रहे हैं कि भारतीय शेयर बाजार का भरोसा लौटा है। हां, 2008 वाला भरोसा पाने के लिए भारत सरकार और बाजार को अभी बहुत कुछ करना होगा।
 
मई में जब नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार आई तो जैसे शेयर बाजार को पंख लग गए। शेयर बाजार का अहम सूचकांक तीस हजार के पार चला गया। दुनिया की हर रेटिंग एजेंसी ने भारत की क्रेडिट रेटिंग निगेटिव से पॉजिटिव कर दी। इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टीना लागार्डे ने साफ कहा है कि दुनिया के निराशा भरे आसमान में भारत एक चमकता सितारा है। दुनिया के जानकार ये मान रहे हैं कि भारत सिर्फ एशिया में ही नहीं सभी उभरते बाजारों में सबसे बेहतर मुनाफा देगा। और यही वजह है कि विदेशी निवेशक धड़ाधड़ भारतीय शेयर बाजार में निवेश कर रहे हैं। अप्रैल 2014 में भारतीय शेयरों में विदेशी निवेशकों ने शुद्ध सात हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की खरीद की थी। मई में जब नरेंद्र मोदी की सरकार बन गई तो ये निवेश बढ़कर साढ़े सोलह हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का हो गया। सिर्फ मई महीने में ही नहीं नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद बीते साल के हर महीने में विदेशी निवेशकों ने जमकर खरीद की। सिर्फ साल का आखिरी महीना दिसंबर अपवाद रहा। दिसंबर महीने में विदेशी निवेशकों ने शुद्ध बिकवाली की और साढ़े आठ सौ करोड़ रुपये से ज्यादा के शेयर बेच दिए। लेकिन, फिर नए साल में विदेशी निवेशकों का भरोसा लौटा और जनवरी में एफआईआई ने साढ़े सत्रह हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के शेयर खरीदे। फरवरी में करीब नौ हजार करोड़ रुपये और मार्च 2015 यानी बीते वित्तीय वर्ष के आखिरी महीने में विदेशी निवेशकों ने करीब नौ हजार करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश भारतीय शेयर बाजार में किया। ये भारतीय शेयर बाजार में दुनिया का भरोसा दिखाता है। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यही है कि शेयर बाजार के नजरिये से क्या देसी निवेशकों को भी नरेंद्र मोदी की सरकार पर उतना ही भरोसा है। कम से कम आंकड़े तो यही बता रहे हैं कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार में बाजार में पैसा लगाकर मुनाफा कमाने की इच्छा देसी निवेशक में भी बलवती हुई जाती है। शेयर बाजार में निवेश करने के लिए जरूरी है कि डीमैट खाता खोला जाए। 31 मार्च को खत्म हुए वित्तीय वर्ष में खुले डीमैट खाते पिछले चार सालों में सबसे ज्यादा हैं। एक अप्रैल 2014 से 31 मार्च 2015 के बीच सोलह लाख से ज्यादा डीमैट खाते खुले हैं। वित्तीय वर्ष 2014 में आठ लाख सात हजार, 2013 में दस लाख इकसठ हजार और वित्तीय वर्ष 2012 में दस लाख दो हजार डीमैट खाते खुले थे। बीजेपी की सरकार बनने के लिए हर महीने करीब आठ प्रतिशत ज्यादा डीमैट खाते खुल रहे हैं। और सबसे अच्छी बात ये है कि तुरंत बीते वित्तीय वर्ष में खुले खातों में से पचासी प्रतिशत से ज्यादा डीमैट खाते नए खाताधारकों के हैं। यानी देसी निवेशकों का भरोसा तेजी से लौट रहा है। तेजी से खुलते डीमैट खातों के बूते देश में ढाई करोड़ से ज्यादा निवेशक शेयर बाजार से सीधे जुड़ गए हैं। निवेशकों को इसका फायदा भी मिला है। अप्रैल से मार्च तक शेयर बाजार के दोनों अहम सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी 33 प्रतिशत से ज्यादा बढ़े हैं। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि 2008 में बुरी तरह से भरोसा खोने के बाद भारतीय शेयर बाजार में देसी छोटे, मंझोले निवेशकों का भरोसा फिर से लौट रहा है। उसे लग रहा है कि एक बार फिर से देश की तरक्की से देश की कंपनियों को होने वाली तरक्की उनके शेयर भाव में भी दिखेगी। और शेयर बाजार में भारतीय कंपनियों में किया गया उनका निवेश उन्हें मुनाफा देगा। मतलब साफ है कि सरकार ने पहली बाधा मजबूती से पार कर ली है। देसी और विदेशी दोनों ही निवेशकों का खोया हुआ भरोसा लौट आया है। लेकिन, ये पहली बाधा पार करने जैसा ही है। अभी नरेंद्र मोदी की सरकार को मनमोहन सिंह की सरकार के पहले कार्यकाल यानी यूपीए वन के आखिरी साल से पहले तक का भरोसा बनाना बाकी है। 2008 में दुनिया में आई मंदी और इसके बुरे परिणाम से ध्वस्त हुए शेयर बाजार में देसी निवेशकों का उसके पहले जैसा भरोसा अब तक नहीं बन सका है। यानी कम से कम शेयर बाजार और तरक्की के मोर्चे पर 2008 जैसा माहौल बनना बाकी है। जनवरी 2008 के पहले आठ दिनों में देसी निवेशकों ने करीब एक लाख साठ हजार डीमैट खाते खोले थे। ये वो दौरर था जब रिलायंस पावर का बहुप्रतीक्षित आईपीओ आना था। और हर कोई शेयर बाजार में निवेश करके तगड़ा मुनाफा कमा लेना चाहता था। लेकिन, वही आईपीओ शेयर बाजार में आईपीओ में निवेश करने वाले लोगों के लिए बुरे सपने की तरह साबित हुआ। और 2008 की मंदी में भारतीय शेयर बाजार और रिलायंस पावर के आईपीओ में मार खाए देसी निवेशक ने तेजी से डीमैट खाता बंद कराकर बाजार से दूरी बना ली। उसके बाद 2010 में आए कोल इंडिया के आईपीओ ने ही निवेशकों को फिर से बाजार की तरफ खींचा। लेकिन, 2008 के बाद से अब तक कोल इंडिया को छोड़कर कोई ऐसा आईपीओ नहीं आया जो, निवेशकों को अपनी तरफ खींचने में कामयाब रहा हो। मतलब साफ है कि भारतीय शेयर बाजार के प्राइमरी मार्केट की संभावनाओं की कहानी फिर से अभी शुरू ही हुई है। और अच्छा हो कि शेयर बाजार इस बार प्राइमरी मार्केट में आए निवेशकों को साध सके। देसी कंपनियों की निवेश योजनाएं पहले से काफी बेहतर हुई हैं। विदेशी कंपनियों को भी मोदी सरकार का मेक इन इंडिया लुभा रहा है। मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रस्ट्रक्चर के मोर्चे पर काफी कुछ हो रहा है। चार महीने में सबसे बेहतर काम मैन्युफैक्चरिंग में होता दिखा है। सड़क बनाने के काम में नितिन गडकरी का मंत्रालय बेहतर कर रहा है। हालांकि, तीस किलोमीटर प्रतिदिन के महात्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने में अभी बहुत लंबी दूरी तय करनी है। फिर भी बारह किलोमीटर प्रतिदिन का लक्ष्य हासिल करना भी बड़ी कामयाबी मानी जानी चाहिए। कुल मिलाकर सरकार की दिशा सही है। बस इसकी रफ्तार बेहतर करने की जरूरत है। फिर 2008 के पहले वाला भरोसा और दस प्रतिशत की तरक्की वाला सपना पूरा होने में भी ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।

Monday, May 12, 2014

इतनी आसानी से अच्छे दिन तो नहीं आने वाले



12 मई को 2014 की संसद के लिए चुनाव का आखिरी दिन और शेयर बाजार का तीसरे हफ्ते का पहला कारोबारी दिन। बाजार में उम्मीदें जैसे किसी अंतरिक्षयान की गति से उछाल मार रही हैं। सोमवार को शेयर बाजार ने फिर से नई ऊंचाई पा ली है। सारी उम्मीद नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार पर टिकी है। सेंसेक्स साढ़े तेईस तो निफ्टी सात हजार पर पहुंच गया है। छे साल से भी ज्यादा समय के बाद शेयर बाजार में इस तरह की तेजी देखने को मिली है। पिछले चार-पांच सालों से इक्कीस हजार पर अंटका सेंसेक्स शुक्रवार को तेईस हजार के पार चला गया। हालांकि, तेईस हजार के ऊपर बंद होने में सेंसेक्स कामयाब नहीं हुआ लेकिन, सेंसेक्स करीब तेईस हजार पर बंद हुआ ये कहा जा सकता है। एक दिन में साढ़े छे सौ प्वाइंट से ज्यादा सेंसेक्स चढ़ गया। लेकिन, क्या ये तेजी निवेशकों के लिए पुराने अच्छे दिन लौटाने वाली है। अगर शेयर बाजार के अनुमान की मानें तो भारतीय जनता पार्टी के चुनावी नारे अच्छे दिन आने वाले हैं की तर्ज पर बाजार के भी अच्छे दिन आने वाले हैं। अब इस बाजार के अनुमान को मानें तो नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार बनने वाली है। और जो बाजार अभी तक अकेले भारतीय जनता पार्टी के 200 के अंदर रहने और मुश्किल से एनडीए बनाकर सरकार का उम्मीद में था। वो बाजार अचानक अकेले भारतीय जनता पार्टी के ही 210-240 सीटों के जीतने का अनुमान लगा रहा है और इसी आधार पर आसानी से नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनने की उम्मीद कर रहा है। 


मई महीने के दूसरे हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन जब दुनिया से किसी तरह का कोई संकेत नहीं था। सिर्फ इसी एक संकेत कि नरेंद्र मोदी मजे से  सरकार बना लेंगे। भारतीय शेयर बाजार ने वो छलांग लगा दी जिसके ट्रेडर, ब्रोकर लंबे समय से इंतजार कर रहे थे। बाजार को अनुमान  ये है कि नरेंद्र मोदी की सरकार बनेगी और ढेर सारे वो रुके हुए फैसले ले लिए जाएंगे जिसके न लागू होने की वजह से दुनिया की रेटिंग एजेंसियां भारत में निवेश को जोखिम बताने लगी थीं। बाजार को उम्मीद है कि मोदी ऐसे फैसले लेंगे जिससे भारत के कारोबारी देश में तेजी से औद्योगिक गतिविधि बढ़ा सकेंगे। बुनियादी परियोजनाओं के पूरा होने में कोई रुकावट नहीं आएगी। यूपीए दो के दौरान सरकार पर जो लगातार पॉलिसी पैरलिसिस का आरोप लगता था वो, खत्म हो जाएगा। बाजार इसी आधार पर दौड़ लगा चुका है। बाजार में ये सब कुछ हुआ है मई महीने के दूसरे हफ्ते में। और मई महीने के तीसरे हफ्ते यानी 16 मई को ये तय हो जाएगा कि बाजार की उम्मीदें कितनी पूरी होंगी। मतलब नरेंद्र मोदी आसानी से सरकार बना पाएंगे या नहीं। चलिए एक बार मान लेते हैं कि 16 मई को जब ईवीएम खोले जाएंगे तो ढेर सारे कमल निशानों के साथ नरेंद्र मोदी सरकार बनाने के लिए रायसीना हिल्स की ओर बढ़ जाएंगे। ये भी मान लेते हैं कि नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी को अकेले 230-240 और बची सीटें आसानी से एनडीए के साथ पूरी हो जाएंगी। नरेंद्र मोदी की वो सरकार बन जाएगी। जो ये कह रही है कि अच्छे दिन आने वाले हैं। अब जरा ये बात कर लें कि अच्छे दिन आने का मतलब क्या। मोटा-मोटा पांच बातें अगर हो जाएं तो मुझे लगता है कि देश के लोग ये मानने लगेंगे कि अच्छे दिन आ गए हैं। सबसे पहले महंगाई कम हो जाए। महंगाई मतलब- सब्जी, अनाज और दूसरी रोज की खाने-पीने चीजें उन्हें सस्ती मिलें। फिर क्या उद्योगों को भरोसा लौटे और वो देश में आसानी से अपने उद्योग लगा चला सकें। फिर क्या कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अच्छा करने लगे। मतलब कारें, एसी, फ्रिज खूब बिकें। और क्या हो वो ये कि लोगों को सस्ता कर्ज मिले।  सस्ती ब्याज दरों पर घर, गाड़ी खरीद सकें। बुनियादी सुविधाएं यानी सड़क, बिजली, पानी की सहूलियत आसानी से मिल सके। और इस सबके लिए सबसे जरूरी कि ढेर सारे रोजगार के मौके बनें। जिससे लोगों की कमाई बढ़े और वो इस तरह से खर्च कर सके, बचा सके कि देश की तरक्की की रफ्तार यानी जीडीपी के आंकड़े दुरुस्त हो सकें।

अच्छी बात ये है कि यूपीए दो की सरकार सारी आलोचनाओं के बाद अपने पीछे अच्छा विदेशी मुद्रा भंडार खजाने में छोड़कर जा रही है। लेकिन, दूसरी देश की ऐसी समस्याएं और गंभीर हुई दिख रही हैं जिसको आधार बनाकर नरेंद्र मोदी कह रहे हैं कि उनकी सरकार बनाइए तो अच्छे दिए आएंगे। सबसे ज्यादा चोट पड़ी है तो भारतीयों पर महंगाई की। महंगाई का आलम ये रहा है कि पिछले तीन सालों से हर बार जब महीने का सामान खरीदने के लिए भारतीय निकलता है तो उसे पहले से ज्यादा रकम चुकानी पड़ी है। रोज की जरूरत के सामान तेजी से महंगे हुए हैं। आटा, दाल, चावल, सब्जी, दूध और दूसरी सारी जरूरी चीजें तेजी से महंगी हुई हैं। हर तीसरे महीने अखबारों में विज्ञापन देकर दूध कंपनियां दूध के दाम एक-दो रुपया बढ़ाने के तर्क पेश करती हैं। और सबसे बड़ी बात ये रही है कि यूपीए एक हो या दो- दोनों ही कार्यकाल में देश में मॉनसून बेहतर रहा है और खाद्यान्न के मामले में भारत की स्थिति बहुत अच्छी रही है। इसके बावजूद सरकार अनाज, फल, सब्जी, दूध की कीमत काबू में नहीं कर सकी। और प्याज की कीमतों पर तो कोहराम मचा। अब सवाल ये है कि नरेंद्र मोदी इस मोर्चे पर क्या आसानी से काबू पा लेंगे। तो इसका जवाब नहीं में हैं। क्योंकि, अभी तक जो मौसम का हाल रहा है वो, साफ दिखा रहा है कि इस साल मॉनसून सामान्य से कम हो सकता है जिसका सीधा सा मतलब होगा कि खेती पर बुरा असर पड़ेगा। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की हालत का अंदाजा लगाइए कि ताजा कारों की बिक्री का आंकड़ा बढ़ने के बजाए करीब दस प्रतिशत कम बता रहा है। मतलब लोगों की जेब में कारें खरीदने के पैसे नहीं हैं। वो भी तब जब दुनिया की हर कार कंपनी भारतीयों को लुभाने के लिए ढेर सारे नए मॉडल हर महीने ला रही है। देश में महंगे कर्ज की वजह से औद्योगिक घरानों को अपनी विस्तार योजना रोकनी पड़ी है। इससे देसी निवेश बुरी तरह प्रभावित हुआ है। घर खरीदने के लिए ग्यारह प्रतिशत के आसपास और गाड़ी खरीदने के लिए लोगों को साढ़े बारह प्रतिशत से ज्यादा ब्याज देना पड़ रहा है। इसकी वजह से रियल एस्टेट सेक्टर में जबर्दस्त ठहराव आ गया है। दिल्ली, मुंबई के बाजार में साल भर पहले के भाव अभी भी थोड़ा खोजने पर मिल जा रहे हैं। डेवलपर भी फंड की वजह से अपने चल रहे प्रोजेक्ट को पूरा नहीं कर पा रहे हैं और नए प्रोजेक्ट शुरू ही नहीं कर पा रहे हैं। अब रियल एस्टेट सेक्टर को उम्मीद है कि नरेंद्र मोदी आएंगे तो इस सेक्टर में तेजी आएगी लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस तरह की नीतियां भारत सरकार की रियल एस्टेट सेक्टर के लिए उसमें डर यही है कि 16 मई के बाद की रियल एस्टेट की तेजी सिर्फ बुलबुला होगी, काला धन बढ़ाने वाली होगी। वो फायगा करेगी तो रियल एस्टेट डेवलपर्स का। उससे देश की जीडीपी में खास बेहतरी नहीं होने वाली। जीडीपी की बेहतरी की चिंता इसलिए कि जीडीपी ग्रोथ यानी तरक्की की रफ्तार इस समय दशक में सबसे कम यानी साढ़े पांच प्रतिशत की है। और इस वित्तीय वर्ष में भी इसी के आसपास ये रफ्तार रहती दिख रही है। क्योंकि, जब तक अगली सरकार, चाहे वो मोदी की हो या किसी और की, काम शुरू कर पाएगी तब तक इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही बीत चुकी होगी और दूसरी तिमाही का आधार भी बन चुका होगा। ऐसे में इस तरक्की की रफ्तार को चमत्कारिक तरीके से बढ़ाना नरेंद्र मोदी या अगली किसी भी सरकार के लिए चुनौती होगी।

बात हमने शेयर बाजार के संकतों से शुरू की थी। इसलिए शेयर बाजार की ही बात फिर से कर लेते हैं और उसके संकेतों को भी ज्यादा गंभीरता से समझने की कोशिश करते हैं। मई के दूसरे हफ्ते में शेयर बाजार में ये जो तेजी देखने को मिली है ये पूरी तरह से उन विदेशी खिलाड़ियों की वजह से है जो एक झटके में अपनी सारी रकम निकालकर किसी दूसरे अच्छे मुनाफा देने वाले ठिकाने की ओर  चल देते हैं। यानी 2008 की ही तरह तेजी से विदेशी निवेशक मुनाफा लेकर भागने लगे तो सेंटिमेंट पर चलने वाले बाजार को बचाना बड़ा मुश्किल होगा। शेयर बाजार की तेजी में जो शेयर सबसे तेजी से भागे हैं उनमें बैंक, पावर और रियल एस्टेट सबसे आगे हैं। हालांकि, अच्छी बात ये है कि मई के दूसरे हफ्ते में आई इस तेजी के नेता वो शेयर हैं जिनके फंडामेंटल्स काफी अच्छे हैं और वो लंबे समय से बाजार में आई कमजोरी की वजह से पिट रहे थे। लेकिन, इसी का दूसरा पहली ये भी है कि शेयर बाजार की इस तेजी में नब्बे प्रतिशत से ज्यादा कंपनियां शामिल नहीं हैं और न ही देसी निवेशक इस तेजी का हिस्सा है। शेयर बाजार में भारतीय देसी निवेशकों की रुचि भी कितनी तेजी से खत्म हुई है इसका अंदाजा लगाने के लिए एक आंकड़ा काफी होगा। इस साल के पहले महीने से मार्च महीने में देसी निवेशकों यानी एनएसडीएल के जरिए ट्रेडिंग अकाउंट खुलवाने वाले करीब आधा प्रतिशत घटे हैं। डर ये कि अगर इस बार 16 मई के बाद 2008 जनवरी वाले हालात हुए तो देसी निवेशक ऐसा भागेंगे कि फिर बरसों ये भरोसा वापस लाने में लग जाएगा। इसलिए शेयर बाजार से मिल रहे अच्छे दिन के संकेतों पर सावधानी बरतने की जरूरत है। नई सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां होंगी फिर चाहे वो अच्छे दिन लाने का दावा करने वाले नरेंद्र मोदी ही क्यों न हों। लालच से बचने की जरूरत है वरना सरकार कोई भी आए लालच अच्छे दिनों को बुरे दिन में बदल देगा। और भारतीय लोकतंत्र है पूरी तरह अनिश्चित। 99 प्रतिशत मोदी की अच्छे दिन वाली सरकार के साथ एक प्रतिशत दूसरी सरकार भी मानें तो देश की भावनाएं जिस तरह से कमजोर होंगी उन्हें उबारना बहुत बड़ी चुनौती होगी।

Tuesday, January 15, 2013

20000 का बाजार और यूपीए की सरकार!

क्या बाजार का मूल स्वभाव ही चोरी, सट्टेबाजी है। कल वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने पहले के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के समय के एक कानून को 2016 तक के लिए टालने का एलान किया। ये कानून इनकम टैक्स विभाग के अधिकारियों को ज्यादा अधिकार देता है कि वो..., विदेशियों की भारत में टैक्स चोरी के मामले की अच्छे से जांच कर सकें। तब से हंगामा मचा था। चिदंबरम ने आते ही इसे 2013-14 तक टाला था। लेकिन, इत्ते से बात नहीं बनी। अब विदेशी निवेशकों को राहत है कि ये कानून GAAR 2016 तक लागू नहीं होगा। इससे बाजार कल खूब भागा। आज भी। बाजार के काम करने की क्या यही मूल शर्त है कि चोरी करने वालों पर शिकंजा न कसे। वो, उसी रकम को घुमाते रहें और बाजार बढ़ाते रहें।
 
 
वैसे, अपने पी चिदंबरम साहब बाजार भगाने के पुराने उस्ताद हैं। 2014 में लोकसभा चुनाव हैं और ये 2013 की शुरुआत है यानी करीब डेढ़ साल का समय है। 2007 अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा पता नहीं कितने लोगों को याद है। यही पी चिदंबरम साहब वित्त मंत्री थे। शेयर बाजार अचानक धड़ाधड़ कर गिरने लगा था। सट्टेबाजों ने तेजी से निवेश निकालना शुरू कर दिया। और, उस समय भी पी नोट्स और FII का ही झंझट था। लेकिन, वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने उस गिरते बाजार में एंट्री क्या ली। सब मामला पलट गया था किसी फिल्म की कहानी जैसा। तब भी ये समझना मुश्किल नहीं था कि आखिर ये बौराया बाजार किसका भला कर रहा है। हाल ये है कि अगर आप घूम टबलकर इस देश के निवेशकों से चर्चा कर लें तो, झूठ बोलकर बुद्धिमान बनने के चक्कर में भले ही सीना चौड़ा किए बाजार से कमाई करने की कहानी सुनने को मिल जाएं। लेकिन, थोड़ा डिटेल में बात कीजिएगा तो, समझ में आएगा कि हमें तो, बड़ी समझ थी लेकिन, कभी ब्रोकरेज के चक्कर में पिट गए तो, कभी बस चूक गए टाइप के बहानों से खुद के बाजार विशेषज्ञ होने की बात बताने वाले लोग मिल जाएंगे। और, इसी विशेषज्ञ होने की कमजोरी को सरकार समझ चुकी है। इसीलिए उसे पता है कि सेंसेक्स सरपट दौड़ता रहे तो, देश की जनता को तरक्की का आभास होता रहेगा। भले उसकी जेब में हुआ छेद बड़ा होता जा रहा है।
 
गजब के फॉर्मूले पर चल रही है यूपीए सरकार। यूपीए 1 पता नहीं किस चमत्कार से आ गई। लेकिन, यूपीए 1 ऐसे ही चमत्कारों से आई थी। 2007 अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में आई इस गिरावट और उसके चमत्कारिक उभार के ठीक पहले यानी अक्टूबर 2007 के पहले पखवाड़े में ही सरकार ने 2009 के लोकसभा चुनाव के लिए तैयारियां शुरू कर दी थीं। और, उन तैयारियों का आगाज भी हो गया था।  उसका असर ये रहा है कि 2009 में यूपीए 2 सत्ता में। और, 2009 में सरकार बनने के साथ ही सरकार के होने पर ही सवाल खड़े होते रहे। देश के सभी राज्यों में कांग्रेस पिटती रही। सिवाय दिल्ली के। देश के सबसे बड़े राज्य यूपी, बिहार में कांग्रेस गायब सी ही रही। लेकिन, अब जब फिर 2009 के लोकसभा चुनाव की तरह 2014 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ डेढ़ साल ही बचे हैं तो, चिदंबरम साहब का चमत्कार दिखने लगा है। नीति विकलांगता से ग्रस्त यूपीए 2 अचानक सारी नीतियों को कड़ाई से लागू करने लगी है या लागू करने की बात करने लगी है। शेयर बाजार का एक अहम वाला सूचकांक सेंसेक्स फिर से 20000 की तरफ जा पहुंचा है। आज तो, छूकर वापस लौटा है। विदेशी निवेशकों को टैक्स चोरी पर भी सरकारी इनकम टैक्स अधिकारी ज्यादा कड़ाई नहीं कर सकेंगे ये खबर सुनते ही विदेशी निवेशक हर तरह की कमाई लेकर भारतीय शेयर बाजार की चमक फिर बढ़ाने में लग गए। मकर संक्रांति के दिन जब प्रयाग (इलाहाबाद) के महाकुंभ में श्रद्धालु आस्था, पुण्य की गठरी संजोने में लगे थे तो, विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से मुनाफे की गठरी तैयार करने में लगे हुए थे। 14 जनवरी को FII यानी विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार में $ 185.41 मिलियन की रक लगा दी। अब कहां टिक पाएंगे इस रकम के सामने हमारे विदेशी निवेशक। ठीक वैसे ही जैसे कहां वॉलमार्ट की लॉबी के आगे टिक पाएंगे हमारे देसी किराना वाले।
 
लेकिन, इसे सरकार क्यों माने। क्यों समझे। बिना माने-समझे और विदेशियों, विदेशी पैसे की चिंता से ही तो, यूपीए 2 आया। यूपीए 3 का भी जुगाड़ लगा लिए हैं। कम लोगों को कम पैसे देने वाली डायरेक्ट कैश सब्सिडी ट्रांसफर योजना को सरकार के मंत्री मैच विनर कह रहे हैं। समझ रहे हैं न सेंसेक्स के 20000 वाले बाजार और सरकार के बनने में बड़ा तालमेल है।

Monday, August 08, 2011

फूल रहा है दुनिया के दादा का दम

शुक्रवार को अमेरिकी शेयर बाजार जब बंद होने की तरफ बढ़ रहे थे। तो, दुनिया की जानी-मानी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी एस एंड पी यानी स्टैंडर्ड एंड पुअर के दफ्तरों में हलचल बढ़ गई। खबरें जो, निकलकर आईं कि दरअसल अमेरिकी कर्ज संकट को सुलझाने के लिए रेटिंग एजेंसी के तय फॉर्मूले के गणित में थोड़ी गड़बड़ हो गई थी। जिसकी वजह से कर्ज की सीमा बढ़ाने और खर्च घटाने के अमेरिकी सरकार की योजना के आधार पर अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग एएए प्लस पर ही बनी रही। लेकिन, शुक्रवार को अमेरिकी बाजार बंद होने से पहले ही स्टैंडर्ड एंड पुअर ने दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की साख पर संदेह खुलेआम जाहिर कर दिया। स्टैंडर्ड एंड पुअर ने अमेरिकी क्रेडिट रेटिंग एएए प्लस से घटाकर एए प्लस कर दिया। और, उस पर भी रेटिंग एजेंसी ने इसे निगेटिव आउटलुक के साथ जारी किया है। इसका मतलब ये हुआ कि अगले 12 से 18 महीने में एक बार फिर से अमेरिका की रेटिंग घटने का खतरा है। और, अमेरिकी रेटिंग का घटना इसलिए भी ऐतिहासिक है कि ये रेटिंग एजेंसी के अस्तित्व में आने के बाद पहली बार हुआ है।
अब सवाल ये है कि इस रेटिंग के घटने को अमेरिकी अर्थव्यवस्था और दुनिया के लिए कितने बड़े खतरे के तौर पर देखा जाना चाहिए। दरअसल अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए ये झटका 2008 में आई मंदी से भी बड़ा है। उसकी वजहें भी साफ हैं। 2008 में जो, मंदी आई थी उसमें अमेरिकी सरकार की साख को बट्टा नहीं लगा था। उस वक्त भी रेटिंग एजेंसियों ने अमेरिका की एएए प्लस की रेटिंग नहीं घटाई थी। क्योंकि, उस मंदी की वजह अमेरिका के रियल एस्टेट सेक्टर और खराब कर्जों को नए तरीके से पैकेजिंग करके बेचकर ज्यादा मुनाफा कमाने का बैंकों का लालच था। लेकिन, इस बार मामला ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि, इस बार तो, सरकारी खजाना ही खाली है। पिछली मंदी में बैंक दिवालिया हुए थे, इस बार तो, सरकार दिवालिया होती दिख रही है। सरकारी बिल के भुगतान में दिक्कत है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिकी कंगाली दुनिया के सामने खुलने का डर दिखाकर कर्ज लेने की सीमा बढ़ाने वाले बिल पर रिपब्लिकन और डेमोक्रैट्स दोनों को एक साथ आने के लिए मना लिया। लेकिन, अमेरिका की जो, योजना है खर्च घटाने की वो, दरअसल अभी भी संदेह के घेरे में है। वैसे तो, अमेरिका ने अगले दस सालों में वित्तीय घाटा 2.1 ट्रिलियन डॉलर घटाने का प्रस्ताव पारित किया है जो, 4 ट्रिलियन डॉलर से काफी कम है। लेकिन, 2.1 ट्रिलियन डॉलर घटाने की भी जो, योजना है वो, संदेह के घेरे में है।
ये संदेह बाजार में बवाल बनकर उभर रहे हैं। अमेरिकी शेयर बाजारों के लिए बीता हफ्ता पिछले दो सालों का सबसे खराब हफ्ता साबित हुआ है। अमेरिकी शेयर बाजार का एसएंडपी 500 सूचकांक पिछले दस कारोबारी दिनों में करीब ग्यारह प्रतिशत गिरा है। अमेरिका गिरा तो, पीछे-पीछे सारे यूरोपीय, एशियाई बाजार भी धड़ाम हो गए। अमेरिका का अपना बुरा हाल और उस पर यूरोप का बढ़ता कर्ज संकट। कुल मिलाकर एक बार फिर दुनिया भर के अर्थशास्त्री ये आशंका जताने लगे हैं कि अमेरिका फिर से मंदी के मुंह में जा रहा है। यस वी कैन का नारा देकर अमेरिकी बदलाव का प्रतीक बन गए बराक ओबामा के भाषणों का नशा अमेरिकी जनता के दिमाग से खत्म हो गया है।

मंदी से बाहर आए अभी अमेरिका को करीब साल का ही समय बीता है कि फिर से मंदी का भूत व्हाइट हाउस की छत पर मंडराने लगा है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के पांव उखड़ने लगे हैं। इस वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में अमेरिका की जीडीपी सवा परसेंट (1.3%) से भी कम बढ़ी है। हालांकि, पहली तिमाही से हालात सुधरे हैं। पहली तिमाही में अमेरिका की जीडीपी आधा परसेंट (1.3%) से भी कम बढ़ी है। अगर पहले छे महीने का हाल देखें तो, ये बढ़त मंदी के बाद रिकवरी की शुरुआत यानी जून 2009 के बाद सबसे कम है।

अर्थशास्त्रियों को डर है कि अमेरिका फिर से मंदी के मुंह में जा सकता है। और, अमेरिकी मंदी का मतलब हुआ- दुनिया भर में मंदी के बादल छाने का खतरा। क्योंकि, GDP की रफ्तार घटने से दूसरी तिमाही में GDP $13.27 ट्रिलियन रह गई है। ये आंकड़ा इसलिए भी डरा रहा है कि मंदी के ठीक पहले यानी 2007 की आखिरी तिमाही में अमेरिका की कुल जीडीपी $13.33 ट्रिलियन डॉलर ही थी। ये आंकड़े साफ बता रहे हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर अब लगा कोई भी एक धक्का इसे सीधे मंदी के मुंह में धकेल देगा।
और, वो धक्का लगता दिख रहा है अमेरिका के खाली सरकारी खजाने की वजह से। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने अमेरिका की कंगाली का वास्ता देकर अमेरिकी सीनेट से कर्ज लेने की सीमा तो बढ़वा ली। लेकिन, जानकार इसे कुछ समय की ही राहत मान रहे हैं। इसके अलावा भी बहुत से ऐसे कारण फिर से उभर रहे हैं जो, अमेरिकी अर्थव्यवस्था को फिर से मंदी की तरफ खींच रहे हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में पिछली तिमाही में जो, झटका लगा है। उसकी सबसे बड़ी वजह है अमेरिकियों ने अपने खर्चे घटा दिए। दरअसल, अमेरिका की पूरी अर्थव्यवस्था खर्च पर ही चलती है। खर्च करने पर ही अर्थव्यवस्था का सत्तर प्रतिशत निर्भर करता है। और, खर्च करने में माहिर माने जाने वाले अमेरिकियों ने घर, गाड़ी हो या फिर दूसरी रोज के इस्तेमाल की जरूरी चीजें- सबकुछ खरीदने में कंजूसी दिखाई है। पिछली तिमाही में अमेरिकियों ने सिर्फ 0.1 प्रतिशत घर ज्यादा खरीदे। ये अप्रैल-जून 2009 की तिमाही के बाद सबसे कमजोर बढ़त है। मंदी के संकेत कार और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स की खरीद के आंकड़ों में भी दिखने लगे हैं। पिछली तिमाही में अमेरिकियों ने करीब साढ़े चार परसेंट (4.4%) कम गाड़ियां और टीवी, फ्रिज खरीदे। दरअसल, अमेरिकियों की जेब में इतने पैसे ही नहीं बच रहे हैं कि वो, खर्च कर सकें। अमेरिकियों का फूड और एनर्जी का बिल बहुत बढ़ गया है। इसलिए खाने और आने-जाने पर खर्च के अलावा दूसरे खर्चों में अमेरिकियों को कटौती करनी पड़ी। मई महीने में गैसोलीन का एक गैलन 4 डॉलर महंगा हो गया। ये बढ़त पिछले तीन सालों में सबसे बड़ी है।
2008 की मंदी के पहले तक दुनिया में भारी जेब और नौकरी के बूते सबसे खुशहाल दिखने वाले अमेरिकी बेरोजगार हो रहे हैं। जिस अमेरिका में माना ये जाता था कि जिसे नौकरी चाहिए उसे मिलेगी। यहां तक कि दुनिया तो, ये समझती थी कि अमेरिकी 6 महीने नौकरी करके 6 महीने मौज में बिताते हैं। अब वो अमेरिका बदल गया है। नौकरियां गायब हो रही हैं। जून में बेरोजगारी की दर चढ़कर करीब दस प्रतिशत पर पहुंच गई। 8 जुलाई को अमेरिकी लेबर डिपार्टमेंट के ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि जून महीने में सिर्फ 18000 लोगों को नौकरी मिली। उस पर निराशाजनक बात ये है कि बड़ी-बड़ी अमेरिकी कंपनियों ने छंटनी का प्लान तैयार कर रखा है। अमेरिका की दूसरी सबसे बड़ी दवा कंपनी मर्क एंड कंपनी 2015 तक करीब 13000 कर्मचारी घटाएगी। सिस्को 6,500 लोगों को बाहर करेगी। LMT ने 6500 कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवत्ति लेने का प्रस्ताव दिया है। गोल्डमैन भी एक हजार लोगों को निकालेगी।
दुनिया में बढ़ती कमोडिटी कीमतों ने अमेरिकियों की कमर तोड़ दी है। दुनिया की सबसे बड़ी स्नैक-फूड बनाने वाली कंपनी पेप्सिको ने पहले ही कह दिया है कि इस साल मुनाफा पहले के अनुमान से कम होगा। वजह वही कि कमोडिटी की कीमतें बढ़ी हैं। और, कंज्यूमर की तरफ से कोई मांग नहीं है। कुल मिलाकर दुनिया के दादा का दम फूलता दिख रहा है। और, उसका बुरा असर दुनिया पर कुछ वैसे ही होता दिख रहा है जैसे, किसी बड़े जमींदार के दिवालिया होने की खबर से गांव में सुख चैन से दो जून की रोटी खाने वाले भी डर जाते हैं कि क्या होगा। भारत में भी निवेशकों को समझ में नहीं आ रहा कि वो क्या करें। अमेरिका की ये बदहाली विश्व अर्थव्यवस्था में अमेरिका, यूरोप की अगुवाई से एशिया की अगुवाई का मौका बनता दिख रहा है। लेकिन, मुश्किल यही है कि पिछले दो ढाई सालों में कुप्रबंधन की मिसाल बन चुकी हमारी सरकार क्या इसे मौके के तौर पर देखती है। क्योंकि, अर्थव्यवस्था में अगुवा सिर्फ बयानबाजी से नहीं बना जा सकता।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...