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Wednesday, March 18, 2015

भ्रष्टाचार की बुनियाद हिलाने वाले विनोद राय

सिर्फ 33 कोयला खदानों की नीलामी से दो लाख करोड़ रुपये सरकारी खजाने में आने से साफ है कि नीतियों के आधार पर सरकार चलने से भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल सकती है। अगर हम देश नीतियों के आधार पर चलाएंगे तो हम देश अच्छे से चला सकते हैं। देश को भ्रष्टाचार मुक्त कर सकते हैं। हम रिश्वत मुक्त तंत्र बना सकते हैं। हमने ये जिम्मेदारी उठाई है और हम देश को उसी रास्ते पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। 33 कोयला खदानों की नीलामी से दो लाख करोड़ रुपये सरकारी खजाने में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये कहा। लेकिन, जब कोयला खदानों के आवंटन में गड़बड़ियों की तरफ सीएजी ने इशारा किया था तो, कम ही लोगों को ये भरोसा रहा होगा कि कोयला खदानों के आवंटन में सरकारी हितों को इस तरह से दरकिनार किया गया है। जब सीएजी विनोद राय ने कोयला खदानों के आवंटन से देश के खजाने में एक लाख छियासी हजार करोड़ रुपये का नुकसान होने का अंदेशा जताया था तो, ज्यादातर आर्थिक विद्वान इसे देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालने वाली रिपोर्ट बता रहे थे। अर्थव्यवस्था के जानकार यही मान रहे थे कि सीएजी का ये आंकलन पूरी तरह से अनुमानों पर तैयार किया गया है। और इस तरह की रिपोर्ट से निवेश का माहौल खराब होगा। यहां तक कि सीएजी विनोद राय के ऊपर राजनीतिक झुकाव तक के आरोप लग रहे थे। यूपीए सरकार के मंत्री सीधे-सीधे सीएजी विनोद राय को धमकी देने वाले अंदाज में बात कर रहे थे। भला हुआ कि सितंबर 2014 में सर्वोच्च न्यायालय को सीएजी की रिपोर्ट सिर्फ कल्पना नहीं लगी और सर्वोच्च न्यायालय ने सभी 204 खदानों का आवंटन रद्द कर दिया। उन्हीं 204 खदानों में से 33 खदानों की नीलामी सरकार ने की है। उन्हीं 33 खदानों की नीलामी से सरकार के खजाने में दो लाख करोड़ रुपये आ गए हैं। अब इस नीलामी की रकम सामने आने के बाद सचमुच ये बात साबित हो रही है कि सीएजी के आंकड़े कल्पना के आधार पर तैयार किए गए थे। लेकिन, सीएजी की कल्पना की उड़ान भी बड़ी छोटी थी। सीएजी की रिपोर्ट में एक लाख छियासी हजार करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान लगाया गया था। जबकि, सिर्फ 33 खदानों ने सरकार के खजाने में दो लाख करोड़ रुपये डाल दिए हैं।

 

इस बात पर बहस हो सकती है कि देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल बनाने में कौन-कौन सी बातें थीं जिन्होंने देश में बदलाव का मानस तैयार किया। और इतना तो तय है कि वो कोई एक दो घटनाएं या व्यक्ति नहीं थे। वो ढेर सारी घटनाएं, संस्थाएं और व्यक्ति थे। बहुत से कारक मिले, जिससे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल बना और उसी वजह से यूपीए दो से तीन के राह में नरेंद्र मोदी आकर खड़े हो गए। लेकिन, सच्चाई यही है कि अगर आज नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री के तौर पर ये कह पा रहे हैं कि न खाऊंगा न खाने दूंगा तो, इसकी बुनियाद संस्था के तौर पर सीएजी और व्यक्ति के तौर पर विनोद राय ने रखी थी। वो सीएजी संस्था और व्यक्ति विनोद राय ही थे, जिन्होंने भ्रष्टाचार की बुनियाद पर बहुत कसकर चोट की थी। ये सीएजी विनोद राय ही थे जिन्होंने बिना किसी बात की परवाह किए एक के बाद एक ऐसी रिपोर्ट बनाई जिससे देश को पता चला कि दरअसल यूपीए एक और दो की नीतियां किस तरह से भ्रष्टाचार की बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी कर रही हैं। और सबसे बड़ी बात ये कि विनोद राय ये सब इसके बावजूद कर रहे थे कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बेहद स्वच्छ छवि वाले मनमोहन सिंह बैठे हुए थे। यहां तक कि सीबीआई के समन के बावजूद ज्यादातर लोगों का यही मानना है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बेईमान नहीं हो सकते। ये धारणा अभी भी पक्के तौर पर लोगों के दिमाग में बैठी हुई है। सोचिए जरा जिस समय सीएजी विनोद राय ने स्पेक्ट्रम और कोयला घोटाले पर रिपोर्ट पेश की थी। सोचिए उस समय मनमोहन सिंह की बेहद ईमानदार छवि के सामने इतने बड़े भ्रष्टाचार की रिपोर्ट देना कितने साहस का काम रहा होगा। विनोद राय ने वो साहस दिखाया।

  

स्पेक्ट्रम घोटाले पर सीएजी की रिपोर्ट पर तत्कालीन संचार मंत्री कपिल सिब्बल की जीरो लॉस थियरी तो सबको याद ही होगी। सीएजी की रिपोर्ट कह रही थी कि स्पेक्ट्रम घोटाला हुआ है। इसी घोटाले में संचार मंत्री रहे ए राजा से लेकर डीएमके की कनिमोझी तक जेल जा चुकी हैं। पहले आओ पहले पाओ की नीति में ढेर सारी अनियमितताएं की गईं, ये भी अब सामने आ चुका है। लेकिन, तब सीएजी की रिपोर्ट पर तत्कालीन संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने शास्त्री भवन में बुलाई गई पत्रकार वार्ता में पत्रकारों के सामने इस तरह से तथ्य पेश किए कि लगा सीएजी ने कपोल कल्पना के आधार पर रिपोर्ट पेश कर दी है। और ये रिपोर्ट सिर्फ और सिर्फ देश के आर्थिक तरक्की के माहौल को झटका देने का काम करेगी। दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार की राह में सीएजी विनोद राय की रिपोर्ट बाधा की तरह दिख रही थी। ईमानदार छवि वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मंत्रियों ने यहां तक कहना शुरू कर दिया था कि सीएजी विनोद राय और पीएसी के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी के निजी संबंधों की वजह से सीएजी सरकार को सांसत में डालने वाली रिपोर्ट तैयार कर रहा है। लेकिन, अब न तो यूपीए की सरकार है, न उनके बड़बोले मंत्री और न ही उनके बेबुनियाद तथ्य। तथ्य ये साबित हुआ है कि सरकार को इस मंदी के दौर पर में स्पेक्ट्रम की नीलामी से भी एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा मिल चुके हैं। अब कोई ये नहीं कहेगा कि सीएजी ने यूपीए दो के समय देश की तरक्की की राह में बाधा खड़ी की थी। बल्कि, सच्चाई ये है कि अब अगर देश में तेजी से तरक्की का माहौल बन रहा है और इस माहौल के साथ भ्रष्टाचार करने में लोगों को डर लगता है तो, इसकी बुनियाद सीएजी विनोद राय ने रखी थी। ऐसी बुनियाद जिस पर देश में कम से कम भ्रष्टाचार वाला तंत्र तैयार किया जा सकता है। जिस तंत्र को तैयार करने की बात प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी कर रहे हैं वो तंत्र सीएजी की रिपोर्ट की बुनियाद से ही बनना शुरू हुआ है। मेरा मानना है कि जब भी देश में हुए इस बड़े बदलाव की बात होगी तो, सीएजी विनोद राय को भी याद किया जाएगा।

Wednesday, October 30, 2013

प्रतिष्ठित भारत, धूमिल चीन



चीन के राष्ट्रपति झी जिनपिंग ने 22 जनवरी को साफ कहा था कि चीन में कोई भी भ्रष्ट बचेगा नहीं। उन्होंने अपने बयान में कहा था कि हमें उस धरती को ही खत्म कर देना है जिस पर भ्रष्टाचार का बीज पनपता है। जिनपिंग ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में छोटे या बड़े भ्रष्ट का फर्क नहीं होगा। चीन के राष्ट्रपति भले ही भ्रष्टाचार मुक्त चीन की कल्पना कर रहे हों। जिनपिंग इसे लेकर कितने संजीदा हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में ढेर सारे बड़े अधिकारियों के साथ चाइना नेशनल पेट्रोलियम के पूर्व मुखिया जियांग जीमिन भी बुरी तरह फंसते दिख रहे हैं। चीन के जिंयांगसू प्रांत की राजधानी नानजिंग के मेयर के खिलाफ भी आर्थिक अपराध की जांच चल रही है। लेकिन, चीन की कंपनियां भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने राष्ट्रपति की बड़ी लड़ाई की योजना की जड़ में ही मट्ठा डाल रही हैं।

दुनिया की जानी मानी संस्था ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल का ताजा सर्वे बता रहा है कि चीन की कंपनियां दुनिया की सबसे भ्रष्ट कंपनियां हैं। और उनके जो काम के तरीके हैं वो सबसे कम भरोसेमंद हैं। ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल दुनिया में भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करने वाला संगठन है। इसका मुख्यालय बर्लिन में है। 52 पन्ने की इस रिपोर्ट में इमर्जिंग मार्केट्स में कॉर्पोरेट्स के कामकाज के तरीके को जांचा गया है। BRICS यानी ब्राजील, रूस, इंडिया, चीन और दक्षिण अफ्रीका के अलावा 12 दूसरे विकासशील देशों की कुल 100 कंपनियों को इस सर्वे में शामिल किया गया है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण खबर ये है कि ये लगभग वही 100 कंपनियां हैं जिन्हें 2011 में ग्लोबल चैलेंजर्स की सूची में शामिल किया गया था। और इन 100 कंपनियों में औसत पारदर्शिता की बात करें तो ये सिर्फ 36 प्रतिशत है। इस सर्वे में जो बातें निकलकर आई हैं उससे दुनिया में अमेरिका के विकल्प के तौर पर देखी जा रही चीन की कंपनियों के कामकाज का तरीका बेहद खतरनाक संकेत देता है। 100 में से 11 कंपनियां जिनमें कंपनी के अंदर ही पारदर्शिता लगभग न के बराबर है उसमें से 9 चीन की ही कंपनियां हैं। ये सारी चीन की बड़ी कंपनियां हैं। चाइना नेशनल ऑफशोर ऑयल, अंशन आयरन एंड स्टील ग्रुप, चाइना शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री कॉर्पोरेशन, ऑटो पार्ट्स बनाने वाली कंपनी वैनजियांग और भारत में भी तकनीक का इस्तेमाल करने वालों के लिए काफी परिचित कंपनी हुआवेई टेक्नोलॉजीज भी शामिल हैं। इन कंपनियों ने किस देश में कितना निवेश है या किस तरह की आगे की योजना है इसकी भी जानकारी छिपाने की कोशिश की है।

चीन की कंपनियों से इसकी शुरुआत मैंने इसीलिए की कि बार-बार एक बात जो कही जाती है कि तरक्की के लिए चीन का मॉडल श्रेष्ठ है। जबकि, ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल का ताजा सर्वे बता रहा है कि किस तरह से चीन की कपनियां तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ती हैं। जबकि, इसी सर्वे में भारतीय कंपनियों ने भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने का काम किया है। ब्रिक्स देशों में सबसे अच्छी कंपनियां भारतीय ही हैं। भारत की कंपनियां ने सर्वे के पैमाने के औसत से काफी अच्छा 52 प्रतिशत हासिल किया है। भारत के बाद दक्षिण अफ्रीका, रूस, ब्राजील और सबसे अंत में जाहिर है चीन की कंपनियों का नाम आता है। और भारतीय कंपनियों की प्रतिष्ठा का झंडा लहराते सबसे आगे देश की सबसे प्रतिष्ठित टाटा ग्रुप की ही कंपनी है। ट्रांसपैरेंसी के मामले में टाटा कम्युनिकेशंस सबसे आगे है। सर्वे के मानकों पर टाटा कम्युनिकेशंस को 71 प्रतिशत मिले हैं। और इस सर्वे में एक बात जो और निकलकर आई है कि भले ही भारत की चर्चा दुनिया में इस समय पॉलिसी पैरालिसिस और भ्रष्टाचार जैसी वजहों से चर्चा में हो। लेकिन, भारत का कानूनी ढांचा ऐसा है कि भारत में काम करने वाली कंपनियों को अपनी आर्थिक जानकारियां सबके सामने रखनी पड़ती हैं। यानी भले ही नीरा राडिया टेप के बाद टाटा ग्रुप और भारतीय कंपनियों की प्रतिष्ठा धूमिल होती दिखी हो लेकिन, सच्चाई यही है कि भारतीय कंपनियां अभी भी दुनिया के पैमाने पर सबसे अच्छी हैं। इसीलिए ये ज्यादा जरूरी हो जाता है कि सरकार को उद्योगों की इस चेतावनी पर ध्यान देना चाहिए कि देश में बेहतर काम करने लायक माहौल खत्म हो रहा है। ये सर्वे दरअसल भारतीय लोकतंत्र और अदालतों के लोकतंत्र को ठीक रखने की भूमिका को भी महत्व दे रहा है।

इस सर्वे में एक और बात निकलकर सामने आई है कि जो कंपनियां शेयर बाजार में सूचीबद्ध हैं वो गैरसूचीबद्ध कंपनियों से ज्यादा बेहतर तरीके से काम कर रही हैं। यानी बाजार यहां पारदर्शिता बचाने और भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल बनाने में मददगार हो रहा है। दरअसल शेयर बाजार में गैरसूचीबद्ध कंपनियां अपने खातों में पारदर्शिता बहुत कम रखती हैं। यानी बाजार से सब बिगड़ता है ये वाली धारणा भी एकदम ठीक नहीं है। इस सर्वे में जब कंपनियों के राजनीतिक रिश्तों की जानकारी लेने की कोशिश की गई तो वहां ज्यादातर कंपनियों ने जानकारी स्पष्ट नहीं की। औऱ न ही दिए जाने वाले चंदे के बारे में। हालांकि, यहां भी भारतीय कंपनियां सबसे बेहतर हैं जबकि, चीन यहां भी सबसे बदतर। इस सर्वे की खबर भारतीय मीडिया में बहुत हल्के में लिखी-बोली गईं। जबकि, ये सर्वे भारतीय लोकतंत्र, कंपनियों और कानून की महत्ता दुनिया में दिखाने वाला है। और, सबसे बड़ी बात ये कि हमें अपने लिहाज से मॉडल तैयार करना होगा न कि चीन और अमेरिका को देखकर। उनका हश्र दुनिया देख रही है।

Thursday, April 05, 2012

उम्मीद तो, जगी है लेकिन,


दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन पर अन्ना

5 अप्रैल 2011 भारतीय इतिहास की कुछ उसी तरह की अहम तारीख है जैसे कि 15 अगस्त 1947 या फिर 26 जनवरी 1950। आजादी या गणतंत्र की तारीख से 5 अप्रैल 2011 की तारीख थोड़ा अलग मायने की है, अलग महत्व की है। आजादी और गणतंत्र की तारीखें ऐसी तारीखें हैं जिस दिन देश को अपनी आजादी और अपने गणतंत्र के होने का अहसास मिला। और, वो अहसास हमारा गर्व बना। क्योंकि, 15 अगस्त 1947 के बाद कम से कम सीधे तौर पर किसी विदेशी का हम पर शासन नहीं रहा और 26 जनवरी 1950 के बाद हमने खुद के बनाए संविधान के लिहाज से एक देश के तौर पर खुद को चलाना सीखा। 5 अप्रैल 2011 का भी महत्व अगर देखा जाए तो, इन दोनों ही तारीखों से कुछ कम नहीं है। लेकिन, 5 अप्रैल 2011 की तारीख अलग इस मायने में है कि इस दिन जो, उम्मीद की किरण दिखी थी वो, अब तक अहसास में नहीं बदल पाई है।
रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार मुक्त भारत की उम्मीद में जमे लोग
5 अप्रैल 2011 को, जो उम्मीद की किरण थी वो, थी भ्रष्टाचार मुक्त भारत की। 5 अप्रैल 2011 को जंतर-मंतर पर किशन बाबूराव उर्फ अन्ना हजारे जब अनशन पर बैठे तो, अंदाजा ही नहीं था कि इस नए गांधी ने भारत की बेहद कमजोर नस पर इतने सलीके से हाथ धर दिया है। नब्ज पकड़ में आई तो, भ्रष्टाचार की बीमारी से पीड़ित हर भारतीय प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर इस डॉक्टर के दवा के परचे की लाइन में खड़ा हो गया। लेकिन, भ्रष्टाचार की बीमारी दूर करने का दावा करने वाले डॉक्टर अन्ना हजारे की मुश्किल ये थी कि खुद के लिए भ्रष्टाचार की बीमारी का पक्का इलाज चाहने वाले हिंदुस्तानी दूसरे हिंदुस्तानियों के लिए खुद ही भ्रष्टाचार की बीमारी बढ़ाने का हर संभव प्रयास कर रहा था। देश में भ्रष्टाचार की बीमारी से लड़ते दिख रहे अकेले इस सीनियर सर्जन के साथ कुछ जूनियर सर्जनों की टीम भी बीमार भ्रष्ट भारतीयों के लिए उम्मीद की किरण दिखी। देश जागा। भ्रष्टाचार की बीमारी में बेसुधी की नींद ही कुछ ऐसी गहरी आई थी।
विकी पीडिया पर अन्ना हजारे का पृष्ठ बताता है कि वो, भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ने वाले महारथी हैं। पद्मश्री और पद्म भूषण जैसे प्रतिष्ठित भारतीय नागरिक सम्मान पा चुके इस शख्स की ढेरों उपलब्धियां भी विकीपीडिया के इस पेज पर मिलेंगी। लेकिन, 5 अप्रैल 2012 को सवाल वहीं का वहीं खड़ा है कि क्या 5 अप्रैल 2011 भारतीय इतिहास में 15 अगस्त 1947 या फिर 26 जनवरी 1950 जैसी निर्णायक तारीख बन पाएगी। कुछ अतिभ्रष्टाचारियों को छोड़कर, पूरे देश की तरह हम भी उम्मीद से हैं। क्योंकि, थोड़े बहुत भ्रष्टाचारी तो हम सब हैं। लेकिन, न्यूनतम भ्रष्टाचारी होने के कारण हम जैसे लोग रिपोर्टिंग करते एक्टिविस्ट की भूमिका में आ गए थे। ये अन्ना के आंदोलन की ताकत थी।
इलाहाबाद विकास प्राधिकरण में रजिस्ट्री के लिए मारामारी
लेकिन, बीते वित्तीय वर्ष के आखिरी दिन इत्तेफाक से हम इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के दफ्तर में काफी समय रहे। और, जमीन की रजिस्ट्री की पीड़ादायी प्रक्रिया और अन्ना को चुनौती देते बाबुओं की फौज से जूझते आम आदमी को देखकर मन में फिर सवाल खड़ा हुआ कि 5 अप्रैल 2011 आखिर निर्णायक तारीख कैसे बन पाएगी। यही वो, आम आदमी था जो, जंतर-मंतर, रामलीला मैदान से लेकर अपने शहर के नुक्कड़, चौराहे तक अन्ना के साथ गला फाड़कर, मैं अन्ना हूं की टोपी लगाकर खड़ा था। वही आम आदमी अपनी खरीदी जमीन की रजिस्ट्री के लिए बाबुओं के सामने रिरिया रहा था। बाबुओं की कृपादृष्टि भर से वो, प्रसन्ना हो रहा था। आजादी के 65 साल बाद भी रजिस्ट्री का वही घटिया तरीका। वही स्टैंप पेपर पर अंगूठे के निशान, हस्ताक्षर से लेकर एक बेहद घटिया पेपर की रसीद से रजिस्ट्री हो जाने की संतुष्टि।
प्राधिकरण में रिश्वत के खिलाफ लगा सूचनापट्ट
31 मार्च 2011 को ADA यानी इलाहाबाद विकास प्राधिकरण की लिफ्ट तेजी से का सातवें, आठवें तल पर ही जा रही थी। सातवें तल पर रजिस्ट्री के डीलिंग क्लर्क के पावन दर्शन होने थे। और, आठवें तल पर एक 25-30 लोगों की क्षमता वाले कमरे में एक साथ 100-150 लोग कुछ छूट की उम्मीद में आखिरी रजिस्ट्री कराने के लिए धंसे पड़े थे। हालांकि, सातवें तल पर डीलिंग क्लर्क के कक्ष के बाहर ही एक बड़ा बोर्ड लगा था जो, साफ तौर पर इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के अन्नामय होने की बात सार्वजनिक तौर पर कह रहा था। उस सार्वजनिक सूचना पट्ट पर साफ लिखा था कि प्राधिकरण के किसी भी कार्य के लिए कोई भी अधिकारी, कर्मचारी सुविधा शुल्क/ रिश्वत न लेने के लिए वचनबद्ध है। लेकिन, इसी बोर्ड पर अन्ना के साथ खड़े अन्ना के घोर विरोधी आम आदमी, कर्मचारी में से किसी ने सुविधा शुल्क/ रिश्वत न लेने के लिए वचनबद्धता को लेने की वचनबद्धता में बदलने की कोशिश की थी। वैसे, कोई इस सूचना पट्ट पर नजर भी नहीं डालता क्योंकि, इससे तो, बनी बात बिगड़ जाएगी। और, अंदर पहुंचते ही प्राधिकरण के अधिकारियों, कर्मचारियों की ईमानदारी का नमूना मिलना शुरू हो ही जाता है।
चढ़ावा डीलिंग क्लर्क से शुरू होकर आखिरी रसीद काटने वाले चपरासी बाबू तक चढ़ रहा था। कोई सरकारी खजाने में जमा होने वाली जायज राशि भर देता तो, रजिस्ट्री के लिए बैठी बाबुओं की फौज में से किसी की करकराती, डराती आवाज सुनाई दे जाती। खर्चवा देबा कि अइसेन रजिस्ट्री होइ जाई। लाखन क जमीन लेब्या औ दुई चार सौ देए म आफत होइ जाथ। किसी तरह जिसकी रजिस्ट्री हो जा रही थी। वो, जैसे अपने सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल के दर्शन जैसा अहसास पा रहा था। ऐसे ही अहसास अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार मुक्त भारत के अहसास की सबसे बड़ी बाधा हैं। 5 अप्रैल 2011 ने एक उम्मीद तो, जगाई है लेकिन, ये उम्मीद भ्रष्टाचार मुक्त भारत के संपूर्ण या फिर बहुमत के अहसास में कब बदलेगी ये बता पाना तो, शायद ही किसी के वश का होगा।

Tuesday, September 06, 2011

बेईमानी से कुछ और लोग डरे होंगे

ईमानदार लोगों को अब भारत में थोड़ा बल तो मिल रहा होगा। अन्ना का भ्रष्टाचार के खिलाफ जोरदार आंदोलन और उसके सामने दंडवत सरकार। कल रेड्डी जेल में, आज अमर सिंह। कलमाड़ी से लेकर राजा तक पहले से हैं। बिहार में भ्रष्ट आईएएस का घर स्कूल बनेगा। मैं बेईमान बनने से पहले से डरता था। अब बेईमान भी डरने लगे होंगे।

जब अमर सिंह के जेल जाने की खबर मैंने सुनी तो, सचमुच मैं बहुत खुश हुआ। अमर सिंह से मेरी कोई निजी दुश्मनी नहीं है न ही दोस्ती। इत्तफाक से पत्रकारिता में होने के बाद भी कभी अमर सिंह नामक प्राणी से मिलने का अवसर नहीं मिला। लेकिन, पत्रकारिता में जो, जानने वाले कभी अमर सिंह के संपर्क में आए वो, अमर लीला बताते रहते हैं। किस तरह अमर सिंह हर किसी को दलाली के नाना प्रकार के तंत्र से वश में करने की क्षमता रखता-दिखाता रहता था ये कोई छिपी बात तो है नहीं। किसी ने कुछ बोला तो, उसके खिलाफ रुपए से लेकर रूपसियों तक का सचित्र विवरण अमर सिंह के लिए ब्रह्मास्त्र जैसा काम करता रहा। यही वजह रही कि मुलायम सिंह यादव का साथ छूटने के बाद भी यही लगता था कि ये अमर सर्वाइव कर जाएगा। अमर सिंह ने दलाली की सारी सीमाएं लांघ ली थीं। अमर सिंह की खूबी ही यही थी कि मुश्किल में फंसे बड़े आदमी को गलत तरीके से मदद करके उस मदद के अहसान के तले दबा दो। फिर चाहे वो, मुलायम सिंह यादव रहे हों, अमिताभ बच्चन या फिर अनिल अंबानी। वैसे, सच्चाई देखी जाए तो, जिसके साथ अमर सिंह जुड़े उसे बर्बाद ही किया। अमर प्रभाव में मुलायम की समाजवादी पार्टी सिर्फ अभिनेता और अभिनेत्रियों की पार्टी रह गई। हां, अमर प्रभाव से धन की कमी मुलायम को कभी नहीं हुई।

अमिताभ बच्चन का चाहे जितना जलवा रहा हो। अमर प्रभाव में उसका तेज भी खत्म नहीं तो, कम तो हुआ ही। अमिताभ चूंकि पुराने जमाने में कांग्रेसी हथकंडों से वाकिफ रहे हैं। इसलिए अमर प्रभाव से थोड़ा बच गए। और, अपनी जमीन बनाए-बचाए रहने में कामयाब रहे। लेकिन, छोटे अंबानी को कैसे अमर प्रभाव ने बर्बाद किया वो, तो सबको पता है। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में दादरी से गुजरते हर व्यक्ति को समझ में ये जरूर आता होगा। अमर सिंह जैसे लोग जिस तरह से नीचे से ऊपर पहुंच गए वो, सीध रास्ते से तो संभव ही नहीं था। इसीलिए एक बार मैंने भी लिखा कि आखिर अमर सिंह, मायावती ये न करें तो, क्या करें लेकिन, इन लोगों  ने तो, ऐसा कर दिया कि सब पीछे छूट गया। और, अब पीछे छूटे लोग तो, ये भी करके आगे की कतार में पहुंचने लायक नहीं रहे।

कुछ ऐसा ही कर्नाटक में रेड्डी बंधुओं ने किया। दक्षिण में पहली भगवा सरकार के भ्रम में बीजेपी भी इस कदर उनके जाल में फंसती गई कि अंदाजा ही नहीं लगा कि कितनी तेजी से कांग्रेस बनने की कोशिश वो कर रहे हैं। हालांकि, बेल्लारी के बीजेपी वाले रेड्डी बंधुओं की कामयाबी के पीछे सारी ताकत कांग्रेस वाले दिवंगत वाईएसआर रेड्डी की ही है। यहां तक कि बेल्लारी के रेड्डी का धन आंध्र के रेड्डी के सहारे ही तेजी से बढ़ा। कांग्रेस वाले रेड्डी ने गुलामी की परंपरा ऐसे लोगों में भर दी थी कि वहां के लोग अभिमान के साथ रेड्डी के लिए जीवन देने को तैयार थे। बेटे जगनमोहन भी उसी फॉर्मूले को आजमा रहे हैं। और, बीजेपी वाले रेड्डी बंधुओं ने अनाप-शनाप पैसे की ताकत पर ऐसे सब कुछ ढेर कर दिया था कि हवाला डायरी में नाम भर आने से इस्तीफा देने वाले लालकृष्ण आडवाणी और बड़ी सी बिंदी लगाए हिंदुस्तानी महिला की ब्रांड सुषमा स्वराज भी बस इन्हें आशीर्वाद भर देने के ही लायक बचे रह गए।


लेकिन, एक बात जो, अभी होनी है कि अमर सिंह किसके लिए ये पैसे जुटाकर बीजेपी के सांसद खरीद रहे थे। मुलायम सिंह यादव को तो, उससे प्रधानमंत्री बनाया नहीं जा सकता था। जाहिर है सरकार कांग्रेस की ही थी और विश्वासमत भी उसी सरकार को जीतना था। फिर पैसा लेते-देते तो, समाजवादी के सांसद रेवती रमण सिंह ही दिखे थे। वो, जेल क्यों नहीं गए। कोई कांग्रेसी जेल जाने की लिस्ट में क्यों नहीं है। बीजेपी के सांसद रिश्वत लेकर घर तो गए नहीं। तो, उनके अभियान को भ्रष्टाचार मिटाने में सहयोग मानने के बजाए उन्हें भी दोषी क्यों माना गया। हो, सकता है कि आगे अदालत इस बात पर ध्यान दे। लेकिन, फिलहाल तो, मैं और मेरे जैसे लोग खुश इसीलिए होंगे कि बेईमान होने से अब ईमानदारों को ही बेईमानों को भी डर लगेगा।

Tuesday, August 16, 2011

अन्ना कैसे सुधारोगे भ्रष्ट भारत

इलाहाबाद के बक्शी बांध की शुरुआत पर अतिक्रमण
किसन बाबूराव उर्फ अन्ना हजारे को सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन तक नहीं करने दे रही है। दरअसल, अलग-अलग किस्मों-रंगों में भ्रष्टाचार ऐसे घुस बैठा है कि डर लगता है कि बिना भ्रष्टाचार के हम रह पाएंगे भी या नहीं।

कल ही इलाहाबाद से लौटा हूं। दिल्ली स इलाहाबाद जाते वक्त प्रयागराज में दो लड़कियों का टिकट कनफर्म नहीं था। या शायद एयरकंडीशंड कोच का टिकट ही नहीं था। लेकिन, उनकी किस्मत अच्छी थी। एक सीट खाली थी। दोनों लड़कियां उसी पर सो गईं। टीटी आया- एक लड़की ज्यादा समझदार थी। टीटी के नाराज होते ही उसने 100 का पत्ता पकड़ा दिया। पहले टीटी और नाराज हुआ। फिर, बोला - एक और दो। एक तो ये था सहूलियत का भ्रष्टाचार।

दूसरा इलाहाबाद में ही घर से निकला। इलाहाबाद के गंगा किनारे के इलाके दारागंज में हमारा घर है। वहां से शहर की तरफ निकला। दारागंज से बक्शी बांध से हम लोग एलेनगंज की तरफ चले। बांध खत्म होते-होते एक साईं मंदिर दिख गया। जिसके बगल में बड़ा सा बैनर भी लगा दिखा जो, बिना किसी डर-भय के चंदा देकर मंदिर बनाने की अपील कर रहा है। ये गजब का भ्रष्टाचार है। अब ये अतिक्रमण, अगर अभी ही इलाहाबाद विकास प्राधिकरण या फिर दूसरे संबंधित अधिकारियों को दिख जाए तो, शायद ये विवाद का विषय न बने। अभी तो, इस मंदिर के आसपास भी कोई इसका मालिकाना हक जताने वाला नहीं दिख रहा था। लेकिन, कल को जब ये मंदिर पक्का, बढ़िया बन जाएगा। कुछ दान नियमित आने लगेगा और मंदिर का कोई भ्रष्ट पुजारी भी जम जाएगा तो, ये आस्था का विषय हो जाएगा। इस भ्रष्टाचारी भारत को कैसे सुधारोगे अन्ना। उस पर ये सरकार !

मैंने ये फोटो फेसबुक पर भी डाली थी। उसकी प्रतिक्रियाएं भी डाल रहा हूं।
Shobhit Chauhan What a nice observation. Within few years this entire land will be a temple. And if the authorities try to break it, there will be communal riots. People will block the roads. They will cry for their religion. and many other things...
Saturday at 5:32pm · 1 personLoading...
  • Harshvardhan Tripathi That's what I want to point out. Why authorities not taking action at start of this type of illeagal land grabbing.
    Saturday at 5:35pm · · 1 personLoading...
  • Aar Ravi भैंस माता की जय.....
    Saturday at 5:37pm ·
  • Shobhit Chauhan Our authorities are in a habit of waiting for a blunder to happen and then show their disaster management skills.
    Saturday at 5:38pm ·
  • Arvind Rastogi bhains mata ke piche bhi ek Baba ji virajman hai Aar Ravi bhai
    Saturday at 5:42pm ·
  • Aar Ravi baba kee .........maar...hame to baba se achchhaa bhais lagtee hain...
    Saturday at 6:03pm ·
  • Arvind Rastogi kya vaha per been bajanee hai
    Saturday at 6:05pm ·
  • Aar Ravi बीन भी ठीक हैं ...भैस कहते हैं बीन बजाने पर ज्यादा दूध देती हैं ..शनि महाराज भी खुश हो जायेगे ..
    Saturday at 6:08pm · ·
  • Arvind Rastogi unko to tail chadega dudh nahi
    Saturday at 6:25pm ·
  • Ravish Shukla jameen par logon ka aur sarkari babu ki pocket me paise ka atikraman hoo jaata hai..issliye hooti hai andekhi...
    Saturday at 7:14pm ·
  • Arvind Rastogi babu ki pocket ke atrikraman ko to anna todne ke liye tayaar hai jamin ka kaun karega
    Saturday at 7:16pm ·
  • Ravish Shukla sachhai ka majboot haath jab todega in logon ko..tabhi khatm hooga yee.
    Saturday at 7:21pm ·
  •  Shri Surya bhai saab tbhi to khta bharshtachar hamare blood cells mein aa chuka hai,ab hum ek doosre ka khoon choosenge aur kuch nhi,jisne yeh kabja kiya hai usey poocho to woh khega mein kya alag kar rha hu sab karte hai,
  • Monday, June 09, 2008

    ... जाने चले जाते हैं कहां

    आज मुंबई मिरर में एन विट्ठल का लेख पढ़ रहा था। जिसमें वो कंसल्टेंसी फर्म मैकेंजी के किसी प्रजेंटेशन का हवाला दे रहे हैं। और, जिस प्रजेंटेशन में भारत के सुपरपावर बनने की इम्मीद दिखी थी। ये प्रजेंटेशन मैकेंजी ने तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को दिखाया था। पूरा प्रजेंटेशन देखने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने पूछा- आखिर ये सब होगा कैसे।

    पूर्व मुख्य सतर्कता अधिकारी (chief vigilance officer) एन विट्ठल कहते हैं कि यही वो सवाल है कि हम सोचते बड़ा अच्छा हैं। योजनाएं बहुत बड़ी-बड़ी बनाते हैं। लेकिन, उसका क्रियान्वयन (implementation) बहुत ही कमजोर होता है, जिसकी वजह से बड़ी-बड़ी योजनाएं बेकार (flop) हो जाती हैं। विट्ठल ने अपने लेख में टी एन शेषन और तमिलनाडु के एम्प्लॉयमेंट डिपार्टमेंट के एक डिप्टी रजिस्ट्रार का हवाला देकर कहा है कि अटल बिहारी वाजपेयी की बात का जवाब हैं ये लोग। जिन्होंने अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल करके क्रियान्वयन (implementation) को धारदार बना दिया।

    विट्ठल साहब की ये बात एकदम सही है। विट्ठल साहब उन अफसरों में से हैं जिन्होंने इस देश में चीफ विजिलेंस ऑफीसर की पोस्ट के सही मायने लोगों को बता दिए। सब कुछ पारदर्शी था। एक बार पहले भी रायपुर में मैंने एन विट्ठल को सुना है। जिसमें उन्होंने संस्कृत के एक श्लोक की पैरोडी बनाकर बताया था कि किस तरह भ्रष्टाचार क्लर्क स्तर का कर्मचारी बकरी, आईएएस लोमड़ी और नेता शेर जैसे अपना हिस्सा खाता है। मुझे अच्छे से विट्ठल का उदाहरण याद नहीं है लेकिन, इसी के आसपास उन्होंने कहा था और तालियां भी खूब बटोरीं थीं। अब एन विट्ठल के बारे में मुंबई मिरर के रेगुलर कॉलम के अलावा कोई खबर नहीं दिखती।

    ऐसे टीएन शेषन इस देश के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त थे, जिसके बाद इस देश में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति, संसद और चुनाव की तरह देश का आम आदमी चुनाव आयोग के बारे में भी जान गया था। दरअसल शेषन को कोई असीमित अधिकार नहीं दिए गए थे। लेकिन, जब शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त बने तो, उन्होंने इस संवैधानिक पद के सारे अधिकारों को क्रियान्वित (implement) किया। इसके बाद ही चुनाव आयोग में इतना दम आया कि वो, दम ठोंककर कहीं भी निष्पक्ष चुनाव करवा देता है। टीएन शेषन के बारे में आखिरी खबर ये थी कि उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लाल कृष्ण आडवाणी के खिलाफ चुनाव लड़ा था।

    हमारी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान बहुत ही कम समय के लिए एक एसपी सिटी आए थे, जसबीर सिंह। मेरी जानकारी के मुताबिक, चंडीगढ़ विश्वविद्यालय से पढ़ाई के दौरान जसबीर छात्रसंघ में भी थे। और, बहुत ही कम उम्र में इंडियन पुलिस सर्विस में चुन लिए गए थे। जसबीर के एसपी सिटी रहते ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ का एक चुनाव हुआ जिसमें हर दूसरे क्षण जसबीर सिंह और छात्रों-छात्रनेताओं में गंभीर विवाद की स्थिति बन जाती थी। खैर, जसबीर की यही काबिलियत रही होगी कि मायावती जब इससे पहले मुख्यमंत्री बनीं थीं तो, मायावती को जसबीर प्रतापगढ़ जिले के लिए सबसे उपयुक्त कप्तान लगे। जसबीर जिले के पुलिस कप्तान बने तो, जसबीर का पहला निशाना बने वहां के रजवाड़े। दबंग और कई अपराधों के आरोपी विधायक रघुराज प्रताप सिंह को महल छोड़कर भागना पड़ा था। लेकिन, मायावती की सरकार गिरने के बाद सपा की सरकार आई तो, जसबीर कहां गए किसी को पता नहीं।

    इलाहाबाद विश्वविद्यालय की ही पढ़ाई के दौरान उस समय के देश के सबसे चर्चित अफसर गोविंद राघव (जी आर) खैररनार को हम लोगों ने सिविल लाइन्स, इलाहाबाद के मुख्य चौराहे सुभाष चौक पर सुना था। मुंबई बीएमसी के तोड़ू दस्ते के इंचार्ज खैरनार दाउद के अवैध निर्माणों को धड़ाधड़ा तोड़ने और उसके बाद हुए जानलेवा हमलों की वजह से देश के सबसे चर्चित अफसर थे। ईमानदारी और निडरता की मिसाल बन चुके खैरनार को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने इलाहाबाद में बुलाया था। उसके बाद मैंने खैरनार के बारे में आखिरी खबर मुंबई मिरर में ही पढ़ी थी। खबर ये थी कि तोड़ू दस्ता का इंचार्ज रहते खैरनार के ऊपर सरकारी कमरे का कुछ बकाया किराया वसूलने के लिए बीएमसी ने नोटिस दी है। किराया बहुत ही मामूली था।

    अब सवाल ये है कि एन विट्ठल, टीएन शेषन, जीआर खैरनार, तमिलनाडु के त्रिचुरापल्ली जिले के एम्प्लॉयमेंट डिपार्टमेंट के डिप्टी रजिस्ट्रार सरत कुमार और इलाहाबाद, प्रतापगढ़ में तेज-तर्रार एसपी रहे जसबीर सिंह जैसे लोगों की खबरें कहां जाती हैं। आखिर ये लोग कहां चले जाते हैं। क्या planning implementation सलीके से करने वाले लोग system को अपच हो जाते हैं। मुझे संस्कृत का कोई श्लोक तो अब याद नहीं रहा। लेकिन, एन विट्ठल की पैरोडी के अंदाज में बस सवाल इतना ही है कि .... सिस्टम को सुधारने की कोशिश करने वाले ... जाने चले जाते हैं कहां ...

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      सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...