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Tuesday, September 06, 2011

बेईमानी से कुछ और लोग डरे होंगे

ईमानदार लोगों को अब भारत में थोड़ा बल तो मिल रहा होगा। अन्ना का भ्रष्टाचार के खिलाफ जोरदार आंदोलन और उसके सामने दंडवत सरकार। कल रेड्डी जेल में, आज अमर सिंह। कलमाड़ी से लेकर राजा तक पहले से हैं। बिहार में भ्रष्ट आईएएस का घर स्कूल बनेगा। मैं बेईमान बनने से पहले से डरता था। अब बेईमान भी डरने लगे होंगे।

जब अमर सिंह के जेल जाने की खबर मैंने सुनी तो, सचमुच मैं बहुत खुश हुआ। अमर सिंह से मेरी कोई निजी दुश्मनी नहीं है न ही दोस्ती। इत्तफाक से पत्रकारिता में होने के बाद भी कभी अमर सिंह नामक प्राणी से मिलने का अवसर नहीं मिला। लेकिन, पत्रकारिता में जो, जानने वाले कभी अमर सिंह के संपर्क में आए वो, अमर लीला बताते रहते हैं। किस तरह अमर सिंह हर किसी को दलाली के नाना प्रकार के तंत्र से वश में करने की क्षमता रखता-दिखाता रहता था ये कोई छिपी बात तो है नहीं। किसी ने कुछ बोला तो, उसके खिलाफ रुपए से लेकर रूपसियों तक का सचित्र विवरण अमर सिंह के लिए ब्रह्मास्त्र जैसा काम करता रहा। यही वजह रही कि मुलायम सिंह यादव का साथ छूटने के बाद भी यही लगता था कि ये अमर सर्वाइव कर जाएगा। अमर सिंह ने दलाली की सारी सीमाएं लांघ ली थीं। अमर सिंह की खूबी ही यही थी कि मुश्किल में फंसे बड़े आदमी को गलत तरीके से मदद करके उस मदद के अहसान के तले दबा दो। फिर चाहे वो, मुलायम सिंह यादव रहे हों, अमिताभ बच्चन या फिर अनिल अंबानी। वैसे, सच्चाई देखी जाए तो, जिसके साथ अमर सिंह जुड़े उसे बर्बाद ही किया। अमर प्रभाव में मुलायम की समाजवादी पार्टी सिर्फ अभिनेता और अभिनेत्रियों की पार्टी रह गई। हां, अमर प्रभाव से धन की कमी मुलायम को कभी नहीं हुई।

अमिताभ बच्चन का चाहे जितना जलवा रहा हो। अमर प्रभाव में उसका तेज भी खत्म नहीं तो, कम तो हुआ ही। अमिताभ चूंकि पुराने जमाने में कांग्रेसी हथकंडों से वाकिफ रहे हैं। इसलिए अमर प्रभाव से थोड़ा बच गए। और, अपनी जमीन बनाए-बचाए रहने में कामयाब रहे। लेकिन, छोटे अंबानी को कैसे अमर प्रभाव ने बर्बाद किया वो, तो सबको पता है। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में दादरी से गुजरते हर व्यक्ति को समझ में ये जरूर आता होगा। अमर सिंह जैसे लोग जिस तरह से नीचे से ऊपर पहुंच गए वो, सीध रास्ते से तो संभव ही नहीं था। इसीलिए एक बार मैंने भी लिखा कि आखिर अमर सिंह, मायावती ये न करें तो, क्या करें लेकिन, इन लोगों  ने तो, ऐसा कर दिया कि सब पीछे छूट गया। और, अब पीछे छूटे लोग तो, ये भी करके आगे की कतार में पहुंचने लायक नहीं रहे।

कुछ ऐसा ही कर्नाटक में रेड्डी बंधुओं ने किया। दक्षिण में पहली भगवा सरकार के भ्रम में बीजेपी भी इस कदर उनके जाल में फंसती गई कि अंदाजा ही नहीं लगा कि कितनी तेजी से कांग्रेस बनने की कोशिश वो कर रहे हैं। हालांकि, बेल्लारी के बीजेपी वाले रेड्डी बंधुओं की कामयाबी के पीछे सारी ताकत कांग्रेस वाले दिवंगत वाईएसआर रेड्डी की ही है। यहां तक कि बेल्लारी के रेड्डी का धन आंध्र के रेड्डी के सहारे ही तेजी से बढ़ा। कांग्रेस वाले रेड्डी ने गुलामी की परंपरा ऐसे लोगों में भर दी थी कि वहां के लोग अभिमान के साथ रेड्डी के लिए जीवन देने को तैयार थे। बेटे जगनमोहन भी उसी फॉर्मूले को आजमा रहे हैं। और, बीजेपी वाले रेड्डी बंधुओं ने अनाप-शनाप पैसे की ताकत पर ऐसे सब कुछ ढेर कर दिया था कि हवाला डायरी में नाम भर आने से इस्तीफा देने वाले लालकृष्ण आडवाणी और बड़ी सी बिंदी लगाए हिंदुस्तानी महिला की ब्रांड सुषमा स्वराज भी बस इन्हें आशीर्वाद भर देने के ही लायक बचे रह गए।


लेकिन, एक बात जो, अभी होनी है कि अमर सिंह किसके लिए ये पैसे जुटाकर बीजेपी के सांसद खरीद रहे थे। मुलायम सिंह यादव को तो, उससे प्रधानमंत्री बनाया नहीं जा सकता था। जाहिर है सरकार कांग्रेस की ही थी और विश्वासमत भी उसी सरकार को जीतना था। फिर पैसा लेते-देते तो, समाजवादी के सांसद रेवती रमण सिंह ही दिखे थे। वो, जेल क्यों नहीं गए। कोई कांग्रेसी जेल जाने की लिस्ट में क्यों नहीं है। बीजेपी के सांसद रिश्वत लेकर घर तो गए नहीं। तो, उनके अभियान को भ्रष्टाचार मिटाने में सहयोग मानने के बजाए उन्हें भी दोषी क्यों माना गया। हो, सकता है कि आगे अदालत इस बात पर ध्यान दे। लेकिन, फिलहाल तो, मैं और मेरे जैसे लोग खुश इसीलिए होंगे कि बेईमान होने से अब ईमानदारों को ही बेईमानों को भी डर लगेगा।

Friday, March 26, 2010

एनसीपी में जा रहे हैं अमर सिंह?

ये सवाल फिर से खड़ा हो रहा है। हालांकि, इसकी कहीं भी चर्चा नहीं हो रही है। मीडिया में चर्चा सिर्फ इस बात की हो रही है कि अमिताभ बच्चन का अपमान कांग्रेस क्यों कर रही है। लेकिन, इस बात की तरफ शायद जानबूझकर लोग ध्यान नहीं दे रहे हैं कि अचानक अमिताभ बच्चन को कांग्रेस-एनसीपी की सरकार में एक ऐसे सीलिंक के उद्घाटन में बुलाने की वजह क्या हो सकती है जिसका शुरुआती उद्घाटन खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने किया हो।

अब भले ही सी लिंक का उद्घाटन सोनिया ने कर दिया था और अब बची चार लेनों का लोकार्पण होना था। लेकिन, सच्चाई तो यही हुई कि सी लिंक की 8 लेनों में से 4 का लोकार्पण सोनिया ने किया और कांग्रेस सरकार, संगठन के न चाहते हुए भी मीडिया में जिस तरह से अमिताभ छाए हैं। बची 4 लेनों का लोकार्पण अमिताभ के हाथों ही याद किया जाएगा। अब अचानक एनसीपी को अमिताभ को सोनिया गांधी के बराबर खड़ा करने की तो नहीं सूझी होगी।

और, अगर आप ध्यान से देखें तो, अमिताभ के सीलिंक उद्घाटन समारोह में आने से सबसे ज्यादा तिलमिलाए दिख रहे हैं मुंबई प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह। कृपाशंकर सिंह उत्तर भारतीय हैं, उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले से आते हैं। कांग्रेस में उत्तर प्रदेश के एकमात्र मजबूत नेता हैं, ठाकुर हैं। अमर सिंह भी ठाकुर हैं, उत्तर प्रदेश से आते हैं। समाजवादी पार्टी से ठिकाना छूटने के बाद कहीं ठिकाना तलाश रहे हैं। क्षत्रिय सम्मेलन और कुछ सितारों के ग्लैमर के जरिए खुद को जिंदा रखने की कोशिश में लगे हैं।

वैसे, जब अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी से इस्तीफा दिया था तभी इस बात की चर्चा जोर-शोर से उठी थी। लेकिन, अमर सिंह और एनसीपी शायद आपसी तालमेल के लिए तैयार नहीं हो पाए थे। इस बीच कांग्रेस ने महंगाई के लिए सीधे तौर पर पवार को जिम्मेदार ठहराया है। पवार को कांग्रेस एकदम से निपटाने की हर कोशिश में लगी है। पवार कभी बाल ठाकरे से मिलकर तो, कभी पूरी सरकार को महंगाई के लिए दोषी ठहराकर कांग्रेस को लगातार परेशान करते ही रहते हैं। लेकिन, उनको एक चेहरा चाहिए जो, महाराष्ट्र से बाहर भी कांग्रेस के लिए मुश्किल खड़ी कर सके। और, इस बात से किसी को भी एतराज नहीं होना चाहिए कि अमर सिंह एक ऐसा चेहरा है जिसे एनसीपी अपने लिहाज से और अमर सिंह एनसीपी को अपने लिहाज से इस्तेमाल करने के लिए बेहद मुफीद दिखते हैं।

ये अमर सिंह का ही प्रताप था कि समाजवादी पार्टी महाराष्ट्र में 4 विधायक जिता ले गई। भले ही उसकी अगुवाई अबू आजमी जैसे आरोपी के हाथ में हो। लेकिन, उत्तर भारतीय और मुसलमान वोटबैंक को अपील करने की एक शानदार कला अमर सिंह के पास है जो, एनसीपी के लिए फायदे की हो सकती है। इसमें भी कोई बहस नहीं है कि अमिताभ अब राजनीति में खुद आएं तो, ये दैवीय चमत्कार से कम नहीं होगा। वो, पत्नी जया बच्चन और छोटे भाई अमर सिंह के जरिए ही राजनीति से जुड़े रहेंगे। और, अमिताभ भले राजनीति से दूर रहें इतनी राजनीति तो, उन्हें पहले से आती है और अमर सिंह की संगत ने इस तरह की सोच को इतनी धार तो दे ही दी थी कि उन्हें अच्छे से अंदाजा होगा कि कांग्रेस सरकार के राज में इतने बड़े आयोजन में विशेष अतिथि बनने के बाद क्या होगा। अमिताभ की ही भाषा में रंक, राजा का बराबरी की कोशिश कर रहा है।

इस कोशिश के पीछे राजनीतिक वनवास झेल रहे छोटे भाई अमर सिंह को फिर से राजनीति में अहम रोल दिलाने की कोशिश हो सकती है। बेवजह नरेंद्र मोदी और बीजेपी के अछूत होने का राग अलापा जा रहा है। असली निशाना कहीं और है। क्योंकि, अमर सिंह जैसे तिकड़मी व्यक्ति की बीजेपी जैसी किसी राष्ट्रीय पार्टी में शायद ही कभी अहमियत बन सके। ऐसे में महाराष्ट्र की एनसीपी को देश के महा प्रदेश उत्तर प्रदेश में थोड़ी बहुत राजनीतिक उर्वर जमीन और महाराष्ट्र में सितारों की बड़ी लाइन को शायद बेहतर राजनीतिक सौदा लगे। अमर सिंह के लिए इससे भला क्या होगा कि फिर से वो टीवी पर दिखने लगेंगे। सस्ती शेरो शायरी का दौर फिर शुरू होगा। अपने कॉरपोरेट क्लाइंट्स को फिर से ताकत का अहसास दिला सकेंगे और अमर सिंह मार्का राजनीति को बीते दिनों की बात मान चुके लोगों को फिर से इसे झेलने के लिए तैयार होना पड़ेगा। और, तो ये राजनीतिक रंग हैं गिरगिट भी इन्हें देखकर अब रंग बदलने में शर्माते हैं।

Sunday, July 13, 2008

अमर सिंह ये न करें तो, क्या करें आप ही बताइए

शनिवार को जब मायावती प्रेस कांफ्रेंस कर रहीं थीं तो, ऑफिस में मेरे एक सहयोगी ने कहा- सर, ये मायावती जैसे नेता इस तरह के क्यों हैं। बोलने का तरीका ठीक नहीं है फिर भी राजनीति में इतने ऊपर कैसे हैं। ये सवाल सिर्फ मेरे सहयोगी का ही नहीं है। ज्यादातर हम जैसे लोगों (मिडिल क्लास) की चर्चा में ये बार-बार आता है कि बद्तमीज-गालियों की भाषा में मायावती बात क्यों करती है और करती है तो, फिर वो देश की राजनीति में इतनी अहम क्यों है।

मायावती की प्रेस कॉन्फ्रेंस कल थी तो, अमर सिंह की आज थी। थोड़ा अलग मायावती से लेकिन, अमर सिंह भी वैसे ही हैं जैसी मायावती है। अमर सिंह भी विरोधियों को गंदे-गंदे विश्लेषणों से नवाजते हैं। राजनीति के सॉफिस्टिकेटेड लोग कहते हैं कि अमर सिंह दलाल किस्म का नेता है। उसकी कोई राजनीतिक बिसात नहीं है। सिर्फ इसकी-उसकी दलाली (मध्यस्थता) करके अपनी हैसियत बनाता रहता है। अमर सिंह को कहा जाता है कि वो, अनिल अंबानी और दूसरे कॉरपोरेट्स के लिए सत्ता से मदद दिलाकर अपनी जेब भरते हैं तो, मायावती पर आरोप ये कि वो दलितों के हित के बहाने करोड़ो रुपए हड़प चुकी हैं।

मायावती के जन्मदिन पर 80 लाख का हार मीडिया के साथ सबकी आलोचना की वजह बनता है तो, अमर सिंह की शाही जीवन शैली पर सब सवाल उठा देते हैं। आलोचना करने वाले कहते हैं कि अमर सिंह ने समाजवादी मुलायम को बरबाद कर दिया। मायावती के लिए यही बात कि कांशीराम के नाम पर मायावती दलितों के बहुमत से सत्ता सुख लूट रही हैं। दोनों एक दूसरे को भी जमकर गरियाते रहते हैं। लेकिन, आलोचना को शह देने वाला बड़ा वर्ग खुद बरसों से यही सब करता आ रहा है। उस पर शायद ही किसी का ध्यान जाता हो।

राजनीति के अमर सिंह और मायावती जैसी ही हैं फिल्मी दुनिया में राखी सावंत। बर्थडे पर मीका के जबरिया चुंबन पर हंगामा किया और उसके बाद तो, राखी किसी को बख्शती नहीं। ये राखी का ही साहस है कि एक टीवी चैनल ने जब उनसे मजाक किया कि उन्हें फिल्म से डायरेक्टर ने निकाल दिया है क्योंकि, फिल्म में उनका सीन फिट नहीं बैठ रहा है। तो, ये राखी ही थीं कि उन्होंने तड़ाक से बोल दिया कि शाहरुख सुपरस्टार है इसलिए उसे निकालने की डायरेक्टर में हिम्मत तो है नहीं। बलि का बकरा तो, उन्हें ही बनाया जा सकता है।

राखी ब्वॉयफ्रेंड से नाराज होती हैं तो, मीडिया के सामने तमाचे जड़ देती हैं। राखी टीवी चैनल पर सारे देश की लड़कियों को चिल्लाकर धमकी देती हैं कि किसी ने अगर अभिषेक की तरफ आंख उठाकर देखा तो, बहुत बुरा होगा। राखी कहती हैं कि वो, करीना नहीं है कि आज इसके साथ तो, कल उसके साथ।

अब चूंकि मैं भी मिडिल क्लास हिंदुस्तानी हूं इसलिए मुझे भी ये तीनों नापसंद हैं। तीनों से समाज खराब हो रहा है इस राय से मैं भी सहमत हो जाता हूं। लेकिन, क्या ये राय सही है कि राखी सावंत, मायावती और अमर सिंह जैसे लोग ही समाज खराब कर रहे हैं। कुछ बातें जो, मेरे दिमाग में आ रही हैं

मायावती ने आज तक दलित हितों के साथ समझौता नहीं किया।
मायावती भी वही कर रही हैं जो, देश की सारी राजनीतिक पार्टियां अपने फायदे के लिए करती हैं।

मायावती पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं।
उनके ऊपर उतने ही आरोप हैं जितने दूसरी पार्टियों के अलग-अलग नेताओं के ऊपर।

अमर सिंह पर दलाली का आरोप लगता है। राजनीतिक और कंपनियों के हितों की दलाली का।
लेकिन, अमर सिंह जैसी ही राजनीतिक और कंपनियों की दलाली कांग्रेस-बीजेपी और लेफ्ट पार्टियों के भी नेता करते हैं- बस ये है कि इसके लिए काम करने वाला आदमी वहां आलाकमान के नीचे छिपछिपकर काम करता है। कांग्रेस में प्रणव मुखर्जी, भाजपा में भैरो सिंह शेखावत और दिवंगत प्रमोद महाजन, लेफ्ट पार्टी में हरकिशन सिंह सुरजीत और सीताराम येचुरी क्या यही रोल अपनी पार्टी के लिए नहीं करते।

किसी भी राजनीतिक नेता से ज्यादा अमर सिंह निजी जिंदगी में अपने मित्रों का साथ देते हैं।
भले ही इसके लिए ये हल्ला किया जाए कि सब राजनीतिक-आर्थिक फायदे के लिए हैं।

राखी सावंत के साथ आजतक अभिषेक के अलावा दूसरे लड़के का नाम नहीं सुनाई दिया।
पब्लिसिटी के लिए बॉलीवुड के बड़े-बड़े घराने की लड़कियां राखी सावंत से ज्यादा नंगई कर रही हैं। और, एक से बढ़कर एक अनोखे पब्लिसिटी स्टंट भी होते हैं।


फिर, इन्हीं लोगों को इतनी गाली देकर ऐसा बनाने की कोशिश क्यों होती है कि ऐसे लोग ही सब खराब कर रहे हैं। और, सारे लोग बहुत ही अच्छा कर रहे थे। दरअसल, इसका जवाब एक दूसरे सवाल में छिपा हुआ है। CNN IBN चैनल पर भारत के पहले फील्ड मार्शल और 1971 की बांग्लादेश लड़ाई जांबाज हीरो सैम मानेकशॉ का पुराना इंटरव्यू चल रहा था। सैम उसके एक दिन पहले ही पूरी जिंदगी जीकर धरती छोड़ स्वर्ग में जा चुके थे (मुझे पूरा भरोसा है सैम स्वर्ग में ही गए होंगे)।

करन थापर ने पहले बीबीसी के लिए सैम का इंटरव्यू किया था। और, वही इंटरव्यू चल रहा था। करन थापर हमेशा की तरह शानदार इंटरव्यू कर रहे थे। अच्छी दोस्ती की वजह से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को स्वीटी कहकर बुलाने वाले सैम का इंटरव्यू कर रहे करन कहीं भी कमजोर नहीं दिखे। जब मैंने विकीपीडिया पर करन की पारिवारिक पृष्ठभूमि जानी तो, दिखा कि करन के पिता सेना में जनरल थे। और, करन के पास दुनिया के कई विश्वविद्यालयों की डिग्री है।

अब, क्या करन किसी सामान्य पृष्ठभूमि से आए होते तो, क्या सैम का इंटरव्यू कर पाते और कर पाते तो, क्या इसी दम के साथ कर पाते। देश के सबसे काबिल पत्रकारों में से एक राजदीप सरदेसाई के पिताजी मशहूर क्रिकेटर दिलीप सरदेसाई थे। और, बरखा दत्त की मां खुद हिंदुस्तान टाइम्स की मशहूर पत्रकार थीं। भाषा, मजबूत पारिवारिक पृष्ठभूमि ऐसी ताकत है जो, एक बड़ा अंतर बना देती है। और, इसका फायदा इन्हें जमकर मिला। पत्रकारिता का मैं सिर्फ उदाहरण दे रहा हूं। राजनीति में तो ऐसे नाम गिनाना और भी आसान है लेकिन, आप किसी भी क्षेत्र के दस सबसे मशहूर लोगों का नाम लेकर देखिए। मेरी बात सही निकलेगी। दरअसल मैं ये नहीं कह रहा हूं कि इन तीनों की काबिलियत में कोई कमी है। लेकिन, सच्चाई यही है कि ये लोग उस वर्ग से आते हैं जहां शुरुआत में ही इन्हें एक ऐसा प्लेटफॉर्म मिल जाता है जिसके बाद बस थोड़ा सा काबिलियत संजोए चलने की जरूरत होती है।

दरअसल यही ये वजह है जिसकी वजह से अमर सिंह, मायावती और राखी सावंत जैसे लोगों को उस पियर ग्रुप (एक ऐसा वर्ग जो, समाज के ऊपरी वर्ग में शामिल है और किसी भी कीमत पर नीचे के वर्ग को ऊपर आने नहीं देना चाहता।) में शामिल होने के लिए ऐसा करना ही पड़ता है। और, सच्चाई यही है कि बात ऐसे ही बन रही है।

मायावती की इसी बद्तमीज छवि की हैसियत है कि विचारधारा के ही आधार पर लोगों से बातचीत, दाना-पानी रखने वाले सीपीएम महासचिव प्रकाश करात मायावती के दरवाजे पहुंच गए। भाजपा तो, 3-3 बार माया मैडम के साथ खड़ी रही। ज्यादा समय नहीं बीता है सोनिया गांधी, मायावती को गुलदस्ता देते हुए फोटो खिंचा रहीं थीं।

जो, अंबानी परिवार बड़े-बड़ों को भाव नहीं देता। उस अंबानी परिवार का अनिल अंबानी, अमर सिंह का दोस्त बनने में फक्र महसूस करता है। सदी के महानायक अमर सिंह की दोस्ती के लिए अपने पुराने दोस्त राजीव गांधी कि विधवा सोनिया के दुश्मन बन जाते हैं।

राखी सावंत के शो पर आमिर खान आकर इंटरव्यू देते हैं। न्यूज चैनल राखी सावंत पर घंटे-घंटे भर के स्पेशल शो करते हैं। मीका-राखी किस प्रकरण के बाद राजदीप सरदेसाई ने भी आधे घंटे का स्पेशल किया भले ही उसके बाद अंत में ये कहकर खत्म किया कि उन्हें अफसोस है कि राखी सावंत पर उन्हें आधे घंटे का स्पेशल करना पड़ रहा है।


तो, अगली बार जब आप राखी सावंत, अमर सिंह और मायावती को गाली देने जा रहे हों तो, सोचिएगा जरूर कौन सा ऐसा वर्ग है जो, ये चाहता है कि मिडिल क्लास सिर्फ उन्हीं की तारीफ करता रहे और उनके वर्ग को नीचे के वर्ग से चुनौती न मिले।

Wednesday, July 09, 2008

पुनर्मूषको भव

सर का ताज कब पांव की जूती बन गया पता ही नहीं चला और पांव की धूल उड़कर सर की शोभा बढ़ा रही है। राजनीति का बेजोड़ रंग इस समय भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में देखने को मिल रहा है। 2004 में जब यूपीए की सरकार बनी थी तो, लगा था कि ये सरकार तो बमुश्किल ही चल पाएगी। लेकिन, चली लड़ते-झगड़ते वामपंथी और कांग्रेसी बैठकों पर बैठकें करते। बैठक से पहले मीडिया के जरिए एक दूसरे पर दबाव बनाने की कोशिश करते और बैठक के बाद एक दूसरे के साथ गलबहियां डाले ऐसे निकलते जैसे सबकुछ मीडिया का ही किया धरा हो।

वैसे अब भी कांग्रेस और लेफ्ट के नेता टीवी चैनलों की बहस में बीच-बीच में ये बताते रहते हैं कि कम्युनल फोर्सेज को बाहर रखने का उनका संकल्प अभी भी उतना ही मजबूत है। कम्युनल फोर्सेज को बाहर रखने का यही संकल्प लिए समाजवादी पार्टी परमाणु समझौते का समर्थन कर रही है। और, मुलायम सिंह यादव कह रहे हैं कि वो, सिर्फ परमाणु समझौते का ही समर्थन नहीं कर रहे हैं। संसद में सरकार के पक्ष में वोट भी देंगे। अमर सिंह चीख-चीखकर खुद के सेक्युलर होने की दुहाई दे रहे हैं। और, आडवाणी को जॉर्ज बुश से भी खतरनाक बता रहे हैं। अमर सिंह लगे हाथ ये भी कह रहे हैं उन्हें पूरा भरोसा है कि लेफ्ट किसी भी कीमत पर सांप्रदायिक बीजेपी के साथ वोट नहीं करेगा। लालू यादव को भी यही भरोसा अपने वामपंथी मित्रों पर है।

लेफ्ट पार्टियों के नेता परमाणु समझौते को ही मुस्लिमों के खिलाफ बता रहे हैं। लेफ्ट भी बीजेपी को देश के लिए सबसे खतरनाक बता रहा है। लेकिन, वो, कह रहे हैं कि जॉर्ज बुश के साथ परमाणु समझौता ज्यादा खतरनाक है। इतना खतरनाक कि देश की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष गठजोड़ वाली यूपीए सरकार को वो पांचवें साल में गिराने पर आमादा हो गए हैं। लेफ्ट के नेता अमर सिंह और लालू की सलाह पर चिढ़कर बोल रहे हैं- हमें इनसे ये सीखने की जरूरत नहीं है कि सांप्रदायिक ताकतों से लड़ाई किस तरह से लड़नी है।

लेफ्ट पार्टियां दुहाई दे रही हैं कि वो, सरकार गिराना नहीं चाहते थे लेकिन, प्रधानमंत्री ने परमाणु समझौते पर IAEA में जरूर जाने की बात कहकर उन्हें उकसाया। उनके स्वाभिमान को ठेस पहुंचाई। कांग्रेस भी यही कह रही है कि ये देश के लिए जरूरी है और वो, देशहित और सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने के लिए कोई भी कुर्बानी देने को तैयार हैं। वैसे मायावती भी सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने की बात कह रही हैं। वो, भी परमाणु समझौते को मुस्लिमों के हितों के खिलाफ बता रही हैं। लेकिन, कमाल ये है कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देकर वापस लेने के फैसले पर कोई भी धर्मनिरपेक्ष पार्टी अपनी जुबान नहीं खोल पाई। जबकि, उत्तर प्रदेश के बड़े-बड़े मौलानाओं ने भी साफ कहाकि देश भर में हज हाउस सरकारी जमीन पर ही बने हैं। और, अमरनाथ यात्रियों के लिए सरकारी जमीन देने में बुराई क्या है।

फिर जब सब सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ ही हैं और किसी भी तरह भाजपा को सत्ता से बाहर रखना चाहते हैं तो, फिर ये लड़ क्यों रहे हैं। वजह है राजनीति का वो रंग जो, इस समय भारतीय राजनीतिक पटकथा पर बुरी तरह से चढ़ा हुआ है। दरअसल सारी कहानी छिपी है 2004 में यूपीए सरकार बनने के समय समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह की बेइज्जती में। सत्ता से ही जीवन रस पाने वाले अमर सिंह सरकार बनने की पार्टी में जाने का मोह छोड़ नहीं पाए जबकि, उन्हें बुलाया तक नहीं गया था। बेआबरू होकर वो, कांग्रेस के कूचे से निकले और सत्ता को बाहर से समर्थन देकर किंगमेकर के रोल में बैठे लेफ्ट के नेता उन्हें समझा रहे थे कि कोई बात नहीं भाजपा को बाहर रखने के लिए इसे सहन कर लेना चाहिए। लेकिन, कांग्रेस ने उन्हें धूल समझकर उड़ा दिया है ये बात अमर सिंह और मुलायम सिंह भूले नहीं। और, ये भी नहीं भूले कि उनकी राजनीतिक छतरी लेफ्ट पार्टियों ने चार साल से ज्यादा सत्ता से बाहर रहकर भी सत्ता सुख लिया और वो, दोनों दिल्ली से दुरिया दिए गए।

फिर, यूपी से सत्ता जाने के बाद मायावती ने उन्हें उत्तर प्रदेश से भी तड़ीपार कर दिया। मायावती और और सोनिया नजदीक दिखीं तो, सपा को और मिर्ची लग गई। लेकिन, लंबे फायदे के लिए मायावती को कांग्रेस के नजदीक जाने में नुकसान दिखा। बस, यूपी के राजनीतिक समीकरण ने कांग्रेस, सपा और राष्ट्रीय लोकदल को नजदीक ला दिया। और, लालकृष्ण आडवाणी की प्रधानमंत्री बनने की इच्छा ने अंदर ही अंदर भाजपा और बसपा को नजदीक ला दिया। इधर नंदीग्राम और बंगाल के दूसरे हिस्सों में हो रहे बवाल पर वामपंथी सरकार के तानाशाही रवैये को छिपाने के लिए ब्लैकमेलिंग पूरी हो चुकी थी।

चुनाव का समय नजदीक आ गया था। महंगाई से चौतरफ परेशान कांग्रेसी अगुवाई वाली केंद्र सरकार किसी भी तरह चुनाव से अभी बचना चाहती है। और, देश का ध्यान दूसरी तरफ मोड़ना चाहती है। पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों में मात खा चुकी लेफ्ट पार्टियां फिर से देश के कमजोर आदमियों की वकालत का अपना एजेंडा लेकर लोकसभा चुनाव में जाना चाहती हैं। विचारधारा के तौर पर अमेरिका की खिलाफत भी उनका स्वाभाविक एजेंडा है। सबकुछ सही था कांग्रेस को लतियाने के लिए कांग्रेस की लतियाई सपा अब लेफ्ट को लतियाकर उन्हें उनकी हैसियत याद दिलाना चाहती है। अमर सिंह कुछ समय के लिए ही सही सत्ता की दलाली कर कॉरपोरेट जगत में अपना रसूख बना लेना चाहते हैं। और, यही वजह है कि चार साल पहले यूपीए सरकार के समर्थन के लिए राष्ट्रपति को सौंपी गई सपा की चिट्ठी आज नए सिरे से भेजी जाएगी।

राजनीति 4 साल में एक पूरा चक्र घूम चुकी है। 4 साल तक यूपीए सरकार के सर का ताज बना लेफ्ट सरकार के लिए कांटेदार जूती बन चुका है। और, 4 साल पहले की समाजवादी पार्टी की धूल भरी राह ही अब यूपीए सरकार के लिए एक्सप्रेस हाईवे बन चुकी है। भइया यही हैं भारतीय राजनीति के रंग ...

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...