Showing posts with label mulayam singh yadav. Show all posts
Showing posts with label mulayam singh yadav. Show all posts

Tuesday, February 21, 2017

इस बार इटावा, औरैया में “नेताजी” नहीं “जाति” तय करेगी जीत

बेटी की विदाई हो जाने के बाद पिता/परिवार और चुनाव में मतदान हो जाने के बाद प्रत्याशी/समर्थक शांत से हो जाते हैं। स्थिर से हो जाते हैं। लेकिन, तीसरे चरण का चुनाव हो जाने के बाद समाजवादी पार्टी के गढ़ इटावा, औरैया में यादव परिवार में गजब हलचल मची हुई दिख रही हैं। समाजवादी पार्टी के गढ़ इटावा, औरैया में समाजवादी पार्टी के लिए वही कमजोरी बन सकती है, जिसे मुलायम सिंह यादव ने अपनी ताकत के तौर पर इस्तेमाल किया था। मुलायम सिंह यादव जातिवादी राजनीति के अगुवा राजनेता रहे हैं, जिसे उन्होंने बड़े सलीके से समाजवादी राजनीति की पैकिंग में बेचा। इटावा, औरैया में काफी संख्या यादव मतदाताओं की है। पिछड़े और मुसलमान के साथ मिलकर वो एक मजबूत आधार बन जाते हैं। यही वजह है कि इस इलाके में समाजवादी पार्टी अपने गठन के बाद से ही स्वाभाविक पार्टी के तौर पर दिखती है और मुलायम सिंह निर्विवाद नेता। अपनी जाति के आधार पर राजनीति करने वाले नेताओं की अगर देश में एक सूची बनाई जाएगी, तो शायद पहले स्थान के लिए मुलायम सिंह यादव से ही सभी को लड़ना होगा। कमाल की बात ये रही कि मुलायम के यादववाद में लम्बे समय तक सारी पिछड़ी जातियां यादव को अपना नेता मानकर खुद की तरक्की यादवों के जरिये ही होता देखती रहीं। लेकिन, 3 दशक में इतना ज्यादा जाति-जाति हुआ कि दूसरी जातियां भी अब जाग सी गई हैं। और, इसीलिए सैफई में सत्ता मतलब इटावा, औरैया की सत्ता वाला भ्रम इस चुनाव में टूटता दिख सकता है। इस चुनाव में सभी जातियों को अपना विधायक चाहिए। इसीलिए हर पार्टी के लिए जातीय जुगाड़ बड़ा कठिन हुआ। समाजवादी गढ़ में जाति का जंजाल कठिन हो गया है। इटावा और औरैया में हर जाति अपना विधायक चाहती है। मतदान हो गया लेकिन, ज्यादातर जातियों ने अपने पत्ते नहीं खोले। हां, इतना जरूर दिखा कि वो अपनी जाति के प्रत्याशी के साथ खुलकर रहीं। इटावा सदर विधानसभा पर रामगोपाल यादव का खासमखास आदमी कुलदीप गुप्ता मजबूत स्थिति में है। पूरे प्रदेश में और इटावा, औरैया की दूसरी सीटों पर परम्परागत तौर पर बीजेपी को वोट करने वाला बनिया मतदाता यहां कुलदीप गुप्ता के साथ खड़ा दिखा। इस सीट से ब्राह्मण उम्मीद कर रहे थे कि बीजेपी किसी ब्राह्मण को टिकट देगी। लेकिन, बीजेपी ने सरिता भदौरिया को टिकट दे दिया। इसकी वजह से ब्राह्मणों में थोड़ी नाराजगी देखने को मिली। 1991 में इस सीट से बीजेपी के अशोक दुबे विधायक बने। इसको भुनाने के लिए बीएसपी ने यहां से नरेंद्र नाथ चतुर्वेदी को टिकट दिया। रघुराज शाक्य का टिकट कटने से नाराज शाक्यों के मत बीजेपी में जाने की खबरें हैं।
इटावा की जसवंतनगर सीट पर ढेर सारे अगर-मगर के बावजूद शिवपाल यादव की जीत पक्की मानी जा रही है। हालांकि, बीजेपी के मनीष यादव को भी अच्छा मत मिलने की उम्मीद है। मनीष यादव ने पिछला चुनाव बसपा से लड़ा था। इस बार बसपा ने दरवेश शाक्य को टिकट दिया है। इसकी वजह से इटावा सदर में बीजेपी के साथ जाते दिखे शाक्य मत इस सीट पर बसपा के लिए गोलबंद होते दिखे। इटावा की भरथना सीट पर समाजवादी पार्टी ने मौजूदा विधायक सुखदेवी वर्मा का टिकट काटकर कमलेश कठेरिया को टिकट दे दिया है। इसकी वजह से कहा जा रहा है कि वर्मा बिरादरी ने सपा प्रत्याशी के खिलाफ वोट किया है। बीजेपी ने भी यहां से सावित्रा कठेरिया को टिकट दिया है। जबकि, बसपा ने अपने पुराने प्रत्याशी राघवेंद्र गौतम पर भरोसा जताया है। गौतम की अच्छी छवि है। इटावा और भरथना दोनों सीटें ऐसी हैं, जहां ब्राह्मण मतदाता बहुत महत्वपूर्ण है। भरथना में ब्राह्मण बीजेपी के साथ दिखे।
मायावती ने मुख्यमंत्री रहते इटावा जिले की औरैया तहसील  काटकर जिला बना दिया था। इसका नतीजा ये रहा था कि 2002 में बसपा यहां की तीनों सीटें जीत गई थी। 2007 में भी बसपा ने 2 सीटें जीतीं थीं। सिर्फ बिधूना सीट पर धनीराम वर्मा सपा की इज्जत बचाने में कामयाब हुए थे। लेकिन, 2012 में सपा ने औरैया की तीनों सीटों पर कब्जा कर लिया। राष्ट्रीय क्रांति पार्टी के लड़ने से 2012 के चुनाव में बीजेपी का खासा नुकसान हुआ था। 19 फरवरी को हुए मतदान में मामला थोड़ा उलटा दिखा। दिबियापुर सीट पर प्रदीप यादव को फिर से सपा ने मैदान में उतारा। यहां का लोध मतदाता बीजेपी के साथ, साथ ही दिबियापुर में बनिया और सवर्ण भी बीजेपी के साथ जाता दिखा है। हालांकि, बसपा से रामकुमार अवस्थी को बसपा के परम्परागत मतों के साथ ब्राह्मण मत भी मिलने की बात कही जा रही है।

बिधूना में बनिया मतदाता बीजेपी के साथ गया दिख रहा है। यहां मुलायम के साढ़ू प्रमोद गुप्ता का टिकट काटकर सपा ने दिनेश यादव को टिकट दिया है। दिनेश यादव धनीराम वर्मा के बेटे हैं। कन्नौज लोकसभा में ही बिधूना विधानसभा आती है और यहां से डिम्पल हार गई थीं। प्रमोद गुप्ता का टिकट कटने के पीछे ये भी एक बड़ी वजह बताई जा रही है। बीजेपी का विनय शाक्य को टिकट देना काम करता दिखा है। बीएसपी के शिवप्रसाद यादव को यादव मत मुश्किल से ही मिलते दिख रहे हैं। औरैया सीट इस चुनाव में सुरक्षित हो गई है। इस सीट पर ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या अधिक है। इस सीट पर समाजवादी पार्टी ने मौजूदा विधायक को ही टिकट दिया है। कुल मिलाकर सभी सीटों पर सबसे ज्यादा मजबूत समाजवादी पार्टी ही नजर आ रही है। लेकिन, मुलायम के इस गढ़ में लोग बीजेपी की स्थिति इस चुनाव में 1991 जैसी बता रहे हैं। माना जा रहा है कि बिधूना, इटावा सदर और भरथना में मतों के बिखराव की स्थिति में बीजेपी को लाभ हो सकता है। लेकिन, समाजवादी पार्टी के नेताजीमुलायम सिंह यादव या कहें कि किसी भी नेता के नाम पर नहीं, इस बार इटावा, औरैया का मतदाता विशुद्ध रूप से अपनी जाति की मजबूती खोज रहा है। और इसमें भी जो समझने वाली बात है कि इसके लिए किसी नेता को ठेकेदारी भी नहीं दे रहा। इसीलिए यादव परिवार के गढ़ जिलों में चुनाव के बाद शांति होने के बजाय हलचल बढ़ गई है। मुलायम ने यादव जाति जगाई, अब सब जातियां जाग गई हैं। 

Tuesday, March 03, 2009

पिटते राष्ट्रीय मुद्दे और राष्ट्रीय पार्टियां

लोकसभा चुनाव का एलान हो गया है। देश भर से चुने गए सांसद अपनी पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के लिए एक दावेदार पेश करेंगे जो, देश चलाने का दावा करेगा। लेकिन, चुनावी महासमर से पहले इतना तो साफ हो गया है कि प्रधानमंत्री भले ही दोनों राष्ट्रीय पार्टियों (कांग्रेस या बीजेपी) में से किसी का किसी तरह से बन जाए। देश पर राज अब क्षेत्रीय पार्टियां ही करेंगी। क्षेत्रीय पार्टियों का दबाव होगा, स्थानीय मुद्दे हावी होंगे। राष्ट्रीय मुद्दों पर भाषण खूब होंगे लेकिन, वोट नहीं मिलेंगे।


मैं अगर कह रहा हूं कि सब कुछ क्षेत्रीय-स्थानीय हो गया है। राष्ट्रीय मुद्दा, राजनीति पीछे छूट रहे हैं तो, ऐसे ही नहीं कह रहा हूं। कल जब गोपालस्वामी चुनाव की तारीखों का एलान कर रहे थे तो, देश की दोनों बड़ी पार्टियां राज्यों में अपने सांसद बढ़ाने के लिए स्थनीय-क्षेत्रीय दलों को साष्टांग प्रणाम कर रहीं थीं। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस, लेफ्ट का गढ़ ढहाने के लिए ममता के सहारे थी तो, उत्तर प्रदेश में उसे मुलायम-अमर की जोड़ी का सहारा है जिन्होंने साम-दाम-दंड-भेद से यूपीए सरकार को परमाणु समझौते के मुद्दे पर बचा लिया था।



मामला सिर्फ इतना ही नहीं है कि कांग्रेस का हाथ इन क्षेत्रीय पार्टियों से मिलने के लिए बेकरार है, असल बात तो कांग्रेस को क्षेत्रीय पार्टियों का पिछलग्गू बनने से गुरेज नहीं है। बंगाल में कांग्रेस के संकटमोचक प्रणव मुखर्जी प्रदेश अध्यक्ष हैं। लेकिन, राष्ट्रीय पार्टी के इस अंतराष्ट्रीय संकटमोचक के पास अपनी पार्टी की राष्ट्रीय उपस्थिति बनाए रखने का कोई नुस्खा नहीं है।


लेकिन, संकटमोचक महाराज पर ही सवाल क्यों खड़ा किया जाए? जब त्यागी सोनिया माता के साथ देश भर में कांग्रेस को खड़ा करने की अनोखी योजना तैयार करने का दावा करने वाले राहुल भइया और नौजवान आंधा-प्रियंका गांधी अपनी खानदानी विरासत वाले राज्य उत्तर प्रदेश में ही कोई ढंग की योजना नहीं दे पा रहे हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के समय दिल्ली में गांधी परिवार के एक निकट व्यक्ति ने मुझसे कहाकि राहुल भइया की नजर लोकसभा चुनाव पर है। विधानसभा चुनाव तो सिर्फ रिहर्सल भर है।


योजना ये थी कि राहुल के विदेशों में पढ़ी नौजवानों की एक टीम लोकसभा चुनाव का खाका तैयार करेगी। विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए मजबूत सीटों को तलाशा जाएगा और पुराने-नए चेहरों को मिलाकर 15-20 सांसद उत्तर प्रदेश से भेजने को कोशिश होगी। अब वो कोशिश कहां तक पहुंची है ये तो मुझे नहीं पता। लेकिन, कांग्रेस का हाल ये है कि 80 सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में मुलायम उसे 17 से ज्यादा देने को तैयार नहीं हैं। वो, भी तब जब बहनजी के प्रकोप से मुलायम डरे-डरे से घूम रहे हैं। अब 17 सीटं लड़ने को ही मिलेंगी तो, 15-20 सांसद जीतेंगे कैसे ये गणित तो, किसी चमत्कार से ही सिद्ध हो पाएगा।


राष्ट्रीय पार्टियों का हाल कितना बुरा है। इसका सही-सही अंदाजा उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के अभी हुए विधानसभा चुनावों से मिल जाता है। इन दोनों ही राज्यों में सत्ता में काबिज बसपा और लेफ्ट फ्रंट को अभी हुए विधानसभा चुनावों में करारी हार झेलनी पड़ी है। दोनों ने ही पूरा दम लगा रखा था। लेकिन, सब टांय-टांय फिस्स हो गया। काबिलेगौर बात ये कि इसका फायदा मिला दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों को- उत्तर प्रदेश में सपा और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस। दोनों ही जगह कांग्रेस-बीजेपी बहुत पिछड़ी हुई दिखीं।


पश्चिम बंगाल की विश्णुपुर (पश्चिम) विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने सीपीएम प्रत्याशी को 30 हजार वोटों के भारी अंतर से हरा दिया। लेकिन, राजनीति की नब्ज बताने वाली हार थी उत्तर प्रदेश की भदोही विधानसभा सीट से बहनजी की बसपा की। भदोही सीट मई 2007 में बसपा ने 5000 वोटों से जीती थी। अब करी इतने ही वोटों से सपा ने ये सीट जीत ली है।


भदोही विधानसभा सीट जीतने के लिए मायावती ने पूरी ताकत झोंक दी थी। 80 हजार दलित, 55 हजार मुस्लिम और इतने ही ब्राह्मण मतदाताओं वाली सीट पर बहनजी के पक्ष में सारे समीकरण दिख रहे थे। लेकिन, सब उल्टा हो गया। बावजूद इसके लिए मायावती की रैली हुई। ब्राह्मण-दलित एकता फॉर्मूले को अग्रदूत सतीश चंद्र मिश्रा और उनके खास ब्राह्मण सिपहसालारों – नकुल दुबे, अनंत मिश्रा, राकेशधर त्रिपाठी (सारे मंत्री)- और मायावती सरकार के ताकतवर मुस्लिम चेहरे नसीमुद्दीन सिद्दिकी ने पूरी ताकत झोंक दी थी।


यहां जो वोट मिले हैं वो, राष्ट्रीय पार्टियों की हैसियत को देश के इस सबसे बड़े सूबे में आइना दिखाते हैं। भदोही उपचुनाव में सपा की मधुबाला पासी को 60,507 वोट मिले। दूसरे नंबर पर रहे बसपा के अमर सिंह सरोज को 55,487 वोट मिले। अब जरा दोनों राष्ट्रीय पार्टियों का हाल देखिए। बीजेपी के दीनदयाल सोनकर बसपा, सपा से बहुत पीछे – हां, तीसरे नंबर पर ही- 14,693 वोट ही जुटा पाए। अब आपको लग रहा होगा कि चौथे नंबर पर तो कांग्रेस ही होगी। जी नहीं, कांग्रेस प्रत्याशी को यहां सिर्फ 2,275 वो मिले हैं। जो, क्षेत्रीय में क्षेत्रीय किसी प्रगतिशील मानव समाज पार्टी के प्रत्याशी के 4,258 वोटों से भी कम हैं।


यही वजह है कि लौह पुरुष आडवाणी को अजीत की राष्ट्रीय लोकदल को 7 सीटें देना फायदे का सौदा लग रहा है। लेकिन, ये भी काफी हद तक तय है कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को गाजियाबाद सीट से लोकसभा में पहुंचने का फायदा भले इस गठजोड़ से हो जाए। ज्यादा फायदा अजीत सिंह को ही मिलना है।


ये हाल सिर्फ उत्तर प्रदेश बंगाल का नहीं है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और 7 लोकसभा सीटों वाली दिल्ली को छोड़ दें तो, पूरे देश में राष्ट्रीय पार्टियां क्षेत्रीय पार्टियों के पीछे कदमताल कर रही हैं। यही वजह है कि दिल्ली में बैठे नेताओं का पुराना दंभ – कि लोकसभा चुनाव में तो राष्ट्रीय मुद्दों पर बात होती है- टूट गया है। मुझे क्षेत्रीय पार्टियों के उत्थान से समस्या नहीं है। मुझे समस्या ये है कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग क्षेत्रीय पार्टियों के पीछे जैसे राष्ट्रीय पार्टियां चल रही हैं। वैसे ही हर राज्य में क्षेत्रीयता ही लोकसभा चुनाव पर हावी होती दिख रही है।



राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे रैली में झंडा-बेनर लगाने वाले कार्यकर्ता की तरह दरी पर किनारे बैठाए गए हैं। सजे मंच पर क्षेत्रीयता, जातिवाद, सांप्रदायिकता हावी है। इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार वैसे दोनों राष्ट्रीय पार्टियां ही हैं। आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा, महंगाई, परमाणु करार पर अखबारों, टीवी चैनलों पर बहस तो चलेगी। कोई 4-6-10 हजार लोगों को लेकर मीडिया घरानों के सर्वे में इस पर 50-60 प्रतिशत लोग चिंता भी जताएंगे। लेकिन, देश की दिशा तय करने वाला एक और चुनाव पूरी तरह से क्षेत्रीय हो गया है। ये एक संप्रभु देश का चुनाव नहीं, अलग-अलग छोटे-छोटे देशों की सहमति से बने एक समूह का चुनाव हो रहा है। ये स्थिति थोड़ी बहुत बदल सकती है तो, हमारे-आपके वोट से। लेकिन, इसके लिए बहुत प्रयत्न करना होगा।


(ये लेख अमर उजाला के संपादकीय पृष्ठ पर छपा है)

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...