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Friday, May 02, 2014

असल जादू या कांग्रेसी हाथ की सफाई

प्रियंका गांधी चर्चा में हैं। हर बार चुनावों के समय होती ही होती हैं। कमाल ये है कि त्यागी छवि के बावजूद रायबरेली गांधी परिवार का निर्बाध किला बना रहे इसके लिए प्रियंका गांधी को ही रायबरेली में जाकर डेरा डालना पड़ता है। मीडिया इसे कभी सोनिया गांधी की काबिलियत पर सवाल के तौर पर नहीं देखता हैवो इसे प्रियंका गांधी की लोगों से जुड़ने की अद्भुत क्षमता के तौर पर देखता है। ऐसी क्षमता जो अगर आगे आ जाए तो देश के सारे नेताओं को हिंद महासागर में डब मरने के हालात बना देगा। हालांकि, देश के दूसरे नेताओं के लिए अच्छी बात ये है कि प्रियंका गांधी का ये करिश्माई व्यक्तित्व कभी भी रायबरेली और अमेठी के आगे नहीं दिखा। अब बताइए रायबरेली और अमेठी तो वैसे ही राजीव, संजय और इंदिरा गांधी के समय से कांग्रेस का ही है। ये अलग बात है कि अपने बूते बीजेपी में रहकर भी खुद की नेता की छवि बनाने वाले वरुण गांधी को उतनी तवज्जो नहीं मिल पाती। कांग्रेस कार्यकर्ता और मीडिया बिना किसी बहस के ये भी मानता है कि ये खुद प्रियंका जी नहीं चाहती हैं कि वो राजनीति में सीधे तौर पर उतरें इसीलिए वो सिर्फ गांधी परिवार की संसदीय सीटों के राजनीतिक प्रबंधक के तौर पर काम करती रहेंगी। इस लिहाज से देखें तो प्रियंका गांधी की भूमिका दरअसल कैप्टन सतीश शर्मा या किशोरी लाल शर्मा से ज्यादा की नहीं है। लेकिन, इस तुलना से शायद ढेर सारे गांधी परिवार भक्त कांग्रेसी मेरी शक्ल बिगाड़ने की कल्पना भी करने लगेंगे। ये तुलना करना मेरे लिए भी मुश्किल काम था कि बताइए देश की सबसे करिश्माई नेता को मैं सतीश और किशोरी लाल शर्मा जैसे लोगों के साथ तौल रहा हूं। लेकिन, मैं पत्रकार हूं। तर्कों पर बात करता हूं। मेरे तर्क उससे अच्छे तर्क से काटे जा सकते हैं। मैं उससे खुश होता हूं। लेकिन, जरा सोचिए ना कि पिछले कई सालों से प्रियंका के करिश्माई व्यक्तित्व ने सिवाय इसके क्या किया है कि रायबरेली और अमेठी में पंजा का कब्जा है। क्या प्रियंका गांधी नहीं होतीं तो ये कब्जा नहीं होता। मैं निजी तौर पर मानता हूं जरूर होता। बिना प्रियंका गांधी के भी ये कब्जा होता। अब ये भी देखिए वही कांग्रेसी और मीडिया राहुल को योग्य साबित करने के हर पैमाने पर कसता है लेकिन, चुनावी समय में अमेठी में राहुल गांधी के दस साल से बने रहने को प्रियंका गांधी के सिर माथे मढ़ देता है। मुझे लगता है कि कांग्रेस के रणनीतिकारों ने ये मायावी जाला जानबूझकर तैयार किया है। क्योंकि, जितने सालों कांग्रेस पार्टी सरकार में रही है और गांधी परिवार के ही जरिए जितने साल रही है। फिर भी देश अपेक्षित गति से तरक्की नहीं कर सका है। इसका लोगों में जो गुस्सा है वो फूटेगा और तबके लिए कोई न करिश्मा बचाकर रखना जरूरी है। ये दरअसल इसलिए भी था कि कांग्रेस की बुरी दशा होनी ही होनी है ये अंदेशा कांग्रेस की रणनीति गांधी परिवार के इर्द गिर्द बनाए रखने वालों को बहुत पहले से था। लेकिन, कांग्रेस के उन रणनीतिकारों को ये बेहद अच्छे से पता है कि वो चाहे जो कर लें कि गांधी के दिए इस नाम को जोड़कर ही कोई कांग्रेस पार्टी के लिए फेवीक्विक का काम कर सकता है। यही गांधी फेविकोल कांग्रेस कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी ताकत है। अब राहुल गांधी तो सारी ताकत लगाने के बाद भी नेता ही नहीं बन पा रहा है तो क्या करें। खबरें ये है कि प्रियंका गांधी को चुनावों के तंरत बाद नतीजे जो भी आएं सोनिया गांधी की जगह दे दी जाएगी। मतलब साफ है कि सोनिया गांधी की सेहत अब वैसी नहीं है कि वो एक जड़ हो चुकी पार्टी को गति दे सकें। इसीलिए ऊर्जावान और कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और मीडिया के एक बड़े वर्ग में पक्के तौर पर करिश्मे के तौर पर देखी जा रही प्रियंका की ताजपोशी कर दी जाएगी।


राहुल गांधी तो राजनीतिक तौर पर किस कदर खत्म हो गए हैं इसका अंदाजा तो न्यूयॉर्क टाइम्स की कांग्रेस के भविष्य पर ताजा टिप्पणी करने वाली इस रिपोर्ट से ही लग जाता है। और इस रिपोर्ट के सिर्फ शुरुआती दो पैराग्राफ पढ़ने का समय निकालिए, सब समझ आ जाएगा। इसीलिए अब राहुल को चुका मानकर कांग्रेस के रणनीतिकार सलीके से प्रियंका को ही नेता बनाने पर तुल गए हैं। प्रियंका की छवि को पहले ही इंदिरा गांधी की छवि से बड़े सुनियोजित तरीके से जोड़ दिया गया है। अब मुझे पता नहीं है कि इंदिरा गांधी सिर्फ राजनीतिक रैलियों दौरों पर ही साड़ी पहनती थीं या प्रियंका तरह उदारमना थीं। सिर्फ चुनावी सभाओं, बैठकों के लिए साड़ी और बाकी समय जरूरत के लिहाज से आधुनिक परिधान। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। लेकिन, सिवाय उसी अंदाज में साड़ी पहनने, इंदिरा की तरह ही शक्ल दिखने को छोड़ दें तो इस प्रियंका में कौन सा करिश्मा है। ये मेरे जैसा पत्रकार तो नहीं समझ पा रहा है। सोचिए कि कांग्रेस जब सबसे बुरे हाल में है। जब नरेंद्र मोदी जैसी ताकतवर चुनौती कांग्रेस के सामने पहली बार खड़ी है तब भी प्रियंका सिर्फ रायबरेली और अमेठी में दूरदर्शन के वाद-संवाद जैसे आयोजन कर रही हैं। हालांकि, कांग्रेस कार्यकर्ता और मीडिया का बड़ा वर्ग चूंकि पहले से प्रियंका का करिश्मा मान रहा है तो उनके दो चार सौ की भीड़ के साथ वाद संवाद को भी नरेंद्र मोदी की मेहनत करके लाई, जुटाई या खुद आई भीड़ के बराबर की कवरेज दे रहा है। कांग्रेस के रणनीतिकार के तौर पर ही पहचाने जाने वाले जनार्दन द्विवेदी जैसे लोग शायद इस करिश्मे का कुछ असर इसी चुनाव में देखना चाहते थे। इसीलिए खबरें आ गईं कि राजीव गांधी प्रियंका को ही अपनी विरासत संभालते देखना चाहते थे। ये शायद प्रयोग का तरीका था। लेकिन, इससे गांधी नाम लगाए दोनों करिश्मे एक साथ एक ही चुनाव में ध्वस्त हो जाते। खैर मैं कह रहा है कि गांधी नाम लगाए दोनों करिश्मे यानी राहुल और प्रियंका गांधी। लेकिन, अब बात आगे निकल चुकी है। प्रियंका के नाम के आगे गांधी लगाने पर विवाद, बहस है तो ये तो तय हो ही गया है कि गांधी नाम का करिश्मा ध्वस्त हो चुका है। क्योंकि, प्रियंका अब राजनीति में आएंगी तो प्रियंका वाड्रा ही कहलाएंगी। रॉबर्ट वाड्रा के कर्मकांड की फाइल उनके खुलकर राजनीति में आने से पहले ही खुलने लगी है। प्रियंका गांधी की जादू वाली राजनीति अंदर से कितनी कमजोर है अंदाजा लगाइए कि जब वरुण गांधी सुल्तानपुर पहुंच गए तो प्रियंका वाड्रा का करिश्मा ऐसा हिला कि वो बिना मेकअप वाली हीरोइन हो गईं। प्रियंका वरुण गांधी को भटका हुआ और जाने क्या-क्या बताने लगीं। रायबरेली, अमेठी के बीच की सुल्तानपुर सीट पर गांधी तो आ रहा है कि स्थापित गांधी परिवार का कब्जा हट रहा है। इलाहाबाद की पहचान होने के बावजूद आनंद भवन, स्वराज भवन और कमला नेहरू अस्पताल भी प्रियंका गांधी को ये साहस नहीं दे पा रहा कि वो कहतीं कि रायबरेली से लेकर इलाहाबाद तक की हर सीट पर पंजे का ही कब्जा होगा। तो प्रियंका की जादूगरी हुई या कांग्रेसी हाथ की सफाई। इसीलिए मेरे दिमाग में ये सवाल बड़ा होता जा रहा है कि प्रियंका का ये जादू असल है या राजनीति में कांग्रेसी हाथ की सफाई भर है। 

Wednesday, September 23, 2009

अब ये बात बेवकूफी की लगती है

वंशवाद की बात अब किसी को समझ में नहीं आ रही है। कम से कम उनको तो नहीं ही समझ में आ रही है जिनके बेटे-बेटी या कोई नजदीकी रिश्तेदार इतने बड़े हो गए हैं कि चुनाव लड़ सकें। और, वो पहले से ही किसी पार्टी में इस हैसियत में हैं कि अपने चुनाव लड़ने लायक उम्र वाले बेटे-बेटी या फिर नजदीकी रिश्तेदार को टिकट दिलवा सकें।


दरअसल सारा मामला पलट गया है। कांग्रेस के वंशवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ते-लड़ते विपक्षी पार्टियों के लोगों की उम्र बढ़ गई और उन्हें अंदाजा ही नहीं लगा कि कब उनके बेटे-बेटी भी वंशवादी राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए तैयार हो गए। लेकिन, अभी रूडी के बेटे-बेटी शायद टिकट लेने भर की उम्र के नहीं हुए हैं इसीलिए बीजेपी प्रवक्ता राजीव प्रताप रूडी ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के बेटे राजेंद्र शेखावत को कांग्रेस का टिकट मिलने का संभावना दिखते ही बयान जारी कर दिया कि “the prez should have refrained from this entire ticket business.... It seems that the prez house too has got infected from this family fiefdom...”


लेकिन, रूडी महाराष्ट्र में ही अपने सबसे बड़े नेता गोपीनाथ मुंडे को शायद याद नहीं रख पाए थे। महाराष्ट्र में वंशवादी राजनीति को आगे बढ़ाने की होड़ सी लगी है। कांग्रेस में ऐसे 67 नेता हैं जिनके बेटे-बेटी या फिर नजदीकी रिश्तेदारों को टिकट देने का दबाव है। विलासराव देशमुख बेटे अमित के लिए टिकट चाहते हैं, सुशील कुमार शिंदे बिटिया प्रणीति को, पतंगराव कदम बेटे विश्वजीत को, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मानिकराव ठाकरे बेटे राहुल को विधानसभा में देखना चाहते हैं।


बीजेपी में वंशवादी राजनीति का सबसे बड़ा ठेका खुद गोपी बाबू ने उठा रखा है। अरे वही मुंडे साहब जो, अब भी महाराष्ट्र बीजेपी में स्वर्गीय प्रमोद महाजन के राजनीतिक कौशल की दुहाई देकर मजे लूट रहे हैं। प्रमोद महाजन की बिटिया पूनम का नाम लोकसभा में आगे नहीं बढ़ा पाए लेकिन, अब विधानसभा में तो पार्टी को टिकट देना ही था। लगे हाथ मुंडे ने अपनी बिटिया पंकजा पाल्वे और दामाद का नाम भी आगे बढ़ा दिया। कह रहे हैं कि भांजे धनंजय को भी अगर बीजेपी टिकट दे दे तो, पार्टी का उत्थान होने में देर नहीं लगेगी।


उधर, शिवसेना में भी सांसद शिवसैनिक अपनी पत्नी, बेटे-बेटी को विधायक शिवसैनिक बनाना चाहते हैं। इस वंशवादी राजनीति के खिलाफ कांग्रेस-बीजेपी-शिवसेना सबमें बगावत हो रही है। लेकिन, बगावत करने वाले वही लोग हैं जो, खुद अभी टिकट की मारामारी में हैं। अभी उनकी हैसियत नहीं बन पाई है कि वो, परिवार वाद को आगे बढ़ा पाएं तो, वो खिलाफत कर रहे हैं। जिनकी हैसियत बनती जा रही है वो, मानिकराव ठाकरे की तरह तर्क दे रहे हैं कि परिवार में कांग्रेस का कार्यकर्ता है तो, उसे परिवार वाद के नाम पर नकारना ठीक नहीं है। अब तो बीजेपी भी इसे परिश्रमवाद जैसा कुछ बताने की कोशिश कर रही है। कुल मिलाकर कांग्रेस और गांधी परिवार को वंशवाद के नाम पर गरियाने वालों की बात अब बेवकूफी लगती है।

Tuesday, May 26, 2009

जान लीजिए राहुल ने कमाल कैसे किया


कांग्रेस की इस जीत ने कई इतिहास बनाए हैं। और, सबसे बड़ी बात ये कि इसका पूरा श्रेय मी़डिया उन राहुल गांधी को दे रहा है जिनको अभी कुछ समय पहले तक राजनीति का नौसिखिया-बच्चा कहा जा रहा था। फिर आखिर अचानक राहुल ने क्या कमाल कर दिया। दूसरी बात ये भी कोई कमाल किया भी है या सिर्फ महज ढेर सारे संयोगों के एक साथ होने ने राहुल के गाल के गड्ढे बढ़ा दिए। और, अपनी मां सोनिया की ही तरह उन्होंने बड़प्पन दिखाते हुए मंत्री बनने से इनकार कर दिया।


अब देखते हैं कि राहुल ने आखिर किया क्या जो, पूरा मीडिया और पूरी कांग्रेस राहुल गांधी के आगे नतमस्तक है। राहुल गांधी ने दरअसल कोशिश करके अनी उन सभी कमियों पर खुद हमला करने की कोशिश की जिसका इस्तेमाल उनके खिलाफ विपक्षी जमकर कर रहे थे। वंशवाद, सिस्टम की कमी, भ्रष्टाचार, नौजवानों को राजनीति में जगह न मिलना और सबसे बड़ा गांधी-नेहरू परिवार का राज। राहुल ने एक-एक करके इस सब पर चोट पहुंचाई। बहुत कम लोगों को याद होगा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय दिया गया राहुल का वो बयान जिसमें राहुल ने गैर गांधी कांग्रेसी प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहाराव को ही दोषी ठहराते हुए कहा था कि अगर उनके यानी गांधी परिवार का कोई प्रधानमंत्री होता तो, बाबरी मस्जिद नहीं गिरती। सभी ने राहुल गांधी के इस बयान को बचकाना करार दिया था यहां तक कि विपक्षियों के हमले से डरी कांग्रेस भी इस मुद्दे को जल्दी से जल्दी दबाने की कोशिश करने लगी थी। लेकिन, वो पहला बयान था राहुल क राजनीतिक जमीन बनाने की कोशिश की शुरुआत की।


उस बयान से और कुछ हुआ हो या न हुआ हो। देश भर के मुसलमानों को एक सीधा संदेश गया कि मुसलमानों के हितों के रक्षा करने लायक गांधी परिवार ही था और आगे भी रहेगा। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इसका असर नहीं दिखा। राहुल गांधी को फ्लॉप करार दे दिया गया था। इसका अंदाजा राहुल को पहले से ही था इसीलिए राहुल ने उसी समय साफ-साफ कह दिया था कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश विधानसभा 2012 और लोसभा 2009 का चुनाव लड़ रही है। राहुल ने लोकसभा के लिहाज से 100 ऐसी विधानसभा चुनीं और वहां यूथ कांग्रेस को मजबूत करने की कोशिश की। ये राहुल ही थे जिन्होंने उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ तालमेल नहीं होने दिया। अब सोचिए कांग्रेस के 21 सांसद दिल्ली पहुंच गए हैं। जबकि, रेशमी कुर्ते में टेलीविजन स्क्रीन पर मुस्कराते अमर सिंह कांग्रेस को उसकी हैसियत याद दिलाते घूम रहे थे और कुल जमा 15-20 सीटें ही देने को तैयार थे।



उत्तर प्रदेश के अलावा राहुल को संभावना दिख रही थी- मध्य प्रदेश, गुजरात और पंजाब में। तीनों ही राज्यों में बीजेपी या फिर एनडीए की सरकार थी। कांग्रेस विपक्ष में थी- राहुल ने इस स्थिति का फायदा उठाकर लोकतांत्रिक तरीके से युवक कांग्रेस के चुनाव करा डाले। मौका मिलने से और पीठ थपथपाने से उत्साहित नौजवान कांग्रेस के साथ जुड़ गया। गुजरात में मोदी की जड़े काफी मजबूत हैं लेकिन, फिर भी कांग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़ गया। मध्य प्रदेश में भी बीजेपी को झटका लगा। पंजाब में तो, अकाली सरकार के कर्म राहुल के लिए सोने पे सुहागा साबित हो गए।


एक और राज्य महाराष्ट्र- यहां तो हींग लगी न फिटकरी और राहुल की कांग्रेस के लिए रंग चोखा ही चोखा। खुद को असली शिवसेना बताने वाली बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने मुंबई की सभी सीटों पर एक लाख से ज्यादा वोट बटोरे हैं। राज्य में भर राज की सेना को इतने वोट तो नहीं मिले कि वो सांसद दिल्ली भेज पाएं लेकिन, इतने वोट जरूर मिल गए कि वो, कांग्रेस को एतिहासिक सफलता दिलाने की सीढ़ी बन गए।


राज ठाकरे जैसा काम आंध्र प्रदेश में देश के किसी भी राजनेता से ज्यादा भीड़ जुटाने वाले स्टाइलिश अभिनेता चिरंजीवी ने कर दिया। प्रजाराज्यम को मिले वोट ने चंद्रबाबू नायडू को पीछे धकेल दिया। कांग्रेसी मुख्यमंत्री वाई एस आर रेड्डी का सत्यम घोटाले जैसा पाप भी धुल गया। तमिलनाडु में भी हर चुनाव का चलता फॉर्मूला पलट गया। अम्मा के गठजोड़ की बढ़त श्रीलंका में तमिलों पर हुए सेना के हमले ने खत्म कर दी। काला चश्मा लगाए करुणानिधि को तमिल हितों की रक्षा करते दिल्ली साफ नजर आने लगी।


राजस्थान में विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी माता वसुंधरा का दिमाग नहीं सुधरा। राजसी ऐंठन से ऊबी राजस्थान की जनता ने लोकतांत्रिक रजवाड़े कांग्रेस के पक्ष में वोट कर दिया। इसके अलावा राहुल ने देश की जनता को संदेश दिया वो, काम कर गया। राहुल पॉश कॉलोनी के ऐसे नौजवान की तरह व्यवहार कर रहे थे जो, किसी दलित बस्ती के हक के लिए पॉश कॉलोनी से ही लड़ता दिखता है। ये फॉर्मूला काम कर गया।


चौथे दौर के चुनाव के बाद राहुल ने जिस तरह के परिपक्व राजनेता की तरह व्यवहार किया वो, निर्णायक साबित हुआ। राहुल ने कहा- उनके नाम के आगे गांधी-नेहरू नाम लगा हुआ है। इसे वो बदल नहीं सकते। लेकिन, उन्होंने वही कहा जो, उनके विरोधी उन पर हमले के लिए कहते हैं। राहुल ने कहा- वंशवाद लोकतंत्र के लिए घातक है और वो, पूरी कोशिश करेंगे कि इसे खत्म किया जाए। ये कहते वक्त उन्हें ख्याल तो जरूर रहा होगा कि पूरी यूथ ब्रिगेड जिसका हल्ला किया जा रहा है – किसी न किसी पुराने कांग्रेसी नेता के बेटे-बेटी की तस्वीरें दिखाकर मीडिया नौजवानों को उनका हिस्सा मिलने की बात कर रहा है – वो पूरी यूथ ब्रिगेड राजनीतिक विरासत ही आगे बढ़ा रही है।


दरअसल भले ही लोग कहें कि वंशवाद, भ्रष्टाचार, सिस्टम की खामी अब मुद्दा नहीं रह गया है। लेकिन, उसी तरह से मुद्दा है जैसे बड़ा से बड़ा शराबी ये नहीं चाहता कि उसकी औलाद नशे को हाथ तक लगाए। राहुल ने इस नब्ज को पकड़ा और अपने पिता की तरह भाषण दे डाला कि रुपए में दस पैसे भी आम लोगों तक नहीं पहुंचता। भाषण ही देना था दे दिया। गुलाम भारत ने सच्चे मन से राहुल की बात स्वीकार कर ली। कोई भला ये पूछने वाला कहां था कि जब आपका ही परिवार पिछले 62 सालों में बड़े समय तक देश पर शासन कर रहा था तो, मतलब यही हुआ ना कि बचे नब्बे पैसे का भ्रष्टाचार कांग्रेस की ही देन है।



राहुल ने कांग्रेस का संगठन खड़ा किया। क्योंकि, ये सिर्फ राहुल ही कर सकते थे। मनमोहन जैसे सोनिया माता के इशारे पर चलने वाले प्रधानमंत्री के होने की वजह से सत्ता तो वैसे ही उनकी दासी थी। इस पर जो रही-सही कसर थी वो, राहुल गांधी के भाई वरुण गांधी ने पूरी कर दी। मीडिया के The Other Gandhi वरुण गांधी ने भाषण देकर बीजेपी के लिए एक सीट पक्की की। बाकी देश की सरकार चलाने भर की सीट भाई राहुल के पाले में चली गई। एकमुश्त मुसलमान वोट के पड़ने से। मुस्लिम वोटों ने ही दरअसल लेफ्ट को कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं छोड़ा। हाथी पस्त हो गया। तो, साइकिल पंचर भले न हुई लेकिन, दिल्ली की दौड़ से बाहर कर दी गई। मुसलमान इतनी जबरदस्त पलटी खाए कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मुसलमानों की पार्टी बनाने का सपना दिखाने वाले MIM के औवैसुद्दीन ओवैसी हैदराबाद से सांसद होकर आए और राहुल के बगल बैठकर चाय की चुस्की ले रहे थे। आजमगढ़ से निकलकर पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में मुस्लिमों की अकेली पार्टी बनने का दावा करने उलेमा काउंसिल का चिराग जलाने वाला भी संसद तक न पहुंच पाया।


लेफ्ट के पिछले तीस सालों के करम की खराबी शायद थोड़ा बहुत छिप भी जाती लेकिन, नंदीग्राम और सिंगूर में चली गोली और मुसलमानों का डर कि बीजेपी न आ जाए। कांग्रेस के लिए सोने पे सुहागा हो गया। बिहार में नीतीश को लेकर मुसलमानों में कोई डर नहीं था। इसीलिए वहां न तो राहुल का चमत्कार चला। न तो सोनिया-मनमोहन का अगुवाई वाली सरकार की लाभकारी योजनाओं (NREGS) का कुछ असर हुआ।


इतने सारे एक साथ बने संयोगों ने राहुल गांधी को इतना बड़ा बना दिया है कि पिता राजीव की कैबिनेट के साथी और कुछ दादी इंदिरा की कैबिनेट के कांग्रेसी नेताओं तक को राहुल ही तारणहार दिख रहा है। गुलाम भारत फिर स्तुतिगान में जुट गया है। लेकिन, यही स्तुतिगान राहुल गांधी के लिए असली चुनौती साबित होगा। कांग्रेस अपने रंग में फिर आने लगी है। लोकतांत्रिक तानाशाह कांग्रेसी नेता अपने हिस्से की मलाई चाटने के लिए हर चाल चलना शुरू कर चुके हैं। जब ऐसे सत्ता दिखने लगती है तो, कांग्रेस में सारा लोकतंत्र धरा का धरा रह जाता है। और, राहुल गांधी के लिए इसे जिंदा रखना ही सबसे बड़ी चुनौती होगी। फिलहाल थोड़ी चैन की सांस राहुल इसलिए भी ले सकते हैं कि अभी बीजेपी छितराई हुई है और तीसरे-चौथे मोर्चे को तो खड़े होने में बी कुछ वक्त लगेगा।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...