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Monday, January 09, 2017

कांग्रेस को एक पूर्णकालिक राजनेता की जरूरत

स्वराज भवन, इलाहाबाद में राहुल, प्रियंका गांधी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल के आखिरी दिन जो बोला, उस पर टिप्पणी के लिए कांग्रेस की तरफ से दूसरी, तीसरा कतार के नेता ही मिल पाए। उसकी वजह ये कि उनके अभी के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी छुट्टी पर हैं। ये पहली बार नहीं है, जब राहुल गांधी छुट्टी पर गए हैं। संसद सत्र का समय हो या बिहार चुनाव राहुल गांधी ने ऐसा कई बार किया है। यहां तक कि देश में रहते भी राहुल गांधी अपनी सुविधानुसार ही राजनीतिक सक्रियता रखते हैं। 90 के दशक में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्रसंघ की राजनीति करते/कराते और संगठन का काम करते/कराते दो बातें जो सबसे ध्यान में रहती थीं। पहली ये कि दूसरा नेता/संगठन क्या कर रहा है और उससे बेहतर हम क्या कर सकते हैं। दूसरी बात ये कि कल सुबह आने वाले अखबार में हमारा किया कैसे छपेगा। हालांकि, छात्रसंघ या छात्र संगठन की राजनीति करते कुछ लोग ऐसे भी होते थे जो सिर्फ इस बात कि चिन्ता करते थे कि कैसे छप जाया जाए। अच्छा, बुरा कुछ भी, कैसे भी। पहली दोनों बातें ध्यान में रखने वाले राजनीति में धीरे-धीरे तपे-तपाए नेता के तौर पर स्थापित होते जाते। और इस प्रक्रिया में वो पूर्णकालिक राजनेता बन जाते हैं। छपास रोगी नेता लम्बे समय तक नहीं चल पाते हैं और अगर चल भी गए तो गम्भीर नेता की उनकी छवि कभी नहीं बन पाती। यहां तक कि राजनीति में ज्यादा समय देने के बावजूद सिर्फ छपासी नेता पूर्णकालिक राजनेता नहीं बन पाते। देश की राजनीति में और राज्यों की राजनीति में मजबूत ज्यादातर नेता पहली दो बातों का ठीक से ध्यान रखते हैं। और उसी को ध्यान में रखते वो राजनीति में आगे बढ़ रहे हैं। अब सवाल ये है कि फिर राहुल गांधी का राजनीतिक विकास क्यों नहीं हो पा रहा है। लम्बे समय से राहुल गांधी लोकसभा में हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं, लगभग अध्यक्ष ही हैं। और कई बार तो मुझे ये भी लगता है कि ईमानदारी से लोगों की तकलीफों को समझना चाहते हैं। फिर ऐसा क्या है जो उन्हें गम्भीर, पूर्णकालिक राजनेता नहीं बनने दे रहा है। अब उसके कारण ढेर सारे हैं। लेकिन, इतना तय है कि कांग्रेस को इस समय एक गम्भीर पूर्णकालिक राजनेता की सख्त जरूरत है। बिना पूर्णकालिक राजनेता के कांग्रेस का विकास क्रम सही नहीं होने वाला। पूर्णकालिक वैसे तो संघ का कॉपीराइट लगता है लेकिन, आज कांग्रेस की ये सबसे बड़ी जरूरत दिखती है।

कांग्रेस के बारे में आम राय यही रही है कि सत्ता की स्वाभाविक दावेदार यही पार्टी है। नरेंद्र मोदी की सरकार के पूर्ण बहुमत में आने के बाद भी कई लोगों इस तरह की बात करते दिख जाते हैं। इस स्वाभाविक दावेदारी के पीछे ढेरों तर्क हो सकते हैं। लेकिन, मेरी नजर में सबसे बड़ा तर्क यही है कि कांग्रेस पूर्णकालिक राजनेताओं की पार्टी रही है। यानी ऐसे नेता जिनके लिए राजनीति उनका ओढ़ना, बिछाना, खाना-पीना, सोना सब था। पूर्णकालिक राजनेता के तौर पर राजीव गांधी कमजोर साबित हुए थे। और उस कमजोरी का नुकसान ये कि अचानक बोफोर्स से भ्रष्टाचार का गोला छूटा और वो जनता में अपनी छवि बचा नहीं सके। लेकिन, राजीव गांधी को सीधे प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला जिसकी वजह से सत्ता ने लम्बे समय तक राजीव गांधी को नेता बनाए रखा। राजीव के जाने के बाद पी वी नरसिंहाराव गजब के पूर्णकालिक राजनेता के तौर पर सामने आए। यही वजह रही कि अल्पमत की सरकार को भी उन्होंने सलीके से चला लिया और भारतीय राजनीति के ढेर सारे चमत्कारी फैसले ले लिए। विदेशी मूल का आरोप झेल रही सोनिया गांधी ने इस पूर्णकालिक राजनेता होने के मंत्र को जान लिया और यही वजह रही कि उन्होंने सबसे बड़ा राजनीतिक फैसला लिया, प्रधानमंत्री न बनने का। सबसे लम्बे समय तक वो कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं। बिना प्रधानमंत्री रहे आजाद भारत में शायद ही कोई इतना ताकतवर रहा हो, जितनी सोनिया गांधी रहीं। उस सबकी वजह थी उनका पूर्णकालिक राजनेता होना। लेकिन, ये कांग्रेस का दुर्भाग्य कहा जाएगा कि इलाहाबाद में कांग्रेस के मूल स्थान वाले शहर में राजनीति करने वालों की तुलना में राहुल गांधी पासंग भी राजनेता न बन सके हैं। पूर्णकालिक राजनेता होना तो शायद राहुल के मूल स्वभाव के ही विपरीत है। राहुल गांधी अंशकालिक राजनेता हैं। वो अंशकाल भी राहुल का तय नहीं होता है। इतने अनिश्चित राजनेता को जनता कैसे स्वीकारे। पूर्णकालिक राजनेता होने का लाभ नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल को किस कदर मिला, ये सबके सामने है। ढेर सारी गलतियों के बाद भी इन दोनों नेताओं का एक पक्का वाला समर्थक वर्ग है। वो समर्थक वर्ग जानता है कि सबके बाद हमारा नेता भागने वाला, गायब होने वाला नहीं है। सर्जिकल स्ट्राइक हो या फिर नोटबंदी- किसी भी मुद्दे पर अपने बयान और व्यवहार से राहुल गांधी एक पूर्णकालिक राजनेता जैसा नहीं दिखे। इसलिए, मुश्किल ये कि कांग्रेस के कार्यकर्ता की छोड़िए, नेता तक को राहुल गांधी के किसी मुद्दे पर निश्चित व्यवहार की उम्मीद नहीं है। इसीलिए उत्तर प्रदेश में ढेर सारे प्रयोगों, कार्यक्रमों को चलाने के बाद भी राज्य में कांग्रेस का चुनावी भविष्य अब पूरी तरह से समाजवादी पार्टी से समझौते में कुछ सीटें मिलने की आस पर ही टिका हुआ है। और ये भी आस इसलिए बनी है कि पूर्णकालिक राजनेता के तौर पर विकसित हो गए अखिलेश यादव को लग रहा है कि सत्ता रहने से और परिवारी मारापीटी के दुष्प्रभाव से बचने में कांग्रेस का साथ कुछ मददगार हो सकता है। लेकिन, यहां भी पूर्णकालिक राजनेता जैसा व्यवहार राहुल गांधी नहीं कर पा रहे हैं। हो ये रहा है कि रणनीतिकार के तौर पर स्थापित हो गए प्रशांत किशोर थकने लगे हैं और इस बुरे हाल में भी पार्टी का झंडा बुलंद करने वाले कांग्रेस नेता खीझने लगे हैं।

पहले से ही खीझे कांग्रेसी नेताओं की खीझ राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बिना आधार के आरोप लगाकर और फिर संसद सत्र के आखिरी दिन जाकर प्रधानमंत्री से मिलकर बढ़ा दी है। अंशकालिक राजनेता होने का ही नुकसान था कि विमुद्रीकरण पर ढेर सारे विपक्षी दलों का समर्थन पा रही कांग्रेस अचानक फिर अकेले हो गई। भूकम्प लाने का दावा करने वाले राहुल गांधी प्रधानमंत्री को हिला देने वाला भूकम्प तो नहीं ला सके। हां, इतना जरूर है कि कांग्रेस की अपनी छत भी गिरती दिख रही है। इसीलिए कांग्रेस को सख्त जरूरत है एक पूर्णकालिक राजनेता की। वो प्रियंका गांधी भी हो सकती हैं या कोई और। कांग्रेस के साथ स्वस्थ लोकतंत्र के लिए भी ये जरूरी है। 

Wednesday, September 14, 2016

हिन्दी दिवस पर चेन्नई की एक सड़क के बहाने

#हिन्दीदिवस
ये चेन्नई की एक सड़क का नाम भर नहीं है। ये पूरे दक्षिण भारत का मानस है। जो हिन्दी पर अंग्रेजी को वरीयता दे रहा है। दोष उनका नहीं है। क्योंकि, हम हिन्दी वाले भी तो अंग्रेजी को वरीयता देते हैं। और #EnglishElite तो उत्तर भारत और उनके नेताओं ने ही तैयार किया। कांग्रेस की इसमें बड़ी भूमिका है। वरना ऐसे क्यों होता कि इंदिरा इज इंडिया इंडिया इज इंदिरा का नारा देने वाले के कामराज के राज्य में हिन्दी इतनी अछूत हो जाती है। अपनी सहूलियत की राजनीति में कांग्रेस ने ऐसे छत्रपों को तैयार किया जो दूसरे राज्य में अछूत से हो जाते। हां, इंदिरा, राजीव हर जगह देश के बड़े नेता रहे। हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं की लड़ाई में शातिर अंग्रेजी ने ऐसे जगह बनाई है कि वही हिन्दुस्तानी भाषाओं के बीच संवाद की भाषा बन गई है। टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलकर हिन्दी वाले तमिल, तेलुगू, कन्नड़ वालों से और वो लोग हम हिन्दी वालों से बात करते हैं। अंग्रेजी न उनको स्वाभाविक तौर पर आती है, न हमको। मैं तमिल की पुस्तक देख रहा था तो कई शब्द हैं जो हिन्दी से मिलते-जुलते हैं। लेकिन, हमें एकदम भिन्न अंग्रेजी सीखने में अपने जीवन की महत्वपूर्ण ऊर्जा खपा देने में ज्यादा बेहतर लगता है।


Friday, April 22, 2016

एक चुकी विरासत का शहजादा

राहुल गांधी को लेकर बार-बार ये कहा जाता है कि इतनी शानदार विरासत को वो संभाल नहीं पा रहे हैं। ये बात इतनी बार और इतने तरीके से कही जा चुकी है कि देश को राहुल गांधी पर अब नेता के तौर पर भरोसा हो ही नहीं पाता है। क्योंकि, देश के लोगों को लगने लगा है कि राहुल गांधी ही दरअसल नाकाबिल हैं। जबकि, कांग्रेस की और गांधी परिवार की विरासत बहुत समृद्ध है। इससे राहुल गांधी की नेतृत्व की क्षमता पर सवाल और गंभीर होता जाता है। अब सवाल यही है कि क्या राहुल गांधी को सचमुच इतनी शानदार विरासत मिली है। जिसे वो आगे नहीं ले जा पा रहे हैं। या दरअसल सच्चाई ये है कि राहुल गांधी को एक चुकी हुई विरासत मिली थी। एक पार्टी के तौर पर भी और एक परिवार के तौर पर भी।

राहुल गांधी की सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि राजनीतिक विश्लेषक और देश की जनता आज के समय में उनकी काबिलियत की तुलना उनके पिता राजीव गांधी से कर रही है। भले ही भारतीय जनमानस में राजीव गांधी की छवि एक गजब के नेता के तौर पर बनी हुई है। जिसने सीधे प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली और देश का सबसे नौजवान प्रधानमंत्री बन गया। लेकिन, विश्लेषक ये भूल जाते हैं कि दरअसल राजीव गांधी के अंदर भी नेतृत्व का कतई कोई गुण नहीं था। होता तो वो ब्रिटेन से पढ़ाई करके भारत लौटने के बाद अपनी मां इंदिरा के साथ राजनीति के गुर सीखते और देश को राजनीतिक तौर पर आगे ले जाने की कोशिश करते। लेकिन, राजीव गांधी ने ऐसा कतई नहीं किया। राजीव गांधी लौटकर सरकारी इंडियन एयरलाइंस के पायलट बन गए। और ये कोई बताने की जरूरत तो है नहीं कि जिस सत्ताधारी परिवार से वो आते थे। उसमें पायलट बनने की उनमें भले सारी योग्यता रही हो। दरअसल योग्यता की कोई जरूरत थी नहीं। 1980 में अगर संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मृत्यु न हुई होती, तो शायद राजीव गांधी चुपचाप विमान उड़ाते रहते और देश शायद ही उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर याद कर पाता। राहुल गांधी पर अकसर ये आरोप लगता है कि वो अपनी पारिवारिक अमेठी सीट से बाहर शायद ही चुनाव जीत सकें। लेकिन, ये कहने वाले भूल जाते हैं कि राजीव गांधी भी 1980 में संजय गांधी की मृत्यु के बाद उनकी पारिवारिक सीट से ही जीतकर आए थे। हालांकि, उस समय देश में जो स्थिति थी, उसमें राजीव गांधी कहीं से भी चुनाव लड़ते और जीत जाते। राजीव गांधी की उपलब्धि के तौर 1982 के एशियन खेलों को कराना भी बताया जाता है। उस समय राजीव गांधी कांग्रेस पार्टी के महासचिव थे। लेकिन, क्या राजीव गांधी ने कोई ऐसी विरासत दी थी, जिसे लेकर ये कहा जाए कि गांधी परिवार या कांग्रेस की समृद्ध विरासत राहुल गांधी को मिली थी, लेकिन, वो इसे संभाल नहीं पाए। राजीव गांधी अगर प्रधानमंत्री बन सके तो उसके पीछे इंदिरा गांधी की हत्या की बुनियाद पर मिला जबर्दस्त बहुमत था। अगर ऐसे प्रधानमंत्री बनना होता, तो सोनिया गांधी 2009 में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना सकती थीं। और कल्पना करके देखिए कि कभी-कभी ही सही लेकिन, राहुल जब बांहें चढ़ाते, कुछ चुने मुद्दों पर गुस्साते नजर आते, तो क्या जनता के बीच उनकी छवि मनमोहन सिंह से बेहतर होती या नहीं। ये बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि राहुल गांधी जब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर होते, तो निश्चित तौर पर इस देश की जनता में एक बड़ा वर्ग और खासकर सत्ता से चिपके रहने वाले कांग्रेसी नेताओं का एक बड़ा वर्ग तो निश्चित तौर पर राहुल गांधी को महानतम प्रधानमंत्री बनाने के सैकड़ों नुस्खे खोजकर उसे अमल में ला देता। क्योंकि, प्रधानमंत्री के तौर पर राजीव गांधी ने कुछ ऐसा नहीं किया था। जो खास हो। लेकिन, राजीव गांधी की बात होते ही नए भारत का निर्माता टाइप विशेषण राजीव गांधी के लिए कहा जाता है।


राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते ही भोपाल गैस कांड हुआ था। ये इतना बड़ा धब्बा है कि किसी भी नेता के सारे जीवन को कलंकित करने के लिए काफी था। लेकिन, भोपाल गैस कांड के बाद भी राजीव गांधी की छवि बेदाग नेता की ही रही। बोफोर्स घोटाला भी राजीव गांधी के समय में ही हुआ। उसी की वजह से 1989 में वी पी सिंह सत्ता में आए। ये राजीव गांधी ही थे जिनके समय में शाहबानो का मामला सामने आया। ये 542 में से 411 सीटें पाकर प्रचंड बहुमत वाली कांग्रेस थी। सोचिए इतने प्रचंड बहुमत वाली सरकार के मुखिया होने के बावजूद राजीव गांधी देश के लिए क्या खास कर पाए। फिर भी राजीव गांधी को भारत रत्न से नवाज दिया गया। दरअसल इसी सब वजह से राहुल गांधी पर ये दबाव बनता है कि वो इतनी बड़ी विरासत संभाल नहीं पाए। राहुल गांधी की डिग्रियों पर कई बार सुब्रमण्यम स्वामी सवाल उठा चुके हैं। लेकिन, शायद ही कभी इस बात की चर्चा हुई हो कि राजीव गांधी 1965 तक ट्रिनिटी कॉलेज, कैंब्रिज में पढ़ने के बावजूद अपनी डिग्री पूरी नहीं कर सके। विकीपीडिया पर अभी भी ये साफ लिखा हुआ दिखता है। ये राजीव गांधी ही थे जिन्होंने एक बयान दिया था कि बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती हिलती ही है। राजीव गांधी का वो बयान अगर आज के समय में आया होता, तो 24 घंटे के टीवी चैनल और सोशल मीडिया ने राजीव गांधी को क्या से क्या बना दिया होता। राजीव गांधी का वो वीडियो अब उपलब्ध है। उसे देखकर साफ लगता है कि राहुल गांधी दरअसल उसी विरासत को संभाल रहे हैं। जो उन्हें मिली थी। लेकिन, मीडिया आंदोलन के इस समय में राहुल गांधी नाकाम साबित हो रहे हैं। जबकि, सच्चाई यही है कि राहुल गांधी राजनीति में आने के अनिच्छुक होने के बावजूद अपनी हर कोशिश कर रहे हैं कि वो कांग्रेस के नेता बन सकें। दिक्कत बस इतनी है कि उनके पिता को प्रचंड बहुमत वाली सरकार मिल गई थी। उनके पिता के समय में मीडिया ऐसा नहीं था जो छोटी-छोटी बातों पर किसी नेता को धूल में मिला देता है। या फिर आसमान में खड़ा कर देता है। दरअसल राजीव गांधी उस समय के नेता थे, जब कांग्रेस के निष्ठावान लोगों का देश भारत हुआ करता था। उसमें सबसे बड़ी सेंध लगाने का काम विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किया था। लेकिन, लिट्टे ने जिस तरह से राजीव गांधी की निर्मम हत्या कर दी। उससे राजीव गांधी पर लगे सारे दाग धुल गए। राजीव गांधी के समय से स्थितियां एकदम उलट हैं। दरअसल राहुल गांधी को विरासत में पाने के लिए खास बचा नहीं है और राहुल गांधी की परवरिश ऐसी हुई नहीं है कि वो कांग्रेस को नए सिरे से लोगों के करीब पहुंचा सकें। इस समय न कांग्रेस के प्रति देश के लोगों में कोई उत्साह सम्मान बचा है ना गांधी परिवार के प्रति। इसीलिए मुझे लगता है कि राजनीतिक विश्लेषकों और देश की जनता को राहुल गांधी की समीक्षा एक समृद्ध विरासत वाले राजकुमार की बजाए एक चुकी हुई विरासत के शहजादे के तौर पर करनी चाहिए। तब शायद ज्यादा बेहतर समीक्षा राहुल गांधी की हो सकेगी। 

Friday, May 21, 2010

सोनिया मैडम, ये कौन सी पॉलिटिक्स है

शासन चलाने के साथ विपक्षी भूमिका भी अपने पास रख लेने की कला कांग्रेस से बेहतर किसी के पास नहीं है। नक्सलियों से निपटने पर केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम का ताजा बयान कुछ इसी नीति को पुख्ता करता है। वैसे इस काम के लिए कांग्रेस अलग-अलग समय पर अलग-अलग नेताओं को इस्तेमाल करती रहती है जो, सरकार में न होकर पार्टी में होते हैं। और, UPA 1-2 में ये भूमिका मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह बखूबी निभा रहे हैं। लेकिन, नक्सल समस्या जैसे गंभीर मसले पर शायद कांग्रेसी पॉलिटिक्स सिर्फ दिग्विजय के बयानों से अपना काम नहीं साध पा रही थी इसलिए चिदंबरम को भी ये बयान देना पड़ा कि नक्सलियों के आतंक से निपटने के लिए धैर्य की जरूरत है।

ये वही चिदंबरम साहब हैं जो, नक्सलियों के खिलाफ बेहद कड़ी सैन्य कार्रवाई तक करने के पक्षधर होने की वजह से कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के निशाने पर भी आ गए थे। शायद और कोई रहा होता तो, वो अनुशासनात्मक कार्रवाई के दायरे में आ गया होता लेकिन, इकोनॉमिक टाइम्स में चिदंबरम की यानी अपनी ही सरकार की नक्सल से निपटने की रणनीति को जिस तरह से बेकार बताया था, उस पर भी सोनिया मैडम ने कुछ भी नहीं कहा। हां, चिदंबरम को जरूर अपनी कड़ी रीढ़ की हड्डी नरम करनी पड़ी। दरअसल अब कांग्रेस को ये लग रहा है कि जिस तरह से रमन सिंह आक्रामक हो रहे हैं अगर इस समय सैन्य कार्रवाई की इजाजत दी गई तो, आम लोगों में उस अभियान की सफलता का सेहरा बीजेपी के मुख्यमंत्री रमन सिंह के सिर बंध सकता है।

संसद में भी कड़े तेवर अपनाते हुए बहस के दौरान विपक्ष के नेता अरुण जेटली खुलेआम कह चुके हैं कि चिदंबरम के साथ हम हैं लेकिन, उनकी पार्टी ही नहीं है। चिदंबरम बेचारे अपनी कड़क मंत्री की छवि बनाए रखना चाहते हैं लेकिन, वो भूल गए कि कांग्रेस की पसंद गृह मंत्री पद के लिए शिवराज पाटिल जैसे ढुलमुल नेता रहे हैं वो, तो मुंबई हमले के बाद बहुत हल्ले की वजह से उनकी बलि लेना पड़ी। अब कांग्रेस को नक्सलियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने वाला गृह मंत्री नहीं चाहिए। वजह साफ है लालू प्रसाद यादव ने जिस तरह से बिहार चुनाव के मद्देनजर नक्सल नीति पर गंदा बयान जारी किया है उसने कांग्रेसी रणनीतिज्ञों के कान खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस को भी तो बिहार में अपना हाल थोड़ा ठीक करना है। उस पर बंगाल में ममता और कांग्रेस की बीच गठजोड़ में पड़ी दरार और ममता को माओवादियों का पूरा साथ इन सबने कांग्रेस को रणनीति थोड़ा बदलने पर मजबूर कर दिया है। हो, सकता है इसकी वजह से अब चिदंबरम के गृह मंत्रालय की ओर से जारी होने वाले नक्सल विरोधी बड़े-बड़े विज्ञापन भी बंद कर दिए जाएं। यही कांग्रेसी पॉलिटिक्स है।

एक नहीं कई नमूने हैं। संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु की फांसी की फाइल गृह मंत्रालय और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बीच गजब फंसी हुई है। और, जब मामला खुलने पर सरकार की किरकिरी होनी शुरू हुई तो, हमेशा कांग्रेस की ओर से मुस्लिमों के बड़े नेता बनने की कोशिश करते दिखने वाले परम धर्मनिरपेक्ष दिग्विजय सिंह ने बयान जारी कर दिया कि अफजल गुरु को जल्द फांसी हो। अब अगर ये सिर्फ बयान भर नहीं है तो, ये बात चिदंबरम, शीला दीक्षित को बतानी थी। राहुल गांधी के इस प्रमुख सलाहकार की बात टालने की हिम्मत भला कौन कांग्रेसी इस समय कर सकता है।

इससे पहले बाटला हाउस एनकाउंटर पर भी दिग्विजय सिंह आजमगढ़ जाकर आतंकी परिवारों तक में अपनी ही सरकार की रिपोर्ट को झुठलाकर आए थे। जांच का आश्वासन भी दिया था। ये अलग बात है कि दिल्ली आते-आते पलट गए। वाह रे कांग्रेसी पॉलिटिक्स।


Wednesday, October 28, 2009

ये पूरा बेड़ा गर्क करके ही मानेंगे

अब सोचिए कि क्या होगा। ये कुछ समझने-मानने को तैयार ही नहीं हैं। वैसे ये मान ही लेते तो, इस हाल में थोड़े न पहुंचते। इतनी गंभीर बीमारी है और इनके शुभचिंतकों से लेकर आलोचक तक अलग-अलग तरीके से इन्हें आगाह कर रहे हैं। लेकिन, इनको क्यों फर्क पड़े आखिर पूरी तरह से स्वस्थ पार्टी को गंभीरमरीज जैसे हाल में पहुंचाने में इनके जैसे बड़े लोगों की पूरी टोली के सत्कर्मों का तो बड़ा योगदान रहा है।


ये हैं बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह जो, ये मानने को तैयार ही नहीं हैं कि भारतीय जनता पार्टी को भारतीय जनता की पार्टी बने रहने के लिए बड़े इलाज की जरूरत है। पार्टी के पेस्ट कंट्रोल की जरूरत हम जैसे लोग तो बहुत पहले से कह रहे हैं। अब तो, ये बात खुद - कम से कम भारतीय जनता पार्टी के तो, सबसे बड़े समाजविज्ञानी- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहनराव भागवत भी कह रहे हैं। पत्रकारों के सवाल पूछने पर भागवत जी ने कहा बीजेपी हमसे सलाह मांगेगी तो, हम देंगे। लेकिन, बिन मांगे सलाह दे ही दी कि भाजपा को बड़ी सर्जरी या कीमोथेरेपी तक की जरूरत है।


लेकिन, अभी करीब डेढ़-2 महीने तक और बीजेपी के ठेकेदार रहने वाले राजनाथ से जब पत्रकारों ने भागवत जी इस सलाह पर प्रतिक्रिया मांगी तो, उन्होंने कहा ये कौन कह रहा है कि बीजेपी का बुरा हाल है। अब पता नहीं राजनाथ सिंह अपने प्रदेश में चार लोगों से मिल बैठके बतियाते भी हैं या नहीं। क्योंकि, अगर जरा भी बतियाते रहते तो, उन्हें पता लग जाता कि उनकी पार्टी की बीमारी इतनी बड़ी हो गई है कि अब लोग पार्टी में रहने वाले लोगों को इस छूत से दूर रहने की सलाह देने लगे हैं। मैं अभी चार दिन पहले इलाहाबाद से लौटा हूं और कांग्रेस के लिए ये सुखद है कि लोग बीजेपी में पड़े अपने नजदीकियों को सलाह देने लगे हैं कि राहुल गांधी से कोई जुगाड़ खोजो ना। क्योंकि, ढंग की राजनीति करने वालों के लिए सपा-बसपा में तो पहले ही जगह नहीं बची है।

Wednesday, January 23, 2008

नेताजी को याद तक करने से डरती है कांग्रेसी सरकार


नेताजी की आत्मा इस देश की सरकारों पर पता नहीं दुखी हो रही होगी, रो रही होगी या हंस रही होगी। जिस देश को आजाद कराने के लिए उन्होंने सबकुछ किया। उसी देश में आजादी के बाद उनको याद तक करने से सरकारें डर रही हैं। पता नहीं कौन सी वजह है जो, सरकारों को नेताजी को याद तक करने से डराती रहती है। वैसे तो, कांग्रेस की सरकार गांधी-नेहरू परिवार के अलावा किसी को देश के लोगों को याद नहीं कराना चाहती। लेकिन, नेताजी के मामले में कांग्रेस को ये भी लगता है कि नेताजी को जितने ज्यादा लोग देश में याद करेंगे, कांग्रेस के आजादी के पहले की उनकी भूमिका के गुणगान में उतनी कमी हो जाएगी।

आज नेताजी की 111वीं जयंती है। लेकिन, देश भर में कहीं इस सरकार ने छोटा सा कार्यक्रम भी नेताजी की याद में नहीं किया। RTI यानी सूचना के अधिकार के तहत सरकार को ये जानकारी देनी पड़ी है कि इस सरकार ने नेताजी पर एक छोटा सा भी विज्ञापन नहीं दिया। जबकि, ऐरे-गैरे नत्थू खैरे टाइप के चिरकुट नेताओं की गंदी सी फोटो लगे विज्ञापनों पर सिर्फ साल भर में सरकार ने 209 करोड़ रुपए खर्च कर दिए।

और, ये भी तब जब बंगाली प्रियरंजन दासमुंशी के पास ही सूचना और प्रसारण मंत्रालय है जो, सरकारी विज्ञापन तय करता है। सरकार अब तक ये भी नहीं बता रही है कि नेताजी की मृत्यु की जांच करने वाले आयोग ने क्या रिपोर्ट सौंपी है। सरकार की बेशर्मी ये है कि आजाद हिंद फौज के कमांडर इन चीफ नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सरकार देश के पहले कमांडर इन चीफ का खिताब देने को तैयार नहीं है। जबकि, ये नेताजी की आजाद हिंद फौज ही थी जिसने देश की आजादी से तीन दिन पहले भारत का झंडा लहरा दिया था।

खैर, देश नेताजी को पूरे सम्मान के साथ याद कर रहा है। क्योंकि, इन कांग्रेसियों का हाल तो ये है कि ये सोनिया और राहुल-प्रियंका को तो सम्मान दे सकते हैं लेकिन, सुभाष चंद्र बोस को याद करने से भी डरते हैं। ये बेशर्म ये तक भूल जाते हैं कि नेताजी भी आजादी के पहले की कांग्रेस के अध्यक्ष तक रह चुके थे। लेकिन, शायद महात्मा गांधी के विरोध की वजह से कोई कांग्रेसी सुभाष को याद करके महात्मा गांधी का विरोधी नहीं कहलाना चाहता।

Saturday, December 01, 2007

धन्य हो सेक्युलर इंडिया की धर्मनिरपेक्षता के पहरेदारों!

तसलीमा नसरीन ने सीपीएम नेता गुरुदास दास गुप्ता को फोन करके कह दिया कि वो अपनी विवादित किताब द्विखंडिता से वो लाइनें हटा देंगी जो, मुस्लिम समुदाय के लोगों को आहत कर रही हैं। गुरुदास दास गुप्ता पूरे जोश के साथ टीवी चैनलों पर प्रकट हुए और कहा कि तसलीमा का ये कृत्य समाज के हित में है। जिन लोगों को तसलीमा की उन लाइनों से कष्ट पहुंचा था। अब उन्हें शांति मिली है। कोलकाता में अब शांति हो जाएगी। दरअसल कोलकाता में शांति की बात कहते समय गुरुदास दास गुप्ता के चेहरे पर जिस तरह के संतोष का भाव था उससे, साफ देखा जा सकता था कि लेफ्ट के नेता अपने गढ़ (पश्चिम बंगाल), वोट बैंक (मुस्लिम) और धर्मनिरपेक्षता (अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण) की रक्षा करने में सफल होते दिख रहे हैं।

कई मुस्लिम संगठनों ने भी तसलीमा के फैसले को उचित बताया और कहा कि अब शांति हो जाएगी। जमायते उलेमा हिंद के मोहम्मद मदनी भी खुश हैं। मदनी ने कहा कि अब तसलीमा कहीं भी रह सकती हैं। जैसे भारत उनकी जागीर हो वो, उसके जागीरदार और तसलीमा उनकी गुनहगार प्रजा। ऐसी गुनहगार प्रजा जिसने गुनाह कबूल कर लिया हो। और, उसे उसके गुनाह के लिए बड़े दिल के राजा ने माफ कर दिया हो।

एक और बयान आया MIM के सांसद असादुद्दीन ओवैसी का। शायद ये अकेला बयान था जो, ईमानदार था। ओवैसी के कृत्य जायज-नाजायज हो सकते हैं। लेकिन, तसलीमा के किताब से लाइनें हटाने के फैसले पर ओवैसी का बयान ईमानदार था। ओवैसी ने कहा- तसलीमा मौकापरस्त हैं। वो सिर्फ इसलिए पन्ने हटाने पर राजी हुई क्योंकि, तसलीमा को लगने लगा था कि भारत के दरवाजे उनके लिए बंद होने वाले हैं। ओवैसी का मानना है कि तसलीमा भविष्य में फिर ऐसे बयान दे सकती हैं जिससे देश का सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ जाए। अब क्या ये देश ओवैसी लोगों की बपौती है कि तसलीमा को देश का दरवाजा बंद होता दिख रहा था।

तसलीमा ने अपनी किताब द्विखंडिता से चार विवादित पन्ने हटा दिए। अब तसलीमा किसी की भावना को आहत नहीं करना चाहती हैं। ये वही तसलीमा हैं जिन्हें दुनिया भर में अभिव्यक्ति की आजादी का प्रतिनिधि माना जाता है। और, भारत को दुनिया के धर्मनिरपेक्ष देशों का नेता। लेकिन, कांग्रेस सरकार और लेफ्ट के नेताओं के तसलीमा के मामले पर दोगले रवैये ने इन लोगों की तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की कलई खोलकर रख दी है। तसलीमा ने किताब के विवादित पन्ने हटाने के साथ ही धर्मनिरपेक्ष भारत पर जोरदार तमाचा जड़ दिया। तसलीमा ने कहा मुझे समझौता करना पड़ रहा है। मैंने वो किया जो, मैंने अपनी जिंदगी में कभी नहीं किया था।

हाल ये है कि बांग्लादेश से आने वाले घुसपैठिये मजे से पश्चिम बंगाल में वहां की नागरिकता लेकर रह रहे हैं। बांग्लादेश में रहने वाले अपने भाई-बंधुओं से मिलने के लिए ये घुसपैठिये निरंतर बाड़ फांदकर आते-जाते रहते हैं। इनके पास बातचीत करने के लिए बांग्लादेश का मोबाइल नंबर होता है। इनके पास पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से जारी राशन कार्ड होता है। और, इतने से लेफ्ट सरकार के खिलाफ हर उठने वाली आवाज को दबाने के लिए हर कर्म-कुकर्म करने का इनको लाइसेंस मिल जाता है। वैसे मुसलमानों के हितों पर हमेशा सजग दिखने वाली लेफ्ट सरकार तसलीमा की नागरिकता के खुले विरोध में है।

ये महज संयोग तो नहीं हो सकता न कि कोलकाता में तसलीमा की खिलाफत में हिंसा उसी समय हुई जब, नंदीग्राम में सुनियोजित सरकारी (लेफ्ट कैडर प्रायोजित) नरसंहार के खिलाफ पूरा देश एक स्वर से आवाज उठा रहा था। 15 सालों बाद कोलकाता में इतना हिंसक विरोध हुआ कि कर्फ्यू लगाना पड़ा। कोलकाता के हर एक गली-मुहल्ले में लाल सलाम का कब्जा जैसा है। ऐसा कब्जा कि लेफ्ट कैडर की इजाजत के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। कुछ लोग ये भी कह रहे हैं कि कोलकाता में हिंसा करने वाले लोग लेफ्ट के समर्थक ही थे।

कोलकाता में जिस दिन हिंसा हुई थी। टीवी चैनलों पर काफी समय तक ये साफ नहीं हो पा रहा था कि ये सब नंदीग्राम के विरोध में हो रहा है। रिजवानुर की मौत के विरोध में या फिर तसलीमा को निकाल बाहर कर देने के समर्थन में। कर्फ्यू लग गया तो, साफ हुआ कि ये सब तसलीमा के विरोध में हो रहा था। धर्मनिरपेक्ष, मुस्लिम हितों की रक्षक लेफ्ट सरकार ने तसलीमा को बंगाल से निकाल बाहर करने में कोई देरी नहीं की। केंद्र में बैठी दूसरी धर्मनिरपेक्ष सरकार को भी तसलीमा की जान बचाने के लिए सांप्रदायिक भाजपा! के शासन वाला राज्य राजस्थान ही मिला।

राजनीति का मौका मिल गया था लगे हाथ दो और सांप्रदायिक भाजपाई सरकारों! ने तसलीमा का सुरक्षा का जिम्मा मांगा। लेकिन, दो धर्मनिरपेक्ष (कांग्रेस और कॉमरेड) सरकारों को ये कैसे पचता कि जिनको वो सांप्रदायिक बताते रहे हैं उसे तसलीमा की सुरक्षा का जिम्मा देकर उन्हें धर्मनिरपेक्ष बनने का मौका कैसे दे देते।

खैर, तसलीमा के बयान के बाद पिछले कई दिनों से तसलीमा की जान किसी तरह बचाए घूमती खुफियां एजेंसियों को भी थोड़ी राहत मिली होगी। कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा- जो, भी शांति कायम करने में मदद करे उस कदम का स्वागत है। दरअसल तसलीमा को मुस्लिम कट्टरपंथियों से सुरक्षित रखना जिस तरह से सरकार के लिए मुश्किल हो रहा था उसमें निश्चित तौर पर कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के लिए इससे राहत की बात क्या हो सकती है।

वैसे कांग्रेस के नेता इस बात पर बोलने से बच रहे हैं कि सरकारों का दुमछल्ला बन चुकी केंद्रीय खुफिया एजेंसी सीबीआई ने जगदीश टाइटलर को क्लीन चिट कैसे दे दी। सीबीआई कुछ इस तरह से काम कर रही है जैसे उसे बनाया ही गया है नेहरू-गांधी परिवार और उनके दरबारियों को हर मुश्किल से बाहर निकालने के लिए। क्वात्रोची के मामले में सीबीआई के कृत्य तो अब देश के ज्यादातर लोगों को पता चल चुका है।

एक बार फिर सीबीआई ने दिखा दिया कि ये एक ऐसी एजेंसी बन चुकी है जो, किसी भी मामले को बरसों तक खींच सकती है। और, उसके बाद सरकार, सत्ता में बैठे लोगों के मनमुताबिक, फैसले सुना देती है। सीबीआई इतने सालों में उस जसबीर सिंह को नहीं खोज पाई जिसे सीएनएन-आईबीएन ने खोज निकाला। और, सिर्फ खोज ही नहीं निकाला। जसबीर का बयान भी टीवी पर चला कि उससे सीबीआई ने कभी कोई पूछताछ नहीं। ये वही जसबीर सिंह है जो, जगदीश टाइटलर के खिलाफ सिखों के नरसंहार का मुख्य गवाह है। अब सीबीआई चैनल से ही जसबीर सिंह को खोजने के लिए मदद मांग रही है। अब क्या कोई तुक बनता है इस एजेंसी को बनाए रखने का।

सवाल तसलीमा की किताब से 4 पन्ने निकलने और जगदीश टाइटलर को सीबीआई की क्लीन चिट मिलने भर का नहीं है। सवाल ये है कि इस तरह भारत किस धर्मनिरपेक्षता का दावा कर सकता है। कांग्रेस और कम्युनिस्ट किस तरह की धर्मनिरपेक्षता की रक्षा में जुटे हैं। क्या धर्मनिरपेक्षता सिर्फ सत्ता बचाने तक की बची रह पाती है।

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