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Tuesday, November 17, 2015

बाजार बड़ा भला कर सकता है

गीता प्रतियोगिता की विजेता मरियम सिद्दीकी
बाजार की बात करिए और एक सांस में कोई भी बाजार की बुराई ही बुराई गिना देगा। वो भी जो बाजार में सिर से पांव तक डूबा है। वो भी जो बाजार के बिना जी नहीं सकता। वो भी जो बाजार की हर सुविधा के लिए सारी जिंदगी कसरत करते रहते हैं। खैर, मैं तो आमतौर पर बाजार का समर्थक ही हूं। बाजार की सुविधाओं का भी। हां, ये भी उतना ही दृढ़ विश्वास है कि बाजार में भी दूसरी सारी व्यवस्थाओं की तरह ढेर सारी कमियां हैं। जिसे सुधारते रहना जरूरी है। इस रविवार को स्टार प्लस पर आने वाला आज की रात है जिंदगी शो देख रहा था। अमिताभ बच्चन हैं, तो आकर्षण बढ़ जाता है। और अमिताभ बच्चन की तराकी भी अद्भुत है। खैर, मैं जो शो देख रहा था। उसमें गीता प्रतियोगिता जीतने वाली मरियम सिद्दीकी थी। मरियम है तो सिर्फ 13 साल की लेकिन, मरियम का ज्ञान किसी बड़े विद्वान का आभास दे रहा था। 13 साल की उम्र में मरियम कह रही थी कि किसी को चोट लगे और हिंदू मुसलमान पूछकर उसका इलाज हुआ तो, इंसानियत मर जाएगी। 

मरियम के माता-पिता
और शो में जब अमिताभ बच्चन ने मरियम के पिता आरिफ सिद्दीकी से पूछा कि उन्हें क्यों लगा कि बेटी को इस तरह के धार्मिक ग्रंथों को पढ़ाना चाहिए। आरिफ का जवाब आया कि एक दिन स्कूल से लौटकर बेटी ने पूछा कि हमारे साथ ज्यादातर बच्चे हिंदू क्यों हैं। इसके बाद लगा कि बच्ची को धर्म की समझ होनी जरूरी है। कमाल ये है कि इस उम्र में मरियम ढेर सारे धर्मग्रंथ पढ़ चुकी है। अब वो गुरुग्रंथ साहिब का अध्ययन कर रही है। ढेर सारा ज्ञान, पढ़ाई और दबाव भी शायद ही उतने लोगों पर असर करे जितना उस दिन स्टार प्लस पर आज की रात है जिंदगी देखने वालों पर हुआ होगा। जाहिर है ये धर्मार्थ नहीं हो रहा है। दूसरे मनोरंजन चैनलों को मात देने के लिए ये कार्यक्रम स्टार प्लस ने बनाया है। लेकिन, इतने सुंदर तरीके से कोई क्या धर्म बताएगा। इसलिए बाजार को खारिज मत कीजिए। मैं तो बाजार को लेकर इतना आशावादी हूं कि कश्मीर की सारी मुश्किलों का हल इसी बाजार में देख रहा हूं। 

Tuesday, August 19, 2014

खेत खत्म, बाजार बमबम

रेडियो पर विज्ञापन सुनते दफ्तर आया जिसमें पत्नी चिंतित है कि खाने का पूरा ध्यान रखने के बाद भी पति चैतन्य नहीं रहता। सलाह मिलती है कि रोज के खाने से शरीर की सारी जरूरतें पूरी नहीं होतीं। प्रोटीन के लिए ये उत्पाद खाओ। और अगर ध्यान से दूसरे विज्ञापनों को देखें तो वो बताता है कि शुद्ध गेहूं या दूसरी रोज की खाने की चीजें इसमें मिली हैं, इसलिए खाओ। ये बाजार चाहता क्या है। खेत से पैदा अनाज छोड़, अनाज को इधर-उधर करके कारखाने में बने, पैक डिब्बाबंद उत्पादन को खाया जाए। कमाल है ना। लेकिन, बाजार ऐसे ही काम करता है। वो चाहता है कि खेत बने रहें लेकिन, सिर्फ उसकी जरूरत भर के। सिर्फ उसके कारखानों में नए उत्पाद बनाने भर के। किसान भी बचे रहें उतने ही।

Tuesday, August 27, 2013

खाना पक्का करना है तो रुपया मजबूत करो सरकार!



मेरे एक मित्र अभी हाल ही में बैंकॉक से लौटे। लौटने के बाद उनसे बात हुई तो बड़े ही निराश स्वर में वो बोले अरे यार अपनी असल औकात जाननी हो तो एक बार विदेश होकर आओ। बैंकॉक वैसे तो पर्यटन की वजह से भारतीयों और दुनिया के लोगों को पसंद आता है। लेकिन, एक दूसरी वजह ये भी कि इलेक्ट्रॉनिक सामानों का अच्छा बाजार भी यहां है। जहां भारतीय आधुनिक तकनीक वाले इलेक्ट्रॉनिक भारत से कम कीमतों पर खरीदकर वापस आते थे। लेकिन, अब हालात बदल चुके हैं। भारतीय रुपये की गिरती कीमत ने भारतीयों की औकात दुनिया के हर कोने में घटा दी है। फिर क्या लंदन, अमेरिका जैसे दुनिया के बड़े चमकते शहर और क्या पर्यटन के ही बूते दुनिया के नक्शे पर जाना जाने वाला बैंकॉक। रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले गिरी ये तो रोज रोज अखबार टीवी की सुर्खियां बनने से सब जान गए हैं लेकिन, थाईलैंड की करेंसी थाई बात के मुकाबले भी हमारा रुपया रोने लगा है ये शायद हममें से कम ही भारतीयों को पता होगा। एक अमेरिकी डॉलर देकर हमारा रुपया 65 से ज्यादा मिल रहा है लेकिन, अगर हम वही रुपया देकर थाईलैंड के बैंकॉक में कुछ खरीदना चाहें या अपनी छुट्टियों को और यादगार बनाने की कोशिश करें तो आधी से कुछ ज्यादा ही कीमत मिल पाएगी। एक रुपया थाई बात में 67 पैसे के बराबर ही होता है। जबकि, वहीं अगर कोई ऑस्ट्रेलियाई आया होगा तो एक ऑस्ट्रेलियाई डॉलर देकर उसे 28 से ज्यादा थाई बात मिल जाएंगे। जबकि, लंदन से एक पाउंड लेकर आए पर्यटक को करीब 49 थाई बात मिल जाएंगे। ये तो थी बैंकॉक में भारतीयों की छुट्टी चौपट होने की कहानी। जिसकी वजह बनी है रुपये की कमजोरी। अगर सिर्फ थाईलैंड में मौज मस्ती या दुनिया के आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की खरीदारी भर का मसला होता तो ये रुपया रोता रहे हमें क्या करना। लेकिन, इस रुपये की कमजोरी अब देश की कमजोरी बनती जा रही है।

रुपया रसातल में जा रहा है। रिजर्व बैंक और सरकार के ढेर सारे डॉलर को लाने-कमजोर करने और रुपये को मजबूत करने के उपाय के बावजूद रुपया रसातल में जा रहा है। मतलब सरकार के फैसले रुपये को मजबूत नहीं कर पा रहे हैं। मतलब 64 से नीचे गिरा रुपया और भी खतरनाक स्तर तक गिर सकता है। यही वजह है कि डॉएश बैंक की ताजा रिपोर्ट कह रही है कि रुपया डॉलर के मुकाबले 70 तक गिर सकता है। यानी उतना जितना न हमारे वित्त मंत्री की उम्र है और न हमारे लोकतंत्र की। हां, साल के अंत तक इसमें कुछ सुधार के संकेत हो सकते हैं। और, इसकी सबसे बड़ी वजह भयानक निराशा है। उस निराशा की कुछ सीधी वजहें जो मुझे दिखती हैं। सबसे पहली ये कि सरकार हो या फिर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया दोनों के फैसले एक समय के बाद खुद के ही मजबूत विरोध की वजह देते हैं। उदाहरण के लिए सरकार की बात करें तो 2 बजट पहले ही वित्त मंत्री के तौर पर प्रणब मुखर्जी ने इस बात के संकेत दिए थे कि अब धीरे-धीरे सरकार सब्सिडी खत्म करेगी और बाजार के हवाले पेट्रोलियम उत्पादों के दाम तय करने का अधिकार देगी। हालांकि, बाजार के हवाले दाम तय करने का जो अधिकार था वो मिलना था सरकारी तेल कंपनियों को ही और वो बड़ी तेजी से मिल भी रहा है। उसी के साथ ये संकेत आए कि 2009 में यूपीए दो बनवाने में अहम भूमिका निभाने वाली मनरेगा योजना पर भी खर्च घटाया जाएगा। लगा कि सरकार खजाने को दुरुस्त करके दुनिया की रेटिंग एजेंसियों को ये दिखाना चाहती है कि भारत सुधारों की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सुधारों का अपना चेहरा और चमकाने के लिए यूपीए 2 में दोबारा वित्त मंत्री बने पी चिदंबरम ने एक के बाद एक धड़ाधड़ ऐसे एलान किए कि बस अब देश में डॉलरों की बाढ़ सी आ जाएगी। फिर वो एफडीआई के जरिए रिटेल में हो, एविएशन और दूसरे क्षेत्रों में हो या फिर एफआईआई के जरिए भारत के शेयर बाजार में हो। लेकिन, हुआ इसका उल्टा। डॉलर को लपकने में लगी सरकार को विपक्ष ने ऐसी लंगड़ी मारी कि लगा पूरा देश ही रिटेल में एफडीआई का विरोधी हो गया। फैसला लिया गया, लौटाया गया, फिर और दम लगाकर लिया गया। पर नतीजा शून्य रहा। अब तक एक भी मल्टीब्रांड रिटेल स्टोर देश में खुल नहीं पाया है जिसे दिखाकर वो अपनी डॉलर के आने की बात मजबूती से समझा पाते।

दूसरे सुधार की बात कर लें। दूसरा सुधार ये कि सरकार का सब्सिडी का बोझ कम करना है। क्योंकि, सरकारी खजाने का घाटा बेहद खतरनाक स्तर तक पहुंच रहा था। फिर चाहे वो वित्तीय घाटा हो या चालू खाते का घाटा। वित्तीय घाटा यानी देश की कुल संपत्ति और कर्ज का संतुलन और चालू खाते का घाटा यानी हर रोज के खर्च के लिए मलतब इंपोर्ट-एक्सपोर्ट के लिए डॉलर रुपये का संतुल। दोनों संतुलन बिगड़ गए थे। 70 प्रतिशत से ज्यादा पेट्रोलियम प्रोडक्ट आयात करने वाली सरकार के लिए सबसे आसान था पेट्रोलियम प्रोडक्ट की सब्सिडी को खत्म करना। ये कहकर-समझकर कि पेट्रोल से कुल महंगाई पर कम असर पड़ता है सरकार ने 25 जून 2010 को पेट्रोल की कीमतों को बाजार के हवाले कर दिया। हालांकि, उसके बाद भी सरकार इस नीति को राजनीतिक लाभ हानि के लिए तोड़ती मरोड़ती रही। बिहार, बंगाल सहित 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव के समय तेल कंपनियों से बिना कहे पेट्रोल के दाम तय करने का अधिकार ले लिया गया। भले ही उस घाटे का असर तेल कंपनियों और उससे सरकार खजाने पर चाहे जैसे पड़ा हो। वही हाल अभी भी है। कच्चा तेल 108 डॉलर प्रति बैरल है। 64 रुपये से ज्यादा देने पर भी 1 डॉलर मिल रहा है। तेल कंपनियों का पेट्रोल पर घाटा बढ़ रहा है लेकिन, 15 अगस्त की समीक्षा बैठक में तेल के दाम तय करने का अधिकार पाई तेल कंपनियों को पेट्रोल का घाटा नहीं दिखा। वजह संसद का सत्र चल रहा है। अब इंतजार है संसद सत्र खत्म होने का। सत्र खत्म होते ही पेट्रोल 2 रुपये लीटर तक महंगा होना तय है। यानी सरकार को डर है भी थोड़ा बहुत तो संसद में हंगामे का। आम आदमी के हितों का दावा करने वाली सरकार को सड़क पर होने वाले हंगामे और आम आदमी की जिंदगी में मचे हंगामे की फिक्र कहां है।

अब तीसरे सुधार की बात कर लें। तीसरा सुधार यानी किसी भी तरह भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेश यानी एफआईआई डॉलर लगाएं। सेंसेक्स अभी 18000 के आसपास ही घूम रहा है। 2008 की मंदी में 21000 जाने के बाद सेंसेक्स लुढ़का तो नवंबर की दीवाली वाली मुहूर्त ट्रेडिंग को ही सेंसेक्स 21000 का आंकड़ा पार कर पाया था। उसके बाद से ये तीसरी दीवाली आने वाली है लेकिन, सेंसेक्स 18000 से ऊपर टिक नहीं पा रहा है। अब ऐसे बाजार में भला कौन सा विदेशी निवेशक डॉलर लगाएगा। हां, इतना जरूर है कि रुपये की गिरावट से वो अपना मुनाफा कमाकर उसे लेकर भागने में ही भलाई समझ रहे हैं।

अब बात रिजर्व बैंक के कदमों की। अब तक महंगाई से चिंतित रिजर्व बैंक ने बाजार में रकम की कमी करने की हरसंभव कोशिश की। उसकी वजह से बैंकों ने ब्याज दरें बढ़ाए रखीं। अब रुपये की गिरावट रोकने के लिए रिजर्व बैंक की नीति फिर से बदली और कुछ राहत बैंकों को दी गई। लेकिन, इससे ब्याज दरों में किसी तरह की कमी की उम्मीद करना ही व्यर्थ है। और, कैच 22 की स्थिति में फंसे रुपये की मजबूती भी नहीं हुई। रुपया जिस दिन 64 के नीचे पहली बार लुढ़का तो संसद सत्र था। लेकिन, सरकार को चिंता लुढ़कते रुपये, गिरती भारत की औकात और आम आदमी की जेब की घटती आमदनी की चिंता नहीं थी। उसे चिंता थी फूड सिक्योरिटी बिल की। फूड सिक्योरिटी बिल पास हो गया। दावा ये है कि इस कानून के बाद देश में कोई भूखा नहीं रहेगा। गरीबों को दो जून की रोटी मिल जाएगी। हो सकता है ये बात सच भी हो सवा लाख करोड़ की इस योजना से देश के गरीबों को 2 जून की पेट भरने लायक रोटी मिल जाए। लेकिन, अगर देश के हालात ऐसे ही बने रहे तो जो मनमोहन की उदारवादी नीति के चलते 1991 से 2010 तक चमकते चेहरे के साथ अच्छी गाड़ी में अच्छा कपड़ा पहनकर अच्छा खाना खा रहे थे वो सब भोजन गारंटी कानून के दायरे मे आते दिखेंगे। इसलिए सरकार खाना पक्का करना है तो रुपया मजबूत करो बाकी सब खुद हो जाएगा। और, रुपया मजबूत करने के लिए एफडीआई, एफआईआई से ज्यादा तुरंत सिर्फ चालू खाते के घाटे को घटाने की जरूरत है। क्योंकि, एक बार भारत की साख दुनिया के सामने सुधरी तो ये एफआईआई, एफडीआई के जरिए डॉलर तो खुद ब खुद आने लगेंगे और सारी समस्या खत्म हो जाएगी। 
(ये लेख मनी मंत्र पत्रिका में छपा है)

Tuesday, January 15, 2013

20000 का बाजार और यूपीए की सरकार!

क्या बाजार का मूल स्वभाव ही चोरी, सट्टेबाजी है। कल वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने पहले के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के समय के एक कानून को 2016 तक के लिए टालने का एलान किया। ये कानून इनकम टैक्स विभाग के अधिकारियों को ज्यादा अधिकार देता है कि वो..., विदेशियों की भारत में टैक्स चोरी के मामले की अच्छे से जांच कर सकें। तब से हंगामा मचा था। चिदंबरम ने आते ही इसे 2013-14 तक टाला था। लेकिन, इत्ते से बात नहीं बनी। अब विदेशी निवेशकों को राहत है कि ये कानून GAAR 2016 तक लागू नहीं होगा। इससे बाजार कल खूब भागा। आज भी। बाजार के काम करने की क्या यही मूल शर्त है कि चोरी करने वालों पर शिकंजा न कसे। वो, उसी रकम को घुमाते रहें और बाजार बढ़ाते रहें।
 
 
वैसे, अपने पी चिदंबरम साहब बाजार भगाने के पुराने उस्ताद हैं। 2014 में लोकसभा चुनाव हैं और ये 2013 की शुरुआत है यानी करीब डेढ़ साल का समय है। 2007 अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा पता नहीं कितने लोगों को याद है। यही पी चिदंबरम साहब वित्त मंत्री थे। शेयर बाजार अचानक धड़ाधड़ कर गिरने लगा था। सट्टेबाजों ने तेजी से निवेश निकालना शुरू कर दिया। और, उस समय भी पी नोट्स और FII का ही झंझट था। लेकिन, वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने उस गिरते बाजार में एंट्री क्या ली। सब मामला पलट गया था किसी फिल्म की कहानी जैसा। तब भी ये समझना मुश्किल नहीं था कि आखिर ये बौराया बाजार किसका भला कर रहा है। हाल ये है कि अगर आप घूम टबलकर इस देश के निवेशकों से चर्चा कर लें तो, झूठ बोलकर बुद्धिमान बनने के चक्कर में भले ही सीना चौड़ा किए बाजार से कमाई करने की कहानी सुनने को मिल जाएं। लेकिन, थोड़ा डिटेल में बात कीजिएगा तो, समझ में आएगा कि हमें तो, बड़ी समझ थी लेकिन, कभी ब्रोकरेज के चक्कर में पिट गए तो, कभी बस चूक गए टाइप के बहानों से खुद के बाजार विशेषज्ञ होने की बात बताने वाले लोग मिल जाएंगे। और, इसी विशेषज्ञ होने की कमजोरी को सरकार समझ चुकी है। इसीलिए उसे पता है कि सेंसेक्स सरपट दौड़ता रहे तो, देश की जनता को तरक्की का आभास होता रहेगा। भले उसकी जेब में हुआ छेद बड़ा होता जा रहा है।
 
गजब के फॉर्मूले पर चल रही है यूपीए सरकार। यूपीए 1 पता नहीं किस चमत्कार से आ गई। लेकिन, यूपीए 1 ऐसे ही चमत्कारों से आई थी। 2007 अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में आई इस गिरावट और उसके चमत्कारिक उभार के ठीक पहले यानी अक्टूबर 2007 के पहले पखवाड़े में ही सरकार ने 2009 के लोकसभा चुनाव के लिए तैयारियां शुरू कर दी थीं। और, उन तैयारियों का आगाज भी हो गया था।  उसका असर ये रहा है कि 2009 में यूपीए 2 सत्ता में। और, 2009 में सरकार बनने के साथ ही सरकार के होने पर ही सवाल खड़े होते रहे। देश के सभी राज्यों में कांग्रेस पिटती रही। सिवाय दिल्ली के। देश के सबसे बड़े राज्य यूपी, बिहार में कांग्रेस गायब सी ही रही। लेकिन, अब जब फिर 2009 के लोकसभा चुनाव की तरह 2014 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ डेढ़ साल ही बचे हैं तो, चिदंबरम साहब का चमत्कार दिखने लगा है। नीति विकलांगता से ग्रस्त यूपीए 2 अचानक सारी नीतियों को कड़ाई से लागू करने लगी है या लागू करने की बात करने लगी है। शेयर बाजार का एक अहम वाला सूचकांक सेंसेक्स फिर से 20000 की तरफ जा पहुंचा है। आज तो, छूकर वापस लौटा है। विदेशी निवेशकों को टैक्स चोरी पर भी सरकारी इनकम टैक्स अधिकारी ज्यादा कड़ाई नहीं कर सकेंगे ये खबर सुनते ही विदेशी निवेशक हर तरह की कमाई लेकर भारतीय शेयर बाजार की चमक फिर बढ़ाने में लग गए। मकर संक्रांति के दिन जब प्रयाग (इलाहाबाद) के महाकुंभ में श्रद्धालु आस्था, पुण्य की गठरी संजोने में लगे थे तो, विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से मुनाफे की गठरी तैयार करने में लगे हुए थे। 14 जनवरी को FII यानी विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार में $ 185.41 मिलियन की रक लगा दी। अब कहां टिक पाएंगे इस रकम के सामने हमारे विदेशी निवेशक। ठीक वैसे ही जैसे कहां वॉलमार्ट की लॉबी के आगे टिक पाएंगे हमारे देसी किराना वाले।
 
लेकिन, इसे सरकार क्यों माने। क्यों समझे। बिना माने-समझे और विदेशियों, विदेशी पैसे की चिंता से ही तो, यूपीए 2 आया। यूपीए 3 का भी जुगाड़ लगा लिए हैं। कम लोगों को कम पैसे देने वाली डायरेक्ट कैश सब्सिडी ट्रांसफर योजना को सरकार के मंत्री मैच विनर कह रहे हैं। समझ रहे हैं न सेंसेक्स के 20000 वाले बाजार और सरकार के बनने में बड़ा तालमेल है।

Saturday, September 12, 2009

बंबई, ब्लॉगर, बाजार, भाषण

कई महीनों बाद मुंबई जाने का अवसर हाथ आया था तो, ऐसा हो ही नहीं सकता था कि मैं इसे छोड़ देता। दरअसल, अनीताजी के मन में सेमिनार कराने की इच्छा ने मुझे ये अवसर प्रदान किया था। अनीताजी के ब्लॉग पर सेमिनार की चर्चा है। इसी सेमिनार के लिए दिल्ली से मुंबई की रेलयात्रा का विवरण बतंगड़ पर है। मैंने सोचा कि सेमिनार में दिया गया मेरा भाषण भी अब पोस्ट किया जा सकता है।



The Role of MEDIA in Financial Market Awareness

Money … Market .. mudra ये कुछ ऐसे शब्द हैं जो, एक दूसरे के समानार्थी यानी synonymus हैं। और, इन सबको आम लोगों तक पहुंचाने में एक और M यानी Mumbai … का बड़ा रोल रहा है। दरअसल यहां विषय रखा गया है The Role of MEDIA in Financial Market Awareness। लेकिन, मुझे लगता है कि MEDIA से भी पहले अगर किसी ने फाइनेंशियल मार्केट के बारे में सबसे ज्यादा लोगों को Aware किया उन्हें जानकार बनाया तो, वो है ये शहर मुंबई।


मुंबई शहर की पहचान मायानगरी के तौर पर होती है और वैसे भले लोग इसे INDIA’S FINANCIAL CAPITAL बोलते हैं लेकिन, जब सपने पूरे करने की बात होती है तो, ज्यादातर माना यही जाता है कि यहां आने वालों के सपने सिर्फ रुपहले पर्दे के जरिए ही पूरे होते। लेकिन, सच्चाई ये है कि इस शहर के एक किनारे में दिखती गोल सी इमारत है जो, देश के बड़े हिस्से के सपने पूरे करने में मददगार बन रही है। बांबे स्टॉक एक्सचेंज- इस इमारत के बिना इस शहर की बात अधूरी रह जाएगी। बांबे स्टॉक एक्सचेंज की इमारत शेयर बाजार का प्रतीक बन गई है ये अलग बात है कि बांबे स्टॉक एक्सचेंज से ज्यादा शेयरों का खरीदना बेचने इसी शहर के ..... 

Tuesday, July 01, 2008

इसके बिना बात पूरी नहीं होगी

मेरे घर वाले कश्मीर से लौट आए हैं। मैंने पिछले लेख में बात यहां खत्म की थी कि अगर राजनीति इसी तरह से घाटी को दहशत के माहौल में धकेलती रहेगी। तो, कैसे कोई दुबारा किसी को कश्मीर घूमने जाने की सलाह दे पाएगा और बेरोजगार कश्मीरी महबूबा, उमर अब्दुल्ला और गुलाम नबी आजाद की बात समझेगा या फिर आतंकवादियों की।

लेकिन, आज जब मेरी घर वालों से बात हुई तो, उन्होंने जिस तरह से अपने कैब ड्राइवर की तारीफ की। उससे साफ है कि कश्मीरी बहुत सच्चे और साफ दिलवाले हैं। और, घाटी में एक दशक से जो कुछ शांति आई है। और, इससे वहां जिस तरह से मौके और रोजगार मिल रहा है वो, उसे आसानी से नहीं गंवाएंगे। गुलमर्ग से लौटते समय जब राजनीति दलों की क्षुद्र स्वार्थों को पूरा करने वाले मुट्ठी भर बहके लोग और जाने-अनजाने आतंकवादियों के हितों को पूरा कर रहे लोगों ने गाड़ी रोककर उसे तोड़ने-जला देने की धमकी दी तो, कश्मीरी टैक्सी ड्राइवर ने मेरे घरवालों को भरोसा दिलाया मेरी लाश से गुजरने के बाद ही ये लोग आपको छू सकेंगे। मुसलमान टैक्सी ड्राइवर पर मेरे घर वालों को भरोसा कुछ इतना हो गया था कि जिस दिन वो लोग कहीं घूमने नहीं जा पाए थे तो, भी वो बोट पर घरवालों के साथ था। इस जज्बे को सलाम औऱ उम्मीद यही कि घाटी में मुसलमान कैब ड्राइवर जैसे लोग ज्यादा मजबूत होंगे।

और, मेरा भरोसा फिर से मजबूत हो गया है कि कश्मीर को बंदूक और बारूद की आग से बाजार ही बचा पाएगा।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...