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Saturday, August 31, 2013

खुद पर भरोसा नहीं दूसरों से भरोसा करने को कहते हो !

रुपया कब मजबूत होगा। इस सवाल के जवाब में अब हम भारतीय रुपये की मजबूती की कल्पना करते हैं तो शायद दिमाग में 64-65 का भाव अच्छा दिखता होगा। वजह ये कि जिस तेजी से रुपया डॉलर, पाउंड और दूसरी मुद्राओं के मुकाबले सरक रहा है उसमें हमें ये लगता है कि जहां है वहीं रुक जाए तो बात बन जाए। और, शायद भारत की सरकार भी ऐसे ही सोच रही है। इसी वजह से फिलहाल रुपये की मजबूती के कोई संकेत नहीं मिल रहे हैं। क्योंकि, हमारी सरकार अभी भी रुपये की मजबूती की अपनी नीति पर खास काम करती नहीं दिख रही है। हम दुनिया के भरोसे हैं। लेकिन, भारत सरकार की मौजूदा अर्थनीति को देखकर एक लाइन जो मेरे दिमाग में सबसे पहले आती है वो ये कि हम अगर दुनिया के ही भरोसे हैं तो, दुनिया फिर हमारा भरोसा क्यों करे। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ये है कि अमेरिका, यूरोप में जब जबरदस्त मंदी आई तो हमारी सरकार ने कहाकि हम इसी वजह से कमजोर हो रहे हैं और अब जब खबरें आ रही हैं कि अमेरिका के बाजार सुधर रहे हैं तो हमारी अर्थव्वस्था में कमजोरी की वजह फिर से यही बन रही है। 

वैसे सच्चाई ये भी है कि 2008-09 में जब अमेरिका, यूरोप बर्बादी के कगार पर था तो चीन और भारत की ने ही अपनी 10 प्रतिशत के आसपास वाली तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था से दुनिया को बचाया था। तो अब मुश्किल कहां है। अमेरिका, यूरोप जब टूटे तो हमारी सरकार ने तेजी से नए बाजार खोजे जिससे एक्सपोर्ट बेहतर हो। लेकिन, ये समस्या का हल नहीं था। डॉलर ऐसे नहीं आएगा।  दरअसल जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था टूटी तो वहां के निवेशकों ने भारत और चीन जैसे बाजारों में डॉलर झोंक दिया। क्योंकि, दुनिया में सबसे बेहतर मुनाफा विदेशी निवेशकों को भारत, चीन जैसे देशों में ही मिल रहा था। लेकिन, इस मौके का इस्तेमाल भारत सरकार घरेलू अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने में नहीं कर पाई। और, डॉलर के आने को भारत की असल ताकत समझने लगी। जबकि, वो भारत की ताकत नहीं थी जैसे ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था सुधरनी शुरू हुई तो वहां के निवेशकों ने फिर से डॉलर निकालना शुरू कर दिया। उसका खामियाजा अब भुगतना पड़ रहा है। उसका असर ये है कि जनवरी 2008 में 21000 का जादुई आंकड़ा पार करने वाला सेंसेक्स 2010 की दीवाली वाली मुहूर्त ट्रेडिंग में ही उस आंकड़े को दोबारा छू पाया। और अब तो 18000 के आसपास लहराते सेंसेक्स के लिए 21000 का आंकड़ा दिवास्वप्न सा दिखने लगा है। वजह साफ है कि हमारी पूरी अर्थव्यवस्था, पूरा बाजार डॉलर डीलरों के इशारों पर नाचता है। दुनिया की अर्थव्यवस्था कमजोर होने पर वो हमारे यहां निवेश करके मुनाफा कमा जाते हैं और फिर हमारे बाजार अर्थव्यवस्था को कमजोर करके हमारे रुपये पर ऐसा दबाव बना देते हैं कि हमारी सरकार फिर डॉलर डीलरों के आगे भीख मांगने वाली मुद्रा में व्यवहार करने लगती है। जबकि, सरकार अगर दुनिया के इस सबसे बड़े बाजार को दुनिया के रहम के बजाय अपने नियमों के लिहाज से चलाने लगे तो बात बन जाए।

अभी जब रुपये की जोरदार गिरावट हुई उसके बाद वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने एलान किया कि निवेश पर बनी कैबिनेट समिति ने करीब दो लाख करोड़ के बुनियादी प्रोजेक्ट को मंजूरी दी। लंबे समय से रुके हुए 36 इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट सड़क, बिजली जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के हैं। ये एक अच्छा कदम है लेकिन, शायद इस अच्छे कदम को चलने में सरकार ने समय बहुत ज्यादा ले लिया है। इतना ज्यादा कि सरकार की लालफीताशाही (नियमकों की बाधाएं पढ़िए) की वजह से देश में करीब सात लाख करोड़ रुपए की योजनाएं अंटकी पड़ी हैं। इस वित्तीय वर्ष में सरकार ने जितनी रकम खर्च करने की योजना बनाई है ये उसकी लगभग आधी रकम है। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि सरकार देश की जो ताकत है उसको बढ़ाने के बजाय डॉलर डीलरों के भरोसे बैठी हुई है। सरकार देश की बुनियादी परियाजनाओं को लेकर कितनी गंभीर है इसका अंदाजा कुछ तथ्यों से लगाया जा सकता है। बीओटी यानी बनाइए चलाइए और सौंप दीजिए- इस आधार पर दिए जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग के सिर्फ 1933 किलोमीटर के प्रोजेक्ट सरकार दे पाई है। पिछले आठ सालों में ये राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए दिया जाने वाला सबसे कम ठेका है। और ये ऐसा नहीं है कि सिर्फ ठेके देने में ही सरकार पिछड़ रही है। योजनाओं में अमल में देरी की वजह से कम से कम 3300 किलोमीटर के 25 राष्ट्रीय राजमार्ग प्रोजेक्ट हैं जो रुके हुए हैं। और देरी की वजह है भूमि अधिग्रहण। हालांकि, सरकार खाद्य सुरक्षा बिल के बाद भूमि अधिग्रहण बिल को पास कराने में कोई कसर हीं छोड़ेगी लेकिन, फिर भी संदेह है कि इस वित्तीय वर्ष में 3500 किलोमीटर से ज्यादा के राष्ट्रीय राजमार्ग लोगों के सफर के लिए तैयार हो पाएंगे। 

बुनियादी क्षेत्र की सभी परियोजनाओं का हाल ऐसा ही है। देश के 80 प्रतिशत थर्मल पावर प्रोजेक्ट रेगुलेटरी क्लियरेंस के अभाव में रुके पड़े हैं या बहुत देरी से चल रहे हैं। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि 11वीं पंचवर्षीय योजना में सरकार ने निजी क्षेत्र के कोयला आधारित बिजलीघरों से 44000 मेगावॉट बिजली उत्पादन का अनुमान लगा रखा था वो अब सिर्फ 7000 मेगावॉट ही पूरा होता दिख रहा है। मुंबई देश का आर्थिक राजधानी है। लेकिन, इस आर्थिक राजधानी में बुनियादी परियोजनाओं के हाल से अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश के आर्थिक हालात क्यों गड़बड़ हैं। मुंबई मेट्रो रेल का दूसरा चरण हो, मुंबई की पहचान बन चुके बांद्रा-वर्ली सी लिंक का विस्तार हो, मोनोरेल के नए रूट की बात हो या फिर नवी मुंबई का प्रस्तावित अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा। सब के सब अभी कागजों में ही हैं। कई सालों के बाद भी अभी ये जमीन पर नहीं दिख रहे हैं। दुखद ये कि हाल ही में मुंबई के महत्वाकांक्षी मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक के लिए 5 चुने गए कंसोर्शियम में से किसी ने बोली नहीं लगाई। और इसके पीछे वजह ये कि वो लागत और उसके लिहाज से मुनाफे को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। साथ ही उन्हें राजनीतिक दखलंदाजी भी परेशानी में डालती है। 

दरअसल ये राजनीतिक दखलंदाजी ही है जो असल वजह है इस देश की अर्थव्यवस्था के बुरे हाल का। अर्थव्यवस्था के लिहाज से एक अच्छा कदम था धीरे-धीरे पेट्रोलियम उत्पादों से सब्सिडी हटाना। लेकिन, जरा देखिए- सरकार ने असल में क्या किया। सब्सिडी हटाई 25 जून 2010 को तेल कंपनियों को पेट्रोल की कीमत तय करने का पूरा अधिकार भी दे दिया। अभी धीरे-धीरे डीजल के दाम भी तय करने का अधिकार दे रहे हैं। लेकिन, 25 जून 2010 के बाद राज्यों के विधानसभा चुनाव जब-जब आए राजनीतिक नफे के लिए अपनी नीति को रोक दिया। अभी भी सरकार वही कर रही है पेट्रोल के दाम कुछ एक रुपये के आसपास 15 अगस्त की रात बढ़ जाने चाहिए थे लेकिन, संसद सत्र चल रहा है इसलिए पेट्रोल और डीजल की बढ़त पर रोक लगा दी गई। तेल कंपनियों का घाटा बढ़ रहा है और घाटे को ब्याज सहित तेल कंपनियां संसद सत्र खत्म होने के तुरंत बाद वसूल लेंगी। और, फिर डीजल के दामों की तेज बढ़त महंगाई को आसमान पर पहुंचा देगी। ब्याज दरें पहले ही ऊंचे स्तर पर हैं। यानी इस सरकार की नीति ही पक्की नहीं है। हर काम वोट के लिहाज से करती है। अब लोगों को लगता होगा कि सरकार देश की अर्थव्यवस्था सुधारने को लेकर चिंतित है लेकिन, सरकार को असल चिंता 2014 की है। इसलिए मनरेगा की कामयाबी का प्रयोग खाद्य सुरक्षा बिल के जरिए किया जा रहा है। भले इससे देश की आर्थिक सुरक्षा पर खतरा आ जाए। डॉलर डीलरों को ऐसे प्रयोग डराते हैं। वो सामाजिक सुरक्षा को प्राथमिकता बताने वाली सरकार के साथ कारोबार क्यों बढ़ाए। सरकार के ये प्रयोग ऐसे हैं कि लड़कर लागू कराया रिटेल में विदेशी निवेश का फैसला भी काम नहीं आ रहा। मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई लागू हो गया लेकिन, अब तक एक भी ऐसी दुकान देश में नहीं खुल सकी है जिसे दिखाकर सरकार विदेशी निवेशकों को भरोसा जीत सके। अब तक रिटेल में विदेशी निवेश की खुलकर वकालत करने वाले फ्यूचर ग्रुप के कर्ताधर्ता किशोर बियानी अब उस रास्ते को इतना कारगर नहीं मान रहे हैं। हालांकि, वो ये कह रहे हैं आर्थिक कमजोरी के हालात कम से कम उनके बिग बाजार को अब तक प्रभावित नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन, वो डर रहे हैं कि नौकरियां जाने लगेंगी, लोगों की जेब की रकम घटने लगेगी तो मुश्किल बढ़ेगी। उनका ये डर बेवजह नहीं है। जून में पिछले नौ महीने में सबसे कम कारें बिकी हैं। 

सरकार चुनावी चिंता में भारत निर्माण के विज्ञापन जमकर चला रही है। लेकिन, असल में भारत निर्माण की तरफ ध्यान नहीं दे रही है। वो इसके जरिए चुनाव जीतना चाहती है और डॉलर डीलरों को आकर्षित करना चाहती है। लेकिन, अगर अर्थव्यवस्था का यही हाल रहा तो चुनाव जीतना मुश्किल होगा साथ ही डॉलर डीलरों के लिए भी भारत आकर्षण की जगह नहीं रह जाएगा। समय अब बहुत कम बचा है लेकिन, फिर भी अगर सरकार तेजी से देश के घरेलू बाजार की ताकत को पहचानकर उसे मजबूत करे। बुनियादी परियाजनाओं को तेजी से चालूकर अगले 3-4 महीने में उसे अमल में लाकर दिखाए। उद्योगों के लिए और लोगों के लिए कर्ज सस्ता करे तो शायद कुछ बात बने। अच्छी बात ये है कि त्यौहारों के देश भारत में त्यौहारों का वक्त शुरू हो चुका है। लोग त्यौहारी रंग में डूबे हैं। बचत की रकम से कपड़ा खरीदेंगे ही, अच्छा खाएंगे ही, मौज मनाएंगे ही। सरकार हिंदुस्तानियों की मौज के इन तीन महीने का इस्तेमाल अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने में कर ले तो अर्थव्यवस्था की चिंता भी दूर होगी और चुनावी चिंता भी। वरना दोनों पर खतरा बढ़ रहा है।

Tuesday, August 27, 2013

खाना पक्का करना है तो रुपया मजबूत करो सरकार!



मेरे एक मित्र अभी हाल ही में बैंकॉक से लौटे। लौटने के बाद उनसे बात हुई तो बड़े ही निराश स्वर में वो बोले अरे यार अपनी असल औकात जाननी हो तो एक बार विदेश होकर आओ। बैंकॉक वैसे तो पर्यटन की वजह से भारतीयों और दुनिया के लोगों को पसंद आता है। लेकिन, एक दूसरी वजह ये भी कि इलेक्ट्रॉनिक सामानों का अच्छा बाजार भी यहां है। जहां भारतीय आधुनिक तकनीक वाले इलेक्ट्रॉनिक भारत से कम कीमतों पर खरीदकर वापस आते थे। लेकिन, अब हालात बदल चुके हैं। भारतीय रुपये की गिरती कीमत ने भारतीयों की औकात दुनिया के हर कोने में घटा दी है। फिर क्या लंदन, अमेरिका जैसे दुनिया के बड़े चमकते शहर और क्या पर्यटन के ही बूते दुनिया के नक्शे पर जाना जाने वाला बैंकॉक। रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले गिरी ये तो रोज रोज अखबार टीवी की सुर्खियां बनने से सब जान गए हैं लेकिन, थाईलैंड की करेंसी थाई बात के मुकाबले भी हमारा रुपया रोने लगा है ये शायद हममें से कम ही भारतीयों को पता होगा। एक अमेरिकी डॉलर देकर हमारा रुपया 65 से ज्यादा मिल रहा है लेकिन, अगर हम वही रुपया देकर थाईलैंड के बैंकॉक में कुछ खरीदना चाहें या अपनी छुट्टियों को और यादगार बनाने की कोशिश करें तो आधी से कुछ ज्यादा ही कीमत मिल पाएगी। एक रुपया थाई बात में 67 पैसे के बराबर ही होता है। जबकि, वहीं अगर कोई ऑस्ट्रेलियाई आया होगा तो एक ऑस्ट्रेलियाई डॉलर देकर उसे 28 से ज्यादा थाई बात मिल जाएंगे। जबकि, लंदन से एक पाउंड लेकर आए पर्यटक को करीब 49 थाई बात मिल जाएंगे। ये तो थी बैंकॉक में भारतीयों की छुट्टी चौपट होने की कहानी। जिसकी वजह बनी है रुपये की कमजोरी। अगर सिर्फ थाईलैंड में मौज मस्ती या दुनिया के आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की खरीदारी भर का मसला होता तो ये रुपया रोता रहे हमें क्या करना। लेकिन, इस रुपये की कमजोरी अब देश की कमजोरी बनती जा रही है।

रुपया रसातल में जा रहा है। रिजर्व बैंक और सरकार के ढेर सारे डॉलर को लाने-कमजोर करने और रुपये को मजबूत करने के उपाय के बावजूद रुपया रसातल में जा रहा है। मतलब सरकार के फैसले रुपये को मजबूत नहीं कर पा रहे हैं। मतलब 64 से नीचे गिरा रुपया और भी खतरनाक स्तर तक गिर सकता है। यही वजह है कि डॉएश बैंक की ताजा रिपोर्ट कह रही है कि रुपया डॉलर के मुकाबले 70 तक गिर सकता है। यानी उतना जितना न हमारे वित्त मंत्री की उम्र है और न हमारे लोकतंत्र की। हां, साल के अंत तक इसमें कुछ सुधार के संकेत हो सकते हैं। और, इसकी सबसे बड़ी वजह भयानक निराशा है। उस निराशा की कुछ सीधी वजहें जो मुझे दिखती हैं। सबसे पहली ये कि सरकार हो या फिर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया दोनों के फैसले एक समय के बाद खुद के ही मजबूत विरोध की वजह देते हैं। उदाहरण के लिए सरकार की बात करें तो 2 बजट पहले ही वित्त मंत्री के तौर पर प्रणब मुखर्जी ने इस बात के संकेत दिए थे कि अब धीरे-धीरे सरकार सब्सिडी खत्म करेगी और बाजार के हवाले पेट्रोलियम उत्पादों के दाम तय करने का अधिकार देगी। हालांकि, बाजार के हवाले दाम तय करने का जो अधिकार था वो मिलना था सरकारी तेल कंपनियों को ही और वो बड़ी तेजी से मिल भी रहा है। उसी के साथ ये संकेत आए कि 2009 में यूपीए दो बनवाने में अहम भूमिका निभाने वाली मनरेगा योजना पर भी खर्च घटाया जाएगा। लगा कि सरकार खजाने को दुरुस्त करके दुनिया की रेटिंग एजेंसियों को ये दिखाना चाहती है कि भारत सुधारों की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सुधारों का अपना चेहरा और चमकाने के लिए यूपीए 2 में दोबारा वित्त मंत्री बने पी चिदंबरम ने एक के बाद एक धड़ाधड़ ऐसे एलान किए कि बस अब देश में डॉलरों की बाढ़ सी आ जाएगी। फिर वो एफडीआई के जरिए रिटेल में हो, एविएशन और दूसरे क्षेत्रों में हो या फिर एफआईआई के जरिए भारत के शेयर बाजार में हो। लेकिन, हुआ इसका उल्टा। डॉलर को लपकने में लगी सरकार को विपक्ष ने ऐसी लंगड़ी मारी कि लगा पूरा देश ही रिटेल में एफडीआई का विरोधी हो गया। फैसला लिया गया, लौटाया गया, फिर और दम लगाकर लिया गया। पर नतीजा शून्य रहा। अब तक एक भी मल्टीब्रांड रिटेल स्टोर देश में खुल नहीं पाया है जिसे दिखाकर वो अपनी डॉलर के आने की बात मजबूती से समझा पाते।

दूसरे सुधार की बात कर लें। दूसरा सुधार ये कि सरकार का सब्सिडी का बोझ कम करना है। क्योंकि, सरकारी खजाने का घाटा बेहद खतरनाक स्तर तक पहुंच रहा था। फिर चाहे वो वित्तीय घाटा हो या चालू खाते का घाटा। वित्तीय घाटा यानी देश की कुल संपत्ति और कर्ज का संतुलन और चालू खाते का घाटा यानी हर रोज के खर्च के लिए मलतब इंपोर्ट-एक्सपोर्ट के लिए डॉलर रुपये का संतुल। दोनों संतुलन बिगड़ गए थे। 70 प्रतिशत से ज्यादा पेट्रोलियम प्रोडक्ट आयात करने वाली सरकार के लिए सबसे आसान था पेट्रोलियम प्रोडक्ट की सब्सिडी को खत्म करना। ये कहकर-समझकर कि पेट्रोल से कुल महंगाई पर कम असर पड़ता है सरकार ने 25 जून 2010 को पेट्रोल की कीमतों को बाजार के हवाले कर दिया। हालांकि, उसके बाद भी सरकार इस नीति को राजनीतिक लाभ हानि के लिए तोड़ती मरोड़ती रही। बिहार, बंगाल सहित 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव के समय तेल कंपनियों से बिना कहे पेट्रोल के दाम तय करने का अधिकार ले लिया गया। भले ही उस घाटे का असर तेल कंपनियों और उससे सरकार खजाने पर चाहे जैसे पड़ा हो। वही हाल अभी भी है। कच्चा तेल 108 डॉलर प्रति बैरल है। 64 रुपये से ज्यादा देने पर भी 1 डॉलर मिल रहा है। तेल कंपनियों का पेट्रोल पर घाटा बढ़ रहा है लेकिन, 15 अगस्त की समीक्षा बैठक में तेल के दाम तय करने का अधिकार पाई तेल कंपनियों को पेट्रोल का घाटा नहीं दिखा। वजह संसद का सत्र चल रहा है। अब इंतजार है संसद सत्र खत्म होने का। सत्र खत्म होते ही पेट्रोल 2 रुपये लीटर तक महंगा होना तय है। यानी सरकार को डर है भी थोड़ा बहुत तो संसद में हंगामे का। आम आदमी के हितों का दावा करने वाली सरकार को सड़क पर होने वाले हंगामे और आम आदमी की जिंदगी में मचे हंगामे की फिक्र कहां है।

अब तीसरे सुधार की बात कर लें। तीसरा सुधार यानी किसी भी तरह भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेश यानी एफआईआई डॉलर लगाएं। सेंसेक्स अभी 18000 के आसपास ही घूम रहा है। 2008 की मंदी में 21000 जाने के बाद सेंसेक्स लुढ़का तो नवंबर की दीवाली वाली मुहूर्त ट्रेडिंग को ही सेंसेक्स 21000 का आंकड़ा पार कर पाया था। उसके बाद से ये तीसरी दीवाली आने वाली है लेकिन, सेंसेक्स 18000 से ऊपर टिक नहीं पा रहा है। अब ऐसे बाजार में भला कौन सा विदेशी निवेशक डॉलर लगाएगा। हां, इतना जरूर है कि रुपये की गिरावट से वो अपना मुनाफा कमाकर उसे लेकर भागने में ही भलाई समझ रहे हैं।

अब बात रिजर्व बैंक के कदमों की। अब तक महंगाई से चिंतित रिजर्व बैंक ने बाजार में रकम की कमी करने की हरसंभव कोशिश की। उसकी वजह से बैंकों ने ब्याज दरें बढ़ाए रखीं। अब रुपये की गिरावट रोकने के लिए रिजर्व बैंक की नीति फिर से बदली और कुछ राहत बैंकों को दी गई। लेकिन, इससे ब्याज दरों में किसी तरह की कमी की उम्मीद करना ही व्यर्थ है। और, कैच 22 की स्थिति में फंसे रुपये की मजबूती भी नहीं हुई। रुपया जिस दिन 64 के नीचे पहली बार लुढ़का तो संसद सत्र था। लेकिन, सरकार को चिंता लुढ़कते रुपये, गिरती भारत की औकात और आम आदमी की जेब की घटती आमदनी की चिंता नहीं थी। उसे चिंता थी फूड सिक्योरिटी बिल की। फूड सिक्योरिटी बिल पास हो गया। दावा ये है कि इस कानून के बाद देश में कोई भूखा नहीं रहेगा। गरीबों को दो जून की रोटी मिल जाएगी। हो सकता है ये बात सच भी हो सवा लाख करोड़ की इस योजना से देश के गरीबों को 2 जून की पेट भरने लायक रोटी मिल जाए। लेकिन, अगर देश के हालात ऐसे ही बने रहे तो जो मनमोहन की उदारवादी नीति के चलते 1991 से 2010 तक चमकते चेहरे के साथ अच्छी गाड़ी में अच्छा कपड़ा पहनकर अच्छा खाना खा रहे थे वो सब भोजन गारंटी कानून के दायरे मे आते दिखेंगे। इसलिए सरकार खाना पक्का करना है तो रुपया मजबूत करो बाकी सब खुद हो जाएगा। और, रुपया मजबूत करने के लिए एफडीआई, एफआईआई से ज्यादा तुरंत सिर्फ चालू खाते के घाटे को घटाने की जरूरत है। क्योंकि, एक बार भारत की साख दुनिया के सामने सुधरी तो ये एफआईआई, एफडीआई के जरिए डॉलर तो खुद ब खुद आने लगेंगे और सारी समस्या खत्म हो जाएगी। 
(ये लेख मनी मंत्र पत्रिका में छपा है)

Friday, October 02, 2009

बस इत्ते के ही गांधी जी

कभी ओबामा गांधी को अपना हीरो बता देते हैं तो, हम खुश हो जाते हैं। कभी दुनिया के किसी कोने में गांधी का नाम कोई बड़ा आदमी ले लेता है तो, हम गांधी और आज की प्रासंगिकता खोजने लगते हैं। कभी 2 अक्टूबर आ जाता है तो, अखबारों के पन्ने रंग जाते हैं। तो, हम आलोचना पर उतर आते हैं।



कभी किसी नौजवान की टीशर्ट पर गांधी का टेढ़ा-मेढ़ा चश्मा दिखता है तो, गांधी को आज के नौजवानों से जोड़ देने की कोशिश शुरू हो जाती है। लेकिन, क्या गांधी सचमुच प्रासंगिक हैं। अभी सुबह एक मित्र का मोबाइल संदेश आया जो, नौजवानों की भाषा में light hearted कहा जा सकता है। लेकिन, लगता है कि सही में गांधी जी बस इत्ते के ही हैं- संदेश पढ़ लीजिए

Dear frnd! For 2nd oct. I m collecting Gandhiji’s Photos. I need ur Contributn 2my collectn. Bas Ghar men jitney bhi 10/50/100/500/1000 k note ho bhej dena



गांधी नोट पर हैं बिकाऊ हैं। गांधी पर वोटबैंक भी मिल जाता है इसीलिए, कांग्रेस उनको तो फिर भी याद कर लेती है। गांधी के ही दिन पैदा हुए और त्याग-नैतिकता के बड़े उदाहरण लालबहादुर शास्त्री जी को तो याद करना भी सब छोड़ देते हैं। अपने पिता का इस तरह से असम्मान देखने के बावजूद पता नहीं कैसे उनके बेटे कांग्रेस में पड़े रहते हैं।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...