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Thursday, April 30, 2020

ऐतिहासिक अवसर है, चूकिए मत मोदी जी !


चीन का डर, भारत का अवसर बनेगा ?

चाइनीज वायरस को पूरी तरह से खत्म होने में वक्त लगेगा, लेकिन इस वायरस का प्रकोप खत्म होते पूरी विश्व संरचना बदल जाएगी। इसमें भारत की भूमिका भी बदल सकती है, बेहतर हो सकती है, लेकिन प्रश्न है कि क्या हमारी नीतियां और उन्हें लागू करने में तेजी भारत को पुन: विश्व गुरु का दर्जा दिला पाएंगी। 3 मई को जब देशबंदी का दूसरा चरण समाप्त होगा, उसके बाद भारत सरकार और राज्य सरकारें विश्व निवेशकों को क्या सकेंते देंगे, उसी से तय होगा कि भारत इस ऐतिहासिक अवसर का कितना लाभ उठा पाएगा। हालांकि, इस बात का अन्दाजा भारत सरकार को भी बहुत अच्छे से है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग मंत्री नितिन गडकरी कह रहे हैं कि वायरस के बाद चीन के प्रति दुनिया भर के अविश्वास का लाभ भारत को उठाना चाहिए। उन्होंने यह भी भरोसा जताया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में भारत सरकार इस अवसर का लाभ उठाने में कामयाब होगी। भारत सरकार में मंत्री होने के नाते नितिन गडकरी की यह सदिच्छा स्वाभाविक दिखती है और देश भी इसी तरह से देख रहा है कि चीन से कंपनियां जब बाहर निकलेंगी तो उनका स्वाभाविक ठिकाना भारत होगा। ताजा यूबीएस मार्केट रिपोर्ट के मुताबिक चीन से बाहर जाने वाली कंपनियों के लिए भारत सर्वाधिक उपयुक्त स्थान हो सकता है। यूबीएस ने 500 बड़ी कंपनियों के बड़े अधिकारियों से बातचीत के आधार पर यह रिपोर्ट जारी की थी। इसका सीधा सा मतलब समझा जा सकती है कि सिर्फ भारत सरकार या उनके मंत्री ही नहीं, दुनिया भर की एजेंसियां यह मान रही हैं कि चीन से बाहर निकलने की इच्छा रखने वाली कंपनियों के लिए भारत सर्वोत्तम स्थान हो सकता है, लेकिन सिर्फ इस तरह की सद्भावना रिपोर्ट से निवेश नहीं आता है। चीन जैसे देश से कंपनियां अपनी मैन्युफैक्चरिंग इकाई भारत लेकर आएं, इसके लिए सबसे जरूरी है कि भारत की सरकार चीन में निर्माण इकाई लगाने वाली कंपनियों की एक रिपोर्ट तैयार करते कि आखिर किन वजहों से यह कंपनियां चीन में जमी हुई हैं। सस्ता श्रम और नीतियों में एकरूपता के मुकाबले में भारत चीन से प्रतिस्पर्धी हो चुका है, लेकिन क्या दूसरे मानकों पर भारत सरकार के विदेश और वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने ऐसी कोई रिपोर्ट तैयार की है, इसका जवाब फिलहाल नहीं में ही दिख रहा है और यहीं पर आकर यह समस्या बड़ी होती दिखती है कि भावनात्मक सद्भावना रिपोर्ट से चीन से बाहर निकलने वाली कंपनियां भारत में कैसे आएंगी।
अमेरिका और चीन के बीच कारोबारी युद्ध के दौरान ही अमेरिकी, जापानी और दक्षिण कोरियाई कंपनियां चीन से बाहर निकलने की तैयारी करने लगीं थीं। उसी समय भारत सरकार को यह तैयारी युद्धस्तर पर करना चाहिए था, लेकिन भारत सरकार इस काम में फिलहाल सफल नहीं हो सकी है। निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर ने राजनयिक स्तर पर अमेरिकी, जापान, दक्षिण कोरिया और दूसरे देशों के साथ संबंध इतने बेहतर किए हैं कि सद्भावना के तहत इन देशों की कंपनियों की पहली प्राथमिकता भारत हो सकता है, लेकिन जैसा मैंने पहले कहाकि बड़ी कंपनियां सद्भावना रिपोर्ट के आधार पर अपना निवेश एक देश से दूसरे देश में नहीं ले जाती हैं। खासकर, चीन से कंपनियों को अपनी निर्माण इकाई दूसरे देश में ले जाना ज्यादा मुश्किल इसलिए भी है क्योंकि चीन में कंपनियों ने भारी निवेश कर रखा है। इस उहापोह के बीच ज्यादातर कंपनियां अमेरिका और चीन के कारोबारी युद्ध के दौरान योजना ही बनाती रहीं, लेकिन विश्वव्यापी चाइनीज वायरस के फैलाव के बाद सभी बड़ी कंपनियों ने अपनी निर्माण इकाइयां चीन से बाहर ले जाने के बारे में सोच रही हैं। सच्चाई यह भी है कि चीन में स्थापित कई विदेशी कंपनियां भारतीय कंपनियों से बात कर रही हैं। दक्षिण कोरिया, जापान और अमेरिका की कंपनियां दूसरे देशों पर भारत को प्राथमिकता दे रही हैं, लेकिन भारत सरकार को इसके लिए आक्रामक नीति तुरन्त लागू करने की जरूरत है। टेलीडाइन, एम्फीनॉल और जॉनसन एंड जॉनसन जैसी कंपनियां अपना कारोबार चीन से समेटना चाह रही हैं। अमेरिका और चीन के बीच कारोबारी युद्ध की चपेट में आने से बचने के लिए जापानी कंपनियां रीको, सोनी और एसिक्स पहले ही चीन से बाहर अपनी उत्पादन इकाई ले जाने की योजना बना रही थीं और चाइनीज वायरस के संक्रमण के बाद जापान सरकार की 2.2 बिलियन डॉलर के प्रस्ताव ने दूसरी जापानी कंपनियों को भी चीन से बाहर निकलने के लिए तैयार कर लिया है, लेकिन मुश्किल वही है कि क्या इस अवसर का लाभ भारत पूरी तरह से उठा पाएगा या फिर नोमुरा की रिपोर्ट में दिख रहा संकट भारत की हानि बढ़ने वाला है। अब जरा कुछ तथ्य देखिए, चाइनीज वायरस के प्रकोप से पहले ही बीते जुलाई रीको ने प्रिंटर उत्पादन इकाई को चीन शेनझेन से थाईलैंड में ही शिफ्ट कर दिया था। नाइके वियतनाम और थाईलैंड के साथ भारत भी आने की संभावना तलाश रही है। तिमाही नतीजों का एलान करते पैनासोनिक के CFO हीरकाजू उमेडा ने स्पष्ट किया था कि उनकी कंपनी चीन से बाहर जाने की संभावना तलाश रही है। भारी खर्च के बावजूद जापानी कार कंपनी माजदा ने चीन के जियांगसू से अपना उत्पादन मेक्सिको के गुआनजुआटो इसी महामारी के बीच ही शिफ्ट कर लिया है। और, यह सब इसके बावजूद हो रहा है कि भारत सरकार ने मेक इन इंडिया के तहत विदेशी कंपनियों को भारत में लाने के लिए कॉर्पोरेट टैक्स 35 प्रतिशत से घटाकर 25.17 प्रतिशत कर दिया है। कई मामलों में तो यह 22 प्रतिशत तक और नई कंपनियों के मामले में 15 प्रतिशत से कुछ ही ज्यादा है।
भारत को एक और बड़ा लाभ सभी देशों के मुकाबले यह भी है कि भारत ऐसा मैन्युफैक्चरिंग हब बन सकता है, जहां उत्पादन की खपत भी पूरी हो सकती है, दुनिया का सबसे बड़ा बाजार भी यहीं मौजूद है। चीन के बाद भारत के पास ही इस तरह का बाजार है, लेकिन इस सबके बावजूद वियतनाम, मलेशिया, ताइवान और थाईलैंड भारत से बाजी मार ले जा रहे हैं तो इसका सीधा दोष सरकारी नीतियों को लागू करने में शिथिलता पर ही जाएगा। चीन से ढेर सारी कपनियां बाहर निकलने की कोशिश कर रही हैं। कंपनियों ने चीन में इतना भारी निवेश कर रखा है कि एक साथ वहां से निकलना संभव नहीं, इसलिए कंपनियां दूसरे देशों में अपना छोटी-बड़ी आधार इकाई लगा रही हैंस जिससे उन्हें चीन से अपना कारोबार पूरी तरह समेटने में आसानी हो। फिलहाल शुरुआती इकाई लगाने के लए चीन से निकलने वाली कंपनियां भारत पर वियतनाम, मलेशिया, सिंगापुर को चुन रही हैं। भारत की प्राथमिकता थाईलैंड और फिलीपींस जैसे देशों से बस थोड़ा ही ऊपर है। नोमुरा ने चीन से बाहर जाने वाली कंपनियों पर एक अनुमान लगाया है। नोमुरा प्रोडक्शन रीलोकेशन इंडेक्स 3 पैमाने पर बना है। पहला- चीन की ही तरह जिस देश से दुनिया भर में निर्यात किया जा सके, दूसरा- बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गुणवत्ता सर्वेक्षण और तीसरा विदेशी निवेश FDI आकर्षित करने में नोमुरा के सूचकांक में स्थिति। इन तीनों पैमानों पर अगर कंपनियों को चीन से निकलना पड़ा तो उनकी पहली पसंद वियतनाम है, उसके बाद मलेशिया, सिंगापुर और भारत का स्थान आता है।
भारत सरकार उम्मीद कर रही थी कि चीन से आने वाली ज्यादातर कंपनियों के लिए पहली पसंद भारत बनेगा, लेकिन नोमुरा की रिपोर्ट इसके ठीक उलट बता रही है। नोमुरा ने चीन से बाहर जा रही 56 कंपनियों पर रिपोर्ट बनाई है और इसके मुताबिक 26 कंपनियां वियतनाम जा रही हैं, इसके बाद 11 कंपनियां ताईवान और 8 कंपनियां थाईलैंड संभावनाएं तलाश रही हैं, 56 में से सिर्फ 3 कंपनियां भारत आ रही हैं। वियतनाम को चीन के जैसे वातावरण का भी लाभ मिल रहा है। लेकिन यह प्रश्न बड़ा हो रहा है कि क्या कम्युनिस्ट शासन वाले चीन से कंपनियां कम्युनिस्ट शासन वाले वियतनाम, इस्लामिक देश या फिर राजशाही वाले थाईलैंड में जाना पसंद कर रही हैं जबकि भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था में ढेर सारे आर्थिक सुधार हुए हैं। वियतनाम भी कम्युनिस्ट देश है और घोषित तौर पर समाजवादी नीतियों वाला देश होने के बावजूद तेजी से पूंजीवादी नीतियों को आगे बढ़ा रहा है। CCP यानि चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी की तरह वियतनाम में CPV कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ वियतनाम का शासन है। ताइवान को वन चाइना पॉलिसी के तहत अपना हिस्सा मानता है हालांकि ताइवान चीन से संघर्ष कर रहा है और अमेरिका के साथ है। मलेशिया इस्लामिक देश है। इतनी विसंगतियों वाले देश अगर पूर्ण बहुमत की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार के शासन वाले भारत पर भारी पड़ रहे हैं तो यह चाइनीज वायरस के खात्मे के बाद बदली विश्व परिस्थितियों में अच्छा संकेत नहीं होगा। आरसीईपी से भारत के बाहर निकलने की घरेलू उद्योगों की चिंता के अलावा एक बड़ी वजह यह भी थी कि चीन, वियतनाम और दूसरे देशों के जरिये अपना औद्योगिक उपनिवेश स्थापित कर सकता है। चीन से बाहर निकलने वाली करीब आधी कंपनियां अगर वियतनाम के रास्ते जा रही हैं तो यह लगभग वही स्थिति हो जाएगी।  नोमुरा की रिपोर्ट स्पष्ट बता रही है कि भारत सरकार को अपनी नीति बनाने और उसे लागू करने में देर नहीं करनी चाहिए वरना उसे बड़ी हानि हो सकती है।
अभी चीन से बाहर निकलने वाली कंपनियां अगर भारत नहीं आ रही हैं तो उसकी एक बहुत बड़ी वजह यह भी है कि चीन से निकलने वाली कंपनियां भारतीय कंपनियों से बात करती हैं तो पता चल रहा है कि फिलहाल यहां कारोबार कब शुरू होगा, इसके बारे में कोई स्पष्टता ही नहीं है। इसलिए जरूरी है कि सरकार, चीन से बाहर निकल रही कंपनियों को भारत लाने के लिए बात करते हुए, देश में कारोबार को चरणबद्ध तरीके से शुरू करे। चाइनीज वायरस के बाद बदलते विश्व में भारत को ऐतिहासिक अवसर मिल रहा है, यह अवसर चूके तो हम कभी विश्व गुरू थे, यह बताएंगे और यह अवसर चुनौती की तरह लेकर अपने पक्ष में कर लिया तो विश्व गुरू भारत को दुनिया मान लेगी। इस ऐतिहासिक अवसर को भारत के पक्ष में कैसे बदलना है, इसकी योजना बनाकर लागू करने के लिए ही जनता ने प्रचण्ड बहुमत से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर चुना है। 

Friday, November 06, 2015

चुनाव के शोर में दब गई अर्थव्यवस्था की अच्छी खबरें

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 6 नवंबर 2015 को छपा लेख
भारत में कोई भी चुनाव हों, उत्सव की तरह होते हैं। ऐसा उत्सव जिसके उत्साह और शोर में सबकुछ दब जाता है। उस पर अगर बिहार जैसे राज्य का चुनाव हों, तो जाहिर है कि ये शोर और उत्साह ज्यादा तेज हो जाता है। यही वजह रही कि पांच चरणों में हुए इस चुनाव के दौरान देश के लोगों को दूसरी कोई बात ज्यादा अहम नहीं दिखी। खासकर तरक्की और इससे जुड़े आंकड़े तो चुनावी माहौल में पूरी तरह से नीरस ही होते हैं। दाल की महंगाई के आंकड़े भी सीधे चुनावी भाषण में तड़का दे सकते थे। इसीलिए दाल की महंगाई की चर्चा तो मीडिया से लेकर चुनावी रैलियों तक खूब रही। लेकिन, इसके अलावा पूरे अक्टूबर महीने और कोई भी खबर सुर्खियां नहीं बन सकीं। लेकिन, यही अक्टूबर महीना रहा जिसमें तेजी से भारत की अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ती दिखने लगी है। और सबसे अच्छी बात ये है कि इन तेजी के संकेतों में संतुलन भी है। यानी लोगों की जेब में पैसे आते दिख रहे हैं। साथ ही कल कारखाने फिर से रफ्तार में आ रहे हैं। उद्योगों के कुछ ऐसे आंकड़ें जिन पर ध्यान कम ही जाता है। लेकिन, उन आंकड़ों में ही दरअसल अर्थव्यवस्था की कमजोरी या मजबूती के लक्षण छिपे होते हैं। उन आंकड़ों से समझने की कोशिश करते हैं।

भारत में सर्विस इंडस्ट्री अक्टूबर महीने में आठ महीने की सबसे तेज रफ्तार में रही है। ताजा सर्वे में ये बात सामने आई है। इसकी सबसे बड़ी वजह नए कारोबार का उभरना है। निक्केई इंडिया कंपोजिट इंडेक्स से ये बात साफ हो रही है। इसके मुताबिक, अक्टूबर महीने में भारत में ज्यादातर आर्थिक गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। साथ ही देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के एसबीआई इंडेक्स के मुताबिक, देश में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ भी अक्टूबर महीने में बेहतर हुई है। एसबीआई कंपोजिट इंडेक्स में मैन्युफैक्चरिंग डेढ़ प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा है। ये लगातार तीसरा महीना है जब मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में तेजी देखने को मिल रही है। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की इस तेजी को एक और आंकड़ा बल देता है। इकतीस अक्टूबर तक के आंकड़ों के मुताबिक, सरकारी खजाने में साढ़े छत्तीस प्रतिशत ज्यादा अप्रत्यक्ष कर आया है। इसका सीधा सा मतलब है कि कंपनियों की बैलेंसशीट बेहतर हुई है। वित्त मंत्री अरूण जेटली ने इसे मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में तेजी का बड़ा आधार बताया है। स्टेट बैंक की रिपोर्ट ये भी बता रही है कि आने वाली तिमाही में पावर, स्टील, ग्रीन एनर्जी, हाइड्रोकार्बन और टेलीकॉम सेक्टर में तेज क्रेडिट ग्रोथ देखने को मिलेगी। इसका सीधा सा मतलब हुआ कि इन क्षेत्रों में तेज हलचल होगी। बैंक घर और कार कर्ज में भी तेज मांग देख रहा है। इन छोटी-छोटी खबरों को जोड़कर आसान भाषा में समझें, तो इसका मतलब ये हुआ कि लंबे समय से मंदी की ओर बढ़ता दिख रहा भारतीय कारोबारी जगत बेहतरी की ओर बढ़ रहा है। पावर, स्टील, ग्रीन एनर्जी, हाइड्रोकार्बन और टेलीकॉम सेक्टर में तेज क्रेडिट ग्रोथ का सीधा सा मतलब हुआ कि कोल ब्लॉक और स्पेक्ट्रम घोटाले के बाद से ठप पड़ गए क्षेत्रों में फिर से नई संभावनाएं बन रही हैं। यानी इंडिया इंक हरकत में है। इसी तरह घर और कार कर्ज की मांग बढ़ने का मतलब ये हुआ कि इंडियन मिडिल क्लास फिर से अपनी जेब से पैसे निकालने लगा है। जो, वो पूरी तरह से बचाकर रखने लगा था। क्योंकि, यूपीए शासन में साढ़े पांच प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार ने इंडियन मिडिल को डरा दिया था। नरेंद्र मोदी की सरकार के लालफीताशाही को खत्म करने की कोशिशों के बाद फिर से भारतीय उद्योग बेहतरी करते दिखने लगे हैं। और इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ऑटोमोबाइल उद्योग का। सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स के ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि सितंबर महीने में देश में कार की बिक्री करीब दस प्रतिशत ज्यादा रही है। ये पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले है। सितंबर महीने में कार कंपनियों ने करीब एक लाख सत्तर हजार कारें बेच ली हैं। देश की अर्थव्यवस्था का असल हाल समझने में यात्री कारों से ज्यादा वाणिज्यिक वाहनों यानी ट्रकों की बिक्री मददगार होती है। सितंबर महीने में वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री में बारह प्रतिशत से ज्यादा की तेजी देखने को मिली है। इसका सीधा सा मतलब हुआ कि उद्योगों को अपने सामान लाने ले जाने के लिए ज्यादा ट्रकों की जरूरत पड़ रही है। लोगों का जीवन किस तरह चल रहा है। इसका अंदाजा भारत में त्योहारों के दौरान लगाना बेहद आसान होता है। अगर बाजार लोगों से भरे हुए हैं और बाजार से लौटते हुए लोग खरीदारी करके लौट रहे हैं, तो इसका सीधा सा मतलब हुआ कि लोगों का जीवन स्तर बेहतर हुआ है। शहरी लोगों की खरीदारी का तरीका ई कॉमर्स के आने से बदला है। भारत सात बिलियन डॉलर का डिजिटल बाजार बन चुका है। इसीलिए अक्टूबर महीने में फ्लिपकार्ट, स्नैपडील और अमेजॉन के बीच शहरी ग्राहक को पकड़ने की होड़ लगी थी। अक्टूबर महीने में फ्लिपकार्ट ने बिग बिलियन सेल में 30 करोड़ डॉलर यानी करीब दो हजार करोड़ रुपये के सामान बेच लिए। इन वेबसाइट पर आने वाले हर ग्राहक ने एक हजार से लेकर पांच हजार रुपये तक की खरीदारी की है। और भारत में वेबसाइट के जरिये सामान खरीदने वाले सिर्फ एक प्रतिशत लोग ही हैं। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस त्योहारी मौसम में भारतीय कितनी खरीदारी कर रहा है।


कारोबारी गतिविधियों के बेहतर होने का साफ असर महत्वपूर्ण आंकड़ों में दिख रहा है। तेरह अक्टूबर को आए आईआईपी यानी औद्योगिक उत्पादन आंकड़े साफ करते हैं कि अर्थव्यवस्था पर छाई धुंध काफी हद तक साफ हो चुकी है। तेरह अक्टूबर को आए औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े के मुताबिक, अगस्त महीने में उत्पादन करीब साढ़े छे प्रतिशत से ज्यादा की रफ्तार से बढ़ा है। ये इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि, औद्योगिक उत्पादन में ये तेजी करीब चौंतीस महीने के बाद देखने को मिल रही है। औद्योगिक उत्पादन के आंकड़ों में सबसे अच्छी बात ये है कि कैपिटल गुड्स यानी उद्योगों के काम में आने वाली मशीनरी का उत्पादन करीब बाइस प्रतिशत बढ़ा है। इस वित्तीय वर्ष के पहले पांच महीने के औद्योगिक उत्पादन के बढ़ने की कुल रफ्तार भी अर्थव्यवस्था की मजबूती का भरोसा दिलाती है। 2015-16 के पहले पांच महीने यानी अप्रैल से अगस्त के दौरान औद्योगिक उत्पादन के बढ़ने की रफ्तार चार प्रतिशत से ज्यादा रही है। 2014-15 के पहले पांच महीने में औद्योगिक उत्पादन के बढ़ने की रफ्तार तीन प्रतिशत ही रही थी। अच्छी बात ये भी है कि महंगाई में कमी की वजह से रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में कमी की है। और आगे भी ब्याज दरें घटने के संकेत हैं। इससे कारोबारी गतिविधि की बेहतरी में मदद मिलेगी। बिहार के चुनाव के शोर में देश में बेहतर हुए कारोबारी माहौल की बात बिल्कुल ही नहीं हुई। लेकिन, अक्टूबर महीने में आए आंकड़े साफ कर रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की कहानी दमदार हो रही है। 

Wednesday, January 28, 2015

तरक्की के मोर्चे पर चीन का मुकाबला

भारतीय शेयर बाजार इन दिनों उसैन बोल्ट से भी तेज रफ्तार से दौड़ रहा है। इस तेजी के पीछे अगर कोई एक वजह सबसे बड़ी है तो वो ये है कि भारत चीन की पीछे छोड़ने वाले है। चीन को लेकर सिर्फ भारत के ही लोगों का नहींदुनिया का कुछ ऐसे ही आकर्षण भाव है। इसीलिए जब आईएमएफ की ये रिपोर्ट आई कि चीन की तरक्की की रफ्तार को भारत पीछे छोड़ने वाला है तो फिर दुनिया भर में भारत में निवेश के लिए होड़ लग गई है। छिपाकर रखी रकम भी लोग भारतीय शेयर बाजार में लगाने दौड़ पड़े हैं। लेकिन, आईएमएफ के इस ताजा अनुमान को जरा सलीके से समझा जाए। आईएमएफ कह रहा है कि 2016 तक भारत की तरक्की की रफ्तार चीन से ज्यादा हो जाएगी। इसे दूसरी तरह से समझें तो वो ऐसे है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से तरक्की करने वाले देश अगले दो सालों में बन जाएगा। 2016 में आईएमएफ भारत की तरक्की की रफ्तार6.5% देख रहा है। और साथ ही अनुमान लगा रहा है कि चीन की तरक्की की रफ्तार घटकर 2016 तक 6.3 प्रतिशत ही रह जाएगी। ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि अभी चीन 7.4 प्रतिशत की रफ्तार से तरक्की कर रहा है। और ये सरकार के साढ़े सात प्रतिशत के अपने अनुमान से कम रह गया है। अब आईएमएफ के अनुमान को मानें तो इसी साल चीन की तरक्की की रफ्तार तेजी से घटकर 6.8 प्रतिशत रह जाएगी। और अगले साल 6.3 प्रतिशत ही रह जाएगी। और बस इसी आधार पर भारतीय शेयर बाजार झूमने लगा है। शेयर बाजार के दोनों सूचकांक रिकॉर्ड तेजी पर हैं।
  
शेयर बाजार की इस तेजी के पीछे दुनिया खासकर पश्चिम की ये नजर महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है कि भारत, चीन को पीछे छोड़ देगा। लेकिन, 2016 में साढ़े छे प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार के साथ भारत को चीन से आगे देखने वाले हमारी नजर ये भी जा रही है कि चीन की हाल की 7.4 प्रतिशत की तरक्की की जो रफ्तार दिख रही है। वो पिछले दो दशकों से सबसे कम है। मतलब पिछले दो दशकों से चीन साढ़े सात प्रतिशत से ज्यादा की रफ्तार से तरक्की करने वाला देश रहा है। और लंबे समय तक वो डबल डिजिट ग्रोथ यानी दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार पर टिका रहा है। अब इस तथ्य को थोड़ा और विस्तार दें तो ये आसानी से समझ में आ जाएगा कि भारत के लिए अभी लंबी यात्रा बची हुई है। भारत अगर लगातार औसत 8 प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार बनाए रखने में कामयाब हो सके और चीन की तरक्की की रफ्तार घटकर औसत पांच प्रतिशत रह जाए तो भी भारत को चीन की बराबरी करने में बत्तीस साल लग जाएंगे। कम से कम दोनों देशों के बीच का जीडीपी का फासला तो यही बताता है। जीडीपी के लिहाज से देखें तो चीन की अर्थव्यवस्था भारत से दस गुना ज्यादा है। चीन की अर्थव्यवस्था साढ़े दस ट्रिलियन डॉलर की है तो भारतीय अर्थव्यवस्था 2013 के अंत तक दो ट्रिलियन डॉलर से भी कम की थी। ठीक है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीस ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का सपना देख रहे हैं। लेकिन, सिर्फ तरक्की की रफ्तार के आधार पर चीन की बराबरी और इस आधार पर होने वाला निवेश पता नहीं कितना कारगर होगा।

भारत आठ प्रतिशत के ऊपर की तरक्की की रफ्तार को साल भर भी संभालकर नहीं रख पाया था। हालांकि, उसके पीछे सबसे बड़ी वजह डॉक्टर मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली सरकार का नीतियों के स्तर पर बेहद लचर रवैया रहा। हाल ये था कि सुधारों को सबसे बड़े पैरोकार और लागू करने वाले वित्तमंत्री के प्रधानमंत्री रहते मनमोहन सिंह के सामने ही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बचकाने तरीके से तीन सब्सिडी वाले सिलिंडर देकर मनमोहनॉमिक्स को शीर्षासन करा दिया। परिणाम ये कि भारत दुनिया की नजर में तो छोड़िए खुद भारत के उद्योगपतियों, निवेशकों की नजर में सबसे जोखिम भरा लगने लगा। भारत के बड़े कारोबारी प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर चेता रहे थे कि यही हाल रहा तो हम अपना कारोबार देश से समेटकर विदेश चले जाएंगे। ऐसे में नरेंद्र मोदी जैसा एक नेता आया जो दुनिया को भारत में आकर कारोबार करने को कह रहा है। मेक इन इंडिया कैंपेन की खिलाफत करने वाले ये कह सकते हैं कि जब दुनिया के बाजार मेड इन चाइना के ठप्पे से दबे, भरे पड़े हैं। तो फिर मेक इन इंडिया कहां ठहरेगा। लेकिन, नरेंद्र मोदी के किसी भी अभियान की खिल्ली उड़ाने वालों को एक छोटा सा उदाहरण ध्यान में रखना चाहिए। वो ताजा उदाहरण है प्रधानमंत्री जनधन योजना। जनधन योजना को नीचे तक कैसे इस्तेमाल किया जा रहा है, जाएगा। इस पर चर्चा आगे होगी। और सफलता, असफलता की कहानी भी उसी समय लिखी जाएगी। लेकिन, एक सरकार के कार्यक्रम को इस तरह से जनता में हाथोंहाथ लिया जाए और वो अभियान गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शामिल हो जाए तो अभियान के महत्व को समझना होगा। एक और उदाहरण है। वो उदाहरण है वाइब्रेंट गुजरात समिट का। किसी राज्य का अपने राज्य की नीतियों को बताकर दुनिया से निवेश जुटाने का, यहां तक कि देश की ही दूसरे राज्यों से निवेश जुटाने का ये अनूठा अभियान है। और कितना निवेश आया, कम आया या ज्यादा आया। इसपर तो बहस होती है, होती रहनी चाहिए।  लेकिन, इसका राज्य की तरक्की में कितना महत्व है और आज इसे किस तरह से हर राज्य अपने राज्य की खूब के तौर पर दिखा रहा है। इससे तो इनकार नहीं किया जा सकता। इसीलिए शायद आईएमएफ का तरक्की का अनुमान और नरेंद्र मोदी का ऐसे समय में प्रधानमंत्री होना, दोनों ऐसी बातें हैं जिन्होंने शेयर बाजार को पंख लगा दिए हैं। मेक इन इंडिया को जिस पैमाने पर प्रधानमंत्री बेच रहे हैं और अमेरिका और जापान के कारोबारी जिस तरह से भारतीय बाजार को अपना मुख्य कारोबारी केंद्र बनाने की तैयारियां कर रहे हैं। वो सचमुच दुनिया का कारोबारी नक्शा बदलने वाला है। इसमें संदेह नहीं है। डॉक्टर मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्री सिद्धांतों की जिस तरह से मिट्टी पलीद करके कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने सामाजिक सुरक्षा का लबादा ओढ़ा था। वो इतना खोखला और भविष्य को मुंह चिढ़ाने वाला था कि न सामाजिक सुरक्षा गरीबों को मिल सकी और न ही देश में गरीबों को रोजगार देने वाले उद्योगों की रफ्तार पटरी पर आ सकी। इसीलिए जब नरेंद्र मोदी की सरकार आई तो कई बातें बिना वजह अच्छे नतीजे देने लगीं। सच्चाई यही है कि इन अच्छे नतीजों में से बहुत की बुनियाद डॉक्टर मनमोहन सिंह के समय में ही रखी गईं थीं। हालांकि, ये लोकतंत्र में होता रहता है कि एक सरकार के अच्छे फैसले या बुरे फैसले का असर उसके बाद आने वाली सरकार के हिस्से में जाए। लेकिन, अच्छे फैसलों पर अपनी छाप छोड़ने का काम जिस तेजी से नरेंद्र मोदी की सरकार कर रही है। उसमें लोग भूल ही जाएंगे कि सब्सिडी बिल धीरे-धीरे घटाने का काम डॉक्टर मनमोहन सिंह की ही सरकार ने किया था। और अब उसी के आधार पर सरकार खजाने की सेहत दुरुस्त हो रही है। इसपर किस्मत के धनी नरेंद्र मोदी को तेजी से गिरती कच्चे तेल की कीमतों वाले समय में प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला है। जाहिर है आंकड़े दिखाकर भले ये साबित करने की कोशिश कोई भी करे लेकिन, जनता बार-बार तर्क नहीं देखती, सुनती।

व्यवहार में अगर महंगाई घट रही है। पेट्रोल, डीजल, सब्जी, फल सस्ते मिल रहे हैं तो वो सरकार की तारीफ करने ही लगती है। और कमाल की बात ये है कि आईएमएफ की तारीफ के पीछे बड़ी वजह सरकार का पेट्रोलियम सब्सिडी को घटाना मुख्य वजह है। आईएमएफ की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टीना लगार्डे का मानना है कि भारत सरकार बेहतर काम कर रही है। इस बेहतरी की बुनियाद में वो संभावना है जो साल 2014-15 में भारत सरकार का एनर्जी बिल 60 प्रतिशत घटता दिखा रहा है। नरेंद्र मोदी की सरकार उन मोर्चों पर खास तेजी से काम कर रही है जिसकी वजह से दुनिया ने भारत को देखने की नजर बदल ली थी। फिर वो पेट्रोलियम सब्सिडी हो, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को मंजूरी की बात हो या तेजी से फैसले लेने की। इसीलिए जब आईएमएफ ये कहता है कि 2016 तक भारत, चीन को तरक्की की रफ्तार में पीछे छोड़ देगा। तो दुनिया की नजर बदल जाना स्वाभाविक है। स्वाभाविक है कि भारतीय शेयर बाजार तेज रफ्तार से भागने लगें। और स्वाभाविक ये भी है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका चीन चिंतित हो जाए। और वहां के अखबारों में भारतीयों के चीन से मुकाबले की इच्छा पर चुटकियां ली जाने लगें। लेकिन, सच्चाई यही है कि भले चीन हमसे दस गुनी ज्यादा बड़ी अर्थव्यवस्था हो जाए। लेकिन, सच्चाई यही है कि दुनिया को भारत का ताकतवर होना डराता नहीं है। चीन का ताकतवर रहना डराता है। इसीलिए दुनिया भारत के साथ खड़ी होना चाहती है। दिख भी रही है। बस एक बात नरेंद्र मोदी की सरकार को ध्यान में रखना होगा कि चीन की वामपंथी सरकार ने कारोबार के लिए हर समझौता कर लिया। चीन दस ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की अर्थव्यवस्था बना दिया। लेकिन, चीन के साथ दुनिया का रिश्ता संदेह का ही है। जबकि, भारत का दुनिया से रिश्ता भरोसे का है। हमें चीन का मुकाबला नहीं करना है, बराबरी भी नहीं करनी है। क्योंकि, चीन की कारोबारी बराबरी करने के लिए उसकी बुराइयों की भी बराबरी जाने-अनजाने हो जाएगी। भारत को नरेंद्र मोदी बीस ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाएं। बस एक बुनियादी बात तय होनी चाहिए कि महात्मा गांधी की ही बात ध्यान में रहे कि कतार में खड़े आखिरी आदमी का हक मारा नहीं जाएगा। वरना शेयर बाजार की ये तेजीआईएमएफ का ये भरोसा ध्वस्त होने में समय नहीं लगेगा।

Monday, May 12, 2014

इतनी आसानी से अच्छे दिन तो नहीं आने वाले



12 मई को 2014 की संसद के लिए चुनाव का आखिरी दिन और शेयर बाजार का तीसरे हफ्ते का पहला कारोबारी दिन। बाजार में उम्मीदें जैसे किसी अंतरिक्षयान की गति से उछाल मार रही हैं। सोमवार को शेयर बाजार ने फिर से नई ऊंचाई पा ली है। सारी उम्मीद नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार पर टिकी है। सेंसेक्स साढ़े तेईस तो निफ्टी सात हजार पर पहुंच गया है। छे साल से भी ज्यादा समय के बाद शेयर बाजार में इस तरह की तेजी देखने को मिली है। पिछले चार-पांच सालों से इक्कीस हजार पर अंटका सेंसेक्स शुक्रवार को तेईस हजार के पार चला गया। हालांकि, तेईस हजार के ऊपर बंद होने में सेंसेक्स कामयाब नहीं हुआ लेकिन, सेंसेक्स करीब तेईस हजार पर बंद हुआ ये कहा जा सकता है। एक दिन में साढ़े छे सौ प्वाइंट से ज्यादा सेंसेक्स चढ़ गया। लेकिन, क्या ये तेजी निवेशकों के लिए पुराने अच्छे दिन लौटाने वाली है। अगर शेयर बाजार के अनुमान की मानें तो भारतीय जनता पार्टी के चुनावी नारे अच्छे दिन आने वाले हैं की तर्ज पर बाजार के भी अच्छे दिन आने वाले हैं। अब इस बाजार के अनुमान को मानें तो नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार बनने वाली है। और जो बाजार अभी तक अकेले भारतीय जनता पार्टी के 200 के अंदर रहने और मुश्किल से एनडीए बनाकर सरकार का उम्मीद में था। वो बाजार अचानक अकेले भारतीय जनता पार्टी के ही 210-240 सीटों के जीतने का अनुमान लगा रहा है और इसी आधार पर आसानी से नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनने की उम्मीद कर रहा है। 


मई महीने के दूसरे हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन जब दुनिया से किसी तरह का कोई संकेत नहीं था। सिर्फ इसी एक संकेत कि नरेंद्र मोदी मजे से  सरकार बना लेंगे। भारतीय शेयर बाजार ने वो छलांग लगा दी जिसके ट्रेडर, ब्रोकर लंबे समय से इंतजार कर रहे थे। बाजार को अनुमान  ये है कि नरेंद्र मोदी की सरकार बनेगी और ढेर सारे वो रुके हुए फैसले ले लिए जाएंगे जिसके न लागू होने की वजह से दुनिया की रेटिंग एजेंसियां भारत में निवेश को जोखिम बताने लगी थीं। बाजार को उम्मीद है कि मोदी ऐसे फैसले लेंगे जिससे भारत के कारोबारी देश में तेजी से औद्योगिक गतिविधि बढ़ा सकेंगे। बुनियादी परियोजनाओं के पूरा होने में कोई रुकावट नहीं आएगी। यूपीए दो के दौरान सरकार पर जो लगातार पॉलिसी पैरलिसिस का आरोप लगता था वो, खत्म हो जाएगा। बाजार इसी आधार पर दौड़ लगा चुका है। बाजार में ये सब कुछ हुआ है मई महीने के दूसरे हफ्ते में। और मई महीने के तीसरे हफ्ते यानी 16 मई को ये तय हो जाएगा कि बाजार की उम्मीदें कितनी पूरी होंगी। मतलब नरेंद्र मोदी आसानी से सरकार बना पाएंगे या नहीं। चलिए एक बार मान लेते हैं कि 16 मई को जब ईवीएम खोले जाएंगे तो ढेर सारे कमल निशानों के साथ नरेंद्र मोदी सरकार बनाने के लिए रायसीना हिल्स की ओर बढ़ जाएंगे। ये भी मान लेते हैं कि नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी को अकेले 230-240 और बची सीटें आसानी से एनडीए के साथ पूरी हो जाएंगी। नरेंद्र मोदी की वो सरकार बन जाएगी। जो ये कह रही है कि अच्छे दिन आने वाले हैं। अब जरा ये बात कर लें कि अच्छे दिन आने का मतलब क्या। मोटा-मोटा पांच बातें अगर हो जाएं तो मुझे लगता है कि देश के लोग ये मानने लगेंगे कि अच्छे दिन आ गए हैं। सबसे पहले महंगाई कम हो जाए। महंगाई मतलब- सब्जी, अनाज और दूसरी रोज की खाने-पीने चीजें उन्हें सस्ती मिलें। फिर क्या उद्योगों को भरोसा लौटे और वो देश में आसानी से अपने उद्योग लगा चला सकें। फिर क्या कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अच्छा करने लगे। मतलब कारें, एसी, फ्रिज खूब बिकें। और क्या हो वो ये कि लोगों को सस्ता कर्ज मिले।  सस्ती ब्याज दरों पर घर, गाड़ी खरीद सकें। बुनियादी सुविधाएं यानी सड़क, बिजली, पानी की सहूलियत आसानी से मिल सके। और इस सबके लिए सबसे जरूरी कि ढेर सारे रोजगार के मौके बनें। जिससे लोगों की कमाई बढ़े और वो इस तरह से खर्च कर सके, बचा सके कि देश की तरक्की की रफ्तार यानी जीडीपी के आंकड़े दुरुस्त हो सकें।

अच्छी बात ये है कि यूपीए दो की सरकार सारी आलोचनाओं के बाद अपने पीछे अच्छा विदेशी मुद्रा भंडार खजाने में छोड़कर जा रही है। लेकिन, दूसरी देश की ऐसी समस्याएं और गंभीर हुई दिख रही हैं जिसको आधार बनाकर नरेंद्र मोदी कह रहे हैं कि उनकी सरकार बनाइए तो अच्छे दिए आएंगे। सबसे ज्यादा चोट पड़ी है तो भारतीयों पर महंगाई की। महंगाई का आलम ये रहा है कि पिछले तीन सालों से हर बार जब महीने का सामान खरीदने के लिए भारतीय निकलता है तो उसे पहले से ज्यादा रकम चुकानी पड़ी है। रोज की जरूरत के सामान तेजी से महंगे हुए हैं। आटा, दाल, चावल, सब्जी, दूध और दूसरी सारी जरूरी चीजें तेजी से महंगी हुई हैं। हर तीसरे महीने अखबारों में विज्ञापन देकर दूध कंपनियां दूध के दाम एक-दो रुपया बढ़ाने के तर्क पेश करती हैं। और सबसे बड़ी बात ये रही है कि यूपीए एक हो या दो- दोनों ही कार्यकाल में देश में मॉनसून बेहतर रहा है और खाद्यान्न के मामले में भारत की स्थिति बहुत अच्छी रही है। इसके बावजूद सरकार अनाज, फल, सब्जी, दूध की कीमत काबू में नहीं कर सकी। और प्याज की कीमतों पर तो कोहराम मचा। अब सवाल ये है कि नरेंद्र मोदी इस मोर्चे पर क्या आसानी से काबू पा लेंगे। तो इसका जवाब नहीं में हैं। क्योंकि, अभी तक जो मौसम का हाल रहा है वो, साफ दिखा रहा है कि इस साल मॉनसून सामान्य से कम हो सकता है जिसका सीधा सा मतलब होगा कि खेती पर बुरा असर पड़ेगा। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की हालत का अंदाजा लगाइए कि ताजा कारों की बिक्री का आंकड़ा बढ़ने के बजाए करीब दस प्रतिशत कम बता रहा है। मतलब लोगों की जेब में कारें खरीदने के पैसे नहीं हैं। वो भी तब जब दुनिया की हर कार कंपनी भारतीयों को लुभाने के लिए ढेर सारे नए मॉडल हर महीने ला रही है। देश में महंगे कर्ज की वजह से औद्योगिक घरानों को अपनी विस्तार योजना रोकनी पड़ी है। इससे देसी निवेश बुरी तरह प्रभावित हुआ है। घर खरीदने के लिए ग्यारह प्रतिशत के आसपास और गाड़ी खरीदने के लिए लोगों को साढ़े बारह प्रतिशत से ज्यादा ब्याज देना पड़ रहा है। इसकी वजह से रियल एस्टेट सेक्टर में जबर्दस्त ठहराव आ गया है। दिल्ली, मुंबई के बाजार में साल भर पहले के भाव अभी भी थोड़ा खोजने पर मिल जा रहे हैं। डेवलपर भी फंड की वजह से अपने चल रहे प्रोजेक्ट को पूरा नहीं कर पा रहे हैं और नए प्रोजेक्ट शुरू ही नहीं कर पा रहे हैं। अब रियल एस्टेट सेक्टर को उम्मीद है कि नरेंद्र मोदी आएंगे तो इस सेक्टर में तेजी आएगी लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस तरह की नीतियां भारत सरकार की रियल एस्टेट सेक्टर के लिए उसमें डर यही है कि 16 मई के बाद की रियल एस्टेट की तेजी सिर्फ बुलबुला होगी, काला धन बढ़ाने वाली होगी। वो फायगा करेगी तो रियल एस्टेट डेवलपर्स का। उससे देश की जीडीपी में खास बेहतरी नहीं होने वाली। जीडीपी की बेहतरी की चिंता इसलिए कि जीडीपी ग्रोथ यानी तरक्की की रफ्तार इस समय दशक में सबसे कम यानी साढ़े पांच प्रतिशत की है। और इस वित्तीय वर्ष में भी इसी के आसपास ये रफ्तार रहती दिख रही है। क्योंकि, जब तक अगली सरकार, चाहे वो मोदी की हो या किसी और की, काम शुरू कर पाएगी तब तक इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही बीत चुकी होगी और दूसरी तिमाही का आधार भी बन चुका होगा। ऐसे में इस तरक्की की रफ्तार को चमत्कारिक तरीके से बढ़ाना नरेंद्र मोदी या अगली किसी भी सरकार के लिए चुनौती होगी।

बात हमने शेयर बाजार के संकतों से शुरू की थी। इसलिए शेयर बाजार की ही बात फिर से कर लेते हैं और उसके संकेतों को भी ज्यादा गंभीरता से समझने की कोशिश करते हैं। मई के दूसरे हफ्ते में शेयर बाजार में ये जो तेजी देखने को मिली है ये पूरी तरह से उन विदेशी खिलाड़ियों की वजह से है जो एक झटके में अपनी सारी रकम निकालकर किसी दूसरे अच्छे मुनाफा देने वाले ठिकाने की ओर  चल देते हैं। यानी 2008 की ही तरह तेजी से विदेशी निवेशक मुनाफा लेकर भागने लगे तो सेंटिमेंट पर चलने वाले बाजार को बचाना बड़ा मुश्किल होगा। शेयर बाजार की तेजी में जो शेयर सबसे तेजी से भागे हैं उनमें बैंक, पावर और रियल एस्टेट सबसे आगे हैं। हालांकि, अच्छी बात ये है कि मई के दूसरे हफ्ते में आई इस तेजी के नेता वो शेयर हैं जिनके फंडामेंटल्स काफी अच्छे हैं और वो लंबे समय से बाजार में आई कमजोरी की वजह से पिट रहे थे। लेकिन, इसी का दूसरा पहली ये भी है कि शेयर बाजार की इस तेजी में नब्बे प्रतिशत से ज्यादा कंपनियां शामिल नहीं हैं और न ही देसी निवेशक इस तेजी का हिस्सा है। शेयर बाजार में भारतीय देसी निवेशकों की रुचि भी कितनी तेजी से खत्म हुई है इसका अंदाजा लगाने के लिए एक आंकड़ा काफी होगा। इस साल के पहले महीने से मार्च महीने में देसी निवेशकों यानी एनएसडीएल के जरिए ट्रेडिंग अकाउंट खुलवाने वाले करीब आधा प्रतिशत घटे हैं। डर ये कि अगर इस बार 16 मई के बाद 2008 जनवरी वाले हालात हुए तो देसी निवेशक ऐसा भागेंगे कि फिर बरसों ये भरोसा वापस लाने में लग जाएगा। इसलिए शेयर बाजार से मिल रहे अच्छे दिन के संकेतों पर सावधानी बरतने की जरूरत है। नई सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां होंगी फिर चाहे वो अच्छे दिन लाने का दावा करने वाले नरेंद्र मोदी ही क्यों न हों। लालच से बचने की जरूरत है वरना सरकार कोई भी आए लालच अच्छे दिनों को बुरे दिन में बदल देगा। और भारतीय लोकतंत्र है पूरी तरह अनिश्चित। 99 प्रतिशत मोदी की अच्छे दिन वाली सरकार के साथ एक प्रतिशत दूसरी सरकार भी मानें तो देश की भावनाएं जिस तरह से कमजोर होंगी उन्हें उबारना बहुत बड़ी चुनौती होगी।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...