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Tuesday, June 18, 2013

चिदंबरम साहब इतनी भी नहीं सुधरी है अर्थव्यवस्था

12 जून को अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच ने भारत की रेटिंग बढ़ाने का एलान किया। हालांकि, इसे अगर ध्यान से समझें तो ये रेटिंग बढ़ने से ज्यादा बद से बदतर हुई साख के थोड़ा सुधरने का मसला था। लेकिन, लंबे समय से ऐसी किसी खबर के इंतजार में बैठी सरकार और उसके वित्त मंत्री के लिए इससे बेहतर खबर भला क्या हो सकती थी। फिच के मुताबिक अब भारत में निवेश करने वालों के लिए माहौल बेहतर हुआ है। ढेर सारे आर्थिक सुधारों की जरूरत है लेकिन, सरकार सही रास्ते पर जा रही है। और, इसीलिए रेटिंग एजेंसी ने भारत का आउटलुक निगेटिव से बढ़ाकर स्थिर कर दिया। और, सरकार के वित्त मंत्री पी चिदंबरम को भी फिर से वित्त मंत्रालय में आए 9 महीने भी बीत चुके हैं। ठीक 9 महीने बाद आई इस शुभ खबर के बहाने वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने देश को ये बताने की कोशिश की कि उनके आने के बाद अर्थव्यवस्था के हालात कितने बेहतर हुए हैं। इसलिए रेटिंग सुधरने के अगले दिन चिदंबरम साहब मीडिया के जरिए देश के सामने थे। रेटिंग सुधारने के फिच के फैसले के जरिए उन्होंने समझाने की कोशिश कि ज्यादातर मोर्चों पर अर्थव्यवस्था पूरी तरह से पटरी पर लौट आई है। और जहां कमी रह गई है उसे 2 महीने यानी जून और जुलाई के महीने तक सुधार लिया जाएगा। 

वित्त मंत्री की उम्मीदों को और परवान मिला लगे हाथ आए महंगाई दर के आंकड़ों से। होलसेल प्राइस इंडेक्स के आंकड़े बता रहे हैं कि मई में महंगाई के बढ़ने की रफ्तार 4.70 प्रतिशत रही जबकि, अप्रैल में महंगाई के बढ़ने की रफ्तार 4.70 प्रतिशत रही थी। इस लिहाज से महंगाई के बढ़ने की रफ्तार 3 साल में सबसे कम रही है। यही महंगाई का वो आंकड़ा है जिसके आधार पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया अपनी मौद्रिक नीति तय करता है। इसका मतलब ये कि इसी के आधार पर ब्याज दरें घटेंगी या बढ़ेंगी ये तय होता है। हालांकि, घटती महंगाई दर में आम जनता के लिहाज से एक आंकड़ा जो और छिपा हुआ है जिसकी चर्चा सरकार कम ही करना चाहेगी वो है फूड इनफ्लेशन यानी खाने पीने के सामानों की महंगाई दर। दरअसल फूड इनफ्लेशन अभी भी 8.25% प्रतिशत है। जबकि, पिछले साल मई में ये 6.08%  था। शायद फूड इनफ्लेशन के इस स्तर पर होने की ये वजह ही है कि वित्त मंत्रालय के साफ इशारों के बाद भी रिजर्व बैंक उस रफ्तार से ब्याज दरें नहीं घटा रहा है जिसकी उम्मीद की जा रही है। और, एक दूसरा पहलू ये भी है कि रिजर्व बैंक चाहता है कि पहले बैंक रेपो रेट में की गई कटौती को लोगों तक पहुंचाएं। क्योंकि, इस साल पौना प्रतिशत और पिछले साल अप्रैल से अब तक रिजर्व बैंक सवा प्रतिशत रेपो रेट घटा चुका है लेकिन, आशंकित बैंक अभी भी ग्राहकों को इस कटौती का फायदा नहीं दे रहे हैं। हाल ये है कि अभी भी अगर घर के लिए किसी को कर्ज लेना है तो, साढ़े दस प्रतिशत के नीचे के ब्याज पर कर्ज मिलना लगभग असंभव है। सरकारी बैंक एसबीआई दस प्रतिशत के आसपास ब्याज पर कर्ज दे रहा है लेकिन, उससे कर्ज मिलना देश के ज्यादातर प्रोजेक्ट के लिए लगभग असंभव है। इसका सीधा सा मतलब हुआ कि अगर कोई अभी घर के लिए कर्ज लेगा तो, उसे बैंक को इस ब्याज दर पर कर्ज ली गई रकम का दोगुना 20 सालों में चुकाना होगा।

फिच की रेटिंग सुधरने के बहाने वित्त मंत्री ने स्थापित करने की कोशिश की कि महंगाई घटी है, विदेशी कर्ज भी कम हुआ है और रिजर्व बैंक के पास विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा है जो, बेहतर होती अर्थव्यवस्था का प्रमाण है। ये काफी हद तक सही भी है कि पिछले 9 महीने में देश की अर्थव्यवस्था सुधरी है या यूं कहें कि अर्थव्यवस्था सुधरने के संकेत सुधरे हैं। लेकिन, इस बात की चर्चा भले कम हो और रिजर्व बैंक फैसले महंगाई के कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स के आंकड़ों के आधार पर लेता हुआ न दिखे। सच्चाई यही है कि इन 9 महीनों की छोड़िए 2009 में यूपीए दो आने के बाद से इस देश के लोगों को जिस महंगाई का सामना करना पड़ा है वो दस प्रतिशत के ऊपर है। आंकड़ों में भी कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (सीपीआई) से तय होने वाला रिटेल इनफ्लेशन 2009 में 10.83 प्रतिशत रहा। 2010 में ये 12.11 प्रतिशत पर पहुंच गया। 2011 में इसमें काफी कमी आई लेकिन, फिर भी ये 8.87 प्रतिशत रहा। 2012 में फिर 9.30 प्रतिशत हो गया और इस साल की बात करें तो, औसत महंगाई करीब साढ़े ग्यारह प्रतिशत है। 
ये महंगाई दर के आंकड़े अगर कम भयावह दिखते हैं तो, इन्हें कुछ और आंकड़ों के साथ रखकर देखिए अर्थव्यवस्था की स्थिति और साफ हो जाएगी। महंगाई की मार झेलने वाले देश के लोगों की जेब में रकम कितनी बढ़ रही है इस पर नजर डालिए। 2012-13 में प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय बढ़कर 39,168 रुपए हुई ये 2011-12 से सिर्फ 3 प्रतिशत बढ़ी है। जबकि, 2011-12 में प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय 4.7 प्रतिशत बढ़ी थी। महंगे कर्ज के बोझ से परेशान कंपनियों के तिमाही नतीजे और बीते वित्तीय वर्ष में दस साल में सबसे कम तरक्की की रफ्तार अर्थव्यवस्था की चुनौती के हालात साफ साफ बयान कर देती है। बीते वित्तीय वर्ष में भारत की तरक्की की रफ्तार पांच प्रतिशत रही है। हालांकि, ये साल सुधार का साल है। और आगे अर्थव्यवस्था सुधरती दिख रही है। लेकिन, अगर सबकुछ अच्छा रहा तो, भी 2015 में अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार सात प्रतिशत के नीचे ही रहती दिख रही है। ये अनुमान विश्व बैंक का है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक, मार्च 2014 में खत्म होने वाले यानी इस वित्तीय वर्ष में भारत की तरक्की की रफ्तार का अनुमान 5.7 प्रतिशत का है। जो पूरी तरह से निर्यात के बेहतर आंकड़ों और निवेश पर टिका हुआ है। वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था की सुनहरी तस्वीर दिखाई। कोयला, गैल, फर्टिलाइजर क्षेत्र में निवेश की बेहतर तस्वीर भी दिखी। साथ ही वित्त मंत्री ने भरोसा दिलाया कि विदेशी निवेश की शर्तें बेहतर करने के लिए चंद्रशेखर समिति की सिफारिशों पर 25 जून को होने वाला सेबी की बैठक में कुछ अच्छे फैसले लिए जाएंगे। हफ्ते के आखिरी दिन अच्छी तेजी देखने को मिली। लेकिन, शुक्रवार को 350 अंक से ज्यादा चढ़ने के बाद भी सेंसेक्स अभी बमुश्किल उन्नीस हजार से कुछ आगे ही जा पाया है। जो, कितने दिनों तक टिकेगा पता नहीं। जनवरी 2008 में 21000 पार करने वाला सेंसेक्स आज तक 21000 छोड़िए 19000 के आसपास ही लहराता रह जा रहा है। वित्त मंत्री भरोसा दिला रहे हैं कि रुपए की औकात डॉलर के मुकाबले अब और नहीं गिरेगी। वैसे 2008 में 1 डॉलर के लिए 46 रुपए के भाव वाला रुपया गिरकर अब 59 के भाव तक पहुंच गया है। वित्त मंत्री पी चिदंबरम बार-बार लोगों से अपील कर रहे हैं कि सोना मत खरीदो और उनकी इस चाह में मैं भी पूरी तरह से साथ हूं लेकिन, सोने के अतिमोह वाले भारतीयों के मन का क्या करेंगे कि जिस दिन उन्होंने भरे गले से ये अपील की उस दिन भी सोने का भाव 360 रुपए प्रति दस ग्राम चढ़ गया। फिर अभी तो शादियों का सीजन शुरू हो रहा है। उसके बाद त्यौहारों की झड़ी लग जाएगी। फिर भारतीय कहां से चिदंबरम साहब की अपील सुनने लगे। सोने पर आयात ड्यूटी जनवरी से दोगुनी हो चुकी है। चार प्रतिशत लगती थी अब आठ प्रतिशत लगती है फिर भी भारतीयों का सोना प्रेम बहुत कम नहीं हो पा रहा है। भारतीयों के बीच सोने की हैसियत जितनी बढ़ेगी और भारतीय रुपए की हैसियत दुनिया में जितनी गिरेगी अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत उतनी ही तेजी से सिर के बल चलने लगेंगे। पेट्रोलियम प्रोडक्ट पर सब्सिडी घटाकर सरकार ने सब्सिडी बिल काफी कम कर लिया है। लेकिन, डीजल की कीमत अठन्नी बढ़ती हुई और पेट्रोल की कीमत रुपए दो रुपए बढ़कर सरकार के महंगाई घटने के सपने को फिर से आधी नींद में हो तोड़ देगी। और, चुनाव नजदीक हैं तो, सरकार खर्चे घटाने के बारे में तो सोच भी नहीं सकती। खुद वित्त मंत्री अब कह रहे हैं कि सभी मंत्रालय खर्च तेजी में करें। तो वित्तीय घाटा तो सुरसा के बढ़ते मुंह की तरह और खुलने के लिए तैयार ही बैठा है। यही वजह रही वित्त मंत्री जी कि आपके लाख इशारे के बाद भी 17 जून को रिजर्व बैंक ने चवन्नी रेट भी नहीं गिराया अब कम से कम 30 जुलाई तक के लिए कर्ज सस्ता होने की उम्मीद धूमिल हो गई है। वित्त मंत्री जी रिजर्व बैंक पर दबाव बनाने से पहले आपको बैंकों पर दबाव बनाना होगा कि वो कर्ज सस्ता करें।

प्रधानमंत्री जी एनर्जी पॉलिसी बेहतर कीजिए जिससे देश में पेट्रोलियम पदार्थों की खोज का काम तेज हो और पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली से पूछिए और इस बात का इंतजाम कीजिए कि देश की पेट्रोलियम पॉलिसी में बाधा पहुंचाने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई हो सके। क्योंकि, सारा खेल भरोसे का है अगर देश के लोगों को ये लगेगा कि कोई और ताकत देश को चला रही है तो, भला वो भरोसा कहां से आएगा। और, अगर भरोसा नहीं आया तो फिर ये यूपीए दो के आखिर में अर्थव्यवस्था की सुनहरी तस्वीर का सपना दिखाकर यूपीए तीन बनाने का सपना भी सपना ही रह जाएगा।

Saturday, February 05, 2011

हर मौत का अपना अर्थशास्त्र है

शाहजहांपुर में ITBP भर्ती के लिए उमड़े नौजवान

भगदड़ में होने वाली मौतें अखबार की सुर्खियां तो बनती ही हैं। एक साथ कुछेक, कुछ सैकड़ा लोगों की मौत हमेशा टीवी को विशेष तौर पर आकर्षित करती है। जब अचानक टीवी न्यूज चैनलों पर फ्लैश चलता है कि आईटीबीपी में भर्ती के लिए गए लाखों छात्रों ने शाहजहांपुर में हंगामा कर दिया है। बवाल मचा दिया है तो, बस बदइंतजामी भर की खबर थी। लेकिन, जब करीब सात लाख के अनुमानित बेरोजगारों का मेला वापसी के लिए रेलवे स्टेशन पर पहुंचा तो, ट्रेनों की छत पर चढ़े कई नौजवानों की स्टेशन पर बने पुल और बिजली के तारों से टकराने से हुई मौत असली खबर बन गई। और, इस खबर को मीडिया में जगह मिल गई। क्योंकि, ढेर सारी हंगामे के विजुअल थे, तस्वीरें थीं, आग थी। अब रेलवे और उत्तर प्रदेश सरकार सारा ठीकरा आईटीबीपी पर ठोंककर किनारा ले रहे हैं। लेकिन, इस बात पर बमुश्किल चर्चा हो पा रही है कि आखिर क्या वजह है कि देश में हर दूसरे-चौथे ऐसे किसी भर्ती अभियान, किसी रियल्टी शो या फिर किसी जगह कुछ मुफ्त में पाने की दौड़ में लोगों की जानें जा रही हैं।

अभी आईटीबीपी की नौकरी पाने की भगदड़ में मरे लोग चर्चा में हैं। सेना के भर्ती अभियानों में भी अकसर गोली चलने से लेकर भगदड़ में मरने की खबरें इस देश में आम हैं। पिछले साल नोएडा में अमेरिकन आइडल की नकल पर बने इंडियन आइडल रियलिटी शो के ऑडीशन में इंडियन आइडल बनने की चाह रखने वालों की ऐसी भीड़ उमड़ी कि आयोजकों के सारे इंतजाम धरे के धरे रह गए। अनियंत्रित भावी इंडियन आइडल्स ने जमकर हंगामा किया, भगदड़ में रौंदे गए कई आइडल अस्पताल पहुंच गए। नोएडा की सड़कों पर घंटों के लिए जाम लग गया। अखबार-टीवी चैनलों पर आयोजकों की बदइंतजामी खबर बन गई। भला हुआ कि इस भगदड़ में कोई अनिष्ट नहीं हुआ। लेकिन, क्या सचमुच कहीं-कोई इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश कर रहा है कि इस देश की भगदड़ की असली वजह क्या है। क्यों, हर दूसरे-चौथे देश भगदड़ लेने लगता है और अगर भगदड़ में देश के कुछ लोगों की मौत हो गई तो, थोड़ी बहुत खबर बन जाती है नहीं तो, भगदड़ों के बारे में कोई चर्चा तक नहीं होती। क्या भगदड़ इस देश की नियति बन गई है।

मंदिरों में आस्था की भीड़ में शामिल कितने लोग हर साल असमय ऊपर भगवान के पास चले जाते हैं इसका कोई हिसाब नहीं है। उत्तर प्रदेश में ही पिछले साल प्रतापगढ़ के कृपालु महाराज आश्रम में हुई भगदड़ और इसमें हुई मौतें भी बड़ी खबर बनी थी। वैसे तो, इस भगदड़ के देश की सबसे बड़ी खबर बनने के पीछे कई वजहें थीं। सबसे पहली कि ये एक स्वघोषित जगतगुरु कपालु महाराज के आश्रम में आयोजित भंडारे के दौरान हुई भगदड़ थी। दूसरी ये कि पहले के कई मंदिरों में मची भगदड़ों की तरह इस भगदड़ में भी कई निर्दोष जानें चली गईं थीं। तीसरी ये कि बाबाओं-साधुओं के इतने कुकर्म मौके से सामने आ रहे थे कि कृपालु महाराज के आश्रम में मची भगदड़ टीआरपी खींचू और पाठक संख्या बढ़ाऊ खबर बन गई। उस पर आश्रम के एक व्यस्थापाक का ये कह देना कि इन 65 मौतों के लिए ईश्वर जिम्मेदार है—खबरों में और मसाला डाल गया। भगवान भरोसे चलते इस देश में एक बार फिर भगवान के मत्थे 65 मौतों का जिम्मा देकर मामला निपटा लिया गया।

लेकिन, इन मौतों के जिम्मेदार ईश्वर तो बिल्कुल भी नहीं थे। कृपालु महाराज के यहां भंडारे में आए लोग मरे थे तो, उन पर जवाबदेही तय हो सकती है। लेकिन, क्या कृपालु महाराज जिम्मेदार थे। थोड़ा ध्यान से देखें तो, कैसे जिम्मेदार थे वो, तो कुछ भूखे-पेटों के भोजन का इंतजाम कर रहे थे साथ ही उन्हें कुछ रुपए और बरतन दे रहे थे। और, क्या ये भगदड़-मौत नहीं होती तो, वही कृपालु महाराज इतने परिवारों के लिए असली जगतगुरु नहीं प्रतिस्थापित हो जाते। तब तो, ये चर्चा टीवी-अखबारों में नहीं होती फिर भी, 25000 गरीबों के भगवान कृपालु ही बन जाते। और, अगले भंडारे में 50000 गरीब इस कृपालु भगवान के दरवाजे खड़े होते।

दरअसल इन भगदड़ मौतों के असली जिम्मेदार खोजकर उसके सही इलाज के बजाए सारी मशक्कत आईटीबीपी या फिर सेना के भर्ती केंद्र, किसी कृपालु, किसी इंडियन आइडल के आयोजक को गुनहगार बताकर असली समस्या पर ध्यान न जाए इसकी कोशिश सफलता पूर्वक काम कर रही है। ये गुनहगार हैं तो, पिछले साल मुंबई पुलिस की भर्ती के दौरान हुई भगदड़ में मारे-रौंदे गए लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है। लगभग हर बार सेना की भर्ती में सेना के जवान बनने के बजाए सेना के जवानों की गोली खाने के लिए अभिशप्त बेरोजगारों की मौतों-भगदड़ों का जिम्मेदार कौन है।

असली जिम्मेदारी किसकी है ये सबको पता है लेकिन, अगर असली जिम्मेदार खोज लिया गया तो, मुश्किल बढ़ जाएगी। अब ये तर्क आ सकता है कि इन सारी भगदड़ों-मौतों की जिम्मेदारी एक जगह जाकर कैसे तय हो सकती है। नोएडा, किसी महाराज का आश्रम, मुंबई या फिर देश के दूसरे हिस्सों में सेना की भर्ती या फिर रोजगार का कोई दूसरा मेला। दरअसल भूख और बेकारी असली वजह है इस देश की भगदड़-मौतों की। ये भगदड़ उसी बीस रुपए की वजह से है जिस पर अभी भी देश की बड़ी आबादी का रोजाना गुजर-बसर हो रहा है। ये हमारी पैदा की हुई विसंगति की भगदड़ है जहां दुनिया की मंदी में भी हम इंडिया ग्रोथ स्टोरी के सिर्फ थोड़ा धीमा पड़ने की बात करते हैं लेकिन, उन लोगों की चिंता बस इतने से पूरी हो जाती है कि साल के 365 दिन में से कम से कम 100 दिन का रोजगार हम देने वाली योजना ले आ रहे हैं। ये अलग बात है कि अलग-अलग राज्यों में 100 दिन के दावे का भी 18 से 60 प्रतिशत ही पूरा हो पा रहा है।

ये भगदड़ तरसते भारत के चमकते इंडिया के साथ की चाह में मची है। भूख-बेकारी के दौर में सेना या पुलिस की नौकरी के लिए लगी लाइन कोई देश सेवा की चाह में नहीं है। ये सिर्फ अपना और अपने परिवार का पेट भरने-जीवन स्तर बेहतर करने की चाह में लगी लाइन है। उस पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जैसा समझदार अर्थशास्त्री कह रहा है कि हमने महंगाई बढ़ने दी, बेरोजगारी नहीं। पिछले साल भर में टेक्सटाइल, आईटी, रिटेल, रियल इस्टेट, मैन्युफैक्चरिंग हर चमकते क्षेत्र से निकाले गए लोगों की बेरोजगारी की खबरों से ही टीवी-अखबार भरे रहते थे। इन सेक्टरों को जिंदा रखने के लिए रियायतों का पिटारा खोलने से उद्योगपतियों ने तो अपना मुनाफा बचा लिया लेकिन, जिनके पेट पर लात पड़ी उन्हें कहीं से मरहम नहीं मिला। फिर भी प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि हमने महंगाई भले बढ़ने दी लेकिन, बेरोजगारी पर काबू पाया।

ये देखने में भले लगता है कि इंडियन आइडल बनने की लाइन में खड़ा हर लड़का-लड़की ये चमक-दमक के लिए बनना चाहता है। सच्चाई ये होती है कि वो, जल्दी से पैसा कमाकर भारतीय से हटकर इंडियन बन जाना चाहता है। इस चक्कर में भगदड़ का शिकार भी बनता है। लेकिन, इस सिस्टम में जब तक भगदड़ों-मौतों के लिए किसी कृपालु महाराज, इंडियन आइडल के आयोजक या फिर सेना-पुलिस की भर्ती में पुख्ता इंतजाम न होने को बहाना बनाकर जिम्मेदारी थोपी जाती रहेगी। तब तक देश की भगदड़ मौतें रोकने का शायद ही कोई इंतजाम हो पाए। इसीलिए भगदड़ और भगदड़ में हुई मौतें इस देश की नियति बनती जा रही हैं। और, देश असली समस्या से ही भगदड़ लेता दिख रहा है।
(ये लेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपा है)

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...