Tuesday, August 16, 2011

अन्ना कैसे सुधारोगे भ्रष्ट भारत

इलाहाबाद के बक्शी बांध की शुरुआत पर अतिक्रमण
किसन बाबूराव उर्फ अन्ना हजारे को सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन तक नहीं करने दे रही है। दरअसल, अलग-अलग किस्मों-रंगों में भ्रष्टाचार ऐसे घुस बैठा है कि डर लगता है कि बिना भ्रष्टाचार के हम रह पाएंगे भी या नहीं।

कल ही इलाहाबाद से लौटा हूं। दिल्ली स इलाहाबाद जाते वक्त प्रयागराज में दो लड़कियों का टिकट कनफर्म नहीं था। या शायद एयरकंडीशंड कोच का टिकट ही नहीं था। लेकिन, उनकी किस्मत अच्छी थी। एक सीट खाली थी। दोनों लड़कियां उसी पर सो गईं। टीटी आया- एक लड़की ज्यादा समझदार थी। टीटी के नाराज होते ही उसने 100 का पत्ता पकड़ा दिया। पहले टीटी और नाराज हुआ। फिर, बोला - एक और दो। एक तो ये था सहूलियत का भ्रष्टाचार।

दूसरा इलाहाबाद में ही घर से निकला। इलाहाबाद के गंगा किनारे के इलाके दारागंज में हमारा घर है। वहां से शहर की तरफ निकला। दारागंज से बक्शी बांध से हम लोग एलेनगंज की तरफ चले। बांध खत्म होते-होते एक साईं मंदिर दिख गया। जिसके बगल में बड़ा सा बैनर भी लगा दिखा जो, बिना किसी डर-भय के चंदा देकर मंदिर बनाने की अपील कर रहा है। ये गजब का भ्रष्टाचार है। अब ये अतिक्रमण, अगर अभी ही इलाहाबाद विकास प्राधिकरण या फिर दूसरे संबंधित अधिकारियों को दिख जाए तो, शायद ये विवाद का विषय न बने। अभी तो, इस मंदिर के आसपास भी कोई इसका मालिकाना हक जताने वाला नहीं दिख रहा था। लेकिन, कल को जब ये मंदिर पक्का, बढ़िया बन जाएगा। कुछ दान नियमित आने लगेगा और मंदिर का कोई भ्रष्ट पुजारी भी जम जाएगा तो, ये आस्था का विषय हो जाएगा। इस भ्रष्टाचारी भारत को कैसे सुधारोगे अन्ना। उस पर ये सरकार !

मैंने ये फोटो फेसबुक पर भी डाली थी। उसकी प्रतिक्रियाएं भी डाल रहा हूं।
Shobhit Chauhan What a nice observation. Within few years this entire land will be a temple. And if the authorities try to break it, there will be communal riots. People will block the roads. They will cry for their religion. and many other things...
Saturday at 5:32pm · 1 personLoading...
  • Harshvardhan Tripathi That's what I want to point out. Why authorities not taking action at start of this type of illeagal land grabbing.
    Saturday at 5:35pm · · 1 personLoading...
  • Aar Ravi भैंस माता की जय.....
    Saturday at 5:37pm ·
  • Shobhit Chauhan Our authorities are in a habit of waiting for a blunder to happen and then show their disaster management skills.
    Saturday at 5:38pm ·
  • Arvind Rastogi bhains mata ke piche bhi ek Baba ji virajman hai Aar Ravi bhai
    Saturday at 5:42pm ·
  • Aar Ravi baba kee .........maar...hame to baba se achchhaa bhais lagtee hain...
    Saturday at 6:03pm ·
  • Arvind Rastogi kya vaha per been bajanee hai
    Saturday at 6:05pm ·
  • Aar Ravi बीन भी ठीक हैं ...भैस कहते हैं बीन बजाने पर ज्यादा दूध देती हैं ..शनि महाराज भी खुश हो जायेगे ..
    Saturday at 6:08pm · ·
  • Arvind Rastogi unko to tail chadega dudh nahi
    Saturday at 6:25pm ·
  • Ravish Shukla jameen par logon ka aur sarkari babu ki pocket me paise ka atikraman hoo jaata hai..issliye hooti hai andekhi...
    Saturday at 7:14pm ·
  • Arvind Rastogi babu ki pocket ke atrikraman ko to anna todne ke liye tayaar hai jamin ka kaun karega
    Saturday at 7:16pm ·
  • Ravish Shukla sachhai ka majboot haath jab todega in logon ko..tabhi khatm hooga yee.
    Saturday at 7:21pm ·
  •  Shri Surya bhai saab tbhi to khta bharshtachar hamare blood cells mein aa chuka hai,ab hum ek doosre ka khoon choosenge aur kuch nhi,jisne yeh kabja kiya hai usey poocho to woh khega mein kya alag kar rha hu sab karte hai,
  • Monday, August 08, 2011

    फूल रहा है दुनिया के दादा का दम

    शुक्रवार को अमेरिकी शेयर बाजार जब बंद होने की तरफ बढ़ रहे थे। तो, दुनिया की जानी-मानी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी एस एंड पी यानी स्टैंडर्ड एंड पुअर के दफ्तरों में हलचल बढ़ गई। खबरें जो, निकलकर आईं कि दरअसल अमेरिकी कर्ज संकट को सुलझाने के लिए रेटिंग एजेंसी के तय फॉर्मूले के गणित में थोड़ी गड़बड़ हो गई थी। जिसकी वजह से कर्ज की सीमा बढ़ाने और खर्च घटाने के अमेरिकी सरकार की योजना के आधार पर अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग एएए प्लस पर ही बनी रही। लेकिन, शुक्रवार को अमेरिकी बाजार बंद होने से पहले ही स्टैंडर्ड एंड पुअर ने दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की साख पर संदेह खुलेआम जाहिर कर दिया। स्टैंडर्ड एंड पुअर ने अमेरिकी क्रेडिट रेटिंग एएए प्लस से घटाकर एए प्लस कर दिया। और, उस पर भी रेटिंग एजेंसी ने इसे निगेटिव आउटलुक के साथ जारी किया है। इसका मतलब ये हुआ कि अगले 12 से 18 महीने में एक बार फिर से अमेरिका की रेटिंग घटने का खतरा है। और, अमेरिकी रेटिंग का घटना इसलिए भी ऐतिहासिक है कि ये रेटिंग एजेंसी के अस्तित्व में आने के बाद पहली बार हुआ है।
    अब सवाल ये है कि इस रेटिंग के घटने को अमेरिकी अर्थव्यवस्था और दुनिया के लिए कितने बड़े खतरे के तौर पर देखा जाना चाहिए। दरअसल अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए ये झटका 2008 में आई मंदी से भी बड़ा है। उसकी वजहें भी साफ हैं। 2008 में जो, मंदी आई थी उसमें अमेरिकी सरकार की साख को बट्टा नहीं लगा था। उस वक्त भी रेटिंग एजेंसियों ने अमेरिका की एएए प्लस की रेटिंग नहीं घटाई थी। क्योंकि, उस मंदी की वजह अमेरिका के रियल एस्टेट सेक्टर और खराब कर्जों को नए तरीके से पैकेजिंग करके बेचकर ज्यादा मुनाफा कमाने का बैंकों का लालच था। लेकिन, इस बार मामला ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि, इस बार तो, सरकारी खजाना ही खाली है। पिछली मंदी में बैंक दिवालिया हुए थे, इस बार तो, सरकार दिवालिया होती दिख रही है। सरकारी बिल के भुगतान में दिक्कत है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिकी कंगाली दुनिया के सामने खुलने का डर दिखाकर कर्ज लेने की सीमा बढ़ाने वाले बिल पर रिपब्लिकन और डेमोक्रैट्स दोनों को एक साथ आने के लिए मना लिया। लेकिन, अमेरिका की जो, योजना है खर्च घटाने की वो, दरअसल अभी भी संदेह के घेरे में है। वैसे तो, अमेरिका ने अगले दस सालों में वित्तीय घाटा 2.1 ट्रिलियन डॉलर घटाने का प्रस्ताव पारित किया है जो, 4 ट्रिलियन डॉलर से काफी कम है। लेकिन, 2.1 ट्रिलियन डॉलर घटाने की भी जो, योजना है वो, संदेह के घेरे में है।
    ये संदेह बाजार में बवाल बनकर उभर रहे हैं। अमेरिकी शेयर बाजारों के लिए बीता हफ्ता पिछले दो सालों का सबसे खराब हफ्ता साबित हुआ है। अमेरिकी शेयर बाजार का एसएंडपी 500 सूचकांक पिछले दस कारोबारी दिनों में करीब ग्यारह प्रतिशत गिरा है। अमेरिका गिरा तो, पीछे-पीछे सारे यूरोपीय, एशियाई बाजार भी धड़ाम हो गए। अमेरिका का अपना बुरा हाल और उस पर यूरोप का बढ़ता कर्ज संकट। कुल मिलाकर एक बार फिर दुनिया भर के अर्थशास्त्री ये आशंका जताने लगे हैं कि अमेरिका फिर से मंदी के मुंह में जा रहा है। यस वी कैन का नारा देकर अमेरिकी बदलाव का प्रतीक बन गए बराक ओबामा के भाषणों का नशा अमेरिकी जनता के दिमाग से खत्म हो गया है।

    मंदी से बाहर आए अभी अमेरिका को करीब साल का ही समय बीता है कि फिर से मंदी का भूत व्हाइट हाउस की छत पर मंडराने लगा है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के पांव उखड़ने लगे हैं। इस वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में अमेरिका की जीडीपी सवा परसेंट (1.3%) से भी कम बढ़ी है। हालांकि, पहली तिमाही से हालात सुधरे हैं। पहली तिमाही में अमेरिका की जीडीपी आधा परसेंट (1.3%) से भी कम बढ़ी है। अगर पहले छे महीने का हाल देखें तो, ये बढ़त मंदी के बाद रिकवरी की शुरुआत यानी जून 2009 के बाद सबसे कम है।

    अर्थशास्त्रियों को डर है कि अमेरिका फिर से मंदी के मुंह में जा सकता है। और, अमेरिकी मंदी का मतलब हुआ- दुनिया भर में मंदी के बादल छाने का खतरा। क्योंकि, GDP की रफ्तार घटने से दूसरी तिमाही में GDP $13.27 ट्रिलियन रह गई है। ये आंकड़ा इसलिए भी डरा रहा है कि मंदी के ठीक पहले यानी 2007 की आखिरी तिमाही में अमेरिका की कुल जीडीपी $13.33 ट्रिलियन डॉलर ही थी। ये आंकड़े साफ बता रहे हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर अब लगा कोई भी एक धक्का इसे सीधे मंदी के मुंह में धकेल देगा।
    और, वो धक्का लगता दिख रहा है अमेरिका के खाली सरकारी खजाने की वजह से। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने अमेरिका की कंगाली का वास्ता देकर अमेरिकी सीनेट से कर्ज लेने की सीमा तो बढ़वा ली। लेकिन, जानकार इसे कुछ समय की ही राहत मान रहे हैं। इसके अलावा भी बहुत से ऐसे कारण फिर से उभर रहे हैं जो, अमेरिकी अर्थव्यवस्था को फिर से मंदी की तरफ खींच रहे हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में पिछली तिमाही में जो, झटका लगा है। उसकी सबसे बड़ी वजह है अमेरिकियों ने अपने खर्चे घटा दिए। दरअसल, अमेरिका की पूरी अर्थव्यवस्था खर्च पर ही चलती है। खर्च करने पर ही अर्थव्यवस्था का सत्तर प्रतिशत निर्भर करता है। और, खर्च करने में माहिर माने जाने वाले अमेरिकियों ने घर, गाड़ी हो या फिर दूसरी रोज के इस्तेमाल की जरूरी चीजें- सबकुछ खरीदने में कंजूसी दिखाई है। पिछली तिमाही में अमेरिकियों ने सिर्फ 0.1 प्रतिशत घर ज्यादा खरीदे। ये अप्रैल-जून 2009 की तिमाही के बाद सबसे कमजोर बढ़त है। मंदी के संकेत कार और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स की खरीद के आंकड़ों में भी दिखने लगे हैं। पिछली तिमाही में अमेरिकियों ने करीब साढ़े चार परसेंट (4.4%) कम गाड़ियां और टीवी, फ्रिज खरीदे। दरअसल, अमेरिकियों की जेब में इतने पैसे ही नहीं बच रहे हैं कि वो, खर्च कर सकें। अमेरिकियों का फूड और एनर्जी का बिल बहुत बढ़ गया है। इसलिए खाने और आने-जाने पर खर्च के अलावा दूसरे खर्चों में अमेरिकियों को कटौती करनी पड़ी। मई महीने में गैसोलीन का एक गैलन 4 डॉलर महंगा हो गया। ये बढ़त पिछले तीन सालों में सबसे बड़ी है।
    2008 की मंदी के पहले तक दुनिया में भारी जेब और नौकरी के बूते सबसे खुशहाल दिखने वाले अमेरिकी बेरोजगार हो रहे हैं। जिस अमेरिका में माना ये जाता था कि जिसे नौकरी चाहिए उसे मिलेगी। यहां तक कि दुनिया तो, ये समझती थी कि अमेरिकी 6 महीने नौकरी करके 6 महीने मौज में बिताते हैं। अब वो अमेरिका बदल गया है। नौकरियां गायब हो रही हैं। जून में बेरोजगारी की दर चढ़कर करीब दस प्रतिशत पर पहुंच गई। 8 जुलाई को अमेरिकी लेबर डिपार्टमेंट के ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि जून महीने में सिर्फ 18000 लोगों को नौकरी मिली। उस पर निराशाजनक बात ये है कि बड़ी-बड़ी अमेरिकी कंपनियों ने छंटनी का प्लान तैयार कर रखा है। अमेरिका की दूसरी सबसे बड़ी दवा कंपनी मर्क एंड कंपनी 2015 तक करीब 13000 कर्मचारी घटाएगी। सिस्को 6,500 लोगों को बाहर करेगी। LMT ने 6500 कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवत्ति लेने का प्रस्ताव दिया है। गोल्डमैन भी एक हजार लोगों को निकालेगी।
    दुनिया में बढ़ती कमोडिटी कीमतों ने अमेरिकियों की कमर तोड़ दी है। दुनिया की सबसे बड़ी स्नैक-फूड बनाने वाली कंपनी पेप्सिको ने पहले ही कह दिया है कि इस साल मुनाफा पहले के अनुमान से कम होगा। वजह वही कि कमोडिटी की कीमतें बढ़ी हैं। और, कंज्यूमर की तरफ से कोई मांग नहीं है। कुल मिलाकर दुनिया के दादा का दम फूलता दिख रहा है। और, उसका बुरा असर दुनिया पर कुछ वैसे ही होता दिख रहा है जैसे, किसी बड़े जमींदार के दिवालिया होने की खबर से गांव में सुख चैन से दो जून की रोटी खाने वाले भी डर जाते हैं कि क्या होगा। भारत में भी निवेशकों को समझ में नहीं आ रहा कि वो क्या करें। अमेरिका की ये बदहाली विश्व अर्थव्यवस्था में अमेरिका, यूरोप की अगुवाई से एशिया की अगुवाई का मौका बनता दिख रहा है। लेकिन, मुश्किल यही है कि पिछले दो ढाई सालों में कुप्रबंधन की मिसाल बन चुकी हमारी सरकार क्या इसे मौके के तौर पर देखती है। क्योंकि, अर्थव्यवस्था में अगुवा सिर्फ बयानबाजी से नहीं बना जा सकता।

    Thursday, July 14, 2011

    एक बार थम क्यों नहीं जाता देश



    मीडिया मजबूरी में या ये कहें कि और करे भी तो, क्या। अब यही चलाना-दिखाना है कि मुंबई के जज्बे को सलाम। आखिरकार जिंदादिल मुंबई के लोगों ने आतंक को फिर से मात दे दी। कुछ 22 प्वाइंट की मामूली सेंसेक्स की बढ़त ने एक और हेडलाइन ये भी दे दी कि आतंक को शेयर बाजार का करारा जवाब। लेकिन, क्या सचमुच ऐसा हुआ है। क्या सच्चाई यही है कि मुंबई या फिर शेयर ने आतंक को करारा जवाब दिया है। देश में अगर कश्मीर के बाद कहीं के लोगों के सीने में सबसे ज्यादा आतंकी घाव पक रहा है तो, वो मुंबई शहर ही है। देश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले इस शहर की मजबूरी को लोगों खासकर हम मीडिया वालों ने जबरदस्ती बहादुरी बनाने की कोशिश बार-बार की है। और, इसे आतंक से लड़ने के लिए जरूरी सकारात्मक सोच साबित कर दिया है।


    11/7/2006 के ट्रेन धमाके हों या फिर 26/11/2008 के ताज और मुंबई के दूसरे अहम ठिकानों पर हुए आतंकी हमले हों। मीडिया में लाख ये बात साबित करने की कोशिश की जाए कि हमलों के तुरंत बाद मुंबई के जिंदादिल लोग उठ खड़े होते हैं। मुंबई कभी थमती नहीं, ये जज्बा दिखाते हैं। लेकिन, इन दोनों धमाकों के समय इन घटनाओं को नजदीक से महसूस करने और मुंबई के लोगों की हालत देखकर लगा कि ये मीडिया बार-बार तय तरीके से मुंबई के लोगों को अपने घाव का इलाज करने के बजाए उसे दबाने, घाव में मवाद बनने को मजबूर कर देता है। ये थोपी गई जिंदादिली ही है कि लोगों का गुस्सा बाहर आने पर एक सामूहिक सहमति की रोक हावी हो जाती है। 11/7 के सीरियल लोकल ट्रेन ब्लास्ट के काफी दिन बाद मैं लोकल से लोवर परेल स्टेशन से ठाणे जा रहा था। अचानक बीच के एक स्टेशन पर अफवाह फैली, ट्रेन में बम है। और, मीडिया में कभी थमती न दिखने वाले मुंबईकर ऐसे थमे कि 3 सेकेंड भी नहीं लगे होंगे और पूरी ट्रेन खाली हो गई। मैं खुद फुर्ती देखकर भी हैरान था कि इतनी तेजी से कैसे में लोकल के डिब्बे से स्टेशन पर आ गया।

    26/11 के हादसे के समय और उसके बाद भी मुंबई के लोगों की सांसें थमी की थमी रह गईं थीं। लेकिन, डर, आतंक की बात करना तो, देश में निराशा फैलाना वाला माना जाता। और, जब झूठे साहसी बनना हो तो, भला कोई क्यों पीछे रहता। लोगों को गुस्सा तक दिखाने की इजाजत नहीं थी। पता नहीं कैसे समाचार चैनलों और अखबारों में बिना कहे ये सहमति बन जाती है कि इस समय लोगों का गुस्सा मत दिखाइए, पॉजिटिव स्टोरी दिखाइए। जिसने घायल लोगों को धमाके के बीच से निकालकर अस्पताल पहुंचाया हो, उसे हीरो बना दीजिए। एक-दो कॉमनमैन यानी आम आदमी को हीरो बना-दिखाकर मीडिया लोगों का गुस्सा दबा देती है। लोग हीरोइक स्टोरी में फंस जाते हैं और आतंकवादी फिर से ढेर सारे आम आदमियों को मौत के घाट उतारने की तैयारी करने में लग जाते हैं। हमें ऐसा बना दिया गया है कि अब कुछ दिन ही लगता है किसी आतंकी हमले को भूलने में। मीडिया में बरसी की खबरों से भले याद आ जाए।

    गुस्सा बाहर न आने देने साजिश और लोगों की जिंदादिल बनाए रखने की साजिश ऐसी हावी होती है कि लोग मजबूरी में आंसू पीकर मुस्कुराने लगते हैं। फिर भावनात्मक कहानियां खोजी जाने लगती हैं। मोमबत्ती जलाए कुछ लोगों के शॉट्स दिखाकर ही आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की मजबूती मान ली जाती है। और, आतंकवाद के असली मुद्दे से लोगों का ध्यान ही भटक जाता है। कौन बताए-समझाए कि अरे, मजबूरी है भइया। इसलिए जिंदादिल नजर आते हैं। ऐसे जिंदादिल कि कांग्रेस के वही महासचिव राहुल गांधी जो, भट्टा-पारसौल में किसानों पर जमीन अधिग्रहण के मामले में मायावती सरकार के खिलाफ रात के अंधेरे में गांव में चुपचाप घुसकर लड़ाई का एलान कर देते हैं। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का एलान और उसके बाद कौन सी लड़ाई राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी ने लड़ी है। उस पर राहुल गांधी मुंबई हमलों पर बयान दे देते हैं कि एक-दो हमले रोके नहीं जा सकते। इराक-ईरान में तो, ऐसे हमे रोज होते रहते हैं। लेकिन, हम हिंदुस्तानियों पर तथाकथित जिंदादिली ऐसी हावी है कि हम राहुल गांधी के बयान पर भी गुस्सा नहीं होते। इस बात पर भी गुस्सा नहीं होते कि पूरी कांग्रेस पार्टी इस बयान को सही साबित करने में जुट जाती है।

    इस बात पर भी हम हिंदुस्तानी अपनी जिंदादिली का त्याग नहीं कर पाते। मीडिया ये चिल्लाने लगता है कि मुंबई में धमाके के बाद हो रही बारिश से सारे सबूत धुल जाने के अंदेशा है। पता नहीं हम ये याद क्यों नहीं कर पाते कि आखिर अब तक सारे सबूत मिलने के बाद भी क्यों नहीं एक भी आतंकी को उसके किए की सजा हम दे पाए। कसाब, अफजल गुरू जैसे लोग हमारी जेल में होते हुए भी हमारे खास मेहमान से बढ़कर हैं। आंकड़े आते रहते हैं कि कसाब पर हर रोज करीब एक करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं। स्पेशल कोर्ट, फास्ट ट्रैक कोर्ट ये सब आतंकियों को सजा सुनाकर फांसी के फंदे तक क्यों नहीं पहुंचा पातीं। जवाब साफ है क्योंकि, कांग्रेस के युवराज को लगता है कि ऐसे एक दो हमले तो रोके नहीं जा सकते। एक दिन मुकर्रर करके सरकार देश की सभी जेलों में बंद आतंकवादियों को एक साथ क्यों फांसी के फंदे पर लटकाती।

    लेकिन, ऐसा भला कैसे हो सकता है। मुंबई हमले के करीब 48 घंटे बाद आतंरिक सुरक्षा सचिव बयान दे देते हैं कि सभी आतंकी संगठनों पर साजिश का शक है। अब समझ लीजिए, किसी पर और कैसे कार्रवाई हो सकती है। फिर बात तो, वही है ना कि, जब ऊपर से संदेश आतंकवाद को राजनीतिक फायदे के रूप में इस्तेमाल करने का हो तो, कार्रवाई कौन और कैसे करेगा। खैर, इस सरकार का जो, अंदाज है वो, साफ कह रहा है कि हिंदुस्तानियों आदत डाल लो। मुंबईकरों आदत डाल लो। हम तुम्हारे न थमने वाले जज्बे की तारीफ करते रहेंगे। तुम अपने कुछ लोगों को खोकर, फिर से सुबह काम के लिए चल पड़ना। क्योंकि, मुंबई-दिल्ली में क्या उदारीकरण के बाद देश के किसी भी हिस्से में कितने भी बड़े हादसे के गम जो, रुक जाएगा-थम जाएगा। बगल वाला वैश्वीकरण वाले इंडिया में एक पायदान ऊपर चला जाएगा। काश एक बार आतंकवाद के दिए जख्म से मुंबई थम जाए, देश थम जाए तो, शायद इसका कुछ इलाज निकल सके। क्योंकि, अब तो देश के सबसे ताकतवर शख्स के तौर पर स्थापित राहुल गांधी भी ये साफ कह रहे हैं ऐसे हमले रोकने की क्षमता उनमें और उनकी सरकार में नहीं है।

    Tuesday, July 12, 2011

    सुस्त बाजार, गायब पब्लिक ऑफर


    इस साल शेयर बाजार की डांवाडोल रफ्तार बाजार के जरिए पैसा जुटाने की इच्छा रखने वाली नई कंपनियों पर भारी पड़ती दिख रही है। साल 2011 आधा बीत रहा है और अभी तक शेयर बाजार के प्राइमरी मार्केट में पैसा लगाने वालों के लिए ज्यादा विकल्प नहीं दिख रहे हैं। पिछले साल की तेजी के भरोसे इस साल कई कंपनियों ने अपना आईपीओ लाने का इरादा कर रखा था। लेकिन, प्राइमरी मार्केट में कंपनियां उतरने का साहस ही नहीं जुटा पा रही हैं। जनवरी से जून महीने की ही बात करें तो, 15 आईपीओ बाजार में उतरने थे लेकिन, समयसीमा खत्म होने के बाद भी वो, बाजार में नहीं आए। ये वो 15 आईपीओ यानी इनीशियल पब्लिक ऑफर थे जिन्हें, बाजार रेगुलेटर सेबी से मंजूरी मिल चुकी थी। एक बार समय सीमा खत्म होने का सीधा सा मतलब ये हुआ कि अब इनके पब्लिक ऑफर फिलहाल तो नहीं आ सकेंगे।

    जिन कंपनियों के आईपीओ सेबी से मंजूरी के बाद भी बाजार में नहीं आ सके। वो, कंपनियां हैं जिंदल पावर, रिलायंस इंफ्राटेल, गुजरात स्टेट पेट्रोलियम, स्टरलाइट एनर्जी, लोढ़ा डेवलपर्स, बीपीटीपी, एंबियंस, ग्लेनमार्क जेनेरिक्स, नेपच्यून डेवलपर्स, कुमार अर्बन डेवलपर्स और एएमआर कंसट्रक्शंस। इनमें से ज्यादातर कंपनियां या तो रियल एस्टेट सेक्टर की हैं या फिर पावर सेक्टर की। वैसे, इन कंपनियों के आईपीओ न आ पाने की बड़ी वजह ये है कि रियल एस्टेट सेक्टर के हालात अंदर से खराब हैं। ज्यादातर कंपनियों के प्रोजेक्ट देरी से चल रहे हैं और पिछले छे महीने में कीमतें भी स्थिर रही हैं। इसके अलावा पावर सेक्टर की कंपनियों के आईपीओ के लटकने की जो वजह बताई जा रही है वो, ये कि पावर सेक्टर की कंपनियों को निवेश पर मुनाफा कमाना मुश्किल हो गया।

    अब ये 15 आईपीओ बाजार से बाहर हो चुके हैं। अगर ये आईपीओ बाजार में आते तो, करीब 25 हजार करोड़ रुपए बाजार से जुटाते। लेकिन, फिलहाल आईपीओ बाजार में दिख रही सुस्ती से निवेशकों को सिर्फ सेकेंडरी बाजार के सहारे ही रहना पड़ रहा है। सेकेंडरी बाजार यानी वो, शेयर जो पहले से ही शेयर बाजार में लिस्टेड हैं। आईपीओ बाजार में कमजोरी की सबसे बड़ी वजह यही मानी जा रही है कि साल 2011 की पहली छमाही में एफआईआई निवेश की रफ्तार बहुत घटी है। इसकी वजह से सेंसेक्स जो, दिवाली पर 21000 का स्तर पार कर गया था। उसके बाद 18000-19000 के बीच में ही लटक रहा है।


    दरअसल पिछले साल के आखिर में जिस तरह से बाजार में तेजी आई थी। और, देश की तरक्की दस अंकों के नजदीक जाती दिख रही थी। उसने निवेशकों का सेंटिमेंट बेहद मजबूत कर दिया था। बाजार के कई तो, सेंसेक्स के इस साल जुलाई के महीने तक 25000 के नजदीक पहुंचने की भविष्यवाणियां भी करने लगे थे। लेकिन, एक के बाद एक घपले-घोटालों की सरकार के कारनामे जैसे-जैसे सामने आने लगे, धीरे-धीरे सारे सेंटिमेंट उल्टी दिशा में चल पड़े। महंगाई को 5-6 प्रतिशत के बीच में लाने का भरोसा बार-बार दिलाने वाली ये सरकार अब बात करने लगी है कि 7-8 प्रतिशत की महंगाई दर ही अभी की सही महंगाई दर है।

    इस सबने भारतीय बाजारों के सेंटिमेंट को बुरी तरह प्रभावित किया है। सेंसेक्स के दिग्गज रिलायंस के लिए एक के बाद एक उत्पादन से लेकर नीतियों में फेरबदल कराने तक की ऐसी खबरें आईं कि ये उबर ही नहीं पा रहा । यही वजह है कि कंपनियों नए आईपीओ बाजार में उतारने का साहस नहीं कर पा रही हैं। साल 2010 के आखिर में बाजार में आई शानदार तेजी के भरोसे आईपीओ में पैसा लगाकर निवेशकों ने जमकर मुनाफा कमाया। पिछले साल के आखिर में आए कोल इंडिया के आईपीओ ने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। और, कोल इंडिया ही क्यों, साल 2010 शेयर बाजार में आईपीओ मार्केट के लिए कितना खास रहा इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सिर्फ सरकारी कंपनियों के पब्लिक इश्यू में ही दस लाख से ज्यादा निवेशक शामिल हुए। हां, सबसे बड़ा धमाका रहा कोल इंडिया के काले सोने का।


    साल 2010 में शेयर बाजार के प्राइमरी मार्केट की सबसे बड़ी खबर बनी करीब पंद्रह हजार करोड़ रुपए का कोल इंडिया का आईपीओ। कोल इंडिया ने देश का सबसे बड़ा IPO बाजार में उतारा और निवेशकों ने इसे हाथों हाथ लिया। दिवाली के पहले आए इस IPO ने निवेशकों को मालामाल भी किया। कोल इंडिया के पब्लिक इश्यू में पैसा लगाने वाले निवेशकों को 60 प्रतिशत तक मुनाफा कमाने को मिला। कोल इंडिया का IPO निवेशकों के लिए काला सोना साबित हुआ। ये शेयर ऐसा चढ़ा कि इसने मार्केट कैपिटलाइजेशन में ओएनजीसी तक को पीट दिया। इसके बाद तो जो भी IPO आए निवेशकों ने उसे हाथों हाथ लिया। सिर्फ सरकारी कंपनियों के ही पब्लिक इश्यू के लिए दस लाख से ज्यादा निवेशक लाइन में लगे। कोल इंडिया (CIL) के अलावा पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन (PGCIL), और मैंगनीज ओर (MOIL) के IPO को अच्छा रिस्पॉन्स मिला।

    इसके अलावा साल 2010 में जितने IPO आए हैं वो, तेजी 3 साल के बाद दिखी है। 2007 में तेजी के दौर में 96 IPO आए थे लेकिन, जनवरी 2008 में शुरू हुई मंदी के असर से 2008 में 36 और 2009 में सिर्फ 21 कंपनियां ही बाजार में अपना IPO लाने की हिम्मत जुटा सकीं। 2010 में 72 IPO आए। यानी साल 2010 प्राइमरी मार्केट के लिए शानदार साबित हुआ है। लोगों को उम्मीद थी कि साल 2011 भी आईपीओ मार्केट के लिए धमाकेदार साबित होगा। लेकिन, आधा साल बीत जाने के बाद भी इस साल अब तक सिर्फ 24 आईपीओ ही बाजार में आए हैं। अब उम्मीद साल की अगली छमाही पर ही टिकी है। लेकिन, वो तेजी तभी आएगी जब महंगाई से राहत मिले और देश की तरक्की की रफ्तार फिर से तेज हो सके। साथ ही सबसे जरूरी ये कि देसी उद्योगपतियों को ये न लगे कि भारत से बेहतर मुनाफा भारत से बाहर पैसा लगाकर बनाया जा सकता है। ये सब हुआ तभी विदेशी निवेशक फिर से लौटेंगे और उनके भरोसे देसी निवेशक भी। इसलिए अभी प्राइमरी मार्केट में पैसा लगाने वाले निवेशकों के लिए सलाह यही है कि वो, सोच-समझकर ही किसी नई कंपनी में रकम लगाएं।


    कुल 25000 करोड़ रुपए के आईपीओ बाजार में नहीं आए


    2007 में 96 आईपीओ आए


    2008 में 36 आईपीओ आए


    2009 में सिर्फ 21 आईपीओ आए


    2010 में 72 आईपीओ आए


    2011 में अब तक सिर्फ 24 आईपीओ आए


    (ये लेख शुक्रवार पत्रिका में छपा है)

    Tuesday, July 05, 2011

    तरक्की की रफ्तार में महंगाई का बड़ा ब्रेकर


    आम आदमी को आम आदमी की सरकार ने एक बार फिर भरोसा दिया है। इस बार चुप रहने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अरसे बाद बोले हैं। और, बोले ये कि मार्च तक महंगाई के बढ़ने की दर छे-साढ़े छे प्रतिशत तक आ जाएगी। इससे ये तो साफ हो गया कि अगले नौ महीने तक 8-9 प्रतिशत की महंगाई दर बनी रहेगी, इसके लिए जनता से उन्होंने लगे हाथ अभयदान भी मांग लिया है। वैसे भी लोकतंत्र में जनता को अपनी सुनाने का मौका पांच साल बाद ही मिलता है। इसलिए मार्च में भी महंगाई दर छे- साढ़े छे प्रतिशत तक आएगी या नहीं ये तो, आगे की आर्थिक परिस्थितियां तय करेंगी। क्योंकि, पिछले दो साल से सरकार, यानी प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और उनकी आर्थिक सलाहकार मंडली दसियों बार आम जनता को ये भरोसा दिला चुकी है कि महंगाई दर बस अगले तीन महीने में छे- साढ़े छे प्रतिशत तक आ जाएगी। लेकिन, हुआ क्या- वही ढाक के तीन पात।


    महंगाई दर नौ प्रतिशत के आसपास ऐसी अंटकी है कि जरा सी नीचे उतरती है तो, सरकारी फैसला ही उसे ऊपर चढ़ने की ताकत दे देता है। दरअसल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी सलाहकार मंडली से उम्मीद थी कि ये देश की सबसे सुधारवादी सरकार चलाएंगे। और, देश की तरक्की की रफ्तार को तेजी से बढ़ाएंगे लेकिन, पिछले कुछ समय से सरकार जिस तरह से घपले-घोटालों में फंसी है उसमें सुधार पीछे छूट गए हैं। और, महंगाई-घोटालों के अलावा तरक्की का हर पैमाना छोटा होता जा रहा है।


    अभी का एक सरकारी फैसला जिसके बूते महंगाई दर तेज छलांग मारने की तैयारी में है वो, है डीजल, रसोई गैस और केरोसिन के दाम बढ़ाना। वैसे सरकार बार-बार ये कह रही है कि ये हमारी मजबूरी है। और, ये काफी हद तक सच भी है कि सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ाने का वो फैसला लेना पड़ा जो, उसके लिए गले की हड्डी साबित हो रहा है। घपले-घोटाले और महंगाई से पहले से ही बुरी तरह से मार खाई सरकार के लिए ये फैसला लेना आसान नहीं था। यहां तक कि इस फैसले के लिए होने वाली एम्पावर्ड ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स की बैठक कई-कई बार टाल दी गई। लेकिन, जब पानी गले तक आ गया तो, सरकार लगा कि ये फैसला लेना जरूरी है।

    सरकार जनता की भलाई के नाम पर दी जाने वाली तेल कंपनियों की सब्सिडी को खत्म करने का मन तो, यूपीए के पहले कार्यकाल में ही बना चुकी थी। इसीलिए वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने बजट में ही साफ कर दिया था कि पेट्रोलियम उत्पादों पर धीरे-धीरे सब्सिडी खत्म की जाएगी। 2009-10 के मुकाबले 2010-11 में सरकार ने तेल कंपनियों को दी जाने वाली सब्सिडी करीब-करीब आधी कर दी। और, इस वजह से सरकार ने 25 जून 2010 को बाजार के हवाले करने के बाद से पेट्रोल करीब 25 परसेंट महंगा करने की इजाजत तेल मार्केटिंग कंपनियों को दे दी। लेकिन, आम आदमी का होने का दावा करने वाली यूपीए सरकार ने खुद भी ये नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी डीजल, रसोई गैस और केरोसिन जैसी आम आदमी के जरूरत वाले पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत उन्हें बढ़ानी पड़ जाएगी।

    लेकिन, सरकारी खजाने पर जब करीब पौने दो लाख करोड़ रुपए का अंडररिकवरी का बोझ वित्तीय घाटे को बढ़ाने लगा तो, सरकार के लिए ये मजबूरी बन गई। वैसे इसी सरकार ने आर्थिक मजबूरियों पर बार-बार राजनीतिक मजबूरियों को तवज्जो दी है। इस साल जनवरी से मार्च के बीच जब कच्चे तेल के भाव 110 से 115 डॉलर प्रति बैरल की खतरनाक ऊंचाई पर पहुंच गए थे तो, भी सरकार ने राजनीतिक मजबूरियों के ही चलते पेट्रोलियम उत्पादों के दाम नहीं बढ़ाए। क्योंकि, बंगाल और केरल से लेफ्ट के सफाए का मौका कांग्रेस छोड़ना नहीं चाहती थी। यही वो, तीन महीने थे जब तेल कंपनियों का घाटा करीब 50000 करोड़ रुपए बढ़ गया था।

    और, अब फैसला तब लिया गया जब कच्चे तेल के भाव घटकर 90-95 डॉलर प्रति बैरल के बीच आ गए। लेकिन, पहले का घाटा सुरसा के मुंह की तरह फैला हुआ था। अब डीजल की कीमते बढ़ने के बाद तेल मार्केटिंग कंपनियों का नुकसान 21000 करोड़ रुपए कम होगा। लेकिन, अभी भी सालान 1.20 लाख करोड़ रुपए का नुकसान बना रहेगा। अब एक लीटर डीजल पर तेल कंपनियों का नुकसान घटकर 6.40 रुपए रह गया है।

    विपक्षी पार्टियों के पास आम जनता का गुस्सा भड़काने के ज्यादा तर्क न मिलें इसलिए सरकार ने इस बार ड्यूटी भी काफी घटाई है। डीजल पर लगाने वाली एक्साइज ड्यूटी अब 2 रुपए लीटर रह गई है। जबकि, अब तक ये ड्यूटी 4.60 रुपए प्रति लीटर थी। इससे सरकारी खजाने पर इसी वित्तीय वर्ष में 23000 करोड़ रुपए की चोट लगेगी। सरकार ने कस्टम ड्यूटी भी 5 परसेंट घटाई है। इसका मतलब ये हुआ कि कच्चे तेल पर अब कोई कस्टम ड्यूटी नहीं लगेगी और डीजल पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी 7.5 परसेंट से घटकर सिर्फ 2.5 परसेंट रह गई है। और, इससे सरकार खजाने से सीधे-सीधे 26000 करोड़ रुपए गायब हो जाएंगे। कुल मिलाकर इस बार ड्यूटी में हुई कटौती से सरकार को वित्तीय वर्ष 2012 में करीब 50 हजार करोड़ रुपए का नुकसान होने वाला है

    लेकिन, एक जो सबसे बड़ी बात हुई है कि इस ड्यूटी कटौती के बाद अब पेट्रोल का जो, आज का भाव है इस पर तेल मार्केटिंग कंपनियों को होने वाला नुकसान खत्म हो गया है। यानी अब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अगर इसी स्तर पर बनी रहीं तो, पेट्रोल पर इन कंपनियों को कोई नुकसान नहीं होगा। दरअसल अर्थशास्त्रियों की सरकार होने के बावजूद आर्थिक मोर्चे पर सरकार की जो, दुर्गति हुई है। सरकार अब इस बार के फैसले से ये कलंक घोना चाहती है।

    लेकिन, ये कलंक धुल पाएगा। इसमें संदेह दिख रहा है। क्योंकि, डीजल के एक रुपया महंगा होने का मतलब है कि महंगाई दर 0.14 प्रतिशत बढ़ जाएगी। तीन रुपए डीजल महंगा होने का मतलब हुआ कि करीब आधा परसेंट महंगाई दर में तेजी। इसके अलावा रसोई गैस और केरोसिन की महंगाई भी असर करेगी। बिना डीजल, रसोई गैस और केरोसिन की कीमत बढ़े ही पिछले तीन साल में महंगाई ने इस सरकार के आम आदमी की जेब से करीब छे लाख करोड़ रुपए निकाल लिए हैं। क्रिसिल की रिपोर्ट बता रही है कि महंगाई की वजह से 2008 में 45,000 करोड़ रुपए, 2009 में 1,60,000 करोड़ रुपए और 2010 में 3,70,000 करोड़ रुपए का चूना जनता को लग चुका है। यानी तीन साल में 5,80,000 करोड़ रुपए का चूना।


    ये चूना कैसे लगा इसे कुछ उदाहरण से समझा जा सकता है। यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के एक साल में पेट्रोल 25 रुपए महंगा हो गया। दूध 8 रुपए महंगा हो गया। स्कूल फीस करीब 20 प्रतिशत बढ़ गई। इंजीनियरिंग, मेडिकल की कोचिंग फीस सवा लाख से डेढ़ लाख रुपए तक महंगी हो गई। दवाएं भी 17 प्रतिशत महंगी हुईं। कपड़े भी 10-15 प्रतिशत महंगे हो गए। ये कुछ उदाहरण भर हैं। सच्चाई ये है कि इस साल भर में सबकुछ महंगाई हुआ है।

    और, इस सबका बुरा असर ये कि भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी से उतरती दिख रही है। साल भर पहले दस परसेंट की तरक्की की रफ्तार पर पहुंची भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार पांचवीं तिमाही तक आते-आते आठ परसेंट से भी कम रह गई। दरअसल, पिछले कुछ समय से सरकार जिस तरह से व्यवहार कर रही है वो, देश के भीतर और बाहर उद्योगों और निवेश को लुभाने में नाकामयाब रहा है। एक समय में सबसे सुधारवादी सरकार चलाने का तमगा रखने वाले मनमोहन सिंह के समय में महंगाई बढ़ती जा रही है, विदेशी निवेश घटता जा रहा है और तरक्की की रफ्तार उल्टे पांव लौट रही है।

    हालांकि, इस वित्तीय वर्ष में भी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत आठ परसेंट से ज्यादा की रफ्तार से बढ़ती दिख रही है। जो, चीन के बाद दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा है। लेकिन, उद्योगों से संकेत अच्छे नहीं आ रहे हैं। औद्योगिक उत्पादन के बढ़ने की रफ्तार 7.3 परसेंट से घटकर 6.3 परसेंट रह गई है। महंगाई 9 परसेंट के ऊपर बनी हुई है। 2010-11 में विदेशी निवेश पहले के साल से 28.5 परसेंट घटा है। और, इस सबका बुरा असर बाजार पर तो दिखना ही था। दीवाली पर इक्कीस हजार पार कर चुका सेंसेक्स अठारह हजार के आसपास ही अंटका हुआ है। यानी करीब 14 परसेंट की गिरावट। मंदी से उबरने में हमने दुनिया के दूसरे देशों से तेजी दिखाई तो, लगा कि चलो तेज तरक्की सब भरपाई कर देगी। लेकिन, अब तरक्की की रफ्तार के रास्ते में महंगाई का ऐसा बड़ा ब्रेकर बनता दिख रहा है। जहां रफ्तार बेहद धीमी होनी ही है। और, सरकार लाख तर्क-कुतर्क करे सच्चाई यही है कि ढेर सारे अर्थशास्त्रियों से भरी इस सरकार के कुप्रबंधन के कारण ये हालात हुए हैं। इसमें मांग-आपूर्ति जैसे अर्थशास्त्र के स्थापित नियमों का कोई दोष नहीं है।
    (ये लेख शुक्रवार पत्रिका में छपा है)

    Thursday, June 23, 2011

    जनता के पसीने की कमाई, निजी कंपनियों को मलाई



    भ्रष्टाचार के एक और बड़े मुद्दे ने लेफ्ट-राइट को एक साथ ला खड़ा किया है। निजी तेल कंपनियों को फायदा पहुंचाने की सरकारी कोशिशों की जिक्र सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में आने के बाद विपक्ष हमलावर हो गया है। हालांकि, सरकार इस मामले को हल्का करने की कोशिश कर रही है और इस मामले पर पत्रकारों को सही रिपोर्टिंग की सलाह दे रही है। और, ये समझाने की कोशिश कर रही है कि सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट आखिरी पड़ताल नहीं है। लेकिन, इसने विपक्ष को तगड़ा मुद्दा दे दिया है। मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने सरकार पर हमला बोल दिया कि सरकार ने राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करके निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाया है। पिछले शुक्रवार को सीएजी रिपोर्ट में रिलायंस और दूसरी निजी कंपनियों को फायदे के आरोप पर बीजेपी और लेफ्ट ने एक साथ हमला बोला।


    बीजेपी की तरफ से वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी थे तो, लेफ्ट की तरफ से सीताराम येचुरी। जोशी और येचुरी दोनों ने ही साफ कहा कि इसकी जांच होनी जरूरी है। जोशी ने सवाल उठाया है कि आखिर तेल रिपोर्ट लीक कैसे हो गई। जोशी ने ये भी सवाल खड़ा किया है कि कोई भी रिपोर्ट बिना संसद में पेश हुए कैसे कहीं पब्लिश की जा सकती है। पहले से ही भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जूझ रही सरकार के लिए निजी कंपनियों को तेल के खेल में फायदा पहुंचाने का आरोप और भारी पड़ता दिख रहा है। और, सबसे बड़ी बात ये है कि इस मुद्दे पर लेफ्ट-राइट दोनों साथ हैं। इससे इस मामले की सीबीआई जांच होनी तय दिख रही है। सीताराम येचुरी ने आरोप लगाया कि सरकार देश के प्राकृतिक संसाधनों को निजी कंपनियों को गलत इस्तेमाल के लिए सौंप चुकी है और इसकी जांच होनी जरूरी है।


    देश उद्योगपति चलाते हैं ये बात अकसर आम लोगों की चर्चा में आती रहती है। लेकिन, उद्योगपति देश चलाने में किस कदर हावी हो रहे हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कि अब निजी कंपनियों की कमाई बढ़ाने के लिए खुद सरकार और सरकारी हितों की चिंता के लिए बनाए गए विभाग निजी कंपनियों के पक्ष में बनी-बनाई नीतियों की ऐसी-तैसी करने से नहीं चूक रहे हैं। ताजा मामला तेल की खोज के बहाने राष्ट्रीय हितों को पूरा करने का दावा करने वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज और केयर्न को नियमों की अनदेखी करके फायदा पहुंचाने का है।

    देश की सर्वोच्च ऑडिट संस्था सीएजी की ताजा रिपोर्ट में जो निकलकर आ रहा है वो, चौंकाने वाला है। रिपोर्ट साफ कह रही है कि रिलायंस ने केजी यानी कृष्णा गोदावरी बेसिन में जो, खोज की है उसके लिए उसने सरकार से वो रकम भी वसूल ली है जो, रकम खर्च ही नहीं हुई थी। रिलायंस को उसके ऑफशोर पेट्रोलियम उत्पाद की खोज में लगे पेट्रो उत्पाद की खोज के लिए रकम भी ज्यादा दी गई। सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2007-08 में आंध्र प्रदेश के कृष्णा गोदावरी बेसिन में ऑपरेशंस के लिए रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अपनी सहयोगी कंपनी से ही ऊंची कीमत पर डीजल खरीदा और सरकार से 745 मिलियन डॉलर यानी करीब साढ़े तीन हजार करोड रुपए की रिकवरी का दावा पेश कर दिया। जबकि, रिलायंस ने ये रकम खर्च ही नहीं की थी।

    रिलायंस ने कमाल का तेल का खेल किया है। सीएजी की रिपोर्ट में साफ नजर आ रहा है कि किस तरह से कंपनी ने अपनी ही सहयोगी कंपनी को ऑपरेशंस के लिए डीजल की बोली सौंप दी। 2006 में के जी बेसिन में तेल कुओं की खोज के लिए बोली लगी तो, रिलायंस की सहयोगी रिलायंस पेट्रोल मार्केटिंग लिमिटेड ने 25457 रुपए प्रति किलोलीटर की बोली लगाई। जबकि, इंडियन ऑयल ने उससे कम 23,054 रुपए प्रति किलोलीटर की बोली लगाई। लेकिन, रिलायंस ने सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल की कीमत में ही एक्साइज ड्यूटी और दूसरे टैक्स जोड़ दिए जिससे इंडियन ऑयल की बोली महंगी हो गई और रिलायंस ने अपनी ही सहयोगी कंपनी रिलायंस पेट्रो मार्केटिंग लिमिटेड को 25457 रुपए प्रति किलोलीटर पर 4000 किलोलीटर का ऑर्डर कर दिया। जबकि, सीएजी की राय साफ है कि एनईएलपी यानी न्यू एक्सप्लोरेशन लाइसेंसिंग पॉलिसी के तहत यहां एक्सपोर्ट ड्यूटी लगनी ही नहीं थी।

    इतना ही नहीं के जी बेसिन के लिए 2008 में एक और बोली मंगाई। जिसमें सरकारी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और भारत पेट्रोलियम ने 23463 रुपए प्रति किलोलीटर की बोली लगाई। रिलायंस ने इन कंपनियों को इसी आधार पर एक मार्च 2008 को पांच-पांच हजार किलोलीटर की सप्लाई का ऑर्डर दे दिया। लेकिन, ये दोनों कंपनियां सप्लाई करतीं इससे पहले ही 4 मार्च 2008 को ऑपरेटर रिलायंस इंडस्ट्रीज ने एक इंटर्नल नोट जारी करके कहा कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और डीजल की कमी के कारण सरकारी तेल कंपनियां डीजल की सप्लाई करने की हालत में नहीं हैं। और, इसी आधार पर रिलायंस ने तीन दिन बाद ही फिर से अपनी सहयोगी रिलायंस पेट्रोल मार्केटिंग लिमिटेड को 31,601 रुपए प्रति किलोलीटर के भाव पर 3600 किलोलीटर की सप्लाई का ऑर्डर दे दिया। ये सीधे-सीधे इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम के भाव से 8137 रुपए प्रति किलोलीटर ज्यादा था। हालांकि, रिलायंस ने मीडिया में बयान जारी किया है कि उसे अभी तक सीएजी की रिपोर्ट नहीं मिली है। और, वो एक जिम्मेदार ऑपरेटर की तरह पीएससी यानी प्रोडक्ट शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट के नियमों से बंधी है। रिलायंस गुजरात के जामनगर में 330 लाख टन क्षमता वाली रिफाइनरी चलाती है। इसमें एक एक्सपोर्ट यूनिट भी शामिल है। खैर, रिलायंस लाख सफाई दे और सरकार इस गड़बड़झाले को दबाने की कोशिश करे। लेकिन, मीडिया में इस घोटाले की खबर खबर आने के बाद से रिलायंस के शेयरों में जोरदार गिरावट देखने को मिली है। हफ्ते के पांचों कारोबारी दिन लगातार रिलायंस के शेयरों में गिरावट देखने को मिली है। शुक्रवार को बाजार बंद हुआ तो, रिलायंस का शेयर 52 हफ्ते के निचले स्तर पर लुढ़क गया और 868 रुपए के भाव पर चला गया।

    सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में रिलायंस को नियमों से बाहर जाकर सरकारी संरक्षण मिलने की लंबी लिस्ट है। इसमें कहा गया है कि रिलायंस को तीन बार से ज्यादा अपना कैपिटल एक्सपेंडिचर बढ़ाने की इजाजत दी गई। इसकी वजह से के जी तेल-गैस क्षेत्र में रिलायंस का कैपिटल एक्सपेंडिचर बारह हजार करोड़ रुपए से बढ़कर पैंतालीस हजार करोड़ रुपए हो गया। इस दौरान रिलायंस ने इस फील्ड के उत्पादन का अनुमान बढ़ाकर करीब दोगुना कर दिया। हालांकि, के जी बेसिन में डी 6 ब्लॉक में रिलायंस के उत्पादन अनुमान पर बार-बार संदेह किया जा रहा है।

    सीएजी की रिपोर्ट में जो बात सामने आ रही है उसके मुताबिक, तेल और गैस उत्पादन पर निगाह रखने वाले नियंत्रक डीजीएच यानी डायरेक्टर जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन ने सरकारी हितों की रक्षा करने के बजाए निजी तेल-गैस खोजने वाली कंपनियों को फायदा पहुंचाया है। रिपोर्ट बता रही है कि कम से कम तीन निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों की अनदेखी की गई है या फिर नियमों को बदला गया है। जाहिर है, सरकारी गड़बड़ियों की मिसाल सिर्फ रिलायंस के ही हक में नहीं है। सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में जिन तीन निजी कंपनियों की बात की गई है वो, हैं रिलायंस इंडस्ट्रीज, केयर्न और ब्रिटिश गैस। कहा जा रहा है कि इन कंपनियों को मंत्रालय और डीजीएच की तरफ से नियमों में ऐसी ढील दी गई जिससे सरकारी नुकसान हुआ और इन कंपनियों को फायदा पहुंचा है।

    रिलायंस के अलावा केयर्न इंडस्ट्रीज को भी सरकार की तरफ से फायदा पहुंचाया गया है। सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में आरोप है कि राजस्थान के बाड़मेर में केयर्न को कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों से हटके फायदा पहुंचाने का आरोप लगा है। केयर्न बाड़मेर में देश का सबसे बड़ा ऑनलैंड ऑयलफील्ड ऑपरेट कर रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि तेल मंत्रालय और तेल और गैस खोजने वाली कंपनियों को नियंत्रित करने के लिए बनी सरकारी संस्था डायरेक्टरेट जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन्स ने नियमों की जमकर अनदेखी की है। सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि केयर्न को कॉन्ट्रैक्ट में तय 11108 वर्ग किलोमीटर के अलावा 1708 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र दिया गया जो, पूरी तरह से शर्तों को उल्लंघन है। सीएजी की रिपोर्ट में ये बात भी सामने आई है कि तेल मंत्रालय और डीजीएच ने पिछले दरवाजे से निजी तेल कंपनियों को कई तरह से फायदा पहुंचाया। इसके अलावा रिलायंस इंडस्ट्रीज, बीजी यानी ब्रिटिश गैस और सरकारी तेल कंपनी ओएनजीसी के ज्वाइंट वेंचर वाले पन्ना मुक्ता और ताप्ती ग्रुप की गैस फील्ड पर भी सीएजी रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं।

    अब मीडिया में मामला आने के बाद और विपक्ष के हमलावर होने के बाद हो सकता है कि सरकार इसमें कुछ कार्रवाई करे। लेकिन, लगातार एक के बाद एक भ्रष्टाचार के मामले जिस तरह से सामने आ रहे हैं। और, उन मामलों पर सरकार बलि का बकरा खोजकर ही कार्रवाई की इतश्री कर ले रही है। उससे अंदेशा है कि इस मामले में भी कुछ डीजीएच और तेल मंत्रालय के अधिकारियों पर कार्रवाई कर कहीं लीपापोती न कर दी जाए। जिसकी शुरुआत सरकारी बयानों के जरिये हो भी चुकी है।
    (ये लेख शुक्रवार पत्रिका में छपा है)

    Tuesday, April 12, 2011

    खून में घुस गया है भ्रष्टाचार

    अन्ना के आंदोलन को कितना बड़ा समर्थन मिल रहा है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बाजार को ये मजबूरी में अपने से जोड़ना पड़ रहा है। आज डिशटीवी रीचार्ज में गड़बड़ी पर फोन किया तो, डिश टीवी की प्रतिनिधि ने पहले अन्ना के सफल आंदोलन पर बधाई दी। फिर मैंने जब पता किया तो, पता चला कि 24 घंटे पहले जिस दुकान से डिश टीवी रीचार्ज कराया था। उसने पैसे ही नहीं जमा कराए। अन्ना के आंदोलन से मेरी भी उम्मीद जगी है। लेकिन, इन लोगों का क्या कर सकते हैं।



    उसके बाद मैं वसुंधरा से इंदिरापुरम की उस दुकान पर गया। तो, दुकान मंगलवार की वजह से बंद थी। बोर्ड से देखकर फोन किया तो, उसने कहा अभी मैं डिशटीवी वालों को हड़काता हूं। फिर बोला कि अच्छा 5 मिनट में फोन करिए तो, बताता हूं। 5 मिनट बाद फोन करने पर उको जब मैंने अपने वीसी नंबर बताया तो, उसने साफ कहा कि इस नंबर का रीचार्ज तो उसने कल किया ही नहीं। फिर जब मैंने उसे हड़काया और न चाहते हुए भी मीडिया में होने और शिकायत की धमकी दी तो, उसी अंदाज में वो बोला कि हमारे लिए सब ग्राहक एक जैसे हैं।लेकिन, उसकी आवाज थोड़ी नरम हो गई थी। और उसने कहा 5 मिनट में बताता हूं। 5 मिनट बाद उसने मेरे पैसे जमा कराए और फिर फोन किया। ट्रांजैक्शन नंबर बताया। मैंने उसे हिदायत देकर फोन रखा। लेकिन भ्रष्टाचार की कहानी अभी बाकी थी। कस्टमर केयर से पता चला कि 250 में से उसने 248 का ही रीचार्ज कराया। मैंने कस्टमर केयर से पूछा क्या ये सही है तो, उसने कहा है तो, गलत लेकिन, 20 रुपए से कम की शिकायत हम दर्ज नहीं कर सकते। हमने भी 2 रुपए के दुकानदार के भ्रष्टाचार को बर्दाश्त किया मजबूरी में।



    अन्नांदोलन का घोर समर्थक होने पर भी कुछ कर नहीं सका। क्योंकि, इस भ्रष्टाचार से निपटने के लिए समय और मानसिक शांति खोने की स्थिति में मैं नहीं हूं। फिर भी उम्मीद करता हूं कि अन्नांदोलन की आग भ्रष्टाचार पर पर कुछ प्रहार तो करेगी ही।

    Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

     Harsh Vardhan Tripathi हर्ष वर्धन त्रिपाठी #Bangladesh में @trahmanbnp प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। @PMOIndia @narendramodi ने उन्हें बध...