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Monday, September 30, 2013

हे राजन ये तुमने क्या किया !



स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के चेयरमैन प्रतीप चौधरी की मानें तो १५ जुलाई को जो फैसला उन्हें लेना था वो उन्होंने १५ सितंबर के बाद किया। यानी पूरे दो महीने इंतजार करने के बाद देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक ने ब्याज दरें बढ़ा दीं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर प्रतीप चौधरी किस बात का इंतजार कर रहे थे। हमारी समझ ये कहती है कि प्रतीप चौधरी को इंतजार था कि डी सुब्बाराव के जाने के बाद नया गवर्नर जो आएगा वो शायद रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के फोकस का एजेंडा बदलेगा। क्योंकि, जो बातें नॉर्थ ब्लॉक के गलियारों में चर्चा में थीं वो ये कि वित्त मंत्री पी चिदंबरम ग्रोथ पर फोकस करना चाहते हैं जबकि, रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव सरकार के इशारे के बाद भी ब्याज दरों में कटौती करने या कटौती करने के संकेत देने तक को तैयार नहीं हैं। ये लगभग तय था कि जब चार सितंबर को डी सुब्बाराव की गवर्नर पद से विदाई होगी तो, कोई ऐसा व्यक्ति ही पद संभालेगा जो वित्त मंत्रालय के सुर के साथ ताल मिला सके। यानी ब्याज दरें कम करके तरक्की की रफ्तार बढ़ाने पर फोकस कर सके। क्योंकि, चुनावी साल में महंगाई को फोकस बताने वाला रिजर्व बैंक अभी की सरकार की संभावनाओं को धूमिल करेगा। इसीलिए अनुमानों के मुताबिक पहले से ही सरकार के सुर के साथ ताल मिलाने का अभ्यास कर चुके रघुराम राजन को रिजर्व बैंक का काम सौंपा गया।

प्रभावशाली, सुदर्शन व्यक्तित्व के स्वामी रघुराम राजन ने डी सुब्बाराव की जगह ली तो सबको लगा कि अब सब ठीक हो जाएगा। काफी हद तक ठीक भी हुआ। चार सितंबर को रघुराम राजन ने दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक के वित्त मंत्रालय के सलाहकार वाला पद छोड़कर मुंबई के रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर का पद क्या संभाला कमजोर हुआ रुपया भी ताल ठोंकने लगा। दे दनादन बाजार में भी तेजी के सारे संकेत मिलने लगे। अठारह हजार के आसपास लहरा रहा सेंसेक्स तेजी से बीस हजार के पार चला गया। लग रहा था कि रुपया सत्तर के पार अब गया कि तब गया लेकिन रघुराम राजन के साथ से रुपये ने तेजी से मजबूती हासिल की और डॉलर के मुकाबले करीब दस रुपये तक चढ़ गया। रुपये की लीकेज यानी जहां जहां डॉलर लेने के लिए रुपया देने वाली स्थितियां थीं उनको कम करने की कोशिश की और काफी हद तक सफल भी रहे। लगे हाथ अंतर्राष्ट्रीय बाजार से भी अच्छी खबरें आने लगीं। रुपया मजबूत हो रहा था और कच्चा तेल भी धीरे-धीरे पटरी पर आ रहा था। रघुराम राजन के गवर्नर का पद संभालने के ठीक एक दिन पहले जो कच्चा तेल एक सौ बारह डॉलर प्रति बैरल के ऊपर था वो एक सौ सात डॉलर प्रति बैरल तक आ गया। लेकिन, दबे छिपे एक गड़बड़ हो रही थी। वो गड़बड़ ये थी कि बैंकों के कर्ज धीरे से महंगे हो रहे थे। एक सुबह मुझे भी झटका लगा जब मेरे बीस साल यानी दो सौ चालीस महीने के कर्ज की सीमा मेरे निजी बैंक ने बढ़ाकर दो सौ पचपन महीने यानी इक्कीस साल से ज्यादा कर दी। असल खतरा यही था। और सरकार की सामाजिक वोट बैंक की जरूरत पूरी करने के लिए निजी बैंक भला क्यों इंतजार करते। लेकिन, सरकारी बैंक के नाम में ही सरकार है तो वो इंतजार कर रहे थे। यही वो इंतजार था जो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के प्रमुख प्रतीप चौधरी कर रहे थे। उनको लग रहा था कि बीस सितंबर की रिजर्व बैंक की क्रेडिट पॉलिसी में कम से कम चौथाई प्रतिशत की कमी तो होगी ही। लेकिन, रघुराम राजन की नीति से शॉर्ट टर्म में रुपया बाजार भले खुश हुआ। राजन का इरादा लंबे समय के लिए कर्ज लेने वाले भारतीयों को खुश करने का कतई नहीं थी। इसीलिए राजन ने जब ये संकेत दिए कि कड़वी दवा भी पीनी पड़ेगी तो मिडटर्म रिव्यू के ठीक एक दिन पहले ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने ब्याज दरें बढ़ा दीं। निजी बैंक तो पहले ही ये काम कर चुके थे। यानी महंगे कर्ज का दौर अभी लंबा चलेगा इसके लिए भारतीयों को तैयार रहना होगा।

महंगाई का दौर जारी रहेगा। इसके लिए सिर्फ बैंकों का कर्ज जिम्मेदार नहीं है। हमारी-आपकी हर तरह की महंगाई बढ़ रही है। खाना सबसे महंगा हो रहा है। अगस्त महीने के महंगाई दर के जो आंकड़े आए हैं उनसे ये संकेत मिल रहे हैं कि महंगाई कम नहीं होने वाली। ये आंकड़े थोक महंगाई दर के हैं। हालांकि, आंकड़ों में ये 5.79% से बढ़कर 6.10% ही हुए हैं। लेकिन, खतरनाक बात इसमें जो छिपी थी वो ये कि महंगाई दर को करीब दशमलव दो प्रतिशत बढ़ाने में खाने-पीने के सामानों की बड़ी अहम भूमिका है। वैसे तो समय-समय पर सरकार की नीति से खाने-पीने के सामान की महंगाई बढ़ती रहती है। लेकिन, पहले की तरह इस बार भी तगड़ा मोर्चा प्याज ने संभाला है। प्याज ने किचन का बजट पीटकर पटरा कर दिया है। प्याज कीमतें 250 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ीं थीं। प्याज की कीमतें बढ़ी हैं ये खबरें मीडिया में आने के तुरंत बाद ही बिचौलयों ने मोर्चा संभाल लिया। नासिक से लेकर दिल्ली तक हर जगह प्याज की कमी थी। और कमी की खबरों के साथ तेजी से बढ़ रही प्याज की कीमतों की भी खबर थी। इसने साहसी रघुराम राजन के सारे साहस की हवा निकाल दी। महंगाई से तरक्की पर फोकस ले जाने की बात करने वाले रघुराम राजन भी महंगाई को बैंक की प्राथमिकता में ले आए। प्याज की हॉरर स्टोरी ने उनके अर्थशास्त्र के सारे सिद्धांतों को ध्वस्त कर दिया। राजन सुब्बाराव वाले सुर में आ गए। विकास की जगह महंगाई रिजर्व बैंक के एंजेडे में आने से हम महंगाई के दुष्चक्र में फंसे रहेंगे।  क्योंकि, अगस्त के भाव सितंबर में भी भाव बढ़ा चुके हैं। सितंबर की भी महंगाई दर अब घटेगी नहीं। फिर त्यौहारों के सीजन में तो हम भारतीय कर्ज लेकर भी मस्त रहते हैं। रघुराम राजन के पास अच्छा मौका था। रुपया काबू में था। बाजार भरोसे में दिख रहा था। जिनकी छींक से हमारे बाजार को निमोनिया हो जाता है वो, अमेरिकी फेडरल रिजर्व भी अच्छी बातें कर गया था। सेंसेक्स इक्कीस हजार की दिशा में जा रहा था। लेकिन, रघुराम राजन ने इस अच्छे मौके को बेकार कर दिया। दो हजार अंकों से ज्यादा चढ़े सेंसेक्स ने फिर उल्टी दिशा पकड़ ली है। रघुराम राजन का पहला दिन जितना एतिहासिक इस मामले में रहा कि तेजी से सब सुधरता दिख रहा है। रघुराम राजन की पहली मौद्रिक नीति का एलानठीक इसके उलट दिशा में जा रहा है कि अभी सब बिगड़ा ही रहेगा। वैसे भी पॉलिसी ही कह रही है कि महंगाई अनुमान से ज्यादा ही रहेगा। अब सारा कुछ दारोमदार इस साल की दूसरी छमाही में बुनियादी परियोजनाओं को कितनी तेजी मिली इस पर निर्भर होगा। लेकिन रघुराम राजन के रेपो रेट बढ़ाने के फैसले पर देश यही कह रहा है कि हे राजन ये तुमने क्या किया।


Tuesday, September 17, 2013

प्याज पत्रकारिता !


महंगाई देश की तरक्की की रफ्तार में सबसे बड़ा ब्रेकर है। ये सबको पता है फिर भी महंगाई बढ़ रही है। वैसे महंगाई के बढ़ने की असल वजह ज्यादातर बिचौलिए ही होते है। वैसे हम कह सकते हैं कि इस देश की ज्यादा जरूरत वाली आबादी के लिए तो सरकार खाद्य सुरक्षा बिल लेकर आई है। फिर चिंता किस बात की। लेकिन, ऐसे लोगों के बारे में सरकार शायद नहीं जानती कि खाली पेट और भूख लगती है। अब भूख लगती है तो लगती रहे। अगस्त महीने के महंगाई दर के जो आंकड़े आए हैं उनसे ये संकेत मिल रहे हैं कि महंगाई कम नहीं होने वाली। ये आंकड़े थोक महंगाई दर के हैं। हालांकि, आंकड़ों में ये 5.79% से बढ़कर 6.10% ही हुए हैं। लेकिन, खतरनाक बात इसमें जो छिपी थी वो ये कि महंगाई दर को करीब दशमलव दो प्रतिशत बढ़ाने में खाने-पीने के सामानों की बड़ी अहम भूमिका है। वैसे तो समय-समय पर सरकार की नीति से खाने-पीने के सामान की महंगाई बढ़ती रहती है। लेकिन, पहले की तरह इस बार भी तगड़ा मोर्चा प्याज ने संभाला है। प्याज ने किचन का बजट पीटकर पटरा कर दिया है। प्याज कीमतें 250 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ीं थीं। प्याज की कीमतें बढ़ी हैं इसमें कोई बहस नहीं है और इसकी खबरें भी मीडिया में आनी ही चाहिए। लेकिन, ये खबर जिस तरह से परोसी जा रही है वो खतरनाक है। प्याज किचन में काटते वक्त आंसू रुलाता है इसलिए टीवी चैनलों की खबर में जब प्याज और वो भी खूब महंगा प्याज आता है तो जाहिर है खबर देखने वालों की आंख से आंसू निकलेंगे ही। सोमवार को थोक महंगाई दर के आंकड़े क्या आए। मंगलवार के लिए टीवी चैनलों पर खबरों का प्राथमिक एजेंडा तय हो गया। प्याज। आंसू निकालने वाला प्याज। इसके बाद तय होता है कि प्याज पर हमारी खबर पर ही सबसे ज्यादा आंसू निकलना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि सबसे ज्यादा लगने वाली खबर हो। मतलब सबसे ज्यादा महंगी प्याज हमारे चैनल पर ही बिके।

एक चैनल पर खबर आई प्याज ने आंसू निकाले। दिल्ली में प्याज की कीमत 70 रुपये किलो पहुंची। ये नंबर एक वाला चैनल था तो उसके ठीक पीछे वाले चैनल ने खबर चलाई। दिल्ली में प्याज के भाव 80 रुपये किलो हुए। अब सवाल ये कि भैया दिल्ली में भाव या 70 होगा या 80 दो चैनलों पर अलग-अलग भाव के प्याज कैसे। खैर ये भी सवाल गलत क्योंकि, हो सकता है दोनों चैनलों के रिपोर्टर अलग-अलग दुकानों से अलग किस्म का प्याज लेकर आए हों। नंबर एक चैनल को बुरा लगा उसने हेडलाइन में ही डाल दिया महंगाई का शतक प्याजा! अब भले ही इस हेडलाइन का कोई मतलब न हो लेकिन, भाव तो समझ में आ रहा है कि इस चैनल पर प्याज 100 रुपये किलो तक बिक रही है। पक्का हो गया कि नंबर एक चैनल की प्याज ही सबसे महंगी है। तो अब इसी पर सबसे ज्यादा आंसू निकलेंगे। लोग आंसू पोछेंगे और फिर से भाव देखेंगे। टीआरपी भी देंगे। प्याज पर सरकारें पहले तो गिरी हैं। इस बार का पता नहीं। लेकिन, टीवी चैनल वालों को ये प्याज इतनी अच्छी लगती है कि हर तरह के प्रचार तंत्र की पारंपरिक धारणाओं को तोड़ देने वाले नरेंद्र मोदी का जन्मदिन और मां का आशीर्वाद भी टीवी चैनलों के प्याज पर भारी नहीं पड़ सका। अब समझ में ये नहीं आता कि क्या ऐसी खबरों पर किसी को भी मंडी भेजकर भाव तय करा लिए जाते हैं। या एक बार चैनल अपने आर्थिक पत्रकार से ये भी समझने की कोशिश करता है कि प्याज ने जो ये आंसू निकाले, ये जो किचन के बजट में आग लगाई, ये सब कब हुआ। लेकिन, ये पूछ लिया जाए तो सोमवार को ही मंगलवार का एजेंडा कैसे तय हो पाएगा। और न्यूजरूम के तय करने वाले लोग कैसे बढ़िया पैकेजिंग कर पाएंगे। देश के हर कोने से रिपोर्टर से तय तरीके से मंडी से महंगी प्याज का वॉकथ्रू करा पाएंगे। जाहिर है हर जगह से महंगी प्याज का वॉकथ्रू तो तय करके ही आ सकता है। दरअसल सोमवार को जो थोक महंगाई दर के आंकड़े आएं हैं वो 2 हफ्ते पहले खत्म हो गए महीने के हैं। और उस समय जो महंगाई थी उसमें प्याज का योगदान 250 प्रतिशत का था। किसी भी टीवी चैनल पर प्याज के आंसू रोकने के लिए ये बात नहीं बताई गई। जाहिर है टीवी तो थोक मंडी वाला भी देखता है और खुदरा मंडी वाला भी। उसे लगता है अरे ये टीवी चैनलों के पढ़े लिखे जानकार लोग तो टीवी पर 70-100 रुपये किलो प्याज बेच रहे हैं। जबकि, इनको न खरीदना है न बेचना है। तो हम क्यों पीछे रहें। 

थोक मंडी वाला 30-35 रुपये किलो वाली प्याज का भाव बढ़ाकर 40-45 कर देता है। खुदरा कारोबारी 70-100 के बीच में कहीं बेच लेगा। और इसका असर ये कि बड़ी मुश्किल से 50-60 के बीच के भाव तक लौटा प्याज फिर से 70-100 पर चला जाएगा। और सितंबर के महंगाई के आंकड़ों में प्याज रुलाने की अपनी शानदार भूमिका अदा करता दिखेगा। 20 सितंबर को रघुराम राजन गवर्नर बनने के बाद पहली बार मॉनिटरी पॉलिसी का एलान करेंगे। राजन के आने बाजार, रुपया सुधरा था। सब ये भी उम्मीद लगा बैठे थे कि राजन सुब्बाराव जैसा व्यवहार नहीं करेंगे और बढ़ती ब्याज दरें कुछ घटाएंगे। हालांकि, उसकी उम्मीद कम ही थी। लेकिन, टीवी चैनलों पर चल रही प्याज की हॉरर स्टोरी अर्थशास्त्र के सारे सिद्धांतों को ध्वस्त कर देगी। राजन सुब्बाराव वाले सुर में आ जाएंगे। विकास की जगह महंगाई रिजर्व बैंक के एंजेडे में आ जाएगी और हम महंगाई के दुष्चक्र में फंसे रहेंगे क्योंकि, टीवी चैनलों को व्यवस्थित तरीके से स्टोरी कराने के लिए व्यवस्थित खबर चाहिए। और वो तभी होगी जब 2 हफ्ते पहले के भाव को आज का भाव साबित किया जा सके। 

Saturday, February 25, 2012

चुनाव बाद फिर फूटेगा महंगाई बम !

देश में सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश और चार दूसरे राज्यों में चुनावी मौहाल के बीच ज्यादातर आर्थिक या फिर लोगों की जेब से ताल्लुक रखने वाले मसलों पर अच्छी खबरें ही आ रही हैं। ये समझने की बात है कि अचानक औद्योगिक रफ्तार से लेकर सेंसेक्स की चाल तक और महंगाई के बढ़ने की रफ्तार सब संभल कैसे गई है। मंगलवार, 14 फरवरी को शेयर बाजार के बांबे स्टॉक एक्सचेंज का अहम सूचकांक सेंसेक्स 6 महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर बंद हुआ था। और, इसकी सबसे बड़ी वजह दिख रही है- महंगाई दर का तेजी से घटना और ब्याज दरों में कमी होने की उम्मीद। इसी दिन आए महंगाई दर के आंकड़े बता रहे थे कि महंगाई के बढ़ने की रफ्तार सात प्रतिशत से भी नीचे आ गई है। ये 26 महीने में महंगाई दर के बढ़ने की सबसे कम रफ्तार है। तो, क्या बजट के ठीक पहले और यूपी चुनावों के समय आ रही इन शानदार खबरों के बूते हम भारतीय अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार फिर से दो अंकों की तरफ ले जाने वाला सपना देखना शुरू कर सकते हैं। चुनाव की मारामारी है तो, जाहिर है कि मीडिया के पास चुनावी मुद्दों के अलावा किसी खबर में बाल की खाल निकालने की समय भी नहीं है। लेकिन, शायद ये तस्वीर उतनी सुनहरी है नहीं जितनी दिख रही है।
5 राज्यों के विधानसभा चुनावों के ठीक पहले 16 नवंबर को तेल मार्केटिंग कंपनियों ने पेट्रोल के दाम करीब 2 रुपए ये कहकर घटाया था कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें घटी हैं और इसलिए हम ये कीमतें घटा रहे हैं। हालांकि, इससे पहले 26 जून 2010 से पेट्रोल की कीमतें तय करने का अधिकार मिलने के बाद तेल मार्केटिंग कंपनियों ने पेट्रोल की कीमत करीब 48 रुपए से बढ़ाकर सत्तर रुपए प्रति लीटर के आसपास पहुंचा दी थीं। जून 2010 से जनवरी 2011 तक पेट्रोल का दाम इसी नीति के तहत 58 रुपए प्रति लीटर के ऊपर हो गया था। लेकिन, इसके बाद जनवरी 2011 से लेकर 14 मई 2011 तक पेट्रोल की कीमतें बिल्कुल भी नहीं बढ़ीं। सवाल ये है कि क्या उस दौरान कच्चे तेल की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में घट गईं थीं या स्थिर थीं। तो, उसका जवाब है कि ऐसा बिल्कुल नहीं था।
दरअसल 18 अप्रैल से 10 मई तक पश्चिम बंगाल और दूसरे कुछ राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने थे और इस वजह से जनवरी से लेकर पेट्रोल की कीमतें तय करने का अधिकार मिलने के बावजूद तेल मार्केटिंग कंपनियां पेट्रोल के दाम बढ़ाने के बजाए पेट्रोल पर घाटा सहती रहीं। उसी दौरान अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल जनवरी के $93.87/ बैरल  से बढ़कर मई में $110.65/ बैरल तक पहुंच गया। लेकिन, राजनीतिक मजबूरी में सरकार ने तेल मार्केटिंग कंपनियों को जनता के टैक्स के पैसे से अंडररिकवरी देना ज्यादा मुनासिब समझा। न कि तेल मार्केटिंग कंपनियों को पेट्रोल के भाव बढ़ाने की इजाजत देना। और, इन्हीं 3-4 महीनों में पेट्रोल के दाम बढ़ाने की इजाजत न देने से तेल कंपनियों का घाटा पचास हजार करोड़ रुपए से ज्यादा बढ़ गया। अप्रैल में तो, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें $118.46/बैरल तक पहुंच गई। लेकिन, फिर भी सरकार ने कीमत नहीं बढ़ाईं।
कुछ हद तक पिछले साल जनवरी से अप्रैल-मई वाले हालात ही इस समय भी हैं। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश समेत 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। और, सरकार इस समय पेट्रोल के दाम बढ़ाने की इजाजत तेल मार्केटिंग कंपनियों को देने का खतरा नहीं उठा सकती। केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस को लगता है कि उत्तराखंड, पंजाब में वो, बीजेपी और बीजेपी-अकाली गठबंधन से सत्ता छीन सकती है और यूपी में पहले से काफी अच्छा करेगी। ऐसे में मुस्लिम आरक्षण के लुभावने, मीठे चुनावी वादे के साथ वो, महंगे पेट्रोल की कड़वाहट जनता को देने से बचना चाह रहे हैं। वो, भी तब जब जनवरी में एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल $110.47/बैरल तक पहुंच गया है। दिसंबर में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का भाव $107.20/बैरल था। यानी दिसंबर से जनवरी में कच्चा तेल करीब $3/ बैरल से ज्यादा महंगा हो गया है। लेकिन, तेल मार्केटिंग कंपनियां पेट्रोल के दाम नहीं बढ़ा रही हैं।
सोमवार, 13 फरवरी को उत्तर प्रदेश के चुनावी माहौल के बीच में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के चेयरमैन आर एस बुटोला ने कंपनी के तिमाही नतीजों का एलान किया। उन्होंने बताया कि पेट्रोल पर तेल मार्केटिंग कंपनियों का घाटा तेजी से बढ़ जा रहा है। लेकिन, पत्रकारों के बार-बार पूछने पर भी वो, ये नहीं बता सके कि हर 15 दिन में समीक्षा के बावजूद अभी तक पेट्रोल के दाम क्यों नहीं बढ़े। जनवरी से अब तक पेट्रोल पर सिर्फ इंडियन ऑयल को ही 362 करोड़ रुपए का घाटा हो चुका है। जाहिर है दूसरी तेल मार्केटिंग कंपनियों का घाटा मिलाकर ये रकम और ज्यादा होगी। और, इसकी भरपाई जनता की गाढ़ी कमाई से वसूले गए टैक्स से ही की जानी है। तो, फिर ये रकम सीधे पेट्रोल की कीमत बढ़ाकर ही सरकार क्यों नहीं वसूल लेती। जवाब साफ है अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री हैं तो, क्या हुआ। अर्थनीति पर राजनीति भारी पड़ ही जाती है। अब कम से कम 6 मार्च यानी मतगणना के दिन तक तो, पेट्रोल महंगा नहीं ही होगा। लेकिन, इसके तुरंत बाद पेट्रोल के दाम कम से कम 3 रुपए लीटर बढ़ना तय है। वो, भी तब जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल और महंगा न हो। और, उसकी उम्मीदें कम इसलिए हैं क्योंकि, भारत और जॉर्जिया में हमले में जिस तरह से ईरान के तार जुड़ रहे हैं। और, यूरोपीय, अमेरिकी देशों के साथ तनाव बढ़ रहा है। उससे कच्चे तेल के सस्ते होने की उम्मीदें कम ही हैं।
देश पहले से वित्तीय घाटे से जूझ रहा है। खुद वित्त मंत्री कह चुके हैं कि वित्तीय घाटा संभालना उनके लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता है। ऐसे में अर्थनीति पर भारी राजनीति की वजह से ये जो, पेट्रोल की कीमतों का घाटा सरकारी खजाने को चोट पहुंचाएगा उससे मुश्किल और बढ़ेगी। फिर पेट्रोल के दाम बढ़े तो, कुछ न कुछ महंगाई बढ़ेगी ये समझने के लिए अर्थशास्त्री होने की तो, जरूरत ही नहीं है। और, अगर दूसरी महंगाई नहीं भी बढ़ी तो, हर रोज चलने वाले लोगों- स्कूटर से लेकर कार तक- का पेट्रोल बिल तो, बढ़ ही जाएगा। उस पर रिजर्व बैंक के ब्याज घटाने का असर तुरंत तो, होने से रहा। क्योंकि, एक साथ आधा प्रतिशत से ज्यादा तो, ब्याज घटेगा नहीं और बैंक उसको ग्राहकों तक पहुंचाने में कम से कम महीने भर तो, लगा ही देंगे। और, अगर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होने से पेट्रोल और महंगा करना पड़ा तो, सीधे महंगाई की मार और डीजल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों पर सब्सिडी की वजह से सरकारी खजाने पर चोट बढ़नी तय है। और, तब धड़ाधड़ भारतीय शेयर बाजार में रकम लगा रहे विदेशी निवेशक कितनी देर तक सेंसेक्स-निफ्टी थामेंगे वो, देखने वाली बात होगी। क्योंकि, सेंसेक्स में दिसंबर से अब तक करीब बीस प्रतिशत का मुनाफा उन्हें साफ दिख रहा होगा। चुनावी राजनीति और लुभाने वाली खबरों का ये कथित संयोग अर्थव्यवस्था को मुश्किल राह पर ले जाता दिख रहा है।

(ये लेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपा है।)

Tuesday, July 05, 2011

तरक्की की रफ्तार में महंगाई का बड़ा ब्रेकर


आम आदमी को आम आदमी की सरकार ने एक बार फिर भरोसा दिया है। इस बार चुप रहने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अरसे बाद बोले हैं। और, बोले ये कि मार्च तक महंगाई के बढ़ने की दर छे-साढ़े छे प्रतिशत तक आ जाएगी। इससे ये तो साफ हो गया कि अगले नौ महीने तक 8-9 प्रतिशत की महंगाई दर बनी रहेगी, इसके लिए जनता से उन्होंने लगे हाथ अभयदान भी मांग लिया है। वैसे भी लोकतंत्र में जनता को अपनी सुनाने का मौका पांच साल बाद ही मिलता है। इसलिए मार्च में भी महंगाई दर छे- साढ़े छे प्रतिशत तक आएगी या नहीं ये तो, आगे की आर्थिक परिस्थितियां तय करेंगी। क्योंकि, पिछले दो साल से सरकार, यानी प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और उनकी आर्थिक सलाहकार मंडली दसियों बार आम जनता को ये भरोसा दिला चुकी है कि महंगाई दर बस अगले तीन महीने में छे- साढ़े छे प्रतिशत तक आ जाएगी। लेकिन, हुआ क्या- वही ढाक के तीन पात।


महंगाई दर नौ प्रतिशत के आसपास ऐसी अंटकी है कि जरा सी नीचे उतरती है तो, सरकारी फैसला ही उसे ऊपर चढ़ने की ताकत दे देता है। दरअसल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी सलाहकार मंडली से उम्मीद थी कि ये देश की सबसे सुधारवादी सरकार चलाएंगे। और, देश की तरक्की की रफ्तार को तेजी से बढ़ाएंगे लेकिन, पिछले कुछ समय से सरकार जिस तरह से घपले-घोटालों में फंसी है उसमें सुधार पीछे छूट गए हैं। और, महंगाई-घोटालों के अलावा तरक्की का हर पैमाना छोटा होता जा रहा है।


अभी का एक सरकारी फैसला जिसके बूते महंगाई दर तेज छलांग मारने की तैयारी में है वो, है डीजल, रसोई गैस और केरोसिन के दाम बढ़ाना। वैसे सरकार बार-बार ये कह रही है कि ये हमारी मजबूरी है। और, ये काफी हद तक सच भी है कि सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ाने का वो फैसला लेना पड़ा जो, उसके लिए गले की हड्डी साबित हो रहा है। घपले-घोटाले और महंगाई से पहले से ही बुरी तरह से मार खाई सरकार के लिए ये फैसला लेना आसान नहीं था। यहां तक कि इस फैसले के लिए होने वाली एम्पावर्ड ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स की बैठक कई-कई बार टाल दी गई। लेकिन, जब पानी गले तक आ गया तो, सरकार लगा कि ये फैसला लेना जरूरी है।

सरकार जनता की भलाई के नाम पर दी जाने वाली तेल कंपनियों की सब्सिडी को खत्म करने का मन तो, यूपीए के पहले कार्यकाल में ही बना चुकी थी। इसीलिए वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने बजट में ही साफ कर दिया था कि पेट्रोलियम उत्पादों पर धीरे-धीरे सब्सिडी खत्म की जाएगी। 2009-10 के मुकाबले 2010-11 में सरकार ने तेल कंपनियों को दी जाने वाली सब्सिडी करीब-करीब आधी कर दी। और, इस वजह से सरकार ने 25 जून 2010 को बाजार के हवाले करने के बाद से पेट्रोल करीब 25 परसेंट महंगा करने की इजाजत तेल मार्केटिंग कंपनियों को दे दी। लेकिन, आम आदमी का होने का दावा करने वाली यूपीए सरकार ने खुद भी ये नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी डीजल, रसोई गैस और केरोसिन जैसी आम आदमी के जरूरत वाले पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत उन्हें बढ़ानी पड़ जाएगी।

लेकिन, सरकारी खजाने पर जब करीब पौने दो लाख करोड़ रुपए का अंडररिकवरी का बोझ वित्तीय घाटे को बढ़ाने लगा तो, सरकार के लिए ये मजबूरी बन गई। वैसे इसी सरकार ने आर्थिक मजबूरियों पर बार-बार राजनीतिक मजबूरियों को तवज्जो दी है। इस साल जनवरी से मार्च के बीच जब कच्चे तेल के भाव 110 से 115 डॉलर प्रति बैरल की खतरनाक ऊंचाई पर पहुंच गए थे तो, भी सरकार ने राजनीतिक मजबूरियों के ही चलते पेट्रोलियम उत्पादों के दाम नहीं बढ़ाए। क्योंकि, बंगाल और केरल से लेफ्ट के सफाए का मौका कांग्रेस छोड़ना नहीं चाहती थी। यही वो, तीन महीने थे जब तेल कंपनियों का घाटा करीब 50000 करोड़ रुपए बढ़ गया था।

और, अब फैसला तब लिया गया जब कच्चे तेल के भाव घटकर 90-95 डॉलर प्रति बैरल के बीच आ गए। लेकिन, पहले का घाटा सुरसा के मुंह की तरह फैला हुआ था। अब डीजल की कीमते बढ़ने के बाद तेल मार्केटिंग कंपनियों का नुकसान 21000 करोड़ रुपए कम होगा। लेकिन, अभी भी सालान 1.20 लाख करोड़ रुपए का नुकसान बना रहेगा। अब एक लीटर डीजल पर तेल कंपनियों का नुकसान घटकर 6.40 रुपए रह गया है।

विपक्षी पार्टियों के पास आम जनता का गुस्सा भड़काने के ज्यादा तर्क न मिलें इसलिए सरकार ने इस बार ड्यूटी भी काफी घटाई है। डीजल पर लगाने वाली एक्साइज ड्यूटी अब 2 रुपए लीटर रह गई है। जबकि, अब तक ये ड्यूटी 4.60 रुपए प्रति लीटर थी। इससे सरकारी खजाने पर इसी वित्तीय वर्ष में 23000 करोड़ रुपए की चोट लगेगी। सरकार ने कस्टम ड्यूटी भी 5 परसेंट घटाई है। इसका मतलब ये हुआ कि कच्चे तेल पर अब कोई कस्टम ड्यूटी नहीं लगेगी और डीजल पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी 7.5 परसेंट से घटकर सिर्फ 2.5 परसेंट रह गई है। और, इससे सरकार खजाने से सीधे-सीधे 26000 करोड़ रुपए गायब हो जाएंगे। कुल मिलाकर इस बार ड्यूटी में हुई कटौती से सरकार को वित्तीय वर्ष 2012 में करीब 50 हजार करोड़ रुपए का नुकसान होने वाला है

लेकिन, एक जो सबसे बड़ी बात हुई है कि इस ड्यूटी कटौती के बाद अब पेट्रोल का जो, आज का भाव है इस पर तेल मार्केटिंग कंपनियों को होने वाला नुकसान खत्म हो गया है। यानी अब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अगर इसी स्तर पर बनी रहीं तो, पेट्रोल पर इन कंपनियों को कोई नुकसान नहीं होगा। दरअसल अर्थशास्त्रियों की सरकार होने के बावजूद आर्थिक मोर्चे पर सरकार की जो, दुर्गति हुई है। सरकार अब इस बार के फैसले से ये कलंक घोना चाहती है।

लेकिन, ये कलंक धुल पाएगा। इसमें संदेह दिख रहा है। क्योंकि, डीजल के एक रुपया महंगा होने का मतलब है कि महंगाई दर 0.14 प्रतिशत बढ़ जाएगी। तीन रुपए डीजल महंगा होने का मतलब हुआ कि करीब आधा परसेंट महंगाई दर में तेजी। इसके अलावा रसोई गैस और केरोसिन की महंगाई भी असर करेगी। बिना डीजल, रसोई गैस और केरोसिन की कीमत बढ़े ही पिछले तीन साल में महंगाई ने इस सरकार के आम आदमी की जेब से करीब छे लाख करोड़ रुपए निकाल लिए हैं। क्रिसिल की रिपोर्ट बता रही है कि महंगाई की वजह से 2008 में 45,000 करोड़ रुपए, 2009 में 1,60,000 करोड़ रुपए और 2010 में 3,70,000 करोड़ रुपए का चूना जनता को लग चुका है। यानी तीन साल में 5,80,000 करोड़ रुपए का चूना।


ये चूना कैसे लगा इसे कुछ उदाहरण से समझा जा सकता है। यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के एक साल में पेट्रोल 25 रुपए महंगा हो गया। दूध 8 रुपए महंगा हो गया। स्कूल फीस करीब 20 प्रतिशत बढ़ गई। इंजीनियरिंग, मेडिकल की कोचिंग फीस सवा लाख से डेढ़ लाख रुपए तक महंगी हो गई। दवाएं भी 17 प्रतिशत महंगी हुईं। कपड़े भी 10-15 प्रतिशत महंगे हो गए। ये कुछ उदाहरण भर हैं। सच्चाई ये है कि इस साल भर में सबकुछ महंगाई हुआ है।

और, इस सबका बुरा असर ये कि भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी से उतरती दिख रही है। साल भर पहले दस परसेंट की तरक्की की रफ्तार पर पहुंची भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार पांचवीं तिमाही तक आते-आते आठ परसेंट से भी कम रह गई। दरअसल, पिछले कुछ समय से सरकार जिस तरह से व्यवहार कर रही है वो, देश के भीतर और बाहर उद्योगों और निवेश को लुभाने में नाकामयाब रहा है। एक समय में सबसे सुधारवादी सरकार चलाने का तमगा रखने वाले मनमोहन सिंह के समय में महंगाई बढ़ती जा रही है, विदेशी निवेश घटता जा रहा है और तरक्की की रफ्तार उल्टे पांव लौट रही है।

हालांकि, इस वित्तीय वर्ष में भी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत आठ परसेंट से ज्यादा की रफ्तार से बढ़ती दिख रही है। जो, चीन के बाद दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा है। लेकिन, उद्योगों से संकेत अच्छे नहीं आ रहे हैं। औद्योगिक उत्पादन के बढ़ने की रफ्तार 7.3 परसेंट से घटकर 6.3 परसेंट रह गई है। महंगाई 9 परसेंट के ऊपर बनी हुई है। 2010-11 में विदेशी निवेश पहले के साल से 28.5 परसेंट घटा है। और, इस सबका बुरा असर बाजार पर तो दिखना ही था। दीवाली पर इक्कीस हजार पार कर चुका सेंसेक्स अठारह हजार के आसपास ही अंटका हुआ है। यानी करीब 14 परसेंट की गिरावट। मंदी से उबरने में हमने दुनिया के दूसरे देशों से तेजी दिखाई तो, लगा कि चलो तेज तरक्की सब भरपाई कर देगी। लेकिन, अब तरक्की की रफ्तार के रास्ते में महंगाई का ऐसा बड़ा ब्रेकर बनता दिख रहा है। जहां रफ्तार बेहद धीमी होनी ही है। और, सरकार लाख तर्क-कुतर्क करे सच्चाई यही है कि ढेर सारे अर्थशास्त्रियों से भरी इस सरकार के कुप्रबंधन के कारण ये हालात हुए हैं। इसमें मांग-आपूर्ति जैसे अर्थशास्त्र के स्थापित नियमों का कोई दोष नहीं है।
(ये लेख शुक्रवार पत्रिका में छपा है)

Thursday, December 23, 2010

मीडिया नहीं मीडिएटर से महंगाई बढ़ती है सरकार !

महंगाई बढ़ी नही कि सबसे पहली वजह साफ-साफ ये मीडिया से लेकर सरकार तक बताने लगती है कि सप्लाई-डिमांड का मिसमैच यानी मांग-आपूर्ति संतुलन बिगड़ने से ये दाम बढ़े हैं। फिर कोई एक मीडिया चिल्लाना शुरू करता है कि ये मांग-आपूर्ति संतुलन बिगड़ने से ज्यादा जमाखोरी की वजह से हुआ है। इसके बाद सरकार हरकत में आती है और कुछ जमाखोरों को पकड़ा जाता है और कुछेक दिनों-हफ्तों में महंगी बिकने वाली, प्याज-टमाटर सस्ता हो जाता है। लेकिन, बड़ा सवाल यही है कि क्या सिर्फ मांग-आपूर्ति संतुलन बिगड़ने से ही हर बार महंगाई बढ़ती है। क्योंकि, पिछले करीब डेढ़ साल से या यूं कह लें कि एक चक्र पूरा करके कुछेक महीने के लिए महंगाई दर घटने के अलावा करीब दो सालों से लगातार जनता महंगाई की मार झेल रही है। ये महंगाई दर तब भी बढ़ती रही जब देश विदेशी मंदी की मार से जूझ रहा था और लोगों की जेब में पैसे कम आ रहे थे।



अब भला ये पूरे दो साल तक मांग-आपूर्ति का संतुलन बिगड़ने से कैसे हो सकता है। महंगाई दर यानी खाने-पीने के सामान, दूसरे जरूरी उपयोग के सामान, पेट्रोल-डीजल की वजह से महंगे-सस्ते होने वाले सामान या फिर ऐसे ढेर सारे सामान जिनके आधार पर तय होता है कि महंगाई दर कम है या ज्यादा। महंगाई दर कम होने का मतलब बिल्कुल भी ये नहीं होता कि महंगाई घट गई है। दरअसल महंगाई दर घटने का मतलब ये हुआ कि महंगाई के बढ़ने की रफ्तार थोड़ी कम हुई है। गुरुवार को आए ताजा आंकड़े 11 दिसंबर को खत्म हफ्ते के हैं और महंगाई के बढ़ने की रफ्तार इस हफ्ते में भी बढ़ती दिख रही है। खाने-पीने के सामान करीब साढ़े बारह परसेंट महंगे हुए हैं। फ्यूल प्राइस इंडेक्स भी चढ़ा दिखा रहा है करीब ग्यारह परसेंट तक यानी इस इंडेक्स में शामिल सामान भी महंगा हुआ है। तो, क्या ये भी मांग-आपूर्ति संतुलन बिगड़ने से हो रहा है।



दरअसल ऐसा बिल्कुल नहीं है। सच्चाई ये है कि सरकार कीमतों पर काबू का कोई ऐसा सिस्टम तैयार नहीं कर पा रही है जिससे जरूरी सामान लोगों को कम कीमत पर मिल सकें। वो, भी तब जब ज्यादातर जरूरी सामान चाहें वो, खाने-पीने के सामान गेहूं-दाल-चावल हों या रोज इस्तेमाल होने वाली सब्जी- इन्हें उगाने वाले किसान की माली हालत कितनी बदली है इसका अंदाजा हर किसी को है। अब फिर से प्याज ने लोगों को रुलाना शुरू किया और लाल टमाटर लोगों का खून जलाने लगा तो, पहले तो, सरकार ने जमाखोरों पर कार्रवाई और बेहतर सप्लाई के लिए पाकिस्तानी प्याज लाने की बात कहकर कीमतें काबू में आने का भरोसा दिलाया। लेकिन, फिर भी बात बिगड़ने लगी तो, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने गुस्से में मीडिया के ऊपर ये ठीकरा फोड़ दिया कि सारी महंगाई मीडिया की वजह से ही है।



शीला दीक्षित के ऊपर तो, सिर्फ एक छोटे से राज्य में लोगों को जरूरी सामान कम कीमत पर उपलब्ध कराने का जिम्मा है लेकिन, अपने केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार साहब का क्या करिएगा जिनके ऊपर पूरे देश को सस्ते में जरूरी खाद्य सामग्री उपलब्ध कराने से लेकर किसानों के हितों की चिंता का जिम्मा है उनकी बात तो, शायद ही आप लोग भूले होंगे। नहीं जनता तो, भूल ही जाती है इसीलिए वो, लगातार ऐसे बयान देते रहते हैं कि आप उनकी असलियत पहचानने में भूल न करें। क्योंकि, ये तो वो भी जानते हैं जनता की याददाश्त कमजोर होती है। दरअसल ये कृषि मंत्री ही हैं जो, हैं तो, जनता के सेवक लेकिन, अपने बयानों से कंपनियों, मुनाफाखोरों की सेवा करते दिखते हैं। इनके बयानों की लंबी लिस्ट है जो, साफ दिखाती हैं कि महंगाई कम क्यों नहीं होती।



ज्यादा दिन नहीं बीते। जब कृषि मंत्री पवार साहब ने बयान दिया कि मैं कोई ज्योतिषी थोड़े ही हूं जो, बता सकूं कि महंगाई कब घटेगी। लेकिन, समय-समय पर वो, ये जरूर बताते रहे कि अब चीनी महंगी होने वाली है, अब दूध महंगा होने वाला है। और, बिना ज्योतिषी हुए कमाल का ज्ञान है पवार साहब को। सब उन्हीं की आशंकाओं या उम्मीदों कह लीजिए, के मुताबिक, महंगा होता रहा। जुलाई के आसपास बारिश का बहाना भी था। तो, प्रधानमंत्री ने अपनी आर्थिक सलाहकार मंडली के साथ खुद ही मोर्चा संभाल लिया। प्रधानमंत्री जी से लेकर उनके आर्थिक सलाहकार सी रंगराजन, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और सारी सरकार ने जनता को भुलावा देना शुरू कर दिया कि दिसंबर तक सब ठीक हो जाएगा। उसकी वजह भी साफ थी सरकार सितंबर से नया होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) लागू करने जा रही थी। इसी आधार पर महंगाई का बढ़ना तय होता है। अब नए WPI का आधार वर्ष 2004-05 को बनाया गया था तो, जाहिर 1993-94 के आधार वर्ष वाले पुराने महंगाई मापने के पैमाने से ये तो, कम ही महंगाई बढ़ना बताएगा। 14 सितंबर को नए WPI के आधार पर आई अगस्त महीने की महंगाई दर करीब दो परसेंट घटकर साढ़े आठ प्रतिशत पर आ गई।



बस प्रधानमंत्री और उनकी आर्थिक सलाहकार मंडली ने दावा करना शुरू कर दिया कि अच्छे मॉनसून की वजह से फसलें अच्छी होंगी और देश में अनाज और दूसरी जरूरी चीजों की अधिकता हो जाएगी तो, दिसंबर तक महंगाई अपने आप कम हो जाएगी। अब मनमोहन जी तो सचमुच बहुत सीधे आदमी हैं। वो, बहुत कठिन समीकरणों को न राजनीति में समझने की कोशिश करते हैं न महंगाई के मामले में। इसीलिए दूसरा कार्यकाल आराम से पूरा करते दिख रहे हैं। लेकिन, चूंकि वो अर्थशास्त्री हैं तो, आंकड़े जरूर समझते हैं।





कुछ आंकड़े मेरे पास हैं वो, मैं पेश कर रहा हूं खुद ही अंदाजा लग जाएगा कि ये महंगाई किसी मांग-आपूर्ति के असंतुलन का नतीजा है क्या ?



2006 के बाद से लगातार हमारा अनाज का उत्पादन बढ़ा है। पिछले साल के कुछ सूखे की वजह से इस साल की फसल पर थोड़ा असर जरूर पड़ा है फिर भी वो, मांग से काफी ज्यादा है।

2007-08 में भारत का गेहूं का उत्पादन रिकॉर्ड 7 करोड़ 80 लाख टन हुआ था। जबकि, उम्मीद 7 करोड़ 68 लाख टन की ही थी।

2009-10 में सिर्फ गेहूं ही नहीं सभी अनाजों की बात करें यानी गेहूं और दालों की तो, अनाज का कुल उत्पादन 21 करोड़ 80 लाख टन तक होने की उम्मीद है। ये पिछले साल से करीब 1 करोड़ 60 लाख टन कम है लेकिन, फिर भी कुल पैदावार इतनी ज्यादा है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में लाखों टन गेहूं सड़ चुका है।





2009-10 में गेहूं का उत्पादन पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए 8 करोड़ 7 लाख टन होने की उम्मीद है। जबकि, दालों का उत्पादन भी रिकॉर्ड 1 करोड़ 46 लाख टन।



चावल भी इस साल करीब 9 करोड़ टन हुआ। और तिलहन उत्पादन करीब ढाई करोड़ टन का है। गन्ना 27 करोड़ 78 लाख टन का सरकारी अनुमान है।



महंगाई में अब बचती है सब्जी तो, उसका कोई ऐसा बुआई चक्र नहीं होता कि जुलाई-अगस्त की बारिश से सब सुधर जाएगा या सब बिगड़ जाएगा। और, अब तो, दिसंबर भी बीतने वाला है। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री जी और उनकी आर्थिक मंडली अब मार्च तक महंगाई दर के साढ़े पांच से छे परसेंट के बीच आ जाने का ख्वाब जनता को दिखा रही है। लेकिन, लगे हाथ कभी रिजर्व बैंक का कोई डिप्टी गवर्नर तो, कभी खुद सरकार का कोई आर्थिक सलाहकार ये बयान भी देता रहता है कि महंगे कच्चे तेल से महंगाई का दबाव बना हुआ है।



जाहिर है सरकार तब तक सोती रहती है जब तक सामान महंगे नहीं हो जाते। और, जनता के साथ मीडिया भी त्राहि-त्राहि नहीं चिल्लाने लगती। मीडिया के लाख चिल्लाने के बाद भी कृषि मंत्री पवार साहब को फर्क नहीं पड़ता क्योंकि, वो तो उस महाराष्ट्र के विदर्भ से आते हैं जहां किसान फसल बर्बाद होने के बाद आत्महत्या कर लेते हैं फिर भी पवार साहब का राजनीतिक सिक्का सबसे ऊंचे भाव पर महाराष्ट्र में चलता है। और, केंद्रीय सरकार भी मांग-आपूर्ति संतुलन बिगड़ने, बारिश कम-ज्यादा होने, पैदावार घटने-बढ़ने जैसे बहानों से जनता को फुसलाती है और मीडिएटर यानी मुनाफाखोरों को कमाने का मौका दिए रहती है। बहुत ज्यादा हल्ला मचा तो, कुछ मीडिया पर ठीकरा फोड़कर और कुछ जमाखोरों पर कार्रवाई के विजुअल-तस्वीरें मीडिया को उपलब्ध कराकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती है। क्योंकि, 3 दिन में प्याज 20 से 80 रुपए किलो और फिर 80 से 40 रुपए किलो आ सकता है तो, एक दो दिन में सामान्य भाव पर भी आ जाएगा। शायद ऐसे ही टमाटर भी एक दो दिन में रसोई में लाने के भाव पर आ जाएगा। इसीलिए शायद ये सवाल इस देश में कभी अहम नहीं रहा कि आखिर पिछले 4 साल में जरूरी खाने-पीने का सामानों का उत्पादन कई गुना बढ़ने के बाद भी कीमतें 300-400 प्रतिशत तक क्यों बढ़ गई हैं। खेती करने वाले किसान को मिलने वाली रकम अभी भी वही है। जाहिर है 200 प्रतिशत भाव सिर्फ मुनाफाखोर बढ़ा रहे हैं। ये छोटी सी बात सरकार समझकर उसका कोई नियमित फॉर्मूला क्यों नहीं लाती। वरना मुनाफाखोर महंगाई के जरिए ऐसे ही अपना खेल करके लोगों की गाढ़ी कमाई खाते रहेंगे और सरकार मीडिया को दोष देकर या फिर कुछ छापे और दूसरी कार्रवाई करके खुद को बचाती रहेगी।
(ये लेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपा है)

Thursday, July 29, 2010

मनमोहन जी आप भी!


अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी गजब भोले हैं। कह रहे हैं कि जब अच्छे मॉनसून की वजह से फसलें अच्छी हो जाएंगी। देश में अनाज और दूसरी जरूरी चीजों की अधिकता हो जाएगी तो, दिसंबर तक महंगाई अपने आप कम हो जाएगी।

अब मनमोहन जी तो सचमुच बहुत सीधे आदमी हैं। वो, बहुत कठिन समीकरणों को न राजनीति में समझने की कोशिश करते हैं न महंगाई के मामले में। इसीलिए दूसरा कार्यकाल आराम से पूरा करते दिख रहे हैं। लेकिन, चूंकि वो अर्थशास्त्री हैं तो, आंकड़े जरूर समझते हैं।


कुछ आंकड़े मेरे पास हैं वो, मैं पेश कर रहा हूं खुद ही अंदाजा लग जाएगा कि ये महंगाई किसी मांग-आपूर्ति के असंतुलन का नतीजा है क्या ?


2006 के बाद से लगातार हमारा अनाज का उत्पादन बढ़ा है। पिछले साल के कुछ सूखे की वजह से इस साल की फसल पर थोड़ा असर जरूर पड़ा है फिर भी वो, मांग से काफी ज्यादा है।


2007-08 में भारत का गेहूं का उत्पादन रिकॉर्ड 7 करोड़ 80 लाख टन हुआ था। जबकि, उम्मीद 7 करोड़ 68 लाख टन की ही थी।


2009-10 में सिर्फ गेहूं ही नहीं सभी अनाजों की बात करें यानी गेहूं और दालों की तो, अनाज का कुल उत्पादन 21 करोड़ 80 लाख टन तक होने की उम्मीद है। ये पिछले साल से करीब 1 करोड़ 60 लाख टन कम है लेकिन, फिर भी कुल पैदावार इतनी ज्यादा है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में लाखों टन गेहूं सड़ चुका है।


2009-10 में गेहूं का उत्पादन पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए 8 करोड़ 7 लाख टन होने की उम्मीद है। जबकि, दालों का उत्पादन भी रिकॉर्ड 1 करोड़ 46 लाख टन।

चावल भी इस साल करीब 9 करोड़ टन हुआ। और तिलहन उत्पादन करीब ढाई करोड़ टन का है। गन्ना 27 करोड़ 78 लाख टन का सरकारी अनुमान है।

महंगाई में अब बचती है सब्जी तो, उसका कोई ऐसा बुआई चक्र नहीं होता कि जुलाई-अगस्त की बारिश से सब सुधर जाएगा या सब बिगड़ जाएगा। फिर इस बारिश के भरोसे अपने प्रधानमंत्री जी से लेकर उनके आर्थिक सलाहकार सी रंगराजन, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और सारी सरकार को भुलावा क्यों है कि दिसंबर तक सब ठीक हो जाएगा। वैसे ऐसे ही भुलावे में रखकर पिछले 5 साल और नई यूपीए के साल भर से ज्यादा हो गए हैं। जय हो ...

Wednesday, April 21, 2010

प्रतिबद्ध कार्यकर्ता, भ्रमित नेता

भारतीय जनता पार्टी ने बुधवार को आज दिल्ली में जो रैली की वो, अपने आप में एतिहासिक कई मायनों में है। सबसे बड़ी बात तो ये कि भारतीय जनता पार्टी की इस 42 डिग्री की गर्मी में दिल्ली में हुई इस रैली ने साबित कर दिया कि घर बैठे कांग्रेस सरकार के राज में महंगाई की गर्मी की तपिश दिल्ली आकर 41 डिग्री के तापमान में झुलसने से कहीं ज्यादा भारी है। साबित ये भी हुआ कि नितिन गडकरी कैसे अध्यक्ष होंगे, उनका बीजेपी के इतिहास में नाम कैसे लिखाएगा ये तो, वक्त बताएगा लेकिन, संघ के इस लाडले अध्यक्ष की ताकत पूरे देश ने देख ली। साबित ये भी हुआ कि अटल-आडवाणी-जोशी और उस दौर के सारे नेताओं को भी नमस्ते किया जा चुका है। पार्टी कार्यकर्ता के सामने सिर्फ और सिर्फ सरकार से महंगाई पर कड़े सवाल पूछते गडकरी ही दिख रहे थे।

लेकिन, इतना सबकुछ होने गडकरी के सबसे ताकतवर नेता के तौर पर प्रतिस्थापित होने के बावजूद गडकरी की बेहोशी ने मीडिया को विश्लेषण का वो बहाना दे दिया कि जब नेता खुद खड़ा नहीं हो पा रहा है तो, पार्टी क्या खड़ी करेगा। देश भर से आए बीजेपी कार्यकर्ताओं की जुबान में बोलते हुए बीजेपी के ताजा-ताजा प्रवक्ता बने तरुण विजय भले ही इसे मीडिया का फाउल गेम कहें कि मीडिया बेवजह उनके अध्यक्ष की बेहोशी को तूल दे रहा हो, मीडिया को देश भर से आए लाखों कार्यकर्ता नहीं दिखे। अब तरुण विजय कुछ भी कहें लेकिन, सवाल उनसे मीडिया अगर पूछे कि क्या कांग्रेस की किसी रैली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी धूप में बेहोश होकर गिर पड़ें तो, क्या बीजेपी इस बात का बतंगड़ नहीं बनाएगी। बनाएगी और जरूर बनाएगी।

प्रतीकों की राजनीति से सत्ता तक पहुंच जाने वाली पार्टियों के इस देश में ऐसे प्रतीक बड़ा असर करते हैं। और, गडकरी की बेहोशी का असर भी उसी तरह से हुआ। गडकरी को कुछ दिन पहले मैंने अपने लेख में एक सलाह दी थी, दूसरे उनके शुभचिंतक भी उनको ये सलाह जरूर देते होंगे अगर वो, उनका बात सुनते होंगे। वो, सलाह भी यही होती होगी कि गडकरी जी राहुल गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस से लड़ना है तो, चुस्त-दुरुस्त रहिए। स्लिम मत होइए लेकिन, स्वस्थ रहिए-स्वस्थ दिखिए। वरना तो, राहुल गांधी के NREGS में तसला उठाए धूप में मिट्टी ढोती तस्वीरों के सामने आपकी रैली में करीब डेढ़ लाख की भीड़ होने पर भी बेहोश होकर गिरने की तस्वीरें कहां ठहर पाएंगी। सोचिए सिर्फ अच्छी बातें करने से कुछ नहीं होगा। अच्छी बातों पर अमल दिखे और इन बातों पर अमल करने वाला पार्टी अध्यक्ष अच्छा दिखे ये बड़ा जरूरी है। अभी ये शुरुआत है आगे इसे सुधार लें तो, शायद मामला संभल जाए।

बीजेपी की महारैली देखने के लिए मैंने राजीव चौक स्टेशन से रामलीला मैदान के लिए ऑटो वाले से पूछा तो, उसका जवाब था-साहब पिछले 25 सालों से ऑटो चला रहा हूं ऐसी रैली नहीं देखी। मैं नहीं जाऊंगा। दूसरा ऑटो वाला इस शर्त पर तैयार हुआ जहां ज्यादा जाम हुआ वहीं छोड़ दूंगा लेकिन, 30 रुपए लूंगा। मुझे लगा अतिशयोक्ति है लेकिन, रामलीला मैदान पर सचमुच ऐसा माहौल था जिससे कहीं से ये लग ही नहीं रहा था ये उस पार्टी की रैली है जिसके गर्त में जाने की भविष्यवाणी पिछले लोकसभा चुनाव में हार के बाद जाने कितने राजनीतिक विश्लेषक लगाने लगे थे। कार्यकर्ताओं में जबरदस्त जोश और जान दिख रही थी।

मंच पर बुढ़ाती पीढ़ी के आडवाणी-जोशी थे लेकिन, पोस्टरों से ये सब गायब थे। किसी-किसी को गडकरी के साथ आडवाणी की सुध आ गई दिख रही थी। मंच के एक-एक तरफ दीन दयाल उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की तस्वीरें टंगी थीं। और, मंच के एक तरफ बड़ा सा लहराता हुआ अटल बिहारी वाजपेयी का मुस्कुराता चित्र था जिस पर उनकी कविताएं लिखीं थीं। नारे लिखे बोर्ड्स पर आम जन या फिर नितिन गडकरी ही दिख रहे थे।

सबसे बड़ी बात ये थी कि रैली में ज्यादातर जगहों कम से कम उत्तर प्रदेश से तो कार्यकर्ता जुटाकर नहीं लाए गए थे। छिटपुट 10-20 की टोली में आए थे। किसी बड़े नेता के साथ जुटकर नहीं आए थे। उम्मीद में चले आए थे पता नहीं अगर वो, रैली के बाद नेताओं के व्यवहार से ठगे न महसूस कर रहे होंगे तो, उत्तर प्रदेश में जमीन से चिपकी पार्टी थोड़ी तो, ऊपर उठेगी। उत्तर प्रदेश में पार्टी की दुर्दशा की वजह समझ में आई जब पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह बोलने खड़े हुए तो, एक कार्यकर्ता मेरे ठीक पीछे से बोला अब तो ग आधी भीड़। ये कोई पैमाना नहीं है लेकिन, ऐसी कच्ची-पक्की लाइनें किसी गंभीर सर्वे से ज्यादा महत्व रखती हैं। हां, रैली में इंतजाम से कार्यकर्ता बहुत खुश थे। पानी के टैंकर से लेकर पैंकेटबंद पानी तक मुफ्त था। लखनऊ से आने वाले करीब डेढ़ हजार कार्यकर्ताओं के लिए सांसद लालजी टंडन के घर भोजन का इंतजाम था। लखनऊ के कार्य़कर्ताओं की बसें तो, जाम में फंस गईं वो तो, समय से नहीं पहुंच सके। हां, उत्तर प्रदेश के दूसरे जिलों से आए कार्यकर्ताओं को शानदार भोजन मिल गया।

अब बीजेपी इस रैली की सफलता से गदगद होगी लेकिन, लगे हाथ उसे ये भी आंकलन जरूर करना चाहिए कि इतनी बड़ी भीड़ की मंशा पार्टी नेता क्यों नहीं भांप सके जो, इस गर्मी में भी पुलिस की लाठी खाने को तैयार थी लेकिन, नेता जी लोग गर्मी झेलने से डर रहे थे। और, बार-बार कार्यकर्ताओं को अनुशासन का पाठ पढ़ा रहे थे। जितनी बार बीजेपी के बड़े नेता सिर्फ दस हजार लोगों के जंतर-मंतर तक जाने की प्रशासन की इजाजत बताकर कार्यकर्ताओं को अनुशासित करने की कोशिश कर रहे थे। उतनी बार कार्यकर्ता नेताओं पर खीझ रहा था। दरअसल ये वही कार्यकर्ताओं की भीड़ थी जो, 2004 के लोकसभा चुनावों के समय भी बीजेपी के साथ थी जिसे देखकर पूरे मीडिया ने बीजेपी की जीत का अनुमान लगाया था। और, ये भीड़ 2009 के लोकसभा चुनावों में भी बीजेपी के साथ थी लेकिन, नेताओं इन कार्यकर्ताओं के जोश को वोट में नहीं बदल सके। बीजेपी और उसके नए अध्यक्ष ये बात समझ लें तो, शायद एक बार फिर बाजी पलट सकती है।
(this article is published on peoples samachar's edit page)

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...