Thursday, July 14, 2011

एक बार थम क्यों नहीं जाता देश



मीडिया मजबूरी में या ये कहें कि और करे भी तो, क्या। अब यही चलाना-दिखाना है कि मुंबई के जज्बे को सलाम। आखिरकार जिंदादिल मुंबई के लोगों ने आतंक को फिर से मात दे दी। कुछ 22 प्वाइंट की मामूली सेंसेक्स की बढ़त ने एक और हेडलाइन ये भी दे दी कि आतंक को शेयर बाजार का करारा जवाब। लेकिन, क्या सचमुच ऐसा हुआ है। क्या सच्चाई यही है कि मुंबई या फिर शेयर ने आतंक को करारा जवाब दिया है। देश में अगर कश्मीर के बाद कहीं के लोगों के सीने में सबसे ज्यादा आतंकी घाव पक रहा है तो, वो मुंबई शहर ही है। देश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले इस शहर की मजबूरी को लोगों खासकर हम मीडिया वालों ने जबरदस्ती बहादुरी बनाने की कोशिश बार-बार की है। और, इसे आतंक से लड़ने के लिए जरूरी सकारात्मक सोच साबित कर दिया है।


11/7/2006 के ट्रेन धमाके हों या फिर 26/11/2008 के ताज और मुंबई के दूसरे अहम ठिकानों पर हुए आतंकी हमले हों। मीडिया में लाख ये बात साबित करने की कोशिश की जाए कि हमलों के तुरंत बाद मुंबई के जिंदादिल लोग उठ खड़े होते हैं। मुंबई कभी थमती नहीं, ये जज्बा दिखाते हैं। लेकिन, इन दोनों धमाकों के समय इन घटनाओं को नजदीक से महसूस करने और मुंबई के लोगों की हालत देखकर लगा कि ये मीडिया बार-बार तय तरीके से मुंबई के लोगों को अपने घाव का इलाज करने के बजाए उसे दबाने, घाव में मवाद बनने को मजबूर कर देता है। ये थोपी गई जिंदादिली ही है कि लोगों का गुस्सा बाहर आने पर एक सामूहिक सहमति की रोक हावी हो जाती है। 11/7 के सीरियल लोकल ट्रेन ब्लास्ट के काफी दिन बाद मैं लोकल से लोवर परेल स्टेशन से ठाणे जा रहा था। अचानक बीच के एक स्टेशन पर अफवाह फैली, ट्रेन में बम है। और, मीडिया में कभी थमती न दिखने वाले मुंबईकर ऐसे थमे कि 3 सेकेंड भी नहीं लगे होंगे और पूरी ट्रेन खाली हो गई। मैं खुद फुर्ती देखकर भी हैरान था कि इतनी तेजी से कैसे में लोकल के डिब्बे से स्टेशन पर आ गया।

26/11 के हादसे के समय और उसके बाद भी मुंबई के लोगों की सांसें थमी की थमी रह गईं थीं। लेकिन, डर, आतंक की बात करना तो, देश में निराशा फैलाना वाला माना जाता। और, जब झूठे साहसी बनना हो तो, भला कोई क्यों पीछे रहता। लोगों को गुस्सा तक दिखाने की इजाजत नहीं थी। पता नहीं कैसे समाचार चैनलों और अखबारों में बिना कहे ये सहमति बन जाती है कि इस समय लोगों का गुस्सा मत दिखाइए, पॉजिटिव स्टोरी दिखाइए। जिसने घायल लोगों को धमाके के बीच से निकालकर अस्पताल पहुंचाया हो, उसे हीरो बना दीजिए। एक-दो कॉमनमैन यानी आम आदमी को हीरो बना-दिखाकर मीडिया लोगों का गुस्सा दबा देती है। लोग हीरोइक स्टोरी में फंस जाते हैं और आतंकवादी फिर से ढेर सारे आम आदमियों को मौत के घाट उतारने की तैयारी करने में लग जाते हैं। हमें ऐसा बना दिया गया है कि अब कुछ दिन ही लगता है किसी आतंकी हमले को भूलने में। मीडिया में बरसी की खबरों से भले याद आ जाए।

गुस्सा बाहर न आने देने साजिश और लोगों की जिंदादिल बनाए रखने की साजिश ऐसी हावी होती है कि लोग मजबूरी में आंसू पीकर मुस्कुराने लगते हैं। फिर भावनात्मक कहानियां खोजी जाने लगती हैं। मोमबत्ती जलाए कुछ लोगों के शॉट्स दिखाकर ही आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की मजबूती मान ली जाती है। और, आतंकवाद के असली मुद्दे से लोगों का ध्यान ही भटक जाता है। कौन बताए-समझाए कि अरे, मजबूरी है भइया। इसलिए जिंदादिल नजर आते हैं। ऐसे जिंदादिल कि कांग्रेस के वही महासचिव राहुल गांधी जो, भट्टा-पारसौल में किसानों पर जमीन अधिग्रहण के मामले में मायावती सरकार के खिलाफ रात के अंधेरे में गांव में चुपचाप घुसकर लड़ाई का एलान कर देते हैं। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का एलान और उसके बाद कौन सी लड़ाई राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी ने लड़ी है। उस पर राहुल गांधी मुंबई हमलों पर बयान दे देते हैं कि एक-दो हमले रोके नहीं जा सकते। इराक-ईरान में तो, ऐसे हमे रोज होते रहते हैं। लेकिन, हम हिंदुस्तानियों पर तथाकथित जिंदादिली ऐसी हावी है कि हम राहुल गांधी के बयान पर भी गुस्सा नहीं होते। इस बात पर भी गुस्सा नहीं होते कि पूरी कांग्रेस पार्टी इस बयान को सही साबित करने में जुट जाती है।

इस बात पर भी हम हिंदुस्तानी अपनी जिंदादिली का त्याग नहीं कर पाते। मीडिया ये चिल्लाने लगता है कि मुंबई में धमाके के बाद हो रही बारिश से सारे सबूत धुल जाने के अंदेशा है। पता नहीं हम ये याद क्यों नहीं कर पाते कि आखिर अब तक सारे सबूत मिलने के बाद भी क्यों नहीं एक भी आतंकी को उसके किए की सजा हम दे पाए। कसाब, अफजल गुरू जैसे लोग हमारी जेल में होते हुए भी हमारे खास मेहमान से बढ़कर हैं। आंकड़े आते रहते हैं कि कसाब पर हर रोज करीब एक करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं। स्पेशल कोर्ट, फास्ट ट्रैक कोर्ट ये सब आतंकियों को सजा सुनाकर फांसी के फंदे तक क्यों नहीं पहुंचा पातीं। जवाब साफ है क्योंकि, कांग्रेस के युवराज को लगता है कि ऐसे एक दो हमले तो रोके नहीं जा सकते। एक दिन मुकर्रर करके सरकार देश की सभी जेलों में बंद आतंकवादियों को एक साथ क्यों फांसी के फंदे पर लटकाती।

लेकिन, ऐसा भला कैसे हो सकता है। मुंबई हमले के करीब 48 घंटे बाद आतंरिक सुरक्षा सचिव बयान दे देते हैं कि सभी आतंकी संगठनों पर साजिश का शक है। अब समझ लीजिए, किसी पर और कैसे कार्रवाई हो सकती है। फिर बात तो, वही है ना कि, जब ऊपर से संदेश आतंकवाद को राजनीतिक फायदे के रूप में इस्तेमाल करने का हो तो, कार्रवाई कौन और कैसे करेगा। खैर, इस सरकार का जो, अंदाज है वो, साफ कह रहा है कि हिंदुस्तानियों आदत डाल लो। मुंबईकरों आदत डाल लो। हम तुम्हारे न थमने वाले जज्बे की तारीफ करते रहेंगे। तुम अपने कुछ लोगों को खोकर, फिर से सुबह काम के लिए चल पड़ना। क्योंकि, मुंबई-दिल्ली में क्या उदारीकरण के बाद देश के किसी भी हिस्से में कितने भी बड़े हादसे के गम जो, रुक जाएगा-थम जाएगा। बगल वाला वैश्वीकरण वाले इंडिया में एक पायदान ऊपर चला जाएगा। काश एक बार आतंकवाद के दिए जख्म से मुंबई थम जाए, देश थम जाए तो, शायद इसका कुछ इलाज निकल सके। क्योंकि, अब तो देश के सबसे ताकतवर शख्स के तौर पर स्थापित राहुल गांधी भी ये साफ कह रहे हैं ऐसे हमले रोकने की क्षमता उनमें और उनकी सरकार में नहीं है।

Tuesday, July 12, 2011

सुस्त बाजार, गायब पब्लिक ऑफर


इस साल शेयर बाजार की डांवाडोल रफ्तार बाजार के जरिए पैसा जुटाने की इच्छा रखने वाली नई कंपनियों पर भारी पड़ती दिख रही है। साल 2011 आधा बीत रहा है और अभी तक शेयर बाजार के प्राइमरी मार्केट में पैसा लगाने वालों के लिए ज्यादा विकल्प नहीं दिख रहे हैं। पिछले साल की तेजी के भरोसे इस साल कई कंपनियों ने अपना आईपीओ लाने का इरादा कर रखा था। लेकिन, प्राइमरी मार्केट में कंपनियां उतरने का साहस ही नहीं जुटा पा रही हैं। जनवरी से जून महीने की ही बात करें तो, 15 आईपीओ बाजार में उतरने थे लेकिन, समयसीमा खत्म होने के बाद भी वो, बाजार में नहीं आए। ये वो 15 आईपीओ यानी इनीशियल पब्लिक ऑफर थे जिन्हें, बाजार रेगुलेटर सेबी से मंजूरी मिल चुकी थी। एक बार समय सीमा खत्म होने का सीधा सा मतलब ये हुआ कि अब इनके पब्लिक ऑफर फिलहाल तो नहीं आ सकेंगे।

जिन कंपनियों के आईपीओ सेबी से मंजूरी के बाद भी बाजार में नहीं आ सके। वो, कंपनियां हैं जिंदल पावर, रिलायंस इंफ्राटेल, गुजरात स्टेट पेट्रोलियम, स्टरलाइट एनर्जी, लोढ़ा डेवलपर्स, बीपीटीपी, एंबियंस, ग्लेनमार्क जेनेरिक्स, नेपच्यून डेवलपर्स, कुमार अर्बन डेवलपर्स और एएमआर कंसट्रक्शंस। इनमें से ज्यादातर कंपनियां या तो रियल एस्टेट सेक्टर की हैं या फिर पावर सेक्टर की। वैसे, इन कंपनियों के आईपीओ न आ पाने की बड़ी वजह ये है कि रियल एस्टेट सेक्टर के हालात अंदर से खराब हैं। ज्यादातर कंपनियों के प्रोजेक्ट देरी से चल रहे हैं और पिछले छे महीने में कीमतें भी स्थिर रही हैं। इसके अलावा पावर सेक्टर की कंपनियों के आईपीओ के लटकने की जो वजह बताई जा रही है वो, ये कि पावर सेक्टर की कंपनियों को निवेश पर मुनाफा कमाना मुश्किल हो गया।

अब ये 15 आईपीओ बाजार से बाहर हो चुके हैं। अगर ये आईपीओ बाजार में आते तो, करीब 25 हजार करोड़ रुपए बाजार से जुटाते। लेकिन, फिलहाल आईपीओ बाजार में दिख रही सुस्ती से निवेशकों को सिर्फ सेकेंडरी बाजार के सहारे ही रहना पड़ रहा है। सेकेंडरी बाजार यानी वो, शेयर जो पहले से ही शेयर बाजार में लिस्टेड हैं। आईपीओ बाजार में कमजोरी की सबसे बड़ी वजह यही मानी जा रही है कि साल 2011 की पहली छमाही में एफआईआई निवेश की रफ्तार बहुत घटी है। इसकी वजह से सेंसेक्स जो, दिवाली पर 21000 का स्तर पार कर गया था। उसके बाद 18000-19000 के बीच में ही लटक रहा है।


दरअसल पिछले साल के आखिर में जिस तरह से बाजार में तेजी आई थी। और, देश की तरक्की दस अंकों के नजदीक जाती दिख रही थी। उसने निवेशकों का सेंटिमेंट बेहद मजबूत कर दिया था। बाजार के कई तो, सेंसेक्स के इस साल जुलाई के महीने तक 25000 के नजदीक पहुंचने की भविष्यवाणियां भी करने लगे थे। लेकिन, एक के बाद एक घपले-घोटालों की सरकार के कारनामे जैसे-जैसे सामने आने लगे, धीरे-धीरे सारे सेंटिमेंट उल्टी दिशा में चल पड़े। महंगाई को 5-6 प्रतिशत के बीच में लाने का भरोसा बार-बार दिलाने वाली ये सरकार अब बात करने लगी है कि 7-8 प्रतिशत की महंगाई दर ही अभी की सही महंगाई दर है।

इस सबने भारतीय बाजारों के सेंटिमेंट को बुरी तरह प्रभावित किया है। सेंसेक्स के दिग्गज रिलायंस के लिए एक के बाद एक उत्पादन से लेकर नीतियों में फेरबदल कराने तक की ऐसी खबरें आईं कि ये उबर ही नहीं पा रहा । यही वजह है कि कंपनियों नए आईपीओ बाजार में उतारने का साहस नहीं कर पा रही हैं। साल 2010 के आखिर में बाजार में आई शानदार तेजी के भरोसे आईपीओ में पैसा लगाकर निवेशकों ने जमकर मुनाफा कमाया। पिछले साल के आखिर में आए कोल इंडिया के आईपीओ ने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। और, कोल इंडिया ही क्यों, साल 2010 शेयर बाजार में आईपीओ मार्केट के लिए कितना खास रहा इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सिर्फ सरकारी कंपनियों के पब्लिक इश्यू में ही दस लाख से ज्यादा निवेशक शामिल हुए। हां, सबसे बड़ा धमाका रहा कोल इंडिया के काले सोने का।


साल 2010 में शेयर बाजार के प्राइमरी मार्केट की सबसे बड़ी खबर बनी करीब पंद्रह हजार करोड़ रुपए का कोल इंडिया का आईपीओ। कोल इंडिया ने देश का सबसे बड़ा IPO बाजार में उतारा और निवेशकों ने इसे हाथों हाथ लिया। दिवाली के पहले आए इस IPO ने निवेशकों को मालामाल भी किया। कोल इंडिया के पब्लिक इश्यू में पैसा लगाने वाले निवेशकों को 60 प्रतिशत तक मुनाफा कमाने को मिला। कोल इंडिया का IPO निवेशकों के लिए काला सोना साबित हुआ। ये शेयर ऐसा चढ़ा कि इसने मार्केट कैपिटलाइजेशन में ओएनजीसी तक को पीट दिया। इसके बाद तो जो भी IPO आए निवेशकों ने उसे हाथों हाथ लिया। सिर्फ सरकारी कंपनियों के ही पब्लिक इश्यू के लिए दस लाख से ज्यादा निवेशक लाइन में लगे। कोल इंडिया (CIL) के अलावा पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन (PGCIL), और मैंगनीज ओर (MOIL) के IPO को अच्छा रिस्पॉन्स मिला।

इसके अलावा साल 2010 में जितने IPO आए हैं वो, तेजी 3 साल के बाद दिखी है। 2007 में तेजी के दौर में 96 IPO आए थे लेकिन, जनवरी 2008 में शुरू हुई मंदी के असर से 2008 में 36 और 2009 में सिर्फ 21 कंपनियां ही बाजार में अपना IPO लाने की हिम्मत जुटा सकीं। 2010 में 72 IPO आए। यानी साल 2010 प्राइमरी मार्केट के लिए शानदार साबित हुआ है। लोगों को उम्मीद थी कि साल 2011 भी आईपीओ मार्केट के लिए धमाकेदार साबित होगा। लेकिन, आधा साल बीत जाने के बाद भी इस साल अब तक सिर्फ 24 आईपीओ ही बाजार में आए हैं। अब उम्मीद साल की अगली छमाही पर ही टिकी है। लेकिन, वो तेजी तभी आएगी जब महंगाई से राहत मिले और देश की तरक्की की रफ्तार फिर से तेज हो सके। साथ ही सबसे जरूरी ये कि देसी उद्योगपतियों को ये न लगे कि भारत से बेहतर मुनाफा भारत से बाहर पैसा लगाकर बनाया जा सकता है। ये सब हुआ तभी विदेशी निवेशक फिर से लौटेंगे और उनके भरोसे देसी निवेशक भी। इसलिए अभी प्राइमरी मार्केट में पैसा लगाने वाले निवेशकों के लिए सलाह यही है कि वो, सोच-समझकर ही किसी नई कंपनी में रकम लगाएं।


कुल 25000 करोड़ रुपए के आईपीओ बाजार में नहीं आए


2007 में 96 आईपीओ आए


2008 में 36 आईपीओ आए


2009 में सिर्फ 21 आईपीओ आए


2010 में 72 आईपीओ आए


2011 में अब तक सिर्फ 24 आईपीओ आए


(ये लेख शुक्रवार पत्रिका में छपा है)

Tuesday, July 05, 2011

तरक्की की रफ्तार में महंगाई का बड़ा ब्रेकर


आम आदमी को आम आदमी की सरकार ने एक बार फिर भरोसा दिया है। इस बार चुप रहने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अरसे बाद बोले हैं। और, बोले ये कि मार्च तक महंगाई के बढ़ने की दर छे-साढ़े छे प्रतिशत तक आ जाएगी। इससे ये तो साफ हो गया कि अगले नौ महीने तक 8-9 प्रतिशत की महंगाई दर बनी रहेगी, इसके लिए जनता से उन्होंने लगे हाथ अभयदान भी मांग लिया है। वैसे भी लोकतंत्र में जनता को अपनी सुनाने का मौका पांच साल बाद ही मिलता है। इसलिए मार्च में भी महंगाई दर छे- साढ़े छे प्रतिशत तक आएगी या नहीं ये तो, आगे की आर्थिक परिस्थितियां तय करेंगी। क्योंकि, पिछले दो साल से सरकार, यानी प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और उनकी आर्थिक सलाहकार मंडली दसियों बार आम जनता को ये भरोसा दिला चुकी है कि महंगाई दर बस अगले तीन महीने में छे- साढ़े छे प्रतिशत तक आ जाएगी। लेकिन, हुआ क्या- वही ढाक के तीन पात।


महंगाई दर नौ प्रतिशत के आसपास ऐसी अंटकी है कि जरा सी नीचे उतरती है तो, सरकारी फैसला ही उसे ऊपर चढ़ने की ताकत दे देता है। दरअसल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी सलाहकार मंडली से उम्मीद थी कि ये देश की सबसे सुधारवादी सरकार चलाएंगे। और, देश की तरक्की की रफ्तार को तेजी से बढ़ाएंगे लेकिन, पिछले कुछ समय से सरकार जिस तरह से घपले-घोटालों में फंसी है उसमें सुधार पीछे छूट गए हैं। और, महंगाई-घोटालों के अलावा तरक्की का हर पैमाना छोटा होता जा रहा है।


अभी का एक सरकारी फैसला जिसके बूते महंगाई दर तेज छलांग मारने की तैयारी में है वो, है डीजल, रसोई गैस और केरोसिन के दाम बढ़ाना। वैसे सरकार बार-बार ये कह रही है कि ये हमारी मजबूरी है। और, ये काफी हद तक सच भी है कि सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ाने का वो फैसला लेना पड़ा जो, उसके लिए गले की हड्डी साबित हो रहा है। घपले-घोटाले और महंगाई से पहले से ही बुरी तरह से मार खाई सरकार के लिए ये फैसला लेना आसान नहीं था। यहां तक कि इस फैसले के लिए होने वाली एम्पावर्ड ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स की बैठक कई-कई बार टाल दी गई। लेकिन, जब पानी गले तक आ गया तो, सरकार लगा कि ये फैसला लेना जरूरी है।

सरकार जनता की भलाई के नाम पर दी जाने वाली तेल कंपनियों की सब्सिडी को खत्म करने का मन तो, यूपीए के पहले कार्यकाल में ही बना चुकी थी। इसीलिए वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने बजट में ही साफ कर दिया था कि पेट्रोलियम उत्पादों पर धीरे-धीरे सब्सिडी खत्म की जाएगी। 2009-10 के मुकाबले 2010-11 में सरकार ने तेल कंपनियों को दी जाने वाली सब्सिडी करीब-करीब आधी कर दी। और, इस वजह से सरकार ने 25 जून 2010 को बाजार के हवाले करने के बाद से पेट्रोल करीब 25 परसेंट महंगा करने की इजाजत तेल मार्केटिंग कंपनियों को दे दी। लेकिन, आम आदमी का होने का दावा करने वाली यूपीए सरकार ने खुद भी ये नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी डीजल, रसोई गैस और केरोसिन जैसी आम आदमी के जरूरत वाले पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत उन्हें बढ़ानी पड़ जाएगी।

लेकिन, सरकारी खजाने पर जब करीब पौने दो लाख करोड़ रुपए का अंडररिकवरी का बोझ वित्तीय घाटे को बढ़ाने लगा तो, सरकार के लिए ये मजबूरी बन गई। वैसे इसी सरकार ने आर्थिक मजबूरियों पर बार-बार राजनीतिक मजबूरियों को तवज्जो दी है। इस साल जनवरी से मार्च के बीच जब कच्चे तेल के भाव 110 से 115 डॉलर प्रति बैरल की खतरनाक ऊंचाई पर पहुंच गए थे तो, भी सरकार ने राजनीतिक मजबूरियों के ही चलते पेट्रोलियम उत्पादों के दाम नहीं बढ़ाए। क्योंकि, बंगाल और केरल से लेफ्ट के सफाए का मौका कांग्रेस छोड़ना नहीं चाहती थी। यही वो, तीन महीने थे जब तेल कंपनियों का घाटा करीब 50000 करोड़ रुपए बढ़ गया था।

और, अब फैसला तब लिया गया जब कच्चे तेल के भाव घटकर 90-95 डॉलर प्रति बैरल के बीच आ गए। लेकिन, पहले का घाटा सुरसा के मुंह की तरह फैला हुआ था। अब डीजल की कीमते बढ़ने के बाद तेल मार्केटिंग कंपनियों का नुकसान 21000 करोड़ रुपए कम होगा। लेकिन, अभी भी सालान 1.20 लाख करोड़ रुपए का नुकसान बना रहेगा। अब एक लीटर डीजल पर तेल कंपनियों का नुकसान घटकर 6.40 रुपए रह गया है।

विपक्षी पार्टियों के पास आम जनता का गुस्सा भड़काने के ज्यादा तर्क न मिलें इसलिए सरकार ने इस बार ड्यूटी भी काफी घटाई है। डीजल पर लगाने वाली एक्साइज ड्यूटी अब 2 रुपए लीटर रह गई है। जबकि, अब तक ये ड्यूटी 4.60 रुपए प्रति लीटर थी। इससे सरकारी खजाने पर इसी वित्तीय वर्ष में 23000 करोड़ रुपए की चोट लगेगी। सरकार ने कस्टम ड्यूटी भी 5 परसेंट घटाई है। इसका मतलब ये हुआ कि कच्चे तेल पर अब कोई कस्टम ड्यूटी नहीं लगेगी और डीजल पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी 7.5 परसेंट से घटकर सिर्फ 2.5 परसेंट रह गई है। और, इससे सरकार खजाने से सीधे-सीधे 26000 करोड़ रुपए गायब हो जाएंगे। कुल मिलाकर इस बार ड्यूटी में हुई कटौती से सरकार को वित्तीय वर्ष 2012 में करीब 50 हजार करोड़ रुपए का नुकसान होने वाला है

लेकिन, एक जो सबसे बड़ी बात हुई है कि इस ड्यूटी कटौती के बाद अब पेट्रोल का जो, आज का भाव है इस पर तेल मार्केटिंग कंपनियों को होने वाला नुकसान खत्म हो गया है। यानी अब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अगर इसी स्तर पर बनी रहीं तो, पेट्रोल पर इन कंपनियों को कोई नुकसान नहीं होगा। दरअसल अर्थशास्त्रियों की सरकार होने के बावजूद आर्थिक मोर्चे पर सरकार की जो, दुर्गति हुई है। सरकार अब इस बार के फैसले से ये कलंक घोना चाहती है।

लेकिन, ये कलंक धुल पाएगा। इसमें संदेह दिख रहा है। क्योंकि, डीजल के एक रुपया महंगा होने का मतलब है कि महंगाई दर 0.14 प्रतिशत बढ़ जाएगी। तीन रुपए डीजल महंगा होने का मतलब हुआ कि करीब आधा परसेंट महंगाई दर में तेजी। इसके अलावा रसोई गैस और केरोसिन की महंगाई भी असर करेगी। बिना डीजल, रसोई गैस और केरोसिन की कीमत बढ़े ही पिछले तीन साल में महंगाई ने इस सरकार के आम आदमी की जेब से करीब छे लाख करोड़ रुपए निकाल लिए हैं। क्रिसिल की रिपोर्ट बता रही है कि महंगाई की वजह से 2008 में 45,000 करोड़ रुपए, 2009 में 1,60,000 करोड़ रुपए और 2010 में 3,70,000 करोड़ रुपए का चूना जनता को लग चुका है। यानी तीन साल में 5,80,000 करोड़ रुपए का चूना।


ये चूना कैसे लगा इसे कुछ उदाहरण से समझा जा सकता है। यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के एक साल में पेट्रोल 25 रुपए महंगा हो गया। दूध 8 रुपए महंगा हो गया। स्कूल फीस करीब 20 प्रतिशत बढ़ गई। इंजीनियरिंग, मेडिकल की कोचिंग फीस सवा लाख से डेढ़ लाख रुपए तक महंगी हो गई। दवाएं भी 17 प्रतिशत महंगी हुईं। कपड़े भी 10-15 प्रतिशत महंगे हो गए। ये कुछ उदाहरण भर हैं। सच्चाई ये है कि इस साल भर में सबकुछ महंगाई हुआ है।

और, इस सबका बुरा असर ये कि भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी से उतरती दिख रही है। साल भर पहले दस परसेंट की तरक्की की रफ्तार पर पहुंची भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार पांचवीं तिमाही तक आते-आते आठ परसेंट से भी कम रह गई। दरअसल, पिछले कुछ समय से सरकार जिस तरह से व्यवहार कर रही है वो, देश के भीतर और बाहर उद्योगों और निवेश को लुभाने में नाकामयाब रहा है। एक समय में सबसे सुधारवादी सरकार चलाने का तमगा रखने वाले मनमोहन सिंह के समय में महंगाई बढ़ती जा रही है, विदेशी निवेश घटता जा रहा है और तरक्की की रफ्तार उल्टे पांव लौट रही है।

हालांकि, इस वित्तीय वर्ष में भी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत आठ परसेंट से ज्यादा की रफ्तार से बढ़ती दिख रही है। जो, चीन के बाद दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा है। लेकिन, उद्योगों से संकेत अच्छे नहीं आ रहे हैं। औद्योगिक उत्पादन के बढ़ने की रफ्तार 7.3 परसेंट से घटकर 6.3 परसेंट रह गई है। महंगाई 9 परसेंट के ऊपर बनी हुई है। 2010-11 में विदेशी निवेश पहले के साल से 28.5 परसेंट घटा है। और, इस सबका बुरा असर बाजार पर तो दिखना ही था। दीवाली पर इक्कीस हजार पार कर चुका सेंसेक्स अठारह हजार के आसपास ही अंटका हुआ है। यानी करीब 14 परसेंट की गिरावट। मंदी से उबरने में हमने दुनिया के दूसरे देशों से तेजी दिखाई तो, लगा कि चलो तेज तरक्की सब भरपाई कर देगी। लेकिन, अब तरक्की की रफ्तार के रास्ते में महंगाई का ऐसा बड़ा ब्रेकर बनता दिख रहा है। जहां रफ्तार बेहद धीमी होनी ही है। और, सरकार लाख तर्क-कुतर्क करे सच्चाई यही है कि ढेर सारे अर्थशास्त्रियों से भरी इस सरकार के कुप्रबंधन के कारण ये हालात हुए हैं। इसमें मांग-आपूर्ति जैसे अर्थशास्त्र के स्थापित नियमों का कोई दोष नहीं है।
(ये लेख शुक्रवार पत्रिका में छपा है)

Thursday, June 23, 2011

जनता के पसीने की कमाई, निजी कंपनियों को मलाई



भ्रष्टाचार के एक और बड़े मुद्दे ने लेफ्ट-राइट को एक साथ ला खड़ा किया है। निजी तेल कंपनियों को फायदा पहुंचाने की सरकारी कोशिशों की जिक्र सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में आने के बाद विपक्ष हमलावर हो गया है। हालांकि, सरकार इस मामले को हल्का करने की कोशिश कर रही है और इस मामले पर पत्रकारों को सही रिपोर्टिंग की सलाह दे रही है। और, ये समझाने की कोशिश कर रही है कि सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट आखिरी पड़ताल नहीं है। लेकिन, इसने विपक्ष को तगड़ा मुद्दा दे दिया है। मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने सरकार पर हमला बोल दिया कि सरकार ने राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करके निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाया है। पिछले शुक्रवार को सीएजी रिपोर्ट में रिलायंस और दूसरी निजी कंपनियों को फायदे के आरोप पर बीजेपी और लेफ्ट ने एक साथ हमला बोला।


बीजेपी की तरफ से वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी थे तो, लेफ्ट की तरफ से सीताराम येचुरी। जोशी और येचुरी दोनों ने ही साफ कहा कि इसकी जांच होनी जरूरी है। जोशी ने सवाल उठाया है कि आखिर तेल रिपोर्ट लीक कैसे हो गई। जोशी ने ये भी सवाल खड़ा किया है कि कोई भी रिपोर्ट बिना संसद में पेश हुए कैसे कहीं पब्लिश की जा सकती है। पहले से ही भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जूझ रही सरकार के लिए निजी कंपनियों को तेल के खेल में फायदा पहुंचाने का आरोप और भारी पड़ता दिख रहा है। और, सबसे बड़ी बात ये है कि इस मुद्दे पर लेफ्ट-राइट दोनों साथ हैं। इससे इस मामले की सीबीआई जांच होनी तय दिख रही है। सीताराम येचुरी ने आरोप लगाया कि सरकार देश के प्राकृतिक संसाधनों को निजी कंपनियों को गलत इस्तेमाल के लिए सौंप चुकी है और इसकी जांच होनी जरूरी है।


देश उद्योगपति चलाते हैं ये बात अकसर आम लोगों की चर्चा में आती रहती है। लेकिन, उद्योगपति देश चलाने में किस कदर हावी हो रहे हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कि अब निजी कंपनियों की कमाई बढ़ाने के लिए खुद सरकार और सरकारी हितों की चिंता के लिए बनाए गए विभाग निजी कंपनियों के पक्ष में बनी-बनाई नीतियों की ऐसी-तैसी करने से नहीं चूक रहे हैं। ताजा मामला तेल की खोज के बहाने राष्ट्रीय हितों को पूरा करने का दावा करने वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज और केयर्न को नियमों की अनदेखी करके फायदा पहुंचाने का है।

देश की सर्वोच्च ऑडिट संस्था सीएजी की ताजा रिपोर्ट में जो निकलकर आ रहा है वो, चौंकाने वाला है। रिपोर्ट साफ कह रही है कि रिलायंस ने केजी यानी कृष्णा गोदावरी बेसिन में जो, खोज की है उसके लिए उसने सरकार से वो रकम भी वसूल ली है जो, रकम खर्च ही नहीं हुई थी। रिलायंस को उसके ऑफशोर पेट्रोलियम उत्पाद की खोज में लगे पेट्रो उत्पाद की खोज के लिए रकम भी ज्यादा दी गई। सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2007-08 में आंध्र प्रदेश के कृष्णा गोदावरी बेसिन में ऑपरेशंस के लिए रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अपनी सहयोगी कंपनी से ही ऊंची कीमत पर डीजल खरीदा और सरकार से 745 मिलियन डॉलर यानी करीब साढ़े तीन हजार करोड रुपए की रिकवरी का दावा पेश कर दिया। जबकि, रिलायंस ने ये रकम खर्च ही नहीं की थी।

रिलायंस ने कमाल का तेल का खेल किया है। सीएजी की रिपोर्ट में साफ नजर आ रहा है कि किस तरह से कंपनी ने अपनी ही सहयोगी कंपनी को ऑपरेशंस के लिए डीजल की बोली सौंप दी। 2006 में के जी बेसिन में तेल कुओं की खोज के लिए बोली लगी तो, रिलायंस की सहयोगी रिलायंस पेट्रोल मार्केटिंग लिमिटेड ने 25457 रुपए प्रति किलोलीटर की बोली लगाई। जबकि, इंडियन ऑयल ने उससे कम 23,054 रुपए प्रति किलोलीटर की बोली लगाई। लेकिन, रिलायंस ने सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल की कीमत में ही एक्साइज ड्यूटी और दूसरे टैक्स जोड़ दिए जिससे इंडियन ऑयल की बोली महंगी हो गई और रिलायंस ने अपनी ही सहयोगी कंपनी रिलायंस पेट्रो मार्केटिंग लिमिटेड को 25457 रुपए प्रति किलोलीटर पर 4000 किलोलीटर का ऑर्डर कर दिया। जबकि, सीएजी की राय साफ है कि एनईएलपी यानी न्यू एक्सप्लोरेशन लाइसेंसिंग पॉलिसी के तहत यहां एक्सपोर्ट ड्यूटी लगनी ही नहीं थी।

इतना ही नहीं के जी बेसिन के लिए 2008 में एक और बोली मंगाई। जिसमें सरकारी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और भारत पेट्रोलियम ने 23463 रुपए प्रति किलोलीटर की बोली लगाई। रिलायंस ने इन कंपनियों को इसी आधार पर एक मार्च 2008 को पांच-पांच हजार किलोलीटर की सप्लाई का ऑर्डर दे दिया। लेकिन, ये दोनों कंपनियां सप्लाई करतीं इससे पहले ही 4 मार्च 2008 को ऑपरेटर रिलायंस इंडस्ट्रीज ने एक इंटर्नल नोट जारी करके कहा कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और डीजल की कमी के कारण सरकारी तेल कंपनियां डीजल की सप्लाई करने की हालत में नहीं हैं। और, इसी आधार पर रिलायंस ने तीन दिन बाद ही फिर से अपनी सहयोगी रिलायंस पेट्रोल मार्केटिंग लिमिटेड को 31,601 रुपए प्रति किलोलीटर के भाव पर 3600 किलोलीटर की सप्लाई का ऑर्डर दे दिया। ये सीधे-सीधे इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम के भाव से 8137 रुपए प्रति किलोलीटर ज्यादा था। हालांकि, रिलायंस ने मीडिया में बयान जारी किया है कि उसे अभी तक सीएजी की रिपोर्ट नहीं मिली है। और, वो एक जिम्मेदार ऑपरेटर की तरह पीएससी यानी प्रोडक्ट शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट के नियमों से बंधी है। रिलायंस गुजरात के जामनगर में 330 लाख टन क्षमता वाली रिफाइनरी चलाती है। इसमें एक एक्सपोर्ट यूनिट भी शामिल है। खैर, रिलायंस लाख सफाई दे और सरकार इस गड़बड़झाले को दबाने की कोशिश करे। लेकिन, मीडिया में इस घोटाले की खबर खबर आने के बाद से रिलायंस के शेयरों में जोरदार गिरावट देखने को मिली है। हफ्ते के पांचों कारोबारी दिन लगातार रिलायंस के शेयरों में गिरावट देखने को मिली है। शुक्रवार को बाजार बंद हुआ तो, रिलायंस का शेयर 52 हफ्ते के निचले स्तर पर लुढ़क गया और 868 रुपए के भाव पर चला गया।

सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में रिलायंस को नियमों से बाहर जाकर सरकारी संरक्षण मिलने की लंबी लिस्ट है। इसमें कहा गया है कि रिलायंस को तीन बार से ज्यादा अपना कैपिटल एक्सपेंडिचर बढ़ाने की इजाजत दी गई। इसकी वजह से के जी तेल-गैस क्षेत्र में रिलायंस का कैपिटल एक्सपेंडिचर बारह हजार करोड़ रुपए से बढ़कर पैंतालीस हजार करोड़ रुपए हो गया। इस दौरान रिलायंस ने इस फील्ड के उत्पादन का अनुमान बढ़ाकर करीब दोगुना कर दिया। हालांकि, के जी बेसिन में डी 6 ब्लॉक में रिलायंस के उत्पादन अनुमान पर बार-बार संदेह किया जा रहा है।

सीएजी की रिपोर्ट में जो बात सामने आ रही है उसके मुताबिक, तेल और गैस उत्पादन पर निगाह रखने वाले नियंत्रक डीजीएच यानी डायरेक्टर जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन ने सरकारी हितों की रक्षा करने के बजाए निजी तेल-गैस खोजने वाली कंपनियों को फायदा पहुंचाया है। रिपोर्ट बता रही है कि कम से कम तीन निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों की अनदेखी की गई है या फिर नियमों को बदला गया है। जाहिर है, सरकारी गड़बड़ियों की मिसाल सिर्फ रिलायंस के ही हक में नहीं है। सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में जिन तीन निजी कंपनियों की बात की गई है वो, हैं रिलायंस इंडस्ट्रीज, केयर्न और ब्रिटिश गैस। कहा जा रहा है कि इन कंपनियों को मंत्रालय और डीजीएच की तरफ से नियमों में ऐसी ढील दी गई जिससे सरकारी नुकसान हुआ और इन कंपनियों को फायदा पहुंचा है।

रिलायंस के अलावा केयर्न इंडस्ट्रीज को भी सरकार की तरफ से फायदा पहुंचाया गया है। सीएजी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में आरोप है कि राजस्थान के बाड़मेर में केयर्न को कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों से हटके फायदा पहुंचाने का आरोप लगा है। केयर्न बाड़मेर में देश का सबसे बड़ा ऑनलैंड ऑयलफील्ड ऑपरेट कर रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि तेल मंत्रालय और तेल और गैस खोजने वाली कंपनियों को नियंत्रित करने के लिए बनी सरकारी संस्था डायरेक्टरेट जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन्स ने नियमों की जमकर अनदेखी की है। सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि केयर्न को कॉन्ट्रैक्ट में तय 11108 वर्ग किलोमीटर के अलावा 1708 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र दिया गया जो, पूरी तरह से शर्तों को उल्लंघन है। सीएजी की रिपोर्ट में ये बात भी सामने आई है कि तेल मंत्रालय और डीजीएच ने पिछले दरवाजे से निजी तेल कंपनियों को कई तरह से फायदा पहुंचाया। इसके अलावा रिलायंस इंडस्ट्रीज, बीजी यानी ब्रिटिश गैस और सरकारी तेल कंपनी ओएनजीसी के ज्वाइंट वेंचर वाले पन्ना मुक्ता और ताप्ती ग्रुप की गैस फील्ड पर भी सीएजी रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं।

अब मीडिया में मामला आने के बाद और विपक्ष के हमलावर होने के बाद हो सकता है कि सरकार इसमें कुछ कार्रवाई करे। लेकिन, लगातार एक के बाद एक भ्रष्टाचार के मामले जिस तरह से सामने आ रहे हैं। और, उन मामलों पर सरकार बलि का बकरा खोजकर ही कार्रवाई की इतश्री कर ले रही है। उससे अंदेशा है कि इस मामले में भी कुछ डीजीएच और तेल मंत्रालय के अधिकारियों पर कार्रवाई कर कहीं लीपापोती न कर दी जाए। जिसकी शुरुआत सरकारी बयानों के जरिये हो भी चुकी है।
(ये लेख शुक्रवार पत्रिका में छपा है)

Tuesday, April 12, 2011

खून में घुस गया है भ्रष्टाचार

अन्ना के आंदोलन को कितना बड़ा समर्थन मिल रहा है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बाजार को ये मजबूरी में अपने से जोड़ना पड़ रहा है। आज डिशटीवी रीचार्ज में गड़बड़ी पर फोन किया तो, डिश टीवी की प्रतिनिधि ने पहले अन्ना के सफल आंदोलन पर बधाई दी। फिर मैंने जब पता किया तो, पता चला कि 24 घंटे पहले जिस दुकान से डिश टीवी रीचार्ज कराया था। उसने पैसे ही नहीं जमा कराए। अन्ना के आंदोलन से मेरी भी उम्मीद जगी है। लेकिन, इन लोगों का क्या कर सकते हैं।



उसके बाद मैं वसुंधरा से इंदिरापुरम की उस दुकान पर गया। तो, दुकान मंगलवार की वजह से बंद थी। बोर्ड से देखकर फोन किया तो, उसने कहा अभी मैं डिशटीवी वालों को हड़काता हूं। फिर बोला कि अच्छा 5 मिनट में फोन करिए तो, बताता हूं। 5 मिनट बाद फोन करने पर उको जब मैंने अपने वीसी नंबर बताया तो, उसने साफ कहा कि इस नंबर का रीचार्ज तो उसने कल किया ही नहीं। फिर जब मैंने उसे हड़काया और न चाहते हुए भी मीडिया में होने और शिकायत की धमकी दी तो, उसी अंदाज में वो बोला कि हमारे लिए सब ग्राहक एक जैसे हैं।लेकिन, उसकी आवाज थोड़ी नरम हो गई थी। और उसने कहा 5 मिनट में बताता हूं। 5 मिनट बाद उसने मेरे पैसे जमा कराए और फिर फोन किया। ट्रांजैक्शन नंबर बताया। मैंने उसे हिदायत देकर फोन रखा। लेकिन भ्रष्टाचार की कहानी अभी बाकी थी। कस्टमर केयर से पता चला कि 250 में से उसने 248 का ही रीचार्ज कराया। मैंने कस्टमर केयर से पूछा क्या ये सही है तो, उसने कहा है तो, गलत लेकिन, 20 रुपए से कम की शिकायत हम दर्ज नहीं कर सकते। हमने भी 2 रुपए के दुकानदार के भ्रष्टाचार को बर्दाश्त किया मजबूरी में।



अन्नांदोलन का घोर समर्थक होने पर भी कुछ कर नहीं सका। क्योंकि, इस भ्रष्टाचार से निपटने के लिए समय और मानसिक शांति खोने की स्थिति में मैं नहीं हूं। फिर भी उम्मीद करता हूं कि अन्नांदोलन की आग भ्रष्टाचार पर पर कुछ प्रहार तो करेगी ही।

Tuesday, March 08, 2011

ये किसका बजट है वित्त मंत्री जी!

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने आखिरकार बजट पेश कर दिया। देश का बजट हर वित्त मंत्री को पेश करना होता है सो, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने भी कर दिया। कम से कम मुझे तो एक क्षण के लिए भी नहीं लगा कि वित्त मंत्री एक ऐसे महान क्षण के लिए संसद में खड़े हैं जिसका इंतजार पूरा देश साल भर से करता रहता है और अगले साल भर तक का लेखा-जोखा जिसके आधार पर ही होता है। फिर वो, मामला चाहे देश के साल भर के बजट का हो या फिर हमारे-आपके घर के बजट का।



वित्त मंत्री ने जब बजट भाषण पढ़ना शुरू किया और उसके बाद जैसे-जैसे उनकी एक-एक लाइनें आती गईं। लगा जैसे उनकी साल भर की मीडिया से मुखातिब होने वाली हर प्रेस कांफ्रेंस को वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने सहेज कर रहा था और उसका एक संग्रह करके बजट भाषण तैयार करवा दिया। जिस एक एलान की वजह से वित्त मंत्री उम्मीद कर रहे हैं कि इस बजट को आम आदमी का बजट करार दिया जाए। उसकी ही चर्चा कर लेते हैं। वो, है टैक्स की सीधी छूट में बीस हजार रुपए की और छूट। एक अप्रैल 2012 से डायरेक्ट टैक्स कोड लागू होना है जिसमें 2 लाख रुपए तक की कमाई टैक्स फ्री है। और, उस लिहाज से एक लाख साठ हजार से एक लाख अस्सी हजार रुपए तक की कमाई को टैक्स से मुक्त करना सीधे-सीधे मुखर्जी का वही बयान लगता है जिसमें वो, ये कह चुके थे कि डायरेक्ट टैक्स कोड की तरफ सरकार धीरे-धीरे कदम बढ़ाएगी।



खेती के उत्पादन और महंगाई पर वित्त मंत्री के बजट भाषण को याद कीजिए। एक भी लाइन ऐसी नहीं दिखी जो, नई हो। पिछले करीब 3 सालों से 6 महीने में एकाध महीने के चक्र को छोड़कर जनता लगातार महंगाई से त्रस्त थी तो, बार-बार सरकारी बयान यही आ रहा था कि दरअसल ये सारी समस्या सप्लाई साइड को लेकर है। और, वो भी तब जब लगातार पिछले 4 सालों से देश में अनाज और दूसरी जरूरी चीजों का उत्पादन दे दनादन हो रहा था। इतना कि हम लाखों टन अनाज मजे से सड़ा दे रहे थे। शायद ये आजाद भारत के इतिहास का पहला बजट होगा जिसमें कोई वित्त मंत्री अलग-अलग एक-एक फसलों के उत्पादन बढ़ाने पर इतनी छोटी-छोटी रकमों के एलान से खुश हो रहा हो। यहां तक कि वित्त मंत्री जी शहर के पास मंडी जैसी योजनाओं के लागू करने का कोई ठोस तरीका नहीं बता पाए। आखिर हर शहर के नजदीक में एक बड़ी मंडी तो, पहले से ही है। अब नोएडा, गुड़गांव, मुंबई, ठाणे, कोलकाता या दूसरे बड़े शहर में सब्जी या दूसरी चीजों का उत्पादन तो होने से रहा।



कच्चे तेल के भाव में लगी आग पर सरकार कैसे पानी डालेगी ये भी वित्त मंत्री के बजट भाषण में कहीं नहीं था। पूरे बजट में इसका खास जिक्र ही नहीं आया। ऑयल प्रोडक्ट पर ड्यूटी घटाने की मांग तेल मार्केटिंग कंपनियों से लेकर राज्य सरकारों और आम आदमी तक सबकी थी। लेकिन, पता नहीं क्यों वित्त मंत्री इस मुद्दे पर चुप्पी साध गए। इसकी महंगाई आएगी तो, कैसे घटाएंगे पता नहीं। महंगाई दर सात प्रतिशत पर लाने का वादा या दावा कई बार ध्वस्त होने के बाद अब मार्च का इंतजार कर रहा है। और, पुराने बयानों में से निकालकर वित्त मंत्री जी ने रिकॉर्ड चला दिया कि रिजर्व बैंक के कदम शानदार रहे हैं उसका असर भी शानदार है और अब महंगाई दर काबू में आ जाएगी।



एक और मुद्दा काला धन। जिस पर उम्मीद थी कि वित्त मंत्री कुछ आगे बढ़ेंगे। लेकिन, जब बजट पेश करते हुए संसद में वित्त मंत्री बोल रहे थे तो, मुझे लग रहा था कि मैं काले धन पर वित्त मंत्री की शास्त्री भवन के पीआईबी कांफ्रेंस हॉल में हुई प्रेस कांफ्रेंस में बैठा हूं। सारी लाइनें वही थीं। वही कि हमने कई देशों के साथ गलत तरीके से बाहर गए धन की जानकारी का समझौता किया है। वही कि हमने 5 सूत्रीय एजेंडे पर काम शुरू किया है जिससे काला धन वापस आ जाएगा। अब उससे काला धन वापस आता तो, सुप्रीमकोर्ट को बार-बार सरकार को फटकार क्यों लगानी पड़ती। लोगों को उम्मीद थी कि एमनेस्टी या फिर काले धन के कुछ गुनहगारों को वित्त मंत्री बजट में बेनकाब करेंगे। लेकिन, ऐसा कुछ नहीं हुआ।



सरकार जो, यूपीए 1 के समय से कहती आ रही है कि विनिवेश और आर्थिक सुधाररफर Hfj हमारे एजेंडे में ऊपर है। वही सब फिर से कह डाला। इस वित्तीय वर्ष में विनिवेश से मिली कमाई और अगले वित्तीय वर्ष में 40 हजार करोड़ का विनिवेश लक्ष्य फिर से बता डाला। कुल मिलाकर करीब 4 दशक से कुछ-कुछ अंतराल पर बजट पेश करते वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी कुछ ऊबे से लग रहे थे। जैसे कोई एक ऐसे काम से ऊब जाता है जिसमें अब उसके पास करने के लिए कुछ नया न हो। लेकिन, करना तो है क्योंकि, वो उसकी ड्यूटी में शामिल है। पॉपुलिस्ट के बहाने रिफॉर्मिस्ट सा लगने वाला बजट वित्त मंत्री पेश करने की कोशिश में लगे रहे। रिफॉर्मिस्ट दिखने से बाजार ने उम्मीदों की हवा भी भरी। लेकिन, बाजार बंद होते-होते वो हवा भी निकल गई। अब ये किसका बजट है किसके लिए बजट है ये कैसे समझा जाए। अबूझ पहेली हो गई है। बस बजट पेश करना था सो, पेश हो गया।
(ये लेख जनवाणी के संपादकीय पृष्ठ पर छपा है)

Saturday, February 05, 2011

हर मौत का अपना अर्थशास्त्र है

शाहजहांपुर में ITBP भर्ती के लिए उमड़े नौजवान

भगदड़ में होने वाली मौतें अखबार की सुर्खियां तो बनती ही हैं। एक साथ कुछेक, कुछ सैकड़ा लोगों की मौत हमेशा टीवी को विशेष तौर पर आकर्षित करती है। जब अचानक टीवी न्यूज चैनलों पर फ्लैश चलता है कि आईटीबीपी में भर्ती के लिए गए लाखों छात्रों ने शाहजहांपुर में हंगामा कर दिया है। बवाल मचा दिया है तो, बस बदइंतजामी भर की खबर थी। लेकिन, जब करीब सात लाख के अनुमानित बेरोजगारों का मेला वापसी के लिए रेलवे स्टेशन पर पहुंचा तो, ट्रेनों की छत पर चढ़े कई नौजवानों की स्टेशन पर बने पुल और बिजली के तारों से टकराने से हुई मौत असली खबर बन गई। और, इस खबर को मीडिया में जगह मिल गई। क्योंकि, ढेर सारी हंगामे के विजुअल थे, तस्वीरें थीं, आग थी। अब रेलवे और उत्तर प्रदेश सरकार सारा ठीकरा आईटीबीपी पर ठोंककर किनारा ले रहे हैं। लेकिन, इस बात पर बमुश्किल चर्चा हो पा रही है कि आखिर क्या वजह है कि देश में हर दूसरे-चौथे ऐसे किसी भर्ती अभियान, किसी रियल्टी शो या फिर किसी जगह कुछ मुफ्त में पाने की दौड़ में लोगों की जानें जा रही हैं।

अभी आईटीबीपी की नौकरी पाने की भगदड़ में मरे लोग चर्चा में हैं। सेना के भर्ती अभियानों में भी अकसर गोली चलने से लेकर भगदड़ में मरने की खबरें इस देश में आम हैं। पिछले साल नोएडा में अमेरिकन आइडल की नकल पर बने इंडियन आइडल रियलिटी शो के ऑडीशन में इंडियन आइडल बनने की चाह रखने वालों की ऐसी भीड़ उमड़ी कि आयोजकों के सारे इंतजाम धरे के धरे रह गए। अनियंत्रित भावी इंडियन आइडल्स ने जमकर हंगामा किया, भगदड़ में रौंदे गए कई आइडल अस्पताल पहुंच गए। नोएडा की सड़कों पर घंटों के लिए जाम लग गया। अखबार-टीवी चैनलों पर आयोजकों की बदइंतजामी खबर बन गई। भला हुआ कि इस भगदड़ में कोई अनिष्ट नहीं हुआ। लेकिन, क्या सचमुच कहीं-कोई इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश कर रहा है कि इस देश की भगदड़ की असली वजह क्या है। क्यों, हर दूसरे-चौथे देश भगदड़ लेने लगता है और अगर भगदड़ में देश के कुछ लोगों की मौत हो गई तो, थोड़ी बहुत खबर बन जाती है नहीं तो, भगदड़ों के बारे में कोई चर्चा तक नहीं होती। क्या भगदड़ इस देश की नियति बन गई है।

मंदिरों में आस्था की भीड़ में शामिल कितने लोग हर साल असमय ऊपर भगवान के पास चले जाते हैं इसका कोई हिसाब नहीं है। उत्तर प्रदेश में ही पिछले साल प्रतापगढ़ के कृपालु महाराज आश्रम में हुई भगदड़ और इसमें हुई मौतें भी बड़ी खबर बनी थी। वैसे तो, इस भगदड़ के देश की सबसे बड़ी खबर बनने के पीछे कई वजहें थीं। सबसे पहली कि ये एक स्वघोषित जगतगुरु कपालु महाराज के आश्रम में आयोजित भंडारे के दौरान हुई भगदड़ थी। दूसरी ये कि पहले के कई मंदिरों में मची भगदड़ों की तरह इस भगदड़ में भी कई निर्दोष जानें चली गईं थीं। तीसरी ये कि बाबाओं-साधुओं के इतने कुकर्म मौके से सामने आ रहे थे कि कृपालु महाराज के आश्रम में मची भगदड़ टीआरपी खींचू और पाठक संख्या बढ़ाऊ खबर बन गई। उस पर आश्रम के एक व्यस्थापाक का ये कह देना कि इन 65 मौतों के लिए ईश्वर जिम्मेदार है—खबरों में और मसाला डाल गया। भगवान भरोसे चलते इस देश में एक बार फिर भगवान के मत्थे 65 मौतों का जिम्मा देकर मामला निपटा लिया गया।

लेकिन, इन मौतों के जिम्मेदार ईश्वर तो बिल्कुल भी नहीं थे। कृपालु महाराज के यहां भंडारे में आए लोग मरे थे तो, उन पर जवाबदेही तय हो सकती है। लेकिन, क्या कृपालु महाराज जिम्मेदार थे। थोड़ा ध्यान से देखें तो, कैसे जिम्मेदार थे वो, तो कुछ भूखे-पेटों के भोजन का इंतजाम कर रहे थे साथ ही उन्हें कुछ रुपए और बरतन दे रहे थे। और, क्या ये भगदड़-मौत नहीं होती तो, वही कृपालु महाराज इतने परिवारों के लिए असली जगतगुरु नहीं प्रतिस्थापित हो जाते। तब तो, ये चर्चा टीवी-अखबारों में नहीं होती फिर भी, 25000 गरीबों के भगवान कृपालु ही बन जाते। और, अगले भंडारे में 50000 गरीब इस कृपालु भगवान के दरवाजे खड़े होते।

दरअसल इन भगदड़ मौतों के असली जिम्मेदार खोजकर उसके सही इलाज के बजाए सारी मशक्कत आईटीबीपी या फिर सेना के भर्ती केंद्र, किसी कृपालु, किसी इंडियन आइडल के आयोजक को गुनहगार बताकर असली समस्या पर ध्यान न जाए इसकी कोशिश सफलता पूर्वक काम कर रही है। ये गुनहगार हैं तो, पिछले साल मुंबई पुलिस की भर्ती के दौरान हुई भगदड़ में मारे-रौंदे गए लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है। लगभग हर बार सेना की भर्ती में सेना के जवान बनने के बजाए सेना के जवानों की गोली खाने के लिए अभिशप्त बेरोजगारों की मौतों-भगदड़ों का जिम्मेदार कौन है।

असली जिम्मेदारी किसकी है ये सबको पता है लेकिन, अगर असली जिम्मेदार खोज लिया गया तो, मुश्किल बढ़ जाएगी। अब ये तर्क आ सकता है कि इन सारी भगदड़ों-मौतों की जिम्मेदारी एक जगह जाकर कैसे तय हो सकती है। नोएडा, किसी महाराज का आश्रम, मुंबई या फिर देश के दूसरे हिस्सों में सेना की भर्ती या फिर रोजगार का कोई दूसरा मेला। दरअसल भूख और बेकारी असली वजह है इस देश की भगदड़-मौतों की। ये भगदड़ उसी बीस रुपए की वजह से है जिस पर अभी भी देश की बड़ी आबादी का रोजाना गुजर-बसर हो रहा है। ये हमारी पैदा की हुई विसंगति की भगदड़ है जहां दुनिया की मंदी में भी हम इंडिया ग्रोथ स्टोरी के सिर्फ थोड़ा धीमा पड़ने की बात करते हैं लेकिन, उन लोगों की चिंता बस इतने से पूरी हो जाती है कि साल के 365 दिन में से कम से कम 100 दिन का रोजगार हम देने वाली योजना ले आ रहे हैं। ये अलग बात है कि अलग-अलग राज्यों में 100 दिन के दावे का भी 18 से 60 प्रतिशत ही पूरा हो पा रहा है।

ये भगदड़ तरसते भारत के चमकते इंडिया के साथ की चाह में मची है। भूख-बेकारी के दौर में सेना या पुलिस की नौकरी के लिए लगी लाइन कोई देश सेवा की चाह में नहीं है। ये सिर्फ अपना और अपने परिवार का पेट भरने-जीवन स्तर बेहतर करने की चाह में लगी लाइन है। उस पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जैसा समझदार अर्थशास्त्री कह रहा है कि हमने महंगाई बढ़ने दी, बेरोजगारी नहीं। पिछले साल भर में टेक्सटाइल, आईटी, रिटेल, रियल इस्टेट, मैन्युफैक्चरिंग हर चमकते क्षेत्र से निकाले गए लोगों की बेरोजगारी की खबरों से ही टीवी-अखबार भरे रहते थे। इन सेक्टरों को जिंदा रखने के लिए रियायतों का पिटारा खोलने से उद्योगपतियों ने तो अपना मुनाफा बचा लिया लेकिन, जिनके पेट पर लात पड़ी उन्हें कहीं से मरहम नहीं मिला। फिर भी प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि हमने महंगाई भले बढ़ने दी लेकिन, बेरोजगारी पर काबू पाया।

ये देखने में भले लगता है कि इंडियन आइडल बनने की लाइन में खड़ा हर लड़का-लड़की ये चमक-दमक के लिए बनना चाहता है। सच्चाई ये होती है कि वो, जल्दी से पैसा कमाकर भारतीय से हटकर इंडियन बन जाना चाहता है। इस चक्कर में भगदड़ का शिकार भी बनता है। लेकिन, इस सिस्टम में जब तक भगदड़ों-मौतों के लिए किसी कृपालु महाराज, इंडियन आइडल के आयोजक या फिर सेना-पुलिस की भर्ती में पुख्ता इंतजाम न होने को बहाना बनाकर जिम्मेदारी थोपी जाती रहेगी। तब तक देश की भगदड़ मौतें रोकने का शायद ही कोई इंतजाम हो पाए। इसीलिए भगदड़ और भगदड़ में हुई मौतें इस देश की नियति बनती जा रही हैं। और, देश असली समस्या से ही भगदड़ लेता दिख रहा है।
(ये लेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपा है)

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...