Monday, September 09, 2013

दंगा !


मुजफ्फरनगर का दंगा भी धर्म की लड़ाई है। ये साबित हो ही चुका है। लेकिन, क्या ये धर्म की लड़ाई है। दरअसल इस देश में एक बड़ी विचित्र बात जो हो बार-बार साबित हो चुकी है कि दंगा या फिर इस तरह का कोई तनाव हिंदु मुस्लिम वोट दिलाने में मददगार होता है। और इससे भी बड़ी बात ये साबित करने की कोशिश होती रही है कि दक्षिणपंथी पार्टियां ही इस सारे ध्रुवीकरण के लिए अकेले जिम्मेदारी निभाती हैं। ये बात कांग्रेस, बसपा, सपा, राजद और जाने कौन-कौन सी देश की पार्टियां लगातार साबित भी करती रहती हैं। दुखद ये नहीं है। देश की ज्यादातर पार्टियां धर्मनिरपेक्ष होने के नाम पर ही मुसलमान वोटों की लड़ाई लड़ती रहती हैं। और ठीक है अगर सिर्फ एकाध दक्षिणपंथी पार्टियों को पूरी तरह सांप्रदायिक बता भर देने से मुसलमान वोट मिल जा रहे हैं तो बुरा क्या है। लेकिन, दुखद बात ये है कि अब कई स्वानामधन्य संपादकों को भी एकाध दक्षिणपंथी पार्टियां उसमें भी राष्ट्रीय स्तर पर अकेली बीजेपी ही है जो देश के सारे दंगों की वजह दिखती है। जबकि, ये साबित होता रहा है कि दंगे या ऐसी किसी भी तनाव वाली स्थिति का मुसलमान वोटों के तौर पर थोक फायदा उन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों को ही होता रहा है। फिर भी दंगे या ऐसी धर्मों के बीच तनाव की स्थिति के लिए जिम्मेदार बीजेपी ही होती है। ये स्थिति ऐसी बिगड़ चुकी है कि अगर बीजेपी शासन वाले राज्य में दंगा हो तो राज्य सरकार कराती है और अगर किसी दूसरी पार्टी का शासन है तो मुख्य विपक्ष में या मुख्य विपक्ष से भी नीचे कहीं दिख रही बीजेपी साजिश करके कराती है।

और बीजेपी ही दंगे या हिंदु मुसलमान तनाव के लिए जिम्मेदार होती है इस बात को साबित करने में कई जिम्मेदार संपादक धर्मनिरपेक्ष पार्टियों से से भी कई हाथ आगे निकलने की कोशिश करते दिखते हैं। एक और महत्वपूर्ण तथ्य है कि हिंदु मुस्लिम के बीच के तनाव की खबर बने इससे पहले जब वो सीधे अपराध की भी खबर होती है तो भी मीडिया उसमें अल्पसंख्यक बहुसंख्यक के लिहाज से पहचान बता या छिपा रहा है। दो धर्मों से जुड़ा मसला है तो उसे बिल्कुल भी मीडिया में नहीं आना चाहिए। दंगा दिखाने से दंगा भड़कता है इस नैतिक नीति के तहत भारतीय मीडिया 2002 के बाद का कोई दंगा नहीं दिखाता #UPriots की चर्चा तो बिल्कुल नहीं। पत्रकारिता की ये नैतिक नीति काफी हद तक सही भी है। लेकिन, ये नीति जब अपनी सहूलियत के लिहाज से बदलती है तो, शायद दंगा भड़काने वालों को और आसानी हो जाती है। ये ऐसे कि कई स्वनामधन्य संपादक ऐसे मसलों पर हिंदुओं के खिलाफ लिखकर ये सोचते हैं कि वो अल्पसंख्यक मुस्लिमों का भला कर रहे हैं। अब एक उदाहरण देखिए आशुतोष की अच्छे पत्रकारों में गिनती है। देश के एक बड़े चैनल के संपादक हैं। लेकिन, मुजफ्फरनगर के मसले पर वो पहले से ही सारी गलती दक्षिणपंथियों पर थोपने लगते हैं। और एकाध उग्र दक्षिणपंथियों के ट्वीट पकड़कर सारा निष्कर्ष निकाल लेते हैं। उन्होंने मुजफ्फरनगर मसले पर ट्वीट किया - Hate tweets should be banned and  such persons should be arrested एकदम सही बात है किसी भी जिम्मेदार संपादक को यही लाइन लेनी चाहिए। लेकिन, इसके बाद की एक और ट्वीट पढ़ने पर लगा कि वो संपादकीय जिम्मेदारी निभाते-निभाते जल्दी से सहूलियत वाली दक्षिणपंथी विरोध की भूमिका चुन लेते हैं। उनका ट्वीट आता है - I repeat those who are writing anti Muslim tweets should be arrested. Unless they are put behind bars they will not change. Harmony is must. अब इस ट्वीट को देखने के बाद लगने लगता है कि वो सारी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के प्रवक्ता की जिम्मेदारी भी निभाने से चूकना नहीं चाहते। ऐसे माहौल में दंगा करना और दंगे की बात करना एक जैसा ही हो जाता है। लेकिन, किसके लिए। उनके लिए जिनके ऊपर दंगे का कोई असर नहीं होता या सकता। 

किसी भी दंगे में किसी की जान जाए ये दुखद है लेकिन, क्या दंगे और जान जाने में भी communal secular का फर्क हो जाता है। पता नहीं पत्रकार राजेश वर्मा का दंगों के कवरेज में मरना दंगा न दिखाने की नैतिक नीति में बदलाव लाता है या नहीं। हम भारतीय भी गजब हैं एक 2002 से @narendramodi कुछ के लिए राक्षस बन गए। हर दूसरे चौथे 2002 दोहराने वाले नियमित रक्षक। ऐसा क्यों? ये सवाल इसीलिए भी उठता है कि मुख्यमंत्री बनने के साथ ही दंगों को न्यौता देने वाली अखिलेश सरकार की बर्खास्तगी की मांग करने वाली पार्टियां भी सेक्युलरिज्म के नाम पर इसमें लगे हाथ बीजेपी की साजिश की जांच की मांग भी जोड़ देती हैं। ये जो दंगा हुआ ये एक अपराधिक घटना थी। जिसमें एक हिंदु लड़की के साथ छेड़खानी एक मुस्लिम लड़के ने किया। लड़की के भाइयों ने उस लड़के को मार दिया। फिर मारे गए लड़के के परिजनों ने लड़की के दोनों भाइयों को मार दिया। छेड़खानी और उसके बाद के किसी भी समय पर कानून व्यवस्था काबू करने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ राज्य सरकार की थी। इसके लिए जो खाप पंचायत बुलाई गई उसका भी आह्वान भारतीय किसान यूनियन और खापों ने मुख्य रूप से किया था। इसको समर्थन राजनीतिक वजहों से सिर्फ बीजेपी ने नहीं, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल ने भी दिया था। ये धार्मिक लड़ाई नहीं थी। न धार्मिक दंगा। ये पूरी तरह से अखिलेश सरकार की नाकामी है। 

मैं हिंदु हूं। पत्नी तीज का व्रत रखती है। उसी के साथ पूजा के लिए मंदिर गया था। दरअसल मैं पूजा तो कम ही कर रहा था। मुजफ्फरनगर की खबरें देख-पढ़ रहा था। आरती के बाद मंदिर के पुजारी ने ऊंचे स्वर में बोला और सबने दोहराया, मैंने भी। धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो प्राणियों में सद्भावना हो विश्व का कल्याण हो। आज ये काफी महत्वपूर्ण है।

Friday, September 06, 2013

भ्रमित भारतीय जनता से भ्रमित भारतीय जनता पार्टी !


पता नहीं मेरे अलावा और कितने लोग ये कहते मानते होंगे। मानते भी होंगे तो सार्वजनिक तौर पर कितने मानते होंगे। लेकिन, मैं सार्वजनिक तौर पर कहता हूं कि ये देश भ्रमित लोगों का देश है। पत्रकार हूं तो तुक्का भिड़ाने के लिहाज से मैं भ्रमित भारत बोलता हूं। भ्रमित भारत यानी क्या करना है किधर जाना है क्यों जाना है या ये सब पता भी है तो भी क्यों करें या कर भी लें तो करने से क्या होगा या हो भी गया तो भी क्या। कुछ इस टाइप वाला भ्रमित भारत। और इसी भ्रमित भारत और भारतीयों का सबसे मजबूत प्रतिबिंब अपने को समझने वाली पार्टी है भारतीय जनता पार्टी। यानी भ्रमित भारतीय जनता की पार्टी। यानी भ्रमित जनता की पार्टी। मतलब पक्के तौर पर बीजेपी मतलब भ्रमित जनता पार्टी लिख सकते हैं। चलिए जनता भी हटाते हैं सिर्फ जनता पार्टी लिखते हैं। वैसे इस समय ये लिखना खतरे से खाली नहीं है। क्योंकि, भ्रमित जनता पार्टी के पक्के नेता के समर्थक भ्रमित नहीं हैं। वो भ्रमित होते भी हैं तो पूरी तरह से। वो भ्रमित हैं कि उनका नेता गुजरात की सेवा करना चाहता है या देश की। 6 करोड़ गुजरातियों की सेवा करने में उसे मजा मिल रहा है या 122 करोड़ भारतीयों की सेवा करने का मजा लेना चाहता है। गर्वी गुजरात कहना चाहता है या जय भारत। लेकिन, कमाल ये है कि इस भ्रमित जनता पार्टी के नेता के समर्थक बिल्कुल भ्रमित नहीं हैं। वो एकदम उसे भगवान की तरह देखते हैं। जो भी वो बोला वही ब्रह्मवाक्य। लेकिन, ऐसे ही भगवान की तरह उस महान नेता को देखने वाला एक अधिकारी भ्रमित हो गया है। वो कह रहा है कि उसके भगवान ने उसे धोखा दे दिया। 

इस धोखे देने की बात उसके भगवान नेता को जोर से लगी। उसे फिर भ्रम हो गया कि वो 6 करोड़ गुजरातियों का ही कर्ज उतारने के लिए है। अरे अभी पक्के तौर पर 20 दिन भी नहीं बीते थे। जब टीवी न्यूज चैनलों पर भ्रम फैल गया था कि लाल किला दिखाएं या लालन कॉलेज। अच्छा हुआ कि लाल किले के बाद लालन कॉलेज दिखाने का विकल्प था। भ्रम को काफी लोगों ने सच्चाई मान लिया कि असली लाल किले वाला तो लालन कॉलेज पर है। लालन कॉलेज से भारतीयों का भ्रम ऐसा दूर हो रहा था कि पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु भी पहले लाल किले के भाषण में क्या भ्रम दूर कर पाए होंगे। भ्रम दूर हो गया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी भ्रम से बाहर निकल आया था। उसने कहा अब भारतीय जनता पार्टी को भ्रमित नहीं होने देना है। तय हुआ कि भ्रम दूर करने वाले नेता को प्रधानमंत्री का दावेदार बना दो। आधी लड़ाई तो ऐसे ही जीत लेंगे। लेकिन, भ्रमित भारत है भ्रमित भारतीय हैं और उन्हीं भ्रमित भारतीयों की जनता पार्टी है। उसके कुछ नेताओं ने भ्रम बढ़ा दिया। ये कहकर कि प्रधानमंत्री की लड़ाई तो 2014 में है फिर 2013 में हमारे मुख्यमंत्री बनने में भ्रम कयों फैला रहे हो। इस भ्रम के समर्थन में वो भ्रमित भारतीय जनता पार्टी के नेता आ गए जो इस भ्रम में हैं कि भ्रम बना रहा तो हम प्रधानमंत्री बन सकते हैं। कम से कम तब तक जब तक कोई दूसरा प्रधानमंत्री न बन जाए। लेकिन, संघ इस भ्रम में फंसने को तैयार नहीं। और इस बार वाला स्वयंसेवक तो पुराने प्रधानमंत्री स्वयंसेवक से भी कम भ्रमित है। उसे मुखौटे की भी जरूरत कम ही है। टोपी की भी। भ्रम दूर होने ही वाला था।

भ्रम दूर हो भी जाता कि वही भगवान मानने वाले अधिकारी की चिट्ठी आ गई। भ्रम बढ़ गया। भ्रम ऐसा बढ़ गया कि लालन कॉलेज को लाल किले से श्रेष्ठ करार देने वाले टीवी न्यूज चैनलों पर नामंजूरी की खबरें भी आ गईं। और, इस नामंजूरी की खबर का आधार बना वही 6 करोड़ गुजरातियों की सेवा का 2017 तक का करार। इसी 6 करोड़ गुजरातियों की सेवा के जज्बे को देखकर ही तो 122 करोड़ भ्रमित भारतीय अपना नेता मानने को तैयार बैठे दिख रहे थे। लेकिन, जब नेता ही भ्रम बढ़ाने लगे तो जनता भला कैसे बिना भ्रमित हुए रह सकती थी। वैसे भ्रमित होने से बचने की जरूरत है। इसी भ्रम की शिकार जनता को भ्रमित करके कांग्रेस हमारे भ्रमित भारतीयों को यहां तक लेकर आ गई है। अब देखिए ये भ्रम आगे हमें कितना भ्रमित करके रखता है।

Tuesday, September 03, 2013

मनमोहन सरकार ये तूने क्या किया !

हम भारतीयों को सपना देखने में बड़ा मजा आता है। ऐसा कि कोई भी हमें सपना दिखा दे तो हम मजे से उसके साथ हो लेते हैं। ये बात हमारे नेताओं को गजब समझ में आई। जवाहर लाल नेहरु ने नया भारत बनाने का सपना दिखाया। भारत एक खोज हो गई, हम भारतीय नेहरु के साथ हो लिए। इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का सपना दिखाया। फिर हम भारतीय इंदिरा के साथ हो लिए। राजीव गांधी ने इक्कीसवीं सदी में ले जाने का सपना दिखाया। हम भारतीय अब राजीव के साथ हो लिए। लेकिन, हम भारतीयों को सबसे तगड़ा सपना दिखाया  गैरराजनीतिक मनमोहन सरकार ने। मनमोहन सरकार कभी नेता नहीं रहे। लेकिन, हमेशा जीवन की सर्वोच्च सुख सुविधा का भोग करते रहे। उन्होंने भी एक सपना इस देश को दिखाया। और, वो अब तक का सबसे तगड़ा सपना था। हम भारतीय बिस्तर पर पड़े इस सपने की आहट भर से गुदगुदाने लगे। वो सपना था हम भारतीयों को अमेरिकी बनाने का। वो सपना था दुनिया की सारी सुख सुविधा भारत में जुटाने का। वो सपना था हम भारतीयों को जेब में जमकर रुपया भर जाने का। वो सपना था हम भारतीयों की देह पर दुनिया के सारे ब्रांडेड कपड़ों के सज जाने का। वो सपना था हम भारतीयों के पास दुनिया की सबसे शानदार कारों के होने का। वो सपना था हम भारतीयों के हंसते-खेलते बिना संयुक्त परिवार के तनाव के मियां-बीवी और बच्चे के साथ मॉल में घूमने का। वो सपना था हर गांव के शहर बन जाने का। वो सपना था हर भारतीय शहर में अमेरिकी शहरों जैसी चमक का। वो सपना था 10% की तरक्की का। हम मनमोहन सरकार के साथ हो लिए। 2004 में, फिर 2009 में। सपना टूट गया है। आधा रह गया है हमारी तरक्की की रफ्तार की तरह। अब देखिए सपने में जीने वाले भारतीय बिस्तर से बूथ तक पहुंचते हैं या इस सपने के लिए 2014 में मनमोहन सरकार का साथ देते हैं। क्योंकि, सपना तो बहुत बड़ा है। और, पूरे तो पहले के भी सपने नहीं हुए थे।

Saturday, August 31, 2013

खुद पर भरोसा नहीं दूसरों से भरोसा करने को कहते हो !

रुपया कब मजबूत होगा। इस सवाल के जवाब में अब हम भारतीय रुपये की मजबूती की कल्पना करते हैं तो शायद दिमाग में 64-65 का भाव अच्छा दिखता होगा। वजह ये कि जिस तेजी से रुपया डॉलर, पाउंड और दूसरी मुद्राओं के मुकाबले सरक रहा है उसमें हमें ये लगता है कि जहां है वहीं रुक जाए तो बात बन जाए। और, शायद भारत की सरकार भी ऐसे ही सोच रही है। इसी वजह से फिलहाल रुपये की मजबूती के कोई संकेत नहीं मिल रहे हैं। क्योंकि, हमारी सरकार अभी भी रुपये की मजबूती की अपनी नीति पर खास काम करती नहीं दिख रही है। हम दुनिया के भरोसे हैं। लेकिन, भारत सरकार की मौजूदा अर्थनीति को देखकर एक लाइन जो मेरे दिमाग में सबसे पहले आती है वो ये कि हम अगर दुनिया के ही भरोसे हैं तो, दुनिया फिर हमारा भरोसा क्यों करे। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ये है कि अमेरिका, यूरोप में जब जबरदस्त मंदी आई तो हमारी सरकार ने कहाकि हम इसी वजह से कमजोर हो रहे हैं और अब जब खबरें आ रही हैं कि अमेरिका के बाजार सुधर रहे हैं तो हमारी अर्थव्वस्था में कमजोरी की वजह फिर से यही बन रही है। 

वैसे सच्चाई ये भी है कि 2008-09 में जब अमेरिका, यूरोप बर्बादी के कगार पर था तो चीन और भारत की ने ही अपनी 10 प्रतिशत के आसपास वाली तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था से दुनिया को बचाया था। तो अब मुश्किल कहां है। अमेरिका, यूरोप जब टूटे तो हमारी सरकार ने तेजी से नए बाजार खोजे जिससे एक्सपोर्ट बेहतर हो। लेकिन, ये समस्या का हल नहीं था। डॉलर ऐसे नहीं आएगा।  दरअसल जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था टूटी तो वहां के निवेशकों ने भारत और चीन जैसे बाजारों में डॉलर झोंक दिया। क्योंकि, दुनिया में सबसे बेहतर मुनाफा विदेशी निवेशकों को भारत, चीन जैसे देशों में ही मिल रहा था। लेकिन, इस मौके का इस्तेमाल भारत सरकार घरेलू अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने में नहीं कर पाई। और, डॉलर के आने को भारत की असल ताकत समझने लगी। जबकि, वो भारत की ताकत नहीं थी जैसे ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था सुधरनी शुरू हुई तो वहां के निवेशकों ने फिर से डॉलर निकालना शुरू कर दिया। उसका खामियाजा अब भुगतना पड़ रहा है। उसका असर ये है कि जनवरी 2008 में 21000 का जादुई आंकड़ा पार करने वाला सेंसेक्स 2010 की दीवाली वाली मुहूर्त ट्रेडिंग में ही उस आंकड़े को दोबारा छू पाया। और अब तो 18000 के आसपास लहराते सेंसेक्स के लिए 21000 का आंकड़ा दिवास्वप्न सा दिखने लगा है। वजह साफ है कि हमारी पूरी अर्थव्यवस्था, पूरा बाजार डॉलर डीलरों के इशारों पर नाचता है। दुनिया की अर्थव्यवस्था कमजोर होने पर वो हमारे यहां निवेश करके मुनाफा कमा जाते हैं और फिर हमारे बाजार अर्थव्यवस्था को कमजोर करके हमारे रुपये पर ऐसा दबाव बना देते हैं कि हमारी सरकार फिर डॉलर डीलरों के आगे भीख मांगने वाली मुद्रा में व्यवहार करने लगती है। जबकि, सरकार अगर दुनिया के इस सबसे बड़े बाजार को दुनिया के रहम के बजाय अपने नियमों के लिहाज से चलाने लगे तो बात बन जाए।

अभी जब रुपये की जोरदार गिरावट हुई उसके बाद वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने एलान किया कि निवेश पर बनी कैबिनेट समिति ने करीब दो लाख करोड़ के बुनियादी प्रोजेक्ट को मंजूरी दी। लंबे समय से रुके हुए 36 इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट सड़क, बिजली जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के हैं। ये एक अच्छा कदम है लेकिन, शायद इस अच्छे कदम को चलने में सरकार ने समय बहुत ज्यादा ले लिया है। इतना ज्यादा कि सरकार की लालफीताशाही (नियमकों की बाधाएं पढ़िए) की वजह से देश में करीब सात लाख करोड़ रुपए की योजनाएं अंटकी पड़ी हैं। इस वित्तीय वर्ष में सरकार ने जितनी रकम खर्च करने की योजना बनाई है ये उसकी लगभग आधी रकम है। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि सरकार देश की जो ताकत है उसको बढ़ाने के बजाय डॉलर डीलरों के भरोसे बैठी हुई है। सरकार देश की बुनियादी परियाजनाओं को लेकर कितनी गंभीर है इसका अंदाजा कुछ तथ्यों से लगाया जा सकता है। बीओटी यानी बनाइए चलाइए और सौंप दीजिए- इस आधार पर दिए जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग के सिर्फ 1933 किलोमीटर के प्रोजेक्ट सरकार दे पाई है। पिछले आठ सालों में ये राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए दिया जाने वाला सबसे कम ठेका है। और ये ऐसा नहीं है कि सिर्फ ठेके देने में ही सरकार पिछड़ रही है। योजनाओं में अमल में देरी की वजह से कम से कम 3300 किलोमीटर के 25 राष्ट्रीय राजमार्ग प्रोजेक्ट हैं जो रुके हुए हैं। और देरी की वजह है भूमि अधिग्रहण। हालांकि, सरकार खाद्य सुरक्षा बिल के बाद भूमि अधिग्रहण बिल को पास कराने में कोई कसर हीं छोड़ेगी लेकिन, फिर भी संदेह है कि इस वित्तीय वर्ष में 3500 किलोमीटर से ज्यादा के राष्ट्रीय राजमार्ग लोगों के सफर के लिए तैयार हो पाएंगे। 

बुनियादी क्षेत्र की सभी परियोजनाओं का हाल ऐसा ही है। देश के 80 प्रतिशत थर्मल पावर प्रोजेक्ट रेगुलेटरी क्लियरेंस के अभाव में रुके पड़े हैं या बहुत देरी से चल रहे हैं। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि 11वीं पंचवर्षीय योजना में सरकार ने निजी क्षेत्र के कोयला आधारित बिजलीघरों से 44000 मेगावॉट बिजली उत्पादन का अनुमान लगा रखा था वो अब सिर्फ 7000 मेगावॉट ही पूरा होता दिख रहा है। मुंबई देश का आर्थिक राजधानी है। लेकिन, इस आर्थिक राजधानी में बुनियादी परियोजनाओं के हाल से अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश के आर्थिक हालात क्यों गड़बड़ हैं। मुंबई मेट्रो रेल का दूसरा चरण हो, मुंबई की पहचान बन चुके बांद्रा-वर्ली सी लिंक का विस्तार हो, मोनोरेल के नए रूट की बात हो या फिर नवी मुंबई का प्रस्तावित अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा। सब के सब अभी कागजों में ही हैं। कई सालों के बाद भी अभी ये जमीन पर नहीं दिख रहे हैं। दुखद ये कि हाल ही में मुंबई के महत्वाकांक्षी मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक के लिए 5 चुने गए कंसोर्शियम में से किसी ने बोली नहीं लगाई। और इसके पीछे वजह ये कि वो लागत और उसके लिहाज से मुनाफे को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। साथ ही उन्हें राजनीतिक दखलंदाजी भी परेशानी में डालती है। 

दरअसल ये राजनीतिक दखलंदाजी ही है जो असल वजह है इस देश की अर्थव्यवस्था के बुरे हाल का। अर्थव्यवस्था के लिहाज से एक अच्छा कदम था धीरे-धीरे पेट्रोलियम उत्पादों से सब्सिडी हटाना। लेकिन, जरा देखिए- सरकार ने असल में क्या किया। सब्सिडी हटाई 25 जून 2010 को तेल कंपनियों को पेट्रोल की कीमत तय करने का पूरा अधिकार भी दे दिया। अभी धीरे-धीरे डीजल के दाम भी तय करने का अधिकार दे रहे हैं। लेकिन, 25 जून 2010 के बाद राज्यों के विधानसभा चुनाव जब-जब आए राजनीतिक नफे के लिए अपनी नीति को रोक दिया। अभी भी सरकार वही कर रही है पेट्रोल के दाम कुछ एक रुपये के आसपास 15 अगस्त की रात बढ़ जाने चाहिए थे लेकिन, संसद सत्र चल रहा है इसलिए पेट्रोल और डीजल की बढ़त पर रोक लगा दी गई। तेल कंपनियों का घाटा बढ़ रहा है और घाटे को ब्याज सहित तेल कंपनियां संसद सत्र खत्म होने के तुरंत बाद वसूल लेंगी। और, फिर डीजल के दामों की तेज बढ़त महंगाई को आसमान पर पहुंचा देगी। ब्याज दरें पहले ही ऊंचे स्तर पर हैं। यानी इस सरकार की नीति ही पक्की नहीं है। हर काम वोट के लिहाज से करती है। अब लोगों को लगता होगा कि सरकार देश की अर्थव्यवस्था सुधारने को लेकर चिंतित है लेकिन, सरकार को असल चिंता 2014 की है। इसलिए मनरेगा की कामयाबी का प्रयोग खाद्य सुरक्षा बिल के जरिए किया जा रहा है। भले इससे देश की आर्थिक सुरक्षा पर खतरा आ जाए। डॉलर डीलरों को ऐसे प्रयोग डराते हैं। वो सामाजिक सुरक्षा को प्राथमिकता बताने वाली सरकार के साथ कारोबार क्यों बढ़ाए। सरकार के ये प्रयोग ऐसे हैं कि लड़कर लागू कराया रिटेल में विदेशी निवेश का फैसला भी काम नहीं आ रहा। मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई लागू हो गया लेकिन, अब तक एक भी ऐसी दुकान देश में नहीं खुल सकी है जिसे दिखाकर सरकार विदेशी निवेशकों को भरोसा जीत सके। अब तक रिटेल में विदेशी निवेश की खुलकर वकालत करने वाले फ्यूचर ग्रुप के कर्ताधर्ता किशोर बियानी अब उस रास्ते को इतना कारगर नहीं मान रहे हैं। हालांकि, वो ये कह रहे हैं आर्थिक कमजोरी के हालात कम से कम उनके बिग बाजार को अब तक प्रभावित नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन, वो डर रहे हैं कि नौकरियां जाने लगेंगी, लोगों की जेब की रकम घटने लगेगी तो मुश्किल बढ़ेगी। उनका ये डर बेवजह नहीं है। जून में पिछले नौ महीने में सबसे कम कारें बिकी हैं। 

सरकार चुनावी चिंता में भारत निर्माण के विज्ञापन जमकर चला रही है। लेकिन, असल में भारत निर्माण की तरफ ध्यान नहीं दे रही है। वो इसके जरिए चुनाव जीतना चाहती है और डॉलर डीलरों को आकर्षित करना चाहती है। लेकिन, अगर अर्थव्यवस्था का यही हाल रहा तो चुनाव जीतना मुश्किल होगा साथ ही डॉलर डीलरों के लिए भी भारत आकर्षण की जगह नहीं रह जाएगा। समय अब बहुत कम बचा है लेकिन, फिर भी अगर सरकार तेजी से देश के घरेलू बाजार की ताकत को पहचानकर उसे मजबूत करे। बुनियादी परियाजनाओं को तेजी से चालूकर अगले 3-4 महीने में उसे अमल में लाकर दिखाए। उद्योगों के लिए और लोगों के लिए कर्ज सस्ता करे तो शायद कुछ बात बने। अच्छी बात ये है कि त्यौहारों के देश भारत में त्यौहारों का वक्त शुरू हो चुका है। लोग त्यौहारी रंग में डूबे हैं। बचत की रकम से कपड़ा खरीदेंगे ही, अच्छा खाएंगे ही, मौज मनाएंगे ही। सरकार हिंदुस्तानियों की मौज के इन तीन महीने का इस्तेमाल अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने में कर ले तो अर्थव्यवस्था की चिंता भी दूर होगी और चुनावी चिंता भी। वरना दोनों पर खतरा बढ़ रहा है।

Tuesday, August 27, 2013

खाना पक्का करना है तो रुपया मजबूत करो सरकार!



मेरे एक मित्र अभी हाल ही में बैंकॉक से लौटे। लौटने के बाद उनसे बात हुई तो बड़े ही निराश स्वर में वो बोले अरे यार अपनी असल औकात जाननी हो तो एक बार विदेश होकर आओ। बैंकॉक वैसे तो पर्यटन की वजह से भारतीयों और दुनिया के लोगों को पसंद आता है। लेकिन, एक दूसरी वजह ये भी कि इलेक्ट्रॉनिक सामानों का अच्छा बाजार भी यहां है। जहां भारतीय आधुनिक तकनीक वाले इलेक्ट्रॉनिक भारत से कम कीमतों पर खरीदकर वापस आते थे। लेकिन, अब हालात बदल चुके हैं। भारतीय रुपये की गिरती कीमत ने भारतीयों की औकात दुनिया के हर कोने में घटा दी है। फिर क्या लंदन, अमेरिका जैसे दुनिया के बड़े चमकते शहर और क्या पर्यटन के ही बूते दुनिया के नक्शे पर जाना जाने वाला बैंकॉक। रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले गिरी ये तो रोज रोज अखबार टीवी की सुर्खियां बनने से सब जान गए हैं लेकिन, थाईलैंड की करेंसी थाई बात के मुकाबले भी हमारा रुपया रोने लगा है ये शायद हममें से कम ही भारतीयों को पता होगा। एक अमेरिकी डॉलर देकर हमारा रुपया 65 से ज्यादा मिल रहा है लेकिन, अगर हम वही रुपया देकर थाईलैंड के बैंकॉक में कुछ खरीदना चाहें या अपनी छुट्टियों को और यादगार बनाने की कोशिश करें तो आधी से कुछ ज्यादा ही कीमत मिल पाएगी। एक रुपया थाई बात में 67 पैसे के बराबर ही होता है। जबकि, वहीं अगर कोई ऑस्ट्रेलियाई आया होगा तो एक ऑस्ट्रेलियाई डॉलर देकर उसे 28 से ज्यादा थाई बात मिल जाएंगे। जबकि, लंदन से एक पाउंड लेकर आए पर्यटक को करीब 49 थाई बात मिल जाएंगे। ये तो थी बैंकॉक में भारतीयों की छुट्टी चौपट होने की कहानी। जिसकी वजह बनी है रुपये की कमजोरी। अगर सिर्फ थाईलैंड में मौज मस्ती या दुनिया के आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की खरीदारी भर का मसला होता तो ये रुपया रोता रहे हमें क्या करना। लेकिन, इस रुपये की कमजोरी अब देश की कमजोरी बनती जा रही है।

रुपया रसातल में जा रहा है। रिजर्व बैंक और सरकार के ढेर सारे डॉलर को लाने-कमजोर करने और रुपये को मजबूत करने के उपाय के बावजूद रुपया रसातल में जा रहा है। मतलब सरकार के फैसले रुपये को मजबूत नहीं कर पा रहे हैं। मतलब 64 से नीचे गिरा रुपया और भी खतरनाक स्तर तक गिर सकता है। यही वजह है कि डॉएश बैंक की ताजा रिपोर्ट कह रही है कि रुपया डॉलर के मुकाबले 70 तक गिर सकता है। यानी उतना जितना न हमारे वित्त मंत्री की उम्र है और न हमारे लोकतंत्र की। हां, साल के अंत तक इसमें कुछ सुधार के संकेत हो सकते हैं। और, इसकी सबसे बड़ी वजह भयानक निराशा है। उस निराशा की कुछ सीधी वजहें जो मुझे दिखती हैं। सबसे पहली ये कि सरकार हो या फिर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया दोनों के फैसले एक समय के बाद खुद के ही मजबूत विरोध की वजह देते हैं। उदाहरण के लिए सरकार की बात करें तो 2 बजट पहले ही वित्त मंत्री के तौर पर प्रणब मुखर्जी ने इस बात के संकेत दिए थे कि अब धीरे-धीरे सरकार सब्सिडी खत्म करेगी और बाजार के हवाले पेट्रोलियम उत्पादों के दाम तय करने का अधिकार देगी। हालांकि, बाजार के हवाले दाम तय करने का जो अधिकार था वो मिलना था सरकारी तेल कंपनियों को ही और वो बड़ी तेजी से मिल भी रहा है। उसी के साथ ये संकेत आए कि 2009 में यूपीए दो बनवाने में अहम भूमिका निभाने वाली मनरेगा योजना पर भी खर्च घटाया जाएगा। लगा कि सरकार खजाने को दुरुस्त करके दुनिया की रेटिंग एजेंसियों को ये दिखाना चाहती है कि भारत सुधारों की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सुधारों का अपना चेहरा और चमकाने के लिए यूपीए 2 में दोबारा वित्त मंत्री बने पी चिदंबरम ने एक के बाद एक धड़ाधड़ ऐसे एलान किए कि बस अब देश में डॉलरों की बाढ़ सी आ जाएगी। फिर वो एफडीआई के जरिए रिटेल में हो, एविएशन और दूसरे क्षेत्रों में हो या फिर एफआईआई के जरिए भारत के शेयर बाजार में हो। लेकिन, हुआ इसका उल्टा। डॉलर को लपकने में लगी सरकार को विपक्ष ने ऐसी लंगड़ी मारी कि लगा पूरा देश ही रिटेल में एफडीआई का विरोधी हो गया। फैसला लिया गया, लौटाया गया, फिर और दम लगाकर लिया गया। पर नतीजा शून्य रहा। अब तक एक भी मल्टीब्रांड रिटेल स्टोर देश में खुल नहीं पाया है जिसे दिखाकर वो अपनी डॉलर के आने की बात मजबूती से समझा पाते।

दूसरे सुधार की बात कर लें। दूसरा सुधार ये कि सरकार का सब्सिडी का बोझ कम करना है। क्योंकि, सरकारी खजाने का घाटा बेहद खतरनाक स्तर तक पहुंच रहा था। फिर चाहे वो वित्तीय घाटा हो या चालू खाते का घाटा। वित्तीय घाटा यानी देश की कुल संपत्ति और कर्ज का संतुलन और चालू खाते का घाटा यानी हर रोज के खर्च के लिए मलतब इंपोर्ट-एक्सपोर्ट के लिए डॉलर रुपये का संतुल। दोनों संतुलन बिगड़ गए थे। 70 प्रतिशत से ज्यादा पेट्रोलियम प्रोडक्ट आयात करने वाली सरकार के लिए सबसे आसान था पेट्रोलियम प्रोडक्ट की सब्सिडी को खत्म करना। ये कहकर-समझकर कि पेट्रोल से कुल महंगाई पर कम असर पड़ता है सरकार ने 25 जून 2010 को पेट्रोल की कीमतों को बाजार के हवाले कर दिया। हालांकि, उसके बाद भी सरकार इस नीति को राजनीतिक लाभ हानि के लिए तोड़ती मरोड़ती रही। बिहार, बंगाल सहित 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव के समय तेल कंपनियों से बिना कहे पेट्रोल के दाम तय करने का अधिकार ले लिया गया। भले ही उस घाटे का असर तेल कंपनियों और उससे सरकार खजाने पर चाहे जैसे पड़ा हो। वही हाल अभी भी है। कच्चा तेल 108 डॉलर प्रति बैरल है। 64 रुपये से ज्यादा देने पर भी 1 डॉलर मिल रहा है। तेल कंपनियों का पेट्रोल पर घाटा बढ़ रहा है लेकिन, 15 अगस्त की समीक्षा बैठक में तेल के दाम तय करने का अधिकार पाई तेल कंपनियों को पेट्रोल का घाटा नहीं दिखा। वजह संसद का सत्र चल रहा है। अब इंतजार है संसद सत्र खत्म होने का। सत्र खत्म होते ही पेट्रोल 2 रुपये लीटर तक महंगा होना तय है। यानी सरकार को डर है भी थोड़ा बहुत तो संसद में हंगामे का। आम आदमी के हितों का दावा करने वाली सरकार को सड़क पर होने वाले हंगामे और आम आदमी की जिंदगी में मचे हंगामे की फिक्र कहां है।

अब तीसरे सुधार की बात कर लें। तीसरा सुधार यानी किसी भी तरह भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेश यानी एफआईआई डॉलर लगाएं। सेंसेक्स अभी 18000 के आसपास ही घूम रहा है। 2008 की मंदी में 21000 जाने के बाद सेंसेक्स लुढ़का तो नवंबर की दीवाली वाली मुहूर्त ट्रेडिंग को ही सेंसेक्स 21000 का आंकड़ा पार कर पाया था। उसके बाद से ये तीसरी दीवाली आने वाली है लेकिन, सेंसेक्स 18000 से ऊपर टिक नहीं पा रहा है। अब ऐसे बाजार में भला कौन सा विदेशी निवेशक डॉलर लगाएगा। हां, इतना जरूर है कि रुपये की गिरावट से वो अपना मुनाफा कमाकर उसे लेकर भागने में ही भलाई समझ रहे हैं।

अब बात रिजर्व बैंक के कदमों की। अब तक महंगाई से चिंतित रिजर्व बैंक ने बाजार में रकम की कमी करने की हरसंभव कोशिश की। उसकी वजह से बैंकों ने ब्याज दरें बढ़ाए रखीं। अब रुपये की गिरावट रोकने के लिए रिजर्व बैंक की नीति फिर से बदली और कुछ राहत बैंकों को दी गई। लेकिन, इससे ब्याज दरों में किसी तरह की कमी की उम्मीद करना ही व्यर्थ है। और, कैच 22 की स्थिति में फंसे रुपये की मजबूती भी नहीं हुई। रुपया जिस दिन 64 के नीचे पहली बार लुढ़का तो संसद सत्र था। लेकिन, सरकार को चिंता लुढ़कते रुपये, गिरती भारत की औकात और आम आदमी की जेब की घटती आमदनी की चिंता नहीं थी। उसे चिंता थी फूड सिक्योरिटी बिल की। फूड सिक्योरिटी बिल पास हो गया। दावा ये है कि इस कानून के बाद देश में कोई भूखा नहीं रहेगा। गरीबों को दो जून की रोटी मिल जाएगी। हो सकता है ये बात सच भी हो सवा लाख करोड़ की इस योजना से देश के गरीबों को 2 जून की पेट भरने लायक रोटी मिल जाए। लेकिन, अगर देश के हालात ऐसे ही बने रहे तो जो मनमोहन की उदारवादी नीति के चलते 1991 से 2010 तक चमकते चेहरे के साथ अच्छी गाड़ी में अच्छा कपड़ा पहनकर अच्छा खाना खा रहे थे वो सब भोजन गारंटी कानून के दायरे मे आते दिखेंगे। इसलिए सरकार खाना पक्का करना है तो रुपया मजबूत करो बाकी सब खुद हो जाएगा। और, रुपया मजबूत करने के लिए एफडीआई, एफआईआई से ज्यादा तुरंत सिर्फ चालू खाते के घाटे को घटाने की जरूरत है। क्योंकि, एक बार भारत की साख दुनिया के सामने सुधरी तो ये एफआईआई, एफडीआई के जरिए डॉलर तो खुद ब खुद आने लगेंगे और सारी समस्या खत्म हो जाएगी। 
(ये लेख मनी मंत्र पत्रिका में छपा है)

Monday, August 26, 2013

ऑफिस चलोगे !

जबरदस्त उमस वाली गर्मी में बच्ची क्लास से बाहर निकला। स्कूल के गेट पर ड्राइवर उसका इंतजार कर रहा था। बच्चा आया। ड्राइवर ने यंत्रवत उसका बैग उतारा। बैग उतारते समय ही बच्चे का सवाल- ऑफिस चलोगे? ड्राइवर का तल्ख जवाब- अभी ऑफिस क्यों चलेंगे ? शाम को चलेंगे। ड्राइवर की तल्खी की वजह शायद ये रही होगी कि बच्चा लगभग हर रोज यही सवाल पूछता होगा। बच्चे ने फिर पूछा- तो कहां चलोगे? ड्राइवर का जवाब आया- डे केयर।

Saturday, August 24, 2013

शीर्षक सूझ नहीं रहा!


#MumbaiGangRape की खबर आ गई थी। वो मुंबई जहां रात 2 बजे भी एक लड़की दस लड़कों के साथ घूमने जा सकती है। और, अकेले लड़के के साथ भी। और, बिना किसी लड़के के साथ भी। उस मुंबई में शाम 6 बजे एक वीरान पड़ी मिल में किसी पत्रकार बनने की शुरुआत करने वाली लड़की के साथ 5 लड़कों ने दुष्कर्म किया। उसके साथी भी था जिसे बांध दिया गया था। मुंबई से आई इस खबर के दूसरे दिन राज ठाकरे के प्रेस कांफ्रेंस करने की खबर आई। हमारे 4-5 बिहारी साथियों ने तुरंत अंदेशा जताया हो न हो इसमें बिहारी ही होंगे। और, कमाल की बात ये कि उन बिहारी साथियों ने ये मान भी लिया कि ऐसे करेंगे तो राज ठाकरे जैसों को मौका मिल ही जाएगा। डर की वजह भी थी। पिछली बार जब 2007 की आखिरी रात को मुंबई के एक होटल के बाहर एक लड़की को निर्वस्त्र करने की कोशिश हुई थी तो, राज ठाकरे ने सारा ठीकरा बिहारियों, यूपी से आए लोगों परडाल दिया था। हालांकि, वो आशंका इस बार सच साबित नहीं हुई। लेकिन, ये डर मीडिया में बना हुआ है कि बलात्कार किसने किया या गलत काम किसने किया उसके आधार पर खबर बढ़ाई जाएगी, पहचान बताई जाएगी। खैर धीरे-धीरे उस लड़की के साथ दुष्कर्म करने वाले 5 लड़कों की पहचान हो गई। मोहम्मद अब्दुल, कासिम बंगाली, सलीम और अशफाक, पांचवां था विजय जाधव। एक न्यूजचैनल के ट्विटर अकाउंट पर इनके नाम आए लेकिन, थोड़ी देर बाद गायब हो गए। किसी भी न्यूज चैनल ने उस दिन इन बलात्कारियों के नाम नहीं दिखाए। शायद 4 मुसलमानों के बलात्कार में शामिल होने से सांप्रदायिक होने के खतरा था। 

यही असल खतरा है। न्यूजरूम में बैठे स्वयंभू नैतिकता के ठेकेदारों ने ये तय कर लिया। अब सवाल यही है कि नैतिकता पीड़ित का चेहरा नाम न बताने-दिखाने की बात कहती है या बेशर्म बलात्कारियों की पहचान छिपाने की। क्योंकि, अगर मीडिया भी कोई कहां का है या किस धर्म का है इस आधार पर नीच कृत्य करने वालों की पहचान छिपाएगा या बताएगा तो फिर समाज सुधरने की बात हम कैसे सो. पाएंगे। हालांकि, इसके बाद अखबारों में सारे नाम छपने के बाद कई चैनलों ने भी बलात्कारियों की पहचान सबको बताई। मुझे तो लगता है कि पहचान छिपाने के पीछे भी सरकारी या सत्ता-सुविधा भोग रहे लोगों की जमात होती है जो नहीं चाहती कि ऐसी घटनाएं लोगों को हमेशा याद रहें और जगाए रहें। 16 दिसंबर को बलात्कार की शिकार लड़की की मृत्यु के बाद और उसके पिता की इजाजत के बाद भी हमारीसरकार ने उसकी जीवित रहने की कोशिश को ही मार दिया था। वो जिंदा रहती तो हर रोज हमें झकझोरती रहती। हर रोज हम इस खतरे से निपटने को सोचते रहते। वरना तो रोज की जिंदगी की जद्दोजहद में हम कहां ऐसी गंदी बातें याद रखते हैं जब तक हमारे साथ, बगल में या ऐसे ही मीडिया पर बड़ी खबर न बन जाए। 

दरअसल कहने को भारत आधुनिक हो चुका है। लेकिन, सच्चाई यही है कि अभी भी हम आदिम काल में ही हैं। बलात्कार को मानसिक विकृति कहने के बजाए हमारे नेताजी लोग पहनावे और टीवी पर दिखने वाली अश्लीलता की वजह से बता रहे हैं। मुंबई की घटना के बाद अभी नरेश अग्रवाल, लालू यादव जैसे लोग बोले। जबकि इन्हें शायद ही पता हो कि लड़की ने क्या पहना था। और, वो कुछ भी पहने होती ऐसे कमीने क्यों रुकते। खैर ये शायद भारतीय नेताओं की प्रवृत्ति है 16 दिसंबर को दिल्ली में हुई गैंगरेप की घटना के बाद देश के गृहमंत्रीसुशील कुमार शिंदे और दूसरे नेताओं की बयानबाजी भला किसे भूली होगी। जैसी मीडिया में खबरें हैं कि उस लड़की ने हालत ठीक होते ही यही कहा कि किसी भी हालत में दोषियों को छोड़ना नहीं है और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। वैसे बहस अभी भी इस बात पर जारी है कि फांसी होनी चाहिए या नहीं। कुछ खबरें बड़ी हो जाती हैं और इस वजह से उसके बहाने समाज के गिरते स्तर पर संवेदनहीनता पर बात चर्चा हो जाती है। गुवाहाटी की सड़कों पर नवंबर 2007 में भी ऐसी ही घटना हुई थी। बिंदास बंबई जैसे देश के सारे शहर बनाने की ओर हम बढ़ते कि रात-दिन का भेद भुलाकर हम मस्त रह पाते। हुआ उल्टा हम सरेशाम मुंबई की मस्ती का ही बलात्कार कर रहे हैं। देश तो पहले ही बलात्कारी बना हुआ है।
(लिखना शुरू किया था तो शीर्षक सूझा नहीं अब लग रहा है कि इसी आखिरी लाइन को शीर्षक बनाना चाहिए था)

Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

 Harsh Vardhan Tripathi हर्ष वर्धन त्रिपाठी #Bangladesh में @trahmanbnp प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। @PMOIndia @narendramodi ने उन्हें बध...