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Saturday, August 24, 2013

शीर्षक सूझ नहीं रहा!


#MumbaiGangRape की खबर आ गई थी। वो मुंबई जहां रात 2 बजे भी एक लड़की दस लड़कों के साथ घूमने जा सकती है। और, अकेले लड़के के साथ भी। और, बिना किसी लड़के के साथ भी। उस मुंबई में शाम 6 बजे एक वीरान पड़ी मिल में किसी पत्रकार बनने की शुरुआत करने वाली लड़की के साथ 5 लड़कों ने दुष्कर्म किया। उसके साथी भी था जिसे बांध दिया गया था। मुंबई से आई इस खबर के दूसरे दिन राज ठाकरे के प्रेस कांफ्रेंस करने की खबर आई। हमारे 4-5 बिहारी साथियों ने तुरंत अंदेशा जताया हो न हो इसमें बिहारी ही होंगे। और, कमाल की बात ये कि उन बिहारी साथियों ने ये मान भी लिया कि ऐसे करेंगे तो राज ठाकरे जैसों को मौका मिल ही जाएगा। डर की वजह भी थी। पिछली बार जब 2007 की आखिरी रात को मुंबई के एक होटल के बाहर एक लड़की को निर्वस्त्र करने की कोशिश हुई थी तो, राज ठाकरे ने सारा ठीकरा बिहारियों, यूपी से आए लोगों परडाल दिया था। हालांकि, वो आशंका इस बार सच साबित नहीं हुई। लेकिन, ये डर मीडिया में बना हुआ है कि बलात्कार किसने किया या गलत काम किसने किया उसके आधार पर खबर बढ़ाई जाएगी, पहचान बताई जाएगी। खैर धीरे-धीरे उस लड़की के साथ दुष्कर्म करने वाले 5 लड़कों की पहचान हो गई। मोहम्मद अब्दुल, कासिम बंगाली, सलीम और अशफाक, पांचवां था विजय जाधव। एक न्यूजचैनल के ट्विटर अकाउंट पर इनके नाम आए लेकिन, थोड़ी देर बाद गायब हो गए। किसी भी न्यूज चैनल ने उस दिन इन बलात्कारियों के नाम नहीं दिखाए। शायद 4 मुसलमानों के बलात्कार में शामिल होने से सांप्रदायिक होने के खतरा था। 

यही असल खतरा है। न्यूजरूम में बैठे स्वयंभू नैतिकता के ठेकेदारों ने ये तय कर लिया। अब सवाल यही है कि नैतिकता पीड़ित का चेहरा नाम न बताने-दिखाने की बात कहती है या बेशर्म बलात्कारियों की पहचान छिपाने की। क्योंकि, अगर मीडिया भी कोई कहां का है या किस धर्म का है इस आधार पर नीच कृत्य करने वालों की पहचान छिपाएगा या बताएगा तो फिर समाज सुधरने की बात हम कैसे सो. पाएंगे। हालांकि, इसके बाद अखबारों में सारे नाम छपने के बाद कई चैनलों ने भी बलात्कारियों की पहचान सबको बताई। मुझे तो लगता है कि पहचान छिपाने के पीछे भी सरकारी या सत्ता-सुविधा भोग रहे लोगों की जमात होती है जो नहीं चाहती कि ऐसी घटनाएं लोगों को हमेशा याद रहें और जगाए रहें। 16 दिसंबर को बलात्कार की शिकार लड़की की मृत्यु के बाद और उसके पिता की इजाजत के बाद भी हमारीसरकार ने उसकी जीवित रहने की कोशिश को ही मार दिया था। वो जिंदा रहती तो हर रोज हमें झकझोरती रहती। हर रोज हम इस खतरे से निपटने को सोचते रहते। वरना तो रोज की जिंदगी की जद्दोजहद में हम कहां ऐसी गंदी बातें याद रखते हैं जब तक हमारे साथ, बगल में या ऐसे ही मीडिया पर बड़ी खबर न बन जाए। 

दरअसल कहने को भारत आधुनिक हो चुका है। लेकिन, सच्चाई यही है कि अभी भी हम आदिम काल में ही हैं। बलात्कार को मानसिक विकृति कहने के बजाए हमारे नेताजी लोग पहनावे और टीवी पर दिखने वाली अश्लीलता की वजह से बता रहे हैं। मुंबई की घटना के बाद अभी नरेश अग्रवाल, लालू यादव जैसे लोग बोले। जबकि इन्हें शायद ही पता हो कि लड़की ने क्या पहना था। और, वो कुछ भी पहने होती ऐसे कमीने क्यों रुकते। खैर ये शायद भारतीय नेताओं की प्रवृत्ति है 16 दिसंबर को दिल्ली में हुई गैंगरेप की घटना के बाद देश के गृहमंत्रीसुशील कुमार शिंदे और दूसरे नेताओं की बयानबाजी भला किसे भूली होगी। जैसी मीडिया में खबरें हैं कि उस लड़की ने हालत ठीक होते ही यही कहा कि किसी भी हालत में दोषियों को छोड़ना नहीं है और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। वैसे बहस अभी भी इस बात पर जारी है कि फांसी होनी चाहिए या नहीं। कुछ खबरें बड़ी हो जाती हैं और इस वजह से उसके बहाने समाज के गिरते स्तर पर संवेदनहीनता पर बात चर्चा हो जाती है। गुवाहाटी की सड़कों पर नवंबर 2007 में भी ऐसी ही घटना हुई थी। बिंदास बंबई जैसे देश के सारे शहर बनाने की ओर हम बढ़ते कि रात-दिन का भेद भुलाकर हम मस्त रह पाते। हुआ उल्टा हम सरेशाम मुंबई की मस्ती का ही बलात्कार कर रहे हैं। देश तो पहले ही बलात्कारी बना हुआ है।
(लिखना शुरू किया था तो शीर्षक सूझा नहीं अब लग रहा है कि इसी आखिरी लाइन को शीर्षक बनाना चाहिए था)

Saturday, January 05, 2013

ये मामला इतना सीधा नहीं है !

दुष्कर्म की घटना के अकेले चश्मदीद को जी न्यूज एडिटर ने अपने पत्रकारीय पुनर्जन्म के लिए इस्तेमाल किया है। ये बहस चल रही है। बहस ये भी कि ऐसे संवेदनशील मसले की भी पैकेजिंग बड़ी घटिया हुई है। हमें लगता है कि ये दोनों बातें काफी हद तक सही हो सकती हैं। लेकिन, मेरी सामान्य बुद्धि इस घटना में इसलिए जी के साथ है क्योंकि, सुधीर ने जो किया ये उसे करना ही चाहिए। बड़ा दाग धोने का मौका जो उसके पास है। लेकिन, य...े साहस दिखाने के बजाए टीवी के महान संपादक सरकारी स्थिरता पर क्यों लामबंद हैं। अब ये इंटरव्यू तो हमेशा सरकार पर उंगली उठाता रहेगा। दूसरी बात टीवी इतना ही संवेदनशील रहता है कि किसी भी घटना की पैकेजिंग अतिमहत्वपूर्ण होती है। कितनी भी संवेदनशील खबर पर घंटों न्यूजरूम में इस बात पर खर्च होते हैं कि कौन सा संगीत या गाना लगे कि और ज्यादा लोग इससे जुड़ जाएं। ये बहसें छोड़िए। सुधीर को दोषी ठहराते रहिए, जरूरी है। लेकिन, इस मुद्दे पर जी के साथ आइए, उसके साहस को सलाम कीजिए। वरना सरकारी चाबुक तो, तैयार है ही।

जो, लोग इसे कानून के खिलाफ बता रहे हैं उनकी जानकारी के लिए सिर्फ ये लड़का ही नहीं। उस लड़की के पिता भी न्यूज चैनलों को साक्षात्कार देना चाह रहे हैं। उनकी लड़की के नाम को सम्मान से जाना जाए ये चाहते हैं पहचान-सम्मान देने में न तो मीडिया साथ दे रहा है न सरकार। फिर से सोचिए सारा मामला समझ में आ जाएगा।

Monday, December 31, 2012

वो जीना चाहती थी और मैं भी चाहता हूं कि वो जिंदा रहे



यहां उस लड़की की उसल तस्वीर लगाना चाहता हूं
अब धीरे-धीरे उस लड़की की कहानियां दबे-छिपे लोगों के सामने आ रही है। दरअसल ये एक ऐसी कहानी है जिसे हर कोई जानना चाहता है। सुनना चाहता है। उस दर्द से दोबारा कोई न गुजरे ऐसा इस देश में ही नहीं दुनिया चाहने वाले लगभद पूरे ही हैं। वो, लड़की एक ऐसी कहानी बन गई है जिसक चर्चा, बातचीत हर कोई कर रहा है लेकिन, सच्चाई ये है कि बातचीत हम उसकी तो, कर रहे हैं। उसे जिंदा रखने की कसमें खा रहे हैं। उसके मरने से पूरे समाज के जिंदा होने की आशा भी जगा चुके हैं। मैं ये दरअसल इसलिए कर रहा हूं कि उसकी असल पहचान किसी को नहीं पता। अजीब टाइप के प्रतीकों के जरिए उसकी पहचान बनी हुई है। कोई उसे दामिनी कह रहा है तो, कोई निर्भय, वेदना या जाने क्या-क्या। अब सवाल यही है कि जिसके नाम पर सारा देश जग गया है। उसको हम मारने पर तुले हुए हैं। हम पता नहीं किस वजह से उसकी पहचान खत्म करने पर तुले हुए हैं।

टीवी संपादकों की संस्था ब्रॉकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (BEA) ने सहमति बनाई कि हम उस सामूहिक दुष्कर्म की शिकार लड़की की निजी स्वतंत्रता को बचाए रखेंगे। और, इसके लिए उन्होंने ये तय किया कि जंतर-मंतर  और देश के दूसरे हिस्सों में होने वाले आंदोलनों को तो, दिखाएंगे लेकिन, उस लड़की के नाम, चेहरे को लोगों के सामने नहीं लाएंगे। उस लड़की के परिवार के लोगों की पहचान नहीं दिखाएंगे। ये सहमति उनके अतिपरिपक्व पत्रकार मन को शायद ठीक लगती होगी। लेकिन, मैं जब अपने मन को टटोलता हूं तो, मुझे लगता है कि ऐसा करना दरअसल उस लड़की की निजी जिंदगी में दखल देने से कहीं ज्यादा ये लगता है कि सरकार के स्थायित्व पर ज्यादा टकराहट न हो। लगभग सारे न्यूज चैनलों, अखबारों ने अपने हिसाब से उसका कुछ नाम रख लिया है और देश की जनता से अपील कुछ इस अंदाज में कर रहे हैं कि सरकारी दूरदर्शन भी उनके सामने पानी भरता दिखे। सवाल यही है कि वो, क्या चाह रहे हैं कि देश एक ऐसी घटना के नाम पर जो, जागा है वो, फिर सो जाए। बल्कि मुझे तो लगता है कि सरकारी उदारवाद की नीति से घुटता वर्ग जो, यथास्थिति वादी हो चुका था। जो, जागा था लेकिन, आंख बंदकर सोए होने का नाटक कर रहा था सिर्फ इस बेवजह की उम्मीद में बुरी घटनाएं सिर्फ बगल से छूकर खबरों में आकर निकल जाएंगी। इस घटना ने उसे डराया है। और, इस डर ने उसे निर्भय होने का एक मंत्र दे दिया है लेकिन, ये निर्भय मंत्र आखिर कब तक काम आएगा। जिस लड़की की शहादत के बाद देश में ऐसा करने वालों के खिलाफ एक ऐसा माहौल बना है जो, सीधे और तुरंत कार्रवाई की स्थिति पैदा कर रहा है। उसी लड़की की पहचान हम क्यों मारने पर तुले हैं।

ये कहानियां आनी शुरू हो चुकी हैं कि उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक गांव से वो लड़की देश की राजधानी आई थी। उस लड़की के पिता के साक्षात्कार नाम बिना बताए अखबारों में छप चुके हैं। पिता ये बता चुका है कि उस लड़की की पढ़ाई के लिए उसने खेत बेच दिया। छोटे भाइयों को पढ़ाना उस लड़की का सबसे बड़ा सपना था। इस सबकी बात हो रही है लेकिन, जो असल वजह है इन सब बातों की यानी वो लड़की। उसकी पहचान या कहें उसे जिंदा रखने से हम डर रहे हैं। क्या अभी भी उसके सा हुआ दुष्कर्म उसके मां-बाप, भाई-बहन के माथे पर कलंक जैसा है। आखिर क्यों हम डर रहे हैं उसकी पहचान जाहिर करने से। आखिर क्यों उस लड़की का चेहरा इस देश की सारी लड़कियों के लिए संबल, ताकत नहीं बन सकता। क्यों उस लड़की का नाम इस देश में महिलाओं के खिलाफ किसी भी तरह के अपराध के खिलाफ एक हथियार नहीं बन सकता। पाकिस्तानी मलाला को तालिबानियों ने गोली मार दी थी। वो, लड़कियों की शिक्षा का बीड़ा उठा रही थी। एक तालिबानी सोच ने उस लड़की को खत्म करना चाहा। ईश्वरीय ताकत या प्रकृति जिसे भी मान लें उसने मलाला को तालिबानी सोच के खिलाफ जिंदा रखा। आज वो, दुनिया में महिलाओं की ताकत और तालिबानी सोच के खिलाफ एक बहुत बड़ी पहचान बन चुकी है। फिर हमारी ये बहादुर लड़की दिल्ली ब्रेवहर्ट के प्रतीक नाम से ही क्यों नहीं जानी जा सकती।

सारी बात तो, सोच बदलने की ही है। अगर दुष्कर्म की शिकार लड़के प्रति नाम छिपाने की सोच इस समाज में जिंदा है तो, उससे दुष्कर्म करने वालों को तो ऑक्सीजन मिलती ही रहेगी। फिर कैसे दुष्कर्म की शिकार कोई लड़की पूरी ताकत से दुष्कर्म करने वालों को दुष्कर्म साबित कर सकेगी। क्यों आखिर कोई लड़की उस तरह से अपनी चोट से उबर नहीं सकती, अपने सामाजिक अपमान से उबरने का काम नहीं कर सकती जैसे किसी को भी सरेआम पीटा जाता है, हत्या की कोशिश की जाती है या फिर हत्या ही कर दी जाती है। लेकिन, हम सोच बदलने के बजाए सारी ताकत इस बात पर लगा रहे हैं कि उसकी पहचान न जाहिर हो। फिर सोच कैसे बदलेगी। अगर सोच बदलने के इस देश के सबसे बड़े आंदोलन की वजह बनी उस लड़की की मौत के बाद हम- हमारी सरकार, हमारी मीडिया, हमारा समाज -उसकी पहचान को भी मार देना चाह रहे हैं। काफी हद तक मार भी दिया है। अभी आंदोलन जल रहा है। कुछ-कुछ लोग जंतर-मंतर पर अभी जुटे हैं। कड़ाके की सर्दी में भी लोग उस लड़की पहचान जिंदा रखने के लिए जुट रहे हैं। लेकिन, मीडिया (पत्रकारिता) और मंत्री (सरकार) तो, तय कर चुके हैं कि उसकी पहचान जगजाहिर न होने देना ही उसके प्रति असली श्रद्धांजलि है।

लेकिन, मुझे लगता है कि इन सारे लोगों की उसकी इच्छा की दरअसल कोई फिक्र नहीं है या ये कहें कि वो, इससे अनजान हैं। अब सोचिए कि जो लड़की अपने सबसे बुरे हाल में भी जीना चाहती थी। उसे हम- हमारी सरकार, हमारी मीडिया, हमारा समाज - मार देना चाह रहे हैं। वो, जिंदा रहना चाहती थी। और, मैं भी चाहता हूं कि वो, जिंदा रहे। किसी भी स्वस्थ समाज के लिए ये जरूरी है कि वो, अपनी बुराइयों को दूर करे। और, किसी बुराई के शिकार को समाज में सम्मान से जीने का मौका दे। दुष्कर्म के मामले में हमारे समाज की गिरी सोच की वजह से उसकी शिकार लड़की पहचान छिपाने की पारंपरिक समझ पत्रकारिता, सरकार और समाज को है। लेकिन, ये समझने की जरूरत है कि अगर हम इस पारंपरिक समझ को बदल नहीं सके तो, समाज कहां से बदलेगा और दुष्कर्म कैसे रुकेंगे। मैं सरकार से अपील करता हूं कि दुष्कर्म की शिकार उस लड़की के असल चेहरे को सबके सामने लाए और उसे इस देश में महिलाओं पर होने वाले अपराध के खिलाफ एक चेहरा बनाए। सरकार जिस हाल में है और जो कर रही है वो, सबके सामने है। मैं तो मानता हूं कि स्थिति ऐसी हो गई है कि देश में सरकार है ऐसा अहसास ही नहीं होता। फिर सरकार ये क्यों नहीं करती कि उसे महिलाओं पर होने वाले अपराध के खिलाफ एक चेहरा बना दे। उसके नाम से दुष्कर्मियों या महिलाओं के खिलाफ अपराध पर ऐसी सजा का एलान करे कि वो, जिंदा रहे। मरने के बाद भी जिंदा रहे। क्यों नहीं संयुक्त राष्ट्र संघ में ये प्रस्ताव भारत सरकार की तरफ से जाए कि हम जाग गए हैं दुनिया को जगाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ उसे अपना ब्रांड अबैसडर बनाए। दुष्कर्मियों के वहशीपन के बाद वो जिस हाल में थी उसमें वो, जिंदा भी रहती तो, शायद इसी मकसद से कि दुष्कर्म करने की दोबारा कोई सोच न सके। फिर उसे क्यों मारने पर तुले हैं हम- हमारी सरकार, हमारी मीडिया, हमारा समाज। 

Monday, December 24, 2012

इस सरकार का फर्मा ही बिगड़ा हुआ है!

बैरिकेड के पीछे छिपी सरकार, राजपथ से इंडिया गेट तक खड़ी जनता से मुंह छिपाती सरकार
सवाल - दिक्कत कहां हैं? अगर सरकार के मुखिया से लेकर हर कोई एक ही बात कह रहा है कि बलात्कार/दुष्कर्म की शिकार लड़की के साथ न्याय होगा। प्रधानमंत्री के भी तीन बेटियां हैं। गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के भी तीन बेटियां हैं। वो, भी चिंतित हैं। फिर क्यों राजपथ से लेकर जनपथ तक जनता बवाल कर रही है। पगलाई भीड़ क्यों असामाजिक तत्वों को सरकार की छवि खराब करने का मौका दे रही है। क्यों, इस जनता को देश के राहुल बाबा की ये बात समझ में नहीं आ रही कि आखिर कोई कानून काम करे इसके लिए समय चाहिए होता है। ऐसे थोड़े  न होता है कि सत्ता के प्रतिष्ठानों को घेरकर भीड़ कोई कानून बनवा ले या कोई बना बनाया कानून लागू करना ले।

सवाल वही कि दिक्कत कहां हैं? जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी राष्ट्र के नाम संबोधन कर दिया। सबको तो पता है देश ही नहीं दुनिया को भी। आखिर कहां अपने प्रधानमंत्री बोलते या बोल पाते हैं। मतलब उन्होंने इसे इतना महत्वपूर्ण तो समझा ना कि इस पर राष्ट्र के नाम संबोधन किया। अब और क्या करें? वो, भी तब जब पुराने जमाने के निकट संबंधी और एक समय तक ताकतवर राष्ट्र के मुखिया पुतिन भारत की यात्रा पर हैं। फिर भी समय निकालकर वो, बोले ना। और, क्या करें आप ही बताइए ना। क्यों, ये लौंडे लपाड़ों की टीम चाहती है कि उनके कहे से देश चलने लगे। अरे, जाओ स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई पूरी करो। सिस्टम में आओ। सिस्टम के जैसे बन जाओ। तब बताना कि देश कैसे चलता है। कानून कैसे बनता है। चले आते हैं। बेवजस सरकार की छवि खराब करते हैं। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तो, रोने लगी हैं। वो, भी तो महिला हैं। उनके साथ केंद्र भेदभाव करता है। पुलिस का नियंत्रण देश के गृहमंत्री के पास और गाली शीला दीक्षित को। इसीलिए उनके सांसद बेटे संदीप दीक्षित ने कह दिया कि कम से कम पुलिस कमिश्नर को तो बर्खास्त कर दो। संदेश जाएगा। संदेश तो जा रहा है। लेकिन, फिर सवाल वही कि दिक्कत कहां हैं? अब तो, सरकार के साथ मीडिया घराने भी ये संदेश चलाने में जोर शोर से लग गए हैं कि आंदोलन हुड़दंगियों के हाथ में चला गया है। अपने बच्चों/परिवार के लोगों को घर में बुला लीजिए। बेचारी सरकारी पुलिस दमन तो कर रही है असामाजिक तत्वों का। अगर आपने अपने बच्चों/परिवार के लोगों को घर वापस नहीं बुलाया तो, फिर दोष मत दीजिएगा सरकार और सरकारी पुलिस को कि इस सर्दी में क्यों पीटा, क्यों सिर फोड़ा, क्यों ठंडे पानी से नहला दिया? लेकिन, जब सब इतने समझदार हैं तो, फिर सवाल वही कि दिक्कत कहां हैं?

जवाब जानने के लिए सिर्फ एक जिम्मेदार व्यकित के बयान अच्छे से सुन लीजिए। ये हैं देश के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे साहब। विनम्रता इनकी पहचान हैं। दरोगा से गृहमंत्री तक बन गए। इन्होंने क्या कहा जब इनसे पूछा गया कि वो, छात्रों से सीधे जाकर क्यों नहीं मिल सकते।

Shinde to cnn ibn: if we meet students today, tomorrow we may have to meet maoists" #shame

Shinde: Tomorrow 100 Adivasis will be killed, can the govt go there?"#shame

 

बस यही दोनों दरअसल जवाब हैं। इस सरकार का फर्मा ही बिगड़ा हुआ है। फर्मा मतलब सांचा। इस सरकार में जो, कुछ भी निकलेगा। आंड़ा तिरछा ही निकलेगा। अब बताइए साहब छात्रों से गृहमंत्री, प्रधानमंत्री या परम प्रधानमंत्री सोनिया गांधी इसलि नहीं मिलना चाहते कि फिर माओवादियों से भी बात करनी पड़ेगी। पहले तो, ये कि छात्र कहां लैंडमाइन बिछा रहे थे। कहां ये हैंडग्रेनेड दाग रहे थे। कहां ये पुलिस, सेना के जवानों की गाड़ी उड़ा रहे थे। हां, अगर ऐसे ही इन्हें चिढ़ाते रहे तो, ये सब ये करने लगेंगे। दूसरी बात ये कि अगर बात करने से माओवादी भी सुधर सकते हैं तो, बात क्यों नहीं करोगे। घोषित/अघोषित आतंकवादियों और उनको पालने वालों से तो, अकसर लाल कालीन बिछाकर बात करते रहते हो। बौरा गए हो क्या। 100 आदिवासी मर जाएं। किसी भी वजह से और देश का गृहमंत्री, वहां तक जाने लायक घटना इसे नहीं समझता। क्यों बने हो मंत्री। मौज करने के लिए। सिर्फ अच्छे-अच्छे कपड़ों में PIB कांफ्रेंस हॉल में बैठकर मीडिया को संबोधित करने के लिए। परेड लेने के लिए। दुनिया घूमने के लिए। इस मौके पर भी जिस सरकार में एक साहसी नेता नहीं है जो, राजपथ/जनपथ पर आकर अपनी बात अपने लोगों से कह सकता। इसीलिए लगता है कि सरकार का फर्मा ही खराब हो चुका है।

फर्मा खराब न हो चुका होता तो, आखिर सरकार क्यों इंतजार करती रहती कि असामाजिक तत्व आकर शांतिपूर्ण चल रहे आंदोलन में शामिल हो जाते। दरअसल संदेह तो, ये होता है कि बड़े समय बाद मनमोहन नीति के आवरण से निकली जनता इतना ज्यादा जाग चुकी है कि सरकार को लगता है कि ऐसे तो, जनता ही सचमुच देश चलाने लगेगी और उसका लोकतंत्र के आवरण में राजशाही चलाने का सपना गड़बड़ाने लगेगा। इसीलिए पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में भी सरकार ने यही किया। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन को सत्ता का आंदोलन, संघ का आंदोलन साबित करने की कोशिश की। और, आखिर में अरविंद केजरीवाल के पार्टी बनाने को सत्ता की भूख करार कर दिया। दरअसल मैं ये बात मानता हूं कि इस देश की जनता जब जागती है तो, उसे आंदोलन करने के लिए कभी किसी आपया बाप की जरूरत नहीं होती है। आजादी से लेकर अब तक बात करें तो, आजादी की लड़ाई के नेता भले ही पूरी तरह से गांधी-नेहरू बन गए। लेकिन, सच्चाई ये है कि जागी जनता को किसी नेता की जरूरत नहीं रही। बाद में जेपी आंदोलन के नाम से जो जाना गया वो, सत्ता परिवर्तन की लड़ाई भी तो, ऐसे ही शुरू हुई थी। आखिर में इसे बंदरों (नौजवानों) का आंदोलन समझने वाले जयप्रकाश नारायण को नेता बनकर आगे आने की जरूरत लगी। दरअसल अभी भी मसला वही है। परेशान देश झूठमूठ का आंख बंद करके सोने का नाटक करने से थक-पक चुका है। उसने आंखें खोल ली है। और, कोई नेता बनना चाहे तो, थोड़ा सा त्यागी बनकर इस अपार ऊर्जाशक्ति का नेता बन सकता है। इतिहास में अमर हो सकता है। लेकिन, मुश्किल यही है कि सरकार से लेकर राजनीति के हर पायदान पर नेता गायब हो गए हैं।



 
सरकार रही नहीं। कम से कम लोकतंत्र वाली तो रही नहीं। और, तानाशाह होने भर की ताकत नहीं है। ये बीच वाली सरकार है। बीच वाली मतलब समझ रहे हैं ना। वर्ना शांतिपूर्वक खड़े हजारों नौजवानों के बीच आने से ये भला क्यों डरते। जवाब ये है कि दिक्कत यहां है कि ये समझ ही नहीं रहे। ये समझ ही नहीं रहे कि क्रांति ऐसे ही होती है।

अंत में- वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने कॉस्टीट्यूशन क्लब में एक सवाल खड़ा किया था कि आखिर इस देश में सीमा पर लड़ने वाली सेना से ज्यादा आंतरिक सेना क्यों है। उसका जवाब मिल रहा है। यही सबसे बड़ा सवाल है इस देश के सामने। यही सबसे बड़ी दिक्कत भी है इस देश के सामने।

Saturday, December 22, 2012

क्रांति ऐसे ही होती है!

बड़े समय से ये बात कही जाने लगी थी कि उदारवाद/ग्लोबल विलेज की नीति के जमाने में भारत में पैदा हुए वर्ग की जवानी, मस्ती, मैकडोनल्ड, पिज्जा और डर्टी पिक्चर में ही बीतने वाली है। लेकिन, शायद ऐसा कहने वाले लोग ये भूले थे कि ऐसा होता नहीं है। हर आने वाली पीढ़ी पहले वाली से ज्यादा संवेदनशील, तेज और तरक्की पसंद होती है। हां, हो सकता है कि वो, बेवजह हर समय चौराहे पर नारे लगाते न दिखे। लेकिन, जब जरूरत पड़ेगी तो, निश्चित तौर पर वो, सड़क से संसद तक होगी और ज्यादा आक्रामक होगी। ये बात सरकारें भूल जाती हैं। या यूं कहें कि सत्ता में रहते-रहते उन्हें याद ही नहीं रहता कि सत्ता में आने का रास्ता क्या होता है। जनता क्यों सत्ता देकर मालिक बना देती है। वो, इसलिए तो, बिल्कुल नहीं कि दुष्कर्म के खिलाफ देश जब गुस्से में खड़ा हो तो, उस पर सरकार पानी की बौछार फेंके, आंसू गैस के गोले फेंके और लाठियां बरसाकर सर तोड़ दे।

जिस तरह से आज इंडिया गेट से रायसीना हिल्स तक गुस्से में नौजवान दिख रहा है। वो, भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के आंदोलन के समय होने वाली आपसी चर्चा को बल देती दिख रही हैं। बात होने लगी है कि क्या अचानत जनता सरकार को जूतियाने के मन बना लेगी और सरकारी पुलिस के भरोसे बैठी सरकार का दम उसी के आंसू गैस के गोले से फूलेगा। कई दिनों से हम लोग ये चर्चा कर रहे थे कि दिल्ली में हुई वहशी दुष्कर्म के इतने बड़े मुद्दे पर अन्ना हजारे का अब तक कोई बयान नहीं आया लेकिन, आज का ये प्रदर्शन देखकर मुझे लगता है कि अन्ना हजारे तो प्रतीक भर थे। मनमोहन के उदारवाद वाली पॉकेट पॉलिटिक्स से उस दौर में पैदा हुआ नौजवान उकता गया है। उस बहाने पैदा हुए सिस्टम से उसे उल्टी आने लगी है। और, इसीलिए जरूरी ये है कि अन्ना से मिली ऊर्जा देश के नौजवान हर जगह का सिस्टम सुधारने में लगाएं। मुश्किल ये है कि ग्लोबलाइजेशन की नीति ने ऐसा हम सबको निकम्मा बना दिया था कि खून में भ्रष्टाचार घुसा सा दिखने लगा था। कई बार मैंने दिल्ली के रेडियो स्टेशनों पर अन्ना आंदोलन के समय ये बहस होते सुनी कि क्या बिना भ्रष्टाचार के हम जी भी सकते हैं। और, वो सब बड़े मजाकिया अंदाज में होता था।

विजय चौक पर रायसीना हिल्स को घेरे खड़े आंदोलनकारी
बड़ी मुश्किल तो ये होती है कि ऐसे आंदोलनों की समीक्षा इस तरह से होने लगती है कि इस आंदोलन की ताकत पिछले आंदोलन से ज्यादा थी या कम। अन्ना के आंदोलन में तो ये भी चर्चा होने लगी थी भ्रष्टाचार के खिलाफ ये लड़ाई सिर्फ सवर्ण लड़ रहे हैं। न पिछड़े हैं, न दलित हैं, न मुसलमान। खैर, बाद में ऐसा बोलने वालों की बुद्धि कुछ तो ठीक हुई ही होगी। और, सरकारों को डर भी लगने लगा था। लेकिन, इस सरकार को अब ज्यादा डरना चाहिए। क्योंकि, ये अब जागी जनता है। न इसे 'आप' की जरूरत है न किसी 'बाप' की। और, मुझे लगता है कि कल एक लड़की जिस तरह से राष्ट्रपति के गलियारे तक दौड़ती चली गई थी उससे लाल पत्थरों के भीतर बैठे लोग डरने लगे होंगे। और, आज सत्ता के असल प्रतीक रायसीना हिल्स- नॉर्थ, साउथ ब्लॉक और राष्ट्रपति भवन को जिस तरह से नौजवानों ने घेर रखा है उसने जरूर इन्हें ज्यादा डराया होगा।


Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

 Harsh Vardhan Tripathi हर्ष वर्धन त्रिपाठी #Bangladesh में @trahmanbnp प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। @PMOIndia @narendramodi ने उन्हें बध...