Thursday, January 17, 2013

असली खेल तो अब शुरू होगा !

चुनाव सिर्फ डेढ़ साल दूर रह गया है। बजट सत्र भी है। ऐसे में सरकार खुद डीजल कीमतें बढ़ाने का फैसला कैसे लेती। इसीलिए तेल कंपनियों के हवाले ये कर दिया गया। आज आधी रात से दाम बढ़ने की बात है। लेकिन, मुझे लगता है कि अगर हुई भी तो, आज सिर्फ रस्मी बढ़त होगी। खेल आगे होगा। औऱ, अच्छा ही है कम से कम बार-बार अपनी सारी असफलताओं का ठीकरा सरकार वित्तीय घाटे (सब्सिडी) के मत्थे तो नहीं मढ़ सकेगी।

फिर सब्सिडी का खेल खत्म हो जाएगा तो, सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों के भी खेल पर रोक लगेगी। फॉर्च्यून 500 की लिस्ट में बनी रहेंगी क्या। जब रिलायंस इंडस्ट्रीज के रहते दूसरी किसी भी सरकारी कंपनी के किसी भी तरह से उससे आगे जाने में पसीने निकलने लगते हैं। अब सोचिए अगर तेल कंपनियों के सामने भी रिलायंस इंडस्ट्रीज आकर खड़ी हो गई तो, क्या होगा? और, मुझे तो, याद है सबको याद होगा। रिलायंस के बंद हो गए पेट्रोल पंप जब खुले थे तो, कैसे आसपास के इलाके के लोगों की आंखें चमकने लगीं थी कि अरे पेट्रोल पंप ऐसे भी होते हैं। पेट्रोल पंप तो, सरकारी तेल कंपनियों के जमाने में सिर्फ तेल भराने के लिए होते थे। हां, कुछेक जगहों पर सरकारी कंपनियों ने भी मॉडल पंप खोले जहां डीजल-पेट्रोल के साथ कुछ और इंतजाम भी किए। लेकिन, कितने पानी, हवा और गाड़ी पोंछना।

लेकिन, जब रिलायंस आया तो, हर रिलायंस पेट्रोल पंप के साथ होटल-मोटल की भी योजना थी। कई बार रिलायंस के तरफ से सरकार को यही निवेदन गया कि हमें बराबरी की लड़ाई का मौका दो। यानी अगर सब्सिडी सरकारी तेल कंपनियों को दे रहे हो तो, हमें भी दो। क्योंकि, हम भी तो, लोगों को ही डीजल-पेट्रोल बेचेंगे। लेकिन, फॉर्च्यून 500 का तमगा छिनने के डर से सरकार ये इजाजत भला कैसे देती। लेकिन, अब जब पेट्रोल-डीजल दोनों के दाम सरकार नहीं, तेल कंपनियां ही तय करेंगी तो, वो भला घाटा क्यों सहेंगी। अब सरकार अंडररिकवरी के जरिए उनकी बैलेंस शीट तो चमकाने से रही। फिर तो, अंग्रेजी में लेवल प्लेइंग फील्ड तैयार हो जाएगी।

अब इस लेवल प्लेइंग फील्ड पर कौन बेहतर खिलाड़ी साबित होगा ये बताने-समझाने की जरूरत है क्या ? याद है ना भारत हॉकी का विश्व चैंपियन था। ध्यानचंद जादूगर थे। फील्ड बदली। चैंपियन बदल गए। देखिए तेल के खेल में क्या होता है।

Tuesday, January 15, 2013

20000 का बाजार और यूपीए की सरकार!

क्या बाजार का मूल स्वभाव ही चोरी, सट्टेबाजी है। कल वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने पहले के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के समय के एक कानून को 2016 तक के लिए टालने का एलान किया। ये कानून इनकम टैक्स विभाग के अधिकारियों को ज्यादा अधिकार देता है कि वो..., विदेशियों की भारत में टैक्स चोरी के मामले की अच्छे से जांच कर सकें। तब से हंगामा मचा था। चिदंबरम ने आते ही इसे 2013-14 तक टाला था। लेकिन, इत्ते से बात नहीं बनी। अब विदेशी निवेशकों को राहत है कि ये कानून GAAR 2016 तक लागू नहीं होगा। इससे बाजार कल खूब भागा। आज भी। बाजार के काम करने की क्या यही मूल शर्त है कि चोरी करने वालों पर शिकंजा न कसे। वो, उसी रकम को घुमाते रहें और बाजार बढ़ाते रहें।
 
 
वैसे, अपने पी चिदंबरम साहब बाजार भगाने के पुराने उस्ताद हैं। 2014 में लोकसभा चुनाव हैं और ये 2013 की शुरुआत है यानी करीब डेढ़ साल का समय है। 2007 अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा पता नहीं कितने लोगों को याद है। यही पी चिदंबरम साहब वित्त मंत्री थे। शेयर बाजार अचानक धड़ाधड़ कर गिरने लगा था। सट्टेबाजों ने तेजी से निवेश निकालना शुरू कर दिया। और, उस समय भी पी नोट्स और FII का ही झंझट था। लेकिन, वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने उस गिरते बाजार में एंट्री क्या ली। सब मामला पलट गया था किसी फिल्म की कहानी जैसा। तब भी ये समझना मुश्किल नहीं था कि आखिर ये बौराया बाजार किसका भला कर रहा है। हाल ये है कि अगर आप घूम टबलकर इस देश के निवेशकों से चर्चा कर लें तो, झूठ बोलकर बुद्धिमान बनने के चक्कर में भले ही सीना चौड़ा किए बाजार से कमाई करने की कहानी सुनने को मिल जाएं। लेकिन, थोड़ा डिटेल में बात कीजिएगा तो, समझ में आएगा कि हमें तो, बड़ी समझ थी लेकिन, कभी ब्रोकरेज के चक्कर में पिट गए तो, कभी बस चूक गए टाइप के बहानों से खुद के बाजार विशेषज्ञ होने की बात बताने वाले लोग मिल जाएंगे। और, इसी विशेषज्ञ होने की कमजोरी को सरकार समझ चुकी है। इसीलिए उसे पता है कि सेंसेक्स सरपट दौड़ता रहे तो, देश की जनता को तरक्की का आभास होता रहेगा। भले उसकी जेब में हुआ छेद बड़ा होता जा रहा है।
 
गजब के फॉर्मूले पर चल रही है यूपीए सरकार। यूपीए 1 पता नहीं किस चमत्कार से आ गई। लेकिन, यूपीए 1 ऐसे ही चमत्कारों से आई थी। 2007 अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में आई इस गिरावट और उसके चमत्कारिक उभार के ठीक पहले यानी अक्टूबर 2007 के पहले पखवाड़े में ही सरकार ने 2009 के लोकसभा चुनाव के लिए तैयारियां शुरू कर दी थीं। और, उन तैयारियों का आगाज भी हो गया था।  उसका असर ये रहा है कि 2009 में यूपीए 2 सत्ता में। और, 2009 में सरकार बनने के साथ ही सरकार के होने पर ही सवाल खड़े होते रहे। देश के सभी राज्यों में कांग्रेस पिटती रही। सिवाय दिल्ली के। देश के सबसे बड़े राज्य यूपी, बिहार में कांग्रेस गायब सी ही रही। लेकिन, अब जब फिर 2009 के लोकसभा चुनाव की तरह 2014 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ डेढ़ साल ही बचे हैं तो, चिदंबरम साहब का चमत्कार दिखने लगा है। नीति विकलांगता से ग्रस्त यूपीए 2 अचानक सारी नीतियों को कड़ाई से लागू करने लगी है या लागू करने की बात करने लगी है। शेयर बाजार का एक अहम वाला सूचकांक सेंसेक्स फिर से 20000 की तरफ जा पहुंचा है। आज तो, छूकर वापस लौटा है। विदेशी निवेशकों को टैक्स चोरी पर भी सरकारी इनकम टैक्स अधिकारी ज्यादा कड़ाई नहीं कर सकेंगे ये खबर सुनते ही विदेशी निवेशक हर तरह की कमाई लेकर भारतीय शेयर बाजार की चमक फिर बढ़ाने में लग गए। मकर संक्रांति के दिन जब प्रयाग (इलाहाबाद) के महाकुंभ में श्रद्धालु आस्था, पुण्य की गठरी संजोने में लगे थे तो, विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से मुनाफे की गठरी तैयार करने में लगे हुए थे। 14 जनवरी को FII यानी विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार में $ 185.41 मिलियन की रक लगा दी। अब कहां टिक पाएंगे इस रकम के सामने हमारे विदेशी निवेशक। ठीक वैसे ही जैसे कहां वॉलमार्ट की लॉबी के आगे टिक पाएंगे हमारे देसी किराना वाले।
 
लेकिन, इसे सरकार क्यों माने। क्यों समझे। बिना माने-समझे और विदेशियों, विदेशी पैसे की चिंता से ही तो, यूपीए 2 आया। यूपीए 3 का भी जुगाड़ लगा लिए हैं। कम लोगों को कम पैसे देने वाली डायरेक्ट कैश सब्सिडी ट्रांसफर योजना को सरकार के मंत्री मैच विनर कह रहे हैं। समझ रहे हैं न सेंसेक्स के 20000 वाले बाजार और सरकार के बनने में बड़ा तालमेल है।

Monday, January 14, 2013

महिला सशक्तिकरण, मकर संक्रांति, नौकरी


मां-बाप के साथ वो मजबूत लड़की
महिलाओं को घर के अंदर रहना चाहिए। लक्ष्मण रेखा नहीं लांघनी चाहिए। खाप जैसे तय करे वैसे चलें, तभी वो सुरक्षित हैं। मजबूत हैं। लेकिन, असल मजबूती महिलाओं की चाहिए तो, क्या करना चाहिए। वही महमूद ने जो, 70 के दशक में गा के कहा था। ना बीवी ना बच्चा ना बाप बड़ा ना भैया द होल थिंग इज दैट की भैया सबसे बड़ा रुपैया। ये था पुरुष सशक्तिकरण का फॉर्मूला। महिला सशक्तिकरण के लिए इस गाने में ना पति ना बच्चा ना बाप बड़ा ना भैया द होल थिंग इज दैट की भैया सबसे बड़ा रुपैया।

आज सुबह मकर संक्रांति पर घर से खिचड़ी खाकर निकला। पत्नी ने परंपरा के लिहाज से काली उड़द की दाल, चावल, घी और दक्षिणा के साथ निर्देश दिया कि इसे मंदिर में जाकर पंडितजी को दे दीजिए। अच्छा हुआ मैं चला गया। मंदिर में पंडित जी को खिचड़ी, दक्षिणा पकड़ाकर निकल रहा था कि एक लड़की व्हीलचेयर पर मंदिर की सीढ़ियों से भगवान को प्रणाम कर रही थी। लड़की के साथ उसके मां-बाप भी थे। एक दूसरी महिला आई। संवेदना जताते हुए कहा लड़की को काफी तकलीफ है और उसकी वजह से आप लोगों को भी। पोलियोग्रस्त लड़की की मां ने तुरंत पलटकर कड़ाई से जवाब देते हुए एक लाइन में कहा- कोई तकलीफ नहीं है, मेरी लड़की नौकरी करती है।

दरअसल यही है महिला सशक्तिकरण का एकमात्र फॉर्मूला। और, महिला क्या किसी को भी मजबूत बनाने का बस यही फॉर्मूला है।

Saturday, January 05, 2013

ये मामला इतना सीधा नहीं है !

दुष्कर्म की घटना के अकेले चश्मदीद को जी न्यूज एडिटर ने अपने पत्रकारीय पुनर्जन्म के लिए इस्तेमाल किया है। ये बहस चल रही है। बहस ये भी कि ऐसे संवेदनशील मसले की भी पैकेजिंग बड़ी घटिया हुई है। हमें लगता है कि ये दोनों बातें काफी हद तक सही हो सकती हैं। लेकिन, मेरी सामान्य बुद्धि इस घटना में इसलिए जी के साथ है क्योंकि, सुधीर ने जो किया ये उसे करना ही चाहिए। बड़ा दाग धोने का मौका जो उसके पास है। लेकिन, य...े साहस दिखाने के बजाए टीवी के महान संपादक सरकारी स्थिरता पर क्यों लामबंद हैं। अब ये इंटरव्यू तो हमेशा सरकार पर उंगली उठाता रहेगा। दूसरी बात टीवी इतना ही संवेदनशील रहता है कि किसी भी घटना की पैकेजिंग अतिमहत्वपूर्ण होती है। कितनी भी संवेदनशील खबर पर घंटों न्यूजरूम में इस बात पर खर्च होते हैं कि कौन सा संगीत या गाना लगे कि और ज्यादा लोग इससे जुड़ जाएं। ये बहसें छोड़िए। सुधीर को दोषी ठहराते रहिए, जरूरी है। लेकिन, इस मुद्दे पर जी के साथ आइए, उसके साहस को सलाम कीजिए। वरना सरकारी चाबुक तो, तैयार है ही।

जो, लोग इसे कानून के खिलाफ बता रहे हैं उनकी जानकारी के लिए सिर्फ ये लड़का ही नहीं। उस लड़की के पिता भी न्यूज चैनलों को साक्षात्कार देना चाह रहे हैं। उनकी लड़की के नाम को सम्मान से जाना जाए ये चाहते हैं पहचान-सम्मान देने में न तो मीडिया साथ दे रहा है न सरकार। फिर से सोचिए सारा मामला समझ में आ जाएगा।

Monday, December 31, 2012

वो जीना चाहती थी और मैं भी चाहता हूं कि वो जिंदा रहे



यहां उस लड़की की उसल तस्वीर लगाना चाहता हूं
अब धीरे-धीरे उस लड़की की कहानियां दबे-छिपे लोगों के सामने आ रही है। दरअसल ये एक ऐसी कहानी है जिसे हर कोई जानना चाहता है। सुनना चाहता है। उस दर्द से दोबारा कोई न गुजरे ऐसा इस देश में ही नहीं दुनिया चाहने वाले लगभद पूरे ही हैं। वो, लड़की एक ऐसी कहानी बन गई है जिसक चर्चा, बातचीत हर कोई कर रहा है लेकिन, सच्चाई ये है कि बातचीत हम उसकी तो, कर रहे हैं। उसे जिंदा रखने की कसमें खा रहे हैं। उसके मरने से पूरे समाज के जिंदा होने की आशा भी जगा चुके हैं। मैं ये दरअसल इसलिए कर रहा हूं कि उसकी असल पहचान किसी को नहीं पता। अजीब टाइप के प्रतीकों के जरिए उसकी पहचान बनी हुई है। कोई उसे दामिनी कह रहा है तो, कोई निर्भय, वेदना या जाने क्या-क्या। अब सवाल यही है कि जिसके नाम पर सारा देश जग गया है। उसको हम मारने पर तुले हुए हैं। हम पता नहीं किस वजह से उसकी पहचान खत्म करने पर तुले हुए हैं।

टीवी संपादकों की संस्था ब्रॉकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (BEA) ने सहमति बनाई कि हम उस सामूहिक दुष्कर्म की शिकार लड़की की निजी स्वतंत्रता को बचाए रखेंगे। और, इसके लिए उन्होंने ये तय किया कि जंतर-मंतर  और देश के दूसरे हिस्सों में होने वाले आंदोलनों को तो, दिखाएंगे लेकिन, उस लड़की के नाम, चेहरे को लोगों के सामने नहीं लाएंगे। उस लड़की के परिवार के लोगों की पहचान नहीं दिखाएंगे। ये सहमति उनके अतिपरिपक्व पत्रकार मन को शायद ठीक लगती होगी। लेकिन, मैं जब अपने मन को टटोलता हूं तो, मुझे लगता है कि ऐसा करना दरअसल उस लड़की की निजी जिंदगी में दखल देने से कहीं ज्यादा ये लगता है कि सरकार के स्थायित्व पर ज्यादा टकराहट न हो। लगभग सारे न्यूज चैनलों, अखबारों ने अपने हिसाब से उसका कुछ नाम रख लिया है और देश की जनता से अपील कुछ इस अंदाज में कर रहे हैं कि सरकारी दूरदर्शन भी उनके सामने पानी भरता दिखे। सवाल यही है कि वो, क्या चाह रहे हैं कि देश एक ऐसी घटना के नाम पर जो, जागा है वो, फिर सो जाए। बल्कि मुझे तो लगता है कि सरकारी उदारवाद की नीति से घुटता वर्ग जो, यथास्थिति वादी हो चुका था। जो, जागा था लेकिन, आंख बंदकर सोए होने का नाटक कर रहा था सिर्फ इस बेवजह की उम्मीद में बुरी घटनाएं सिर्फ बगल से छूकर खबरों में आकर निकल जाएंगी। इस घटना ने उसे डराया है। और, इस डर ने उसे ‘निर्भय’ होने का एक मंत्र दे दिया है लेकिन, ये निर्भय मंत्र आखिर कब तक काम आएगा। जिस लड़की की ‘शहादत’ के बाद देश में ऐसा करने वालों के खिलाफ एक ऐसा माहौल बना है जो, सीधे और तुरंत कार्रवाई की स्थिति पैदा कर रहा है। उसी लड़की की पहचान हम क्यों मारने पर तुले हैं।

ये कहानियां आनी शुरू हो चुकी हैं कि उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक गांव से वो लड़की देश की राजधानी आई थी। उस लड़की के पिता के साक्षात्कार नाम बिना बताए अखबारों में छप चुके हैं। पिता ये बता चुका है कि उस लड़की की पढ़ाई के लिए उसने खेत बेच दिया। छोटे भाइयों को पढ़ाना उस लड़की का सबसे बड़ा सपना था। इस सबकी बात हो रही है लेकिन, जो असल वजह है इन सब बातों की यानी वो लड़की। उसकी पहचान या कहें उसे जिंदा रखने से हम डर रहे हैं। क्या अभी भी उसके सा हुआ दुष्कर्म उसके मां-बाप, भाई-बहन के माथे पर कलंक जैसा है। आखिर क्यों हम डर रहे हैं उसकी पहचान जाहिर करने से। आखिर क्यों उस लड़की का चेहरा इस देश की सारी लड़कियों के लिए संबल, ताकत नहीं बन सकता। क्यों उस लड़की का नाम इस देश में महिलाओं के खिलाफ किसी भी तरह के अपराध के खिलाफ एक हथियार नहीं बन सकता। पाकिस्तानी मलाला को तालिबानियों ने गोली मार दी थी। वो, लड़कियों की शिक्षा का बीड़ा उठा रही थी। एक तालिबानी सोच ने उस लड़की को खत्म करना चाहा। ईश्वरीय ताकत या प्रकृति जिसे भी मान लें उसने मलाला को तालिबानी सोच के खिलाफ जिंदा रखा। आज वो, दुनिया में महिलाओं की ताकत और तालिबानी सोच के खिलाफ एक बहुत बड़ी पहचान बन चुकी है। फिर हमारी ये बहादुर लड़की दिल्ली ब्रेवहर्ट के प्रतीक नाम से ही क्यों नहीं जानी जा सकती।

सारी बात तो, सोच बदलने की ही है। अगर दुष्कर्म की शिकार लड़के प्रति नाम छिपाने की सोच इस समाज में जिंदा है तो, उससे दुष्कर्म करने वालों को तो ऑक्सीजन मिलती ही रहेगी। फिर कैसे दुष्कर्म की शिकार कोई लड़की पूरी ताकत से दुष्कर्म करने वालों को दुष्कर्म साबित कर सकेगी। क्यों आखिर कोई लड़की उस तरह से अपनी चोट से उबर नहीं सकती, अपने सामाजिक अपमान से उबरने का काम नहीं कर सकती जैसे किसी को भी सरेआम पीटा जाता है, हत्या की कोशिश की जाती है या फिर हत्या ही कर दी जाती है। लेकिन, हम सोच बदलने के बजाए सारी ताकत इस बात पर लगा रहे हैं कि उसकी पहचान न जाहिर हो। फिर सोच कैसे बदलेगी। अगर सोच बदलने के इस देश के सबसे बड़े आंदोलन की वजह बनी उस लड़की की मौत के बाद हम- हमारी सरकार, हमारी मीडिया, हमारा समाज -उसकी पहचान को भी मार देना चाह रहे हैं। काफी हद तक मार भी दिया है। अभी आंदोलन जल रहा है। कुछ-कुछ लोग जंतर-मंतर पर अभी जुटे हैं। कड़ाके की सर्दी में भी लोग उस लड़की पहचान जिंदा रखने के लिए जुट रहे हैं। लेकिन, मीडिया (पत्रकारिता) और मंत्री (सरकार) तो, तय कर चुके हैं कि उसकी पहचान जगजाहिर न होने देना ही उसके प्रति असली श्रद्धांजलि है।

लेकिन, मुझे लगता है कि इन सारे लोगों की उसकी इच्छा की दरअसल कोई फिक्र नहीं है या ये कहें कि वो, इससे अनजान हैं। अब सोचिए कि जो लड़की अपने सबसे बुरे हाल में भी जीना चाहती थी। उसे हम- हमारी सरकार, हमारी मीडिया, हमारा समाज - मार देना चाह रहे हैं। वो, जिंदा रहना चाहती थी। और, मैं भी चाहता हूं कि वो, जिंदा रहे। किसी भी स्वस्थ समाज के लिए ये जरूरी है कि वो, अपनी बुराइयों को दूर करे। और, किसी बुराई के शिकार को समाज में सम्मान से जीने का मौका दे। दुष्कर्म के मामले में हमारे समाज की गिरी सोच की वजह से उसकी शिकार लड़की पहचान छिपाने की पारंपरिक समझ पत्रकारिता, सरकार और समाज को है। लेकिन, ये समझने की जरूरत है कि अगर हम इस पारंपरिक समझ को बदल नहीं सके तो, समाज कहां से बदलेगा और दुष्कर्म कैसे रुकेंगे। मैं सरकार से अपील करता हूं कि दुष्कर्म की शिकार उस लड़की के असल चेहरे को सबके सामने लाए और उसे इस देश में महिलाओं पर होने वाले अपराध के खिलाफ एक चेहरा बनाए। सरकार जिस हाल में है और जो कर रही है वो, सबके सामने है। मैं तो मानता हूं कि स्थिति ऐसी हो गई है कि देश में सरकार है ऐसा अहसास ही नहीं होता। फिर सरकार ये क्यों नहीं करती कि उसे महिलाओं पर होने वाले अपराध के खिलाफ एक चेहरा बना दे। उसके नाम से दुष्कर्मियों या महिलाओं के खिलाफ अपराध पर ऐसी सजा का एलान करे कि वो, जिंदा रहे। मरने के बाद भी जिंदा रहे। क्यों नहीं संयुक्त राष्ट्र संघ में ये प्रस्ताव भारत सरकार की तरफ से जाए कि हम जाग गए हैं दुनिया को जगाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ उसे अपना ब्रांड अबैसडर बनाए। दुष्कर्मियों के वहशीपन के बाद वो जिस हाल में थी उसमें वो, जिंदा भी रहती तो, शायद इसी मकसद से कि दुष्कर्म करने की दोबारा कोई सोच न सके। फिर उसे क्यों मारने पर तुले हैं हम- हमारी सरकार, हमारी मीडिया, हमारा समाज। 

Monday, December 24, 2012

इस सरकार का फर्मा ही बिगड़ा हुआ है!

बैरिकेड के पीछे छिपी सरकार, राजपथ से इंडिया गेट तक खड़ी जनता से मुंह छिपाती सरकार
सवाल - दिक्कत कहां हैं? अगर सरकार के मुखिया से लेकर हर कोई एक ही बात कह रहा है कि बलात्कार/दुष्कर्म की शिकार लड़की के साथ न्याय होगा। प्रधानमंत्री के भी तीन बेटियां हैं। गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के भी तीन बेटियां हैं। वो, भी चिंतित हैं। फिर क्यों राजपथ से लेकर जनपथ तक जनता बवाल कर रही है। पगलाई भीड़ क्यों असामाजिक तत्वों को सरकार की छवि खराब करने का मौका दे रही है। क्यों, इस जनता को देश के राहुल बाबा की ये बात समझ में नहीं आ रही कि आखिर कोई कानून काम करे इसके लिए समय चाहिए होता है। ऐसे थोड़े  न होता है कि सत्ता के प्रतिष्ठानों को घेरकर भीड़ कोई कानून बनवा ले या कोई बना बनाया कानून लागू करना ले।

सवाल वही कि दिक्कत कहां हैं? जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी राष्ट्र के नाम संबोधन कर दिया। सबको तो पता है देश ही नहीं दुनिया को भी। आखिर कहां अपने प्रधानमंत्री बोलते या बोल पाते हैं। मतलब उन्होंने इसे इतना महत्वपूर्ण तो समझा ना कि इस पर राष्ट्र के नाम संबोधन किया। अब और क्या करें? वो, भी तब जब पुराने जमाने के निकट संबंधी और एक समय तक ताकतवर राष्ट्र के मुखिया पुतिन भारत की यात्रा पर हैं। फिर भी समय निकालकर वो, बोले ना। और, क्या करें आप ही बताइए ना। क्यों, ये लौंडे लपाड़ों की टीम चाहती है कि उनके कहे से देश चलने लगे। अरे, जाओ स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई पूरी करो। सिस्टम में आओ। सिस्टम के जैसे बन जाओ। तब बताना कि देश कैसे चलता है। कानून कैसे बनता है। चले आते हैं। बेवजस सरकार की छवि खराब करते हैं। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तो, रोने लगी हैं। वो, भी तो महिला हैं। उनके साथ केंद्र भेदभाव करता है। पुलिस का नियंत्रण देश के गृहमंत्री के पास और गाली शीला दीक्षित को। इसीलिए उनके सांसद बेटे संदीप दीक्षित ने कह दिया कि कम से कम पुलिस कमिश्नर को तो बर्खास्त कर दो। संदेश जाएगा। संदेश तो जा रहा है। लेकिन, फिर सवाल वही कि दिक्कत कहां हैं? अब तो, सरकार के साथ मीडिया घराने भी ये संदेश चलाने में जोर शोर से लग गए हैं कि आंदोलन हुड़दंगियों के हाथ में चला गया है। अपने बच्चों/परिवार के लोगों को घर में बुला लीजिए। बेचारी सरकारी पुलिस दमन तो कर रही है असामाजिक तत्वों का। अगर आपने अपने बच्चों/परिवार के लोगों को घर वापस नहीं बुलाया तो, फिर दोष मत दीजिएगा सरकार और सरकारी पुलिस को कि इस सर्दी में क्यों पीटा, क्यों सिर फोड़ा, क्यों ठंडे पानी से नहला दिया? लेकिन, जब सब इतने समझदार हैं तो, फिर सवाल वही कि दिक्कत कहां हैं?

जवाब जानने के लिए सिर्फ एक जिम्मेदार व्यकित के बयान अच्छे से सुन लीजिए। ये हैं देश के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे साहब। विनम्रता इनकी पहचान हैं। दरोगा से गृहमंत्री तक बन गए। इन्होंने क्या कहा जब इनसे पूछा गया कि वो, छात्रों से सीधे जाकर क्यों नहीं मिल सकते।

Shinde to cnn ibn: if we meet students today, tomorrow we may have to meet maoists" #shame

Shinde: Tomorrow 100 Adivasis will be killed, can the govt go there?"#shame

 

बस यही दोनों दरअसल जवाब हैं। इस सरकार का फर्मा ही बिगड़ा हुआ है। फर्मा मतलब सांचा। इस सरकार में जो, कुछ भी निकलेगा। आंड़ा तिरछा ही निकलेगा। अब बताइए साहब छात्रों से गृहमंत्री, प्रधानमंत्री या परम प्रधानमंत्री सोनिया गांधी इसलि नहीं मिलना चाहते कि फिर माओवादियों से भी बात करनी पड़ेगी। पहले तो, ये कि छात्र कहां लैंडमाइन बिछा रहे थे। कहां ये हैंडग्रेनेड दाग रहे थे। कहां ये पुलिस, सेना के जवानों की गाड़ी उड़ा रहे थे। हां, अगर ऐसे ही इन्हें चिढ़ाते रहे तो, ये सब ये करने लगेंगे। दूसरी बात ये कि अगर बात करने से माओवादी भी सुधर सकते हैं तो, बात क्यों नहीं करोगे। घोषित/अघोषित आतंकवादियों और उनको पालने वालों से तो, अकसर लाल कालीन बिछाकर बात करते रहते हो। बौरा गए हो क्या। 100 आदिवासी मर जाएं। किसी भी वजह से और देश का गृहमंत्री, वहां तक जाने लायक घटना इसे नहीं समझता। क्यों बने हो मंत्री। मौज करने के लिए। सिर्फ अच्छे-अच्छे कपड़ों में PIB कांफ्रेंस हॉल में बैठकर मीडिया को संबोधित करने के लिए। परेड लेने के लिए। दुनिया घूमने के लिए। इस मौके पर भी जिस सरकार में एक साहसी नेता नहीं है जो, राजपथ/जनपथ पर आकर अपनी बात अपने लोगों से कह सकता। इसीलिए लगता है कि सरकार का फर्मा ही खराब हो चुका है।

फर्मा खराब न हो चुका होता तो, आखिर सरकार क्यों इंतजार करती रहती कि असामाजिक तत्व आकर शांतिपूर्ण चल रहे आंदोलन में शामिल हो जाते। दरअसल संदेह तो, ये होता है कि बड़े समय बाद मनमोहन नीति के आवरण से निकली जनता इतना ज्यादा जाग चुकी है कि सरकार को लगता है कि ऐसे तो, जनता ही सचमुच देश चलाने लगेगी और उसका लोकतंत्र के आवरण में राजशाही चलाने का सपना गड़बड़ाने लगेगा। इसीलिए पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में भी सरकार ने यही किया। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन को सत्ता का आंदोलन, संघ का आंदोलन साबित करने की कोशिश की। और, आखिर में अरविंद केजरीवाल के पार्टी बनाने को सत्ता की भूख करार कर दिया। दरअसल मैं ये बात मानता हूं कि इस देश की जनता जब जागती है तो, उसे आंदोलन करने के लिए कभी किसी ‘आप’ या ‘बाप’ की जरूरत नहीं होती है। आजादी से लेकर अब तक बात करें तो, आजादी की लड़ाई के नेता भले ही पूरी तरह से गांधी-नेहरू बन गए। लेकिन, सच्चाई ये है कि जागी जनता को किसी नेता की जरूरत नहीं रही। बाद में जेपी आंदोलन के नाम से जो जाना गया वो, सत्ता परिवर्तन की लड़ाई भी तो, ऐसे ही शुरू हुई थी। आखिर में इसे बंदरों (नौजवानों) का आंदोलन समझने वाले जयप्रकाश नारायण को नेता बनकर आगे आने की जरूरत लगी। दरअसल अभी भी मसला वही है। परेशान देश झूठमूठ का आंख बंद करके सोने का नाटक करने से थक-पक चुका है। उसने आंखें खोल ली है। और, कोई नेता बनना चाहे तो, थोड़ा सा त्यागी बनकर इस अपार ऊर्जाशक्ति का नेता बन सकता है। इतिहास में अमर हो सकता है। लेकिन, मुश्किल यही है कि सरकार से लेकर राजनीति के हर पायदान पर नेता गायब हो गए हैं।



 
सरकार रही नहीं। कम से कम लोकतंत्र वाली तो रही नहीं। और, तानाशाह होने भर की ताकत नहीं है। ये बीच वाली सरकार है। बीच वाली मतलब समझ रहे हैं ना। वर्ना शांतिपूर्वक खड़े हजारों नौजवानों के बीच आने से ये भला क्यों डरते। जवाब ये है कि दिक्कत यहां है कि ये समझ ही नहीं रहे। ये समझ ही नहीं रहे कि क्रांति ऐसे ही होती है।

अंत में- वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने कॉस्टीट्यूशन क्लब में एक सवाल खड़ा किया था कि आखिर इस देश में सीमा पर लड़ने वाली सेना से ज्यादा आंतरिक सेना क्यों है। उसका जवाब मिल रहा है। यही सबसे बड़ा सवाल है इस देश के सामने। यही सबसे बड़ी दिक्कत भी है इस देश के सामने।

Saturday, December 22, 2012

क्रांति ऐसे ही होती है!

बड़े समय से ये बात कही जाने लगी थी कि उदारवाद/ग्लोबल विलेज की नीति के जमाने में भारत में पैदा हुए वर्ग की जवानी, मस्ती, मैकडोनल्ड, पिज्जा और डर्टी पिक्चर में ही बीतने वाली है। लेकिन, शायद ऐसा कहने वाले लोग ये भूले थे कि ऐसा होता नहीं है। हर आने वाली पीढ़ी पहले वाली से ज्यादा संवेदनशील, तेज और तरक्की पसंद होती है। हां, हो सकता है कि वो, बेवजह हर समय चौराहे पर नारे लगाते न दिखे। लेकिन, जब जरूरत पड़ेगी तो, निश्चित तौर पर वो, सड़क से संसद तक होगी और ज्यादा आक्रामक होगी। ये बात सरकारें भूल जाती हैं। या यूं कहें कि सत्ता में रहते-रहते उन्हें याद ही नहीं रहता कि सत्ता में आने का रास्ता क्या होता है। जनता क्यों सत्ता देकर मालिक बना देती है। वो, इसलिए तो, बिल्कुल नहीं कि दुष्कर्म के खिलाफ देश जब गुस्से में खड़ा हो तो, उस पर सरकार पानी की बौछार फेंके, आंसू गैस के गोले फेंके और लाठियां बरसाकर सर तोड़ दे।

जिस तरह से आज इंडिया गेट से रायसीना हिल्स तक गुस्से में नौजवान दिख रहा है। वो, भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के आंदोलन के समय होने वाली आपसी चर्चा को बल देती दिख रही हैं। बात होने लगी है कि क्या अचानत जनता सरकार को जूतियाने के मन बना लेगी और सरकारी पुलिस के भरोसे बैठी सरकार का दम उसी के आंसू गैस के गोले से फूलेगा। कई दिनों से हम लोग ये चर्चा कर रहे थे कि दिल्ली में हुई वहशी दुष्कर्म के इतने बड़े मुद्दे पर अन्ना हजारे का अब तक कोई बयान नहीं आया लेकिन, आज का ये प्रदर्शन देखकर मुझे लगता है कि अन्ना हजारे तो प्रतीक भर थे। मनमोहन के उदारवाद वाली पॉकेट पॉलिटिक्स से उस दौर में पैदा हुआ नौजवान उकता गया है। उस बहाने पैदा हुए सिस्टम से उसे उल्टी आने लगी है। और, इसीलिए जरूरी ये है कि अन्ना से मिली ऊर्जा देश के नौजवान हर जगह का सिस्टम सुधारने में लगाएं। मुश्किल ये है कि ग्लोबलाइजेशन की नीति ने ऐसा हम सबको निकम्मा बना दिया था कि खून में भ्रष्टाचार घुसा सा दिखने लगा था। कई बार मैंने दिल्ली के रेडियो स्टेशनों पर अन्ना आंदोलन के समय ये बहस होते सुनी कि क्या बिना भ्रष्टाचार के हम जी भी सकते हैं। और, वो सब बड़े मजाकिया अंदाज में होता था।

विजय चौक पर रायसीना हिल्स को घेरे खड़े आंदोलनकारी
बड़ी मुश्किल तो ये होती है कि ऐसे आंदोलनों की समीक्षा इस तरह से होने लगती है कि इस आंदोलन की ताकत पिछले आंदोलन से ज्यादा थी या कम। अन्ना के आंदोलन में तो ये भी चर्चा होने लगी थी भ्रष्टाचार के खिलाफ ये लड़ाई सिर्फ सवर्ण लड़ रहे हैं। न पिछड़े हैं, न दलित हैं, न मुसलमान। खैर, बाद में ऐसा बोलने वालों की बुद्धि कुछ तो ठीक हुई ही होगी। और, सरकारों को डर भी लगने लगा था। लेकिन, इस सरकार को अब ज्यादा डरना चाहिए। क्योंकि, ये अब जागी जनता है। न इसे 'आप' की जरूरत है न किसी 'बाप' की। और, मुझे लगता है कि कल एक लड़की जिस तरह से राष्ट्रपति के गलियारे तक दौड़ती चली गई थी उससे लाल पत्थरों के भीतर बैठे लोग डरने लगे होंगे। और, आज सत्ता के असल प्रतीक रायसीना हिल्स- नॉर्थ, साउथ ब्लॉक और राष्ट्रपति भवन को जिस तरह से नौजवानों ने घेर रखा है उसने जरूर इन्हें ज्यादा डराया होगा।


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