Showing posts with label महिला सशक्तिकरण. Show all posts
Showing posts with label महिला सशक्तिकरण. Show all posts

Sunday, March 08, 2015

इस तरह का महिला सशक्तिकरण न हो!

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक बेहद शानदार खबर है। खबर है कि जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल ने वहां की कंपनियों को अपने बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में महिलाओं को कम से कम तीस प्रतिशत जगह देने का नियम बना दिया है। जर्मन संसद से इसे मंजूरी मिल चुकी है। सचमुच ये बहुत अच्छी खबर है। अब इसका इस्तेमाल जर्मन कंपनियां घर-परिवार की महिलाओं को ही बोर्ड में लाकर खानापूर्ति करेंगी या सचमुच इससे बोर्डरूम की तस्वीर कुछ बदलेगी। हालांकि, निजी तौर पर मैं आरक्षण पसंद नहीं करता। फिर वो किसी भी तरह का हो। लेकिन, सच्चाई यही है कि पुरुष हो, जाति हो, विशेष समाज हो या फिर कोई भी हो, जो मजबूत है उसके सामने कमजोर को मजबूत करने के लिएए या कहें कि मजबूत की बराबरी या उसके आसपास खड़ा करने के लिए उसी समाज को कुछ करना होता है। तो उस करने में आरक्षण भी एक कारगर तरीका है। और ये स्वस्थ समाज के लिए जरूरी भी है कि समाज में महिलाएं भी पुरुषों के आसपास हों। इससे वो बेहतर होते हैं, मानवीय होते हैं। सिर्फ पुरुषों या शायद सिर्फ महिलाओं को प्रभुत्व का समाज बड़ा खतरनाक होगा, है भी।
 
भारत में जातिगत आरक्षण है। महिलाओं को भी काफी जगहो पर आरक्षण मिला हुआ है, खासकर पंचायत चुनावों में। बार-बार विधानसभा और लोकसभा में भी महिला आरक्षण की चर्चा हो रही है। हालांकि, पार्टियां इसके साथ खड़ी दिखना चाहती हैं। लेकिन, जब पार्टी में महिलाओं को बराबरी का हक देने की बात होती है तो वो शायद ही कभी पूरी हो पाती है। यहां तक कि सबसे ताकतवर महिलाओं वाली पार्टियों – कांग्रेस (सोनिया गांधी), तृणमूलकांग्रेस (ममता बनर्जी), एआईएडीएमके (जयललिता), बहुजन समाज पार्टी (मायावती) और पीडीपी (महबूबा मुफ्ती) – में भी महिलाओं की हिस्सेदारी कितनी है। ये सब जानते हैं। पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण दिया गया है। और काफी महिलाएं इससे सशक्त भी हुई होंगी। लेकिन, बहुतायत कैसे सशक्त हुई हैं वो रास्ता वाया पुरुष ही है। ये इलाहाबाद के अखबार में छपा है। लालगोपालगंज के अध्यक्ष प्रतिनिधि की तस्वीर ऊपर चमक रही है। पंचायत अध्यक्ष जुलेखा जी की शकल भी नहीं दिख रही। सिर्फ नाम नीचे लिखा है। प्रतिनिधि महोदय अध्यक्ष जी के पति हैं। पंचायती राज में गजब महिला सशक्तिकरण है। मुझे लगता है कि 365 दिन का महिला सशशक्तिकरण का कुछ किया जाए वरना तो ऐसे ही महिला दिवस की तरह आरक्षण भी महिला सशक्तिकरण का एक धोखा भर बनकर रह जाएंगे।  

Monday, January 14, 2013

महिला सशक्तिकरण, मकर संक्रांति, नौकरी


मां-बाप के साथ वो मजबूत लड़की
महिलाओं को घर के अंदर रहना चाहिए। लक्ष्मण रेखा नहीं लांघनी चाहिए। खाप जैसे तय करे वैसे चलें, तभी वो सुरक्षित हैं। मजबूत हैं। लेकिन, असल मजबूती महिलाओं की चाहिए तो, क्या करना चाहिए। वही महमूद ने जो, 70 के दशक में गा के कहा था। ना बीवी ना बच्चा ना बाप बड़ा ना भैया द होल थिंग इज दैट की भैया सबसे बड़ा रुपैया। ये था पुरुष सशक्तिकरण का फॉर्मूला। महिला सशक्तिकरण के लिए इस गाने में ना पति ना बच्चा ना बाप बड़ा ना भैया द होल थिंग इज दैट की भैया सबसे बड़ा रुपैया।

आज सुबह मकर संक्रांति पर घर से खिचड़ी खाकर निकला। पत्नी ने परंपरा के लिहाज से काली उड़द की दाल, चावल, घी और दक्षिणा के साथ निर्देश दिया कि इसे मंदिर में जाकर पंडितजी को दे दीजिए। अच्छा हुआ मैं चला गया। मंदिर में पंडित जी को खिचड़ी, दक्षिणा पकड़ाकर निकल रहा था कि एक लड़की व्हीलचेयर पर मंदिर की सीढ़ियों से भगवान को प्रणाम कर रही थी। लड़की के साथ उसके मां-बाप भी थे। एक दूसरी महिला आई। संवेदना जताते हुए कहा लड़की को काफी तकलीफ है और उसकी वजह से आप लोगों को भी। पोलियोग्रस्त लड़की की मां ने तुरंत पलटकर कड़ाई से जवाब देते हुए एक लाइन में कहा- कोई तकलीफ नहीं है, मेरी लड़की नौकरी करती है।

दरअसल यही है महिला सशक्तिकरण का एकमात्र फॉर्मूला। और, महिला क्या किसी को भी मजबूत बनाने का बस यही फॉर्मूला है।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...