Saturday, February 05, 2011

हर मौत का अपना अर्थशास्त्र है

शाहजहांपुर में ITBP भर्ती के लिए उमड़े नौजवान

भगदड़ में होने वाली मौतें अखबार की सुर्खियां तो बनती ही हैं। एक साथ कुछेक, कुछ सैकड़ा लोगों की मौत हमेशा टीवी को विशेष तौर पर आकर्षित करती है। जब अचानक टीवी न्यूज चैनलों पर फ्लैश चलता है कि आईटीबीपी में भर्ती के लिए गए लाखों छात्रों ने शाहजहांपुर में हंगामा कर दिया है। बवाल मचा दिया है तो, बस बदइंतजामी भर की खबर थी। लेकिन, जब करीब सात लाख के अनुमानित बेरोजगारों का मेला वापसी के लिए रेलवे स्टेशन पर पहुंचा तो, ट्रेनों की छत पर चढ़े कई नौजवानों की स्टेशन पर बने पुल और बिजली के तारों से टकराने से हुई मौत असली खबर बन गई। और, इस खबर को मीडिया में जगह मिल गई। क्योंकि, ढेर सारी हंगामे के विजुअल थे, तस्वीरें थीं, आग थी। अब रेलवे और उत्तर प्रदेश सरकार सारा ठीकरा आईटीबीपी पर ठोंककर किनारा ले रहे हैं। लेकिन, इस बात पर बमुश्किल चर्चा हो पा रही है कि आखिर क्या वजह है कि देश में हर दूसरे-चौथे ऐसे किसी भर्ती अभियान, किसी रियल्टी शो या फिर किसी जगह कुछ मुफ्त में पाने की दौड़ में लोगों की जानें जा रही हैं।

अभी आईटीबीपी की नौकरी पाने की भगदड़ में मरे लोग चर्चा में हैं। सेना के भर्ती अभियानों में भी अकसर गोली चलने से लेकर भगदड़ में मरने की खबरें इस देश में आम हैं। पिछले साल नोएडा में अमेरिकन आइडल की नकल पर बने इंडियन आइडल रियलिटी शो के ऑडीशन में इंडियन आइडल बनने की चाह रखने वालों की ऐसी भीड़ उमड़ी कि आयोजकों के सारे इंतजाम धरे के धरे रह गए। अनियंत्रित भावी इंडियन आइडल्स ने जमकर हंगामा किया, भगदड़ में रौंदे गए कई आइडल अस्पताल पहुंच गए। नोएडा की सड़कों पर घंटों के लिए जाम लग गया। अखबार-टीवी चैनलों पर आयोजकों की बदइंतजामी खबर बन गई। भला हुआ कि इस भगदड़ में कोई अनिष्ट नहीं हुआ। लेकिन, क्या सचमुच कहीं-कोई इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश कर रहा है कि इस देश की भगदड़ की असली वजह क्या है। क्यों, हर दूसरे-चौथे देश भगदड़ लेने लगता है और अगर भगदड़ में देश के कुछ लोगों की मौत हो गई तो, थोड़ी बहुत खबर बन जाती है नहीं तो, भगदड़ों के बारे में कोई चर्चा तक नहीं होती। क्या भगदड़ इस देश की नियति बन गई है।

मंदिरों में आस्था की भीड़ में शामिल कितने लोग हर साल असमय ऊपर भगवान के पास चले जाते हैं इसका कोई हिसाब नहीं है। उत्तर प्रदेश में ही पिछले साल प्रतापगढ़ के कृपालु महाराज आश्रम में हुई भगदड़ और इसमें हुई मौतें भी बड़ी खबर बनी थी। वैसे तो, इस भगदड़ के देश की सबसे बड़ी खबर बनने के पीछे कई वजहें थीं। सबसे पहली कि ये एक स्वघोषित जगतगुरु कपालु महाराज के आश्रम में आयोजित भंडारे के दौरान हुई भगदड़ थी। दूसरी ये कि पहले के कई मंदिरों में मची भगदड़ों की तरह इस भगदड़ में भी कई निर्दोष जानें चली गईं थीं। तीसरी ये कि बाबाओं-साधुओं के इतने कुकर्म मौके से सामने आ रहे थे कि कृपालु महाराज के आश्रम में मची भगदड़ टीआरपी खींचू और पाठक संख्या बढ़ाऊ खबर बन गई। उस पर आश्रम के एक व्यस्थापाक का ये कह देना कि इन 65 मौतों के लिए ईश्वर जिम्मेदार है—खबरों में और मसाला डाल गया। भगवान भरोसे चलते इस देश में एक बार फिर भगवान के मत्थे 65 मौतों का जिम्मा देकर मामला निपटा लिया गया।

लेकिन, इन मौतों के जिम्मेदार ईश्वर तो बिल्कुल भी नहीं थे। कृपालु महाराज के यहां भंडारे में आए लोग मरे थे तो, उन पर जवाबदेही तय हो सकती है। लेकिन, क्या कृपालु महाराज जिम्मेदार थे। थोड़ा ध्यान से देखें तो, कैसे जिम्मेदार थे वो, तो कुछ भूखे-पेटों के भोजन का इंतजाम कर रहे थे साथ ही उन्हें कुछ रुपए और बरतन दे रहे थे। और, क्या ये भगदड़-मौत नहीं होती तो, वही कृपालु महाराज इतने परिवारों के लिए असली जगतगुरु नहीं प्रतिस्थापित हो जाते। तब तो, ये चर्चा टीवी-अखबारों में नहीं होती फिर भी, 25000 गरीबों के भगवान कृपालु ही बन जाते। और, अगले भंडारे में 50000 गरीब इस कृपालु भगवान के दरवाजे खड़े होते।

दरअसल इन भगदड़ मौतों के असली जिम्मेदार खोजकर उसके सही इलाज के बजाए सारी मशक्कत आईटीबीपी या फिर सेना के भर्ती केंद्र, किसी कृपालु, किसी इंडियन आइडल के आयोजक को गुनहगार बताकर असली समस्या पर ध्यान न जाए इसकी कोशिश सफलता पूर्वक काम कर रही है। ये गुनहगार हैं तो, पिछले साल मुंबई पुलिस की भर्ती के दौरान हुई भगदड़ में मारे-रौंदे गए लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है। लगभग हर बार सेना की भर्ती में सेना के जवान बनने के बजाए सेना के जवानों की गोली खाने के लिए अभिशप्त बेरोजगारों की मौतों-भगदड़ों का जिम्मेदार कौन है।

असली जिम्मेदारी किसकी है ये सबको पता है लेकिन, अगर असली जिम्मेदार खोज लिया गया तो, मुश्किल बढ़ जाएगी। अब ये तर्क आ सकता है कि इन सारी भगदड़ों-मौतों की जिम्मेदारी एक जगह जाकर कैसे तय हो सकती है। नोएडा, किसी महाराज का आश्रम, मुंबई या फिर देश के दूसरे हिस्सों में सेना की भर्ती या फिर रोजगार का कोई दूसरा मेला। दरअसल भूख और बेकारी असली वजह है इस देश की भगदड़-मौतों की। ये भगदड़ उसी बीस रुपए की वजह से है जिस पर अभी भी देश की बड़ी आबादी का रोजाना गुजर-बसर हो रहा है। ये हमारी पैदा की हुई विसंगति की भगदड़ है जहां दुनिया की मंदी में भी हम इंडिया ग्रोथ स्टोरी के सिर्फ थोड़ा धीमा पड़ने की बात करते हैं लेकिन, उन लोगों की चिंता बस इतने से पूरी हो जाती है कि साल के 365 दिन में से कम से कम 100 दिन का रोजगार हम देने वाली योजना ले आ रहे हैं। ये अलग बात है कि अलग-अलग राज्यों में 100 दिन के दावे का भी 18 से 60 प्रतिशत ही पूरा हो पा रहा है।

ये भगदड़ तरसते भारत के चमकते इंडिया के साथ की चाह में मची है। भूख-बेकारी के दौर में सेना या पुलिस की नौकरी के लिए लगी लाइन कोई देश सेवा की चाह में नहीं है। ये सिर्फ अपना और अपने परिवार का पेट भरने-जीवन स्तर बेहतर करने की चाह में लगी लाइन है। उस पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जैसा समझदार अर्थशास्त्री कह रहा है कि हमने महंगाई बढ़ने दी, बेरोजगारी नहीं। पिछले साल भर में टेक्सटाइल, आईटी, रिटेल, रियल इस्टेट, मैन्युफैक्चरिंग हर चमकते क्षेत्र से निकाले गए लोगों की बेरोजगारी की खबरों से ही टीवी-अखबार भरे रहते थे। इन सेक्टरों को जिंदा रखने के लिए रियायतों का पिटारा खोलने से उद्योगपतियों ने तो अपना मुनाफा बचा लिया लेकिन, जिनके पेट पर लात पड़ी उन्हें कहीं से मरहम नहीं मिला। फिर भी प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि हमने महंगाई भले बढ़ने दी लेकिन, बेरोजगारी पर काबू पाया।

ये देखने में भले लगता है कि इंडियन आइडल बनने की लाइन में खड़ा हर लड़का-लड़की ये चमक-दमक के लिए बनना चाहता है। सच्चाई ये होती है कि वो, जल्दी से पैसा कमाकर भारतीय से हटकर इंडियन बन जाना चाहता है। इस चक्कर में भगदड़ का शिकार भी बनता है। लेकिन, इस सिस्टम में जब तक भगदड़ों-मौतों के लिए किसी कृपालु महाराज, इंडियन आइडल के आयोजक या फिर सेना-पुलिस की भर्ती में पुख्ता इंतजाम न होने को बहाना बनाकर जिम्मेदारी थोपी जाती रहेगी। तब तक देश की भगदड़ मौतें रोकने का शायद ही कोई इंतजाम हो पाए। इसीलिए भगदड़ और भगदड़ में हुई मौतें इस देश की नियति बनती जा रही हैं। और, देश असली समस्या से ही भगदड़ लेता दिख रहा है।
(ये लेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपा है)

Friday, January 28, 2011

इस मौलाना की बात सुननी जरूरी है


मौलाना गुलाम मोहम्मद वास्तनवी

केंद्र सरकार पिछले काफी समय से बार-बार जिस एक शब्द का जमकर इस्तेमाल कर रही है वो, इनक्लूसिव ग्रोथ। हिंदी में ये समग्र विकास बनता है। यानी ऐसी विकास की रफ्तार जो, सिर्फ आंकड़ों में ही न हो। हर किसी को उस विकास का फायदा हो। देवबंदियों के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षा के केंद्र दारुल उलूम में मौलाना गुलाम मोहम्मद वास्तनवी ने मोहातिम (वाइस चांसलर) के तौर पर कुर्सी संभाली तो, गुजरात के सूरत का होने की वजह से उनसे ये सवाल होना तय था कि आखिर वो, मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के राज वाले गुजरात को कैसे देखते हैं- खासकर मुसलमानों के विकास की दृष्टि से।

मौलाना वास्तनवी बेहद पढ़े-लिखे हैं। एमबीए की डिग्री हासिल की है। प्रगतिशील है। आधुनिक हैं। दारुल उलूम के गुजरात और महाराष्ट्र में चलने वाले शिक्षा संस्थानों को आधुनिक रूप देने के अगुवा रहे हैं। वास्तनवी का ही कमाल है कि देवबंदी शिक्षा संस्थानों में इंजीनियरिंग और मेडिकल पढ़कर मुसलमान देश की तरक्की का हिस्सा बन रहे हैं। उन्हीं वास्तनवी ने कह दिया कि नरेंद्र मोदी के गुजरात में सब फल-फूल रहे हैं। उन्होंने कहाकि गुजरात में अल्पसंख्यकों के खिलाफ कोई भेदभाव नहीं हो रहा है। भारत की प्रमुख इस्लामिक संस्था देवबंद के शिक्षा केंद्र दारुल उलूम के मुखिया का ये बयान नरेंद्र मोदी के लिए तो, अब तक की सबसे बड़ी तारीफ था लेकिन, वास्तनवी के लिए मोदी का ये समग्र विकास उल्टा चला तीर साबित हो गया। देश भर से मौलानाओं ने नरेंद्र मोदी के गुजरात के समग्र विकास और मोदी की तारीफ के लिए वास्तनवी के खिलाफ खुली जंग छेड़ दी। आखिरकार मौलाना वास्तनवी को इस्तीफे की पेशकश करनी पड़ गई। हालांकि, उन्होंने अभी तक कुर्सी छोड़ने का एलान नहीं किया है।


 वास्तनवी ने इस्तीफे की पेशकश के साथ ये भी कहा कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया और समझा गया। सच्चाई भी यही है। वास्तनवी ने मोदी के गुजरात के समग्र विकास की तारीफ के साथ ही ये भी कहा था कि गुजरात के दंगों को आठ बीत चुके हैं और अब हमें आगे बढ़ना चाहिए। वास्तनवी ने कहा कि गुजरात या दुनिया में कहीं भी, दंगे हों ये मानवता के लिए खराब है और ये कभी नहीं होना चाहिए। गुजरात के दंगे कंलक हैं और इसके दोषियों को सजा मिलनी चाहिए। मोदी के गुजरात में समग्र विकास की तारीफ करने वाले वास्तनवी का बयान ये बताता है कि वास्तनवी मानवतावादी हैं, आधुनिक हैं और समय के साथ चलने में यकीन रखते हैं। इसीलिए वास्तनवी के दारुल उलूम का मोहातिम बनने के बाद देवबंद के प्रगतिशील रास्ते पर चलने की उम्मीद लोगों की थी।


मौलाना ने साफ कहा था कि मौलवियों को फतवा जारी करते समय ये बताना होगा कि फतवा जारी करने के पीछे का तर्क क्या है। देवबंदी विचार को मानने वाले मुसलमान भारत सहित पाकिस्तान, अफगानिस्तान और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हैं। अच्छा हुआ कि वास्तनवी ने फिलहाल इस्तीफे की पेशकश वापस ले ली है। वरना, लड़कियों के जींस न पहनने जैसे विवादित फतवे के लिए जानी जाने वाली देवबंदी जमात के आधुनिक रास्ते पर चलने की राह में भी बड़ी रुकावट आती दिख रही थी। वास्तनवी ने ये भी कहा था कि गुजरात के बारे में जितना बुरा सुनाई देता है उतना है नहीं। वास्तनवी की मानें तो, गुजरात दंगों के राहत में सरकार मुसलमानों के साथ कोई भेदभाव नहीं कर रही है। गुजरात की तरक्की से प्रभावित वास्तनवी ने मुसलमानों से अच्छी पढ़ाई करने की अपील की। क्योंकि, वो मानते हैं कि राज्य सबको रोजगार देना चाह रहा है।


लेकिन, एक गुजराती मुसलमान की बात सुनने के बजाए उस पर देश भर के परंपरावादी राशन-पानी लेकर चढ़ गए। वास्तनवी गुजरात में हैं तो, उनका गुजरात की तरक्की से प्रभावित होना आंकड़ों की वजह से बिल्कुल नहीं होगा। वो, तो अपने आसपास के विकास से ही ये बयान जारी कर रहे होंगे। लेकिन, आंकड़े भी बताते हैं कि वास्तनवी ने बेवजह नरेंद्र मोदी के गुजरात की तारीफ नहीं की। अब वास्तनवी के खिलाफ राशन-पानी लेकर चढ़ने वाले मौलानाओं को ये अंदाजा नहीं है कि देश काफी आगे बढ़ चुका है। अब हिंदू हो या मुसलमान बेवजह सड़कों पर किसी के पक्ष में इस्तेमाल आसानी से नहीं होने वाला। अयोध्या पर फैसले के मामले में ये साफ दिख चुका है।


इस साल के वाइब्रैंट गुजरात के दौरान कुल 20.83 लाख करोड़ रुपए के निवेश समझौते हुए हैं। ये देश की GDP का करीब आधा है। ये सारे समझौते अगर जमीन पर उतरते हैं यानी इन पर काम शुरू होता है तो, 52 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलेगा। यानी राज्य के लगभग सभी काम करने वालों की चाहत पूरी हो जाएगी। गुजरात की विकास दर पिछले पांच सालों से 11 परसेंट के ऊपर है। जबकि, देश के लिए अभी दस परसेंट की तरक्की की रफ्तार को छूना सपना ही रहा है। गुजरात की आबादी 5 करोड़ से ज्यादा है।



गुजरात में ढाई करोड़ से ज्यादा यानी आधी से ज्यादा आबादी के पास मोबाइल फोन है। पूरे देश के मोबाइल उपभोक्ताओं की 5% से ज्यादा हिस्सेदारी गुजरातियों के ही पास है। गुजरात के शहरी इलाकों में 100 प्रतिशत मोबाइल की पहुंच है। और, ऐसा नहीं है कि गुजरात का विकास सिर्फ शहरी या उद्योगों का विकास है। खेती के मामले में भी गुजरात इंडस्ट्री की ग्रोथ से बेहतर कर रहा है। गुजरात की कृषि विकास की दर 12.8% रही है। जबकि, पूरे देश की खेती की विकास दर 2.8% है। 2002-03 के सूखे के बाद गुजरात ने जबरदस्त विकास किया है। बिजली की लगातार आपूर्ति, नर्मदा नदी की बेहतरी और छोटे-छोटे बांधों ने गुजरात में सिंचाई की स्थिति अच्छी की है। करीब ढाई लाख छोटे तालाब गुजरात में हैं। गुजरात की ये तरक्की देखकर ही पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने देश के दूसरे राज्यों को गुजरात से सीख लेने की सलाह दी थी।


उद्योगों के राज्य के तौर पर जाने जाने वाले गुजरात में खुद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का जोर यही रहता है कि जो, जहां है जो, कर रहा है उसे वहीं रहने-करने की सहूलियत मिले। और, इसीलिए गुजरात सरकार की कृषि रथ यात्रा इस साल भी राज्य के सभी 25 जिलों से होकर गुजरी। जिसमें किसानों को बीज, सिंचाई, खेती के चक्र और तकनीक के बारे में जागरूक किया गया।

दारुल उलूम के करीब दो शताब्दी के इतिहास में पहली बार कोई गुजराती वाइस चांसलर बना। इस गुजराती की बात सुनना देश हित में है। क्योंकि, देश को बांटने वाले सबसे ज्यादा तर्क गुजरात की ही धरती से खोद-खोदकर लाए जाते हैं। और, अब जब खुद एक गुजराती मुसलमान ने आगे बढ़ने की बात की तो, उसे पीछे ले जाया जा रहा है। गुजरात और गुजराती मुसलमान 2002 से कब का आगे निकल चुका है। लेकिन, 2011 में भी कुछ लोग जाने किस हित के लिए 2002 के आगे के गुजरात को न देखना चाहते हैं, न सुनना चाहते हैं। लेकिन, अब इस गुजराती मौलाना की सुनना जरूरी है ये किसी नरेंद्र मोदी या सिर्फ गुजरात की बात करता भले दिख रहा हो लेकिन, ये बात उस भारत की कर रहा है जो, विश्वशक्ति बनने का दम भर रहा है। ये मौलाना जानता है कि मुसलमानों का भला इसी में है कि वो, अच्छा पढ़ें और देश के साथ अच्छे से बढ़ें। पढ़ने-बढ़ने का महत्व तो, आजकल अमेरिकियों को ओबामा बताने में भी जुटे हैं। सुनिए वरना ये GDP ग्रोथ, तरक्की, विश्वशक्ति- सब सपना ही रह जाएगा। क्योंकि, मुसलमानों को देश की तरक्की में हिस्सेदार बनाने के बजाए उन्हें सिर्फ देश में वोटबैंक के तौर पर इस्तेमाल करना किसी के हित में नहीं है।

Wednesday, January 12, 2011

ये आरक्षण की कहानी थोड़ी तो ठीक करनी ही होगी

अब दिल्ली से मुंबई के बीच चलने वाली सुपरफास्ट राजधानी एक्सप्रेस भोपाल झांसी के रास्ते घूमकर नहीं आएगी-जाएगी। क्योंकि, आरक्षण की मांग लेकर दूसरी कई मांगे जो, गुर्जरों ने उठाईं थीं वो, सब सरकार ने मान ली हैं। गुर्जरों के नेता वही कर्नल बैंसला हैं जो, कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ मुस्कुराते हुए विजयी भाव से गुर्जरों को समझा रहे हैं। यहीं बैंसला पहले ऐसा ही प्रकोप बीजेपी की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के सामने भी दिखा चुके हैं।

गुर्जरों की 14 मांगें मानी गई हैं वो, ये हैं कि राजस्थान सरकार विशेष पिछड़ी जातियों के सर्वे का काम छे महीने में पूरा कराएगी। इन जातियों में गुर्जर, रैबारी, गाडिया लुहार और बंजारा शामिल है। अगर सर्वे में कुछ और जातियां जुड़ती है तो आरक्षण बढ़ाया जाएगा। ये सर्वे कराने का आदेश राजस्थान हाईकोर्ट ने पहले ही दिया था लेकिन, समय एक साल का दिया था। अब बस यही समय छे महीने का हो गया है। अहम मांग ये सरकार ने मानी है कि वो, अदालत में एक समीक्षा याचिका डालेगी जिसमें सर्वे पूरा होने तक गुर्जरों को पांच प्रतिशत आरक्षण की मंजूरी मांगी जाएगी। और, मांगें ऐसी नहीं हैं जिसकी चर्चा की जाए कि गुर्जरों के उत्थान के लिए सरकार और क्या-क्या करने जा रही है। सवाल ये है कि अगर यही मांगें थीं तो, राजस्थान सरकार ने 17 दिन तक किस बात का इंतजार किया। चलिए सर्वे के लिए तो, छे महीने का समय मिल गया है। लेकिन, अब अगर फिर से राजस्थान सरकार पांच प्रतिशत अतिरिक्त आरक्षण गुर्जरों को देने से मना कर दे तो, क्या होगा। यानी ये आग सिर्फ कुछ समय के लिए ठंडी हुई है।

इन ओबीसी गुर्जरों को और नीचे के आरक्षण की श्रेणी में कैसे शामिल करा पाएगी सरकार। सबसे बड़ा सवाल तो यही है। ये सवाल कई सालों से है। और, गुर्जरों का सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े तो सरकार छे महीने बाद बताएगी लेकिन, गुर्जरों को देखकर तो नहीं लगता कि वो, सामाजिक-आर्थिक तौर पर ऐसे कमजोर हैं कि वो, ओबीसी से भी नीचे के आरक्षण की श्रेणी में जोड़ दिए जाएं। ये जाने कितने दिनों तक रेल गाड़ियों से लेकर सड़कों तक को अपने हिसाब से चलाते हैं। ये हजारों लीटर दूध ठसके से बहा देते हैं वो, भी किसलिए आरक्षण के लिए जरिए सुविधा चाहने की लड़ाई में।

ये लड़ाई देखकर तो यही लगने लगता है कि अब जातियां खत्म हो रही हैं। और, जातियों की बजाए आरक्षण की श्रेणी के आधार पर पहचान हो रही है। और, एक बात और उल्टी हो रही है। जातियां थीं तो, लोग ऊपर की जाति के बराबर होना चाहते थे। अब आरक्षण मिलने लगा तो, लोग नीचे की श्रेणी में आरक्षण चाहने लगे। नीचे जाने की लड़ाई ऐसी हो गई है कि राजस्थान में 2007 की गर्मियों में गुर्जर और मीना समुदाय के करीब 30 लोगों ने शहादत दे दी। ये लोग इसे भी शहादत कहते हैं। हो सकता है कि इन शहीदों की गुर्जर-मीना बहुल गांवों में मूर्तियां भी लगी हों। इन जातियों के नेता इसे शहादत बताकर औऱ जानें लेने-देने को भी अस्मिता से जोड़े रहते हैं।

नीचे गिरने की इस लड़ाई को जरा और आसान भाषा में समझिए। गुर्जर पहले से ही ओबीसी हैं लेकिन, उनका कहना है कि ओबीसी में जाटों के भी शामिल होने से उन्हें आरक्षण का पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा है। और, एसटी श्रेणी में होने की वजह से मीना जाति के लोगों का सामाजिक स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है।

दरअसल सच्चाई ये है कि राजस्थान में समय-समय पर जलने वाली आरक्षण की आग सभी राजनीतिक दलों ने अपने चूल्हे में बचा कर रखी थी। कभी कोई हवा मारकर आग की आंच तेज कर देता है कभी दूसरा। 2003 के विधानसभा चुनाव में राजे ने हर रैली में गुर्जरों को भरोसा दिलाया कि वो चुनाव जीतते ही उन्हें ओबीसी से एसटी बना देंगी। लेकिन, चुनाव जीतने के बाद साफ कह दिया कि ये केंद्र का मसला है इसमें वो कुछ नहीं कर सकतीं।

एक नजर अगर राजस्थान के जातीय समीकरण पर डालें तो, ये साफ हो जाएगा कि राजस्थान में ये आरक्षण की आग समय-समय पर इतनी आसानी से क्यों भड़कती रहती है। राज्य में गुर्जर करीब 6 प्रतिशत हैं, मीना करीब 13 प्रतिशत और जाट करीब 10 प्रतिशत। यानी वोट बैंक के लिहाज से तीनों जातियां ऐसी हैं कि इन्हें नाराज करके कोई तपते रेगिस्तान में सत्ता का पानी नहीं पी सकता। और, इसी सत्ता के लिए बीजेपी ने 1999 के लोकसभा चुनाव के पहले जाटों को ओबीसी श्रेणी का लाभ दे दिया। जाट ओबीसी श्रेणी पाने के लिए काफी समय से हिंसा पर उतारू थे। और, पहले से ही शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक तौर पर संपन्न जाटों ने ओबीसी कोटे का 25 से 70 प्रतिशत तक लाभ लेना शुरू कर दिया। और, गुर्जरों को ये बात खटकने लगी।

अब तक गुर्जर और मीना जातियों के लोगों में काफी सामंजस्य था। लेकिन, एसटी में शामिल मीना जाति के लोग पुलिस कॉन्सटेबल से लेकर आईपीएस/आईएएस होने लगे तो, बगल में अब तक मीना के साथ चाय-पानी करने वाले गुर्जरों को मीना के एसटी श्रेणी में होने से ही जलन होने लगी। जबकि, अगर आरक्षण देने की बात की जाए तो, राजस्थान में मीना, गुर्जर या जाट तीनों में से कोई भी जाति आरक्षण की हकदार नहीं है। मीना और अब अपने लिए एसटी कोटा मांग रहे गुर्जर तो, एसटी में शामिल किसी भी तरह से नहीं हो सकते। राजस्थान में ये दोनों जातियां बड़े गांवों में अच्छे घरों में संपन्न तरीके से रह रही हैं। इन जातियों में परिवार के एक-दो लोग नौकरी में हैं। राजस्थान में व्यापार में भी ये तीनों जातियां इतनी प्रभावी तो हैं ही कि इन्हें किसी भी तरह से एसटी (शेड्यूल्ड ट्राइबल) श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता। क्योंकि, इस श्रेणी में शामिल होने के लिए जरूरी शर्तों में से सबसे जरूरी ये है कि एसटी में शामिल होने वाली जाति का लोगों से संपर्क न जुड़ा हुआ हो। जीवन की सामान्य जरूरतें इनकी पूरी न हो पा रही हों। और, ऐसा कम से कम मीना और गुर्जरों के साथ तो नहीं है।

वैसे इन जातियों के आरक्षण ने राजस्थान में हमेशा से एक दूसरे विरोधी रहे ब्राह्मण और राजपूतों को भी साथ ला दिया है। लेकिन, राजनीतिक तौर पर अब न ये सुने जाते हैं और न ही ओबीसी, एससी/एसटी कोटे की असली हकदार जातियां गड़िया लोहार, बंजारा और नट। सच्चाई ये है कि राजस्थान में अगर किसी को आरक्षण अब मिलना चाहिए तो वो गड़िया लोहार, बंजारा और नट जातियां ही हैं।

लेकिन, राजस्थान में आरक्षण श्रेणी बदलने को लेकर किए जा रहे इस आंदोलन ने देश में जनरल, ओबीसी, एससी/एसटी कोटे वाली जातियों के नए सिरे से वर्गीकरण की जरूरत तय कर दी है। अगर ऐसा नहीं होता है तो, अछूत से ब्राह्मण बनने की लड़ाई आजादी के तिरसठ साल बाद अब बड़ी, पिछडी सभी जातियों के जल्दी से जल्दी अछूत बनने की लड़ाई में बदल जाएगी। और, ये सिर्फ राजस्थान में ही नहीं है। यूपी-बिहार जैसे राज्यों में भी यादव, कुर्मी जातियों को कब तक अन्य पिछड़ा वर्ग में रखा जाएगा ये भी बड़ा सवाल है।

वरना किसी न किसी जाति का कोई नेता खुद के लिए आरक्षण की मांग करेगा और टीवी चैनल पर चिल्लाकर ये बयान देगा कि देश देखेगा कि कोई जाति किस तरह से देश के लिए कुर्बान हो सकती है। कुल मिलाकर जरूरत ये समझने की है कि देश की आजादी के समय दस सालों के लिए लागू हुआ आरक्षण कब तक अलग-अलग जातियों के लोगों की जान लेता रहेगा। शायद इसका एक मात्र तरीका यही है कि जातियों का आरक्षण खत्म करके सिर्फ आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाए और वो भी दस प्रतिशत से ज्यादा नहीं।

Thursday, December 23, 2010

मीडिया नहीं मीडिएटर से महंगाई बढ़ती है सरकार !

महंगाई बढ़ी नही कि सबसे पहली वजह साफ-साफ ये मीडिया से लेकर सरकार तक बताने लगती है कि सप्लाई-डिमांड का मिसमैच यानी मांग-आपूर्ति संतुलन बिगड़ने से ये दाम बढ़े हैं। फिर कोई एक मीडिया चिल्लाना शुरू करता है कि ये मांग-आपूर्ति संतुलन बिगड़ने से ज्यादा जमाखोरी की वजह से हुआ है। इसके बाद सरकार हरकत में आती है और कुछ जमाखोरों को पकड़ा जाता है और कुछेक दिनों-हफ्तों में महंगी बिकने वाली, प्याज-टमाटर सस्ता हो जाता है। लेकिन, बड़ा सवाल यही है कि क्या सिर्फ मांग-आपूर्ति संतुलन बिगड़ने से ही हर बार महंगाई बढ़ती है। क्योंकि, पिछले करीब डेढ़ साल से या यूं कह लें कि एक चक्र पूरा करके कुछेक महीने के लिए महंगाई दर घटने के अलावा करीब दो सालों से लगातार जनता महंगाई की मार झेल रही है। ये महंगाई दर तब भी बढ़ती रही जब देश विदेशी मंदी की मार से जूझ रहा था और लोगों की जेब में पैसे कम आ रहे थे।



अब भला ये पूरे दो साल तक मांग-आपूर्ति का संतुलन बिगड़ने से कैसे हो सकता है। महंगाई दर यानी खाने-पीने के सामान, दूसरे जरूरी उपयोग के सामान, पेट्रोल-डीजल की वजह से महंगे-सस्ते होने वाले सामान या फिर ऐसे ढेर सारे सामान जिनके आधार पर तय होता है कि महंगाई दर कम है या ज्यादा। महंगाई दर कम होने का मतलब बिल्कुल भी ये नहीं होता कि महंगाई घट गई है। दरअसल महंगाई दर घटने का मतलब ये हुआ कि महंगाई के बढ़ने की रफ्तार थोड़ी कम हुई है। गुरुवार को आए ताजा आंकड़े 11 दिसंबर को खत्म हफ्ते के हैं और महंगाई के बढ़ने की रफ्तार इस हफ्ते में भी बढ़ती दिख रही है। खाने-पीने के सामान करीब साढ़े बारह परसेंट महंगे हुए हैं। फ्यूल प्राइस इंडेक्स भी चढ़ा दिखा रहा है करीब ग्यारह परसेंट तक यानी इस इंडेक्स में शामिल सामान भी महंगा हुआ है। तो, क्या ये भी मांग-आपूर्ति संतुलन बिगड़ने से हो रहा है।



दरअसल ऐसा बिल्कुल नहीं है। सच्चाई ये है कि सरकार कीमतों पर काबू का कोई ऐसा सिस्टम तैयार नहीं कर पा रही है जिससे जरूरी सामान लोगों को कम कीमत पर मिल सकें। वो, भी तब जब ज्यादातर जरूरी सामान चाहें वो, खाने-पीने के सामान गेहूं-दाल-चावल हों या रोज इस्तेमाल होने वाली सब्जी- इन्हें उगाने वाले किसान की माली हालत कितनी बदली है इसका अंदाजा हर किसी को है। अब फिर से प्याज ने लोगों को रुलाना शुरू किया और लाल टमाटर लोगों का खून जलाने लगा तो, पहले तो, सरकार ने जमाखोरों पर कार्रवाई और बेहतर सप्लाई के लिए पाकिस्तानी प्याज लाने की बात कहकर कीमतें काबू में आने का भरोसा दिलाया। लेकिन, फिर भी बात बिगड़ने लगी तो, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने गुस्से में मीडिया के ऊपर ये ठीकरा फोड़ दिया कि सारी महंगाई मीडिया की वजह से ही है।



शीला दीक्षित के ऊपर तो, सिर्फ एक छोटे से राज्य में लोगों को जरूरी सामान कम कीमत पर उपलब्ध कराने का जिम्मा है लेकिन, अपने केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार साहब का क्या करिएगा जिनके ऊपर पूरे देश को सस्ते में जरूरी खाद्य सामग्री उपलब्ध कराने से लेकर किसानों के हितों की चिंता का जिम्मा है उनकी बात तो, शायद ही आप लोग भूले होंगे। नहीं जनता तो, भूल ही जाती है इसीलिए वो, लगातार ऐसे बयान देते रहते हैं कि आप उनकी असलियत पहचानने में भूल न करें। क्योंकि, ये तो वो भी जानते हैं जनता की याददाश्त कमजोर होती है। दरअसल ये कृषि मंत्री ही हैं जो, हैं तो, जनता के सेवक लेकिन, अपने बयानों से कंपनियों, मुनाफाखोरों की सेवा करते दिखते हैं। इनके बयानों की लंबी लिस्ट है जो, साफ दिखाती हैं कि महंगाई कम क्यों नहीं होती।



ज्यादा दिन नहीं बीते। जब कृषि मंत्री पवार साहब ने बयान दिया कि मैं कोई ज्योतिषी थोड़े ही हूं जो, बता सकूं कि महंगाई कब घटेगी। लेकिन, समय-समय पर वो, ये जरूर बताते रहे कि अब चीनी महंगी होने वाली है, अब दूध महंगा होने वाला है। और, बिना ज्योतिषी हुए कमाल का ज्ञान है पवार साहब को। सब उन्हीं की आशंकाओं या उम्मीदों कह लीजिए, के मुताबिक, महंगा होता रहा। जुलाई के आसपास बारिश का बहाना भी था। तो, प्रधानमंत्री ने अपनी आर्थिक सलाहकार मंडली के साथ खुद ही मोर्चा संभाल लिया। प्रधानमंत्री जी से लेकर उनके आर्थिक सलाहकार सी रंगराजन, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और सारी सरकार ने जनता को भुलावा देना शुरू कर दिया कि दिसंबर तक सब ठीक हो जाएगा। उसकी वजह भी साफ थी सरकार सितंबर से नया होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) लागू करने जा रही थी। इसी आधार पर महंगाई का बढ़ना तय होता है। अब नए WPI का आधार वर्ष 2004-05 को बनाया गया था तो, जाहिर 1993-94 के आधार वर्ष वाले पुराने महंगाई मापने के पैमाने से ये तो, कम ही महंगाई बढ़ना बताएगा। 14 सितंबर को नए WPI के आधार पर आई अगस्त महीने की महंगाई दर करीब दो परसेंट घटकर साढ़े आठ प्रतिशत पर आ गई।



बस प्रधानमंत्री और उनकी आर्थिक सलाहकार मंडली ने दावा करना शुरू कर दिया कि अच्छे मॉनसून की वजह से फसलें अच्छी होंगी और देश में अनाज और दूसरी जरूरी चीजों की अधिकता हो जाएगी तो, दिसंबर तक महंगाई अपने आप कम हो जाएगी। अब मनमोहन जी तो सचमुच बहुत सीधे आदमी हैं। वो, बहुत कठिन समीकरणों को न राजनीति में समझने की कोशिश करते हैं न महंगाई के मामले में। इसीलिए दूसरा कार्यकाल आराम से पूरा करते दिख रहे हैं। लेकिन, चूंकि वो अर्थशास्त्री हैं तो, आंकड़े जरूर समझते हैं।





कुछ आंकड़े मेरे पास हैं वो, मैं पेश कर रहा हूं खुद ही अंदाजा लग जाएगा कि ये महंगाई किसी मांग-आपूर्ति के असंतुलन का नतीजा है क्या ?



2006 के बाद से लगातार हमारा अनाज का उत्पादन बढ़ा है। पिछले साल के कुछ सूखे की वजह से इस साल की फसल पर थोड़ा असर जरूर पड़ा है फिर भी वो, मांग से काफी ज्यादा है।

2007-08 में भारत का गेहूं का उत्पादन रिकॉर्ड 7 करोड़ 80 लाख टन हुआ था। जबकि, उम्मीद 7 करोड़ 68 लाख टन की ही थी।

2009-10 में सिर्फ गेहूं ही नहीं सभी अनाजों की बात करें यानी गेहूं और दालों की तो, अनाज का कुल उत्पादन 21 करोड़ 80 लाख टन तक होने की उम्मीद है। ये पिछले साल से करीब 1 करोड़ 60 लाख टन कम है लेकिन, फिर भी कुल पैदावार इतनी ज्यादा है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में लाखों टन गेहूं सड़ चुका है।





2009-10 में गेहूं का उत्पादन पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए 8 करोड़ 7 लाख टन होने की उम्मीद है। जबकि, दालों का उत्पादन भी रिकॉर्ड 1 करोड़ 46 लाख टन।



चावल भी इस साल करीब 9 करोड़ टन हुआ। और तिलहन उत्पादन करीब ढाई करोड़ टन का है। गन्ना 27 करोड़ 78 लाख टन का सरकारी अनुमान है।



महंगाई में अब बचती है सब्जी तो, उसका कोई ऐसा बुआई चक्र नहीं होता कि जुलाई-अगस्त की बारिश से सब सुधर जाएगा या सब बिगड़ जाएगा। और, अब तो, दिसंबर भी बीतने वाला है। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री जी और उनकी आर्थिक मंडली अब मार्च तक महंगाई दर के साढ़े पांच से छे परसेंट के बीच आ जाने का ख्वाब जनता को दिखा रही है। लेकिन, लगे हाथ कभी रिजर्व बैंक का कोई डिप्टी गवर्नर तो, कभी खुद सरकार का कोई आर्थिक सलाहकार ये बयान भी देता रहता है कि महंगे कच्चे तेल से महंगाई का दबाव बना हुआ है।



जाहिर है सरकार तब तक सोती रहती है जब तक सामान महंगे नहीं हो जाते। और, जनता के साथ मीडिया भी त्राहि-त्राहि नहीं चिल्लाने लगती। मीडिया के लाख चिल्लाने के बाद भी कृषि मंत्री पवार साहब को फर्क नहीं पड़ता क्योंकि, वो तो उस महाराष्ट्र के विदर्भ से आते हैं जहां किसान फसल बर्बाद होने के बाद आत्महत्या कर लेते हैं फिर भी पवार साहब का राजनीतिक सिक्का सबसे ऊंचे भाव पर महाराष्ट्र में चलता है। और, केंद्रीय सरकार भी मांग-आपूर्ति संतुलन बिगड़ने, बारिश कम-ज्यादा होने, पैदावार घटने-बढ़ने जैसे बहानों से जनता को फुसलाती है और मीडिएटर यानी मुनाफाखोरों को कमाने का मौका दिए रहती है। बहुत ज्यादा हल्ला मचा तो, कुछ मीडिया पर ठीकरा फोड़कर और कुछ जमाखोरों पर कार्रवाई के विजुअल-तस्वीरें मीडिया को उपलब्ध कराकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती है। क्योंकि, 3 दिन में प्याज 20 से 80 रुपए किलो और फिर 80 से 40 रुपए किलो आ सकता है तो, एक दो दिन में सामान्य भाव पर भी आ जाएगा। शायद ऐसे ही टमाटर भी एक दो दिन में रसोई में लाने के भाव पर आ जाएगा। इसीलिए शायद ये सवाल इस देश में कभी अहम नहीं रहा कि आखिर पिछले 4 साल में जरूरी खाने-पीने का सामानों का उत्पादन कई गुना बढ़ने के बाद भी कीमतें 300-400 प्रतिशत तक क्यों बढ़ गई हैं। खेती करने वाले किसान को मिलने वाली रकम अभी भी वही है। जाहिर है 200 प्रतिशत भाव सिर्फ मुनाफाखोर बढ़ा रहे हैं। ये छोटी सी बात सरकार समझकर उसका कोई नियमित फॉर्मूला क्यों नहीं लाती। वरना मुनाफाखोर महंगाई के जरिए ऐसे ही अपना खेल करके लोगों की गाढ़ी कमाई खाते रहेंगे और सरकार मीडिया को दोष देकर या फिर कुछ छापे और दूसरी कार्रवाई करके खुद को बचाती रहेगी।
(ये लेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपा है)

Saturday, November 06, 2010

बिहारियों को लात बोनस में मिलता है

घर बैठे कुछ नहीं मिलता और ज्ञान तो बिल्कुल भी नहीं। ज्ञान कैसे मिला ये आगे बताऊंगा ज्ञान के साथ। सात नवंबर को बिटिया के जन्मदिन की वजह से इलाहाबाद जाना पड़ा। 6 को किसी ट्रेन में टिकट नहीं था लेकिन, दिवाली वाली रात इलाहाबाद दुरंतो में ढेर सारी सीटें खाली थीं तुरंत दुरंतो का टिकट कटा लिया। मुहूर्त ट्रेडिंग की वजह से सात बजे के बाद के बुलेटिन में बाजार पर लाइव देने के बाद घर निकला। नोएडा से वसुंधरा शिफ्ट करने का पहला नुकसान झेला। वसुंधरा के सहयोग अपार्टमेंट से आनंद विहार जाने के लिए कोई साधन नहीं था। एक मित्र मुंबई से आए थे उन्हें बुलाया वो, आए और आनंद विहार छोड़कर चले गए। मेट्रो स्टेशन के गेट पर ही एक साहब ने बताया कि आखिरी मेट्रो तो आठ बजे तक ही थी। घड़ी देखा तो, 8.10 हो रहे थे। उनके साथ लौटे, बस या कोई दूसरा साधन पकड़ने के लिए। मैंने उनसे फिर पूछा आप ऊपर तक गए थे क्या तो, उन्होंने कहा नहीं मुझे भी किसी दूसरे सज्जन ने बताया। तब तक मैंने देखा मेट्रो हॉर्न बजाती निकल रही थी। खैर, अब मेट्रो पकड़ी नहीं जा सकती थी वो, आखिरी मेट्रो थी। और, अगर मेट्रो मिल जाती तो, ये पोस्ट भी नहीं बनती।
स्टेशन से बाहर निकलकर सड़क पार की। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए बस थी नहीं। और, दिवाली की रात होने से दूसरे साधन भी कम होने से मैंने ऑटो पकड़ने में ही भलाई समझी। ऑटो वाले ने कहा 100 रुपए। मैंने कहा – 80। उसने कहा- 90 देना हो तो चलो। जिन साहब की वजह से मेट्रो छूटी थी। वो, बगल ही खड़े थे। बोले मैं 70 में करा देता हूं। मुझे लक्ष्मीनगर छोड़ देना। उन्होंने एक दो असफल प्रयास किए। जो, 120 तक मांग रहे थे।मैंने जल्दी से 90 वाली ऑटो की सवारी कर ली। बस इसके बाद दिव्य ज्ञान प्राप्ति शुरू हो गई। जो, शायद पूरा बिहार चुनाव कवर करने पर भी इससे ज्यादा तो नहीं ही हो पाता। मैंने कहा – कहां से हो। वो, पूरे ठसके से बोला – बिहारी हूं। मैंने पूछा कहां के बिहारी हो। मुजफ्फरपुर के। मैंने पूछा – वोट देने नहीं गए। वो, फट पड़ा। किसको वोट देने जाएं। जिनकी वजह से यहां अपनी माटी छोड़कर दिल्ली आना पड़ा। सब साले ... बिहार को बर्बाद कर गए। ललुआ ने तो 15 साल में बिहार का वो हाल कर दिया कि बिहारी, बिहार में रहने लायक रहा नहीं और बाहर बिहारी ऐसा हो गया है कि उससे बास आने लगी है।


इतनी ज्ञान की बातें वो कर रहा था कि मुझे लगा कि अगर बिहार के चुनावी माहौल में वो किसी मंच पर इसी अंदाज में ये सब बोल रहा होता तो, वो बड़ा नेता हो जाता। लालू मसखरी करके इतने साल तक बिहारियों को बेवकूफ बनाए रहे। वो, ऑटो वाला तो ईमानदारी से बिहार और बिहारियों की तरक्की के रास्ते तलाशने की बात कर रहा था। मुझे डर लग रहा था वो, ऑटो तेज रफ्तार में चलाते हुए पीछे पलकटकर हाथ फेंककर गुस्से में मुझसे हड़काने के अंदाज में बात कर रहा था-बता रहा था। बोला बिहार में तो कुछ करने-धरने को है ही नहीं। अब एक गन्ना मिल लग जाए। हजार आदमी को काम मिल जाए। तो, पांच मिल में पांच हजार लोग और उनसे जुड़े-जुड़े पचीस हजार लोगों को काम। देखो यहां ओखला में, नरायणा में कैसे काम होता है। प्रोडक्ट (हां, यही कहा था उसने माल नहीं कहा था) बनता है। रिक्शा वाला, ट्रॉली वाला लाद के ले जाता है, स्टोर तक पहुंचता है आखिर सबका मेहनताना जोड़कर इतना बचता होगा ना। तभी तो। सबकी मजदूरी तो बिहारी ही करता है ना। फिर। यहां दिल्ली में साला काम करो और मजदूरी मांगो तो, मजदूरी काम के बदले मिलती है और लात बोनस में मिलती है। लेकिन, का करें। कम से कम लात बोनस में मिलने के बाद भी मजदूरी मिल तो जाती है। दिन भर ऑटो चलाकर सौ रुपया तो बचाकर घर ले जाते हैं ना।


बिहार में भी तो मजदूरी ही करते थे। लेकिन, बिहार में मजदूरी नहीं मिलता सिर्फ बोनस ही मिलता है। ... मजदूरी तुम्हारा लेकर भाग जाएंगे क्या। साला ... । मैंने फिर कुरेदा लेकिन, वोट देने तो जाना चाहिए था। क्यों जाएं। जहां से रोजी-रोटी चल रही है। वहीं के हैं। बिहारी, दिल्ली को गाली देते-देते अचानक दिल्ली का हो गया। फिर बोला वैसे घर परिवार सब वहां। अम्मी-अब्बू भी वहीं हैं। वहां काम मिले तो, कोई काहे यहां रहे। बिहारी सरमाएदार सब बाहर जाकर इंडस्ट्री लगाता है। बिहार में नहीं लगाता। कहते हैं ना चिराग तले अंधेरा। पहले लोग चिराग जलाते थे। फिर ज्यादा मिट्टी का तेल न जल जाए इसलिए खाना खाके या जरूरी काम करके बुझा देते थे। अब 24 घंटे बिजली चाहिए। दिल्ली में हम लोगों को झुग्गी में भी सरकार मुफ्त में बिजली पानी देती है। बिहार लौटते हैं तो, बिजली-पानी कुछ नहीं मिलता। और पानी जहां मिलता है। बाढ़ आ जाती है। गांव का गांव साफ हो जाता है।


फिर बोला मैंने तो किसी को वहां वोट ही नहीं दिया। तो, मैंने कहा जब वोट नहीं दिया तो, गाली भी तो मत दो। बोला- किसको वोट दें। सबने इलाके के सबसे बड़े गुंडे को टिकट दे दिया। मैंने कहा- कम गुंडे को जिताओ। अचानक फिर उसने ट्रैक बदल दिया। गुंडागर्दी कम हो जाए और बिजली-पानी मिले तो, सब ठीका जाए। मैंने पूछा वैसे नीतीश ने तो कुछ काम किया है ना। बोला – हम अभी गांव गए थे तो, लोग देसी में कह रहे थे। बोला मिथिला में लोग कहते हैं कि

लाल लै चले झोरा


नीतीश लै चले बोरा
मैं इसका मतलब ठीक से नहीं समझ पाया। तो, उसने बताया कि लालू के समय में इतना मिलता था कि झोला खाली बगल में दबाए घूम रहे हैं खाने तक को नहीं। अब नीतीश के राज में बोरा भरके है। खाने को तो दिक्कत नहीं है। स्कूल, कॉलेज में भी नीतीश ने बड़ा काम किया है। कॉपी, किताब भी दे रहा है। पैसा भी दे रहा है। मैंने पूछा कौन बिरादर हो। बोला मुसलमान हैं। वसीम नाम बताया। मैं समझ गया कि 14-15 साल से चल रहे गठजोड़ के बाद भी नीतीश को आखिर नरेंद्र मोदी के नाम से चिढ़ क्यों होने लगती है।
वसीम बोला नेता लोगों को समझना चाहिए कि अब कोई गोबर नहीं खाता। अब सब अन्न खाते हैं। सबको पता है कि कौन कितना बेवकूफ बना रहा है। वसीम लालू के शासन में ही दिल्ली आया था। वसीम जैसों ने तब लालू की मसखरी पर हंसते हुए लालू की तैयार की हुई सांप्रदायिकता के डर से लालू को सत्ता दी। अब वसीम बेवकूफ बनने से इनकार कर चुका है।

Friday, November 05, 2010

शुभ दीपावली

रोशनी के इस त्यौहार पर सभी साथियों की जिंदगी में रोशनी हो। हमेशा खुशी की फुलझड़ियां छूटती रहें। और, काश इस रोशनी के त्यौहार पर थोड़ा अंधेरा उन लोगों के दिमाग से भीं छंटता जो, भ्रष्टाचार और आतंकवाद, नक्सलवाद को हमारी-आपकी जिंदगी में स्थाई कर देना चाह रहे हैं

Friday, October 22, 2010

ये चीन की तरक्की की असली कहानी है

चीन में इस महिला के 8 महीने बच्चे की हत्या कर दी गई
इस तरह की कहानी चीन से निकलकर कम ही आती है। लेकिन, इसे पूरी दुनिया को जानना बेहद जरूरी है। चीन की तरक्की की कहानी दुनिया अकसर कहती रहती है। लेकिन, ये किस कीमत पर मिल रही है ये कभी-कभी ही चर्चा में आता है। कभी-कभी भारत में भी हम लोग ये कहकर कि चीन जैसी तरक्की हो तो, तानाशाही में भी क्या दिक्कत है। हम तरक्की तो कर लेंगे। लेकिन, इस तरह की चीनी तरक्की के फॉर्मूले को समझकर शायद हममें से जो, लोग चीन की तरह बनने-बनाने का सपना देख रहे हैं वो, थोड़ा दूसरा सपना देखना शुरू कर दें।

चीन के Siming इलाके में सारी मानवता को जलील कर देने वाली घटना हुई है। चीनी परिवार नियोजन अधिकारियों ने एक गर्भवती महिला के 8 माह के बच्चे की पेट में ही खतरनाक इंजेक्शन देकर हत्या कर दी। Luo Yanquan कंस्ट्रक्शन वर्कर हैं और उनके पहले ही एक 9 साल की बेटी है। और, डब चीन के Siming  के परिवार नियोजन अधिकारियों को पता चला कि Luo Yanquan  की पत्नी Xiao Aiying फिर से गर्भवती है तो, सिर्फ एक बच्चे की तानाशाही नीति के तहत उन्होंने जबरदस्ती उसकी भ्रूण हत्या की कोशिश की। पेट में बच्चे के 8 महीने पूरे हो चुके थे। लेकिन, किसी भी बात की परवाह न करके चीन के परिवार नियोजन अधिकारियों ने Xiao Aiying को बुरी तरह से मारा पीटा। और, जबरदस्ती घातक इंजेक्शन के जरिए बच्चे की हत्या कर दी।

Luo Yanquan ने इसकी शिकायत पुलिस में करनी चाही लेकिन, वहां उनकी किसी ने नहीं सुनी। न तो वहां का डरा-दबा-प्रतिबंधित मीडिया Luo Yanquan की मदद करने के लिए सामने आया। यहां तक कि इस ज्यादती के खिलाफ मामला दायर करने के लिए वकील तक नहीं मिला। थक हारकर Luo Yanquan  ने अपने ब्लॉग पर  अपनी दुभरी दास्तान लिखी। जिसे देखकर अल जजीरा चैनल ने इसकी रिपोर्ट तैयार कराई और ये दुनिया के मीडिया में आया। लेकिन, ये एक कहानी है। सच्चाई ये है कि चीन की पूरी तरक्की की बुनियाद में ऐसे कितने अजन्मे-जन्मे बच्चों की लाशें दबा दी गई हैं।

Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

 Harsh Vardhan Tripathi हर्ष वर्धन त्रिपाठी #Bangladesh में @trahmanbnp प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। @PMOIndia @narendramodi ने उन्हें बध...