Thursday, November 27, 2008

नपुंसक नेताओं के हाथ में कब तक रहेगा देश

खून खौल रहा है। इच्छा ये कि क्यों नहीं मैं भी किसी फोर्स में हुआ। और, क्यों नहीं ऐसा मौका मुझे भी मिला कि दो-चार आतंवादियों को मार गिराता। साथ में कुछ नपुंसक नेताओं को भी। हम टीवी वाले भले ही देश को न्यूज दिखाने के चक्कर में हर खबर को नाटकीय अंदाज में पेश करने वाले बन गए हैं। लेकिन, सच्चाई यही है कि कलेजा हमारा भी कांपता है। औऱ, खून हमारा भी खौलता है।


लगातार आतंकवादी चुनौती दे रहे हैं और जब आतंकवादी ऐसा धमाका करते हैं, सरेआम हिंदुस्तानियों की लाशें गिराते हैं, तब भले ही हम मीडिया वाले झकझोर कर देश को जगाने की कोशिश करते हों लेकिन, ये रात का धमाका सुबह की रोशनी के साथ डर भी खत्म कर देता है। और, आतंकवादियों के लिए सुबह फिर से नई तैयारी का रास्ता बना देती है। क्योंकि, हम नपुंसक नेता और उनके इशारे पर एक ही धमाके के लिए अलग-अलग मास्टरमाइंड पकड़ने वाली एटीएस और पुलिस के बताए भर से ही संतोष कर सकते हैं।


देश का आम आदमी मर रहा है। अब मैं ये सोच रहा हूं कि क्या कोई आम आदमी जागेगा नहीं। देश में घुन की तरह आतंकवादियों के हिमायती ऐसे भर गए हैं कि जाने कितने बुधवार की जरूरत है। मुझे नहीं समझ में आता कि जेल में बंद आतंकवादियों को किसके लिए बचाकर रखा हुआ है। क्या फिर किसी खूंखार आतंकवादी के लिए देश के कुछ लोगों को बंधक बनाया जाएगा तब। अब अगर मुंबई के ताज होटल, ओबरॉय होटल को कुछ घंटों के लिए ही सही बंधक बना सकते हैं। तो, साफ है कि देश बंधक है। औऱ, हमारे कमीने नेताओं को सिर्फ अपने वोटबैंक की चिंता सता रही है। उसको भड़का दूसरा इसका वोट ले लेता है। ये इसको भड़काकर उसका वोट ले लेता है।


संसद पर हमले के अलावा अब तक आतंकवादी चोरी-छिपे बम रखकर निर्दोष हिंदुस्तानियों की जान लेते थे। अब नपुंसक सरकार के राज में इनका साहस ऐसा बढ़ गया है कि ये दौड़ा-दौड़ाकर हमारी जान ले रहे हैं। इधर,हमारा नपुंसक गृहराज्य मंत्री शकील अहमद जानकारी देने के बजाए टेलीविजन चैनल पर एंकर से झगड़े कर रहा था। उधर, मुंबई में एंबुलेंस में हमारी लाशें लदकर हॉस्पिटल पहुंच रही थीं।

Monday, November 17, 2008

मन के सुकून के लिए

मेरे मित्र रवीश इस बार बहराइच गए तो, उन्हें दर्दनाक खबर सुनने को मिली। उनके दोस्त की हत्या कर दी गई जिसे पुलिस दुर्घटना बता रही है। पत्रकार होने के बावजूद वो, बहराइच में कुछ खास नहीं कर पाए। उन्होंने ये वाकया मेरे पास भेजा जिसे में ब्लॉग पर छाप रहा हूं। कोई और मदद तो हम दूर बैठकर शायद नहीं कर सकते। लेकिन, आवाज तो उठा ही सकते हैं।

अब जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है कम से कम राकेश की मौत ने यह बता दिया...मैं पिछले दिनों अपने शहर बहराईच गया था वहीं पता चला कि मेरे दोस्त राकेश साहू का क़त्ल हो गया....हालांकि पुलिस ने बताया कि उसकी हत्या नहीं बल्कि दुॆघटना हुई...लेकिन मौके-ए-वारदात और मेरे दोस्त महेद्र के प्रयासों के चलते हम यह समझाने में कामयाब रहे कि राकेश का बाकायदा क़त्ल किया गया है....राकेश रंगकॆमी..साहित्यकार..और मददगार शख्श था...हमेशा हंसते हुए वो दूसरों की मदद करता था लेकिन पैसों से नहीं बल्कि साथ खड़े होकर..मैं जब भी अपने घर से वापस दिल्ली या कहीं और जाने लगता तो वह कोशिश करके मुझे छोड़ने रोडवेज तक आता था..और बाद में नम आंखों से हाथ हिलाता रहता तब तक जब तक मेरी बस उसकी आंखों से ओझल नहीं हो जाती

...जब उसकी मौत की खबर मुझे पता चली तब मैं कोतवाली से लेकर लोकल अखबार के दफ्तरों के चक्कर काटता रहा कि शायद उसके क़ातिलों को पकड़ने में कोई दिलचस्पी दिखाए..लेकिन अखबार ने रोज़ाना मिलने वाले पुलिस को नाखुश न ही किया....और वही छापा जो पुलिस बता रही थी..लेकिन बाद में एसपी चंद्रप्रकाश से जब हमने बात की तो उन्होंने कहा कि यह मॆडर और हम जल्द ही वॆक आउट कर लेंगे....लेकिन २० दिन बीतने को है कोई भरोसा पैदा करने वाला काम पुलिस ने नहीं किया..ऊपर से जो राकेश शहर के लिए बेगाना नहीं था उसकी लाश को पुलिस ने लावारिश बनाकर जला डाला...बहराईच में मेरे जैसे उसके दोस्त,साहित्यकार और रंगकॆमी सब उसके क़ातिलों को सजा दिलवाना चाहते हैं..लेकिन कोई पचड़े में नहीं पड़ना चाहता है

...मैं जब तक शहर में था तब तक उसके लिए भाग दौड़ करता रहा लेकिन जैसे ही मैं दिल्ली आया लोगों का उत्साह ठंडा पड़ गया... जब भी सोचता हूं कि क्या राकेश का यही हश्र होना चाहिए क्या राकेश को चार अदद कंधे भी उस शहर में नहीं मिल पाया जिसके बारे में उसने बहुत कुछ सोच रखा था....जब मैं बहराईच जाता था तो अक्सर हम मिलते खाते-पीते और बड़ी बातें करते लेकिन सोचता हूं राकेश के मामले में कितना असहाय हो गया हूं...मीडियाकॆमी होने के नाते ज्यादा कोफ्त से मन भर जाता है..कभी..कभी अवसाद से सिर भिन्नाने लगता है....

राकेश के बारे में अगर मैं आपको बताऊं तो वह बहराईच का ब्लैक बेल्ट था...रंगकॆमी था....साहित्यकार था..और अधिकतर कस्बाई लड़कों की तरह थोड़ी आवारागॆद भी था...उसने झटके में प्यार किया फिर शादी भी की...लेकिन झटके में ही शादी टूट भी गई..उसने कभी खुल कर बताया नहीं कि आखिर जिसे इतना प्यार करता था उससे इतनी नफ़रत क्यों हो गई लेकिन एक बार झोंके में उसने कहा था कि पत्नी की मां ठीक नहीं है

..हमने इसलिे ज्यादा पूछा नहीं कि घरेलु मामला है..लेकिन फोन पर अक्सर कहता था कि रवीश भाई मेरी जान को ख़तरा है मैं अपनी पत्नी को तलाक नहीं दूंगा..लेकिन वो राकेश से छुटकारा चाहती है...उसका क़त्ल क्यों हुआ..कैसे हुआ..नहीं मालूम है....लेकिन उसकी लाश का जब फोटो मैंने देखा तो उसका गला कटा था....कमीज़ और जूते मोजे गायब थे...जेब से मोबाइल और पॆस नदारद था..कैसे हो सकती है राकेश की हत्या .....आरुषि को कवर करते हुए मैने जाना कि ब्लाइंड मॆडर किसे कहते हैं....लेकिन इतना ब्लाइंड होगा राकेश के मामले में मुझे अंदेशा नहीं था..
प्लीज अगर कुछ कर सकते हों तो करिए......

रवीश रंजन शुक्ला

Monday, November 03, 2008

लतियाए, जूतियाए, काटे, गोली खाने के बाद भी हम ऐसे ही रहेंगे

हमारा पिटना, मरना देश भर की चिंता की विषय बना हुआ है। देश (कहने भर को ही है-हर मुद्दे पर तो बंटा है) पता नहीं ऐसे सोच रहा है कि नहीं लेकिन, हम ऐसे ही सोच रहे हैं। क्योंकि, हम आजादी के बाद से (और, मुझे तो लगता है कि उत्पत्ति के साथ ही) ही ये मानने लगे हैं कि हम कमजोर होते हैं तो, देश कमजोर होता है। हम मजबूत रहते हैं तो, देश मजबूत होता है। ये अलग बात है कि जब हमसे कोई पूछता है कि हमने देश की मजबूती के लिए कभी कुछ किया क्या। तो, जवाब आता है- हमहीं तो, देश चलाते हैं- दिमाग चलाते हैं। और, दिमाग चलाना तो, बड़ा काम है। अब जो, दिमाग नहीं चला पाए 60-62 सालों में अब वो सब हम पर लात-जूते गोली चला रहे हैं। फिर भी हम दिमाग चला रहे हैं- रिरिया रहे हैं थोड़ा लात कम चलाओ भाई।

हम कहते हैं कि हम देश को ढेर सारे प्रधानमंत्री, रेलमंत्री से लेकर पता नहीं कौन-कौन त मंत्री और बड़े-बड़े ब्यूरोक्रैट देते हैं। हम कहते हैं कि हम देश के हर हिस्से में जाकर वहां का उत्थान करते हैं। हम कहते हैं कि हम किसी भी हालात में रह सकते हैं किसी भी हालत तक पहुंच सकते हैं। हमारी वजह से देश के दूसरे राज्यों के उद्योग-धंधे चल रहे हैं। हम गए तो, दूसरे राज्य चौपट हो जाएंगे। हम कहते हैं कि हमने जितने बड़े आंदोलन किए उससे देश की सामाजिक दशा-दिशा सुधरी। कुल मिलाकर हम कुछ इस तरह से जीते हैं कि इस देश में जो कुछ भी हैं- हम हैं।

हमें सबकी बड़ी चिंता है। अब हम पूरे देश को अपना मानते हैं इसलिए देश भर में कहीं भी जाकर रहते हैं। हमारी संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम की है- इसलिए दुनिया के किसी भी कोने में बस चार रोटी के जुगाड़ में निकल पड़ते हैं। बाकी सब जहां जाएंगे वहां हमारे भाई-बंधु तो, कुछ न कुछ चिंता करेंगे ही। हम रेलगाड़ियों-बसों में जानवरों की तरह एक के ऊपर एक लदकर सफर करते हैं। अब तक तो आप सबने हमें पहचान ही लिया होगा। हां, हम बिहारी हैं। जो, विस्तार योजना में अब उत्तर भारतीय कहे जाते हैं। वैसे इस बिहारी या उत्तर भारतीय में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भइया-बाबू को हम नहीं जोड़ पाए हैं। ई हम जो हैं ना सिर्फ बिहार से लेकर गोरखपुर के रास्ते उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़-जौनपुर तक ही पाए जाते हैं।

लेकिन, इधर थोड़ी मुश्किल हो गई है। अब हम परोपकारियों को कोई आने नहीं दे रहा है। सब हम जैसी बातें करने लगे हैं। सब कह रहे हैं कि हम खुदही बना लेंगे चलो भइया-बाबू लोगों निकल लो यहां से। लेकिन, हम तो वसुधैव कुटुंबकम वाले हैं। हम देश बाहर जाकर बसे और सूरीनाम मॉरीशस में हम लोग राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री बनके वहां के लोगों का भला कर रहे हैं तो, हम इनकी बेवकूफों की बातों में कैसे आते। इन सब बेवकूफों को क्या पता कि हम नहीं रहेंगे तो, इनके यहां की राजनीति-अर्थनीति-समाजनीति कैसे चलेगी। ये सब तो दिमाग वाले काम हैं। लेकिन, ई ससुरे सुनी नहीं रहे हैं। कह रहे हैं सीधे से नहीं मानोगे तो, मारने-पीटने लगे। राम-राम हम तो इनका भला कर रहे हैं- इनकी गारा-मजदूरी से लेकर रात भर जागके चौकीदारी और चर्चगेट से ठाणे-वाशी, मीरा-भायंदर प्रेम से हमहीं तो लेकर जाते हैं। फिर भी ई हमको मार रहे हैं। हम अब फिर रिरिया रहे हैं- सबको मना थोड़ी न है तुम भी यही सब करो। अब उनके दिमाग तो है नहीं अपने पागल नेता के बवकावे में आ गए हैं कह रहे हैं कि ये सब भागेंगे तो खुदै ज्यादा काम मिलेगा।

उनके नेता को पागल हम नहीं कहे हम तो, उनके साथ बंबई में रहते हैं (उनका नेतवा बंबई सुनेगा तो, फिर मारेगा)। लेकिन, हमारे नेता तो, पटना-बिहार-दिल्ली रहते हैं। ऊ कहे कि हमरे अलावा सबका नेता पगला है। हमरे नेता को नहीं पहचाने। अरे वही जो, करीब पंद्रह साल राज करके हमको इतना (ना)लायक बना दिए कि हमको लगा कि चलो अब वसुधैव कुटुंबकम को चरितार्थ करके ही कुछ हो पाएगा। बिहार में ई करने के बाद अब रेल में यही कर रहे हैं। अब लेकिन, रेल तो देश भर में चलती है। बस यही पंगा हो गया।

हमने बड़ा चेत के-मशक्कत करके इनको हटाए। लेकिन, हम कहे न हम दिमाग वाले हैं। तो, सोचिए हम पर राज करने वाला नेता (जो, दूसरे नेताओं को बुड़बक-पागल कहके बेईज्जती करता है और पटना युनिवर्सिटी के जमाने से उसी पागलपन-बुड़बकई को ब्रांड बनाके मेहररुवौ को मुख्यमंत्री बना दिया) कितना दिमागदार होगा। अब ऊ कह रहा है कि हम पर खतरा है यानी साफ है देश पर खतरा है। इसलिए हमारे सारे लोग राजनीति बंद करें और इस्तीफा दे दें। क्योंकि, राजनीति करने का आजीवन पट्टा तो, ऊ हमारे कान में बड़े-बड़े बाल वाले नेताजी के ही पास है। ऊ कह रहे हैं कि उनके पटना युनिवर्सिटी के दिन वाले साथी और उसके बाद से परम विरोधी (बीच-बीच में हंस बोल लेते हैं तो, गलत संदेश न समझ लीजिएगा) नेताजी देश को गलत संदेश दे रहे हैं। इस्तीफा नहीं दे रहे हैं।

काहे लिए इस्तीफा। इसलिए कि हमको बंबई में पीटा गया। हममें से एक को गोली मार दी गई। हमारे उस एक का गुनाह कोई थोड़ी न था। उ तो, बस थोड़ा गुस्सा दिखा रहा था। बेचारे के पास लाइसेंसी नहीं थी तो, देसी कट्टा टाइप रिवॉल्वर जुगाड़ करके किसी तरह मुंबई आया और गुस्से में चीखा। एकाध फायर इधर-उधर किए बेचारा बार-बार कहता रहा कि हम किसी को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते। बस राज ठाकरे को मारना चाहते हैं पुलिस कमिश्नर से मेरी बात करा दो। अब क्या उसे इतना भरोसा था कि कमिश्नर उसे साथ ले जा कर राज को गोली मारने में मदद करेगा।
खैर कमिश्नर की जगह कम पढ़े-लिखे दरोगा-सिपाही आए। और, बेवकूफ हममें से उस एक ज्यादा दिमाग वाले की बात नहीं समझ सके। और, उसे गोली मार दी। बस इसके बाद हमारे सारे नेता (क्योंकि, हम तो अब भी यही मानते हैं कि नेतागिरी करने का दिमाग वाला काम तो बस हमारे ही वश का है) एक साथ खड़े होकर एक सुर में दूसरे पागल नेता के खिलाफ जुटे। पीएम-मैडम के सामने रिरियाए। कान में बड़े बाल वाले नेता बाहर निकले तो, समझ में आया कि अरे अभी तो हमारी सत्ता हमारे विरोधी के पास है। बस वितंडा कर दिया।

अब उनसे कोई राज्य की बात करता है तो, ऊ साध्वी प्रज्ञा की चर्चा करने लगते हैं। बटला में आतंकवादी मारे जाते हैं। तो, उनके दूसरे फोटोकॉपी नेताजी (अरे वही जो थोड़ा तुतलाकर बोलते हैं फिर अमर सिंह विस्तार से मीडिया को बयान समझाते हैं, यहां तक कि जो, ऊ नहीं भी बोले होते हैं ऊ भी समझा देते हैं) की पार्टी के हमारे लोग प्रदर्शन करते हैं। कहते हैं नाहक अल्पसंख्यक भाई परेशान किए जा रहे हैं। नेताजी खुद रक्षामंत्री रह चुके हैं लेकिन, इनके सिपहसालार पुलिस-फौज का मनोबल तोड़ने वाला हर बयान दे डालते हैं।

लेकिन, इस सबके बाद भी हम गाना गा रहे हैं हम तो, ऐसे हैं भइया। हम न सुधरेंगे भइया। हमको समझ में नहीं आ रहा है कि हम मुंबई से सटे ठाणे स्टेशन पर जब हमको पिटते देखते हैं तो, इतना गुस्सा गए कि बंबई हत्या करने चले। लेकिन, पटना से गोरखपुर स्टेशन पर जब उससे भी गंदा करम होता है तो, किसी राहुल राज का खून नहीं खौलता। ऊ घर छोड़कर दूसरी जगह सुख-शांति तलाश लेता है। सालों से हमारे हरामखोर नेता हमारा खून चूस लिए-हमारी इज्जत फालूदा बनाके कुल्फी के साथ खा गए- हमारा खून नहीं खौला। हमें हमारे घर से निकाल बाहर किया इन कमीनों ने और हम इनके पीछे झंडा-डंडा लेकर खड़े हैं कि हम तो महान हैं हमारा काम तो, सिर्फ राज करना है। हम लात-गोली मुंबई में खा रहे हैं। हम असम में काटे जा रहे हैं। और, ई हरामखोर बुद्धिमान सबको बांटके राज करने के जतन ढूंढ़ रहे हैं। अब एक राज भी राज करने के लिए इनसे सबक सीखके उस्ताद बन रहा है।

पता नहीं किसी राहुल राज को नजदीकै में इनको मारने जितना गुस्सा क्यों नहीं आया। 2000 किलोमीटर का सफर करके आने तक गुस्सा बना रहा। 10-5 किलोमीटर की रेंज में चारो तरफ घूमते बड़े-बड़े कमीने क्यों नहीं दिखते। एक बार बाहर निकले तो, हम सड़ी-गली जिंदगी जीकर भी घर लौटना नहीं चाहते। लेकिन, हम गुस्सा हैं उनसे जिनके घर में हैं। हम उनसे गुस्सा नहीं हैं जिनकी वजह से हम बेघर हो रहे हैं। हम बंबई कट्टा लेकर किसी को डराने-धमकाने चले जाते हैं लेकिन, जहां हैं जिससे डरके रहते हैं उसके लिए गंगाजल का इस्तेमाल नहीं कर पाते। हां, फिल्म में तो हम ताली खूब बजाते हैं। यही वजह है कि राजेंद्र यादव मुंबई मिरर में बिहारी ब्रांड पर लिख मारते हैं कि बिहारी सबसे पहले बिहार से डिटैच होता है। लेकिन, जहां रहता है वहां बिहारी ही रहता है। अब ई यादवजी को कौन समझाए हम डिटैच मन से नहीं मजबूरी में हो रहे हैं। लेकिन, हम तो बस यही सोचकर डरे जा रहे हैं कि ये मजबूरी खत्म होके कभी हमारे मन का भी काम होगा या हम लतियाए, जूतियाए, काटे, गोली खाने के बाद भी ऐसे ही रहेंगे। हम गाना गाते रहेंगे हम तो, ऐसे हैं भइया। हम न सुधरेंगे भइया।

Tuesday, October 28, 2008

आइए दीपावली पर भारत को कंजरवेटिव बनाने का संकल्प लेते हैं

मेरी याद की पहली दीवाली है जिसका उत्साह कम से कम मीडिया के जरिए तो काफी ठंडा नजर आ रहा है। कई चैनलों पर तो लुढ़कते शेयर बाजार की वजह से काली दीवाली तक चमकता नजर आया। मुंबई में नौकरियां जाने के बाद हंगामा करते डेंटेड-पेंटेड जेट के कर्मचारी चैनलों पर काली दीवाली की नींव पुख्ता कर रहे थे। ये अलग बात है कि नरेश गोयल की आत्मा की आवाज ने फिर से मंदी में नौकरी जाने की स्टिंग के विजुअल में से इन कर्मचारियों को निकालने पर मजबूर कर दिया।

ये दीवाली ऐसी आई है कि दुनिया के सबसे जवान देश के चेहरे की झुर्रियां और गहरी होती जा रही हैं। अखबारों-चैनलों की खबर की शुरुआत कुछ इस तरह से हो रही है कि बुरी खबरों का सिलसिला अभी बंद नहीं हुआ है.. एक और बुरी खबर ये है.. अंतरराष्ट्रीय बाजार से लगातार बुरी खबरें आ रही हैं.. घरेलू मोरचे से भी बुरी खबरें आ रही हैं.. । हाल कुछ ऐसा कि जवान भारत अगर मीडिया के जरिए अपनी (बीमारी) के बारे में पता करना चाहता है तो, उसे लगता है कि देश तो, ICU में जाने लायक हो गया है।

कभी-कभी तो बीमारी लाइलाज लगने लगती है। 60 साल में बेकारी-बदहाली का मर्ज भी इतना खतरनाक नहीं लगा जितना एक अंकल सैम की बीमारी ने 60 साल के जवान भारत को बीमार कर रखा है। बेरोजगारी के आंकड़े अमेरिका में आते हैं तो, भारत में अच्छा भला लाख-पचास महीने पाने वाला भी डरने लगता है। इसी साल की 11 जनवरी तक उत्साह से सेंसेक्स के पचीस हजार जाने और रिलायंस को 3500 रुपए के भाव पर खरीदने की सलाह देने वाले बाजार के जानकार (पता नहीं कितना) कह रहे हैं बाजार के बॉटम का अंदाजा लगाना मुश्किल है। अब, भइया जब इतने बुड़बक थे तो, ऊपर वाला लेवल कहां से ले आए थे।

लीमन ब्रदर्स डूबते हैं तो, ICICI बैंक के डूबने का कयास हम खुद लगा लेते हैं। AIG लाइफ इंश्योरेंस का अमेरिका में दिवाला निकलता है तो, AIG के साथ भारत में इंश्योरेंस का कारोबार शुरू करने वाले टाटा की साख पर बट्टा लगने लगता है। किसी को टाटा की कई पीढ़ियों के कारोबारी कौशल पर भरोसा ही नहीं रह जाता। ये भी नहीं सोचते कि यही टाटा- कोरस से लेकर जैगुआर-लैंड रोवर तक टाटा का फौलादी ठप्पा जड़ चुके हैं।

6 महीने तक अर्थशास्त्र के विद्वानों, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह-वित्तमंत्री पी चिदंबरम-योजना आयोग उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया, की तिकड़ी ये भुलावा देती रही कि भारतीय अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल बहुत मजबूत हैं उसे कोई खतरा नहीं। अब ये तो बड़े जानकार हैं फिर भी इन्हें पता नहीं कैसे समझ में नहीं आया कि फंडामेंटल जिस वजह से मजबूत थे उन्हीं वजहों की जब बुनियाद दरक रही है तो, फंडामेंटल मजबूत कैसे रह जाएंगे। खैर, ये इनको नहीं समझ में आया आम आदमी को समझ में गया। ये आम आदमी (भारत का नहीं शेयर बाजार में इसे रिटेल इन्वेस्टर कहते हैं) कौड़ियों के भाव पर भी मजबूत फंडामेंटल वाली कंपनियों के शेयर खरीदने को तैयार नहीं हुआ।

बाजार गिर रहा है, लोकसभा (कई राज्यों के विधानसभा चुनाव भी) चुनाव सिर पर हैं, नौकरियां जा रही हैं, कंपनियों के नतीजे खराब हो रहे हैं जो, अच्छे भी हैं वो, बाजार की उम्मीदों से कम हैं (बाजार की उम्मीद दूल्हे का लालची बाप हो गया है जिसको कितना भी दहेज कम लगता है), बाजार की इसी उम्मीद पर खरे न उतरने की वजह से कंपनियां अपनी बढ़ने की योजना रोक रही हैं, कर्मचारियों की छंटनी कर रही हैं, 2 साल में 3 गुना मुनाफा दने वाली प्रॉपर्टी इधर 6 महीने में बढ़ने को छोड़िए रुपए में चवन्नी कम हो गई, प्रॉपर्टी से मुनाफा कमाने की इच्छा रखने वाले की चवन्नी घटी तो, उसे प्रॉपर्टी में चवन्नी लगाने का इरादा भी त्याग दिया, खरीदने वाले मन मारकर बैठ गए लेकिन, घर बनाने वाले लगे पड़े रहे इंडिया ग्रोथ स्टोरी के चक्कर में, फिर आधे पड़े प्रोजेक्ट को बैंकों ने कर्ज देने से मना कर दिया, अमेरिका का गोलमाल भारत में आकर गोलमाल रिटर्न हो गया। एक नजर में तो भारत का हाल एकदम अमेरिका जैसा दिख रहा है। उनकी तरक्की में हम उनके जैसे नहीं बन पाए। बदहाली में उनके इशारे पर ता-ता- थैया कर रहे हैं। बड़ी मुश्किल से अमेरिकी भी ये मानने लगे हैं कि उनके नीति नियंता कुछ गलत भी करते हैं।

मैं भी मुंबई में एक निजी कंपनी में नौकरी करता हूं। मैंने भी शेयर बाजार में पैसे लगाए हैं। मैं भी इंडिया ग्रोथ स्टोरी से प्रभावित हूं। मैं भी मीडिया के जरिए देश की अर्थव्यवस्था का हाल देखता-समझता हूं। मैं डर गया हूं। लेकिन, 34 घंटे के मुंबई से इलाहाबाद के सफर ने मेरा डर खत्म कर दिया। अरे, भई मैं राज ठाकरे के डर से मुंबई से इलाहाबाद नहीं आया। इलाहाबाद मेरा घर है और मैं यहां अपनी दीवाली हमेशा की तरह रोशन करने आया हूं।

मुंबई में प्रॉपर्टी मार्केट क्रैश हो रहा हैं। यहां अब भी जमीन महंगी ही हो रही है। यहां किसी ने घर करोड़ो में खरीदकर ताला नहीं बंद किया है। यहां 10-20-50 लाख का जो, भी घर खरीदा या तो उसमे रह रहे हैं या किराए पर उठा है। सिविल लाइंस में कार्निवाल (मेला) लगा है तो, रामबाग के सेवा समिति विद्या मंदिर में वर्ल्ड फन फेयर लगा है। धनतेरस के दिन सिविल लाइंस में गाड़ियों की कतारों से जाम लगा हुआ था। दूसरे दिन अखबार में खबर थी – धनतेरस पर साढ़े आठ करोड़ की कारें, चार करोड़ की मोटरसाइकिलें बिकीं। धनतेरस के बहाने साल भर से मिक्सी, फ्रिज से लेकर बाइक, कार- सबका प्लान रुका हुआ था। ये कंजरवेटिव भारत है जो, जरूरत की चीज साल भर टाल देता है। धनतेरस पर घर में आया नया सामान सबको खुश कर देता है।

मुंबई में बड़ी प्लाज्मा टीवी किसी भी दिन अचानक आ जाती है। विलासिता का एक सामान जुड़ता है लेकिन, खुशी नहीं आती। इलाहाबादी बड़ी टीवी खरीदकर मेगा इलेक्ट्रॉनिक्स से टीवी पैक करते-करते ही दोस्तों-रिश्तेदारों को बता देता है धनतेरस पर बड़ा टीवी लिया। बस पैक कर रहा है बस दुई मिनट में घर पहुंच रहे हैं। 125 करोड़ के आसपास के तरक्की वाले भारत में सिर्फ 2 करोड़ से कुछ ज्यादा लोग शेयर बाजार के जरिए तरक्की कर रहे थे। बचा 123 करोड़ कंजरवेटिव भारत है। अब इसी कंजरवेटिव भारत के सहारे ICICI बैंक के CEO&MD के वी कामत को भी भरोसा है कि हम पर खास असर नहीं पड़ेगा क्योंकि, हम बहुत कंजरवेटिव सिस्टम में काम करते हैं। ये बात उन्होंने सीएनबीसी आवाज़ संपादक संजय पुगलिया से खास मुलाकात में कही।

मैं भी मुंबई के मुक्त बाजार से इलाहाबाद के कंजरवेटिव भारत आ गया हूं। कोई डर नहीं लग रहा- सब मस्त हैं। कंजरवेटिव भारत में सब ठीक चल रहा है। न तो, किसी कमर्शियल या रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट के धीमे होने की खबर है ना तो, किसी की नौकरी जाने की खबर है। बल्कि, कंपनियां तो, अब कंजरवेटिव भारत से कारोबार जुगाड़ने के लिए URGENT PLACEMENT की मुद्रा में धड़ाधड़ नियुक्तियां कर रही हैं। दीपावली पर उतनी ही आतिशबाजी-धूम-पटाका है। सबके घर में छोटी-बड़ी लक्ष्मी गणेशजी की मूर्तियां आई हैं। दीवाली पर सिर्फ रोशनी है।

इस रोशनी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह-वित्तमंत्री पी चिदंबरम-योजना आयोग उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया, की तिकड़ी के भारतीय अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल मजबूत होने के दावे सही लगने लगे हैं लेकिन, ये इस तिकड़ी के ग्लोबल विलेज का हिस्सा बने भारत की वजह से नहीं है। ये कंजरवेटिव भारत की ग्रोथ स्टोरी है। ये सचमुच बहुत मजबूत हैं और उसे कोई खतरा नहीं। सबको शुभ दीपावली और आइए इस दीप पर्व पर ये संकल्प लें कि, कंजरवेटिव भारत को इतना तो बचाए ही रखेंगे कि अमेरिका की सेहत खराब होने से हम ICU में न पहुंच जाएं।

Monday, September 01, 2008

जहां हर पांचवा पर्यटक भारतीय है

अभी हाल में ही प्रतापजी दक्षिण अफ्रीका होकर लौटे। वहां से लौटने के बाद वहां के सामाजिक परिवेश और उसका भारत से शानदार तुलनात्मक विश्लेषण किया। उनके इन लेखों की सीरीज अमर उजाला में छपी। मैं उसे यहां भी पेश कर रहा हूं। चौथी और आखिरी कड़ी में वहां भारतीय पर्यटकों पर नजर

मेघा सम्पत बता रहीं थी कि हर साल पूरी दुनिया से दक्षिण अफ्रीका जाने वाले पर्यटकों में 20 प्रतिशत से अधिक भारत से आते हैं। यहां से भारत जाने की संख्या लगभग बराबर ही है। बालीवुड के निमार्ताओं को भी जोहांसबर्ग, केपटाउन और डरबन की लोकेशन काफी रास आ रहीं हैं। गांधी और किक्रेट ऐसे दो बिंदु है, जो दो देशों को आपस में जोड़ते हैं। मेघा सम्पत साउथ अफ्रीका टूरिज्म की इंडिया के लिए कंट्री मैनेजर हैं। केपटाउन के होटल मिलेनियर्स में एक शाम हम सब बैठे थे। अपने शक-सुबह और सवालों पर आपस में बातें कर रहें थे।

मेघा जिस समय यह बता रहीं थी, पास की दूसरी टेबिल पर बैठे दो काले लोगों से मैं पूछता हूं। शाम के साढ़े सात बजे हैं, मैं बाहर अकेले घूमने जाना चाहता हूं। दोनों मिलकर मुझे रोकते हैं। बाहर हो सकने वाले संभावित खतरे से मुझे आगाह करते हैं। इससे एक दिन पहले पहले दोपहर जब मैं बेलेबेले मार्केट में मोबाइल पर बात करता हुआ पैदल टहल रहा था। तभी मुंबई से यहां आकर बस गए किशोर भाटिया ने मुझे टोंका था। अकेले सडक़ पर यूं मत निकला कीजिए कोई भी मोबाइल छीन लेगा। मेघा हों, होटल के दो दक्षिण अफ्रीकी या किशोर भाटिया सभी अपनी जगह सही हैं। दक्षिण अफ्रीका में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। बेहतर कानून व्यवस्था का विश्वास अगर अंतराष्ट्रीय जगत को मिल जाए तो यह तरक्की कई गुना बढ़ सकती है। अच्छी बात यह है कि दक्षिण अफ्रीका ऐसी कोशिशें कर रहा है।

दक्षिण अफ्रीका में बाजार और परिवार दोनों को मिलाकर एक खास किस्म की पर्यटन संस्कृति विकसित की है। देश के दर्शनीय स्थलों को घूमने के साथ वहां के समाज से आत्मीय संवाद का सुख मन को छू जाता है। लोगों ने अपने घर में कुछ कमरे विशिष्ट सुख-सुविधाओं वाले बना रखे हैं। वे जिसका इस्तेमाल गेस्ट हाउस के तौर पर करते हैं। केपटाउन की वाइन वैली से लौटते समय दोपहर भोज के लिए हम वुल्फकाफ नाम के एक गेस्टहाउस कम रेस्ट्रां में दोपहर भोज के लिए रूके थे। खाने की तैयारी के बीच हमारा परिचय हाउस लेडी रोनीफा से कराया गया। बताया गया कि इनकी देखरेख में ही खाने की पूरी तैयारी हुई है। ये जो स्पेशल चाकलेट केक है, इसे इन्होंने खुद बनाया है। भारतीय शैली में अभिवादन के लिए हाथ जोड़े लगातार चेहरे पर मुस्कुराहट लिए रोनिफा हमारे बीच थी। हम उसके खाने की तारीफ कर रहे थे। किसी-किसी डिश की रेसेपी या उसमें क्या पड़ा है, जानने की कोशिश भी। उस हाउस लेडी ने बैगन का भरता बनाने की बात कही थी। खाते समय बैगन तो था, भरता जैसा कुछ भी नहीं बन सका था। हम सब उसकी भावनाओं की कद्र करते हुए सब खा गए थे। यह पारिवारिकता का ही अहसास था, जहां हमने बाजार की तरह कोई टोंका-टाकी नहीं की। उस लेडी ने भारत आने-जाने के सहेज कर रखे गए अपने बोर्डिंग पास जब हमें दिखाए और स्वदेश फिल्म की सीडी भी।

जंगल और संपन्न वन्य जीवन दक्षिण अफ्रीका में पर्यटकों को सर्वाधिक आकर्षित करता है। इधर निजी क्षेत्रों ने जंगल खरीदकर बहुत बड़े-बड़े गेम शेयर एरिया विकसित किए हैं। माबूला, भारतीय उद्योगपति विजय माल्या का 12 हजार हेक्टेयर के जंगल को घेरकर बना गेम शेयर। भारतीयों के लिए इसकी लोकप्रियता का अंदाजा यहां की गेस्ट रिलेशन मैनेजर अनीता बब्बर के इस दावे से लगाइए कि कोई भी भारतीय हस्ती जोहांसबर्ग के पास से भी होकर गुजरे और यहां न आए, ऐसा बहुत कम ही होता है।
जोहांसबर्ग हो कि कैपटाउन या दूसरा कोई शहर। जैसे आप अपनी पहचान पर्यटक के तौर पर देते हैं, वैसै ही आपको सवालनुमा सुझाव मिलेगा, सन सिटी गए कि नहीं। जोहांसबर्ग से 130 किलोमीटर पहले। अठारवीं शताब्दी के मध्य में भूकंप से तबाह हो गई एक बस्ती के अवशेष 1920 में तलाशे गए। इस समय अगर आप वहां जाएं तो पाएंगें कि उसे दुनिया के आधुनिकतम और विकसित शहरों के टक्कर में खड़ा कर दिया गया है। अब वहां बस्ती तो नहीं है, पूरा क्षेत्र बाजार में बदल गया है, लेकिन चमक-दमक के शौकीन इस शहर से कई दिन रूके बिना जाना नहीं चाहेंगे। सनसिटी में एक पुराना शहर इतनी बारीकी से नकली तरीके से बनाया गया है कि हर जगह पर चौंक जाता है कि ये भी अनुकृति है क्या? नकली समुद्र है, जिसमें निधारित समय पर रोज लहरें उठती हैं। नकली पहाड़ के भीतर बने विशाल बाजार में रोज तकनीकी स्तर पर मनोरंजन के लिए भूकंप आता है।

बतौर भारतीय दक्षिण अफ्रीका में गांधी के देश का होने की एक पहचान स्वाभाविक तौर पर मिल जाती है। दक्षिण अफ्रीका के काले लोग उन्हें अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष करने वाला पहला सिपाही मानते हैं। गांधी के महत्व को आप यूं समझिए कि वहां पर्यटन के लिए टुअर आपरेटर गांधी पैकेज बताते हैं, उनमें गांधी से जुड़े सारे इलाकों तक ले जाया जाता है। इस तरह का दूसरा पैकेज नेल्सन मंडेला से जुड़ा है। भारतीयों के लिए नेल्सन मंडेला से जुड़े स्थान भी यात्रा के अनिवार्य पड़ाव होते हैं। जिस जेल से नेल्सन मंडेला 27 साल की कैद से मुक्त होकर बाहर आए थे, जेल के उस गेट पर भी पर्यटकों की भीड़ बनी रहती है।

दक्षिण अफ्रीका का पर्यटन विभाग यहां के बढ़ते अपराध को दुष्प्रचार और मीडिया की देन मानता है। केप वाइनलैंड के मेयर के जानसन भी कहते हंै कि आपस में मारपीट अलग बात है, पर्यटकों के साथ होने वाले हादसे यहां बहुत कम हैं। यहां से कई गुना ज्यादा खतरा लंदन और न्यूयार्क में है। गुजरे 2007 में 20-20 क्रिकेट विश्वकप यहां हुआ। हजारों की तादात में भारतीय दर्शक आए। एक भी घटना कहीं से रिपोर्ट नहीं है।

दक्षिण अफ्रीका में पर्यटकों को सुरक्षा का भाव देने के लिए हर रेस्टोरेंट और गेस्टहाउस पर कम्युनिटी पुलिसिंग व्यवस्था या फिर सिक्योरिटी एजेंसी के द्वारा 24 घंटे कवर्ड होने का बोर्ड लगा है। प्रतिष्ठानों और संस्थानों के अलावा नगरीय क्षेत्र में रहने वाले अभिजात्य दक्षिण अफ्रीकी न्यूनतम 900 रैंड यानि 5400 रूपए महीने की फीस सुरक्षा एजेंसियों पर खर्च करते हैं।

दक्षिण अफ्रीका में 2010 में फुटबाल विश्वकप फीफा की तैयारियां चल रही हैं। सरकार खेल के इस उत्सव को पर्यटन के विकास में इस्तेमाल करना चाहती है। भारतीय पर्यटकों पर इस बार भी खास नजर है। इस कारण पूरे देश में भारतीय खाने के 100 से अधिक ठिकाने का एक फूड 222.ह्यशह्वह्लद्धड्डद्घह्म्द्बष्ड्ड.ठ्ठद्गह्ल पर अपडेट किया गया है। भारत के कई शहरों में छोटे-बड़े उत्सव की तैयारी है,ताकि रिश्तों की कड़ी को और मजबूत बनाया जा सके।

Thursday, August 28, 2008

लीजिए साहब हैसियत सामने आ गई

हम ये समझ नहीं पा रहे हैं कि हम कैसा देश बनें। लेकिन, हमारे देश की अभी क्या हैसियत है। इस कड़वी सच्चाई का अक्सर दूसरे-चौथे रोज सामना करना पड़ जाता है। अखबार के पन्ने पर बॉक्सर विजेंदर कुमार और पहलवान सुशील कुमार के साथ सोनिया गांधी की मुस्कुराती तस्वीर के ठीक नीचे से असलियत कुछ वैसे ही झांक रही थी जैसे, परदा कहानी में परदा गिरते ही सारी लाट साहबी की सच्चाई पठान के सामने आ जाती है।

अखबार के पहले पन्ने पर सबसे बोल्ड फॉण्ट में खबर है कि दुनिया के एक तिहाई गरीब सिर्फ हमारे महान देश भारत में पाए जाते हैं। यानी, दुनिया के सबसे ज्यादा खतरनाक बीमारी से ग्रसित लोग भारत में ही हैं। गरीबी दुनिया की सबसे खतरनाक बीमारी है इससे भला किसी को क्या इनकार होगा। और, इस बीमारी से पीड़ित मरीज हमारे देश में अफ्रीका के उन इलाकों से भी ज्यादा हैं जहां की गंदी तस्वीरें दिखाकर BBC WORLD और CNN दुनिया (खासकर धनाढ्य देशों) को ये बताते हैं कि गरीब नाम के बीमार ऐसे होते हैं। लगे हाथ ये भी बताने से नहीं चूकते कि ये प्रजाति विलुप्त होने के बजाए बढ़ रही है लेकिन, अमरीका-लंदन जैसी जगहों पर शायद ही इनके कुछ अवशेष बचे हों।

और, कल जो मैं बीजिंग ओलंपिक में पदकों की तालिका में भारत और चीन की तुलना करने की गुस्ताखी कर रहा था। उसे और आगे बढ़ा रहा हूं। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, 1980 में चीन में 835 मिलियन यानी 83 करोड़ पचास लाख, उस समय की चीन की कुल आबादी के 83 प्रतिशत लोग, गरीबी की महामारी से पीड़ित थे। भारत के 42 करोड़ 10 लाख लोग, 60 प्रतिशत, गरीबी की महामारी की चपेट में थे। 2005 का आंकड़ा देख लीजिए। चीन में 20 करोड़ 80 लाख, कुल आबादी के 16 प्रतिशत लोग, गरीबी की महामारी के जाल में फंसे रह गए। जबकि, भारत में उसी समय 45 करोड़ 60 लाख लोग, आबादी के 42 प्रतिशत, गरीबी की महामारी से पीड़ित ही रहे।

और, दुनिया क्यों एशिया में भी हमसे ज्यादा गरीबी का तमगा नेपाल के ही सिर सज रहा है। एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) की ताजा रिपोर्ट कह रही है कि गरीबी के मामले में पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका भी हमसे बेहतर है। यही वजह है कि कल मैं एक टीवी चैनल पर चीन स्पेशल देख रहा था। तो, एक चीनी का पैराडब (चीनी भाषा से हिंदी) सुनाई दे रहा था कि भारत के बारे में तो वो, लोग चर्चा भी नहीं करते। हां, भारत की छवि ये है कि वो, गरीबों-टूटी-फूटी सड़कों वाला देश है। और, वो ठसके से ये भी बता रहा था कि हम सिर्फ वोट ही तो नहीं दे सकते (कुछ इस अंदाज में अच्छा रहने-खाने को मिले तो, लोकतंत्र जाए ठेंगे पे)। हमारे यहां की शानदार सड़कें, ऊंची इमारतें और बहुत कुछ है हमारे पास बताने को। अब बस आगे फिर— ये तो कोढ़ जैसा है जब कुरेदा जाता है फिर कीड़े बाहर निकल आते हैं।

Wednesday, August 27, 2008

हम कैसा देश बनें

बड़ी भयानक ऊहापोह है। भारत इसी ऊहापोह में आजादी के बाद से ऐसा जूझ रहा है कि खुद का भी वजूद नहीं बचा रह पाया है। कुल मिलाकर ऐसे कहें कि एक बार हम जब गुलाम हुए तब से आज तक यानी सैकड़ों सालों से हम तय ही नहीं कर पा रहे हैं कि हम गुलाम है या आजाद। मुगलों और अंग्रेजों ने हमें ऐसा रगड़ा है कि हम देश वासी मुंबई की रगड़ा पेटीस हो गए हैं। पता ही नहीं चलता- मटर कितनी है, पानी कितना है, कितना गरम है और गरम है तो क्या गरम है आलू की टिक्की या फिर मटर या सिर्फ मटर का पानी।

आजादी के बाद नए मापदंड बने। पहले बरसों हम नेहरूवियन मॉडल में गुटनिरपेक्ष बने- फिर उनकी सुपुत्री इंदिरा गांधी ने कहा- सोवियत संघ जैसा बनना चाहिए। उधर, इंदिरा गांधी की अकाल मौत हुई और इधर सोवियत संघ का संघ ही गायब हो गया और सिर्फ रूस (Russia) रह गया। सोचिए, अगर आज भी रूस, सोवियत संघ (united states of soviet russia) रहा होता तो, अमेरिका से आज भी आगे होता। कहां- अरे, वहीं जहां सबसे आगे निकलकर चीन ने दुनिया को पटक मारा है। वही बीजिंग ओलंपिक जो, कल खत्म हो गया लेकिन, दुनिया को बता गया कि अब दुनिया का दादा वॉशिंगटन नहीं रह गया। नया बादशाह बीजिंग से बोलेगा।

खैर, मैं देश की बात कर रहा था तो, सोवियत संघ उधर टूट और इधर हमारे देश के नेताओं का आदर्श भी नहीं रह गया। अब हम अमेरिका जैसा बनना चाहते हैं। कमाल ये कि इस पर संघी-भाजपाई से लेकर कांग्रेसी तक सब सहमत हैं। नए समाजवादियों को भी अमेरिका का ही साथ अच्छा लग रहा है। सिर्फ कम्युनिस्ट भाई चीन जैसा बनाना चाहते हैं देश को। ये अलग बात है कि कम्युनिस्ट भाइयों की जिन दो राज्यों में बपौती है उसे, चीन तो क्या चीन के पिद्दी बराबर भी नहीं बना पा रहे हैं।

अमेरिका, रूस बनने के समय तो मैं इतना जाग्रत ही नहीं था कि कुछ बनाने में अपनी बहुमूल्य राय दे पाता। लेकिन, अब देश कैसा बने इसमें मेरी बहुमूल्य राय काम आ सकती है। चीन जैसा देश बनने में मुझे जाग्रत होने के साथ ही चिढ़ होनी शुरू हो गई थी। उतनी ही जितनी कोई अगर पाकिस्तान जैसा बनने की वकालत कर दे।

इसकी सीधी-सीधी कई वजहें थीं
चीन ने हमारी जमीन पर कब्जा जमा रखा है।
चीन ने तिब्बत पर जबरी कब्जा जमाया हुआ है। घिघियाए दलाई लामा भारत में हैं, उनसे अनायास सहानुभूति है।
कम्युनिस्ट चीन में तानाशाही है।
हमारे देश में जो, कम्युनिस्ट बने घूम रहे हैं वो, सिर्फ हिंदू धर्म पर हमला करके काम चला रहे हैं।
कम्युनिस्ट राज्यों के पास कोई ऐसा मॉडल नहीं है जो, बता सके कि चीन जैसा ही बनना चाहिए। एक पश्चिम बंगाल थोड़ा बहुत था वो, भ्रम भी शीशे की तरह टूटकर चुभ रहा है।


इतनी वजहें दिमाग में ऐसे घर किए हुए हैं कि जब मैं देहरादून, अमर उजाला में भारतीय सैन्य संस्थान (IMA) में पासिंग आउट परेड कवर करने गया तो, जॉर्ज फर्नांडिस से लगभग भिड़ सा गया था। जॉर्ज फर्नांडिस रक्षा मंत्री थे, पासिंग आउट परेड के मुख्य अतिथि थे। POP भाषण के दौरान उन्होंने चीन का जिक्र किया और उसकी जमकर तारीफ की। मंच से उतरते ही दूसरे पत्रकारों के साथ मैंने उन्हें घेर लिया। और, कड़े लहजे में सवाल दागा- क्या आप भारत में चीन मॉडल की वकालत कर रहे हैं। फर्नांडिस ने कहा- मैं सिर्फ चीन के विकास की बात कर रहा था। लेकिन, मैं तो भरा हुआ था। फिर से मैंने वही सवाल किया। फर्नांडिस इतने झल्ला गए कि उन्होंने प्रेस से बात करने मना कर दिया। कहा- आप मेरे मुंह में अपने शब्द डालने की कोशिश कर रहे हैं।

खैर, मैंने देहरादून छोड़ दिया। और, मुंबई आ गया-मन में कहीं न कहीं बचपन से था कि मुंबई जैसा देश हो जाए तो, मजा आ जाए। लेकिन, मायानगरी में आते ही इसकी फिल्मी छवि टूट सी गई। मरीन ड्राइव के क्वीन्स नेकलेस से मैं मुंबई को पहचानता था। जहां पुरानी-नई मॉडल की शानदार गाड़ियों में बड़े लोग घूमते हैं। यहां एयरपोर्ट (अब तो, कम से कम एयरपोर्ट शानदार हो ही गया है) से उतरते ही झुग्गियों से गुजरकर होटल तक पहुंचा। समझ में आ गया मैं अपने पैतृक प्रतापगढ़ के गांव से निकलकर देश के सबसे बड़े गांव में आ गया।

गांव में सड़कें कच्ची-पक्की हो सकती हैं लेकिन, कोई भी दूरी तय करने में साइकिल से जितना समय लगता है उससे ज्यादा समय मुंबई में ट्रैफिक के बीच फंसी कारों से लग जाता है। गांव में खेत में लोग दिशा-मैदान जाते हैं तो, यहां भी रेलवे ट्रैक के किनारे लोग लैट्रिन करते मिल जाएंगे। झुग्गियों में तो लोग गांव से भी बदतर हालात में रह रहे हैं। हां, झुग्गी में भी एयरकंडीशनर जरूर लगा है। अपने गांव देश की लंबी-चौड़ी जगह और शानदार हवा-पानी को छोड़कर लोग तरक्की तलाशते नाले के ऊपर-सड़क के किनारे-रेलवे ट्रैक के किनारे बदबूदार जगह में एक चारपाई की जगह में झुग्गी बनाकर तरक्की वाले देश में रह रहे हैं।

फिर, कभी-कभी लगता है कि दिल्ली जैसा देश हो जाए तो, मजा आ जाए। और, दिल्ली इधर जिस तेजी से बदल रही है—कि हर महीने भर पे भी दिल्ली जाओ तो, नई सी लगती है, ढेर सारे फ्लाईओवर, चमचमाती सड़कें- उससे और लगता है कि देश, दिल्ली जैसा ही हो जाए। फिर, लगा कि नहीं यार इतनी सड़कों-फ्लाई ओवरों पर दिल्ली वाले तो, मजे से चल ही नहीं पा रहे हैं। ऑफिस के टाइम में तो, मुंबई से थोड़ा ही भले रह पाते हैं। फिर भी दिल्ली देश की अकेली वर्ल्ड क्लास सिटी लगती है।

और, लीजिए कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 में होने वाला है। उसकी तैयारी की वजह से ये दिल्ली का साज-सजावट ज्यादा तेजी से हो रही है। बड़ी मुसीबत है भारत के लिए चीन और पाकिस्तान जैसे देश के बगल में होना। पाकिस्तान रोज हम पर बिना वजह गोली बरसाता रहता है-धमाके करता रहता है। निर्दोष मारे जाते हैं। तो, चीन की तरक्की से हम ऐसे ही मरे जा रहे हैं। चीन 5 SEZ बनाता है तो, हम 500 SEZ के प्रस्ताव पास कर देते हैं। जबकि, हमें ये अच्छे से पता है कि हमारे लिए SEZ मॉडल काम का नहीं है। और, देखिए हमें भी 108 साल में ओलंपिक में रिकॉर्ड बनाने के लिए चीन की राजधानी बीजिंग ही एक जगह मिली थी।

रिकॉर्ड भारत ने भी बनाया और चीन ने भी। भारत देश की अब तक की जिंदगी का पहला और अकेला निजी स्वर्ण पदक मिला। चीन के खिलाड़ी 51 स्वर्ण पदक लटकाए घूम रहे हैं। हम कुल जमा तीन गिनती में पहुंचे तो, चीन ने पदकों की सेंचुरी मार दी। लीजिए, साहब अब चीन से कुछ तुलना बची क्या। स्वर्ण पदक के लिहाज से चीन हमसे 51 गुना आगे, अपना कांसा भी मिला लें तो, भी चीन तीस गुना आगे। अब मैं सोच रहा जॉर्ज फर्नांडिस गलती से ही सही कह रहे थे हमें चीन जैसा बनना चाहिए। वो, भी उन जवानों की पासिंग आउट परेड में जो, हो सकता है चीन की उसी सीमा पर तैनात कर दिए जाएं। जहां चीन ने लंबे भारतीय क्षेत्र पर चीनी झंडे लगाकर नई सीमा बना दी है।

अब मुझे भी लगता है कि हम चीन जैसा ही देश बनें। कांग्रेसी-कम्युनिस्ट तो, खुश होंगे ही। संघी भी खुश होंगे बस उन्हें ये नहीं बताना है कि हम कम्युनिस्ट चीन जैसा बन रहे हैं। वैसे, संघियों को भी गुजरात एक देश बनाने का मॉडल मिल गया है। लेकिन, फिर वही बात कि हम चीन तो हैं नहीं थ्येन आन मेन चौक पर लोकतंत्र बहाली की मांग करने वाले छात्रों का नरसंहार करने वाली रेड आर्मी किसी को याद तक नहीं है। चीन की तरक्की सबको याद है। अब एक चुनाव विकास के मुद्दे पर जीतने वाले नरेंद्र मोदी भी शायद तरक्की से सब ढंक दें। लेकिन, गुजरात में है तो, लोकतंत्र ही ना। तानाशाही तो है नहीं कि बस एक ही पार्टी, एक ही राज। फिर, तो हम चीन भी नहीं बन पाएंगे। वैसे, मेरे स्वर्गीय बाबा श्री श्रीकांत त्रिपाठी शास्त्री मुझकों अक्सर समझाते हुए एक श्लोक सुनाते थे जो, मुझे अब याद नहीं है। लेकिन, उसका मतलब मुझे याद है कि हाथी के पैर में सबका पैर समा जाता है। यानी इतने बड़े बनो कि सारी गलतियां उसमें छिप जाएं। अब भारत की पहचान भले दुनिया में हाथी के तौर पर होती है लेकिन, हम हाथी नहीं बन पा रहे हैं।

लीजिए, मैं चीन, गुजरात जैसा बनते-बनते फिर से हाथी यानी भारत बनने लगा। दिमाग में बाप-दादाओं का दिया भरा हुआ है ना। अरे, अब तो मुझे कुछ नहीं समझ में आ रहा। क्या हम बिना चरित्र के ही देश रह जाएंगे। ए भाई, किसी को समझ में आ रहा हो तो, बताओ ना- हम कैसा देश बनें। और, देश के वीरों ये सलाह मत देना कि हमें किसी की नकल की जरूरत नहीं हम भारत हैं और भारत ही बनेंगे। क्योंकि, आजादी के करीब बासठ सालों बाद भी हम भारत जैसा बनते-बनते बिना किसी चरित्र के रह गए हैं। प्लीज, बताइएगा जरूर, हम ही नहीं देश मानसिक उलझन में है।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...