Friday, October 22, 2010

ये चीन की तरक्की की असली कहानी है

चीन में इस महिला के 8 महीने बच्चे की हत्या कर दी गई
इस तरह की कहानी चीन से निकलकर कम ही आती है। लेकिन, इसे पूरी दुनिया को जानना बेहद जरूरी है। चीन की तरक्की की कहानी दुनिया अकसर कहती रहती है। लेकिन, ये किस कीमत पर मिल रही है ये कभी-कभी ही चर्चा में आता है। कभी-कभी भारत में भी हम लोग ये कहकर कि चीन जैसी तरक्की हो तो, तानाशाही में भी क्या दिक्कत है। हम तरक्की तो कर लेंगे। लेकिन, इस तरह की चीनी तरक्की के फॉर्मूले को समझकर शायद हममें से जो, लोग चीन की तरह बनने-बनाने का सपना देख रहे हैं वो, थोड़ा दूसरा सपना देखना शुरू कर दें।

चीन के Siming इलाके में सारी मानवता को जलील कर देने वाली घटना हुई है। चीनी परिवार नियोजन अधिकारियों ने एक गर्भवती महिला के 8 माह के बच्चे की पेट में ही खतरनाक इंजेक्शन देकर हत्या कर दी। Luo Yanquan कंस्ट्रक्शन वर्कर हैं और उनके पहले ही एक 9 साल की बेटी है। और, डब चीन के Siming  के परिवार नियोजन अधिकारियों को पता चला कि Luo Yanquan  की पत्नी Xiao Aiying फिर से गर्भवती है तो, सिर्फ एक बच्चे की तानाशाही नीति के तहत उन्होंने जबरदस्ती उसकी भ्रूण हत्या की कोशिश की। पेट में बच्चे के 8 महीने पूरे हो चुके थे। लेकिन, किसी भी बात की परवाह न करके चीन के परिवार नियोजन अधिकारियों ने Xiao Aiying को बुरी तरह से मारा पीटा। और, जबरदस्ती घातक इंजेक्शन के जरिए बच्चे की हत्या कर दी।

Luo Yanquan ने इसकी शिकायत पुलिस में करनी चाही लेकिन, वहां उनकी किसी ने नहीं सुनी। न तो वहां का डरा-दबा-प्रतिबंधित मीडिया Luo Yanquan की मदद करने के लिए सामने आया। यहां तक कि इस ज्यादती के खिलाफ मामला दायर करने के लिए वकील तक नहीं मिला। थक हारकर Luo Yanquan  ने अपने ब्लॉग पर  अपनी दुभरी दास्तान लिखी। जिसे देखकर अल जजीरा चैनल ने इसकी रिपोर्ट तैयार कराई और ये दुनिया के मीडिया में आया। लेकिन, ये एक कहानी है। सच्चाई ये है कि चीन की पूरी तरक्की की बुनियाद में ऐसे कितने अजन्मे-जन्मे बच्चों की लाशें दबा दी गई हैं।

Friday, October 08, 2010

अयोध्या को इस नजरिए से देखिए

अयोध्या की विवादित जमीन श्रीरामजन्मभूमि है या नहीं- इस पर 30 सितंबर को आए अदालत के फैसले के बाद लगने लगा था कि देश सचमुच 1992 से काफी आगे बढ़ चुका है और अब इस मुद्दे पर राजनीति की संभावना बिल्कुल नहीं है। लेकिन, अयोध्या के एतिहासिक फैसले के चंद घंटों बाद ही धीरे-धीरे फिर से ये मसला साफ होने लगा कि देश भले ही 1992 से काफी आगे बढ़ चुका हो लेकिन, देश चलाने वाले या फिर इसे चलाने की चाह रखने वाले देश को इतना आगे जाने देने का मन नहीं बना पाए हैं। देर शाम तक धीरे-धीरे सदभाव वाले बयान तीखे होने लगे और ये साफ दिखने लगा कि फिलहाल अयोध्या के लिए सीता के श्राप से मुक्त होने का समय नहीं आया है। ये किंवदंती है कि जब सीता को अयोध्या छोड़ना पड़ा तो, उन्होंने कहाकि जो अयोध्यावासी उनके ऊपर हो रहे अन्याय के खिलाफ नहीं खड़े हो पा रहे हैं उन्हें समृद्धि-खुशहाली नहीं मिल सकेगी।

अब बार-बार जो ये कहा जा रहा है कि देश 1992 से बहुत आगे निकल चुका है यानी अब धर्म और मंदिर-मस्जिद के नाम पर कुछ नहीं होगा। अब मुद्दा विकास का है। और, नौजवान इस मुद्दे से भटकने को तैयार नहीं है। और, सच्चाई भी यही है कि अगर इसी नजरिए से अयोध्या को देखा जाए तो, इस विवाद का हल भी आसानी से निकल सकता है और सीता के श्राप से अयोध्या को मुक्ति भी मिल सकती है। अयोध्या विवाद की वजह से केंद्र और राज्य सरकार ने इस छोटे से कस्बे टाइप के शहर को छावनी बना रखा है। बावजूद इसके अयोध्या में ओसतन 10 से 12 लाख रामभक्त रामलला के दर्शन करने के लिए यहां चले आते हैं। लंबी सुरक्षा प्रक्रिया और रामलला का इतने सालों से कनात के मंदिर में रहना भी उनकी आस्था कम नहीं कर पा रहा है। लेकिन, सितंबर महीने में अयोध्या पर फैसले की तारीख ने ऐसी दहशत पैदी की कि सिर्फ डेढ़ लाख रामभक्त ही यहां आए। ये वो धार्मिक भक्त हैं जिनकी राम पर आस्था है। राम लला बिराजमान के अस्थायी मन्दिर के प्रधान पुजारी महंत आचार्य सत्येन्द्र दास बताते हैं कि सामान्य दिनों में राम लला के दर्शन को प्रतिदिन सात से आठ हजार लोग आते हैं और धार्मिक महत्व के दिनों में यह संख्या 15 हजार तक पहुंच जाती है।


अब सिर्फ अगर इस एक आंकड़े से बात को आगे ले जाएं और मान लें कि औसतन दस लाख लोग भी आम दिनों में अयोध्या में रामजन्मभूमि के दर्शन करने आते हैं तो, सितंबर में नौ लाख चालीस हजार भक्त अयोध्या नहीं आ पाए। और, अगर एक आने वाले रामभक्त का अयोध्या में खर्च एक हजार रुपए भी मान लें तो, सितंबर महीने के तनावपूर्ण माहौल में अयोध्या को नुकसान हुआ करीब सौ करोड़ रुपए का। जो, अयोध्या के फूल वाले से लेकर मंदिर के चढ़ावे तक में जाता। ये दस लाख भक्त भी वो हैं जो, अयोध्या के आसपास के इलाकों से यानी उत्तर प्रदेश और उससे सटे राज्यों से आने वाले भक्तों की संख्या है।

ये तब है जब अभी अयोध्या को भारतीयों की पर्यटन स्थल सूची में बहुत नीचे जगह मिल पाती है। यहां तक कि उत्तर प्रदेश का हिंदू भी जब धार्मिक यात्रा की योजना बनाता है तो, उसकी सूची में वैष्णो देवी, तिरुपति बालाजी, शिरडी जैसे मंदिर ऊपर की सूची में रहते हैं। बाहर के टूरिस्ट फिर चाहे वो धार्मिक यात्रा पर हों या सिर्फ घूमकर भारत देखने के मूड में उनकी लिस्ट में तो अयोध्या बिल्कुल ही नहीं रहता है। ये तब है जब इस देश में सर्व सहमति से अगर किसी एक भगवान पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वालों की बात हो तो वो संभवत: राम ही होंगे।

जाहिर है रामराज्य के जरिए यानी राममंदिर के दर्शन के लिए आने वाले भक्तों के जरिए अयोध्या के विकास की नई कहानी लिखी जा सकती है। राममंदिर के निर्माण के साथ इस शहर की तकदीर बदल सकती है। और, ये तकदीर सिर्फ हिंदुओं की नहीं बदलेगी। रामलला के कपड़े पिछले दस सालों से अयोध्या को दोराही कुआं इलाके के सादिक अली सिलते हैं। वो, कहते हैं कि रामलला को पहनाए जाने वाले कपड़े उनके हाथ के सिले हैं ये उनके लिए गर्व की बात है। क्योंकि, राम तो सबके हैं। शहर में खड़ाऊं बनाने से लेकर मूर्तियां बनाने तक के काम में हिंदुओं के साथ मुस्लिमों की भी अच्छी भागीदारी है। अयोध्या एक ऐसा शहर है जो, हिंदुओं के लिए भगवान राम की जन्मभूमि की आस्था है तो, अवध के नवाबों की विरासत भी ये शहर समेटे हैं लेकिन, फिर भी ये शहर वीरान है तो, इसकी सबसे बड़ी वजह ये विवाद ही है।

अयोध्या में अवध शासकों के समय के कई मुस्लिमों के महत्व के स्थानों के साथ 3000 से ज्यादा मंदिर हैं। निर्मोही, निरंजनी, निर्वाणी, उदासीन, वैष्णव सहित लगभग सभी अखाड़ों के यहां बड़े ठिकाने हैं। शहर में दस हजार से ज्यादा साधु हमेशा रहते हैं। लेकिन, इतनी विविधता और बताने-दिखाने की समृद्ध विरासत होने के बावजूद इस शहर के लोग बेकारी, कम आमदनी से जूझ रहे हैं। अयोध्या के रास्ते में कुछ चीनी मिलों की बदबू यहां आने वाले को भले ही बड़ी इंडस्ट्री के होने का भ्रम पैदा करे लेकिन, सच यही है कि अयोध्या में चीनी मिलों के अलावा कोई ऐसी इंडस्ट्री भी नहीं है जहां 100 लोगों को भी रोजगार मिला है। किसी बड़ी कंपनी का शोरूम नहीं है। मनोरंजन का कोई साधन नहीं है। अयोध्या शहर की बाजार कस्बों से बदतर नहीं तो बेहतर भी नहीं है। शहर के लोगों की औसत महीने की कमाई 100 रुपए से ज्यादा नहीं है।

देश में शायद ही किसी को अयोध्या का दशहरा या दिवाली याद आता हो। लोगों को पता भी नहीं है कि अयोध्या में दिवाली दशहरा मनाया भी जाता है या नहीं। मैं इलाहाबाद से हूं और वहां दशहरे के दस दिनों में शहर के हर मोहल्ले की चौकी देखने का अलग ही आकर्षण होता है। पूरा शहर उल्लास में होता है। दिल्ली से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में होने वाली रामलीलाएं भी चर्चा का वजह बनती हैं। लेकिन, दशहरा-दिवाली में भी इस शहर में उत्साह नहीं होता है। जबकि, राम, रावण पर विजय हासिल करके लौटे तो इसी अयोध्या ही थे। फिर अन्याय पर न्याय की विजय के इस महापर्व में इस शहर को जरा भी जगह क्यों नहीं मिल पा रही है। अब सारा मामला यही है कि आस्था से भले ही कानूनी फैसले न होते हों और तथाकथित आस्थावान लोग भले ही आस्था और न्याय को पूरी तरह से ध्यान में रखकर दिए कानून के फैसले को मानने को तैयार न हों। लेकिन, रास्तो तो यही मानना पड़ेगा। भले ही दोनों पक्षों की आस्था कुछ भी कहती हो।

बार-बार ये बात होती है कि देश बहुत आगे निकल गया है। देश के कई राज्यों के चुनाव नतीजे आने के बाद राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक भी ये कहते अकसर दिखते रहे कि अब विकास पर ही चुनाव जीता जा सकता है। विकास ही नेता को बड़ा बनाएगा। अभी भी पिछड़े राज्यों के अगुवा उत्तर प्रदेश के लिए भी जरूरी है कि धार्मिक-जातिगत आधार पर नहीं, विकास के आधार पर मुद्दे तय हों। और, अयोध्या को रामजन्मभूमि एक उच्च अदालत ने मान लिया है। उसे आधार बनाकर समृद्ध अयोध्या और उसके जरिए अयोध्या से सटे उत्तर प्रदेश के कई जिलों के विकास की कहानी लिखी जा सकती है।
(ये लेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपा है)

Monday, August 23, 2010

एक फैशन रिपोर्टर की इच्छा

एक फैशन रिपोर्टर अपने दोस्त से

U know today I got biggest compliment of my life.


Someone said na ki u looks like a super model if u have some height


Even she said na ki u looks like a short super model

Sunday, August 22, 2010

फैशन रिपोर्टर और शाहरुख खान

दिल्ली की एक फैशन रिपोर्टर शाहरुख खान से


मैं आपसे शादी करना चाहती हूं

शाहरुख खान – मुझे कोई दिक्कत नहीं अगर आपकी मम्मी को एतराज ना हो तो

फैशन रिपोर्टर – हां, मेरी मम्मी को दिक्कत होगी क्योंकि, वो भी आपको प्यार करती है

शाहरुख खान – कोई बात नहीं जब मैं 20 साल बाद आऊंगा तो, तुम्हारी बेटी मुझसे शादी के लायक हो जाएगी।

और, फैशन रिपोर्टर शाहरुख की इस हाजिरजवाबी पर लाजवाब थी। कुछ सो स्वीट टाइप की।
(डिसक्लेमर- ये सारी बातचीत चलताऊ अंग्रेजी में हुई थी और उसी तरह से शब्दों का भी इस्तेमाल हुआ था। हिंदी में ये सारी बातचीत फूहड़ता होती। अंग्रेजी में ये बातचीत आधुनिक होने का सबूत देती है।)

इस बार देश की इज्जत चली जाए तो, बेहतर

पता नहीं मैं भी ऐसा क्यों हो गया हूं। मुझे लग रहा है कि देश की इज्जत एक बार चली ही जानी चाहिए। अब बताइए भला कोई भी ऐसे कैसे सोच सकता है कि देश की इज्जत चली जाए। देश की सबसे बड़ी नेता सोनिया गांधी जी कह रही हैं कि ये देश की इज्जत से जुड़ा मामला है। देश के सबसे बड़े मीडिया परिवार को चलाने वाले सुब्रत रॉय सहारा जी भी कह रहे हैं कि अभी तक जो हुआ, सो हुआ। अब बस करो। लेकिन, मेरी भी गुस्ताखी देखिए कि मैं कह रहा हूं कि नहीं देश की इज्जत इस बार चली जाने दीजिए।


साला देश की इज्जत भी गजब हो गई है। वैसे तो, ये मुझे समझ में ही नहीं आता कि आखिर ये हमारा देश भी और इसकी इज्जत भी। हमारी इज्जत हमसे ताकतवर और बड़े देश अमरीका-चीन तो उतारते ही रहते हैं। पाकिस्तान, नेपाल भी जब चाहे तब हमारी इज्जत की एक परत उधेड़ देते हैं। पर हम हैं कि इज्जत बचाने में लग जाते हैं कि चलो एक ही परत तो उधड़ी है अब बचा लेते हैं।


अब वही हाल है माइक फेनेल नामक प्राणी जाने कितना पहले से कलमाड़ी के काले कारनामों की तरफ इशारा कर रहा था। हमारी अपनी संस्थाएं – साल भर पहले आई कम्पट्रोलर एंड ऑडीटर जनरल की रिपोर्ट हो या फिर अभी आई चीफ विजिलेंस कमीशन की रिपोर्ट – बता रही थीं कि सब गड़बड़झाला है। लेकिन, किसी का ध्यान नहीं गया। अब बस समझाने में लग गए हैं कि किसी तरह देश की इज्जत बच जाए। बाद में देखेंगे कि किसने कितना काला किया है।


कुल मिलाकर बस इरादा कुछ ऐसा ही है कि किसी तरह खेल हो जाए तो, फिर खेल कर लें। भ्रष्टाचार का खेल ऐसा है ही कि किसी को भी भ्रष्ट करने की ताकत रखता है। खेल मंत्री साहब की कोई खेल वाला सुनता तो है नहीं। फिर भी कह रहे हैं कि खेल हो जाने दीजिए फिर कोई बख्शा नहीं जाएगा। सब यही कह रहे हैं कि खेल हो जाने दीजिए। और, मैं ये कह रहा हूं कि अगर ‘खेल’ हो ही गया तो, फिर कोई क्या कर लेगा। इसीलिए मेरी ये दिली इच्छा है कि हे भगवान इस बार देश की इज्जत चली जाने दो। शायद भ्रष्टाचार के खिलाफ इसी बहाने कुछ विरोध के स्वर बनें, मजबूत हों, कुछ कार्रवाई हो। वरना तो इस देश में भ्रष्टाचार पर गजब की आम सहमति बन चुकी है। काफी हद तक सांसदों की सैलरी बढ़ाने जैसी आम सहमति भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बन चुकी है।

Thursday, July 29, 2010

मनमोहन जी आप भी!


अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी गजब भोले हैं। कह रहे हैं कि जब अच्छे मॉनसून की वजह से फसलें अच्छी हो जाएंगी। देश में अनाज और दूसरी जरूरी चीजों की अधिकता हो जाएगी तो, दिसंबर तक महंगाई अपने आप कम हो जाएगी।

अब मनमोहन जी तो सचमुच बहुत सीधे आदमी हैं। वो, बहुत कठिन समीकरणों को न राजनीति में समझने की कोशिश करते हैं न महंगाई के मामले में। इसीलिए दूसरा कार्यकाल आराम से पूरा करते दिख रहे हैं। लेकिन, चूंकि वो अर्थशास्त्री हैं तो, आंकड़े जरूर समझते हैं।


कुछ आंकड़े मेरे पास हैं वो, मैं पेश कर रहा हूं खुद ही अंदाजा लग जाएगा कि ये महंगाई किसी मांग-आपूर्ति के असंतुलन का नतीजा है क्या ?


2006 के बाद से लगातार हमारा अनाज का उत्पादन बढ़ा है। पिछले साल के कुछ सूखे की वजह से इस साल की फसल पर थोड़ा असर जरूर पड़ा है फिर भी वो, मांग से काफी ज्यादा है।


2007-08 में भारत का गेहूं का उत्पादन रिकॉर्ड 7 करोड़ 80 लाख टन हुआ था। जबकि, उम्मीद 7 करोड़ 68 लाख टन की ही थी।


2009-10 में सिर्फ गेहूं ही नहीं सभी अनाजों की बात करें यानी गेहूं और दालों की तो, अनाज का कुल उत्पादन 21 करोड़ 80 लाख टन तक होने की उम्मीद है। ये पिछले साल से करीब 1 करोड़ 60 लाख टन कम है लेकिन, फिर भी कुल पैदावार इतनी ज्यादा है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में लाखों टन गेहूं सड़ चुका है।


2009-10 में गेहूं का उत्पादन पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए 8 करोड़ 7 लाख टन होने की उम्मीद है। जबकि, दालों का उत्पादन भी रिकॉर्ड 1 करोड़ 46 लाख टन।

चावल भी इस साल करीब 9 करोड़ टन हुआ। और तिलहन उत्पादन करीब ढाई करोड़ टन का है। गन्ना 27 करोड़ 78 लाख टन का सरकारी अनुमान है।

महंगाई में अब बचती है सब्जी तो, उसका कोई ऐसा बुआई चक्र नहीं होता कि जुलाई-अगस्त की बारिश से सब सुधर जाएगा या सब बिगड़ जाएगा। फिर इस बारिश के भरोसे अपने प्रधानमंत्री जी से लेकर उनके आर्थिक सलाहकार सी रंगराजन, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और सारी सरकार को भुलावा क्यों है कि दिसंबर तक सब ठीक हो जाएगा। वैसे ऐसे ही भुलावे में रखकर पिछले 5 साल और नई यूपीए के साल भर से ज्यादा हो गए हैं। जय हो ...

Wednesday, June 30, 2010

राष्ट्रीय पार्टी के पिछलग्गू नेता

लग रहा है कि किसी तरह जनता दल यूनाइटेड कम से कम साथ चुनाव लड़ने पर तो राजी हो गई है। अब दबी-छिपी शर्तें जो भी हों लेकिन, शायद नीतीश को भी ये लगा कि बीजेपी से टूटे तो, लालू-पासवान और कांग्रेस उनके चमकदार मुख्यमंत्री के कार्यकाल को जाने कहां इतिहास में ले जाकर पटक देंगे। लेकिन, नीतीश कुमार ने नवीन पटनायक बनने की हर संभावना तलाशने की कोशिश की थी। ये भले ही अभी हुआ नहीं लेकिन, बार-बार उभरने वाला एक सवाल जरूर फिर से खड़ा हो गया है कि क्या बीजेपी भले ही कांग्रेस के अलावा दूसरी अकेली राष्ट्रीय पार्टी होने का दावा करती हो लेकिन, उसका व्यवहार राष्ट्रीय पार्टी होने के उसके दावे को बल नहीं देता। क्या वजह है कि अकसर वो, अपने क्षेत्रीय सहयोगियों से मात खा जाती है।

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी बार-बार ये चिल्लाकर कहने की कोशिश कर रहे हैं कि बिहार के चुनाव में भाजपा का कौन नेता प्रचार के लिए जाएगा कौन नहीं ये भाजपा तय करेगी ये तय करने का हक सहयोगी पार्टियों को नहीं है। लेकिन, जब उनसे ये पूछा जाता है कि क्या नरेंद्र मोदी और वरुण गांधी बिहार विधानसभा चुनाव में प्रचार के लिए जाएंगे तो, उनकी जुबान थोड़ी लड़खड़ाने लगती है। वो, गोल-गोल घुमाने लगते हैं। ठीक वैसे ही जैसे किसी भी क्षेत्रीय सहयोगी से तालमेल बिठाने में पूरी पार्टी गोल-गोल घूमने लगती है।

बिहार में जनता दल यूनाइटेड के साथ सरकार बनाने से पहले तक भाजपा नेता और अब सरकार में उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी नीतीश कुमार से न तो कम कद्दावर नेता थे और न ही उनका आधार नीतीश से कम था। लेकिन, साथ सरकार चलाने में नीतीश के उप मुख्यमंत्री क्या बने वो, एकदम से चुप मुख्यमंत्री होकर रह गए। शानदार उपलब्धियों के साथ चलती दिख रही जेडी यू और बीजेपी की सरकार में उपलब्धियों के समय बीजेपी जाने कहां गायब हो जाती है। सिर्फ नीतीश का मुस्कुराता चेहरा दिखता है। यहां तक कि चार साल का कार्यकाल पूरा होते-होते नीतीश को ये भी लगने लगता है कि बीजेपी तो, बस उनकी छवि के ही भरोसे चल रही है। और, इसलिए गठजोड़ से लाभ उनको हो रहा है तो, वो जरा दबकर रहें। नीतीश इस गलतफहमी के शिकार भी हैं कि करीब 12 सालों से बीजेपी के साथ गलबहियां डालने के बाद भी वो, सबसे बड़े तथाकथित सेक्युलर नेता हैं जिस पर मुस्लिम वोट मिलता है। लेकिन, नीतीश को ऐसा लगा क्यूं।

दरअसल नीतीश जो कर रहे हैं उसके पीछे बीजेपी के पुराने सहयोगियों का बीजेपी को समय-समय पर ठेंगा दिखाना रहा है। बीजेपी की 20 साल पुरानी सहयोगी शिवसेना भले ही अपने बूते महाराष्ट्र में कुछ खास न कर सके लेकिन, बीजेपी जैसी राष्ट्रीय आधार वाली पार्टी को महाराष्ट्र में अपने पीछे खड़ा कर देती है। प्रमोद महाजन को छोड़ दें तो, महाराष्ट्र बीजेपी में किसी नेता को इतना ताकतवर होने ही नहीं देती कि वो, विधानसभा चुनाव में सहयोग के फॉर्मूले तय कर सके। इसके लिए दिल्ली से बीजेपी हाईकमान को ठाकरे दरबार में हाजिरी लगानी पड़ती है।

पंजाब में अकाली दल के साथ भी बीजेपी कुछ ऐसे ही रिश्ते निभा रही है। नवजोत सिंह सिद्धू के तेज तर्रार चुटकुले युक्त भाषणों को छोड़ दें तो, वहां की राजनीति में बीजेपी, अकाली दल की पिछलग्गू ही लगती है। जबकि, शहरी वोटबैंक के जरिए बनी अकाली-बीजेपी सरकार में बीजेपी के शहरी वोटबैंक का बड़ा हिस्सा है। ठाकरे-अकाली तो स्वभाव से उग्र हैं लेकिन, बीजेपी देश के सबसे विनम्र मुख्यमंत्री की छवि रखने वाले नवीन पटनायक को भी नहीं संभाल सकी। लोकसभा और उड़ीसा विधानसभा चुनावों के ठीक पहले नवीन पटनायक धीरे से बीजेपी से पल्ला झाड़कर खड़े हो गए और नतीजा सबके सामने है। नवीन पटनायक की पार्टी बिना किसी के सहयोग के सत्ता में है।

ज्यादातर भारतीय जनता पार्टी ने जिसे सहयोग दिया। धीरे-धीरे सहयोगी पार्टी तो बड़ी होती गई लेकिन, सहयोग करते-करते राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद बीजेपी अपना आधार खोती गई। उत्तर प्रदेश में पहले से तीसरे नंबर पर बीजेपी पहुंच गई है। और, पहले नंबर पर है बहन मायावती की बहुजन समाज पार्टी। यही बहुजन समाज पार्टी जब तीसरे नंबर पर 50-60 विधायकों के साथ थी तो, देश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनाने का श्रेय लेकर बीजेपी गदगद थी। प्रदेश में उस समय बीजेपी के सबसे ज्यादा विधायक चुनकर आते थे। अब हाल ये है कि प्रदेश बीजेपी का अध्यक्ष खोजने के लिए बीजेपी को बेहद मशक्कत करनी पड़ी। सूर्यप्रताप शाही अच्छे नेता हैं लेकिन, मुश्किल यही है कि उनमें ऐसा चमत्कार नहीं दिखता कि कार्यकर्ता उनके नाम पर उत्साहित होकर पार्टी की खोई नंबर एक पोजीशन लौटा दे। हां, वरुण गांधी 2012 के लिए आगे करने से पार्टी में थोड़ी जान जरूर आई दिखती है लेकिन, सवाल यही है कि गठजोड़ की राजनीति में बीजेपी इतना मात क्यों खाती है।

झारखंड में शिबू सोरेन ने जिस तरह से बीजेपी की बत्ती गुल की है वो, तो इस पार्टी के नेताओं के राजनैतिक कौशल पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है। सोरेन ने जिस तरह से अविश्वास प्रस्ताव पर बीजेपी के खिलाफ वोट किया और उसके बाद बाप-बेटे ने मिलकर करीब एक महीने तक बीजेपी और उसके सारे नेताओं को शीर्षासन कराया वो, सबको बीजेपी की गठजोड़ के मामले में कमजोरी याद दिलाता रहेगा। और, यही बाप बेटे क्यों। कर्नाटक में येदियुरप्पा की सरकार बनने से पहले देवगौड़ा बाप-बेटे ने भी तो बीजेपी की नाक में दम कर दिया था।

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले बीजेपी को इस सवाल का जवाब खोजना ही होगा कि आखिर वो, गठजोड़ के गणित को समझने में क्यों गड़बड़ा जाती है। जिन पार्टियों से बीजेपी का गठजोड़ है उन सबके कांग्रेस से अपने राज्य में छत्तीस के रिश्ते हैं और उन पार्टियों के लिए भी बीजेपी का हाथ पकड़ना ही फायदे का सौदा है। फिर भी बीजेपी का हाथ दबा क्यों रहता है।

आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की धुर विरोधी तेलगू देशम पार्टी हो या फिर तमिलनाडु में जयललिता, इनको संभालना बीजेपी के लिए क्यों मुश्किल हो जाता है। नॉर्थ ईस्ट के राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियों को बीजेपी क्यों अपने पाले में ला नहीं पाती या लाकर भी रख नहीं पाती। बीजेपी को इस सवाल का जवाब जल्दी से जल्दी खोजना होगा। क्योंकि, बीजेपी का ये व्यवहार उसके राष्ट्रीय पार्टी के चरित्र से मेल नहीं खाता। और, जिस तरह से कांग्रेस लगातार ये दावा कर रही है और काफी कुछ सिद्ध भी करती जा रही है कि फिर से सिर्फ कांग्रेस ही इस देश की अकेली राष्ट्रीय पार्टी है वो, भारतीय जनता पार्टी के लिए बड़ी खतरे की घंटी साबित हो सकती है।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...