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Friday, June 02, 2017

क्या सीता के श्राप से मुक्त होने वाली है अयोध्या ?

अयोध्या में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
किम्वदन्ति है कि जब सीता को अयोध्या छोड़ना पड़ा तो, उन्होंने कहाकि जो अयोध्यावासी उनके ऊपर हो रहे अन्याय के खिलाफ नहीं खड़े हो पा रहे हैं उन्हें समृद्धि-खुशहाली नहीं मिल सकेगी। सवाल ये है कि क्या सीता के श्राप से अयोध्या कभी मुक्त नहीं हो सकेगी। या फिर अयोध्या के लिए सीता के श्राप से मुक्त होने का समय आ गया है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या में हैं, इसलिए अयोध्या फिर से खबरों में है। लेकिन, सवाल ये है कि क्या अयोध्या सिर्फ विवादों की वजह से ही खबरों में रहेगी या फिर खबरों से आगे भी भगवान राम वाली समृद्ध अयोध्या अस्तित्व में आएगी। ये तो सच है कि अब देश 1992 से बहुत आगे निकल चुका है। मंदिर-मस्जिद अब वोट तो तैयार नहीं कर पा रहा है। पिछले चुनाव ज्यादातर विकास के मुद्दे पर ही हुए हैं। तो क्या अयोध्या को भी विकास के मुद्दे पर देखे जाने का वक्त आ गया है। अयोध्या विवाद की वजह से केंद्र और राज्य सरकार ने इस छोटे से कस्बे टाइप के शहर को छावनी बना रखा है। बावजूद इसके सालाना करीब 60 लाख रामभक्त अयोध्या चले आते हैं। 60 लाख सालाना मतलब 5 लाख लोग हर महीने मतलब हर दिन करीब 15 हजार लोग अयोध्या आते हैं। लेकिन, ये संख्या अयोध्या में लगने वाले रामनवमी, सावन मेले की वजह से बड़ी दिखती है। इस लिहाज से रामलला के दर्शन के अनुमानित आंकड़े तो बेहद निराश करने वाले हैं। प्रतिदिन 3-4 हजार श्रद्धालु ही तम्बू कनात में विराजमान रामलला के दर्शन करने आते हैं। पूरी ताकत से जय श्रीराम का नारा हर फुर्सत में लगाने वाले भी जाने कितने लोग रामलला विराजमान के दर्शन कर सके होंगे। इसका अन्दाजा इसी से लग जाता है कि रामलला विराजमान के नाम पर सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के खाते में 5-8 लाख रुपए महीने के ही जमा हो पाते हैं। यानी कुल जमा साल भर में रामलला विराजमान के खाते में 60 लाख से एक करोड़ रुपए के बीच में कहीं रकम जमा हो पाती है। औसतन ये रकम 70 लाख के आसपास ही होती है।
अयोध्या के तम्बू कनात वाले रामलला की हैसियत उनके भक्तों ने साल के 70 लाख की कर रखी है। राम दरिद्रों के देवता हो गए हैं। दरिद्र भक्तों के दरिद्र देवता। और इसी से दरिद्र उत्तर प्रदेश। ये दरिद्रता का चक्र क्या सीता के श्राप का परिणाम है। दूसरा तथ्य देखिए, भगवान विष्णु के ही अवतार माने जाने व्यंकटेश बालाजी तिरुपति मन्दिर में हर रोज भक्तों का चढ़ावा करीब 3 करोड़ का होता है। सिर्फ तिरुपति बालाजी न्यास की आमदनी की बात करें तो, मन्दिर न्यास को 2600 करोड़ रुपए की कमाई हुई। इसमें प्रतिदिन औसतन 3 करोड़ के लिहाज से चढ़ावा, 600 करोड़ रुपए सालाना टिकट की बिक्री और 800 करोड़ रुपए जमा रकम पर ब्याज के तौर पर मिला। तिरुपति दर्शन के लिए जाने वालों की ताकत ये है कि तिरुपति के लिए दिल्ली से सीधी उड़ान है। और आज की तारीख में दिल्ली से तिरुपति जाने वाली एयर इंडिया और स्पाइस जेट की टिकट 13000 रुपए से 58000 रुपए तक की है। इसके अलावा चेन्नई और बैंगलुरू देश के ज्यादातर बड़े शहरों से सीधी उड़ान से जुड़े हुए हैं। अयोध्या जाने के लिए उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ उड़कर पहुंचा जा सकता है। लेकिन, शायद ही इक्का दुक्का श्रद्धालु होंगे जो, रामलला विराजमान के दर्शन के लिए लखनऊ उड़कर पहुंचते होंगे। जबकि, तिरुपति पूरी तरह से और बैंगलुरू, चेन्नई के लिए उड़कर पहुंचने वालों में बड़ी संख्या भगवान व्यंकटेश के श्रद्धालुओं की होती है। भगवान व्यंकटेश तो तिरुमाला पहाड़ी पर हैं। लेकिन, भगवान के भक्तों की सुविधा से युक्त तिरुपति शहर में सैकड़ों छोटे बड़े होटल मिल जाएंगे। पूरी अयोध्या में शायद ही कोई ढंग का होटल मिल सके। उसकी वजह भी बड़ी साफ है शायद ही कोई पर्यटक गर्मी या सर्दी की छुट्टियों में अपने बीवी बच्चों के साथ अयोध्या की यात्रा का कार्यक्रम बनाता हो। घोर आस्थावान लोग ही एकाध बार रामलला के दर्शन करके वैतरणी पार कर लेने का भरोसा कर लेते हैं। अयोध्या को भारतीयों की पर्यटन स्थल सूची में बहुत नीचे जगह मिल पाती है। यहां तक कि उत्तर प्रदेश का हिन्दू भी जब धार्मिक यात्रा की योजना बनाता है तो, उसकी सूची में वैष्णो देवी, तिरुपति बालाजी, शिरडी जैसे मंदिर ऊपर की सूची में रहते हैं। बाहर के टूरिस्ट फिर चाहे वो धार्मिक यात्रा पर हों या सिर्फ घूमकर भारत देखने के मूड में उनकी लिस्ट में तो अयोध्या बिल्कुल ही नहीं रहता है। ये तब है जब इस देश में सर्व सहमति से अगर किसी एक भगवान पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वालों की बात हो तो वो संभवत: राम ही होंगे।
वजह बड़ी साफ है अयोध्या की पहचान सिर्फ विवादित ढांचे वाले शहर की बनकर रह गई है। अब योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री के तौर पर अयोध्या में हैं। माना जा रहा है कि केंद्र में मोदी और उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के संयोग से रामलला विराजमान की दशा सुधर सकती है। अयोध्या के विकास की बड़ी योजना मुख्यमंत्री आदित्यनाथ तैयार कर रहे हैं, ऐसा कहा जा रहा है। इसलिए उम्मीद जगती है कि रामराज्य के जरिए यानी राममंदिर के दर्शन के लिए आने वाले भक्तों के जरिए अयोध्या के विकास की नई कहानी लिखी जा सकती है। राममंदिर के निर्माण के साथ इस शहर की तकदीर बदल सकती है। और, ये तकदीर सिर्फ हिंदुओं की नहीं बदलेगी। रामलला के कपड़े पिछले दस सालों से अयोध्या को दोराही कुआं इलाके के सादिक अली सिलते हैं। वो, कहते हैं कि रामलला को पहनाए जाने वाले कपड़े उनके हाथ के सिले हैं ये उनके लिए गर्व की बात है। क्योंकि, राम तो सबके हैं। शहर में खड़ाऊं बनाने से लेकर मूर्तियां बनाने तक के काम में हिंदुओं के साथ मुस्लिमों की भी अच्छी भागीदारी है। अयोध्या एक ऐसा शहर है जो, हिंदुओं के लिए भगवान राम की जन्मभूमि की आस्था है तो, अवध के नवाबों की विरासत भी ये शहर समेटे हैं।

अयोध्या में अवध शासकों के समय के कई मुस्लिमों के महत्व के स्थानों के साथ 3000 से ज्यादा मंदिर हैं। निर्मोही, निरंजनी, निर्वाणी, उदासीन, वैष्णव सहित लगभग सभी अखाड़ों के यहां बड़े ठिकाने हैं। शहर में दस हजार से ज्यादा साधु हमेशा रहते हैं। लेकिन, इतनी विविधता और बताने-दिखाने की समृद्ध विरासत होने के बावजूद इस शहर के लोग बेकारी, कम आमदनी से जूझ रहे हैं। अयोध्या के रास्ते में कुछ चीनी मिलों की बदबू यहां आने वाले को भले ही बड़ी इंडस्ट्री के होने का भ्रम पैदा करे लेकिन, सच यही है कि अयोध्या में चीनी मिलों के अलावा कोई ऐसी इंडस्ट्री भी नहीं है जहां 100 लोगों को भी रोजगार मिला है। किसी बड़ी कंपनी का शोरूम नहीं है। मनोरंजन का कोई साधन नहीं है। अयोध्या शहर का बाजार अच्छे कस्बों से बदतर है। शहर के लोगों की महीने की औसत कमाई 100 रुपए से ज्यादा नहीं है। इससे बड़ा दुर्भाग्य अयोध्या का क्या होगा कि सरयू आरती के लिए महीने का 15000 रुपए का प्रावधान किया गया था। आरती के लिए इससे ज्यादा रकम की जरूरत होने पर इन्तजाम भी प्रशासनिक अधिकारी आपस में चन्दा मिलाकर करते रहे हैं। हालांकि, अब इतना अच्छा है कि प्रतिदिन 1500 रुपए का प्रावधान प्रशासन ने कर दिया है। उम्मीद करनी चाहिए कि एक योगी के राज में अयोध्या को सीता के श्राप से मुक्ति मिल सकेगी।
(ये लेख QUINTHINDI में छपा है।) 

Friday, April 04, 2014

लाहौल विला कुव्वत, सेक्युलर वोट गायब हो रहा था!

ये जरूरी था। बताइए भारत जैसे देश से पूरी सेक्युलर कौम ही खत्म हो रही थी। क्या हिंदू, क्या मुसलमां। सब बौरा गए थे। सबने विकास की अफीम चाट ली है। सबको लगता है कि तरक्की मिले, जेब में रकम आए। अच्छा जी लें। अच्छे से रह लें। अरे इससे क्या होगा अगर भारत में हिंदू, मुसलमान की बात ही होना बंद हो जाए। बताइए हमारी यही तो ताकत है कि हम धर्मनिरपेक्ष देश हैं। और इसी आधार पर हमारे देश में एक धर्मनिरपेक्ष वोट बैंक तैयार हुआ। इतना मजबूत कि बरसों तो ढेर सारे सांप्रदायिक इस सेक्युलर वोटबैंक को टस से मस तक नहीं कर सके। सवा सौ साल पुरानी पार्टी का साथ भी था इन सेक्युलर वोटरों को। लेकिन, बुरा हो सांप्रदायिक ताकतों का। जिन्होंने लगके समझाना शुरू किया कि धर्मनिरपेक्ष होना ठीक नहीं है। धार्मिक बनाने लगे। बताओ भला हमें धर्म की चिंता सिवाय वोट के करने की जरूरत है क्या। ये हमारा भारत देश है। संविधान के आधार पर ही जब हम धर्मनिरपेक्ष देश हैं तो क्या बद्तमीजी है कि इसे वोट बटोरने के अलावा धार्मिक बनाने की। देश की अच्छी बात ये थी कि मुसलमानों ने हमेशा सांप्रदायिक ताकतों को हराने वाले का ही साथ दिया। पहले कांग्रेस थी, फिर सपा, बसपा और फिर जाने कौन-कौन मिले लेकिन, हमारे देश की संवैधानिक बुनियाद पर हमने कभी धर्मनिरपेक्षता को जरा सा भी कमजोर नहीं होने दिया। ढेर सारे हिंदू भी हमारे साथ थे। कुछ सांप्रदायिक हिंदुओं को छोड़कर। ये सेक्युलर हिंदू, मुसलमान मिलकर ऐसे मजबूती से धर्मनिरपेक्षता बचाते बढ़ते गए कि सांप्रदायिक ताकतों को हमने अछूत बना दिया। हमारा धर्मनिरपेक्ष संविधान किसी को ऐसे सांप्रदायिक होने की इजाजत नहीं देता। फिर भला ये संघी, भाजपाई ऐसी बदतमीजी क्यों करने पर तुले हुए हैं। और उस पर भी ये नरेंद्र मोदी।

बताइए भला ऐसे भी होता है क्या। जब भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जरिए ही अस्तित्व में है। और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर हमने पक्के तौर पर सांप्रदायिक होने का ठप्पा लगा दिया था। तो ये कैसे संभव है कि बीजेपी किसी भी तरह से सांप्रदायिक होने से खुद को बचा पाए। बताइए ये कोई तरीका है कि एक नरेंद्र मोदी जो संघ का प्रचारक रहा, खांटी स्वयंसेवक है। वो मंदिर, मस्जिद तोड़कर सड़क चौड़ी करने की बात कर रहा है। अधर्म की बात कर रहा है। वो कह रहा है कि विकास सबके लिए जरूरी है। सांप्रदायिक लोगों के लिए विकास होगा जरूरी। धर्मनिरपेक्ष लोगों के लिए विकास से ज्यादा जरूरी है कि मंदिर, मस्जिद बीच सड़क बने। धर्म दिखे लोगों को। बताओ भला ये मोदी जिसी पार्टी ने इसे इतना कुछ दिया उसके मूल सिद्धांतों से ही समझौता कर ले रहा है। अरे बड़ी मुश्किल से तो हम धर्मनिरपेक्ष लोगों ने भारतीय जनता पार्टी को ऐसा सांप्रदायिक बनाया कि उसी के विरोध से हमारे सेक्युलर वोट मजबूत हो रहे थे। चाहे जो हो जाए। पांच साल चाहे जो बात कर लें। चुनाव के समय सांप्रदायिक ताकतों को हराना ही हमारा सबसे बड़ा लक्ष्य रहा। हम उस लक्ष्य में पिछले छे दशकों से कामयाब भी थे। लेकिन, ये नरेंद्र मोदी क्या आया। 2002 के बाद ये हमारी उस सेक्युलर वोटबैंक की बुनियाद को मजबूत करने की वजह ही नहीं दे रहा। ये मोदी कहता है कि विकास करो। मजबूत सरकार बनाओ। अरे भइया ये सब तुम्हीं कर लोगे तो हम क्या करेंगे। हमें विकास ही करना होता तो छे दशक कम थोड़े ही होते हैं। और ये फालतू की बात है। इसमें बड़ी मेहनत लगती है। बिना ज्यादा मेहनत के सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने का फॉर्मूला जब हमने खोज लिया तो, भला हम कठिन विकास करके सांप्रदायिक ताकतों को हराने वाला फॉर्मूला क्यों आजमाने की सोचें। हम धर्मनिरपेक्ष लोगों को ज्यादा डर तबसे लगा जब हिंदुओं के आराध्य भगवान श्रीराम के मसले पर अदालत के फैसले पर भी सांप्रदायिक ताकतों ने उत्पात नहीं मचाया। उससे भी ज्यादा डर हमें तब लगने लगा जब दिखा कि ये तो सांप्रदायिक होने से ही मजबूती से मना करने लगे हैं। और हमारे सेक्युलर वोट भी उन सांप्रदायिक ताकतों के पाले में जाने लगे हैं।

और सबसे जरूरी बात। भारत के मुसलमानों तुम बाबरी मस्जिद से आगे जाने की सोचने लगे थे। वो भी सांप्रदायिक @narendramodi के भरोसे। उसका विकास भी तुम्हें लुभाने लगा है। अब बताते हैं हम तुम्हें, तुम्हारे भर चुके घावों को कुरेदेंगे, मिर्ची डालेंगे, हमारे सेक्युलर वोट, कम्युनल हो रहे थे। हम चुप कैसे बैठे रह जाते। याद करो बाबरी मस्जिद को, सेक्युलर हो जाओ, सेक्युलर वोट बन जाओ। आखिर कम्युनल, सेक्युलर की लड़ाई में सेक्युलर वोट ही न बचे तो हम किससे लड़ेंगे और कैसे जीतेंगे। एक बार सेक्युलर, कम्युनल हो जाए तो फिर देखो ये मोदी कैसे जीतता है। किसे याद रहेगा कि देश पिछले एक दशक में सबसे कम तरक्की कर रहा है। किसे याद रहेगा पिछले एक दशक में जो घोटाले हुए उससे छोटे-मोटे देश नए बनकर तैयार हो जाए। किसे याद रहेगा कि महंगाई ने पिछले तीन साल से जेब में छेद कर रखा है।

Friday, October 08, 2010

अयोध्या को इस नजरिए से देखिए

अयोध्या की विवादित जमीन श्रीरामजन्मभूमि है या नहीं- इस पर 30 सितंबर को आए अदालत के फैसले के बाद लगने लगा था कि देश सचमुच 1992 से काफी आगे बढ़ चुका है और अब इस मुद्दे पर राजनीति की संभावना बिल्कुल नहीं है। लेकिन, अयोध्या के एतिहासिक फैसले के चंद घंटों बाद ही धीरे-धीरे फिर से ये मसला साफ होने लगा कि देश भले ही 1992 से काफी आगे बढ़ चुका हो लेकिन, देश चलाने वाले या फिर इसे चलाने की चाह रखने वाले देश को इतना आगे जाने देने का मन नहीं बना पाए हैं। देर शाम तक धीरे-धीरे सदभाव वाले बयान तीखे होने लगे और ये साफ दिखने लगा कि फिलहाल अयोध्या के लिए सीता के श्राप से मुक्त होने का समय नहीं आया है। ये किंवदंती है कि जब सीता को अयोध्या छोड़ना पड़ा तो, उन्होंने कहाकि जो अयोध्यावासी उनके ऊपर हो रहे अन्याय के खिलाफ नहीं खड़े हो पा रहे हैं उन्हें समृद्धि-खुशहाली नहीं मिल सकेगी।

अब बार-बार जो ये कहा जा रहा है कि देश 1992 से बहुत आगे निकल चुका है यानी अब धर्म और मंदिर-मस्जिद के नाम पर कुछ नहीं होगा। अब मुद्दा विकास का है। और, नौजवान इस मुद्दे से भटकने को तैयार नहीं है। और, सच्चाई भी यही है कि अगर इसी नजरिए से अयोध्या को देखा जाए तो, इस विवाद का हल भी आसानी से निकल सकता है और सीता के श्राप से अयोध्या को मुक्ति भी मिल सकती है। अयोध्या विवाद की वजह से केंद्र और राज्य सरकार ने इस छोटे से कस्बे टाइप के शहर को छावनी बना रखा है। बावजूद इसके अयोध्या में ओसतन 10 से 12 लाख रामभक्त रामलला के दर्शन करने के लिए यहां चले आते हैं। लंबी सुरक्षा प्रक्रिया और रामलला का इतने सालों से कनात के मंदिर में रहना भी उनकी आस्था कम नहीं कर पा रहा है। लेकिन, सितंबर महीने में अयोध्या पर फैसले की तारीख ने ऐसी दहशत पैदी की कि सिर्फ डेढ़ लाख रामभक्त ही यहां आए। ये वो धार्मिक भक्त हैं जिनकी राम पर आस्था है। राम लला बिराजमान के अस्थायी मन्दिर के प्रधान पुजारी महंत आचार्य सत्येन्द्र दास बताते हैं कि सामान्य दिनों में राम लला के दर्शन को प्रतिदिन सात से आठ हजार लोग आते हैं और धार्मिक महत्व के दिनों में यह संख्या 15 हजार तक पहुंच जाती है।


अब सिर्फ अगर इस एक आंकड़े से बात को आगे ले जाएं और मान लें कि औसतन दस लाख लोग भी आम दिनों में अयोध्या में रामजन्मभूमि के दर्शन करने आते हैं तो, सितंबर में नौ लाख चालीस हजार भक्त अयोध्या नहीं आ पाए। और, अगर एक आने वाले रामभक्त का अयोध्या में खर्च एक हजार रुपए भी मान लें तो, सितंबर महीने के तनावपूर्ण माहौल में अयोध्या को नुकसान हुआ करीब सौ करोड़ रुपए का। जो, अयोध्या के फूल वाले से लेकर मंदिर के चढ़ावे तक में जाता। ये दस लाख भक्त भी वो हैं जो, अयोध्या के आसपास के इलाकों से यानी उत्तर प्रदेश और उससे सटे राज्यों से आने वाले भक्तों की संख्या है।

ये तब है जब अभी अयोध्या को भारतीयों की पर्यटन स्थल सूची में बहुत नीचे जगह मिल पाती है। यहां तक कि उत्तर प्रदेश का हिंदू भी जब धार्मिक यात्रा की योजना बनाता है तो, उसकी सूची में वैष्णो देवी, तिरुपति बालाजी, शिरडी जैसे मंदिर ऊपर की सूची में रहते हैं। बाहर के टूरिस्ट फिर चाहे वो धार्मिक यात्रा पर हों या सिर्फ घूमकर भारत देखने के मूड में उनकी लिस्ट में तो अयोध्या बिल्कुल ही नहीं रहता है। ये तब है जब इस देश में सर्व सहमति से अगर किसी एक भगवान पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वालों की बात हो तो वो संभवत: राम ही होंगे।

जाहिर है रामराज्य के जरिए यानी राममंदिर के दर्शन के लिए आने वाले भक्तों के जरिए अयोध्या के विकास की नई कहानी लिखी जा सकती है। राममंदिर के निर्माण के साथ इस शहर की तकदीर बदल सकती है। और, ये तकदीर सिर्फ हिंदुओं की नहीं बदलेगी। रामलला के कपड़े पिछले दस सालों से अयोध्या को दोराही कुआं इलाके के सादिक अली सिलते हैं। वो, कहते हैं कि रामलला को पहनाए जाने वाले कपड़े उनके हाथ के सिले हैं ये उनके लिए गर्व की बात है। क्योंकि, राम तो सबके हैं। शहर में खड़ाऊं बनाने से लेकर मूर्तियां बनाने तक के काम में हिंदुओं के साथ मुस्लिमों की भी अच्छी भागीदारी है। अयोध्या एक ऐसा शहर है जो, हिंदुओं के लिए भगवान राम की जन्मभूमि की आस्था है तो, अवध के नवाबों की विरासत भी ये शहर समेटे हैं लेकिन, फिर भी ये शहर वीरान है तो, इसकी सबसे बड़ी वजह ये विवाद ही है।

अयोध्या में अवध शासकों के समय के कई मुस्लिमों के महत्व के स्थानों के साथ 3000 से ज्यादा मंदिर हैं। निर्मोही, निरंजनी, निर्वाणी, उदासीन, वैष्णव सहित लगभग सभी अखाड़ों के यहां बड़े ठिकाने हैं। शहर में दस हजार से ज्यादा साधु हमेशा रहते हैं। लेकिन, इतनी विविधता और बताने-दिखाने की समृद्ध विरासत होने के बावजूद इस शहर के लोग बेकारी, कम आमदनी से जूझ रहे हैं। अयोध्या के रास्ते में कुछ चीनी मिलों की बदबू यहां आने वाले को भले ही बड़ी इंडस्ट्री के होने का भ्रम पैदा करे लेकिन, सच यही है कि अयोध्या में चीनी मिलों के अलावा कोई ऐसी इंडस्ट्री भी नहीं है जहां 100 लोगों को भी रोजगार मिला है। किसी बड़ी कंपनी का शोरूम नहीं है। मनोरंजन का कोई साधन नहीं है। अयोध्या शहर की बाजार कस्बों से बदतर नहीं तो बेहतर भी नहीं है। शहर के लोगों की औसत महीने की कमाई 100 रुपए से ज्यादा नहीं है।

देश में शायद ही किसी को अयोध्या का दशहरा या दिवाली याद आता हो। लोगों को पता भी नहीं है कि अयोध्या में दिवाली दशहरा मनाया भी जाता है या नहीं। मैं इलाहाबाद से हूं और वहां दशहरे के दस दिनों में शहर के हर मोहल्ले की चौकी देखने का अलग ही आकर्षण होता है। पूरा शहर उल्लास में होता है। दिल्ली से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में होने वाली रामलीलाएं भी चर्चा का वजह बनती हैं। लेकिन, दशहरा-दिवाली में भी इस शहर में उत्साह नहीं होता है। जबकि, राम, रावण पर विजय हासिल करके लौटे तो इसी अयोध्या ही थे। फिर अन्याय पर न्याय की विजय के इस महापर्व में इस शहर को जरा भी जगह क्यों नहीं मिल पा रही है। अब सारा मामला यही है कि आस्था से भले ही कानूनी फैसले न होते हों और तथाकथित आस्थावान लोग भले ही आस्था और न्याय को पूरी तरह से ध्यान में रखकर दिए कानून के फैसले को मानने को तैयार न हों। लेकिन, रास्तो तो यही मानना पड़ेगा। भले ही दोनों पक्षों की आस्था कुछ भी कहती हो।

बार-बार ये बात होती है कि देश बहुत आगे निकल गया है। देश के कई राज्यों के चुनाव नतीजे आने के बाद राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक भी ये कहते अकसर दिखते रहे कि अब विकास पर ही चुनाव जीता जा सकता है। विकास ही नेता को बड़ा बनाएगा। अभी भी पिछड़े राज्यों के अगुवा उत्तर प्रदेश के लिए भी जरूरी है कि धार्मिक-जातिगत आधार पर नहीं, विकास के आधार पर मुद्दे तय हों। और, अयोध्या को रामजन्मभूमि एक उच्च अदालत ने मान लिया है। उसे आधार बनाकर समृद्ध अयोध्या और उसके जरिए अयोध्या से सटे उत्तर प्रदेश के कई जिलों के विकास की कहानी लिखी जा सकती है।
(ये लेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपा है)

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