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Tuesday, October 30, 2012

चरित्र निर्माण की शाखा नए सिरे से लगानी होगी


ये बात हमेशा सच साबित होती है कि और एक बार फिर तथ्यों के साथ साबित हो रही है कि किसी भी घटना का बीज कभी न कभी पड़ता है तभी आगे जाकर वो बड़ा पौधा बन जाता है। पार्टी विद् डिफ्रेंस का दावा करती रही भारतीय जनता पार्टी आजकल अजीब स्थिति में है। सबसे ज्यादा ईमानदारी, चरित्र, शुचिता के दावे वाली इस पार्टी की मुश्किल ये हो रही है कि जब देश में लंबे अर्से के बाद आंदोलन का माहौल है और सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम ताकतवर हो रही है तो, इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे हैं। बड़ी मुश्किल की बात ये है कि ये राष्ट्रीय अध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी को शुचिता, चरित्र, त्याग और ईमानदारी की शिक्षा देने वाले मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रिय होने की वजह से पद पर आसीन हुआ माना जाता है।

जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बागडोर संघ के पहले सरसंघचालक डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार की तरह दिखने वाले मोहनराव भागवत ने संभाली थी तो, लगा था कि पार्टी नई उर्जा से पुराने आदर्शों को फिर से लौटा पाएगी। पार्टी बुजुर्ग हो चुकी भारत मां की तीन धरोहर अटल-आडवाणी-मुरली मनोहर की तिकड़ी के सहारे आगे बढ़ती नहीं दिख रही थी। अटल बिहारी बाजपेयी बीमार थे, मुरली मनोहर संगठन में अलग-थलग थे क्योंकि, आडवाणी बुजुर्गियत के बावजूद अपनी तैयार की हुई पौध के जरिए पार्टी चला रहे थे। उस समय पहली बार किसी सरसंघचालक ने बीजेपी से जुड़े मुद्दों पर मीडिया में उतने खुले तौर पर अपनी बात रखी थी। बीजेपी को हम निर्देश नहीं देते हैं ये कहने के बावजूद बार-बार मोहन भागवत पार्टी को ये बताते रहे कि बीजेपी अब बुजुर्ग हो चुके आडवाणी के भरोसे नहीं चलने वाली। जिन्ना पर बयान देकर आडवाणी संघ की अच्छी सूची से ऐसे ही बाहर हो चुके थे। ऐसे में उम्र और ऊर्जा का हवाला देकर उन्हें अभिभावक की भूमिका में लाकर संघ के निर्देशों के आधार पर काम करने वाले अध्यक्ष की तलाश संघ की महाराष्ट्र के रोड, फ्लाईओवरमैन टाइप कहे जाने वाले नितिन गडकरी पर जाकर खत्म हुई। शुरू में लगा संघ का काम पूरा हो गया है। गडकरी की एक कमी उनकी काया की थी तो, वो गडकरी ने ऑपरेशन के जरिए ठीक कराने की कोशिश भी कर ली जो, काफी हद तक सफल भी रही। लेकिन, कारोबारी गडकरी पार्टी को भी कारोबार की तरह चलाने लगे जिसके दुष्परिणाम अब साफ-साफ दिखने लगे हैं।

गडकरी के पहले भी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को रिश्वत लेते कैमरे पर देश ने देखा लेकिन, पार्टी के खिलाफ कोई माहौल नहीं बना। बंगारू लक्ष्मण की एक लाख रुपए की रिश्वत की रकम और बंगारू को पार्टी ने अध्यक्ष पद से हटाकर उसे काफी हद तक मुक्ति पा ली। और, बंगारू सिर्फ नागपुर के आशीर्वाद से अध्यक्ष पद पर नहीं थे। लेकिन, इस बार मामला जरा अलग है। नितिन गडकरी सिर्फ नागपुर के ही आशीर्वाद से अध्यक्ष हैं इसमें अब जरा सा भी बहस की गुंजाइश नहीं दिखती। और, इसमें कोई संदेह भी नहीं है कि बीजेपी में उसके मूल संगठन संघ के आशीर्वाद के बिना किसी का खड़े, लड़े रह पाना संभव भी नहीं है और शायद होना भी नहीं चाहिए। अटल-आडवाणी की ताकत भी संघ ही था। और, ये ताकतवर आशीर्वाद बना रहे इसके लिए नितिन गडकरी ने हरसंभव कोशिश भी की। दिल्ली में पार्टी कार्यालय नए सिरे से संवर रहा है। आडवाणी की दिल्ली दरबार की मंडली को काफी हद तक किनारे कर दिया। जो, शायद जरूरी भी हो गया था। लेकिन, इस मंडली के मुख्य प्रभावी भूमिका से हटने के बाद जो, नई ऊर्जा, कार्यकर्ताओं को मुख्य प्रभावी भूमिका में आना था वो, भी नहीं आ पाए। नितिन गडकरी ने संघ के प्रचारक और मोदी विरोध की वजह से हाशिए पर पड़े अच्छे संगठनकर्ता संजय जोशी को मुख्य भूमिका में लाकर संघ को और खुश कर दिया। उत्तर प्रदेश में उमा भारती की वापसी और बड़ी-बड़ी बातों से ये माहौल पैदा कर दिया कि अब यूपी में संघ/बीजेपी कैडर वापस आ रहा है। उमा की वापसी तो, कराई लेकिन, उमा को अधिकार नहीं दिए। गडकरी खुश थे कि उत्तर प्रदेश के सारे बड़े नेता अपनी सीटों के चुनाव में फंस गए। और, हुआ भी यही इन सारे नेताओं ने येनकेन बस अपनी सीट जीतने तक ही अपने कर्तव्य की इतश्री समझ ली। और, नितिन गडकरी ने इन बातों के बीच यूपी में चुनाव जीतने की रणनीति ठेकेदारों जैसी बना ली। यूपी को कई हिस्सों में बांटा और छोटे-छोटे ठेके सीट जिताने का भरोसा लेकर बांट दिए। फिर क्या अपराधी, क्या भ्रष्टाचारी सब ठेका हासिल कर चुके थे। यहीं आकर समझ में आ गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नितिन गडकरी पर लगाया दांव सही नहीं है। उत्तर प्रदेश के नतीजों ने इस पर मुहर लगा दी। भारतीय जनता पार्टी को मतदाताओं ने लड़ाई में कहीं देखा ही नहीं। अलग होने का दावा तो, पहले से ही भोथरा हो चुका था। सीटों का अर्धशतक तक नहीं लग पाया।

यही उत्तर प्रदेश था जहां से पार्टी केंद्र की राजनीति साधने का भरोसा पा चुकी थी। यही उत्तर प्रदेश था जहां से अटल बिहारी बाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी केंद्रीय राजनीति में कद्दावर थे। इसी उत्तर प्रदेश से बीजेपी के उत्थान के बीज पड़े थे। और, इसी उत्तर प्रदेश की एक घटना याद करने पर मुझे आज की बीजेपी की समस्या की जड़ समझ में आ जाती है। मुझे कुछ लोगों ने नब्बे के दशक की ये घटना बताई थी। ये कितनी सच है पता नहीं लेकिन, इसके बहाने इस मूल समस्या की समझ भले आ जाती है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ भवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर प्रमोद महाजन आए हुए थे। प्रमोद महाजन उस समय भारतीय जनता पार्टी के तेजस्वी नेताओं में थे। जाहिर है ऐसे तेजस्वी नेता से जल्द से जल्द हर कोई संबंध बना लेना चाहेगा। बीजेपी की एक महिला पदाधिकारी ने प्रमोद महाजन से अपना परिचय दिया। उन्होंने पूछा आप क्या करती हैं। महिला पदाधिकारी ने कहा- पार्टी में इस दायित्व पर हूं। प्रमोद महाजन ने फिर से पूछा- वही जवाब। तो, उन्होंने पूछा राजनीति के अलावा क्या कारोबार करती हैं। उन्होंने कहा फुलटाइम पार्टी की सेवा करती हूं। तो, प्रमोद महाजन ने कहा- अगर खाने-कमाने का अलग से इंतजाम नहीं है तो, आप पार्टी से ही खाएंगी। उस समय प्रमोद महाजन का ये उद्बोधन असर कर गया था। लगता था कि इसीलिए ये नेता इतना ऊपर है। लेकिन, ये सच है कि प्रमोद महाजन जैसे नेताओं ने एक ऐसी पौध तैयार की जिसमें संसाधन के जरिए जनता को साधने की रणनीति तैयार की गई। और, संसाधन के जरिए जनता को साधने की ये रणनीति तो, बीजेपी को शाइन नहीं दे पाई है ये सबने देखा है।

प्रमोद महाजन दुनिया में नहीं हैं इसलिए उनकी आलोचना करने की कोई वजह नहीं है। लेकिन, प्रमोद महाजन जैसे नेता तभी तेजस्वी थे जब मुख्य भूमिका में घोर राजनीतिक तपस्या वाले स्वयंसेवक थे। अगर कारोबारी स्वयंसेवक सत्ता के केंद्र में आए तो, समाज सुधारने का संकट खड़ा हो जाएगा। बीजेपी में दरअसल ज्यादातर लोगों को करीने से सजे प्रमोद महाजन और उनकी फंड के जरिए पार्टी चलाने की कला इतनी पसंद आई कि वो, प्रमोद महाजन के दूसरे राजनीतिक संघर्षों, कार्यों को भूल गए। हर कोई प्रमोद महाजन बनने चला और प्रमोद महाजन नीचे से नीचे वाला संस्करण तैयार होता रहा। राजनीतिक प्रमोद महाजन तो, कोई तैयार ही नहीं हो पाया। और, अटल-आडवाणी-जोशी तो, भला कहां से तैयार हो पाते। जाहिर है ऐसे में पार्टी तो, बहुत पीछे छूट जाएगी।

आडवाणी जी बुजुर्ग हो गए हैं लेकिन, सत्ता मोह नहीं छूट रहा। आडवाणी जी खुद प्रधानमंत्री बनने के लिए अपनी डी 4 मंडली के आगे अच्छे कार्यकर्ताओं की जायज मांग, इच्छा को भी पीछे कर देते हैं। आडवाणी जी बहुत कुछ किए लेकिन, अब पार्टी का नुकसान कर रहे हैं। यही सब तो, वजह थी न जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नितिन गडकरी को राज्य से उठाकर राष्ट्रीय नेता बना दिया था। तो, आखिर जब पार्टी ही गलत राजनीतिक रास्ते पर चल पड़ी है तो, किसी ऐसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक को संघ क्यों नहीं बढ़ा पा रहा। जो, पार्टी ठीक कर सके। जरूरी ये है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नए सिरे से चरित्र निर्माण की शाखा लगाना शुरू करे। 2012-14 जैसे सालों की समयसीमा रखकर लक्ष्य न बनाए।

Tuesday, October 23, 2012

एक विचार

अटल-आडवाणी-जोशी दरअसल संघ के स्वयंसेवक पहले थे। बीजेपी नेता बाद में। शुरुआती विरोध के बाद सर्वस्वीकार्य हो गए। क्या संघ अपने किसी ऐसे स्वयंसेवक को प्रचारक के तौर पर बीजेपी में नहीं निकाल सकता जिसने दरअसल त्याग का जीवन जिया हो। बेदाग हो और कम से कम 2 पीढ़ियों से जिसका ठीक संवाद हो और आगे की एक पीढ़ी से तरीके से संवाद करने लायक हो। रकम से राजनीति होती है इसे ध्वस्त करने वाला हो। ये स्थापित कर सके कि राजनीति ठीक रही तो, रकम तो, आती ही रहती है।

Friday, September 30, 2011

जल्दबाजी मोदी को भारी पड़ेगी?


नरेंद्र मोदी के उपवास के दौरान लालकृष्ण आडवाणी
 गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में अब तक जो, दिखता रहा है कि वो, हर फैसला बड़ा सोच-समझकर लेते हैं। इसी से ताकतवर भी हुए। लेकिन, अब लालकृष्ण आडवाणी का ये विरोध नरेंद्र मोदी के लिए बड़ी मुसीबत बनता दिख रहा है। इतनी हड़बड़ी ठीक नहीं। दिल्ली फिर दूर हो जाएगी।

और, सबसे बड़ी बात ये है कि नरेंद्र मोदी को ये समझना होगा कि अगर उन्हें 6 करोड़ गुजरातियों से आगे बढ़कर 120 करोड़ से ज्यादा हिंदुस्तानियों का नेता बनना है तो, उस अंतर के लिहाज से व्यवहार करना होगा। अगर ये अंतर नरेंद्र मोदी की समझ में नहीं आया तो, बस गुजरात को परिवारों को घूमने की जगह या फिर ऑटो हब बनाकर ही खुश रहना होगा।

नरेंद्र मोदी को तो, वैसे भी अच्छे से पता है कि विद्रोही तेवर दिखाने वाले भाजपाई नेता कितने भी बड़े हों। उनका हश्र क्या होता है। कुछ को तो, उन्होंने ही निपटाया है। और, उन्हें ये तो, अच्छे से पता होगा कि निपटा इसीलिए पाए कि पार्टी उनके साथ थी। एक जमाने के दिग्गज कल्याण सिंह आज जबरन ये बयान देते घूम रहे हैं कि वो, बीजेपी में किसी कीमत पर नहीं लौटेंगे। वो, ये नहीं बता पाते कि कीमत देने के लिए उन्हें खोज कौन रहा है। या उनके पास कीमत देने गया कौन था। कल्याण उस वक्त देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री थे और नरेंद्र मोदी से ज्यादा बड़े हिंदू हृदय सम्राट थे। उमा भारती तो, मध्य प्रदेश तक में जाकर बीजेपी की सरकार बनवा आईं थीं। आखिरकार उन्हें पार्टी की गति से ही चलते हुए लौटना पड़ा।

और, ये नरेंद्र मोदी और बीजेपी के हित में होगा कि ऐसी नौबत न आए कि मोदी की तुलना कल्याण, उमा (जैसे वो बाहर गई थीं) के साथ हो। अभी मोदी को शांत रहने की जरूरत थी। मोदी ने जिस तरह से उपवास के दौरान सबको छोटा दिखाने की कोशिश की वो, किसी को कैसे पचेगा। जबकि, आडवाणी अब कितने दिन। ये समझकर मोदी को फैसला लेना चाहिए। आडवाणी के बाद बीजेपी की स्वाभाविक पसंद वो बन जाते। और, ऐसे समय में नरेंद्र मोदी की ये राजनीति नीतीश कुमार जैसे लोग और बीजेपी में कम जनाधार वाले आडवाणी के पीछे घूमने वाले नेताओं की राजनीति चमकाने में मददगार होगी। क्योंकि, चमत्कार हो जाए और अभी सरकार गिरे, जो होने वाला नहीं है, तो, भले आडवाणी पीएम इन वेटिंग स प्रधानमंत्री बन पाएं। 2014 तक तो, उनकी दावेदारी किसी सूरत में नहीं बचेगी। और, ये बात नरेंद्र मोदी और उनके सभी शुभचिंतकों को समझना होगा।

क्योंकि, ये महज संयोग नहीं हो सकता। नरेंद्र मोदी और लालकृष्ण आडवाणी के बीच जंग काफी समय से चल रही है। अभी लोकसभा चुनाव को दो साल से ज्यादा बचे हैं। पिछली बार भी 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले गुजरात के चुनाव के समय ही ये घोषणा हो गई थी कि लालकृष्ण आडवाणी प्रधानमंत्री पद के दावेदार होंगे। और, करीब पांच साल बाद फिर वैसा ही दृष्य है। गुरु गुड़ रह गए चेला चीनी हो गया की देसी कहावत चरितार्थ होती दिख रही है।

Saturday, September 10, 2011

और, किसी में दम भी तो नहीं?

सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्रा के दौरान आडवाणी के साथ अटल, गोविंदाचार्य और कल्याण सिंह
भ्रष्टाचार के खिलाफ लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा को पीएम बनने का आखिरी दांव मान रहे हैं। काफी हद तक सही भी है। लेकिन, बड़ी सच्चाई ये है कि बीजेपी में आडवाणी के अलावा कोई ऐसा राष्ट्रीय नेता भी तो नहीं है जो, पूरे देश में एक समान दमदारी से रथयात्रा कर सकता हो। इस बार की रथयात्रा की भी असली परीक्षा उत्तर प्रदेश में ही होगी। वैसे, अच्छी खबर ये है कि उमा भारती लौट आईँ हैं और अपने पिता समान आडवाणी की रथयात्रा को सफल बनाने के साथ अपनी राजनीतिक जमीन सुधारने की भी बड़ी चुनौती उनके सामने होगी।

लेकिन, अब कई मुश्किले हैं। प्रमोद महाजन नहीं हैं। अटल बिहारी वाजपेयी नहीं जैसे ही हैं। गोविंदाचार्य होते हुए भी नहीं हैं। और, कल्याण सिंह हैं भी तो, उल्टे हैं। कौन चलेगा इस बार आडवाणी के साथ। राज्यों में मंच पर कौन से नेता होंगे जो, दहाड़ेंगे। आडवाणी के अलावा किसकी शक्ल देखकर बीजेपी कार्यकर्ता या आम जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में पूरे मन से जुटेगी। कई सवाल हैं। देखिए, इनके जवाब रथयात्रा के बाद कैसे आते हैं।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...