Friday, July 26, 2013

राहुल गुस्सा क्यों कम करना चाहते हैं?

राहुल गांधी ने अमेठी में बड़ी अच्छी अच्छी बातें बोली हैं। गुस्सा बुरी बात है। गुस्सा करना ठीक नहीं है। उन्होंने अच्छी बातें करते हुए ये भी कहा कि नौजवानों को मौका मिलना जरूरी है। राहुल ये भी बोल गए कि पंजाब में कांग्रेस और अकालियों ने नौजवानों को बड़े मौके दिए और उससे राज्य के साथ नौजवानों की भी तरक्की हुई। बड़ी अच्छी बातें कही हैं राहुल गांधी ने। लेकिन, राहुल गांधी के साथ बड़ी विडंबना है। अब सोचिए वो अमेठी में पंजाब के नौजवानों का भला याद कर रहे हैं और इसमें भी कोई एतराज नहीं लेकिन, वो पंजाब में भी कांग्रेस के साथ अकालियों के अच्छे काम को नौजवानों की तरक्की के लिए बेहतर बता रहे हैं। क्या राहुल गांधी 1984 के बाद ये कल्पना भी कर सकते हैं कि कांग्रेस और अकाली समीकरण साथ काम कर सकते हैं। खैर, इस कपोल कल्पना पर ध्यान देने की इच्छा मेरी नहीं है। मेरी इच्छा दरअसल राहुल गांधी की इस बात को समझने की है कि वो गुस्सा करने से मना क्यों कर रहे हैं और गुस्से वाले नौजवान को वो बिना गुस्से के ही भला आदमी क्यों मान रहे हैं।

सवाल ये भी है कि वो अचानक ये क्यों कह रहे हैं कि गुस्सा लोगों में भरा जा रहा है और गुस्सा ठीक नहीं है।बड़ी जायज बात कही है राहुल गांधी ने। गुस्सा ठीक नहीं होता और अगर गुस्सा सरकार के खिलाफ हो। सरकार में बैठे लोगों के खिलाफ हो तो बिल्कुल ठीक नहीं होता। सही भी है कि गुस्सा होगा और नौजवान को होगा तो मुश्किल किसे होगी। जाहिर है जिससे नौजवानों की उम्मीदें पूरी नहीं हो रही होंगी। और, वो उम्मीदें सत्ता में बैठे लोग ही बंधाते हैं। 2004 में जब यूपीए सत्ता में आया तो देश के नौजवानों को बड़ी उम्मीदें बढ़ीं थीं। वजह साफ थी 90 के दौर में पी वी नरसिंहाराव की सरकार के चमत्कारिक वित्त मंत्री मनमोहन सिंह सोनिया गांधी के त्याग के बाद प्रधानमंत्री बन रहे थे। देश के नौजवानों के मन में गुस्सा नहीं तब उम्मीदें थीं। उम्मीद इस बात की थी कि दुनिया के दरवाजे उनके लिए खुल जाएंगे। हर मौके पर पहला अधिकार उन्हीं का होगा। ये उम्मीद ऐसी थी कि 2008 की मंदी के बाद भी 2009 में बीजेपी के लौह पुरुष और प्रधानमंत्री पद के दावेदार लाल कृष्ण आडवाणी के मनमोहन को बेहद कमजोर बताने के बाद भी लोगों का भरोसा यूपीए 2 के लिए बन गया। अब यूपीए 3 की जमीन टूटी दिख रही है। यूपीए 2 के आधे से नौजवान सड़कों पर आ गया। गुस्से में है। कभी अन्ना तो कभी अरविंद के साथ सड़कों पर सरकार के खिलाफ गुस्सा दिखाया। 
गुस्सा ऐसा हो गया कि 16 दिसंबर की बलात्कार की घटना के बाद नौजवान रायसीना हिल्स पर ऐसे चढ़ गया जैसे दुश्मन देश की चोटी फतह करने जा रहा हो। ये गुस्सा सत्ता को डराता है। और इसी गुस्से को अपनी बनाई उम्मीदें दिखाकर नौजवानों के गुस्से को साधने की कोशिश में नरेंद्र मोदी भी लग गए। उनको दिख गया कि भ्रष्टाचार एक समय के बाद तो सबको स्वीकार हो जाता है। बस नौजवान ही इसे स्वीकार नहीं करता। क्योंकि, नौजवान भ्रष्टाचार से खटता है लेकिन, उस भ्रष्टाचार के खाने में वो हिस्सेदार नहीं होता। देश के नौजवान के सामने अर्थशास्त्र का मनमोहक सिद्धांत भी बिखर चुका है। न जेब में पैसे हैं न अच्छी नौकरी से जेब में पैसे आने का कोई भविष्य दिख रहा है। नौजवान गुस्साएगा ही। लेकिन, गुस्साएगा तो सत्ता को खतरा होता है। राहुल गांधी की पार्टी सत्ता में है। राहुल सत्ता के शीर्ष पर हैं। भले प्रधानमंत्री न हों। इसलिए राहुल अब कह रहे हैं कि गुस्सा ठीक नहीं है।

अब राहुल गांधी बांह चढ़ाकर गुस्साने की बात नहीं करते। क्योंकि, राहुल समझ गए हैं कि गुस्सा बढ़ाने की उनकी नीति उनकी ही सत्ता के खिलाफ जा रही है। इसीलिए अब कह रहे हैं कि गुस्सा मत करिए। अभी किसी राज्य सरकार के खिलाफ गुस्से का मसला भी नहीं है। राहुल को पता है कि गुस्सा और वो भी नौजवानों का गुस्सा 2014 पर भारी पड़ सकता है। और, इस मुद्दे को बढ़ाने का कोई मौका नरेंद्र मोदी वाली बीजेपी छोड़ने वाली नहीं है। इसीलिए नौजवान के इस गुस्से को अच्छा या खराब बताने के दोनों ही रास्ते सत्ता पाने या सत्ता गंवाने की तरफ जाते हैं। इसीलिए नरेंद्र मोदी केंद्र सरकार को हर मौके पर गरियाकर ये जताना बताना चाहते हैं कि सत्ता में बैठे लोग चाहते तो नौजवानों की उम्मीद बढ़ती लेकिन, वो काम ऐसा कर रहे हैं कि गुस्सा बढ़ाने की जरूरत है। गुस्सा बढ़ाइए सत्ता में मुझे बैठाइए और फिर मैं उम्मीद बढ़ाऊंगा।

Monday, July 01, 2013

आंकड़ों का जादू चलेगा या नरेंद्र मोदी का

543 ये वो आंकड़ा है जिसके आधार पर एक बात बार-बार आसानी से स्थापित हो जाती है। वो ये कि इस देश के एक बड़े भूभाग में लगभग शून्य की स्थिति में होने की वजह से भारतीय जनता पार्टी या फिर उसके कितने भी करिश्माई नेता के लिए दिल्ली की गद्दी पर काबिज होना संभव नहीं है। आज की तारीख में बीजेपी मतलब नरेंद्र मोदी समझें तो ये 543 का आंकड़ा और भयावह दिखने लगता है। राजनीतिक जानकार शुरुआत देश के निचले इलाके से करते हैं और पूरब की तरफ बढ़त हुए केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों का जिक्र करके आसानी से साबित कर पाते हैं कि यहां भारतीय जनता पार्टी किसी भी हाल में लड़ाई की स्थिति में न आ पाती है और आती दिख रही है। उसमें एक ताजा वाजिब तर्क ये जुड़ जाता है कि दक्षिण के बीजेपी के प्रवेश द्वार कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी चरमकाल से क्षरणकाल की ओर बढ़ी है जिससे अब पहले आई सीटें आधी रह जाएं तो कोई अचरज नहीं। महाराष्ट्र की बात करें तो, शिवसेना-महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का घरेलू बंटवारा रिश्ते में आए बीजेपी के लिए वोट बांटने का काम और करेगा।

मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ में लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और वहां सत्ता विरोधी समीकरण लोकसभा चुनावों पर भी काम करेगा। अभी इन दोनों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी के पास जितने सांसद हैं वो अधिकतम हैं तो जाहिर है कि इसका भी नुकसान बीजेपी को ही होगा। और, बीजेपी मतलब इस समय वैसे ही नरेंद्र मोदी हैं जैसे किसी समय अटल-आडवाणी हुआ करते थे। बिहार में नीतीश नरेंद्र मोदी के मुद्दे पर छोड़ गए तो जाहिर है कि सेक्युलर नीतीश कुमार को इसका फायदा होगा और बीजेपी की सीटें पहले से घटेंगी। झारखंड में भ्रष्टाचार का मुद्दा बीजेपी के खिलाफ जाएगा। उत्तर प्रदेश की बात करें तो, नए नेता बीजेपी में बने नहीं और पुराने नेता जितना भी मिले उनको मिले के लिए लड़ रहे हैं। उस पर उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और मायावती का मजबूत जातिवादी वोटबैंक नरेंद्र मोदी के करिश्मे को खाक कर देगा। यानी उत्तर प्रदेश में भी नरेंद्र मोदी वाली बीजेपी गई काम से। तर्क ये भी कि अयोध्या अब किसी को अपील नहीं करता। और, अगर बीजेपी ध्रुवीकरण की कोशिश करेगी तो इसका भी नुकसान बीजेपी को होगा क्योंकि, मुसलमान एकजुट होकर बीजेपी के खिलाफ वोट करेगा।
गुजरात गौरव नरेंद्र मोदी जितना वहां हैं उससे ज्यादा अब संभव है नहीं। 26 सांसदों वाले गुजरात में पहले से ही बीजेपी के 17 सांसद हैं। अगर 2-4 और बढ़ गए या पूरी 26 भी बीजेपी को मिल गई तो भी बीजेपी 1998-99 वाला करिश्मा दोहराती नहीं दिख रही है। बीजेपी ने 1998 में 25.6% वोट के साथ 182 सीटें हासिल की थीं और इसी स्तर पर 1999 में 23.7% वोट के साथ रही। 2009 में बीजेपी 18.8% वोट के साथ सिर्फ 116 सीटों पर रह गई। अब यहीं से मेरा तर्क नरेंद्र मोदी वाली बीजेपी के पक्ष में जाने लगता है। सबसे पहले तो ये तथ्य कि इस देश में मतदान का प्रतिशत लगभग 60 के आसपास ही होता है। जब कोई लहर होती है तो, वोटिंग प्रतिशत 60 के ऊपर चला जाता है नहीं तो 56 से 58 प्रतिशत के बीच रहा है। 1977, 84, 89, 91 और फिर 1998 में वोटिंग प्रतिशत 60 के ऊपर गया। यानी 2009 इस लिहाज से मतदाताओं को प्रेरित करने वाला चुनाव नहीं रहा। 2009 में ही बीजेपी का वोट प्रतिशत 98 के उच्चतम स्तर से करीब 6 प्रतिशत कम रहा। तो इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि बीजेपी अपना वोट में 6 प्रतिशत का इजाफा कर सकती है। ये इजाफा होने की दो ही मुख्य वजहें होती हैं। पहला देश में अभी की जो सरकार है उसके खिलाफ लोगों में इतना गुस्सा भर जाए कि वो इसे उखाड़ फेंकने की तैयारी कर लें। दूसरा जो विकल्प दिख रहा हो उस पार्टी और उसके नेता में लोगों का भरोसा उतना ही हो कि वो सत्ता उखाड़ फेंकें तो, विकल्प में जो नेता दिख रहा है उसे सौंपने का भी मन बना लें। मुझे नहीं लगता कि पहली वजह अच्छे से तैयार है इस पर किसी को भी संदेह होगा। अब बात दूसरी वजह की। उत्तराखंड की राष्ट्रीय आपदा- भले इसे सरकार घोषित न करे- में जिस तरह से नरेंद्र मोदी ने काम किया वो, दूसरी वजह को और मजबूत बनाती है। भले ही नरेंद्र मोदी की पीआर एक्सरसाइज में लगी कंपनी या फिर उनके उत्साही समर्थकों ने पंद्रह हजार गुजरातियों को एक झटके में आपदामुक्त करने के मोदी के काम को रैंबो एक्ट बनाकर विवादित कर दिया। लेकिन, जैसे-जैसे इस मुद्दे पर विवाद बढ़ा और मामला साफ हुआ तो, कुछ बातें जो साफ होकर आईं वो मोदी के पक्ष में ही जाती दिख रही हैं। पहली बात ये कि नरेंद्र मोदी ने उत्तराखंड पर खुद कभी राजनीति नहीं की। छनकर जो खबरें आईं उसमें उन्होंने अपनी पार्टी के उत्तराखंड के नेताओं को इस मुद्दे पर राजनीति के लिए डांटा भी। दूसरा उन्होंने इस आपदा पर कभी खुद कोई दावा नहीं किया। तीसरा जिस तरह से वो आपदा की जानकारी के दूसरे ही दिन अपनी पूरी मशीनरी के साथ वहां पहुंचे और उत्तराखंड के सोते-जागते दिखने वाले मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को साथ रखकर राहत काम की अगुवाई की वो, एक शानदार नेता की तस्वीर तैयार करती हैं। गुजरात में बड़ा बढ़िया विकास करते हैं। भुज को भूकंप के बाद तेजी में फिर से खड़ा कर दिया इसकी कहानियां नरेंद्र मोदी के लिए अच्छी बुनियाद तैयार कर चुकीं हैं लेकिन, बात आगे बढ़ने में यही रोड़ा बन रहा था। लोग विरोधी तर्क पेश कर रहे हैं कि देश गुजरात नहीं है। लेकिन, पहाड़ पर आई अब तक की सबसे भयानक आपदा में नरेंद्र मोदी ने जिस तरह नेतृत्व किया और उसके बाद कांग्रेस की बौखलाहट साफ दिखाती है कि नरेंद्र मोदी अपना काम कर गए।
और इसी आधार पर मैं मानता हूं कि ऊपर जिस 543 के आंकड़े से मैंने लेख की शुरुआत की है। उसकी बजाए 272 के आंकड़े पर बात करें तो तस्वीर व्यहारिक दिखेगी। पहले उन राज्यों की बात कर लेते हैं जहां से 356 सीटें आती हैं। और, यहां बीजेपी का प्रभाव कम है ज्यादा इस पर बहस हो सकती है लेकिन, नहीं है ये कहने वाले नहीं होंगे। ये राज्य हैं गुजरात (26 सांसद), उत्तर प्रदेश (80 सांसद), उत्तराखंड (5 सांसद), मध्य प्रदेश (29 सांसद), राजस्थान (25 सांसद), पंजाब (13 सांसद), झारखंड (14 सांसद), बिहार (40 सांसद), महाराष्ट्र (48 सांसद), कर्नाटक (28 सांसद), हरियाणा (10 सांसद), दिल्ली (7 सांसद), गोवा (2 सांसद), हिमाचल प्रदेश (4 सांसद), छत्तीसगढ़ (11 सांसद), असम (14 सांसद)। गुजरात में बीजेपी का प्रभाव सब जानते हैं। उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जहां भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे ज्यादा संभावना है। और, मोदी के प्रचार प्रमुख बनने पर बिहार के बाद सबसे ज्यादा खुसी जाहिर करने वाला राज्य उत्तर प्रदेश ही रहा। मतलब साफ है कि एक अदद नेता यूपी में बीजेपी कैडर को फिर से 1990 वाले दशक की तरह खड़ा कर सकता है और बीजेपी कार्यकर्ताओं को नरेंद्र मोदी में वो नेता नजर आ रहा है। राजस्थान में फिर से बीजेपी मजबूत होती दिख रही है। असम में इस समय भी 14 में से 4 सांसद बीजेपी के ही हैं। और, बार-बार छिटकने वाले सहयोगियों की चर्चा हो रही है। लेकिन, नरेंद्र मोदी वाली बीजेपी की एक स्वाभाविक सहयोगी तमिलनाडु के बीजेपी अछूत राज्य में शानदार स्थिति में हैं। लोकसभा में 39 में से आधी से कुछ ज्यादा भी बीजेपी के लिए जुड़ा तो मोदी का काम हो जाएगा। इसे जोड़ लें तो 395 सीटें हैं जिन पर भाजपा लड़ाई में है। अब अगर बीजेपी 200 सीटों से ज्यादा जोड़ पाती है तो, अभी के एनडीए में सिर्फ जयललिता को जोड़ते ही सवा दो सौ का आंकड़ा पार कर जाएगा। एक बड़ी पुरानी पिक्चर मैंने देखी है जिसमें सेठ की भूमिका वाला कलाकार दूसरे फटेहाल कलाकार को समझाता है कि देखो पैसा पैसे को खींचता है। ये सुनकर फटेहाल कलाकार अपने जेब से रुपय्या निकालकर सेठ की नोटों की गड्डी खींचने का प्रयास करता है। इतने में सेठ सिक्का छीनकर फटेहाल कलाकार को भगा देता है और कहता है कि पैसा पैसे को खींचता है ये सच है। लेकिन, ज्यादा पैसा कम पैसे को खींचता है। तो, सीधी सी बात है कि एनडीए तो 272 के आंकड़े तक खिंच ही जाएगा लेकिन, इसके लिए खुद बीजेपी को 200 का आंकड़ा पार करना होगा। और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पी ए संगमा का एक बयान नरेंद्र मोदी वाली बीजेपी का पक्ष मजबूत कर रहा है। संगमा ने हाल ही में कहा है कि नरेंद्र मोदी अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता बस धर्मनिरपेक्ष पक्ष कमजोर है। मतलब साफ है कि अगर आडवाणी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष हो सकते हैं तो 200 के पार खड़ी नरेंद्र मोदी वाली बीजेपी के साथ भला कौन आने से सांप्रदायिक बनेगा। फिर चाहे वो चंद्रबाबू नायडू हों या उड़ीसा वाले नवीन पटनायक।

Tuesday, June 18, 2013

चिदंबरम साहब इतनी भी नहीं सुधरी है अर्थव्यवस्था

12 जून को अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच ने भारत की रेटिंग बढ़ाने का एलान किया। हालांकि, इसे अगर ध्यान से समझें तो ये रेटिंग बढ़ने से ज्यादा बद से बदतर हुई साख के थोड़ा सुधरने का मसला था। लेकिन, लंबे समय से ऐसी किसी खबर के इंतजार में बैठी सरकार और उसके वित्त मंत्री के लिए इससे बेहतर खबर भला क्या हो सकती थी। फिच के मुताबिक अब भारत में निवेश करने वालों के लिए माहौल बेहतर हुआ है। ढेर सारे आर्थिक सुधारों की जरूरत है लेकिन, सरकार सही रास्ते पर जा रही है। और, इसीलिए रेटिंग एजेंसी ने भारत का आउटलुक निगेटिव से बढ़ाकर स्थिर कर दिया। और, सरकार के वित्त मंत्री पी चिदंबरम को भी फिर से वित्त मंत्रालय में आए 9 महीने भी बीत चुके हैं। ठीक 9 महीने बाद आई इस शुभ खबर के बहाने वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने देश को ये बताने की कोशिश की कि उनके आने के बाद अर्थव्यवस्था के हालात कितने बेहतर हुए हैं। इसलिए रेटिंग सुधरने के अगले दिन चिदंबरम साहब मीडिया के जरिए देश के सामने थे। रेटिंग सुधारने के फिच के फैसले के जरिए उन्होंने समझाने की कोशिश कि ज्यादातर मोर्चों पर अर्थव्यवस्था पूरी तरह से पटरी पर लौट आई है। और जहां कमी रह गई है उसे 2 महीने यानी जून और जुलाई के महीने तक सुधार लिया जाएगा। 

वित्त मंत्री की उम्मीदों को और परवान मिला लगे हाथ आए महंगाई दर के आंकड़ों से। होलसेल प्राइस इंडेक्स के आंकड़े बता रहे हैं कि मई में महंगाई के बढ़ने की रफ्तार 4.70 प्रतिशत रही जबकि, अप्रैल में महंगाई के बढ़ने की रफ्तार 4.70 प्रतिशत रही थी। इस लिहाज से महंगाई के बढ़ने की रफ्तार 3 साल में सबसे कम रही है। यही महंगाई का वो आंकड़ा है जिसके आधार पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया अपनी मौद्रिक नीति तय करता है। इसका मतलब ये कि इसी के आधार पर ब्याज दरें घटेंगी या बढ़ेंगी ये तय होता है। हालांकि, घटती महंगाई दर में आम जनता के लिहाज से एक आंकड़ा जो और छिपा हुआ है जिसकी चर्चा सरकार कम ही करना चाहेगी वो है फूड इनफ्लेशन यानी खाने पीने के सामानों की महंगाई दर। दरअसल फूड इनफ्लेशन अभी भी 8.25% प्रतिशत है। जबकि, पिछले साल मई में ये 6.08%  था। शायद फूड इनफ्लेशन के इस स्तर पर होने की ये वजह ही है कि वित्त मंत्रालय के साफ इशारों के बाद भी रिजर्व बैंक उस रफ्तार से ब्याज दरें नहीं घटा रहा है जिसकी उम्मीद की जा रही है। और, एक दूसरा पहलू ये भी है कि रिजर्व बैंक चाहता है कि पहले बैंक रेपो रेट में की गई कटौती को लोगों तक पहुंचाएं। क्योंकि, इस साल पौना प्रतिशत और पिछले साल अप्रैल से अब तक रिजर्व बैंक सवा प्रतिशत रेपो रेट घटा चुका है लेकिन, आशंकित बैंक अभी भी ग्राहकों को इस कटौती का फायदा नहीं दे रहे हैं। हाल ये है कि अभी भी अगर घर के लिए किसी को कर्ज लेना है तो, साढ़े दस प्रतिशत के नीचे के ब्याज पर कर्ज मिलना लगभग असंभव है। सरकारी बैंक एसबीआई दस प्रतिशत के आसपास ब्याज पर कर्ज दे रहा है लेकिन, उससे कर्ज मिलना देश के ज्यादातर प्रोजेक्ट के लिए लगभग असंभव है। इसका सीधा सा मतलब हुआ कि अगर कोई अभी घर के लिए कर्ज लेगा तो, उसे बैंक को इस ब्याज दर पर कर्ज ली गई रकम का दोगुना 20 सालों में चुकाना होगा।

फिच की रेटिंग सुधरने के बहाने वित्त मंत्री ने स्थापित करने की कोशिश की कि महंगाई घटी है, विदेशी कर्ज भी कम हुआ है और रिजर्व बैंक के पास विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा है जो, बेहतर होती अर्थव्यवस्था का प्रमाण है। ये काफी हद तक सही भी है कि पिछले 9 महीने में देश की अर्थव्यवस्था सुधरी है या यूं कहें कि अर्थव्यवस्था सुधरने के संकेत सुधरे हैं। लेकिन, इस बात की चर्चा भले कम हो और रिजर्व बैंक फैसले महंगाई के कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स के आंकड़ों के आधार पर लेता हुआ न दिखे। सच्चाई यही है कि इन 9 महीनों की छोड़िए 2009 में यूपीए दो आने के बाद से इस देश के लोगों को जिस महंगाई का सामना करना पड़ा है वो दस प्रतिशत के ऊपर है। आंकड़ों में भी कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (सीपीआई) से तय होने वाला रिटेल इनफ्लेशन 2009 में 10.83 प्रतिशत रहा। 2010 में ये 12.11 प्रतिशत पर पहुंच गया। 2011 में इसमें काफी कमी आई लेकिन, फिर भी ये 8.87 प्रतिशत रहा। 2012 में फिर 9.30 प्रतिशत हो गया और इस साल की बात करें तो, औसत महंगाई करीब साढ़े ग्यारह प्रतिशत है। 
ये महंगाई दर के आंकड़े अगर कम भयावह दिखते हैं तो, इन्हें कुछ और आंकड़ों के साथ रखकर देखिए अर्थव्यवस्था की स्थिति और साफ हो जाएगी। महंगाई की मार झेलने वाले देश के लोगों की जेब में रकम कितनी बढ़ रही है इस पर नजर डालिए। 2012-13 में प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय बढ़कर 39,168 रुपए हुई ये 2011-12 से सिर्फ 3 प्रतिशत बढ़ी है। जबकि, 2011-12 में प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय 4.7 प्रतिशत बढ़ी थी। महंगे कर्ज के बोझ से परेशान कंपनियों के तिमाही नतीजे और बीते वित्तीय वर्ष में दस साल में सबसे कम तरक्की की रफ्तार अर्थव्यवस्था की चुनौती के हालात साफ साफ बयान कर देती है। बीते वित्तीय वर्ष में भारत की तरक्की की रफ्तार पांच प्रतिशत रही है। हालांकि, ये साल सुधार का साल है। और आगे अर्थव्यवस्था सुधरती दिख रही है। लेकिन, अगर सबकुछ अच्छा रहा तो, भी 2015 में अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार सात प्रतिशत के नीचे ही रहती दिख रही है। ये अनुमान विश्व बैंक का है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक, मार्च 2014 में खत्म होने वाले यानी इस वित्तीय वर्ष में भारत की तरक्की की रफ्तार का अनुमान 5.7 प्रतिशत का है। जो पूरी तरह से निर्यात के बेहतर आंकड़ों और निवेश पर टिका हुआ है। वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था की सुनहरी तस्वीर दिखाई। कोयला, गैल, फर्टिलाइजर क्षेत्र में निवेश की बेहतर तस्वीर भी दिखी। साथ ही वित्त मंत्री ने भरोसा दिलाया कि विदेशी निवेश की शर्तें बेहतर करने के लिए चंद्रशेखर समिति की सिफारिशों पर 25 जून को होने वाला सेबी की बैठक में कुछ अच्छे फैसले लिए जाएंगे। हफ्ते के आखिरी दिन अच्छी तेजी देखने को मिली। लेकिन, शुक्रवार को 350 अंक से ज्यादा चढ़ने के बाद भी सेंसेक्स अभी बमुश्किल उन्नीस हजार से कुछ आगे ही जा पाया है। जो, कितने दिनों तक टिकेगा पता नहीं। जनवरी 2008 में 21000 पार करने वाला सेंसेक्स आज तक 21000 छोड़िए 19000 के आसपास ही लहराता रह जा रहा है। वित्त मंत्री भरोसा दिला रहे हैं कि रुपए की औकात डॉलर के मुकाबले अब और नहीं गिरेगी। वैसे 2008 में 1 डॉलर के लिए 46 रुपए के भाव वाला रुपया गिरकर अब 59 के भाव तक पहुंच गया है। वित्त मंत्री पी चिदंबरम बार-बार लोगों से अपील कर रहे हैं कि सोना मत खरीदो और उनकी इस चाह में मैं भी पूरी तरह से साथ हूं लेकिन, सोने के अतिमोह वाले भारतीयों के मन का क्या करेंगे कि जिस दिन उन्होंने भरे गले से ये अपील की उस दिन भी सोने का भाव 360 रुपए प्रति दस ग्राम चढ़ गया। फिर अभी तो शादियों का सीजन शुरू हो रहा है। उसके बाद त्यौहारों की झड़ी लग जाएगी। फिर भारतीय कहां से चिदंबरम साहब की अपील सुनने लगे। सोने पर आयात ड्यूटी जनवरी से दोगुनी हो चुकी है। चार प्रतिशत लगती थी अब आठ प्रतिशत लगती है फिर भी भारतीयों का सोना प्रेम बहुत कम नहीं हो पा रहा है। भारतीयों के बीच सोने की हैसियत जितनी बढ़ेगी और भारतीय रुपए की हैसियत दुनिया में जितनी गिरेगी अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत उतनी ही तेजी से सिर के बल चलने लगेंगे। पेट्रोलियम प्रोडक्ट पर सब्सिडी घटाकर सरकार ने सब्सिडी बिल काफी कम कर लिया है। लेकिन, डीजल की कीमत अठन्नी बढ़ती हुई और पेट्रोल की कीमत रुपए दो रुपए बढ़कर सरकार के महंगाई घटने के सपने को फिर से आधी नींद में हो तोड़ देगी। और, चुनाव नजदीक हैं तो, सरकार खर्चे घटाने के बारे में तो सोच भी नहीं सकती। खुद वित्त मंत्री अब कह रहे हैं कि सभी मंत्रालय खर्च तेजी में करें। तो वित्तीय घाटा तो सुरसा के बढ़ते मुंह की तरह और खुलने के लिए तैयार ही बैठा है। यही वजह रही वित्त मंत्री जी कि आपके लाख इशारे के बाद भी 17 जून को रिजर्व बैंक ने चवन्नी रेट भी नहीं गिराया अब कम से कम 30 जुलाई तक के लिए कर्ज सस्ता होने की उम्मीद धूमिल हो गई है। वित्त मंत्री जी रिजर्व बैंक पर दबाव बनाने से पहले आपको बैंकों पर दबाव बनाना होगा कि वो कर्ज सस्ता करें।

प्रधानमंत्री जी एनर्जी पॉलिसी बेहतर कीजिए जिससे देश में पेट्रोलियम पदार्थों की खोज का काम तेज हो और पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली से पूछिए और इस बात का इंतजाम कीजिए कि देश की पेट्रोलियम पॉलिसी में बाधा पहुंचाने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई हो सके। क्योंकि, सारा खेल भरोसे का है अगर देश के लोगों को ये लगेगा कि कोई और ताकत देश को चला रही है तो, भला वो भरोसा कहां से आएगा। और, अगर भरोसा नहीं आया तो फिर ये यूपीए दो के आखिर में अर्थव्यवस्था की सुनहरी तस्वीर का सपना दिखाकर यूपीए तीन बनाने का सपना भी सपना ही रह जाएगा।

Saturday, April 13, 2013

बुद्धिवालों मुझे गरियाने मत लगना !

आमतौर पर सामान्य बुद्धि वालों की तरह मैं भी बाबा विरोधी हूं। ज्यादातर बाबाओं का जो, अंधविश्वास, अंधभक्ति फैलाकर लोगों को बरगलाते हैं और उनकी कमाई से खुद दुनिया की सारी सुख सुविधाओं का इस्तेमाल करते हैं। सिरसा वाले बाबा राम रहीम सिंह में भी मुझे इसी तरह की कमियां दिखती हैं। चमकते कपड़े पहनकर और अजीब से संगीत वाले विज्ञापनों के जरिए वो भले ही लोगों तक पहुंचते हों। लेकिन, उनके खिलाफ कई अपराध के मामले हैं। ये अलग बात है कि उन पर कानूनी शिकंजा उनके भक्तों के जनदबाव की वजह से शायद नहीं बन पाता।

सितंबर 2007 में मैंने राम रहीम सिंह के इन्हीं कारनामों के खिलाफ लिखा भी था। और, मैं मानता हूं कि वो मुद्दा अलग है और उस पर कार्रवाई होनी ही चाहिए। उस रिपोर्ट पर एक बड़ी तीखी टिप्पणी आई थी। टिप्पणी किन्हीं रोहित की थी जो, हरियाणा के बलवारा से हैं और शायद किसी चैनल के स्ट्रिंगर हैं। वो, टिप्पणी मैं पूरी यहां चिपका रहा हूं। (aap ko kya lagta hai aapne ye sach likha hai??? kya aap ke paas in baato ka koi paroof hai???? harsh ji midal ho kar saocho ek tarfa mat likho...kya aapne kabhi dere dwara manvta bhlai ke ke baare main bhi blog pe kuch publish kiya hai??? kya aapne kabhi dere main aakar dekha ki waha kasa mahool hai,,, aap un gharo se pucho ki dere ki kya ahmiyt hai jo pehle shrab ki gandgi se ghire the or aaj waha suckh shanti hai,,,,, jo dere ke kehlaf mamle hai ye aap bhi jante hai or main bhi..ye sab mamle rajniti ke karan hai... chalo aap ko bolne ka haqq hai lekin plz pehle tathyo ko parkha karo phir kuch likho to acha hoga...)

नोएडा में सड़क नाली साफ करते डेरा सच्चा सौदा के लोग
उस वक्त मुझे लगा कि ये भी बाबा के अंधभक्तों में से होंगे इसलिए मैंने उनसे बहस नहीं की। लेकिन, आज सुबह जब मैं अपने घर से निकल रहा था। तो, घर के सामने की सड़क पर ढेर सारी महिलाएं और पुरुष सड़क-नाली सब साफ कर रहे थे। और, साफ कर रहे थे मतलब पूरे मनोयोग से साफ कर रहे थे। किसी NGO के लोगों की तरह फोटो खिंचवाने के लिए और फोटो खींचकर उससे रकम वसूलने के लिए नहीं। मैं गाड़ी स्टार्ट करके निकल पड़ा तो, बाहर कई बड़ी बसें, ट्रैक्टर खड़े दिखे। बसों पर बैनर लगा था। डेरा सच्चा सौदा सिरसा वाले। उसके नीचे नोएडा महासफाई अभियान। फिर मैंने गाड़ी मोड़ी अपने घर के सामने की सड़क पर समाजसेवा का काम कर रहे लोगों की एक फोटो अपने मोबाइल से ली। और, आगे उन्हीं में से एक से बात की तो, पता चला कि कल बाबा का सत्संग नोएडा के किसी सेक्टर में है। इसलिए सत्संग से पहले बाबा के अनुयायी पूरे नोएडा को साफ कर रहे हैं। उसने बताया कि करीब 3 लाख लोग एक साथ इस सफाई अभियान में हैं और सेक्टर 55, 56, 57 की तरफ पंजाब के लोग हैं। और, दूसरी तरफ हरियाण, यूपी के भी लोग हैं। संख्या कम ज्यादा हो सकती है। अब तक के अनुभव के आधार पर मैं ये दावा कर सकता हूं कि इतना बड़ा सफाई अभियान चलाने की ताकत शायद भारत के किसी नगर निगम में नहीं है और नोएडा अथॉरिटी उसका अपवाद नहीं है। सलाम इस जज्बे को। अपने घर के सामने के सफाई अभियान की तस्वीर भी चिपका रहा हूं।

Tuesday, March 12, 2013

विकीपीडिया के रास्ते- इंडिया-इटली की खोज


#ItalianMarines की खबरें देख-सुन रहा हूं। फिर सोचा कि आखिर क्यों इटली भी हमसे इतना ऐंठ के बात कर ले रहा है। विकीपीडिया के रास्ते खोजा तो, कुछ समझ में आया। 2-3 तथ्य विकीपीडिया से यहां चिपका रहा हूं। इटली वही रोम राजधानी वाला देश, पश्चिमी सभ्यता की मुख्य भूमि। a very high standard of living, and has a high GDP per capitaG8, G20, NATO का सदस्य देश। NATO के परमाणु अस्त्रों का भी साझेदार। दुनिया का 9वां सबसे बड़ा रक्षा बजट। वैसे, आबादी सिर्फ 6 करोड़ से कुछ ज्यादा ही है। क्या अभी भी ये बताने की जरूरत है कि भारत सरकार इटली के खिलाफ कुछ कर क्यों नहीं पाती? वैसे विकीपीडिया पर इटली पूरा पढ़ें तो, बेहतर

 
विकीपीडिया पर इंडिया भारत गणराज्य है। क्षेत्रफल में सबसे बड़ा देश और दुनिया की दूसरी सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है। most populous democracy वाला देश भी है जिसका मतलब हम समझने की कोशिश कर रहे हैं। सिंधु घाटी सभ्यता की उत्पत्ति वाला देश है। हिंदु, बुद्ध, जैन और सिख धर्म इसी इंडिया से जन्मे। इसाई, इस्लाम बाद में आए। 18वीं शताब्दी की शुरुआत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का गुलाम हुआ। 1947 में महात्मा गांधी के अंहिसा आंदोलन से आजादी मिली। जो, शहीद हुए उनका कोई योगदान नहीं। विकीपीडिया पढ़कर ऐसा ही लगता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की दसवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था लेकिन, nominal GDP के साथ ये भी हम समझने की कोशिश कर रहे हैं। हां, सबसे महत्वपूर्ण विकीपीडिया का ये तथ्य कि दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी खरीदार जनता अंग्रेजी में इसे third-largest by purchasing power parity (PPP) लिखा गया है। इसके चक्कर में सरकार अब सिर्फ PPP मॉडल ही लागू करना चाहती है। इसमें प्राइवेट कोई भी हो सकता है देसी भी, विदेशी भी।

एक और बात विकीपीडिया कहता है कि 1991 में जो, बाजार आधारित आर्थिक सुधार हुए उससे इंडिया सबसे तेजी से तरक्की वाली अर्थव्यवस्था बन गया है। लेकिन, जो विकीपीडिया में नहीं लिखा है वो, ये कि सबसे तेजी से तरक्की करते रहने के बावजूद आर्थिक सुधार के बीस साल बाद असल लड़ाई ये चल रही है कि इंडिया में गरीब 32 प्रतिशत हैं या 42 प्रतिशत।

हां, ये सच बात भी विकीपीडिया लिखता है कि इंडिया नाम का देश गरीबी, निरक्षरता, भ्रष्टाचार, कुपोषण, अपर्याप्त सरकारी स्वास्थ्य सुविधा और सबसे आखिर में आतंकवाद से बुरी तरह से त्रस्त है। विकीपीडिया में इंडिया nuclear weapons state के साथ  regional power है। तीसरी सबसे बड़ी पैदल सेना है ये लिखा है। लेकिन, ये नहीं लिखा कि इसके बावजूद पैदल सीमा पार करके आतंकवादी अकसर आते रहते हैं और राजनीतिक माफ कीजिएगा राजनयिक वजहों से सेना ज्यादा कुछ कर नहीं पाती। सिर काटकर पाकिस्तानी उन्हें शहीद बना देते हैं। सैनिक खर्चों में हम दुनिया में सातवें नंबर पर हैं ये भी विकीपीडिया से ज्ञान मिला है। इंडिया में parliamentary system है जिसमें 28 राज्य और 7 केंद्र शासित राज्य हैं। ढेर सारी भाषाएं, ढेरों तरह की संस्कृति के लोग हैं। विकीपीडिया पर इंडिया और कैसा दिखता है वो, भी पढ़ें

 

Tuesday, February 26, 2013

रेल बजट की कहानी मेरे FB स्टेटस अपडेट की जुबानी

में कई साल पहले कुछ की बात सुनी थी जिसके किनारे 36 नए शहर बसने थे। इस बजट में उसके बारे में किसी ने कुछ सुना है क्या?

#RailBudget में किराया इस खूबी से बढ़ाया गया है जैसे, डीजल-पेट्रोल की कीमत बाजार के हवाले करके इस खबर को खबर जैसा ही नहीं रहने देती सरकार !

उम्मीद है कि जोड़तोड़ से अगर UPA 3 बना तो रायबरेली या अमेठी में #RailBudget में रेलवे हेडक्वार्टर का एलान हो सकता है।

उत्तर प्रदेश बिना जीते न बीजेपी को सत्ता मिलेगी न कांग्रेस के दिन लौटेंगे। लेकिन, कांग्रेस है कि सारी मेहनत सिर्फ 2 सीटों के लिए ही करती है। #RailBudget


बस pawan bansal साहब अब रुलाएंगे क्या? #RailBudget में हमें कुछ नहीं चाहिए। घाटा सुनकर रोना आ गया।


#RailBudget पेश करते pawan bansal साहब से बाजार बद्तमीजी कर रहा है। सेंसेक्स करीब 200 प्वाइंट गिर गया।

#RailBudget में बंसल साहब ने सारी समस्याएं समझ ली हैं। सारी समस्याएं ठीक हों ये वो कह रहे हैं। कैसे करेंगे पता नहीं क्योंकि, सबसे बड़ी समस्या वो घाटा बता रहे हैं।

#RailBudget पेश करने से पहले राजीव गांधी को याद करने और सोनिया गांधी को शुक्रिया करने से क्या रेल बजट बेहतर बनता है?


200 KM/H स्पीड वाली ट्रेन की कल्पना गुदगुदाती है कि 3.5 घंटे में दिल्ली से इलाहाबाद। सपना कब पूरा होगा। #RailBudget

Tuesday, February 12, 2013

मोदी की ये पैकेजिंग बिकाऊ लगती है?

ये महज संयोग है या सचमुच एक फैसला कितने संयोगों को जन्म दे देता है ये समझने की बात है। लेकिन, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से नितिन गडकरी की विदाई क्या हुई, अचानक भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में एक अजीब सा माहौल बनता दिख रहा है। नरेंद्र मोदी उतना ही कह सुन रहे हैं जितना वो, हमेशा कहते सुनते थे लेकिन, संयोग देखिए कि उनका कहा अब काफी सुनने वाले दिखने लगे हैं। इतने कि दिल्ली के प्रतिष्ठित श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के बच्चों को उनका कहा रतन टाटा और राहुल गांधी के कहे से ज्यादा मूल्यवान दिखा और नरेंद्र मोदी जब वहां पहुंचे तो, श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के छात्रों को अपने किए फैसले पर फक्र होता दिखा।

नरेंद्र मोदी ने वहां कई बातें अपने पक्ष में कहीं जिसमें देश के इसी संविधान, कानून, लोग, अफसर और दफ्तर से गुजरात को बेहतर बनाने के बहाने देश को बेहतर बनाने का रास्ता दिखाने की कोशिश की। आधा भरा और आधा खाली गिलास वाले नजरिए को श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के छात्रों के सामने नरेंद्र मोदी ने तीसरे नजरिए में बदल दिया कि गिलास आधा भरा या खाली नहीं होता। गिलास तो पूरा भरा ही होता है और फिर आधा पानी से भरा हो सकता है आधा हवा से। नरेंद्र मोदी का यही अलग नजरिया खुद उनके लिए और उनकी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के लिए सुखद संयोग बनाता दिख रहा है। और, मोदी के नजरिए में सबसे खास बात कि पैकेजिंग सही नहीं तो, अच्छा से अच्छा उत्पाद नहीं बिक सकता। नरेंद्र मोदी ने हालांकि ये बात आयुर्वेद के संदर्भ में कही थी लेकिन, अवधारणा, भावना और प्रतीकों से नेता मानने वाले भारत में ये पैकेजिंग हमेशा काफी महत्वपूर्ण रही है। फिर चाहे वो नेहरू रहे हों, इंदिरा रही हों, राजीव रहे हों, वी पी सिंह रहे हों या फिर खुद बीजेपी के अकेले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी।

गुटनिरपेक्ष, उदार छवि वाले नेहरु को तुरंत आजाद हुए भारत ने सिर आंखों पर बैठाया तो, उनकी बेटी इंदिरा को संसद में अटल बिहारी वायपेजी ने जो, दुर्गा की छवि दी थी। उसे जनता ने भी सम्मान दिया। इसीलिए इंदिरा की तानाशाही भी इस देश की जनता को पसंद आई। राजीव गांधी को राजनीति नहीं आती थी लेकिन, पैकेजिंग भावना में एक बेहद सच्चे इंसान की हो गई। फिर कंप्यूटर क्रांति भी हिस्से में जुड़ी। कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ देश में अलख जगाने वाले वी पी सिंह राजा नहीं फकीर है भारत की तकदीर है के नारे के साथ प्रधानमंत्री बन गए। अटल बिहारी वाजपेयी की छवि गलत पार्टी में सही नेता की रही। ये सब मामला पैकेजिंग का ही था।

अब मामला आज का है। आज की बात करें तो, दुनिया भर में मंदी है। बड़ी मुश्किल से दस प्रतिशत की तरक्की का मनमोहिनी सपना दिखाने वाली सरकार का ताजा अनुमान कह रहा है कि इस वित्तीय वर्ष में तरक्की की रफ्तार पांच प्रतिशत रहेगी। यानी, सपना आधा हो चुका है। वहीं दस प्रतिशत के आसपास की तरक्की लगातार नरेंद्र मोदी के गुजरात में कायम है। इसलिए मोदी राष्ट्रीय राजनीति के दरवाजे पर खड़े होकर भी गर्वी गुजरात का गान करने में नहीं हिचकते। वजह साफ है। ये गर्वी गुजरात की पैकेजिंग बिक गई तो, भारत की तरक्की के लिए मोदी को नेता मानने का संयोग बन जाएगा। वैसे, ये महज संयोग नहीं हो सकता कि श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में जब मोदी कॉमर्स यानी कारोबार, तरक्की का सपना बेच रहे थे तो, इलाहाबाद के कुंभ में बीजेपी के नए अध्यक्ष राजनाथ सिंह और उसके बाद सारे हिंदुत्व के पुरोधा संगम की रेती पर संतों के साथ राम लला के भव्य मंदिर की बात कर रहे थे। ये पैकेजिंग ही है। ये पैकेजिंग है बीजेपी को असल मुद्दों से भटकी पार्टी का आरोप लगाने वाले पुराने कार्यकर्ताओं, मतदाताओं को नजदीक लाने की। साथ ही नए भारत या यूं कहें कि भारत से इंडिया बन गए यूथ को अपने साथ लाने की। इसीलिए संतों के सामने इलाहाबाद में राजनाथ नतमस्तक थे तो, श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में मोदी नौजवानों को न्यू एज पावर बता रहे थे और ये भी कि सारी समस्याओं का समाधान विकास में है। श्रीराम और कॉमर्स का ये संयोग, ये पैकेजिंग नरेंद्र मोदी के लिए बड़ी संभावना बना रहा है।

पैकेजिंग इतनी ही नहीं है। ये भी महज संयोग तो नहीं हो सकता कि दिसंबर में गुजरात विधानसभा चुनाव के ठीक पहले नरेंद्र मोदी से मिलने के लिए ब्रिटिश हाई कमिश्नर जेम्स बेवन गांधीनगर आते हैं और, गुजरात दंगों के बाद से बंद कारोबारी रिश्ते सामान्य करने की बात करते हैं। और, अभी नरेंद्र मोदी कुंभ के कलश से अमृत चखने पहुंचे नहीं हैं उससे पहले ये भी खबर आ गई है कि यूरोपीय यूनियन भी उनके साथ काराबोरी और दूसरे रिश्ते सामान्य करने की कोशिश में लग गया है। नरेंद्र मोदी की पैकेजिंग बिकाऊ दिख रही है। ज्यादा उग्र नहीं लेकिन, समय के साथ श्रीराम का नाम और कॉमर्स के काम वाली जो पैकेजिंग दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से मोदी ने देश की जनता को बेची है। काफी बिकाऊ दिख रही है। इस पैकेजिंग की रही-सही कसर ये खबर पूरी करती दिख रही है कि नरेंद्र मोदी अटल बिहारी वाजपेयी की लोकसभा सीट यानी उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से चुनाव लड़ सकते हैं। वैसे, भी उत्तर प्रदेश में लक्ष्मीकांत बाजपेयी की अध्यक्षी में पार्टी बेहतर करती दिख रही है। कल्याण सिंह पार्टी को चुनाव जिताएंगे खुद चुनाव लड़ने-जीतने से बचेंगे। और, साफ दिख रहा है कि राजनाथ सिंह को पता है कि सहमति की तलाश में ही उन पर प्रधानमंत्री बनने का कांटा रुक सकता है लेकिन, इसके लिए पहले बीजेपी को उस स्थिति तक पहुंचना होगा और उस स्थिति में नरेंद्र मोदी के अलावा कोई और नाम बीजेपी को पहुंचा नहीं सकता तो, साफ है कि राजनाथ सिंह इस दूसरे मिले कार्यकाल को खराब नहीं करना चाहेंगे। ये सारी पैकेजिंग नरेंद्र मोदी के पक्ष में बिकाऊ लग रही है।

Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

 Harsh Vardhan Tripathi हर्ष वर्धन त्रिपाठी #Bangladesh में @trahmanbnp प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। @PMOIndia @narendramodi ने उन्हें बध...