Friday, February 20, 2009

हाथी पर गुंडे ही गुंडे

देश का संवैधानिक दादा यानी प्रधानमंत्री बनने की इच्छा ने अलग-अलग राज्यों में बाहुबली सांसदों-विधायकों (असंवैधानिक दादाओं) का बड़ा भला कर दिया है। और, इसमें रोक लगाने में अदालतें भी कामयाब नहीं हो पा रही हैं। पता नहीं कितने लोगों को याद होगा कि, अदालत से दोषी करार दिए गए लोगों को संसद-विधानसभा का चुनाव लड़ने से रोकने के लिए बात चल रही थी। लेकिन, अबतक इस पर कुछ ठोस नहीं हो सका। जाहिर है जब देश का दादा बनने के लिएमुकाबला चल रहा हो तो, भला छोटे-मोटे दादाओं के दुष्कर्म रोकने की चिंताभला किसे होती।



और, इसका सबसे बुरा असर दिख रहा है उत्तर प्रदेश पर। प्रधानमंत्री बननेकी इच्छा ने मायावती के मन में ऐसा जोर मारा है कि मायावती जिन्हें मरवाना चाहती थीं (ऐसा भगोड़े अतीक अहमद ने पहली बार टीवी आने के बाद बोला था) अब वही अतीक अहमद हाथी पर सवार होकर लोकसभा में फिर पहुंचना चाहते हैं। जिससे कम से कम लोकतंत्र को बंधुआ बनाए रखकर उसके जरिए अपने दुष्कर्मों को जनता की इच्छा कहने का माद्दा बना रहे।



मायावती के खासमखास मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दिकी इलाहाबाद की नैनी जेल में मिलकर अतीक के साथ इलाहाबाद और आसपास की लोकसभा सीटों को जीतने की योजना बना रहे हैं। यूपीए सरकार के खिलाफ वोट करने के बाद अतीक के सारेकरीबीयों (इलाहाबाद के छंटे बदमाशों) पर मामले हल्के किए जा रहे हैं।



मायावती जब सत्ता में आई तो, चिल्ला-चिल्लाकर सपा के जंगलराज और जंगलराज चलाने वाले बदमाशों के सफाए की बात कह रही थीं। तब से अब तक त्रिवेणी संगम में बड़ा पानी बह गया है। इलाहाबाद से जौनपुर, बनारस, गाजीपुर होते हुए गोरखपुर की तरफ बढ़िए। मायावती के सत्ता में आने के बसपा किस तरह से बाहुबलियों की हो गई है ये मजे से दिख जाता है।



चलिए एक बार फिर से पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े बदमाशों की एकलिस्ट देखते हैं-अतीक अहमद (फूलपुर, इलाहाबाद), मुख्तार अंसारी (गाजीपुर अब मऊ सेविधायक), रघुराज प्रताप सिंह (विधायक, कुंडा, प्रतापगढ़), धनंजय सिंह(विधायक, रारी, जौनपुर), हरिशंकर तिवारी (हारे विधायक, चिल्लूपार,गोरखपुर)। इन पांचों की हैसियत ये है कि निर्दल चुनाव जीतते हैं या जीतनेका माद्दा रखते हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार आने से पहले येमुलायम के खासमखास थे। ये लिस्ट सिर्फ उनकी है जिनकी चर्चा पूरे प्रदेश में होती है। हर जिले के बदमाशों की गाड़ी पर भी अब नीला हाथी वाला झंडा ही लहराता दिखता है।



मुख्तार पर भाजपा विधायक कृष्णानंद राय और अतीक अहमद पर बसपा विधायक राजूपाल की हत्या का आरोप है। मायावती ने सत्ता में आते ही सबसे पहले इन्हींलोगों की नकेल कसी। लेकिन, अब ये दोनों हाथी की सवारी कर रहे हैं।मुख्तार अंसारी को बनारस से बसपा ने लोकसभा प्रत्याशी बना दिया है। मुख्तार के साथ ही उसके भाई अफजाल अंसारी को बसपा ने गाजीपुर सेप्रत्याशी बना दिया है। बात न बिगड़ी तो, अतीक अहमद के लिए इलाहाबाद या फिर इलाहाबाद की ही दूसरी फूलपुर लोकसभा सीट से हाथी सजा तैयार खड़ा है। जैसे संजय दत्त को लड़ाने के लिए अमरसिंह ने तैयारी कर रखी थी वैसी ही तैयारी बहनजी ने वीवीआईपी गेस्ट हाउस में मुलायम सरकार के समय उनके साथ बद्तमीजी करने वाले अतीक के लिए कर रखी है। अतीक चुनाव नहीं लड़े तो, अतीक से आधी से भी कम उम्र की अतीक की बीवी लोकसभा चुनाव लड़ सकती है। कुंडा विधायक रघुराज प्रताप सिंह अपने प्रताप से प्रतापगढ़ की सीट भी समाजवादी पार्टी को जिता चुके हैं। अब राजा के भी कस-बल ढीले पड़ रहेहैं। सुनते हैं कि वो, भी बहनजी के भाई बनना चाहते हैं।



मायाराज के सहारे अपनी गुंडई परवान चढ़ाने की इच्छा रखने वालों में जौनपुर की रारी विधानसभा से विधायक धनंजय सिंह भी शामिल है। लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान धनंजय गुंडई में पारंगत हुआ। अब संसदमें पहुंचने के लिए मायावती ने धनंजय को हाथी दे दिया है। धनंजय को संसदमें पहुंचाने के लिए पहले से घोषित बसपा प्रत्याशी का टिकट कट गया है। धनंजय को बहनजी की ही सरकार ने 50 हजार रुपए का इनामी बदमाश बनाया था।



वैसे धनंजय के रास्ते में ताजा रोड़ा बना है उत्तर प्रदेश के पांच लाख रुपए का इनामी बदमाश रहा बृजेश सिंह। बृजेश जब तक भगोड़ा रहा तब तक उसकेतार भाजपा से जुड़े होने की बात चलती रही। जब दिल्ली पुलिस ने उसेभुवनेश्वर से पकड़ा उसके बाद माहौल बदल गया है। अब बृजेश हाथी की पीठ परचढ़ने के लिए मुंहमांगी कीमत (हवा 40 करोड़ रु की है) देने को तैयार है।और, चर्चा गरम है कि बृजेश को जौनपुर या चंदौली से बसपा से लोकसभा प्रत्याशी बनाया जा सकता है।



एक जमाने में उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े बदमाश हरिशंकर तिवारी भी हाथी कीसवारी कर रहे हैं। छोटा बेटा विनय शंकर भले ही पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे के हाथों हार गया। बड़ा बेटा भीष्म शंकर खलीलाबाद से,बसपा सांसद बन चुका है। अब 2009 के लोकसभा चुनाव में पूरा परिवार हाथी परझूमते हुए दिल्ली पहुंचने की तैयारी में है। गोरखपुर लोकसभा सीट से हरिशंकर तिवारी का छोटा बेटा विनयशंकर, सटी खलीलाबाद सीट से बड़ा बेटा भीष्मशंकर और गोरखपुर के ही बगल की महाराजगंजसीट से भांजा गणेशशंकर पांडे बसपा प्रत्याशी घोषित हो चुके हैं।



अब बताइए मायावती गुंडों की बिग बॉस हुई या नहीं (दुर्भाग्य ये कि वो, देश का प्रधानमंत्री बनने की जबरदस्त दावेदार हैं)। दरअसल यही वो दीमक है जो, इस देश के लोकतंत्र को अंदर से काफी हद तक खोखला कर चुका है। देश का संवैधानिक दादा (प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री) बनने के लिए बड़े नेता जिस तरह के कुकर्म (जाने-अनजाने) कर गुजरते हैं। उसी पर खुद बाद में रोते भी रहते हैं। इन बदमाशों के पुनर्जीवन के लिए आखिर लालकृष्ण आडवाणीऔर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी कितने जिम्मेदार हैं। मायावती और दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्री तो घोषित तौर पर अपराधियों केसरदार बन ही जाते हैं। क्या इसका जवाब कभी खोजा जाएगा। और, ये कहानी सिर्फ उत्तर प्रदेश की नहीं है, पूरे देश की है।



उम्मीद सिर्फ इतने से ही बची है कि उत्तर प्रदेश का माहौल कुछ बदला तो है। इसका अंदाजा सिर्फ दो नारों से लग जाता है

--यूपी विधानसभा चुनाव के समय बसपा कार्यकर्ता नारा लगाते थे

---चढ़कर गुंडों की छाती पे, मोहर लगेगी हाथी पे

जो, बसपा को नहीं चाहते थे वो, भी सपा को हराने के लिए नारा लगाते थे

---पत्थर रख लो छाती पे, मोहर लगाओ हाथी पे

और, उत्तर प्रदेश का नया नारा है

---गुंडे चढ़ गए हाथी पे, पत्थर रख लो छाती पे



वैसे पत्थर रखने से नहीं पत्थर मारने से ही बात बनेगी। क्योंकि, उत्तर प्रदेश में हाथी पगला गया है। और, हाथी की पीठ पर सारे बदमाश चढ़कर उत्तर प्रदेश की जमीन रौंद रहे हैं।

Thursday, December 25, 2008

बहिनजी गलती हो गई माफी कैसे मिल पाएगी

उत्तर प्रदेश की जनता को कर्कश आवाज में मुलायम के जंगलराज के खिलाफ चीखकर मायावती ने ठग लिया है। जिन दलितों के दबे होने को लेकर वो सत्ता में आई अब वही दलित होना मायावती के लिए इतना बड़ा हथियार बन गया है कि पूरा उत्तर प्रदेश दलित बन गया है। मनुवाद को गाली देने वाली मायावती सबसे बड़ी मनुवादी हो गई है।

मायाराज- जंगलराज का समानार्थी शब्द लगने लगा है। लेकिन, दरअसल ये जंगलराज से बदतर हो गया है। क्योंकि, जंगल का भी कुछ तो कानून होता ही है। 24 अगस्त को मैंने बतंगड़ ब्लॉग पर लिखा था कि गुंडे चढ़ गए हाथी पर पत्थर रख लो छाती पर लेकिन, अब ये जरूरी हो गया है कि हाथी पर चढ़े गुंडों को पत्थरों से मार गिराया जाए। क्योंकि, पहले से bimaru उत्तर प्रदेश की बीमारी अब नासूर बनती जा रही है। शुरू में जब अपनी ही पार्टी के अपराधियों को मायावती ने जेल भेजा तो, लगा कि मायाराज, मुलायम राज से बेहतर है। लेकिन, ये वैसा ही था जैसा नया भ्रष्ट दरोगा थाना संभालते ही पुराने बदमाशों को निपटाकर छवि चमकाता है और अपने बदमाश पाल-पोसकर बड़े करता है। पता नहीं अभी up (उल्टा प्रदेश) को और कितना उलटा होना बाकी है।

और, सच्चाई तो यही है कि जब जनता ने मुलायम को पलटकर माया को सत्ता दिया था तो कोई बहुत माया की काबिलियत पर नहीं दिया था। मुलायम की कारस्तानियों पर दिया था। लेकिन, अब तो उत्तर प्रदेश की जनता बस यही कह रही है कि बहिनजी गलती हो गई माफ कर दो। लेकिन, इतने बड़े पाप की सजा अब 5 साल के पहले उत्तर प्रदेश की जनता को कहां मिल पाएगी।

Sunday, December 21, 2008

Nawaz does an antulay on Zardari … I don’t think so .. what do u think

मेरे शीर्षक का पहला हिस्सा शनिवार को मुंबई के the free press journal की हेडलाइन थी जिस पर मुझे भयानक एतराज है। और, ये एतराज इसलिए भी बढ़ जाता है कि सिर्फ तुक ताल बिठाने के लिए फ्री प्रेस जर्नल ने ये हेडलाइन ठेल दी। वैसे तो, फ्री प्रेस जर्नल कितने लोग पढ़ते हैं इसका मुझे पता नहीं है लेकिन, फिर भी जाहिर है कुछ लोग तो ऐसे होंगे ही जिन्होंने इस हेडलाइन को पढ़कर नवाज शरीफ के साथ गैरशरीफ अंतुले को भी एक खांचे में डाल दिया होगा।

अब जरा एक नजर डालें कि आखिर पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और यूपीए सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री ने क्या ऐसा किया कि मीडिया उनमें समानता खोजने लगा है। ऊपर से तो, दरअसल सिर्फ एक समानता दिखती है वो, ये कि ये दोनों अपने देश की सरकारों को सांसत मे डाल रहे हैं। और, इन दोनों के बयानों से- अंतुले के बयान से पाकिस्तान और शरीफ के बयान से भारत को- पड़ोसी देश को आरोप में मजबूती मिली है और इन दोनों के अपने देश का पक्ष कमजोर हुआ है।

अब सवाल ये है कि दिक्कत क्या है लोकतंत्र है और दोनों देशों में ऐसे सुर रखने वाले लोग हैं ये, क्या कम है। लेकिन, दरअसल सच्चाई बड़ी भयावह है। मैंने पिछले लेख में जब लिखा था कि जरदारी पर भरोसा करने में हर्ज क्या है तो, कई लोगों ने सवाल खड़ा किया था कि जरदारी पर भरोसा हम कैसे कर लें। लेकिन, मैंने उसी लेख के आखिर में चुनाव के समय और अंतुले जैसी जमात का भी जिक्र किया था जो, बासठ सालों से इसी तरह की बेतुकी बयानबाजी से ही अपना दानापानी चला रहे हैं और स्वस्थ मजबूत लोकतंत्र की निशानी मानकर कुछ जनता इनके बकरी से मिमियाने को शेर की दहाड़ और फिर इन्हें सवा सेर बनाती गई।

जब विपक्ष के नेता और हिंदुत्व के पुरोधा कहे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी और कम्युनिस्ट नेता मोहम्मद सलीम आतंकवाद को देश के खिलाफ जंग मानकर सरकार के साथ बिना किसी शर्त के खड़े थे तो, उस समय अब्दुल रहमान अंतुले को एटीएस चीफ हेमंत करकरे की हत्या मालेगांव धमाकों का सच छिपाने की साजिश के तहत की गई लगने लगी। वो, इतने से ही बस नहीं माने। उन्होंने ये भी कह डाला कि ये हिंदू आतंकवाद का हिस्सा हो सकता है। अंतुले ये बयान तब दे रहे थे जब ये साफ हो चुका है कि कितनी बड़ी साजिश के तहत मुंबई पर हमला पाकिस्तानी जमीन से तैयार हुआ। वो, सारे पाकिस्तानी थे। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि अब अंतुले इतनी बड़ी बेवकूफी को ढोल पीटकर सच करवा लेना चाहते हैं कि हिंदू आतंकवाद की साजिश का पता न चले इसके लिए पाकिस्तानी मुसलमान आतंकवादी, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी और लश्कर जैसे संगठनों ने साजिश रची।

करकरे जिस तरह आतंकवादियों की गोली का निशाना बने उसमें ये साबित हो चुका है कि कोई सामान्य सिपाही भी होते तो, उन्हें आतंकवादियों की गोलियां न पहचानतीं। और, मुझे तो डर लगता है कि कहीं ये कांग्रेस की चुनावी रणनीति का हिस्सा न हो। क्योंकि, हर मोरचे पर पिटती सरकार जब आतंकवाद पर पिटी और उसी के साथ चुनाव हुए तो, जनता ने ये साफ कर दिया कि वो, आतंकवाद को देश की सबसे बड़ी समस्या मानते हैं लेकिन, इस पर राजनीति वो बर्दाश्त नहीं करेंगे। और, शायद यही वजह थी कि आडवाणी हों या फिर कोई और संसद में सब एकसुर में आतंकवाद को कुचलने के लिए एक साथ तेज आवाज में सरकार के साथ बोले।

लेकिन, अंतुले तब भी अलग बोल रहे थे। वो, कह रहे थे कि नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी और unlawfull prevention act पास हुआ तो, इससे अल्पसंख्यकों के हित मारे जाएंगे। अब जब ये बिल आतंकवाद को कुचलने के लिए है तो, हिंदुस्तानी मुसलमान का हित कैसे मारा जाएगा। अंतुले जैसे लोग हिंदुस्तानी मुसलमानों को किस खांचे में खड़ा करना चाहते हैं मैं समझ नहीं पा रहा हूं। थोड़ा दबे-दबे में लालू प्रसाद यादव से लेकर दूसरे बासठ सालों से इसी तरह की तुष्टिकरण की राजनीति पर जिंदा लोग भी अंतुले की खिलाफत करने से बच रहे थे।

लेकिन, जब सोनिया गांधी के विश्वस्त कांग्रेसी महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहाकि कि अंतुले ने क्या गलत कह दिया। तब मेरा संदेह और पक्का हो गया कि ये कांग्रेस की चुनावी रणनीति का हिस्सा है। कांग्रेस कड़ी बयानबाजी और पाकिस्तान के खिलाफ दबाव बनाकर देश को ये संदेश देना चाहती है कि हम आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए सबसे काबिल हैं। साथ ही अंतुले, दिग्विजय जैसों की फौज अल्पसंख्यक वोट बटोरने के अभियान में लगा दी जिससे मुलायम, माया जैसों का वोट कटे और लोकसभा में कुछ सीटें बढ़ जाएं। विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस, मीडिया और राजनीतिक विश्लेषक तीनों ये मान चुके हैं कि लोकसभा चुनावों में आतंकवाद का मुद्दा तो नहीं चलेगा।

अंतुले इतने पर भी बस नहीं हुए। अब वो कट्टरपंथी मौलाना की तरह बोलने लगे हैं। उन्होंने कहाकि वक्फ की जमीन अल्लाह की जमीन है और इस पर अगर किसी ने कब्जा किया है तो, उसके खिलाफ जेहाद जायज है। यानी अंतुले गृहयुद्ध की बुनियाद और पुख्ता कर रहे हैं। अब अगर इसकी प्रतिक्रिया में बहुसंख्यक भी उसी अंदाज में आया तो, हाल क्या होगा। जब मौका था कि मजबूरी में फंसे पाकिस्तान पर दबाव डालकर आतंकवाद की जड़ में मट्ठा डाला जा सकता था। जब मौका था कि भारत-पाकिस्तान को साथ लेकर अपनी तरक्की बेहतर कर लेता तो, अंतुले, दिग्विजय की कांग्रेस अपनी वोटबैंक पॉलिटिक्स को भुनाने में जुट गई है।

नवाज शरीफ अपने देश के राष्ट्रपति के खिलाफ बोले तो, वो सच्चाई है कि मुंबई हमले में पकड़ा गया आतंकवादी अजमल कसाब पाकिस्तान के फरीदकोट का है। नवाज शरीफ का ये इंटरव्यू जिस पाकिस्तानी जियो न्यूज चैनल पर दिखाया गया उसने वहां के गांव वालों का इंटरव्यू तक प्रसारित किया जिससे ये और पुष्ट होता है। इससे तो, अंतुले का बयान वैसे ही खारिज हो जाता है। लेकिन, अंतुले जैसी राजनीति को पालपोसकर बड़ा करने वाली कांग्रेस अब शायद अंतुले को बुढ़ापे में अपने पुनर्जीवन के लिए इस्तेमाल कर लेना चाहती है। इसीलिए मैं फिर से कह रहा हूं कि खुली आंख से जरदारी, शरीफ पर भरोसा ठीक है। आंखबंदकर देश में बैठे लोगों की कारस्तानियों पर भरोसा ठीक नहीं है।

Wednesday, December 17, 2008

मुंबई में जिंदगी की रफ्तार से तेज दौड़ रही है दहशत



मुंबई में जिंदगी की रफ्तार कुछ ऐसी है कि छोटे शहरों से आया आदमी तो यहां खो जाता है। उसे चक्कर सा आने लगता है। इस रफ्तार को समझकर इसके साथ तो बहुतेरे चल लेते हैं। लेकिन, इस रफ्तार को कोई मात दे देगा ये, मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था। पर 16 दिसंबर को रात 8 बजे की करी रोड से थाना की लोकल ट्रेन में सफर के दौरान दहशत मैंने अपने नजदीक से गुजरते देखी।

करी रोड से स्टेशन पहुंचकर रुकी तो, अचानक हवा में कुछ आवाजें सुनाई दीं कि कोई लावारिस बैग पड़ा है। 30 सेकेंड भी नहीं लगे होंगे कि ठसाठस भरी ट्रेन में एक दूसरे के शरीर से चिपककर पिछले 40 मिनट से यात्रा कर रहे यात्री एक दूसरे से छिटककर प्लेटफॉर्म पर पहुंच गए। फर्स्टक्लास का पूरा कंपार्टमेंट खाली हो गया था। शायद ये मुंबई की लोकल में चलने का लोगों का अभ्यास ही था कि लोग क दूसरे से रगड़ते 30 सेकेंड में ट्रेन के डिब्बे से बाहर हो गए और कोई दुर्घटना न हुई।


4-5 मिनट रुकने और पुलिस की जांच के बाद ट्रेन चल दी और फिर ट्रेन में नशे में धुत एक आदमी की इस बात से कि- कौन साला इस मारामारी की जिंदगी को ढोना चाहता है-जब मरना होगा तो, मरेंगे ही। क्या बाहर मौत नहीं है- मुंबई स्पिरिट जिंदा हो गया। डिब्बे में ही खड़े-खड़े ताश की गड्डी भी खुल गई और सब घर भी पहुंच गए। लेकिन, दरअसल आतंक की जमात का काम बिना कुछ किए पूरा हो चुका है। अब मुंबई ऐसे ही चौंक-चौंककर अनदेखी और देखी दहशत से डरेगी।

Monday, December 15, 2008

जरदारी पर भरोसा करने में हर्ज क्या है


पाकिस्तान पर हमला बोल देना चाहिए। पाकिस्तान से सारे रिश्ते खत्म कर लेना चाहिए। मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले और उसके बाद इसमें पाकिस्तानी धरती के इस्तेमाल के साफ सबूत के बाद इस तरह की आवाजें तेज हो गई हैं। राजनीतिक नफा-नुकसान के लिहाज से ही सभी पार्टियों के नेता सड़क पर बयान दे रहे हैं। हां, अच्छी बात ये है कि संसद के भीतर आतंकवाद पर हुई चर्चा में बरसों बाद भारतीय नेता की ही तरह सारी पार्टियों ने बात की। कांग्रेस-भाजपा-लेफ्ट के चिन्हों से भले ही जनता उन्हें अलग नहीं कर पा रही है। अब सवाल ये है कि उस दिन की चर्चा के बाद क्या।

पाकिस्तान और भारत की सरकारें लगभग एक जैसे सुर में बात कर रही हैं। दोनों अपने देश के लोगों का भरोसा खोना नहीं चाहते। दोनों देशों की सरकारों को अब आतंकवाद नासूर बन गया दिख रहा है। और, उस नासूर का मवाद इस कदर बढ़ता जा रहा है कि शरीर का अंग कटने की नौबत आ गई है। वैसे, इस नासूर को पालने-पोसने में 1947 के बाद से दोनों देशों की सत्ता संभालने वालों ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत धार्मिक बुनियाद पर नहीं बंटा था, सब रंग मिले थे इसलिए खूनी रंग हम पर बहुत कम चढ़ा और इसकी वकालत करने वाले अकसर सामाजिक तौर पर अलग-थलग हो जाते थे। लेकिन, इसने भारत में एक ऐसी जमात खड़ी कर दी जो, सेक्युलरिज्म यानी धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़कर अपने सारे दुष्कर्मों को निपटा देना चाहती है।

ऐसी जमात का काम चलता भी रहा। ये जनता के गुस्से का शिकार होते थे। लेकिन, फिर पलटी मारकर स्वभाव से शांति प्रिय भारतीय जनता की आधी-अधूरी, लूली-लंगड़ी ही सही लेकिन, लोकतांत्रिक पसंद बन जाते थे। और, उधर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान का हाल ये कि चाहे तानासाह हो या फिर लोकतांत्रिक हुक्मरान- सबको ये लगता था कि बिना हिंदू-हिंदुस्तान को गरियाए, भारत में आतंकवाद फैलाए उनकी सत्ता बहुत दिनों तक नहीं चल सकती। सबको जेहाद इस्लाम का सबसे जरूरी हिस्सा लग रहा था और ये भी लगता था कि भारत के मुसलमानों से भी कम आबादी वाला ये देश ही दुनिया में इस्लाम का झंडा उठाकर चल सकेगा। इस चक्कर में पाकिस्तान में जमात ही जमात खड़ी हो गई। ये जमातें पाकिस्तानी तानाशाहों और लोकतांत्रिक सरकारों के सरदारों से बड़ी हो गईं। और, हाल ये हो गया कि अवाम की चुनी प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो निपट गईं।

इसके बाद पत्नी विरह ने आसिफ अली जरदारी को शायद इतनी नजदीक से आतंकवाद का मतलब समझाया। जरदारी और उनका विदेश में पढ़ रहा बेटा पाकिस्तान के अमन पसंद लोगों के साथ ही दुनिया के लिए आतंकवाद के खिलाफ एक हथियार की तरह दिखने लगे। लेकिन, ये आतंकवाद इतना कमजोर तो था नहीं। इसे तो, अमेरिका ने ही अपना काम मजे से चलाने के लिए तैयार किया था। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच मे तालिबान और दूसरे आतंकवादी कैंपों को सुहराकर-फुसलाकर-पुचकारकर अमेरिका ने ही बढ़ाया था। लेकिन, जब इसी जेहाद से अमेरिकी की फटी तो, वो विश्वशांति के बहाने इराक को बरबाद करने का लाइसेंस जबरी ले गया। अगर सबको याद हो तो, पाकिस्तान से बेहद खराब संबंधों के बावजूद भारत की हर तरह की जनता- धर्मनिरपेक्ष या राष्ट्रवादी- बुश को विलेन और सद्दाम को हीरो मानकर चल रही थी। साफ है पाकिस्तान से हमारी लड़ाई-अदावत धर्म की वजह से कम सीमा जुड़ी होने-पड़ोसी होने से ज्यादा है।

कमाल ये है कि मुंबई पर हुए हमले के बाद अपनी पश्चिमी दासता से प्रेरित मानसिकता की वजह से हम सबने इसे भारत का 9/11 बताकर तुरंत अमेरिका के इराक हमले जैसे ही एक्शन की उम्मीद करनी और उस उम्मीद को पूरा करने के लिए सरकार को दबाव में डालने की कोशिश शुरू कर दी। अब सवाल ये है कि क्या हम अमेरिका जैसे हैं। अमेरिकी जनता तो, खुद को दुनिया का दादा समझती है इसलिए उसकी इज्जत बची रहे इसके लिए 2-4 देश बरबाद कर देने वाले शासकों को वो ज्यादा महत्व देते हैं। लेकिन, क्या भारत की जनता का ये मिजाज है। क्या अमेरिका की तरह हम पाकिस्तान से लड़कर जीत सकते हैं। क्या अमेरिका और इराक की लड़ाई में जैसे इराक बरबाद हो गया और अमेरिका का नुकसान बहुत कम रहा। हम भारत-पाकिस्तान की लड़ाई में वैसे नतीजों की उम्मीद कर रहे हैं।

अब जो लोग ये कह रहे हैं कि भारत को पाकिस्तान या फिर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर हमला बोल देना चाहिए। उनके बुद्धि के संतुलन पर मुझे भरोसा एकदम नहीं है। क्योंकि, वो दो तरह के लोग हैं- पहले बेहद चालाक हैं सिर्फ राजनीतिक-सामाजिक नफे-नुकसान के बयान दे रहे हैं, खुद भीतर से डरे रहते हैं कि हालात इतने न बिगड़ें। दूसरे सचमुच के भावनात्मक बेवकूफ हैं। जो, सच्चे भारतीय हैं लेकिन, आजादी के बासठ सालों में नाकारा सरकारों से इतने नाराज हैं कि उन्हें लगता है कि अब आर या पार हो ही जाना चाहिए।


फिर अगर लड़ाई नहीं तो हम करें क्या। मुझे लगता है कि हमें जरदारी पर भरोसा करना चाहिए। आंखमूंदकर नहीं। जरदारी उतना ही आतंकवाद का मारा है जितना भारत। जरदारी सीधे-सीधे भारत सरकार के सामने झुक नहीं सकता ये उसकी राजनीतिक मजबूरी और कट्टर इस्लामी ताकतों का डर भी है। लेकिन, शायद ये जरदारी का रणनीतिक साथ ही हो सकता है जो, इस समय में भारत को इस मसले पर काफी राहत दे सकता है। जरदारी दबाव में ही सही लेकिन, आतंकवादी संगठनों के ऑफिस पर ताले लगवा रहा है। उन्हें भूमिगत होना पड़ रहा है। अच्छी बात ये है कि इस समय भारत को अमेरिका का रणनीतिक समर्थन भी हासिल है। और, भारत की दुनिया के नक्शे पर बढ़ती ताकत की वजह से दुनिया की दादा संस्थाएं यूनाइटेड नेशंस, सुरक्षा परिषद, वर्ल्ड बैंक, IMF भी भारत की सुन रहे हैं। कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार को विपक्ष का भी समर्थन हासिल है। क्योंकि, ताजा चुनाव नतीजे बता रहे हैं कि आतंकवाद का हल जनता चाहती है इस पर राजनीति तो बिल्कुल भी नहीं।

अब बस मुश्किल एक ही है कि चुनाव का समय नजदीक है। लाख सरकार और विपक्ष संसद मे चिल्लाकर बोल चुके हैं कि सब एक साथ हैं। लेकिन, सभी इसका राजनीतिक फायदा लेना चाहेंगे। सरकार ने अगर थोड़ी कार्रवाई को अपनी कामयाबी के खाते में जोड़कर वोट बटोरने की कोशिश की तो, विपक्ष तुरंत ही सरकार के बहीखाते के आतंकवाद पर नाकामी के किस्सों को मंच से चढ़कर चिल्लाने लगेगा। तब जरदारी को भी राहत मिलेगी, आतंकवादियों को भी फिर से मौका मिलेगा। वैसा ही जैसा हम पिछले बासठ सालों से देते आ रहे हैं।

Thursday, November 27, 2008

नपुंसक नेताओं के हाथ में कब तक रहेगा देश

खून खौल रहा है। इच्छा ये कि क्यों नहीं मैं भी किसी फोर्स में हुआ। और, क्यों नहीं ऐसा मौका मुझे भी मिला कि दो-चार आतंवादियों को मार गिराता। साथ में कुछ नपुंसक नेताओं को भी। हम टीवी वाले भले ही देश को न्यूज दिखाने के चक्कर में हर खबर को नाटकीय अंदाज में पेश करने वाले बन गए हैं। लेकिन, सच्चाई यही है कि कलेजा हमारा भी कांपता है। औऱ, खून हमारा भी खौलता है।


लगातार आतंकवादी चुनौती दे रहे हैं और जब आतंकवादी ऐसा धमाका करते हैं, सरेआम हिंदुस्तानियों की लाशें गिराते हैं, तब भले ही हम मीडिया वाले झकझोर कर देश को जगाने की कोशिश करते हों लेकिन, ये रात का धमाका सुबह की रोशनी के साथ डर भी खत्म कर देता है। और, आतंकवादियों के लिए सुबह फिर से नई तैयारी का रास्ता बना देती है। क्योंकि, हम नपुंसक नेता और उनके इशारे पर एक ही धमाके के लिए अलग-अलग मास्टरमाइंड पकड़ने वाली एटीएस और पुलिस के बताए भर से ही संतोष कर सकते हैं।


देश का आम आदमी मर रहा है। अब मैं ये सोच रहा हूं कि क्या कोई आम आदमी जागेगा नहीं। देश में घुन की तरह आतंकवादियों के हिमायती ऐसे भर गए हैं कि जाने कितने बुधवार की जरूरत है। मुझे नहीं समझ में आता कि जेल में बंद आतंकवादियों को किसके लिए बचाकर रखा हुआ है। क्या फिर किसी खूंखार आतंकवादी के लिए देश के कुछ लोगों को बंधक बनाया जाएगा तब। अब अगर मुंबई के ताज होटल, ओबरॉय होटल को कुछ घंटों के लिए ही सही बंधक बना सकते हैं। तो, साफ है कि देश बंधक है। औऱ, हमारे कमीने नेताओं को सिर्फ अपने वोटबैंक की चिंता सता रही है। उसको भड़का दूसरा इसका वोट ले लेता है। ये इसको भड़काकर उसका वोट ले लेता है।


संसद पर हमले के अलावा अब तक आतंकवादी चोरी-छिपे बम रखकर निर्दोष हिंदुस्तानियों की जान लेते थे। अब नपुंसक सरकार के राज में इनका साहस ऐसा बढ़ गया है कि ये दौड़ा-दौड़ाकर हमारी जान ले रहे हैं। इधर,हमारा नपुंसक गृहराज्य मंत्री शकील अहमद जानकारी देने के बजाए टेलीविजन चैनल पर एंकर से झगड़े कर रहा था। उधर, मुंबई में एंबुलेंस में हमारी लाशें लदकर हॉस्पिटल पहुंच रही थीं।

Monday, November 17, 2008

मन के सुकून के लिए

मेरे मित्र रवीश इस बार बहराइच गए तो, उन्हें दर्दनाक खबर सुनने को मिली। उनके दोस्त की हत्या कर दी गई जिसे पुलिस दुर्घटना बता रही है। पत्रकार होने के बावजूद वो, बहराइच में कुछ खास नहीं कर पाए। उन्होंने ये वाकया मेरे पास भेजा जिसे में ब्लॉग पर छाप रहा हूं। कोई और मदद तो हम दूर बैठकर शायद नहीं कर सकते। लेकिन, आवाज तो उठा ही सकते हैं।

अब जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है कम से कम राकेश की मौत ने यह बता दिया...मैं पिछले दिनों अपने शहर बहराईच गया था वहीं पता चला कि मेरे दोस्त राकेश साहू का क़त्ल हो गया....हालांकि पुलिस ने बताया कि उसकी हत्या नहीं बल्कि दुॆघटना हुई...लेकिन मौके-ए-वारदात और मेरे दोस्त महेद्र के प्रयासों के चलते हम यह समझाने में कामयाब रहे कि राकेश का बाकायदा क़त्ल किया गया है....राकेश रंगकॆमी..साहित्यकार..और मददगार शख्श था...हमेशा हंसते हुए वो दूसरों की मदद करता था लेकिन पैसों से नहीं बल्कि साथ खड़े होकर..मैं जब भी अपने घर से वापस दिल्ली या कहीं और जाने लगता तो वह कोशिश करके मुझे छोड़ने रोडवेज तक आता था..और बाद में नम आंखों से हाथ हिलाता रहता तब तक जब तक मेरी बस उसकी आंखों से ओझल नहीं हो जाती

...जब उसकी मौत की खबर मुझे पता चली तब मैं कोतवाली से लेकर लोकल अखबार के दफ्तरों के चक्कर काटता रहा कि शायद उसके क़ातिलों को पकड़ने में कोई दिलचस्पी दिखाए..लेकिन अखबार ने रोज़ाना मिलने वाले पुलिस को नाखुश न ही किया....और वही छापा जो पुलिस बता रही थी..लेकिन बाद में एसपी चंद्रप्रकाश से जब हमने बात की तो उन्होंने कहा कि यह मॆडर और हम जल्द ही वॆक आउट कर लेंगे....लेकिन २० दिन बीतने को है कोई भरोसा पैदा करने वाला काम पुलिस ने नहीं किया..ऊपर से जो राकेश शहर के लिए बेगाना नहीं था उसकी लाश को पुलिस ने लावारिश बनाकर जला डाला...बहराईच में मेरे जैसे उसके दोस्त,साहित्यकार और रंगकॆमी सब उसके क़ातिलों को सजा दिलवाना चाहते हैं..लेकिन कोई पचड़े में नहीं पड़ना चाहता है

...मैं जब तक शहर में था तब तक उसके लिए भाग दौड़ करता रहा लेकिन जैसे ही मैं दिल्ली आया लोगों का उत्साह ठंडा पड़ गया... जब भी सोचता हूं कि क्या राकेश का यही हश्र होना चाहिए क्या राकेश को चार अदद कंधे भी उस शहर में नहीं मिल पाया जिसके बारे में उसने बहुत कुछ सोच रखा था....जब मैं बहराईच जाता था तो अक्सर हम मिलते खाते-पीते और बड़ी बातें करते लेकिन सोचता हूं राकेश के मामले में कितना असहाय हो गया हूं...मीडियाकॆमी होने के नाते ज्यादा कोफ्त से मन भर जाता है..कभी..कभी अवसाद से सिर भिन्नाने लगता है....

राकेश के बारे में अगर मैं आपको बताऊं तो वह बहराईच का ब्लैक बेल्ट था...रंगकॆमी था....साहित्यकार था..और अधिकतर कस्बाई लड़कों की तरह थोड़ी आवारागॆद भी था...उसने झटके में प्यार किया फिर शादी भी की...लेकिन झटके में ही शादी टूट भी गई..उसने कभी खुल कर बताया नहीं कि आखिर जिसे इतना प्यार करता था उससे इतनी नफ़रत क्यों हो गई लेकिन एक बार झोंके में उसने कहा था कि पत्नी की मां ठीक नहीं है

..हमने इसलिे ज्यादा पूछा नहीं कि घरेलु मामला है..लेकिन फोन पर अक्सर कहता था कि रवीश भाई मेरी जान को ख़तरा है मैं अपनी पत्नी को तलाक नहीं दूंगा..लेकिन वो राकेश से छुटकारा चाहती है...उसका क़त्ल क्यों हुआ..कैसे हुआ..नहीं मालूम है....लेकिन उसकी लाश का जब फोटो मैंने देखा तो उसका गला कटा था....कमीज़ और जूते मोजे गायब थे...जेब से मोबाइल और पॆस नदारद था..कैसे हो सकती है राकेश की हत्या .....आरुषि को कवर करते हुए मैने जाना कि ब्लाइंड मॆडर किसे कहते हैं....लेकिन इतना ब्लाइंड होगा राकेश के मामले में मुझे अंदेशा नहीं था..
प्लीज अगर कुछ कर सकते हों तो करिए......

रवीश रंजन शुक्ला

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