Monday, September 05, 2016

यूपी चुनाव तक खालिस हिंदू पार्टी हो जाएगी कांग्रेस?

कांग्रेस हिंदू पार्टी हो जाएगी, ये कल्पना भी राजनीतिक तौर पर बेमानी लगती है। कांग्रेस के ऊपर सबसे बड़ा आरोप ही यही है कि वो मुस्लिम तुष्टीकरण करती है। लेकिन, इस आरोप के साथ ये तथ्य भी ध्यान में रखना जरूरी हो जाता है कि कांग्रेस दरअसल जिस गांधी नाम की बुनियाद पर खड़ी है, उस गांधी का पूरा जीवन दर्शन ही राम की अराधना से जुड़ा है। और अब वही गांधी फिर से कांग्रेस को बचाने की बुनियाद बनते दिख रहे हैं। राहुल गांधी के अपने भाषण में कहे गए- इन लोगों ने मारा उन्हें ... RSS के लोगों ने गांधीजी को गोली मारी।- पर फिर से मजबूती से खड़े होना दरअसल उसी रणनीति को पुख्ता कर रहा है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में जिस तेजी से राजनीतिक घटनाक्रम बदल रहा है, दरअसल उसमें कांग्रेस के लिए खालिस हिंदू पार्टी की तरह का व्यवहार ही अकेला रास्ता है, जिससे 2012 और 2014 से आगे कांग्रेस के लिए कुछ हासिल करने की उम्मीद है। देशभर में भले ही कांग्रेस को जमकर मुसलमान मत मिल जाते हों लेकिन, सच्चाई ये भी है कि जहां भी राज्यों में मुसलमानों को विकल्प मिला वो उस तरफ चले गए। इसीलिए फिर से मुसलमानों को राज्यों में जोड़ने की गुंजाइश तभी बनेगी, जब कांग्रेस को इतने हिंदू मत मिलते दिखें, जिससे बीजेपी के सामने कुछ टिकने की स्थिति बन सके।

कांग्रेस की मुश्किल ये है कि सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे देश में कांग्रेस से मुसलमानों का काफी हद तक मोहभंग हो गया। और इस मोहभंग की सबसे बड़ी वजह यही है कि कांग्रेस को इतने हिंदू मत मुश्किल से मिलते दिख रहे हैं जिससे कुछ सीट जीतने की स्थिति बने। यही वजह रही कि मुसलमानों ने कांग्रेस को छोड़कर दूसरे क्षेत्रीय दलों को पकड़ लिया। उत्तर प्रदेश में मुलायम और मायावती के आगे कांग्रेस के पास मुसलमानों में भरोसा जगाने के लिए कोई चेहरा ही नहीं है। मुलायम सिंह यादव और मायावती मुसलमानों को मनाने के लिए जहां तक जा रहे हैं, वहां तक पहुंचना अभी के हाल में कांग्रेस के लिए ज्यादा मुश्किल दिखता है। कांग्रेस से मुसलमानों के जबरदस्त कटाव का ही असर था कि जम्मू कश्मीर से लेकर महाराष्ट्र, हरियाणा में कांग्रेस गायब सी हो गई है। असम में सर्बानंद सोनोवाल और हिमंतविश्व शर्मा बड़े कारक रहे लेकिन, सच्चाई ये भी है कि बदरुद्दीन अजमल ने मुसलमानों को कांग्रेस से बहुत दूर कर दिया। यहां तक कि बिहार में लगातार बीजेपी के साथ नीतीश कुमार पर तो मुसलमान भरोसा जमाए रहे। लेकिन, कांग्रेस को एकदम किनारे कर दिया। वही कांग्रेस जब लालू-नीतीश के साथ दिखी तो उसके साथ चले गए। ये बड़ी सीधी सी वजहें हैं जिसकी वजह से कांग्रेस को ये बात समझ में आ चुकी है कि उत्तर प्रदेश में मुसलमानों पर थोड़ा बहुत भी भरोसा जमाना है, तो उसे पहले कुछ हिंदू मतों का भरोसा दिखाना होगा।

बेहद कठिन जातीय समीकरण वाले उत्तर प्रदेश में पिछड़ों और दलितों में सेंध लगाने की हर कोशिश नाकाम होने के बाद अब कांग्रेस ने सवर्णों, खासकर ब्राह्मणों पर ही पूरा ध्यान दिया है। बीजेपी कांग्रेस की ब्राह्मणों को लुभाने की राजनीति पर ज्यादा कान देने से इसलिए बच रही है कि उसे लगता है कि सवर्णों का स्वाभाविक रुझान बीजेपी की तरफ है। बीजेपी नेता मानते हैं कि कांग्रेस अभी इस हाल में नहीं है कि सवर्ण उसकी तरफ मुड़ जाए। लेकिन, कांग्रेस को यहीं उम्मीद दिख रही है। राजनीति से संन्यास लेने की अवस्था में पहुंची शीला दीक्षित को फिर से मुख्यधारा की राजनीति में लाना इसी रणनीति के तहत है। सवर्णों के साथ राममंदिर मुद्दे पर भावुक तौर पर जुड़े वर्ग को लुभाने की कोशिश भी कांग्रेस करने की कोशिश कर रही है।


इन लोगों ने मारा उन्हें ... RSS के लोगों ने गांधीजी को गोली मारी। इस बयान पर पीछे हटने के बाद फिर से उच्चतम न्यायालय में राहुल गांधी उस बयान पर मजबूती से खड़े रहना कांग्रेस की इस नई रणनीति का हिस्सा है। इसीलिए संघ और बीजेपी ने भी कांग्रेस उपाध्यक्ष पर हमला करने में देर नहीं लगाई। संघ के प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने कहाकि अगर राहुल गांधी को यू टर्न लेना था तो दो साल से वो ट्रायल से क्यों बच रहे है? क्या राहुल गांधी से सच से डर रहे हैं? कांग्रेस उपाध्यक्ष की ओर से अदालत में वरिष्ठ वकील और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल बहस कर रहे हैं। कपिल सिब्बल ने पत्रकारों से कहाकि ये लड़ाई अदालत की नहीं है। इसी लड़ाई में ये फैसला होगा कि असली हिंदू कौन है? हाल ही में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बने राजबब्बर ने इसे और साफ किया है। राजबब्बर कह रहे हैं कि राहुल गांधी ने बड़ा सवाल खड़ा किया है कि हिंदू कौन है? हे राम! कहने वाला या फिर हे राम! कहने वाले को मारने वाला। राहुल गांधी ये सवाल अनायास नहीं खड़ा कर रहे हैं। दरअसल कांग्रेस के रणनीतिकारों का ये बड़ा दांव है। कांग्रेस को पता है कि बीजेपी अब हिंदू पार्टी के ठप्पे पर जोर देने का खतरा कतई मोल नहीं लेने वाली। अगर ये सैंपल टेस्टिंग सही साबित होती दिखती है, तो 2017 के पहले तक कांग्रेस खालिस हिंदू पार्टी की तरह व्यवहार करती दिखने लगेगी। क्योंकि, उसे यही एक रास्ता उत्तर प्रदेश में अपनी जड़ें जमाने की ओर ले जाता है। 

Saturday, September 03, 2016

यूपी के 2.5 करोड़ स्मार्टफोन में कमल निशान चाहते हैं अमित शाह

उत्तर प्रदेश में अभी चुनाव आयोग ने कोई तारीख नहीं दी है। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के तो प्रत्याशी भी तय नहीं हैं। इसलिए चुनावी हलचल जमीन पर बहुत ज्यादा नजर नहीं आती। लेकिन, सोशल मीडिया पर सितंबर महीने से भारतीय जनता पार्टी के लिए युद्धस्तर पर जुटने का वक्त है। और इसका आगाज खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह करेंगे। 3 सितंबर को लखनऊ के राममनोहर लोहिया विश्वविद्यालय के भीमराव अंबेडकर ऑडीटोरियम में भारतीय जनता पार्टी सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट कर रही है। एक समय में वन बूथ ट्वेंटी यूथ का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी अब यूथ को पकड़ने के लिए बूथ की जगह स्मार्टफोन के रास्ते पर खड़ी है। स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाला कोई भी, खासकर नौजवान, छूटने न पाए। उत्तर प्रदेश में मई 2014 से आगे बढ़ने का अमित शाह का मंत्र यही है। इसीलिए अमित शाह के हवाले से कई बार ये खबर मीडिया में आती रही है कि विधानसभा चुनाव चाहने वाले से फेसबुक पर कम से कम 25 हजार लोग जुड़ होने चाहिए। ये उसी सोशल मीडिया मंत्र का विस्तार है। हालांकि, खुद अमित शाह बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं से सीधे मिलने के पारंपरिक तरीके में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। लेकिन, सोशल मीडिया के इस युग में शाह को अच्छे से पता है कि अपनी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक आसानी से पहुंचाने का सबसे आसान और प्रभावी जरिया स्मार्टफोन है। इसीलिए उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के आईटी विभाग को साफ निर्देश है कि स्मार्टफोन वाले नौजवान को पकड़ने की रणनीति तैयार करें। इसी की विधिवत शुरुआत 3 सितंबर को सोशल मीडिया वॉलंटियर मीट से अमित शाह करेंगे। उत्तर प्रदेश के चुनाव में सोशल मीडिया भारतीय जनता पार्टी के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी बात से लग सकता है कि अभी तक नया प्रदेश अध्यक्ष आने के बाद कोई मीडिया मीट या कार्यशाला नहीं हुई है। जबकि, सोशल मीडिया की कई कार्यशालाएं पहले ही की जा चुकी हैं।

उत्तर प्रदेश में एक मोटे अनुमान के मुताबिक करीब डेढ़ करोड़ फेसबुक यूजर्स हैं। और व्हाट्सएप इस्तेमाल करने वालों की संख्या करीब 5 करोड़ है। इसीलिए बीजेपी उत्तर प्रदेश में व्हाट्सएप इस्तेमाल करने वालों को पकड़ने के ही चक्कर में है। बीजेपी का मानना है कि ढाई करोड़ व्हाट्सएप यूजर्स हैं जो बीजेपी के साथ जुड़ सकते हैं। इसीलिए इन्हीं ढाई करोड़ व्हाट्सएप यूजर्स के मोबाइल में कमल निशान पक्का बनाने की योजना पर बीजेपी काम कर रही है। बीजेपी से जुड़े व्हाट्सएप समूहों और फेसबुक पेज पर या फिर अपने ही फेसबुक अकाउंट से भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में लिखने वालों की भी सूची तैयार की जा रही है। चाहे वो भारतीय जनता पार्टी से सीधे कार्यकर्ता के तौर पर जुड़े हों या न जुड़े हों। 3 सितंबर को होने लखनऊ में होने वाली सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट में ऐसे लोगों को शामिल करने पर ज्यादा जोर है, जो अभी तक बीजेपी से नहीं जुड़े हैं लेकिन, बीजेपी के पक्ष में नियमित तौर पर लिख रहे हैं। बीजेपी आईटी विभाग के मुताबिक, करीब 8 हजार लोगों ने अभी तक सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट के लिए पंजीकरण किया है। हालांकि, कुल पांच हजार लोगों के ही कार्यक्रम में शामिल होने की उम्मीद है। इन 5 हजार लोगों में से आधे से ज्यादा तो अभी भी बीजेपी से किसी न किसी तरह से जुड़े हुए हैं। इसीलिए नए आने वाले लोगों को बीजेपी अपने चुनावी अभियान में अच्छे से जोड़ने की योजना बना रही है। उत्तर प्रदेश बीजेपी आईटी विभाग के एक नेता का कहना है कि 25 से 45 साल के बीच के ज्यादातर स्मार्टफोन यूजर किसी राजनौतिक दल के कार्यकर्ता नहीं हैं। ऐसे लोग किसी बड़े नेता की रैली छोड़कर राजनैतिक कार्यक्रमों में कम ही शामिल होते हैं। क्योंकि, वो अपनी नौकरी, रोजगार में व्यस्त हैं या फिर पारिवारिक जीवन के मजे ले रहे हैं। लेकिन, फेसबुक और व्हाट्सएप पर अगर उनको राजनीतिक रूप से जोड़ा जाए, तो वो आसानी से सक्रिय हो जाते हैं। और पार्टी की नीतियों, केंद्र सरकार के कामों को नीचे तक ले जाने में मददगार होते हैं। 

सोशल मीडिया के जरिए सक्रिय लोगों के अपने पक्ष में होने का बड़ा फायदा अभी हाल के दिनों में बीजेपी को मिल चुका है। जब मुख्य धारा का मीडिया दयाशंकर सिंह के बेहूद बयान के खिलाफ पूरी पार्टी को लानत भेजने में लगा था। लेकिन, सोशल मीडिया पर एक ही दिन बाद दयाशंकर की बेटी और पत्नी को चेहरा बनाकर पूरा माहौल खड़ा कर दिया गया। बाद में पीछे से बीजेपी ने भी इस अभियान को जमकर समर्थन दिया। बेटी के सम्मान में, भाजपा मैदान में नारे के साथ बीजेपी भले सड़कों पर उतरी। लेकिन, ये नारा किसी बीजेपी नेता के दिमाग में नहीं उपजा था। ये नारा उसी सोशल मीडिया ब्रिगेड ने उछाला था जो, बीजेपी के लिए सोशल मीडिया पर स्वत:स्फूर्त तरीके से काम कर रही है। उसी ताकत को संगठित करने की योजना पर अमित शाह काम कर रहे हैं।
लखनऊ में हो रही सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट की जमीन पहले ही तैयार कर ली गई थी। यूपी बीजेपी ने काम के लिहाज से उत्तर प्रदेश को 6 क्षेत्रों में बांट रखा है। उन सभी 6 क्षेत्रों में आईटी विभाग कार्यशाला कर चुका है। ब्रज क्षेत्र में 2 कार्यशालाएं की गईं। 10 जुलाई को प्रदेश की एक कार्यशाला भी हो चुकी है। 3 सितंबर की सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट के बाद बीजेपी प्रदेश की हर कमिश्नरी पर सोशल मीडिया कार्यशाला कराने की योजना बना रही है। औसतन 4 जिले पर एक कमिश्नरी है। उत्तर प्रदेश में कुल 18 कमिश्नरी हैं। साथ ही बीजेपी प्रदेश के हर विकास खंड में सोशल मीडिया यूनिट खड़ी करने की तैयारी कर रही है। विकासखंड को बीजेपी अपने काम के लिहाज से मंडल कहती है और प्रदेश में बीजेपी के 1500 मंडल हैं। 15 सितंबर तक बीजेपी इन सभी मंडलों में अपनी यूनिट बनाने की कोशिश कर रही है। इसके बाद ग्राम पंचायत तक पहुंच बनाने की कोशिश होगी। बीजेपी के रणनीतिकारों का ये भी मानना है कि शहरों की अपेक्षा गांव में सोशल मीडिया के जरिये बनाई गई पहुंचा का ज्यादा लंबा असर होता है। गांव में एक बार कोई सूचना लोगों तक पहुंचा दी गई, तो गांव के लोग नई सूचना आने तक उसी आधार पर बात करते हैं। इसलिए चुनाव पूरा होने तक व्हाट्सएप और फेसबुक के जरिये बीजेपी नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की अच्छाइयों से हर स्मार्टफोन भर देने की योजना पर काम कर रही है। 2017 का विधानसभा चुनाव जीतने का ये सबसे बड़ा नुस्खा है। 

Wednesday, August 31, 2016

पुरुषवादी सोच है किराए की कोख में अपना बच्चा?

केंद्र सरकार को इस बात के लिए बधाई देनी चाहिए कि लंबे समय से बिना किसी नियंत्रण के चल रहे किराए की कोख के बाजार को नियंत्रित करने के लिए एक कानून बनाने की कोशिश की है। हालांकि, कानून बनने से पहले ही किराए की कोख के कानून पर ढेर सारे मोर्चे खुल गए हैं। हालांकि, सरकार ने बड़ी मशक्कत करके काफी सावधानी से सरोगेसी पर कानून बनाने की कोशिश की है। लेकिन, इसपर पार्टी के भीतर भी दोफाड़ है। खासकर इस बात पर बहुत ज्यादा विवाद है कि अगर कोई गोद ले सकता है, तो उसे किराए की कोख की इजाजत क्यों नहीं होगी। प्रगतिशील जमात सिंगल पैरेंट और एलजीबीटी समुदाय के लोगों के लिए भी सरोगेसी कानूनी करने की मांग कर रही है। एक बहस ये भी खड़ी हो रही है कि आखिर जिस महिला का शरीर है, उसकी कोख है, उसके अलावा सरकार कौन होती है, ये तय करने वाली। बहस है कि किसी में भी ममत्व और बापत्व जग सकता है। ऐसे में विज्ञान ने अगर ऐसी तरक्की कर ली है कि कोई अपना शुक्राणु के जरिये किसी दूसरे की कोख में अपना बच्चा पैदा कर सकता है और अगर उस कोख को देने वाली को एतराज नहीं है, तो फिर सरकार को क्या बीच में आना चाहिए। कई लोग तो विदेशियों और भारत के अमीरों से किराए की कोख के बदले में मिलने वाले धन से गरीबी खत्म होने तक की शानदार दलीलें दे रहे हैं। लेकिन, इन सबमें एक बड़ा सवाल छूट रहा है। ये सारी चिंता किसी के अपना बच्चा पैदा करने की इच्छा की तो हो रही है। लेकिन, कोई ये सवाल नहीं खड़ा कर रहा है कि आखिर जिस बच्चे के सिर से मां-बाप का साया हट गया हो। वो क्या करे? वो क्या मां-बाप पैदा कर सकता है। कमाल है कि हम पहले से सभ्य होने की बात कर रहे हैं। लेकिन, इस सभ्य होने में धरती पर जो आया नहीं है, इसके लिए तो कानून पर बहस हो रही है। हां, जो पहले से ही धरती पर है और जिसकी किस्मत ने दगा दिया और मां-बाप नहीं रहे। उनके लिए हमारा ये सभ्य समाज शायद ही संवेदनशील होता दिख रहा हो।

अगले 10 महीने बाद किराए की कोख का कानून लागू हो जाएगा, तो हो सकता है कि फिर से बच्चों को गोद लेने वालों की संख्या कुछ बढ़ जाए। लेकिन, इसके पहले तक किसी तरह का कोई कानून न होने का दुष्परिणाम ये है कि देश में अनाथों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। न सरकार और न ही तथाकथित तौर पर पहले से ज्यादा सभ्य हुआ हमारा समाज। सूचना के अधिकार के तहत सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स एजेंसी से आई जानकारी बताती है कि पिछले पांच सालों में गोद लेने वालों की संख्या आधी रह गई है। चाहे वो देश में गोद लेने के इच्छुक रहे हों या फिर विदेशी। महिला एवं बाल विकास मंत्री ने इस पर गहरी चिंता जताते हुए गोद लेने के कानूनों को काफी सरल कर दिया। हालांकि, गोद लेने वालों में सिंगल पैरेंट ज्यादातर सेलिब्रिटी ही नजर आते हैं। उस देश में जहां हर साल लगभग पचास हजार बच्चे अनाथ हो जाते हों और उनमें से बमुश्किल 800 से 1000 बच्चों को गोद लिया जाता हो। किराए की कोख का कानून बनने पर मचने वाला हल्ला थोड़ा चौंकाता है। बेटी हो या बेटा बच्चा एक ही अच्छा के नारे को लागू करने वाला सभ्य भारतीय समाज अनाथ बच्चों को गोद लेने की बहस की बजाए किराए की कोख में बच्चा पैदा करने के अधिकार की बहस कर रहा है। कमाल की बात ये है कि अभी तक देश में सरोगेसी यानी किराए की कोख का कोई कानून ही नहीं था। उसकी वजह से दुनिया भर के किसी भी वजह से अपना बच्चा न कर पाने वाले विदेशी दंपतियों के लिए सबसे बेहतर कोख का बाजार भारत ही रहा है। यूके, आयरलैंड, डेनमार्क, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, बेल्जियम, मैक्सिको, थाइलैंड और नेपाल में पहले से ही कमर्शियल सरोगेसी प्रतिबंधित है। इसलिए इन देशों के लोग सीधे भारत का रुख कर रहे हैं। हालांकि, अब भारत भी कमर्शियल सरोगेसी प्रतिबंधित करने वाले देशों में शामिल हो गया है। लेकिन, भारत में अभी सरोगेसी हो सकती है। लेकिन, वो विदेशियों के लिए और एलजीबीटी, सिंगल पैरेंट के लिए पूरी तरह से प्रतिबंधित है। हां, सरकार ने ऐसे दंपतियों के लिए जो किसी स्वास्थ्य वजहों से अपना बच्चा पैदा नहीं कर सकते, उन्हें इस बात की इजाजत दी है कि वो किराए की कोख से अपना बच्चा पैदा कर सकते हैं। उसका भी बाजार न खड़ा हो जाए इसके लिए सरकार ने ढेर सारे नियम लगाए हैं। बच्चा किसी नजदीकी रिश्तेदार की कोख से ही पैदा सकता है। हालांकि, सरकार से ये संकेत साफ मिल रहे हैं कि नजदीकी रिश्तेदार की परिभाषा को विस्तार दिया जाएगा। और ये ठीक भी है।

प्रगतिशीलता और विकसित समाज की बात करने वाले भूल जाते हैं कि फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, पुर्तगाल, बुल्गेरिया और स्विट्जरलैंड जैसे विकसित देशों में सरोगेसी पूरी तरह से प्रतिबंधित है। इसलिए भारत जैसे देश में जो पहले से ही बढ़ती आबादी और ढेर सारे अनाथ बच्चों वाला देश है, वहां पर किराए की कोख से अपना बच्चा चाहने की बात शायद मानवता पर दूसरी बहस की जरूरत बताती है। विदेशियों को या फिर किसी भी गैरभारतीय को भारत आकर किसी की कोख से बच्चा लेकर जाना किस तरह की सभ्यता की ओर ले जा रहा है। बार-बार ये दलील दी जाती है कि गरीब महिलाओं के लिए अपनी जरूरत भर के पैसे कमाने का एक जरिया था, जो सरकार ने इस कानून के जरिए बंद कर दिया। नियंत्रित बाजार ज्यादातर मामलों में जरूरी और बेहतरी करने वाला होता है। लेकिन, किराए की कोख के बाजार की वकालत और भारत जैसे देश की छवि कुछ ऐसे कर देना कि यहां की गरीब महिलाएं अपनी कोख बेचकर जरूरत भर का कमा पा रही है। पता नहीं, इसे कैसे प्रगतिशीलता कहा जा सकता है। और ये अपने ही शुक्राणु से पैदा हुआ बच्चा पाने की चाहत पुरुषवादी मानसिकता का चरम ही तो है। जहां महिला तो अपने पति के शुक्राणु से पैदा बच्चे को अपना मान ले। लेकिन, पुरुष किसी भी बच्चे को अपनाकर उसे अपने बच्चे का दर्जा देने से बचना चाहता है। इसलिए मुझे लगता है कि एक बेहतर कानून बन रहा है। जरूरत हो तो इसमें कुछ नियम-शर्तों में ढील दी जाए। लेकिन, किराए की कोख के बाजार को महिमामंडित करना न तो सभ्य समाज के हक में है, न महिलाओं के और न ही देश के। और सबसे बड़ा सवाल ये कि अनाथ होते बच्चों को गोद लेने में आई कमी शायद इस कानून के बनने के बाद कुछ बेहतर हो। इसलिए किराए की कोख के कानून के बनने और इस बाजार के नियंत्रित होने का स्वागत कीजिए। हां, जो जरूरी है, वो संशोधन होना चाहिए और सरकार भी इसके लिए तैयार दिख रही है। मानवता का स्तर ऊंचा उठाने में मदद कीजिए। अनाथ बच्चों की चिंता कीजिए। बेटी हो या बेटा बच्चा एक ही अच्छा से आगे बढ़िए। अगर नहीं है अपना बच्चा तो एक अनाथ बच्चे के सिर पर हाथ रखिए। समाज में जिन महिलाओं को किसी वजह से मातृत्व सुख नहीं मिल सकता, उनके प्रति नजरिया सुधारने का भी एक मौका है ये किराए की कोख का कानून।

Saturday, August 27, 2016

बेटी हो या बेटा, खिलाड़ी शानदार हैं, दरअसल इस देश में सिस्टम बिगड़ा है

योगेश्वर दत्त भी बिना सोना-चांदी जीते निकल लिए हैं। अब तो हिंदुस्तान के बेटों की इज्जत बचना नामुमकिन है। पहले भी कहां बची थी। बेटों की बेइज्जती जाने-अनजाने लगभग पूरा का पूरा हिंदुस्तान बेटियों की इज्जत बढ़ाते कर रहा था। व्हाट्सएप पर अब नारी सशक्तिकरण के कुछ और नए चुटकुले, जुमले ईजान होंगे। लेकिन, सवाल क्या इस देश में खेल में बेटी-बेटा के मुकाबले का है। क्योंकि, मुझे तो लगता है कि बेटी हो या बेटा, खेल के मैदान में मजबूत होने के लिए गैर खिलाड़ी खेल संघों के धुरंधर, जमे-जमाए कोचों और सरकारी व्यवस्था से सबका मुकाबला होता है। उस कठिन मुकाबले से जीतकर बाहर निकलने वाले आपको दिख जाते हैं। दीपा कर्माकर की आज पूरे देश में चर्चा है। लेकिन, दीपा कर्मकार के कोच बता रहे हैं कि कैसे एक दूसरे गैरजिम्नास्ट कोच ने दीपा का भविष्य खत्म करने की पूरी योजना तैयार कर ली थी। दीपा के कोच बिशेस्वर नंदी ने 9 फरवरी 2012 को त्रिपुरा खेल संघ के सचिव को लिखी एक चिट्ठी में दीपा के खिलाफ की जा रही साजिश के बारे में लिखा था। कमाल की बात ये कि दीपा के खिलाफ ये साजिश करने का आरोप जिम्नास्टिक फेडरेशन ऑफ इंडिया के जीवन पर्यंत मुख्य कोच गुरदयाल सिंह बावा पर है। सोचिए ये साजिश सफल हो जाती, तो भारतीय प्रोदुनोवा की सफलता की कहानी दुनिया को कतई न पता चलती। ये एक साजिश सफल नहीं हुई। लेकिन, भारतीय खेलों में ऐसी हजारों साजिशें सफल हो जाती हैं। और बेटियों को कोख में मारने से जितने पदक कम हुए हैं, उससे कहीं ज्यादा ऐसी साजिशों के जाल में फंसकर खिलाड़ियों- बेटा हो या बेटी- की खेलमृत्यु हो जाती है। अच्छा हुआ कि दीपा कर्मकार, पी वी सिंधु और साक्षी मलिक ने इस देश को बहुत सलीके से ये अहसास कराया कि खेल और भी हैं क्रिकेट के सिवाय। ऐसा नहीं है कि इससे पहले ये अहसास इस देश को कभी हुआ ही नहीं। पीटी ऊषा से शुरू हुआ ये अहसास इस देश में लगातार होने लगा है। अच्छा है कि ये अहसास बढ़ने लगा है। दीपा कर्मकार, पी वी सिंधु और साक्षी मलिक ने वो कर दिखाया, जो कोई नहीं कर सका था। कोई नहीं मतलब- कोई नहीं। न देश का कोई बेटा, न बेटी। बेटियों को लेकर इस देश में बहुत से पूर्वाग्रह हैं और इसीलिए जब बेटी ऐसे मेडल के साथ चमकती दिखती है, तो मेडल अनमोल हो जाता है। और इस बार बेटियों ने सचमुच भारतीय खेल स्थितियों के लिहाज से चमत्कार जैसा कर दिखाया है। अच्छा है कि बेटियों ने ये चमत्कार किया है। लेकिन, खेल के मामले में हिंदुस्तान में बेटों की कहानी आम जीवन की बेटियों से खास अलग नहीं है। आपको लग रहा होगा, ये क्या तुलना मैं कर रहा हूं। क्रिकेट में नेताओं की दिलचस्पी और प्रभुत्व इतनी ज्यादा है कि देश की सर्वोच्च अदालत से लेकर आमजन तक खेल में सुधार मतलब क्रिकेट में सुधार मान लेते हैं और इसीलिए लगता है कि लोढ़ा समिति की सिफारिशें लागू हो गईं, तो देश में खेल सुधर जाएगा। दरअसल ये मानना उसी तरह का है जैसे इस देश में क्रिकेट के अलावा कोई और खेल खेला ही नहीं जाता। इसीलिए और कहीं सुधार की भी जरूरत नहीं है।


अब जरा देखिए समाज में जैसे बेटियों के साथ ढेर सारे भेदभाव होते हैं। वैसे ही खेल में खिलाड़ियों को- बेटी हो या बेटा- कितनी तरह की मुश्किलों से गुजरना पड़ता है। रियो ओलंपिक शुरू होने से पहले ही पहलवान नरसिंह यादव का डोप टोस्ट पॉजिटिव हुआ। इसका मतलब ये कि नरसिंह यादव ने प्रतिबंधित दवाई लेकर अपनी क्षमता बढ़ाने की कोशिश की। नरसिंह यादव के मामले में मीडिया रिपोर्ट्स के साथ खेल संघ से आ रही आवाजें भी यही बता रहीं थीं कि नरसिंह के साथ साजिश हुई है। नरसिंह यादव का मामला मीडिया में आया। सरकार, खेल मंत्री सब नरसिंह के समर्थन में थे। नरसिंह यादव ओलंपिक तक पहुंच गया। लेकिन, भारतीय खेल का तंत्र कितना बिगड़ा इसका अंदाजा लगाइए कि ओलंपिक तक पहुंच जाने के बाद भी नरसिंह अपना मुकाबला नहीं खेल सका। अपने वर्ग में नरसिंह यादव पदक के पक्के दावेदार के तौर पर देखा जा रहा था। दूसरा उदाहरण देखिए- शॉट पुटर इंदरजीत सिंह। इंदरजीत सिंह को भी रियो ओलंपिक में पदक के पक्के दावेदार के तौर पर देखा जा रहा था। इसकी पक्की बुनियाद थी। इंदरजीत ने 2015 में हुई एशियन एथलेटिक चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक हासिल किया था। पिछले साल दो मुकाबलों में इंदरजीत ने स्वर्ण पदक जीता है। इसीलिए इंदरजीत की ओलंपिक में पदक दावेदारी तगड़ी मानी जा रही थी। लेकिन, इंदरजीत खेल संघों के खिलाफ काफी मुखर रहा। अमेरिका प्रशिक्षण के लिए अपने कोच को ले जाने के लिए इंदरजीत को लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। इंदरजीत खेल संघ और उसके तंत्र की खामियों को बार-बार इंगित करता रहता था। इंदरजीत ने कई बार खेलों में फैले भ्रष्टाचार की बात मंत्रालय तक पहुंचाई। इसीलिए इंदरजीत को पहले से ही अपने खिलाफ होने वाली साजिश का शक था। और वही हुआ। ओलंपिक से ठीक पहले 22 जून की टेस्ट रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई। नरसिंह यादव को सरकार और मीडिया से मिले समर्थन ने रियो तक पहुंचाया। लेकिन, रियो में खेलने से पहले ही उसे पटक दिया गया और इंदरजीत तो रियो तक भी नहीं पहुंच पाया। खेल संघों में बैठे ताकतवर लोगों ने पदक के दावेदार शॉट पुटर को लंगड़ी मार दी। इंदरजीत के खिलाफ ये साजिश है। इसे साबित करने के लिए ये एक तथ्य ही काफी है। 22 जून को इंदरजीत की टेस्ट रिपोर्ट पॉजिटिव आती है। जबकि, 29 जून की रिपोर्ट निगेटिव। कुल मिलाकर 28 अप्रैल से 11 जुलाई के बीच इंदरजीत का 6 बार टेस्ट लिया गया। इंदरजीत ओलंपिक के लिए करीब एक साल पहले ही क्वालीफाई कर गया था। ऐसे में सवाल ये उठता है कि उसे क्या जरूरत थी कि ओलंपिक के करीब एक महीने पहले वो प्रतिबंधित दवाओं का इस्तेमाल करके अपने भविष्य को दांव पर लगाता। 15 जुलाई 2016 को मुंबई में एक प्रेस कांफ्रेंस में इंदरजीत ने कहा था- किसी एथलीट को खत्म करने का एकमात्र तरीका ये है कि उसे डोप टेस्ट में फंसा दो। दिक्कत इस देश के बेटे या बेटी में नहीं है। दिक्कत देश के बिगड़े, भ्रष्ट तंत्र की है। मुकाबला हर बात में हम चीन से करते हैं। अमेरिकी बनना, दिखना चाहते हैं। ओलंपिक की पदक सूची हमें अहसास दिलाती है कि अमेरिका और चीन के तंत्र ने उन खिलाड़ियों के साथ छोटी-बड़ी साजिशें नहीं रचीं। प्रधानमंत्री जी आप फिर मन की बात करेंगे। निवेदन है, इस बार मेरे और करोड़ों देशवासियों के मन की बात बोलिए। बोलिए कि किसी खिलाड़ी के साथ साजिश न होगी। और बोलने के साथ साजिश करने वालों के खिलाफ कुछ कर भी दीजिए। 

Thursday, August 25, 2016

गैर जाटव वोटों के लिए बीजेपी इस “आरक्षण” के खिलाफ है

लोकसभा चुनावों के पहले दिल्ली में यूपी भवन में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने एक कार्यकर्ता को पैर छूने से रोका, तो उस भाजपा कार्यकर्ता ने कहा- आप ब्राह्मण हैं और हमारे अध्यक्ष भी। लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने जवाब दिया- मैं हिंदू हूं, बस। उस समय लोकसभा का चुनाव चढ़ाव पर था और किसी को ये कल्पना भी नहीं थी कि भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में इस तरह का चमत्कार करने जा रही है। लगभग हर जिले में खुद प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी रैली कर रहे थे। उस समय समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर कैसे नरेंद्र मोदी और तब के उत्तर प्रदेश के प्रभारी अमित शाह को ये भरोसा है कि उत्तर प्रदेश में सभी जातियों के लोग कमल के फूल पर मुहर लगाने जा रहे हैं। दरअसल, भारतीय जनता पार्टी ने गैर जाटव छोड़ सभी दलित जातियों और गैर यादव छोड़ सभी पिछड़ी जातियों को अपने पाले में लाने की मुहिम चुपचाप चला रखी थी। यही वजह रही कि जब उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को अप्रत्याशित तौर पर बयालीस प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले। अब ये कोई रहस्य नहीं है कि मायावती की अपनी जाति के लोगों को छोड़कर काफी दलितों और मुलायम सिंह यादव की जाति के लोगों को छोड़कर काफी पिछड़ों ने भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में लोकसभा में मतदान किया। यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी किसी भी हाल में लोकसभा 2014 में साथ आई दूसरी दलित और पिछड़ी जातियों को किसी भी हाल में छूटने नहीं देना चाहती। गैर जाटव दलितों का भी भारतीय जनता पार्टी पर भरोसा बेहतर है। इसका उदाहरण देखने को तब मिला, जब पूरे प्रदेश में चालीस हजार सफाईकर्मियों की नौकरी निकली। आरक्षण व्यवस्था के आधार पर निकली सफाईकर्मियों की नौकरी में सबसे ज्यादा किसी का हक मारा जा रहा है, तो वो दलितों में खासकर वाल्मीकि समाज के लोगों का। और इनकी लड़ाई लड़ने के लिए आगे आए हैं यूपी बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष और मेरठ से विधायक लक्ष्मीकांत बाजपेयी। बाजपेयी ने नगर विकास मंत्री आजम खान को चिट्ठी लिखकर सफाई कर्मचारियों की भर्ती में ढेर सारी विसंगतियां गिनाई हैं और इसे दूर करने को कहा है। बाजपेयी का कहना है कि सबसे पहले तो जो लोग पहले से लंबे समय से संविदा पर काम कर रहे हैं। उनका हक मारा जा रहा है। शासनादेश के मुताबिक, 18-40 साल के लोग ही इसमें आवेदन कर पाए हैं। आखिर जो लोग बरसों से ये काम कर रहे हैं और उनकी उम्र 40 साल से ज्यादा हो गई है, अब वो कहां जाएंगे। और लक्ष्मीकांत बाजपेयी एक गंभीर समस्या की तरफ भी इशारा करते हैं। वो कहते हैं कि सामान्य और पिछड़ी जातियों के लोग सरकारी नौकरी के लिए सफाईकर्मी बन जाएंगे। लेकिन, वो सफाई काम करने के बजाए वाल्मीकि समाज के लोगों को कम पैसे देकर उन्हीं से काम करवाएंगे और शोषण करेंगे।
ब्राह्मण नेता के रूप में स्थापित होने के बावजूद बाजपेयी खुद को हिंदू नेता कहलाना ही पसंद करते हैं। इसका लाभ उन्हें मेरठ में अपनी विधानसभा में तो मिलता ही है। प्रदेश अध्यक्ष रहते चमत्कारी सांसद संख्या जिताने का श्रेय भी इसी वजह से दिखता है। अब विधानसभा चुनाव नजदीक देखकर वाल्मीकि समाज को अपने पाले में बनाए रखने के लिए बीजेपी के लिए ये राजनीति का अच्छा मौका दिखता है। लेकिन, बाजपेयी जिस गंभीर समस्या की तरफ इशारा करते हैं। वो अनायास नहीं है। मेरठ नगर निगम में सफाईकर्मी के लिए 80000 लोगों ने आवेदन किया है और इसमें से करीब 55000 सामान्य जातियों के लोग हैं। वजह ये कि सफाईकर्मी को महीने के 15000 रुपये से ज्यादा मिलेंगे। पहले से संविदा पर काम कर रहे सफाईकर्मियों से बात करने पर आसानी से पता चल जाता है कि आरक्षण कैसे वाल्मीकि समाज के अच्छे दिन की राह में रोड़ा बना हुआ है। 
2006 में विनेश विद्यार्थी को मेरठ नगर निगम में संविदा पर सफाईकर्मी का काम मिला, तो उम्मीद यही थी कि एक दिन वो नियमित कर्मचारी के तौर पर अच्छी तनख्वाह और सरकारी नौकरी में मिलने वाली हर सुविधा का लाभ उठा पाएंगे। लेकिन, एक दशक बाद जब राज्य सरकार ने 40000 सफाईकर्मियों के लिए भर्ती निकाली, तो विनेश अपने को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। इसीलिए सफाईकर्मियों की भर्ती में आरक्षण का वो विरोध कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश सफाई कर्मचारी संघ के प्रदेश सचिव विनेश विद्यार्थी बताते हैं कि 2006 में जब उन्होंने काम शुरू किया था, तो सिर्फ वाल्मीकि समाज के ही लोग सफाई के काम में थे। संविदा पर काम करने वाले सफाईकर्मियों को नियमित करने की लड़ाई वो लंबे समय से लड़ रहे हैं। लेकिन, इस लड़ाई का परिणाम ये हुआ कि सरकार ने संविदा की नौकरी ही खत्म कर दी। सितंबर 2015 के बाद विनेश मेरठ नगर निगम के संविदा सफाईकर्मी भी नहीं रह गए और अक्टूबर 2015 में जब फिर से मेरठ नगर निगम में विनेश ने काम किया, तो उनके और नगर निगम के बीच में एक कंपनी थी। दरअसल संविदा पर सफाईकर्मी रखने के बजाए प्रदेश सरकार ने हर नगर निगम को आउटसोर्सिंग करने को कह दिया। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि अब सफाईकर्मी किसी कंपनी के जरिए वही काम कर रहे थे। और इस संविदा से ठेके पर कराए जा रहे काम का कितना बड़ा नुकसान दलितों में भी वाल्मीकि समाज के लोगों को झेलना पड़ा, इसे कुछ आंकड़ों से आसानी से समझा जा सकता है।
विनेश विद्यार्थी ने 2006 में 1928 रुपये महीने पर सफाई का काम शुरू किया था। उसके बाद विनेश को 3030 रुपये महीने मिलने लगे और बाद में आउटसोर्सिंग कंपनी के जरिए अंतिम तनख्वाह महीने की 7106 रुपये रही। अब इसमें समझने वाली बात ये है कि जब विनेश को 7106 रुपये महीने मिल रहे हैं, उस समय तक शासनादेश के जरिए सफाईकर्मियों की महीने की तनख्वाह 13380 रुपये हो चुकी थी। विनेश जैसे 2215 ऐसे लोग हैं जो, संविदा पर मेरठ नगर निगम में पिछले कई बरस से काम पर लगे थे। 4 जुलाई को जब सरकार ने मेरठ में 2355 नियुक्तियां निकालीं और उसमें पहले से काम कर रहे लोगों को वरीयता देने की बात कही, तो इन लोगों को उम्मीद की किरण नजर आई। लेकिन, इन 2355 में अनुसूचित जाति के लोगों के लिए सिर्फ 495 पद देखकर इनकी सारी उम्मीद धरी की धरी रह गई।
और विनेश साफ कहते हैं कि इससे वाल्मीकि समाज के लोगों का हक मारा जा रहा है। अगड़ी और पिछड़ी जातियों के लोग सरकारी नौकरी के लिए सफाईकर्मी भी बनने को तैयार हैं। विनेश कहते हैं कि जब हर जगह प्रशिक्षित को वरीयता मिलती है, तो यहां गैरप्रशिक्षित को आरक्षण क्यों दिया जा रहा है। दरअसल आधुनिकीकरण से सफाई का स्वरूप बदला है, काम बेहतर हुआ तो दूसरी जातिया भी सफाई के काम में आना चाहती हैं। क्योंकि, मशीन से सफाई बढ़ रही है। विनेश आरोप लगाते हैं कि दलितों की नेता के नाम पर राज्य की कई बार मुख्यमंत्री बनीं मायावती तो वाल्मीकि समाज के लोगों के साथ खड़ी ही नहीं होती। वो संपूर्ण दलित जाति की नेता नहीं है। वो सिर्फ जाटव की नेता हैं। मेरठ नगर निगम सफाई कर्मचारी संघ के महासचिव कैलाश चंडोला कहते हैं कि कम वेतन था तो हम लोग काम करते थे। जब ज्यादा वेतन हो गया तो हर कोई नौकरी करना चाहता है। हमारी लड़ाई सरकार से ये है कि हमने गंदगी उठाई। जब 3000 मिलते थे तो हम काम करते थे। अब 18000 मिलेगा तो दूसरे लोगों को मौका। वैसे भी दूसरी जाति के लोग काम करने वाले नहीं हैं, वो कम पैसे देकर काम तो हमसे ही कराएंगे। और हमारे पास कोई विकल्प न होने से कम पैसे में काम करना हमारी मजबूरी होगी।

ये आरक्षण का दूसरा पहलू है। सफाईकर्मी पिछले कई दिन से मेरठ नगर निगम के दरवाजे पर धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका कहना है कि आरक्षण दिया जाए। लेकिन, पहले जो लोग काम करते आ रहे हैं, उनको नियमित किया जाए। उसके बाद ही दूसरे लोगों को ये मौका दिया जाए। एक और सफाई कर्मचारी नेता राजू धवन कहते हैं कि दरअसल हमारे पास तो ना के बराबर मौके हैं और अब इसमें भी अच्छे दिन आने लगे, तो दूसरी जातियों के लोग आरक्षण का सहारा लेकर रोड़ा बन रहे हैं। अलग-अलग समय पर आई ढेर सारी रिपोर्ट का हवाला देते हुए ये लोग कहते हैं कि दरअसल वाल्मीकि समाज को आरक्षण का कोई लाभ अनुसूचित जाति का होने के नाते नहीं मिला। हां, आज आरक्षण की वजह से वाल्मीकि समाज के परिवार में बेहतरी की एक गुंजाइश जरूर खत्म होती दिख रही है। जाहिर है जब वोटबैंक और आरक्षण दोनों साथ दिख रहे हों, तो नेताओं को राजनीति की उर्वर जमीन दिख ही जाती है। और वो भी तब जब 6 महीने में ही प्रदेश में विधानसभा चुनाव होंना है।  
(ये लेख QUINTHINDI पर छपा है)

Monday, August 22, 2016

बाबू सिंह कुशवाहा की तरह दिखने लगे हैं स्वामी प्रसाद मौर्या

बीजेपी में शामिल हुए स्वामी प्रसाद मौर्या (bjp.org)
बीएसपी के एक पूर्व सांसद ब्रजेश पाठक भी बीजेपी में शामिल हो गए हैं। दिल्ली में उन्होंने मायावती को छोड़कर अमित शाह को अपना नेता मान लिया। कल तक वो आगरा में थे, बहन जी की रैली के संयोजक थे। आगरा से बढ़िया एक्सप्रेस वे मिला, तो सीधे 11 अशोक रोड पहुंच गए। आगरा से दिल्ली डेढ़ घंटे का ही रास्ता है और उन्होंने बीएसपी से बीजेपी की दूरी भी डेढ़ दिन से कम में तय कर ली। दिल्ली के बीजेपी कार्यालय से आ रही तस्वीरें ठीक वैसी ही हैं, जैसी 2012 में थीं। 2012 के विधानसभा चुनावों के पहले भी दूसरे दलों से भारतीय जनता पार्टी में हो रही भगदड़ से ऐसा लगने लगा था कि भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ रही है। लगभग ऐसा ही दृष्य बना था। बहुजन समाज पार्टी के कद्दावर नेता बाबू सिंह कुशवाहा भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे। बाबू सिंह कुशवाहा के अलावा बादशाह सिंह, दद्दन मिश्रा, अवधेश वर्मा और जिलों में तो जाने कितने छोटे बड़े नेता हाथी से उतरकर कमल का फूल पकड़ने को बेताब हो रहे थे। हालांकि, 2012 और 2017 के बीच में 2014 भी आया था। 2014 के बाद की भारतीय जनता पार्टी एकदम अलग है। पार्टी पूरी तरह से नेतृत्व के पीछे एकजुट है। मोदी-शाह के फैसलों पर जरा भी किंतु-परंतु नहीं है। नितिन गडकरी के लिए फैसले पर फिर भी कई नेता किंतु-परंतु लगा देते थे। इस समय सरकार में नरेंद्र मोदी और संगठन में अमित शाह चुनावी प्रबंधन के बड़े उस्ताद हैं। लेकिन, जिस तरह से दूसरे दलों से नेता कूदकर भारतीय जनता पार्टी के पाले में आ रहे हैं, उससे एक खतरा तो बढ़ रहा है। वो खतरा है पार्टी में 2014 के पहले से और 2014 के बाद भी अभी तक मजबूती से अपने लिए जमीन बना रहे बीजेपी कार्यकर्ताओं की बढ़ती कुंठा। ये बड़ा खतरा है। क्योंकि, बाहर से आने वाला हर नेता सीधे टिकट की दावेदारी ही जता रहा है। और सिर्फ दावेदारी ही नहीं जता रहा है। बल्कि, भारतीय जनता पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता पर अमर्यादित टिप्पणी भी कर रहा है।


बाबू सिंह कुशवाहा की ही तरह मायावती के बेहद नजदीकी नेताओं में शुमार स्वामी प्रसाद मौर्या भारतीय जनता पार्टी के नेता बन चुके हैं। लेकिन, उनका अपना संगठन भी काम कर रहा है। ये  वो संगठन है, जो स्वामी प्रसाद मौर्या ने बहन जी को नेता न मानने और आखिरकार अमित शाह को नेता मान लेने के बीच बनाया है। उसी संगठन लोकतंत्र बहुजन मंच की 20 सितंबर को लखनऊ में रैली है। इलाहाबाद में मौर्या उसी रैली की तैयारी के सिलसिले में मंडलीय बैठक कर रहे थे। अपने संगठन के कार्यकर्ताओं को रैली के लिए तैयार करते, जोश भरते स्वामी प्रसाद मौर्या ने बीजेपी कार्यकर्ताओं का जोश ठंडा कर दिया। अगले दिन इलाहाबाद के अखबारों में सुर्खियां बीजेपी कार्यकर्ताओं के लिए अपमानजनक टिप्पणी की तरह थी। इलाहाबाद में स्वामी प्रसाद मौर्या ने कहाकि जो लोग बाहर से आकर भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने वालों का विरोध कर रहे हैं, वो भाजपा के दुश्मन हैं। स्वामी प्रसाद मौर्या ने और आगे जाते हुए कहाकि इन्हीं लोगों की वजह से भाजपा पिछले बीस सालों से सत्ता से बाहर है। मौर्या ने कहाकि बीजेपी की दशा बाहरी का विरोध करने की मानसिकता की वजह से ही खराब है। उन्होंने कहाकि जिसमें ताकत होगी वो टिकट ले लेगा। हालांकि, चुनाव लड़ने और प्रचार करने पर मौर्या ने कहाकि जो नेतृत्व तय करेगा, वही करेंगे। आने वाली सरकार भाजपा की है और वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में काम करेंगे। सवाल यही है कि क्या बिना निष्ठावान बीजेपी नेताओं, कार्यकर्ताओं के, बाहरी नेता, कार्यकर्ता के बूते बीजेपी उत्तर प्रदेश में सत्ता में आ रही है। इसका जवाब तो चुनाव के बाद आएगा। लेकिन, परिस्थितियों से तुलना करें तो 2012 याद आता है। इलाहाबाद के एक बीजेपी नेता ने कहा जब अभी ये हाल है, तो टिकट बंटवारे के समय क्या होगा। इलाहाबाद की तीन सीटों पर स्वामी प्रसाद मौर्या के विश्वस्त बसपाई ताल ठोंक रहे हैं और पहले से बीजेपी के निष्ठावान नेताओं के पसीने छूट रहे हैं। इससे स्वामी प्रसाद मौर्या के अपने पुराने साथी बाबू सिंह कुशवाहा की गति प्राप्त करने की आशंका बढ़ती जा रही है। इलाहाबाद की शहर उत्तरी विधानसभा, जहां बीजेपी बहुत मजबूत मानी जाती है, वहां भी टिकट की दावेदारी बीएसपी से बीजेपी में हाल में शामिल नेता मजबूती से कर रहे हैं। बीजेपी में माना जाता है कि प्रत्याशी चयन में अंतिम मुहर तो सर्वे के आधार पर ही पक्की लगती है। ये भी एक छोटा सा सर्वे माना जा सकता है, बीजेपी में बाहर से आए नेताओं पर करीब डेढ़ दशक से बिना सत्ता की बीजेपी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं, नेताओं की राय। दूसरे सैनिकों को तो अपने सेनापति के पीछे कितना भी खड़ा किया जा सकता है। लेकिन, दूसरे के सेनापतियों के पीछे अपनी सेना खड़ा करना शायद नई राजनीतिक रणनीति है। 
(ये लेख quint Hindi पर छपा है)

Friday, August 19, 2016

650 किलोमीटर बाद भी एक जैसा अहसास!

कोस कोस पर पानी बदले चार कोस पर बानी। ये हिन्दुस्तान की विविधता को लेकर कहा जाता है। लेकिन, मुझे लगता है कि हिंदुस्तान में चार कोस तो क्या कितना भी लंबा सफर तय कर लिया जाए, एक जैसा ही है। और ये एक जैसा पानी या बानी नहीं, उससे भी बढ़कर हर हिन्दुस्तानी की वीआईपी बनने की ललक है। और ये वीआईपी या वीवीआईपी बनने की ललक बेवजह नहीं है। इसकी बड़ी पक्की टाइप की वजह है। क्योंकि, बिना वीआईपी या वीवीआईपी बने धौंस नहीं जमती। यहां तक चौराहे पर खड़े ट्रैफिक वाला शायद नियम कानून से चलने वाले पर तो फटकार लगा देगा। लेकिन, अगर वीआईपी, वीवीआईपी टाइप का कोई बिल्ला, पट्टा स्टिकर की शक्ल में कार, SUV पर चिपका है, तो फिर कहां किसी की मजाल। यही वो अहसास है जिसने पूरे हिन्दुस्तान को एक सूत्र में बांध रखा है और इसी मसले पर देश की सारी विविधता, एकता में अद्भुत तरीके से बदल जाती है। रक्षाबंधन पर घर जाना था। 17 की रात प्रयागराज एक्सप्रेस से जाना और 18 की रात प्रयागराज एक्सप्रेस से आना। 16 तारीख दफ्तर से लौटते बोटैनिकल गार्डन वाले चौराहे के पहले एक स्कॉर्पियो में Press के साथ VIP का स्टिकर लगा देखा। लेकिन, जब उसी के नीचे VVIP का भी स्टिकर लगा देखा, तो मुझे लगा कि ये तो अतिमहत्वपूर्ण होने के अहसास से जितना लदे हैं, इनके इस अहसास की तस्वीर तो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचनी चाहिए। आखिर 48 घंटे से भी कम समय में ऐसा राष्ट्रव्यापी वीआईपी अहसास मिला रहा है।


18 की सुबह इलाहाबाद पहुंचे। छोटे भाई के साथ स्टेशन से घर के रास्ते में थे कि सिविललाइंस वाले हनुमान मंदिर चौराहे के आगे एक साहब की कार दिखी। पहली नजर में भारतीय जनता पार्टी के किसी विधानसभा टिकट के इच्छुक टाइप की कार लगी। थोड़ा नजदीक से देखने पर समझ आया कि कोई जनकल्याण पार्टी के महासचिव हैं। नंबर प्लेट पर नजर पड़ी, तो समझ में आया कि ये तो वकील भी हैं। हाईकोर्ट का स्टिकर जो चस्पा था। मतलब डिग्री है। साथ ही ये भी मतलब कि वकालत अच्छी चल रही होती, तो ऐसे जन कल्याण पार्टी में क्यों जाना पड़ता और असली झटका मुझे तब लगा, जब मैंने देखा कि वो कार तो OLACabs के साथ जुड़ी हुई है। वाह रे वीआईपी हिन्दुस्तान। 

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...