Showing posts with label Amit Shah. Show all posts
Showing posts with label Amit Shah. Show all posts

Monday, June 19, 2017

मोदीराज में रायसीना पहाड़ी पर एक दलित के विराजने का मतलब

भारतीय जनता पार्टी के सांसदों को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए प्रस्तावक के तौर पर दस्तखत करने के लिए मुख्तार अब्बास नकवी के यहां जाना था। कमाल की बात ये थी कि उनमें से किसी को भी नहीं पता था कि दिल्ली की सबसे ऊंची और सम्वैधानिक तौर पर देश की सबसे ऊंची रायसीना पहाड़ी पर विराजने के लिए वो लोग किसके नाम पर मुहर लगाने जा रहे हैं। ज्यादातर सांसद लालकृष्ण आडवाणी के ही पक्ष में सहानुभूति रख रहे थे। लेकिन, राष्ट्रपति बनाने के लिए सांसदों की सहानुभूति नहीं, उनके मतों की जरूरत थी। और वो मत पार्टी के तय उम्मीदवार के ही पक्ष में जाना तय था। सांसद मुख्तार अब्बास नकवी के घर पहुंच रहे थे और ठीक उसी समय 11 अशोक रोड में भाजपा मुख्यालय पर राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बताया कि रामनाथ कोविंद एनडीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार होंगे। बिहार के राज्यपाल को राष्ट्रपति बनाने की नरेंद्र मोदी और अमित शाह की इस योजना की जानकारी किसी को नहीं थी।
भारतीय राजनीति नरेंद्र मोदी और अमित शाह को आगे कैसे याद करेगी ? एक शातिर राजनीतिक जोड़ी के तौर पर ? उनकी योजना से बाहर काम करने वाले हर नेता का खात्मा करने वाली जोड़ी के तौर पर ? भारतीय जनता पार्टी को देश की चक्रवर्ती पार्टी बनाने के तौर पर ? हिन्दू एकता के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाले नेता के तौर पर ?
अगर इतिहास में आज मुझे इस जोड़ी को दर्ज करने को कहा जाए, तो मैं इस जोड़ी को इन सारे जवाबों के मिश्रण के तौर पर याद करूंगा। भारतीय राजनीति में इस जोड़ी को एक क्रूर राजनीतिक जोड़ी के तौर पर याद किया जाएगा। और इसलिए भी कि इसी राजनीतिक जोड़ी ने भारतीय जनता पार्टी को भारत की सर्वशक्तिमान पार्टी कैसे बना दिया। 31 मई को अमित शाह गुजरात के छोटा उदयपुर विधानसभा में बूथ कार्यकर्ताओं के साथ थे। छोटा उदयपुर में अमित शाह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ, विस्तारक के तौर पर थे। अमित शाह की महत्वाकांक्षी विस्तारक योजना के तहत गुजरात में 48000 विस्तारकों को राज्य के सभी 48000 बूथ पर जाना था। इसी के तहत छोटा उदयपुर विधानसभा के बूथ पर अमित शाह लोगों के दरवाजे पहुंचे। छोटा उदयपुर विधानसभा में अमित शाह का विस्तारक के तौर पर जाना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि, यहां से कांग्रेस का विधायक 8 बार से चुना जा रहा है। आदिवासी बहुल इस इलाके में कांग्रेस की अभी भी मजबूत पकड़ है। अमित शाह सबसे कठिन काम खुद चुनते हैं। इसी कठिन काम चुनने में जब उन्होंने उत्तर प्रदेश चुना था, तो वहीं रामनाथ कोविंद भी उन्हें मिले थे।
अमित शाह ने कहाकिनरेंद्र मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री रहते बीजेपी ने 120 सीटें जीतीं, अब मोदी जी प्रधानमंत्री हैं, इसलिए हम 150 सीटें जीतेंगे।
लेकिन, ये अमित शाह को भी अच्छे से पता है कि गुजरात में राजनीतिक तौर पर हालात इधर बहुत बिगड़े हैं। इसलिए मोदी के मुख्यमंत्री के प्रधानमंत्री बन जाने भर से बीजेपी को गुजरात में 150 सीटें नहीं मिलने वाली। हार्दिक पटेल पहले से ही पूरे राज्य में पाटीदारों को लगातार ये समझाने में लगा हुआ है कि बीजेपी पाटीदारों का भला नहीं कर रही। लेकिन, पाटीदारों में बीजेपी के गहरे धंसे होने से हार्दिक पटेल बहुत कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। लेकिन, गुजरात में दलितों का एकजुट होना बीजेपी के लिए चिन्ता की वजह हो सकती है। जिग्नेश मेवानी दलितों के साथ मुसलमानों को लाकर भारतीय जनता पार्टी के लिए मुसीबत बनने की कोशिश कर रहा है। ऊना में दलित उत्पीड़न पूरे देश में दलितों को एक साथ लाने में मदद कर रहा है। सहारनपुर में भीम आर्मी का मजबूत होना भी बीजेपी के लिए बुरे संकेत की तरह है।
इस सबके बीच में गुजरात विधानसभा का चुनाव इसी साल के अन्त में होना है। ऐसे में 150 सीटें हासिल करने के लिए जरूरी है कि गुजरात में हिन्दू एकता का बीजेपी का आधार मजबूत बना रहे। और इसके लिए पिछड़े वर्ग से आने वाले प्रधानमंत्री के साथ दलित का राष्ट्रपति बनना बीजेपी के लिए सोने पर सुहागा जैसा दिखता है। रामनाथ कोविंद बिहार के राज्यपाल हैं। उम्मीदवारी घोषित होने के बाद जिस तरह से नीतीश कुमार की प्रतिक्रिया दिखी है, उसमें जेडीयू का साथ आना लगभग तय है। चंद्रबाबू नायडू, के चंद्रशेखर राव, रामविलास पासवान पूर्ण समर्थन दे चुके हैं। मुलायम सिंह यादव भी मोदी के उम्मीदवार के साथ ही रहेंगे। कोविंद उत्तर प्रदेश के कानपुर से आते हैं और कोली समाज से आते हैं। इसलिए मायावती के सामने भी विरोध का विकल्प बचता नहीं है। पहली प्रतिक्रिया में मायावती ने भी समर्थन के संकेत दे दिए हैं। कुल मिलाकर सीपीएम महासचिव सीतीराम येचुरी को छोड़कर अब तक आई सारी प्रतिक्रियाएं सकारात्मक रही हैं। 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी अपना आधार मजबूत करने के लिए रायसीना पहाड़ी पर किसी दलित के पक्ष में खड़ा है।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत लगातार हिन्दुओं के लिए एक कुंआ, एक मन्दिर, एक श्मशान की बात कर रहे हैं। अब एक गैर स्वयंसेवक दलित के रायसीना पहाड़ी पर विराजमान होने के संघ और मोदी के फैसले से संघ की बात का वजन दलितों में और बढ़ेगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए हिन्दू एकता का आधार और मजबूत होगा। देश में दलित-मुसलमान आन्दोलन को मजबूत करने की इच्छा रखने वालों पर रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी वज्रपात की तरह है। मोदी-शाह यूं ही नहीं, आज की तारीख की सबसे खतरनाक राजनीतिक जोड़ी है। इस जोड़ी ने एक दलित को रायसीना पहाड़ी पर चढ़ा दिया है, अब दलित भला किसी और की कहां सुनने वाला है।
(ये लेख QUINTHINDI पर छपा है)

Thursday, March 16, 2017

नई वाली बीजेपी में यूपी के मुख्यमंत्री श्रीकांत शर्मा होंगे?

राजनाथ सिंह ने अब साफ कह दिया है कि वो उत्तर प्रदेश लौटना नहीं चाहते हैं। राजनाथ सिंह ने शुरू से ही अपना ये रुख साफ कर रखा है। चुनाव के बीच में भी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के सवाल पर वो फीकी हंसी के साथ यही जवाब देते रहे कि सब मुझे ही मिलना चाहिए क्या? पार्टी में बहुत से योग्य लोग हैं। लेकिन, राजनाथ सिंह के नाम की चर्चा एक बार फिर से तब तेज हो गई जब, 14 मार्च को हेडलाइंस टुडे के सम्पादक राहुल कंवल ने एक ट्वीटकर बताया कि राजनाथ सिंह को यूपी का मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव मिला है और उन्होंने इस पर सोचने के लिए समय मांगा है। राहुल कंवल ने इसी ट्वीट में केशव मौर्या और मनोज सिन्हा को भी दावेदार बताया। नरेंद्र मोदी और अमित शाह वाली भारतीय जनता पार्टी में किसी भी तरह का कयास लगाना खुद को बेवकूफ साबित करने से ज्यादा कुछ भी नहीं है। इसलिए उत्तर प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री कौन होने जा रहा है, इसका अनुमान लगाने की बेवकूफी मैं नहीं कर सकता। लेकिन, एक विश्लेषण इस आधार पर करने की कोशिश कर रहा हूं कि जैसा खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह कह रहे हैं कि नए वाले भारत में नई वाली बीजेपी बन रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बाकायदा #IAmNewIndia अभियान चला रहे हैं। इसमें लोगों से इस नए वाले भारत के लिए शपथ लेने को कहा जा रहा है। ये अब बहुत सलीके से स्थापित हो चुका तथ्य है कि ये नई वाली बीजेपी है। जिसे नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने तैयार किया है। इस आधार पर नया वाला उत्तर प्रदेश भी तैयार हो गया है और प्रचंड बहुमत मिलने के बाद इस नए वाले उत्तर प्रदेश में तैयार हुई नई वाली बीजेपी को चलाने के लिए मुख्यमंत्री के तौर पर नया वाला नेता भी चाहिए।
इस सारे नए वाले आधार पर अगर देखा जाए तो, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय सचिव और अब मथुरा से शानदार जीत हासिल करने वाले श्रीकांत शर्मा इस पैमाने पर सबसे फिट बैठते हैं। अगर मैं कह रहा हूं कि श्रीकांत शर्मा नई वाली बीजेपी में बीजेपी के लिहाज से नए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के पैमाने पर सबसे फिट बैठते हैं, तो उसकी कई वजहें हैं। 1 जुलाई 1970 को पैदा हुए श्रीकांत शर्मा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के रास्ते भारतीय जनता पार्टी में आए हैं। मथुरा से दिल्ली आए श्रीकांत ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का मजबूत काम खड़ा किया। और दिल्ली में ही पूरी तरह से बस गए। श्रीकांत को पहली बार बड़ी जिम्मेदारी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के मीडिया प्रभारी के तौर पर मिली। श्रीकांत शर्मा के साथ एक और बड़ी शानदार उपलब्धि ये है कि वो तीन राष्ट्रीय अध्यक्षों के मीडिया प्रभारी रहे हैं। नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह और अमित शाह के कार्यकाल में अभी तक मीडिया का प्रभार श्रीकांत के पास ही है। अमित शाह के महासचिव बनने के साथ ही भारतीय जनता पार्टी के 9 अशोक रोड मुख्यालय में श्रीकांत का बढ़ता प्रभाव साफ दिखने लगा था। अमित शाह ने राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी देकर उसे और प्रभावी बना दिया। कमाल की बात ये कि मीडिया का प्रभार अभी भी श्रीकांत के ही पास है। 2014 के लोकसभा चुनावों में मथुरा से श्रीकांत लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते थे। लेकिन, रणनीतिक तौर पर मथुरा से हेमामालिनी को चुनाव लड़ाया गया। लेकिन, इसके बावजूद श्रीकांत ही मथुरा में बीजेपी नेता के तौर पर जाते रहे। मथुरा के जवाहरबाग में हुई जबर्दस्त गोलीबारी के बाद हेमामालिनी जब फिल्म की शूटिंग में व्यस्त थीं, उस समय बीजेपी की तरफ से श्रीकांत ने ही मोर्चा संभाला। 9 अशोक रोड पर मथुरा से आने वाला हर व्यक्ति को खाना पूछा जाए, ये श्रीकांत ने सुनिश्चित कर रखा था। अमित शाह वाली बीजेपी में मीडिया के लिए पार्टी को जानने का एकमात्र जरिया श्रीकांत शर्मा ही रहे। माना जाता है कि श्रीकांत को उत्तर प्रदेश में बड़ी भूमिका देने के लिहाज से ही अमित शाह ने खुद तैयार किया है। उसका असर भी दिखता है। श्रीकांत शर्मा को लम्बे समय से बीजेपी दफ्तर में देखने वाले जानते हैं कि श्रीकांत ने किस तरह से मीडिया में बीजेपी की छवि सुधारने के साथ एक मजबूत नेता की अपनी छवि भी बचाए रखी। मीडिया के बीच कई लोग श्रीकांत को अमित शाह की प्रतिमूर्ति कहते हैं।

इलाहाबाद में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का रोड शो हो या फिर बनारस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रोड शो। दोनों रोड शो में श्रीकांत शर्मा की भूमिका कितनी अहम थी, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बनारस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इलाहाबाद में अमित शाह की गाड़ी के आगे चलने वाली खुली जीप में श्रीकांत शर्मा सवार थे। श्रीकांत शर्मा के लिए ये कहा जाता है कि अमित शाह जो सोचते हैं, उसे मीडिया में सलीके से स्थापित करने का काम वो कर देते हैं। और सबसे बड़ी बात कि मीडिया प्रभारी रहते श्रीकांत ने ऑफ कैम ब्रीफिंग वाली परम्परा खत्म करा दी। मथुरा से श्रीकांत एक लाख से ज्यादा मतों से जीते हैं। अमित शाह अच्छी तरह जानते हैं कि चुनाव नहीं जीते तो, राजनीति खत्म। इस बात को समझते हुए श्रीकांत ने लोकसभा चुनावों के तुरंत बाद से ही अपनी विधानसभा तैयार करना शुरू कर दिया था। इसलिए देश के सबसे बड़े सूबे में नई वाली बीजेपी के नए नेता के तौर पर श्रीकांत शर्मा सबसे तगड़े दावेदार नजर आते हैं। अमित शाह का हर कहा-अनकहा उत्तर प्रदेश में लागू करने के लिए सबसे बेहतर दांव नजर आता है। हालांकि, ये नरेंद्र मोदी-अमित शाह वाली बीजेपी है, यहां कोई भी अनुमान लगाना खुद को बेवकूफ साबित करना हो सकता है।  

Friday, January 27, 2017

अटल-आडवाणी-जोशी की तैयार की जमीन दूसरों को सौंप रहे हैं मोदी-अमित शाह

अमित शाह हर हाल में उत्तर प्रदेश जीतना चाहते हैं। मूल वजह ये कि अमित शाह जानते हैं कि चुनाव जीतकर ही सब सम्भव है। गुजरात में अमित शाह ने चमत्कारिक जीत का जो मंत्र जाना था, उसे वो 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में दोहरा चुके हैं। लेकिन, उसी लोकसभा चुनाव की चमत्कारिक जीत ने अब अमित शाह के ऊपर ये दबाव बहुत बढ़ा दिया है कि वो हर हाल में उत्तर प्रदेश में बीजेपी का सरकार बनवा पाएं। अच्छे प्रदर्शन के लिए दबाव कारगर होता है। लेकिन, कई बार अपेक्षित परिणाम पाने के दबाव में ऐसे उल्टे काम हो जाते हैं, जिसका पता बहुत बाद में चलता है। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी अमित शाह की अगुवाई में कुछ ऐसे ही काम कर रही है। भारतीय जनता पार्टी की 2 सूची आ चुकी है। 149 और 155 मिलाकर 299 सीटों के प्रत्याशियों की सूची पर नजर डालने से दूसरी पार्टियों की तरह बेटा-बेटी को प्रत्याशी बनाना साफ दिख रहा है। साथ ही ये भी कि बाहरी-भीतरी, अब वाली बीजेपी में फर्क नहीं डालता। लेकिन, एक बात जो नहीं दिख रही, वो ये कि उत्तर प्रदेश में 2017 का विधानसभा चुनाव इसलिए भी याद रखा जाएगा कि बीजेपी ने अपनी कई परम्परागत सीटें भी जिताऊ के नाम पर दूसरे प्रत्याशियों को दे दीं। उत्तर प्रदेश में अटल-आडवाणी-जोशी की तैयार की गई शहरी जिताऊ सीटों पर अब नरेंद्र मोदी-अमित शाह-सुनील बंसल वाली बीजेपी दूसरे दलों के प्रत्याशियों को उपहार के तौर पर दे रही है।
इलाहाबाद की शहर उत्तरी सीट से भारतीय जनता पार्टी ने हर्षवर्धन बाजपेयी को उम्मीदवार बनाया है। 2012 में हर्षवर्धन बाजपेयी इसी सीट से बीएसपी से उम्मीदवार थे और दूसरे स्थान पर रहे थे। ये सीट अभी कांग्रेस के खाते में है। अनुग्रह नारायण सिंह लगातार दूसरी बार इस सीट से चुने गए। हर्षवर्धन बाजपेयी के पारिवारिक आधार के भरोसे बीजेपी के सभी कार्यकर्ताओं को दरकिनार करके टिकट दिया गया। वो पारिवारिक आधार ये है कि 1962 से 1974 तक हर्षवर्धन बाजपेयी की दादी राजेन्द्री कुमारी बाजपेयी यहां से चुनी जाती रहीं। 1977 में देशभर के साथ शहर उत्तरी सीट ने भी नतीजे दिए। लेकिन, 1980 में फिर से इस सीट को हर्षवर्धन बाजपेयी के पिता अशोक कुमार बाजपेयी ने जीत लिया। इस लिहाज से देखने पर लगता है कि बीजेपी नेतृत्व ने बहुत शानदार फैसला लिया है बीएसपी से बीजेपी में आए हर्षवर्धन बाजपेयी को टिकट देकर। कांग्रेस के अनुग्रह नारायण सिंह से आसानी से बाजपेयी के पारिवारिक मजबूत आधार और बीजेपी के आधार के भरोसे बीजेपी ये सीट फिर से झटक सकती है।  लेकिन, इस सीट को और ठीक से समझने के लिए 1991 के बाद की कहानी सुननी जरूरी है। 1991 में यहां से पहली बार भारतीय जनता पार्टी का खाता खुला और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नरेंद्र सिंह गौर को शहर उत्तरी की जनता ने चुन लिया। ये रामंदिर आंदोलन का दौर था। मंडल पर कमंडल की जीत हो चुकी थी। डॉक्टर गौर ने अभी के विधायक अनुग्रह नारायण सिंह को ही हराया था। इसके बाद 1993, 96, 2002 में भी डॉक्टर गौर ही जीतते रहे। इस सीट के बारे में कहा जाता रहा कि अगर यहां से किसी को भी कमल निशान के साथ खड़ा कर दिया जाए, तो वो जीत जाएगा। 2007 में डॉक्टर गौर हारे और उसके बाद 2012 में बीजेपी ने इलाहाबाद की बारा सीट से 2 बार विधायक रहे उदयभान करवरिया पर दांव लगाया लेकिन, फिर से हार मिली। उदयभान करवरिया और हर्षवर्धन बाजपेयी के बीच करीब डेढ़ हजार मतों का फासला था और उस लड़ाई का फायदा कांग्रेस के अनुग्रह नारायण सिंह को मिला। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह, राममंदिर आंदोलन के अगुवा नेता विहिप के अशोक सिंघल और भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी की तिकड़ी ने इलाहाबाद को बीजेपी का मजबूत किला बना दिया था और आज उस मजबूत किले को जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी एक बाहरी के सहारे है। शहर उत्तरी ब्राह्मण बहुल सीट है, तो इससे सटी दूसरी सीट है शहर दक्षिणी, जो कि बनिया बहुल है। यही ब्राह्मण-बनिया है, जो बीजेपी का मूल आधार है। शहर दक्षिणी से भारतीय जनसंघ का खाता पहली बार 1969 में ही खुल गया था। रामगोपाल संड विधायक चुने गए थे। उसके 1989 में केशरी नाथ त्रिपाठी ने फिर से बीजेपी के लिए ये सीट जीती। 89 के बाद 91, 93, 96 और 2002 में भी केशरी नाथ त्रिपाठी इस सीट पर कमल खिलाते रहे। 2007 में बीएसपी के नंद गोपाल गुप्ता नंदी ने केशरी नाथ को हरा दिया और अब वही नंद गोपाल गुप्ता नंदी बीजेपी के टिकट पर दक्षिणी से उम्मीदवार हैं। केशरी नाथ त्रिपाठी पश्चिम बंगाल के राज्यपाल हैं और वो नंदी को टिकट देने के पूरी तरह से खिलाफ हैं। लेकिन, उनकी नहीं सुनी गई।

इलाहाबाद की लोकसभा सीट से लगातार तीन बार डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी चुनाव जीते। इलाहाबाद की शहर उत्तरी और दक्षिणी की ये कहानी थोड़ी लम्बी भले हो गई। लेकिन, उत्तर प्रदेश की शहरी सीटों पर भारतीय जनता पार्टी की पकड़ बताने के लिए ये कहानी जरूरी है। ये वो शहरी सीटें हैं, जहां आम मध्य वर्ग, हिन्दुत्व से जुड़ा मतदाता बिना सोचे लगातार करीब 3 दशकों से मत देता रहा है। यही वजह है कि 14 वर्षों से भले ही भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने से बहुत दूर है। महानगरों की विधानसभा सीटों पर उसकी प्रभावी उपस्थिति बनी रही। लेकिन, अमित शाह के कुछ भी करके जीतने के मंत्र के प्रभाव से बीजेपी का अपना प्रभाव गायब होता दिख रहा है। लखनऊ लोकसभा सीट पर अटल बिहारी वाजपेयी के सांसद बनने के बाद ये सीट भाजपा का सबसे मजबूत किला रहा। 1991 से 2009 तक अटल बिहारी वाजपेयी और उसके बाद लालजी टंडन और राजनाथ सिंह इसी सीट से कमल निशान पर लोकसभा पहुंचे। इसी लोकसभा की 2 महत्वपूर्ण सीटों लखनऊ कैंट और लखनऊ मध्य पर बीजेपी ने कांग्रेस से आई रीता बहुगुणा जोशी और बीएसपी से ब्रजेश पाठक को उम्मीदवार बनाया है। ये सही है कि जिताऊ प्रत्याशी खोज लेना राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती होती है। जिसे अमित शाह बखूबी पार कर जा रहे हैं। लेकिन, ये सवाल तो आने वाले समय में उठेगा कि जिताऊ खोजने के चक्कर में अपनों के जरिये जीती जा सकने वाली सीटें भी दूसरों को दे देना कौन सी राजनीतिक समझदारी है। लखनऊ और इलाहाबाद बड़े उदाहरण हैं, ऐसी करीब 50 सीटें हैं, जो बीजेपी अपने प्रत्याशियों के भरोसे जीत सकती थी। लेकिन, उसने जिताऊ के नाम पर बाहरी पर दांव लगाया। मोटा-मोटा हर जिले की करीब एक ऐसी सीट जिताऊ के चक्कर में बीजेपी ने दूसरों को दे दी है। इन बाहरियों के आने से बीजेपी कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी साफ देखने को मिल रही है। 
(ये लेख Quint Hindi पर छपा है।)

Tuesday, January 10, 2017

उत्तर प्रदेश में "परिवर्तन" का क्या होगा?

प्रख्यात समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि जिन्दा कौमें 5 साल तक इंतजार नहीं करती हैं। लेकिन, देश के सबसे बड़े सूबे में समाजवादी सरकार के मुखिया अखिलेश यादव 5 साल के बाद भी उत्तर प्रदेश की जनता को परिवर्तन की आहट ही सुना पा रहे हैं। और इसी परिवर्तन की आहट के जरिये वो उत्तर प्रदेश की जनता को संदेश देना चाह रहे हैं कि प्रदेश के लोगों की भलाई दोबारा समाजवादी पार्टी की सरकार लाने में ही है। और इसे बौद्धिक तौर पर मजबूती देने के लिए अखिलेश यादव के इस कार्यकाल पर एक किताब आई है। इस किताब में परिवर्तन की आहट बताता अखिलेश के भाषणों का संकलन है। कमाल की बात ये है कि आमतौर पर परिवर्तन की बात विपक्ष सत्ता हासिल करने के लिए करता है। लेकिन, उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य बनने जा रहा है, जहां चुनावी लड़ाई परिवर्तन के ही इर्द गिर्द हो रही है। फिर चाहे वो सत्ता पक्ष हो या विपक्ष। सरकार में आने के लिए विपक्ष सत्ता परिवर्तन की लड़ाई लड़ता है। इसीलिए भारतीय जनता पार्टी का परिवर्तन पर खास जोर देना आश्चर्यजनक नहीं लगता। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष विशेषकर परिवर्तन पर जोर देते हैं। भारतीय जनता पार्टी की पूरी चुनावी रणनीति इसी एक शब्द के इर्दगिर्द बुनी हुई दिखती है। परिवर्तन रथयात्रा और परिवर्तन महारैली ये भारतीय जनता पार्टी के दो सबसे बड़े चुनावी अस्त्र नजर आ रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी अपनी यात्रा और रैली के जरिये ये बताने की कोशिश कर रही है कि उत्तर प्रदेश की जनता को अगर देश के सबसे बड़े सूबे का खोया हुआ सम्मान हासिल करना है, तो उसे परिवर्तन करना होगा। और वो परिवर्तन भारतीय जनता पार्टी की सरकार के आने से होगा।

बीजेपी राजनीतिक तौर पर उत्तर प्रदेश सरकार की नाकामियों, कानून व्यवस्था और परिवारिक झगड़े को मुद्दा बनाए हुए है। साथ ही केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की उन योजनाओं का भी जिक्र परिवर्तन के साथ किया जा रहा है जिससे देश के साथ उत्तर प्रदेश के लोगों को भी सीधे लाभ मिलता दिखे। और इसीलिए अमित शाह हों या बीजेपी की परिवर्तन रथयात्रा के नेता, मोदी सरकार की हर योजना को एक सांस में लोगों को बताना नहीं भूलते। राजनीतिक लड़ाई के साथ बौद्धिक लड़ाई में भी भारतीय जनता पार्टी अब परिवर्तन की ही बात कर रही है। और इस बौद्धिक लड़ाई में परिवर्तन की ब्रांडिंग का जिम्मा बीजेपी के थिंक टैंक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध संस्थान ने ले लिया है। संस्थान के निदेशक अनिर्बान गांगुली की मूल भाषा अंग्रेजी है। लेकिन, पिछले कुछ समय में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध संस्थान ने हिन्दी को लेकर ढेर सारे शोध पत्र, पुस्तकें प्रकाशित की हैं। और अब परिवर्तन की ओर नाम से एक पुस्तक संस्थान लेकर आया है। अनिर्बान गांगुली कहते हैं कि ये कहना गलत होगा कि बीजेपी ने ये पुस्तक लिखी या लिखवाई है। निश्चित तौर पर इस पुस्तक में नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद देश में अलग-अलग क्षेत्रों में हुए परिवर्तन की चर्चा है। लेकिन, इसे लिखने वाले कहीं से भी बीजेपी से सम्बद्ध नहीं हैं। ये स्वतंत्र लेखकों की ओर से स्वतंत्र तौर पर केंद्र सरकार की नीतियों की समीक्षा है। वैसे तो ये किताब केंद्र सरकार की नीतियों के असर पर है। लेकिन, बीजेपी इसका फायदा उत्तर प्रदेश के चुनावों में लेना चाहती है।
बीजेपी परिवर्तन की ओर ले जाने की बात कर रही है, तो समाजवादी पार्टी या कहें कि अखिलेश यादव प्रदेश की जनता को परिवर्तन की आहट सुनाना चाह रहे हैं। डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध संस्थान की ये किताब 168 पन्ने की जिसमें कुल 28 लेखकों ने लिखा है। जबकि, अखिलेश यादव की किताब परिवर्तन की आहट पूरी तरह से अखिलेश यादव के दिए गए भाषणों का संग्रह है। करीब सवा दो सौ पृष्ठ की इस किताब में 34 शीर्षकों से प्रदेश में समाजवादी सरकार के कामों का ब्यौरा दिया गया है। साथ ही अखिलेश यादव ने इस किताब के जरिये भावनात्मक तौर पर भी यूपी की जनता से जुड़ने की कोशिश की है। बीजेपी सरकार बदलने के लिए परिवर्तन की ओर जाने की बात कर रही है तो अखिलेश यादव परिवर्तन की आहट के जरिये प्रदेश की जनता को ये समझाना चाह रहे हैं कि परिवर्तन की आहट पिछले 5 सालों में सुनाई देने लगी है लेकिन, परिवर्तन के लिए जनता को उन्हें एक मौका और देना चाहिए। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश की जनता के सामने दो बड़ी पार्टियां परिवर्तन की दुहाई दे रही हैं। अब देखना है कि उत्तर प्रदेश की जनता को परिवर्तन की आहट सुनाई देती है या वो परिवर्तन की ओर चल देती है। 

Friday, December 02, 2016

बीजेपी संगठन में भला कोई क्यों काम करे?

भारतीय जनता पार्टी ने लम्बे समय से इंतजार कर रही दिल्ली और बिहार इकाई को उनका नया अध्यक्ष दे दिया है। मनोज तिवारी को दिल्ली का अध्यक्ष बना दिया गया है। साथ ही बिहार इकाई का अध्यक्ष नित्यानंद राय को बना दिया गया है। उत्तर पूर्वी दिल्ली से बीजेपी सांसद मनोज तिवारी गायक हैं, भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता हैं। संगठन में कोई खास काम नहीं किया है। लोकसभा चुनाव के ठीक पहले ही बीजेपी में आए हैं। नित्यानंद राय 4 बार विधायक रहे हैं और इस समय उजियारपुर संसदीय क्षेत्र से सांसद हैं। पहली नजर में तिवारी और राय के बीच कोई समानता नहीं नजर आती। लेकिन, इन दोनों के बीच एक ऐसी समानता है जिसने चुनाव वाले राज्य उत्तर प्रदेश के बीजेपी नेताओं की परेशानी बढ़ा दी है। दरअसल दोनों ही लोकसभा सांसद हैं। जनप्रतिनिधि हैं यानी चुनाव में इनको पहले टिकट मिला, फिर पदाधिकारी भी बना दिए गए। यही वो समानता है जिसने यूपी बीजेपी के नेताओं की परेशानी बढ़ा दी है। बीजेपी के टिकट की कतार में लगे नेता नई उलझन में हैं। दरअसल बीजेपी में एक अनकहा सा फरमान है कि किसी भी पार्टी पदाधिकारी को टिकट नहीं दिया जाएगा। इस चक्कर में कई लोगों को यूपी बीजेपी की नई टीम बनाते समय उसमें शामिल नहीं किया गया। उसके पीछे बड़ी सीधी सी वजह ये कि पार्टी पदाधिकारी चुनाव लड़ाने का काम करेंगे और ज्यादा से ज्यादा सीटों पर पार्टी प्रत्याशी को जिताने में जुटेंगे जबकि, खुद चुनाव लड़ने पर प्रत्याशी सिर्फ अपनी सीट के बारे में ही सोच सकेगा। इसी फॉर्मूले के तहत बहुत से लोगों को बीजेपी में पदाधिकारी नहीं बनाया गया। चुनावी रणनीति के लिहाज से ये काफी हद तक सही भी माना जा सकता है। लेकिन, उत्तर प्रदेश में हालिया पदाधिकारियों की नियुक्ति ने बीजेपी नेताओं को एक नई पहेली सुलझाने के लिए दे दी है। वो पहेली ये कि क्या अब बीजेपी में ज्यादातर पदाधिकारी सिर्फ जनप्रतिनिधि ही होंगे। कम से कम हाल में नियुक्त पदाधिकारियों के चयन से तो यही संदेश जाता दिखता है। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या बनाए गए। केशव इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से चुनकर आए हैं।

केशव के अलावा शिवप्रताप शुक्ला उत्तर प्रदेश बीजेपी के उपाध्यक्ष हैं और साथ ही उन्हें पार्टी ने राज्यसभा में भी भेज दिया है। दूसरे उपाध्यक्षों में धर्मपाल सिंह विधायक हैं, आशुतोष टंडन (गोपाल) विधायक हैं। गोपाल टंडन लालजी टंडन के बेटे हैं। कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह भी सांसद हैं और प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। सांसद सतपाल सिंह को भी प्रदेश का उपाध्यक्ष बनाया गया है। सुरेश राणा भी विधायक हैं, साथ ही प्रदेश उपाध्यक्ष भी। कानपुर से विधायक सलिल विश्नोई को भी पार्टी का महामंत्री बनाया गया है। जनप्रतिनिधियों का कब्जा सिर्फ अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महामंत्री की कुर्सी तक ही नहीं है। एक महिला मोर्चा को छोड़कर यूपी में बीजेपी के सभी मोर्चे के अध्यक्ष जनप्रतिनिधि ही हैं। पिछड़ा मोर्चा का अध्यक्ष राजेश वर्मा को बनाया गया है। राजेश वर्मा सीतापुर से सांसद हैं। युवा इकाई का अध्यक्ष सुब्रत पाठक को बनाया गया है। सुब्रत पाठक कन्नौज से डिम्पल यादव के खिलाफ चुनाव लड़े थे और करीब 15 हजार मतों से हार गए थे। यानी पार्टी ने पहले सुब्रत को टिकट दिया और अब उन्हें पदाधिकारी भी बना दिया। सुब्रत पाठक कन्नौज के मजबूत नेताओं में हैं। लेकिन, सवाल वही है कि क्या बीजेपी में राजनीति करने वाले सिर्फ वही नेता महत्व पाएंगे, जो टिकट पाकर चुनाव जीत सकेंगे या चुनाव जीतने की हैसियत रखते हैं। यहां तक कि यूपी में अनुसूचित मोर्चा के अध्यक्ष कौशल किशोर भी सांसद हैं और अनुसूचित जनजाति मोर्चा अध्यक्ष छोटेलाल खरवार सोनभद्र से सांसद हैं। राजेश वर्मा और कौशल किशोर दोनों ही लोकसभा चुनाव से ठीक पहले ही बीजेपी में आए हैं। जनप्रतिनिधि को ही पदाधिकारी बनाने और पदाधिकारी को ही जनप्रतिनिधि बना देने की ये नई परम्परा यहीं खत्म नहीं होती है। उत्तर प्रदेश को अपने काम के लिहाज से बीजेपी ने 8 क्षेत्रों में बांट रखा है। उन 8 क्षेत्रों में से 3 के अध्यक्ष जनप्रतिनिधि ही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाले काशी क्षेत्र के अध्यक्ष  लक्ष्मण आचार्य हैं और उन्हीं को पार्टी ने विधान परिषद सदस्य भी बनाया। पश्चिम क्षेत्र के अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह विधान परिषद के सदस्य हैं। अवध क्षेत्र के अध्यक्ष मुकुट बिहारी वर्मा भी विधायक हैं।


सामान्य तौर पर देखने पर इसमें कोई भी गड़बड़ी नजर नहीं आती। लेकिन, ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों का आधार मजबूत करने में बड़े आधार वाले नेताओं के साथ शानदार संगठन करने वाले नेताओं की भी बड़ी भूमिका रही है। भारतीय जनता पार्टी तो मूलत: संघ के पूर्णकालिक संगठन मंत्रियों के आधार पर संगठन तैयार करने वाली पार्टी रही है। जहां संगठन में अच्छा काम करने वालों को ही पदाधिकारी बनाए जाने की परम्परा रही है। अब सवाल ये है कि अगर जनप्रतिनिधियों को ही पदाधिकारी और पदाधिकारी को ही मनोनीत जनप्रतिनिधि बनाने की ये परम्परा मजबूत हो रही है, तो कौन संगठन का काम करेगा। भारतीय जनता पार्टी सत्ता में है, लगातार चुनाव जीत रही है। अभी हो सकता है कि इस गलत परम्परा के खतरे न दिख रहे हों। लेकिन, जब पार्टी का चुनावी आधार हल्का पड़ेगा, तो संगठन में काम करने वाले भी शायद ही मिलेंगे। संगठन हो या सरकार बीजेपी कुछ ही लोगों के हाथ में हर तरह की सत्ता जाने के बड़े खतरे की ओर बढ़ रही है। 
(ये लेख QUINTHINDI पर छपा है)

Saturday, September 03, 2016

यूपी के 2.5 करोड़ स्मार्टफोन में कमल निशान चाहते हैं अमित शाह

उत्तर प्रदेश में अभी चुनाव आयोग ने कोई तारीख नहीं दी है। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के तो प्रत्याशी भी तय नहीं हैं। इसलिए चुनावी हलचल जमीन पर बहुत ज्यादा नजर नहीं आती। लेकिन, सोशल मीडिया पर सितंबर महीने से भारतीय जनता पार्टी के लिए युद्धस्तर पर जुटने का वक्त है। और इसका आगाज खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह करेंगे। 3 सितंबर को लखनऊ के राममनोहर लोहिया विश्वविद्यालय के भीमराव अंबेडकर ऑडीटोरियम में भारतीय जनता पार्टी सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट कर रही है। एक समय में वन बूथ ट्वेंटी यूथ का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी अब यूथ को पकड़ने के लिए बूथ की जगह स्मार्टफोन के रास्ते पर खड़ी है। स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाला कोई भी, खासकर नौजवान, छूटने न पाए। उत्तर प्रदेश में मई 2014 से आगे बढ़ने का अमित शाह का मंत्र यही है। इसीलिए अमित शाह के हवाले से कई बार ये खबर मीडिया में आती रही है कि विधानसभा चुनाव चाहने वाले से फेसबुक पर कम से कम 25 हजार लोग जुड़ होने चाहिए। ये उसी सोशल मीडिया मंत्र का विस्तार है। हालांकि, खुद अमित शाह बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं से सीधे मिलने के पारंपरिक तरीके में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। लेकिन, सोशल मीडिया के इस युग में शाह को अच्छे से पता है कि अपनी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक आसानी से पहुंचाने का सबसे आसान और प्रभावी जरिया स्मार्टफोन है। इसीलिए उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के आईटी विभाग को साफ निर्देश है कि स्मार्टफोन वाले नौजवान को पकड़ने की रणनीति तैयार करें। इसी की विधिवत शुरुआत 3 सितंबर को सोशल मीडिया वॉलंटियर मीट से अमित शाह करेंगे। उत्तर प्रदेश के चुनाव में सोशल मीडिया भारतीय जनता पार्टी के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी बात से लग सकता है कि अभी तक नया प्रदेश अध्यक्ष आने के बाद कोई मीडिया मीट या कार्यशाला नहीं हुई है। जबकि, सोशल मीडिया की कई कार्यशालाएं पहले ही की जा चुकी हैं।

उत्तर प्रदेश में एक मोटे अनुमान के मुताबिक करीब डेढ़ करोड़ फेसबुक यूजर्स हैं। और व्हाट्सएप इस्तेमाल करने वालों की संख्या करीब 5 करोड़ है। इसीलिए बीजेपी उत्तर प्रदेश में व्हाट्सएप इस्तेमाल करने वालों को पकड़ने के ही चक्कर में है। बीजेपी का मानना है कि ढाई करोड़ व्हाट्सएप यूजर्स हैं जो बीजेपी के साथ जुड़ सकते हैं। इसीलिए इन्हीं ढाई करोड़ व्हाट्सएप यूजर्स के मोबाइल में कमल निशान पक्का बनाने की योजना पर बीजेपी काम कर रही है। बीजेपी से जुड़े व्हाट्सएप समूहों और फेसबुक पेज पर या फिर अपने ही फेसबुक अकाउंट से भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में लिखने वालों की भी सूची तैयार की जा रही है। चाहे वो भारतीय जनता पार्टी से सीधे कार्यकर्ता के तौर पर जुड़े हों या न जुड़े हों। 3 सितंबर को होने लखनऊ में होने वाली सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट में ऐसे लोगों को शामिल करने पर ज्यादा जोर है, जो अभी तक बीजेपी से नहीं जुड़े हैं लेकिन, बीजेपी के पक्ष में नियमित तौर पर लिख रहे हैं। बीजेपी आईटी विभाग के मुताबिक, करीब 8 हजार लोगों ने अभी तक सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट के लिए पंजीकरण किया है। हालांकि, कुल पांच हजार लोगों के ही कार्यक्रम में शामिल होने की उम्मीद है। इन 5 हजार लोगों में से आधे से ज्यादा तो अभी भी बीजेपी से किसी न किसी तरह से जुड़े हुए हैं। इसीलिए नए आने वाले लोगों को बीजेपी अपने चुनावी अभियान में अच्छे से जोड़ने की योजना बना रही है। उत्तर प्रदेश बीजेपी आईटी विभाग के एक नेता का कहना है कि 25 से 45 साल के बीच के ज्यादातर स्मार्टफोन यूजर किसी राजनौतिक दल के कार्यकर्ता नहीं हैं। ऐसे लोग किसी बड़े नेता की रैली छोड़कर राजनैतिक कार्यक्रमों में कम ही शामिल होते हैं। क्योंकि, वो अपनी नौकरी, रोजगार में व्यस्त हैं या फिर पारिवारिक जीवन के मजे ले रहे हैं। लेकिन, फेसबुक और व्हाट्सएप पर अगर उनको राजनीतिक रूप से जोड़ा जाए, तो वो आसानी से सक्रिय हो जाते हैं। और पार्टी की नीतियों, केंद्र सरकार के कामों को नीचे तक ले जाने में मददगार होते हैं। 

सोशल मीडिया के जरिए सक्रिय लोगों के अपने पक्ष में होने का बड़ा फायदा अभी हाल के दिनों में बीजेपी को मिल चुका है। जब मुख्य धारा का मीडिया दयाशंकर सिंह के बेहूद बयान के खिलाफ पूरी पार्टी को लानत भेजने में लगा था। लेकिन, सोशल मीडिया पर एक ही दिन बाद दयाशंकर की बेटी और पत्नी को चेहरा बनाकर पूरा माहौल खड़ा कर दिया गया। बाद में पीछे से बीजेपी ने भी इस अभियान को जमकर समर्थन दिया। बेटी के सम्मान में, भाजपा मैदान में नारे के साथ बीजेपी भले सड़कों पर उतरी। लेकिन, ये नारा किसी बीजेपी नेता के दिमाग में नहीं उपजा था। ये नारा उसी सोशल मीडिया ब्रिगेड ने उछाला था जो, बीजेपी के लिए सोशल मीडिया पर स्वत:स्फूर्त तरीके से काम कर रही है। उसी ताकत को संगठित करने की योजना पर अमित शाह काम कर रहे हैं।
लखनऊ में हो रही सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट की जमीन पहले ही तैयार कर ली गई थी। यूपी बीजेपी ने काम के लिहाज से उत्तर प्रदेश को 6 क्षेत्रों में बांट रखा है। उन सभी 6 क्षेत्रों में आईटी विभाग कार्यशाला कर चुका है। ब्रज क्षेत्र में 2 कार्यशालाएं की गईं। 10 जुलाई को प्रदेश की एक कार्यशाला भी हो चुकी है। 3 सितंबर की सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट के बाद बीजेपी प्रदेश की हर कमिश्नरी पर सोशल मीडिया कार्यशाला कराने की योजना बना रही है। औसतन 4 जिले पर एक कमिश्नरी है। उत्तर प्रदेश में कुल 18 कमिश्नरी हैं। साथ ही बीजेपी प्रदेश के हर विकास खंड में सोशल मीडिया यूनिट खड़ी करने की तैयारी कर रही है। विकासखंड को बीजेपी अपने काम के लिहाज से मंडल कहती है और प्रदेश में बीजेपी के 1500 मंडल हैं। 15 सितंबर तक बीजेपी इन सभी मंडलों में अपनी यूनिट बनाने की कोशिश कर रही है। इसके बाद ग्राम पंचायत तक पहुंच बनाने की कोशिश होगी। बीजेपी के रणनीतिकारों का ये भी मानना है कि शहरों की अपेक्षा गांव में सोशल मीडिया के जरिये बनाई गई पहुंचा का ज्यादा लंबा असर होता है। गांव में एक बार कोई सूचना लोगों तक पहुंचा दी गई, तो गांव के लोग नई सूचना आने तक उसी आधार पर बात करते हैं। इसलिए चुनाव पूरा होने तक व्हाट्सएप और फेसबुक के जरिये बीजेपी नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की अच्छाइयों से हर स्मार्टफोन भर देने की योजना पर काम कर रही है। 2017 का विधानसभा चुनाव जीतने का ये सबसे बड़ा नुस्खा है। 

Monday, August 22, 2016

बाबू सिंह कुशवाहा की तरह दिखने लगे हैं स्वामी प्रसाद मौर्या

बीजेपी में शामिल हुए स्वामी प्रसाद मौर्या (bjp.org)
बीएसपी के एक पूर्व सांसद ब्रजेश पाठक भी बीजेपी में शामिल हो गए हैं। दिल्ली में उन्होंने मायावती को छोड़कर अमित शाह को अपना नेता मान लिया। कल तक वो आगरा में थे, बहन जी की रैली के संयोजक थे। आगरा से बढ़िया एक्सप्रेस वे मिला, तो सीधे 11 अशोक रोड पहुंच गए। आगरा से दिल्ली डेढ़ घंटे का ही रास्ता है और उन्होंने बीएसपी से बीजेपी की दूरी भी डेढ़ दिन से कम में तय कर ली। दिल्ली के बीजेपी कार्यालय से आ रही तस्वीरें ठीक वैसी ही हैं, जैसी 2012 में थीं। 2012 के विधानसभा चुनावों के पहले भी दूसरे दलों से भारतीय जनता पार्टी में हो रही भगदड़ से ऐसा लगने लगा था कि भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ रही है। लगभग ऐसा ही दृष्य बना था। बहुजन समाज पार्टी के कद्दावर नेता बाबू सिंह कुशवाहा भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे। बाबू सिंह कुशवाहा के अलावा बादशाह सिंह, दद्दन मिश्रा, अवधेश वर्मा और जिलों में तो जाने कितने छोटे बड़े नेता हाथी से उतरकर कमल का फूल पकड़ने को बेताब हो रहे थे। हालांकि, 2012 और 2017 के बीच में 2014 भी आया था। 2014 के बाद की भारतीय जनता पार्टी एकदम अलग है। पार्टी पूरी तरह से नेतृत्व के पीछे एकजुट है। मोदी-शाह के फैसलों पर जरा भी किंतु-परंतु नहीं है। नितिन गडकरी के लिए फैसले पर फिर भी कई नेता किंतु-परंतु लगा देते थे। इस समय सरकार में नरेंद्र मोदी और संगठन में अमित शाह चुनावी प्रबंधन के बड़े उस्ताद हैं। लेकिन, जिस तरह से दूसरे दलों से नेता कूदकर भारतीय जनता पार्टी के पाले में आ रहे हैं, उससे एक खतरा तो बढ़ रहा है। वो खतरा है पार्टी में 2014 के पहले से और 2014 के बाद भी अभी तक मजबूती से अपने लिए जमीन बना रहे बीजेपी कार्यकर्ताओं की बढ़ती कुंठा। ये बड़ा खतरा है। क्योंकि, बाहर से आने वाला हर नेता सीधे टिकट की दावेदारी ही जता रहा है। और सिर्फ दावेदारी ही नहीं जता रहा है। बल्कि, भारतीय जनता पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता पर अमर्यादित टिप्पणी भी कर रहा है।


बाबू सिंह कुशवाहा की ही तरह मायावती के बेहद नजदीकी नेताओं में शुमार स्वामी प्रसाद मौर्या भारतीय जनता पार्टी के नेता बन चुके हैं। लेकिन, उनका अपना संगठन भी काम कर रहा है। ये  वो संगठन है, जो स्वामी प्रसाद मौर्या ने बहन जी को नेता न मानने और आखिरकार अमित शाह को नेता मान लेने के बीच बनाया है। उसी संगठन लोकतंत्र बहुजन मंच की 20 सितंबर को लखनऊ में रैली है। इलाहाबाद में मौर्या उसी रैली की तैयारी के सिलसिले में मंडलीय बैठक कर रहे थे। अपने संगठन के कार्यकर्ताओं को रैली के लिए तैयार करते, जोश भरते स्वामी प्रसाद मौर्या ने बीजेपी कार्यकर्ताओं का जोश ठंडा कर दिया। अगले दिन इलाहाबाद के अखबारों में सुर्खियां बीजेपी कार्यकर्ताओं के लिए अपमानजनक टिप्पणी की तरह थी। इलाहाबाद में स्वामी प्रसाद मौर्या ने कहाकि जो लोग बाहर से आकर भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने वालों का विरोध कर रहे हैं, वो भाजपा के दुश्मन हैं। स्वामी प्रसाद मौर्या ने और आगे जाते हुए कहाकि इन्हीं लोगों की वजह से भाजपा पिछले बीस सालों से सत्ता से बाहर है। मौर्या ने कहाकि बीजेपी की दशा बाहरी का विरोध करने की मानसिकता की वजह से ही खराब है। उन्होंने कहाकि जिसमें ताकत होगी वो टिकट ले लेगा। हालांकि, चुनाव लड़ने और प्रचार करने पर मौर्या ने कहाकि जो नेतृत्व तय करेगा, वही करेंगे। आने वाली सरकार भाजपा की है और वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में काम करेंगे। सवाल यही है कि क्या बिना निष्ठावान बीजेपी नेताओं, कार्यकर्ताओं के, बाहरी नेता, कार्यकर्ता के बूते बीजेपी उत्तर प्रदेश में सत्ता में आ रही है। इसका जवाब तो चुनाव के बाद आएगा। लेकिन, परिस्थितियों से तुलना करें तो 2012 याद आता है। इलाहाबाद के एक बीजेपी नेता ने कहा जब अभी ये हाल है, तो टिकट बंटवारे के समय क्या होगा। इलाहाबाद की तीन सीटों पर स्वामी प्रसाद मौर्या के विश्वस्त बसपाई ताल ठोंक रहे हैं और पहले से बीजेपी के निष्ठावान नेताओं के पसीने छूट रहे हैं। इससे स्वामी प्रसाद मौर्या के अपने पुराने साथी बाबू सिंह कुशवाहा की गति प्राप्त करने की आशंका बढ़ती जा रही है। इलाहाबाद की शहर उत्तरी विधानसभा, जहां बीजेपी बहुत मजबूत मानी जाती है, वहां भी टिकट की दावेदारी बीएसपी से बीजेपी में हाल में शामिल नेता मजबूती से कर रहे हैं। बीजेपी में माना जाता है कि प्रत्याशी चयन में अंतिम मुहर तो सर्वे के आधार पर ही पक्की लगती है। ये भी एक छोटा सा सर्वे माना जा सकता है, बीजेपी में बाहर से आए नेताओं पर करीब डेढ़ दशक से बिना सत्ता की बीजेपी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं, नेताओं की राय। दूसरे सैनिकों को तो अपने सेनापति के पीछे कितना भी खड़ा किया जा सकता है। लेकिन, दूसरे के सेनापतियों के पीछे अपनी सेना खड़ा करना शायद नई राजनीतिक रणनीति है। 
(ये लेख quint Hindi पर छपा है)

Monday, April 11, 2016

दलित-पिछड़े की पार्टी दिखने को बेकरार भाजपा

भारतीय जनता पार्टी मई 2014 से आगे बढ़ने का रास्ता तलाश रही है। ये तलाश इसलिए भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती हैं क्योंकि, दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनाव परिणामों से ये लगने लगा है कि भारतीय जनता पार्टी मई 2014 से पीछे जा रही है। इसीलिए भारतीय जनता पार्टी ने आखिरकार पूरा समय लेने के बाद पांच राज्यों के अध्यक्ष तय कर दिए। पार्टी संगठन और समर्थकों, कार्यकर्ताओं के लाख दबाव के बावजूद राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इन पांचों राज्यों के अध्यक्ष नामित करने में इतना समय लिया, जो राजनीतिक और रणनीतिक लिहाज से खतरनाक होता दिखता है। लेकिन, अच्छी बात ये है कि अमित शाह ने इन पांचों राज्यों में लगभग भविष्य की भारतीय जनता पार्टी की रूपरेखा जाहिर की है। हालांकि, भारतीय जनता पार्टी का वर्तमान भी यही है। लेकिन, सबके बावजूद भारतीय जनता पार्टी पर सवर्ण और उसमें भी ब्राह्मण बनिया की पार्टी होने का जो ठप्पा लगा है। उसे अमित शाह पूरी तरह से खत्म कर देना चाहते हैं। सैद्धांतिक और काफी हद तक व्यवहारिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी के नेता, कार्यकर्ता ये कह सकते हैं कि भाजपा में जाति से किसी की कुर्सी तय नहीं होती है। लेकिन, भारतीय राजनीति जाति से ही चलती है, चल रही है। इसमें जरा सा भी संदेह किसी को शायद ही हो। और इसीलिए जब इस जातिवादी राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के ऊपर दलितों-पिछड़ों का हक मारने की साजिश करने वाली पार्टी की ठप्पा लगाने की कोशिश तेज हुई, तो अमित शाह ने पूरा दांव ही पलट दिया। ताजा बने पांच प्रदेश अध्यक्षों में से चार पिछड़ी जाति से आते हैं। जबकि, एक दलित। यही पांच प्रदेश अध्यक्ष भाजपा का नया सामाजिक-राजनीतिक समीकरण हैं।

ताजा बने प्रदेश अध्यक्षों में से पंजाब और उत्तर प्रदेश तो तुरंत चुनाव वाले राज्य हैं। पंजाब में पार्टी ने दलित नेता विजय सांपला को पार्टी की कमान सौंपी है। सांपला के बारे में बताया जाता है कि उन्होंने मंडियों में बोझ उठाने का काम किया है। इसी तरह से उत्तर प्रदेश के नए अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या के सबसे बड़े विशेषणों में से एक अपने पिता के साथ चाय बेचना भी है। चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री बन गया की सफलता से भारतीय जनता पार्टी इस कदर उत्साहित दिख रही है कि ज्यादातर नेताओं को जमीनी और बेहद कमजोर पृष्ठभूमि का साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। और मीडिया को भी ऐसी सुर्खियां लुभाती हैं। इसीलिए केशव मौर्या की नियुक्ति को सभी ने चाय बेचने से जरूर जोड़ा। वैसे केशव प्रसाद मौर्या का चयन करके अमित शाह ने बेहतर रणनीति तैयार कर दी है। पहले के अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने पिछले करीब चार सालों में उत्तर प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी को एक नई धार दे दी थी। अब उसी जमीन को और बेहतर करने की जिम्मेदारी केशव प्रसाद मौर्या पर होगी। केशव इलाहाबाद जिले की फूलपुर सीट से सांसद हैं। लेकिन, केशव की खासियत ये है कि वो पिछड़ी कुशवाहा जाति से हैं। जो राजनीतिक तौर पर उत्तर प्रदेश में किसी दल के साथ निष्ठावान नहीं है। बाबू सिंह कुशवाहा ही इस समाज के बड़े नेता था। अच्छा है कि इस बार भाजपा ने पुरानी गलती न करके अपना नेता खड़ा करने का मन बनाया है। हालांकि, उत्तर प्रदेश में भाजपा की सत्ता कल्याण सिंह से ही जुड़ी हुई है। जो लोध जाति से आते हैं। लेकिन, इसके बावजूद कलराज सिंह और राजनाथ सिंह के चमकते चेहरे उत्तर प्रदेश के पिछड़ी जाति के लोगों में भाजपा के अपनी पार्टी होने का भरोसा नहीं जगा पाते हैं। जबकि, तेज तर्रार नेता और केंद्रीय मंत्री उमा भारती भी लोध जाति से ही आती हैं। इस सबके बावजूद भारतीय जनता पार्टी सवर्णों की ही पार्टी बनी रही। इसीलिए अब जब खुद अमित शाह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और सवर्ण नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पिछडी जाति से हैं। उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष पिछड़ी जाति से होने भारतीय जनता पार्टी के सवर्णों की पार्टी होने की अवांछित छवि से मुक्त करने में मददगार होगा। अच्छी बात ये है कि केशव पिछड़ी जाति से हैं लेकिन, पिछड़ों के नेता नहीं हैं। केशव हिंदुत्ववादी नेता हैं। अशोक सिंघल की छत्रछाया में पले-बढ़े केशव से इस वजह से सवर्ण भी कम बिदकेंगे। हालांकि, केशव के लिए यही चुनौती भी है कि पार्टी की ब्राह्मण-बनिया वाली छवि से पिछड़ों-दलितों की हितैषी पार्टी बनने के इस क्रम में सवर्ण खासकर ब्राह्मण नाराज न हो जाए। ये इसलिए भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि लक्ष्मीकांत बाजपेयी की ही कुर्सी केशव मौर्या को संभालनी है। केशव को इस बात का अंदाजा है। इसीलिए केशव ने शुरुआत बाजपेयी के कार्यकाल की तारीफ से ही की है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि लक्ष्मीकांत बाजपेयी को राष्ट्रीय टीम में शामिल किया जा सकता है।


सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं पंजाब और कर्नाटक में भी ब्राह्मण अध्यक्षों की जगह दलित और पिछड़े नेता को अमित शाह ने भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष बनाया है। कर्नाटक में प्रहलाद जोशी और पंजाब में कमल शर्मा भारतीय जनता पार्टी की कमान संभाल रहे थे। कर्नाटक में तो बी एस येदियुरप्पा स्थापित रहे हैं। और इतने स्थापित रहे हैं कि इतने भ्रष्टाचार के आरोप, नई पार्टी बनाने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी में येदियुरप्पा का विकल्प तैयार नहीं हो सका है। इसलिए येदियुरप्पा के पिछड़ी जाति से होने से ज्यादा उनका मजबूत जनाधार उनकी ताजपोशी की वजह बना। येदियुरप्पा ही नए बने प्रदेश अध्यक्षों में अकेले बड़े जनाधार वाले नेता हैं। बाकी के सभी अध्यक्षों को अपने राज्य का नेता बनने के लिए और अमित शाह की पार्टी की छवि बदलने की कोशिश को सफल करने के लिए कड़ी मेहनत करना होगा। पंजाब में अकालियों के साथ भारतीय जनता पार्टी की दो बार से सरकार है। अगर दिल्ली और बिहार के फैसले भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ नहीं गए होते, तो पंजाब में बादल पिता-पुत्र की जोड़ी से किनारा करने का फैसला अमित शाह ने उसी समय ले लिया होता। लेकिन, बदली परिस्थितियों में सत्ता विरोधी लहर को कम करने के लिए एक दलित नेता विजय सांपला को प्रदेश अध्यक्ष बनाना बेहतर साबित हो सकता है। आम आदमी पार्टी जिस तरह से पंजाब में आक्रामक है। उसमें भारतीय जनता पार्टी को शहरी मतदाताओं के अलावा गांव में भी मतदाता समूह चाहिए था। और उस कमी को विजय सांपला पूरी कर सकते हैं। तेलंगाना में पिछड़ी जाति से आने वाले के लक्ष्मण और अरुणाचल प्रदेश में पूर्व सांसद तापिर गांव को अध्यक्ष की कुर्सी सौंपना भी अमित शाह की पार्टी की छवि बदलने वाली कवायद को ही मजबूत करने की कोशिश दिखती है। ये कोशिश सफल हुई, तो भारतीय जनता पार्टी मई 2014 से आगे भले न बढ़े लेकिन, कम से कम उस जगह पर मजबूती से खड़ी रह सकती है। लेकिन, उत्तर प्रदेश के संदर्भ में सावधानी बेहद जरूरी है कि मामला आधी छोड़ पूरी को धावै, आधी मिलै न पूरी पावै वाला न हो जाए। क्योंकि, राजनीति में बहुत ज्यादा जाति जोड़ने पर जाति जुड़कर घटती ही जाती है। लेकिन, छवि बदलने की अमित शाह की इस कोशिश की तारीफ की जा सकती है। 

Friday, December 05, 2014

बंगाल में दक्षिणपंथ, दीदी और वामपंथ

अमित शाह को अभी भी राष्ट्रीय मीडिया भारतीय जनता पार्टी के पुराने राष्ट्रीय अध्यक्षों की तरह सम्मान देने को तैयार नहीं है। दिल्ली में बैठे पत्रकार अभी भी ये मानने को तैयार ही नहीं हैं कि भारतीय जनता पार्टी को जो अप्रत्याशित सफलता देश के हर हिस्से में मिल रही है, उसमें मोदी लहर के अलावा अमित शाह की शानदार सांगठनिक क्षमता का भी कमाल है। अभी अगर ऐसी सफलता राजनाथ सिंह या किसी हिंदी पट्टी के नेता के नेतृत्व में बीजेपी को मिल रही होती तो यही हिंदी मीडिया उस अध्यक्ष को महानतम साबित कर देता। उसके पीछे सबसे बड़ी वजह ये है कि दिल्ली के पत्रकारों से या ये कह लें कि ज्यादातर पत्रकारों से अमित शाह कम ही मिलते-जुलते हैं। इस वजह से निजी तौर पर पत्रकारों के पास अमित शाह को समझने की दृष्टि कम ही बन पाती है। पत्रकार अमित शाह को गुजरात में नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद के तौर पर हर बुरे काम से जोड़कर याद करना ज्यादा पसंद करते हैं। उसके पीछे वजह ये कि आसानी से साबित किया जा सकता है। लेकिन, अगर अमित शाह को समझना है और अमित शाह की संगठन चलाने की क्षमता समझना है तो इसके लिए अमित शाह को सुनना होगा। फिर चाहे वो निजी बातचीत में हो या फिर अमित शाह को भाषणों को सुनना हो। मीडिया में उत्तर प्रदेश और बिहार से जुड़े पत्रकार सबसे ज्यादा हैं। इसलिए थोड़ा अंटक-अंटककर  फिर धाराप्रवाह हिंदी न बोलने वाला नेता उन्हें कम ही अपील कर पाता है। क्योंकि, वो हिंदी धाराप्रवाह न बोलने वाले नेता के भाषणा को ज्यादा सुनते भी नहीं हैं। मतलब ये कि अमित शाह खुद पत्रकारों से निजी तौर पर घुलना-मिलना कम ही पसंद करते हैं और अमित शाह की पुरानी छवि और धाराप्रवाह हिंदी न होने के कारण ज्यादातर हिंदी पत्रकार उनके भाषणों को दूसरे नेताओं की तरह ध्यान से सनते ही नहीं है। इससे हो ये रहा है कि अमित शाह को समझने का पत्रकारों का काम अधूरा ही रह जा रहा है और इसी आधार पर वो अपना विश्लेषण दे रहे हैं। जाहिर अधूरी समझ का विश्लेषण भी पूरा भला कैसे हो सकता है। अब ये बात मैं क्यों कह रहा हूं इसकी वजह बताता हूं। अमित शाह को जब उत्तर प्रदेश का  प्रभारी बनाया गया था तो उत्तर प्रदेश बीजेपी के एक नेता ने कहा अरे ई उत्तर प्रदेश है। अब अमित शाह हमें राजनीति बताएंगे। वो उत्तर प्रदेश के नेता बरसों से पार्टी कार्यालय में जमे हैं। उनकी राजनीतिक समझ इसी तरह से बनती बिगड़ती रही है। लेकिन, अमित शाह उत्तर प्रदेश में राजनीति समझने-समझाने नहीं, दरअसल संगठन बनाने आ रहे थे। और निजी बातचीत में कुछ ही दिन में उत्तर प्रदेश के नेता ये मानने लगे थे कि अमित शाह बोलते कम हैं लेकिन, काम बहुत ज्यादा करते हैं। संगठन की अमित शाह को गजब की समझ है। और इसीलिए जब लोकसभा चुनाव के समय अमित शाह मीडिया से मुखातिब होते थे तो अमित शाह मीडिया के किसी भी निष्कर्ष को एक झटके में खारिज कर देते थे। जाहिर है अमित शाह बेहतर समझ के साथ राजनीति कर रहे थे। इसीलिए मीडिया को हरियाणा और महाराष्ट्र में अक्खड़ अमित शाह तो नजर आया लेकिन, अपनी पार्टी संगठन के लिए दूसरों की योजना को मटियामेट करने वाला अमित शाह नजर नहीं आया।

अब अमित शाह जिस एजेंडे पर हैं वो मीडिया समझ तो रहा है लेकिन, अभी भी उसका सही विश्लेषण शायद नहीं कर पा रहा है। इसकी वजह ये कि कोलकाता में अमित शाह की रैली को विवादों के बाद मंजूरी तो  मीडिया की नजर में आई लेकिन, मीडिया की नजर में बहुत ज्यादा वो तैयारी नहीं आ पाई जो, कोलकाता रैली के लिए अमित शाह ने की थी। कोलकाता में वो एक बेहतर रैली कही जा सकती है। और सबसे बड़ी बात ये कि उस रैली में नौजवानों, महिलाओं की भागीदारी जमकर थी। अमित शाह वहां भी पूर्ण बहुमत वाली बीजेपी सरकार की बात कर रहे थे। क्योंकि, अमित शाह को ये पता है कि इसी बहुमत न पा सकने वाली पार्टी के तौर पर बीजेपी का चरित्र चित्रण पिछले छे दशकों में ऐसे हो चुका है कि गठजोड़ की बात आते ही बीजेपी दूसरे दर्जे की पार्टी नजर आने लगती है। इसीलिए अमित शाह कहीं भी गठजोड़ की बात नहीं कर रहे हैं। इसीलिए अमित शाह ने स्वाभाविक तौर पर साथी रही शिवसेना से भी किनारा करने में जरा सा भी गुरेज नहीं किया। यही अमित शाह की सबसे बड़ी ताकत है। अमित शाह को पता है कि उनकी ताकत तभी है जब भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत की सरकारें देश में चलाए। अमित शाह कोलकाता की रैली में तृणमूल कांग्रेस को घोटाले और आतंकवाद से जोड़ रहे थे। लेकिन, अमित शाह को पता है कि ये बंगाल है और यहां मुसलमानों का ध्रुवीकरण उनके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा साबित हो सकती है। इसीलिए जब रैली में भाषण करते उनके कानों में नमाज की आवाज सुनाई दी तो वो रुक गए और करीब चार मिनट तक शांत रहे। उन्होंने ये कहा भी कि ममता दीदी को कोई मौका नहीं देना है।

अमित शाह की ये रणनीति बंगाल में ये ममता बनर्जी के लिए तो चिंता की वजह है ही। राजनीतिक वामपंथ के लिए ये ज्यादा बड़ी चिंता की वजह बन सकता है। दरअसल जब बंगाल में ममता बनर्जी राजनीतिक वामपंथ से लड़ रहीं थीं तो चुपचाप उग्र, कट्टर वामपंथ ने धीरे से ममता की तृणमूल कांग्रेस की छांव में आना शुरु कर दिया था। दरअसल ये जो तृणमूल कांग्रेस और राजनीतिक वामपंथियों की लड़ाई बंगाल में पिछले कुछ समय से दिख रही है ये लड़ाई राजनीतिक वामपंथ और उग्र वामपंथ के बीच ही है। हां, उग्र वामपंथ ने तृणमूल कांग्रेस का बैनर जरूर थाम लिया है। लेकिन, अब जो खबरें आ रही हैं वो पहली बार हैं कि भारतीय जनता पार्टी और उससे जुड़े संगठन भी मुकाबले में हैं। बंगाल में अराजकता की राजनीति बहुत ज्यादा रही है। भले वो राष्ट्रीय मीडिया की नजर में इसलिए नहीं आती रही कि वामपंथ से जुड़े पत्रकार इस मसले पर लिखने-बोलने से बचते रहे। इसलिए वहां सड़कों पर खून खराबे से भी किसी राजनीतिक दल की ताकत का अंदाजा लगता है। अब भारतीय जनता पार्टी और उससे जुड़े संगठन भी सड़कों पर खून खराबे के मुकाबले में उतर पड़े हैं। इसका मतलब ये कि बंगाल की धरती पर दक्षिणपंथी, राजनीतिक और उग्र वामपंथ दोनों से लड़ने लायक हो गए हैं। और ये छोटी बात नहीं है। यही अमित शाह की सांगठनिक क्षमता का कमाल है। जबकि, पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी के संगठन की कमान जिन राहुल सिन्हा के हाथ में है वो कमजोर कड़ी माने जा रहे हैं। इसलिए ये भी चर्चा है कि अमित शाह यहां प्रदेश अध्यक्ष बदलकर किसी और को ला सकते हैं। कोई ऐसा जो पश्चिम बंगाल में बस चुके, कारोबार कर रहे हैं बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों को भी साध सके। राहुल सिन्हा की मुश्किल ये है कि देश भर में नरेंद्र मोदी की लहर और अमित शाह की सांगठनिक क्षमता के बावजूद वो बंगाल में संगठन में बेहतर लोगों को लाने में अक्षम साबित हुए हैं। यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी को बंगाल के बड़े चेहरों को बीजेपी से जोड़कर अपील तैयार करनी पड़ रही है। बाबुल सुप्रियो, बप्पी लाहिरी के बाद कुमार सानू और अभिनेत्री रितुपर्णोंसेन गुप्ता का भाजपा में आना इसी कवायद का हिस्सा है।

पश्चिम बंगाल अमित शाह की प्राथमिकता में है। इसीलिए अमित शाह ने प्रदेश भाजपा को एक करोड़ की सदस्यता का लक्ष्य दे रखा है। हालांकि, राहुल सिन्हा की अगुवाई वाली बीजेपी फिलहाल इसमें पिछड़ती सी दिख रही है। और दिल्ली में बीजेपी नेता इससे खुश नहीं है। अमित शाह हर मोर्चे पर चाक चौबंद हैं। इसीलिए पश्चिम बंगाल की बुद्धिजीवियों वाली धरती पर जाने माने पत्रकार और अभी भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता एम जे अकबर को लगाया गया है। एम जे अकबर की अगुवाई में एक बुद्धिजीवियों की रैली भी कोलकाता में हो चुकी है। इस रैली में एम जे अकबर ने कहाकि बंगाल की जनता को रोजगार देने के बजाय ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस राज्य को लूटने में लगी है। अकबर लोगों से अपील कर रहे हैं कि 35 साल लाल सलाम ने बंगाल को बर्बाद किया। अब शारदा सलाम बर्बाद कर रहा है। और इसमें पूरी तरह से ममता बनर्जी का ही हाथ है। और लोकसभा चुनाव के पहले तक सिर्फ 6 प्रतिशत वोट वाली बीजेपी लोकसभा चुनाव में 16 प्रतिशत तक पहुंची तो राज्य में सभी पार्टियों की रणनीति बदलती दिख रही है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का पूरा ध्यान कांग्रेस और लेफ्ट से हटकर अब सिर्फ भारतीय जनता पार्टी की तरफ है। वो किस तरह हड़बड़ाई हुई हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तृणमूल कांग्रेस की युवा शाखा के अध्यक्ष और ममता बनर्जी के भांजे अभिषेक बनर्जी ने बीजेपी अध्यक्ष राहुल सिन्हा के भाई सुदीप के तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने को बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया। जबकि, सुदीप काफी पहले से तृणमूल कांग्रेस की युवा शाखा से जुड़ा हुआ है। सीपीएम ने भी ममता बनर्जी से सीधे-सीधे मिलने के बजाय बीच में कांग्रेस को माध्यम की तरह इस्तेमाल करने की रणनीति तैयार की है। खबरें तो ये हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सीपीएम के साथ हाथ मिलाने को मंजूरी दे दी है। लेकिन, मुश्किल ये है कि अगर कांग्रेस सीपीएम, तृणमूल और बीजेपी के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होता तो, उसमें भी भारतीय जनता पार्टी को बढ़त मिलती दिख रही है। 27 प्रतिशत मुसलमानों का होना भी इन्हें आश्वस्त नहीं कर पा रहा है। इसीलिए एक ऐसा विकल्प तैयार करने की कोशिश हो रही है कि मुसलमान मतों का विभाजन कम से कम हो। लेकिन, ये सब अमित शाह की उस रणनीति के कारगर होने के संकेत हैं जिसमें वो विपक्षी को पहले ही इतना डरा देते हैं कि वो लड़ाई के मैदान में ज्यादा हिस्सा हथियाने के बजाय अपना हिस्सा बचाने में ही सारी ताकत झोंकने लगता है। इसलिए बंगाल की बेहद दिलचस्प लड़ाई भारतीय राजनीति के इतिहास में अद्भुत तरीके से शामिल होने जा रही है। दक्षिणपंथ और वामपंथ की राजनीति का इतना नजदीकी से मुकाबला शायद अभी तक नहीं हुआ है। 

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...