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Saturday, September 03, 2016

यूपी के 2.5 करोड़ स्मार्टफोन में कमल निशान चाहते हैं अमित शाह

उत्तर प्रदेश में अभी चुनाव आयोग ने कोई तारीख नहीं दी है। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के तो प्रत्याशी भी तय नहीं हैं। इसलिए चुनावी हलचल जमीन पर बहुत ज्यादा नजर नहीं आती। लेकिन, सोशल मीडिया पर सितंबर महीने से भारतीय जनता पार्टी के लिए युद्धस्तर पर जुटने का वक्त है। और इसका आगाज खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह करेंगे। 3 सितंबर को लखनऊ के राममनोहर लोहिया विश्वविद्यालय के भीमराव अंबेडकर ऑडीटोरियम में भारतीय जनता पार्टी सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट कर रही है। एक समय में वन बूथ ट्वेंटी यूथ का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी अब यूथ को पकड़ने के लिए बूथ की जगह स्मार्टफोन के रास्ते पर खड़ी है। स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाला कोई भी, खासकर नौजवान, छूटने न पाए। उत्तर प्रदेश में मई 2014 से आगे बढ़ने का अमित शाह का मंत्र यही है। इसीलिए अमित शाह के हवाले से कई बार ये खबर मीडिया में आती रही है कि विधानसभा चुनाव चाहने वाले से फेसबुक पर कम से कम 25 हजार लोग जुड़ होने चाहिए। ये उसी सोशल मीडिया मंत्र का विस्तार है। हालांकि, खुद अमित शाह बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं से सीधे मिलने के पारंपरिक तरीके में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। लेकिन, सोशल मीडिया के इस युग में शाह को अच्छे से पता है कि अपनी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक आसानी से पहुंचाने का सबसे आसान और प्रभावी जरिया स्मार्टफोन है। इसीलिए उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के आईटी विभाग को साफ निर्देश है कि स्मार्टफोन वाले नौजवान को पकड़ने की रणनीति तैयार करें। इसी की विधिवत शुरुआत 3 सितंबर को सोशल मीडिया वॉलंटियर मीट से अमित शाह करेंगे। उत्तर प्रदेश के चुनाव में सोशल मीडिया भारतीय जनता पार्टी के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी बात से लग सकता है कि अभी तक नया प्रदेश अध्यक्ष आने के बाद कोई मीडिया मीट या कार्यशाला नहीं हुई है। जबकि, सोशल मीडिया की कई कार्यशालाएं पहले ही की जा चुकी हैं।

उत्तर प्रदेश में एक मोटे अनुमान के मुताबिक करीब डेढ़ करोड़ फेसबुक यूजर्स हैं। और व्हाट्सएप इस्तेमाल करने वालों की संख्या करीब 5 करोड़ है। इसीलिए बीजेपी उत्तर प्रदेश में व्हाट्सएप इस्तेमाल करने वालों को पकड़ने के ही चक्कर में है। बीजेपी का मानना है कि ढाई करोड़ व्हाट्सएप यूजर्स हैं जो बीजेपी के साथ जुड़ सकते हैं। इसीलिए इन्हीं ढाई करोड़ व्हाट्सएप यूजर्स के मोबाइल में कमल निशान पक्का बनाने की योजना पर बीजेपी काम कर रही है। बीजेपी से जुड़े व्हाट्सएप समूहों और फेसबुक पेज पर या फिर अपने ही फेसबुक अकाउंट से भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में लिखने वालों की भी सूची तैयार की जा रही है। चाहे वो भारतीय जनता पार्टी से सीधे कार्यकर्ता के तौर पर जुड़े हों या न जुड़े हों। 3 सितंबर को होने लखनऊ में होने वाली सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट में ऐसे लोगों को शामिल करने पर ज्यादा जोर है, जो अभी तक बीजेपी से नहीं जुड़े हैं लेकिन, बीजेपी के पक्ष में नियमित तौर पर लिख रहे हैं। बीजेपी आईटी विभाग के मुताबिक, करीब 8 हजार लोगों ने अभी तक सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट के लिए पंजीकरण किया है। हालांकि, कुल पांच हजार लोगों के ही कार्यक्रम में शामिल होने की उम्मीद है। इन 5 हजार लोगों में से आधे से ज्यादा तो अभी भी बीजेपी से किसी न किसी तरह से जुड़े हुए हैं। इसीलिए नए आने वाले लोगों को बीजेपी अपने चुनावी अभियान में अच्छे से जोड़ने की योजना बना रही है। उत्तर प्रदेश बीजेपी आईटी विभाग के एक नेता का कहना है कि 25 से 45 साल के बीच के ज्यादातर स्मार्टफोन यूजर किसी राजनौतिक दल के कार्यकर्ता नहीं हैं। ऐसे लोग किसी बड़े नेता की रैली छोड़कर राजनैतिक कार्यक्रमों में कम ही शामिल होते हैं। क्योंकि, वो अपनी नौकरी, रोजगार में व्यस्त हैं या फिर पारिवारिक जीवन के मजे ले रहे हैं। लेकिन, फेसबुक और व्हाट्सएप पर अगर उनको राजनीतिक रूप से जोड़ा जाए, तो वो आसानी से सक्रिय हो जाते हैं। और पार्टी की नीतियों, केंद्र सरकार के कामों को नीचे तक ले जाने में मददगार होते हैं। 

सोशल मीडिया के जरिए सक्रिय लोगों के अपने पक्ष में होने का बड़ा फायदा अभी हाल के दिनों में बीजेपी को मिल चुका है। जब मुख्य धारा का मीडिया दयाशंकर सिंह के बेहूद बयान के खिलाफ पूरी पार्टी को लानत भेजने में लगा था। लेकिन, सोशल मीडिया पर एक ही दिन बाद दयाशंकर की बेटी और पत्नी को चेहरा बनाकर पूरा माहौल खड़ा कर दिया गया। बाद में पीछे से बीजेपी ने भी इस अभियान को जमकर समर्थन दिया। बेटी के सम्मान में, भाजपा मैदान में नारे के साथ बीजेपी भले सड़कों पर उतरी। लेकिन, ये नारा किसी बीजेपी नेता के दिमाग में नहीं उपजा था। ये नारा उसी सोशल मीडिया ब्रिगेड ने उछाला था जो, बीजेपी के लिए सोशल मीडिया पर स्वत:स्फूर्त तरीके से काम कर रही है। उसी ताकत को संगठित करने की योजना पर अमित शाह काम कर रहे हैं।
लखनऊ में हो रही सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट की जमीन पहले ही तैयार कर ली गई थी। यूपी बीजेपी ने काम के लिहाज से उत्तर प्रदेश को 6 क्षेत्रों में बांट रखा है। उन सभी 6 क्षेत्रों में आईटी विभाग कार्यशाला कर चुका है। ब्रज क्षेत्र में 2 कार्यशालाएं की गईं। 10 जुलाई को प्रदेश की एक कार्यशाला भी हो चुकी है। 3 सितंबर की सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट के बाद बीजेपी प्रदेश की हर कमिश्नरी पर सोशल मीडिया कार्यशाला कराने की योजना बना रही है। औसतन 4 जिले पर एक कमिश्नरी है। उत्तर प्रदेश में कुल 18 कमिश्नरी हैं। साथ ही बीजेपी प्रदेश के हर विकास खंड में सोशल मीडिया यूनिट खड़ी करने की तैयारी कर रही है। विकासखंड को बीजेपी अपने काम के लिहाज से मंडल कहती है और प्रदेश में बीजेपी के 1500 मंडल हैं। 15 सितंबर तक बीजेपी इन सभी मंडलों में अपनी यूनिट बनाने की कोशिश कर रही है। इसके बाद ग्राम पंचायत तक पहुंच बनाने की कोशिश होगी। बीजेपी के रणनीतिकारों का ये भी मानना है कि शहरों की अपेक्षा गांव में सोशल मीडिया के जरिये बनाई गई पहुंचा का ज्यादा लंबा असर होता है। गांव में एक बार कोई सूचना लोगों तक पहुंचा दी गई, तो गांव के लोग नई सूचना आने तक उसी आधार पर बात करते हैं। इसलिए चुनाव पूरा होने तक व्हाट्सएप और फेसबुक के जरिये बीजेपी नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की अच्छाइयों से हर स्मार्टफोन भर देने की योजना पर काम कर रही है। 2017 का विधानसभा चुनाव जीतने का ये सबसे बड़ा नुस्खा है। 

Saturday, December 05, 2015

राजनीति में खेलिये, क्रिकेट में क्यों खेलते हैं नेताजी?

भाजपा सांसद युवा मोर्चा के अध्यक्ष और #BCCI सचिव @ianuragthakur बड़ी मासूमियत से भारत-पाक सीरीज के पक्ष में बोल रहे हैं। उनके कहे का लिंक भी लगा रहा हूं। जो उन्होंने बार-बार ट्वीट किया है। जो वो कह रहे हैं वो इतना सीधा मासूम नहीं हैं। वो सीधे एक पक्ष हैं। इसलिए उनकी बात को गंभीरता से उतना ही लिए जाने की जरूरत है जितना सरकार उद्योग संगठनों की सुनती है और जैसे सुनती है। क्रिकेट जैसा उद्योग चूंकि सारे दलों के नेता मिलकर चलाते हैं। इसलिए ये चलता रहे। फिर चाहे भारत के पाकिस्तान से मानवीय और औद्योगिक रिश्ते कितने ही खराब रहें। क्योंकि, उससे सीधे-सीधे नेताओं का कुछ बुरा नहीं हो रहा। अब अगर पाकिस्तान से हमारे राजनयिक कारोबारी संबंध बेहतर नहीं हो रहे, तो क्रिकेट खेलकर कौन सी डिप्लोमेसी हो जाएगी। मैं निजी तौर पर किसी भी प्रतिबंध का विरोधी हूं। लेेकिन, अनुराग ठाकुर की मासूमियत में मुझे सारी पार्टियों का क्रिकेट कनेक्शन पैसे के ढेर पर भारतीय जनमानस की खिल्ली उड़ाता दिखता है। इसीलिए जब अनुराग कहते हैं कि सोशल मीडिया से ही हर बात तय नहीं की जा सकती। तो मुझे लगता है कि ये उस पार्टी का नेता कह रहा है जिसके पूर्ण बहुमत में #SocialMedia का बड़ा हाथ है। जिस सरकार के नेता, मंत्री, सासद से लेकर छोटे नेता तक सोशल मीडिया पर बड़े से बड़ा हो जाना चाह रहे हैं। उस पार्टी के सांसद का ये कहना कि सबकुछ सोशल मीडिया से ही तय नहीं होना चाहिए। उस चेहरे को बेनकाब करता है। जिसमें सबके हित छिपे हुए हैं। फिर से कह रहा हूं कि मैं निजी तौर पर प्रतिबंध के खिलाफ हूं लेकिन, अब तय होना चाहिए कि भारत के नेताओं को धनधान्य से भरपूर रखने के लिए क्रिकेट डिप्लोमेसी हो रही है या फिर सचमुच इससे भारत-पाक के रिश्ते कभी सुधरते हैं। इसलिए फिलहाल तो मैं #NoCricketWithPakistan कह रहा हूं। क्रिकेट डिप्लोमेसी की आड़ में नेताओं की अमरबेल की जड़ में मट्ठा पड़ना जरूरी है। पत्रकारिता के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए ही मैंने अनुराग ठाकुर के बयान का लिंक भी लगाया है। लेकिन, ये नेताजी लोग राजनीतति खेलते क्रिकेट क्यों खेलने लगते हैं। इनके बयान को सुनकर ये सीरीज कराने की आतुरता भी समझ में आएगी।

Saturday, October 03, 2015

सोशल मीडिया से समाज समझता स्वयंसेवक प्रधानमंत्री

कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी की सरकार के 180 दिन पूरे होने पर यू टर्न सरकार का खिताब दे दिया था। ये दरअसल कांग्रेस की आरोप पुस्तिका थी। जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर 25 उन मुद्दों से पलटने की जिक्र किया था। जिसे खुद मोदी ने चुनाव के समय करने का आश्वासन दिया था। उसके बाद हर उस मुद्दे पर जहां भी मोदी सरकार अपने बनाए-बोले किसी नियम में संशोधन की तलाश करने लगती। कांग्रेस वहां यू टर्न सरकार का आरोप उछाल देती है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संबंधित फाइलों को सार्वजनिक करने, काला धन वापस लाने, भूमि अधिग्रहण बिल और नेट न्यूट्रलिटी उसमें सबसे अहम मुद्दे थे। जिस पर नरेंद्र मोदी पर यू टर्न लेने का आरोप लगाया गया था। वैसे यू टर्न आधार कार्ड पर भी इस सरकार ने लिया है। कुछ इसी तरह नीतियों के लिहाज से पाकिस्तान पर भी सरकार का यू टर्न साफ दिखता है। सवाल ये है कि आखिर एक ताकतवर राजनेता से मुख्यमंत्री और फिर प्रचंड बहुमत वाले प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ऐसे यू टर्न क्यों ले रहे हैं जिससे उनकी और सरकार की छवि कमजोर हो रही है। इसका जवाब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फेसबुक मुख्यालय में हुए सवाल-जवाब में दे दिया है।

फेसबुक मुख्यालय में नरेंद्र मोदी के अपने ही फैसले से पलटने की पीछे की वजह की चर्चा करने से पहले कुछ ऐसे बड़े यू टर्न फैसलों पर नजर डालते हैं। जिससे मामला समझने में आसानी हो। पाकिस्तान के साथ विदेश नीति के यू टर्न फैसले की बात करते हैं। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से उत्साही हिंदुत्व कार्यकर्ताओं को कुछ ऐसी उम्मीद बन गई थी कि वो पाकिस्तान से कम से कम पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर तो छीन ही लेंगे। इसीलिए एक ये धारणा बड़ी तेजी से लोगों के दिमाग में घर कर गई कि इस सरकार ने पाकिस्तान के साथ बातचीत का फैसला करके इस मामले पर यू टर्न ले लिया है। हालांकि, इस सरकार ने पहली बार कूटनीतिक तरीके से पाकिस्तान को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। दूसरा बड़ा फैसला था भूमि अधिग्रहण कानून को अध्यादेश के तौर पर लागू करने का। इसमें किसानों की मर्जी पूरी तरह से सरकार की मर्जी या कहें कि दया पर आधारित थी। बाद में विपक्ष के जोरदार विरोध और किसी भी सूरत में इसके संसद से पास न हो पाने की स्थिति देखकर सरकार ने यहां भी यू टर्न लिया और अध्यादेश वापस ले लिया। नेट न्यूट्रलिटी पर भी सरकार ने यू टर्न लिया। लेकिन, बाद में सरकार ने नेट न्यूट्रलिटी को ही अपना सिद्धांत बताया और जोरशोर से उसके पक्ष में ही नीतियां बनाने का भरोसा दिया। फिर संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद के मंत्रालय ने नेशनल इनक्रिप्शन पॉलिसी में जबरदस्त गड़बड़ की। ड्राफ्ट पॉलिसी में सरकार ने सभी प्रकार के सोशल मीडिया संदेशों को नब्बे दिनों तक संभालकर रखने और उसे मांगने पर सरकार को देने का कानून बनाने की बात की थी। इस मुद्दे पर सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका से प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी सरकार की खाट खड़ी होती दिखी। आखिरकार संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद को प्रेस कांफ्रेंस करके इस बेतुके ड्राफ्ट को वापस लेना पड़ा। इस यू टर्न से समझ में आता है कि ढेर सारे मुद्दों पर नरेंद्र मोदी की सरकार ने यू टर्न लेना क्यों ठीक समझा। और इससे ये भी समझ में आता है कि कम से कम ये सरकार अपने ही किसी फैसले को पलटने में देर नहीं लगाती। अगर उसे ये समझ में आ जाए कि इस फैसले से जनता उसके खिलाफ हो रही है। नेशनल इनक्रिप्शन पॉलिसी का ड्राफ्ट आया, तो इतनी जबरदस्त प्रतिक्रिया लोगों की हुई कि चौबीस घंटे के भीतर मंत्री को सामने आना पड़ा। गलती माननी पड़ी। ड्राफ्ट वापस लेना पड़ा। इसका मतलब ये हुआ कि सरकार का फीडबैक सिस्टम ठीक काम कर रहा है। वैसे तो साफ तौर पर दिखता यही है कि भूमि अधिग्रहण कानून इसलिए नहीं बना कि सरकार के पास उसे पास कराने के लिए पर्याप्त संख्याबल नहीं है। इसीलिए उसे वापस लेना पड़ा। लेकिन, एक दूसरा पहलू ये भी है कि सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया भूमि अधिग्रहण कानून के बहुत पक्ष में नहीं थी। धीरे-धीरे सरकार की छवि किसान विरोधी होती जा रही थी। इसलिए सरकार को भूमि अधिग्रहण कानून से पूरी तरह से पीछे हटना पड़ा। दरअसल नरेंद्र मोदी को ये बहुत अच्छे से पता है कि 2019 में उनको जवाब देना होगा। और उस समय अगर कुछ बदलाव नहीं दिखा, तो कोई तर्क काम नहीं आएगा। इसीलिए नरेंद्र मोदी ने चीन की तर्ज पर औद्योगिक तेजी के लिए इस भूमि अधिग्रहण कानून को लागू करने की योजना बनाई थी। जिससे 2019 के पहले बड़े बदलाव करके जनता के मन में बन रही किसान विरोधी छवि को बेहतर उद्योग, विकास, रोजगार से भरा जा सके। लेकिन, जब लगा कि घर के रहे न घाट के वाली स्थिति सरकार की होने जा रही है, तो सरकार को भूमि अधिग्रहण कानून पर पीछे हटना पड़ा।

आधार पर भी इस सरकार का यू टर्न साफ दिखता है। लेकिन, सच्चाई यही है कि लोगों में इस योजना को लेकर बहुत उत्साह बना हुआ है। और दूसरे विरोध भले हों लेकिन, ये तो सच्चाई है कि तकनीक के इस दौर में अगर देश को लोगों का एक डाटा बैंक नहीं तैयार होता है, तो इससे सरकार आगे जाने के बजाए पीछे चली जाएगी। फिर प्रधानमंत्री की जनधन योजना और सीधे खाते में रकम देने की योजना लागू करने का ये बेहतर तरीका साबित हो रहा था। इसलिए मोदी सरकार ने मनमोहन सरकार की उस किसी योजना को रोका नहीं। भले उस पर यू टर्न सरकार होने का ठप्पा लगातार लगा हो। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार ये साफ करते हैं कि उन्हें लोगों की भलाई के लिए किसी भी अपने फैसले के संशोधन में जरा सा भी एतराज नहीं है। और यही शायद उनकी सफलता का मंत्र भी है कि वो जनता में गुस्से को समझ जाते हैं। नरेंद्र मोदी ने फेसबुक मुख्यालय में बातचीत में कहाकि पहले सरकार को पांच साल बाद जनता के गुस्से का पता चलता था और तब तक देर हो जाती थी। अब लोगों की प्रतिक्रिया सोशल मीडिया में हर रोज, हर मिनट आ रही है। उन्होंने कहाकि मैं यहां जो बोल रहा हूं। उस पर भी वोटिंग हो रही होगी कि मोदी अच्छा बोला या खराब। नरेंद्र मोदी मानते हैं कि वो इस प्रतिक्रिया से खुद को दुरुस्त करते हैं। गवर्नेंस बेहतर करने की कोशिश करते हैं। इसीलिए वो मुख्य धारा की मीडिया से ज्यादा इस नई मीडिया की प्रतिक्रिया के आधार पर सरकार चलाने की कोशिश करते हैं। और इस आधार पर फिलहाल सफल भी होते दिख रहे हैं। ट्विटर, फेसबुक का रिपोर्टर प्रधानमंत्री को जनता की प्रतिक्रिया बता रहा है। सोशल मीडिया से समाज को समझने वाला स्वयंसेवक प्रधानमंत्री मिला हुआ है। इसीलिए यू टर्न का ठप्पा इस प्रधानमंत्री को डराता नहीं है। 

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...