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Wednesday, August 31, 2016

पुरुषवादी सोच है किराए की कोख में अपना बच्चा?

केंद्र सरकार को इस बात के लिए बधाई देनी चाहिए कि लंबे समय से बिना किसी नियंत्रण के चल रहे किराए की कोख के बाजार को नियंत्रित करने के लिए एक कानून बनाने की कोशिश की है। हालांकि, कानून बनने से पहले ही किराए की कोख के कानून पर ढेर सारे मोर्चे खुल गए हैं। हालांकि, सरकार ने बड़ी मशक्कत करके काफी सावधानी से सरोगेसी पर कानून बनाने की कोशिश की है। लेकिन, इसपर पार्टी के भीतर भी दोफाड़ है। खासकर इस बात पर बहुत ज्यादा विवाद है कि अगर कोई गोद ले सकता है, तो उसे किराए की कोख की इजाजत क्यों नहीं होगी। प्रगतिशील जमात सिंगल पैरेंट और एलजीबीटी समुदाय के लोगों के लिए भी सरोगेसी कानूनी करने की मांग कर रही है। एक बहस ये भी खड़ी हो रही है कि आखिर जिस महिला का शरीर है, उसकी कोख है, उसके अलावा सरकार कौन होती है, ये तय करने वाली। बहस है कि किसी में भी ममत्व और बापत्व जग सकता है। ऐसे में विज्ञान ने अगर ऐसी तरक्की कर ली है कि कोई अपना शुक्राणु के जरिये किसी दूसरे की कोख में अपना बच्चा पैदा कर सकता है और अगर उस कोख को देने वाली को एतराज नहीं है, तो फिर सरकार को क्या बीच में आना चाहिए। कई लोग तो विदेशियों और भारत के अमीरों से किराए की कोख के बदले में मिलने वाले धन से गरीबी खत्म होने तक की शानदार दलीलें दे रहे हैं। लेकिन, इन सबमें एक बड़ा सवाल छूट रहा है। ये सारी चिंता किसी के अपना बच्चा पैदा करने की इच्छा की तो हो रही है। लेकिन, कोई ये सवाल नहीं खड़ा कर रहा है कि आखिर जिस बच्चे के सिर से मां-बाप का साया हट गया हो। वो क्या करे? वो क्या मां-बाप पैदा कर सकता है। कमाल है कि हम पहले से सभ्य होने की बात कर रहे हैं। लेकिन, इस सभ्य होने में धरती पर जो आया नहीं है, इसके लिए तो कानून पर बहस हो रही है। हां, जो पहले से ही धरती पर है और जिसकी किस्मत ने दगा दिया और मां-बाप नहीं रहे। उनके लिए हमारा ये सभ्य समाज शायद ही संवेदनशील होता दिख रहा हो।

अगले 10 महीने बाद किराए की कोख का कानून लागू हो जाएगा, तो हो सकता है कि फिर से बच्चों को गोद लेने वालों की संख्या कुछ बढ़ जाए। लेकिन, इसके पहले तक किसी तरह का कोई कानून न होने का दुष्परिणाम ये है कि देश में अनाथों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। न सरकार और न ही तथाकथित तौर पर पहले से ज्यादा सभ्य हुआ हमारा समाज। सूचना के अधिकार के तहत सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स एजेंसी से आई जानकारी बताती है कि पिछले पांच सालों में गोद लेने वालों की संख्या आधी रह गई है। चाहे वो देश में गोद लेने के इच्छुक रहे हों या फिर विदेशी। महिला एवं बाल विकास मंत्री ने इस पर गहरी चिंता जताते हुए गोद लेने के कानूनों को काफी सरल कर दिया। हालांकि, गोद लेने वालों में सिंगल पैरेंट ज्यादातर सेलिब्रिटी ही नजर आते हैं। उस देश में जहां हर साल लगभग पचास हजार बच्चे अनाथ हो जाते हों और उनमें से बमुश्किल 800 से 1000 बच्चों को गोद लिया जाता हो। किराए की कोख का कानून बनने पर मचने वाला हल्ला थोड़ा चौंकाता है। बेटी हो या बेटा बच्चा एक ही अच्छा के नारे को लागू करने वाला सभ्य भारतीय समाज अनाथ बच्चों को गोद लेने की बहस की बजाए किराए की कोख में बच्चा पैदा करने के अधिकार की बहस कर रहा है। कमाल की बात ये है कि अभी तक देश में सरोगेसी यानी किराए की कोख का कोई कानून ही नहीं था। उसकी वजह से दुनिया भर के किसी भी वजह से अपना बच्चा न कर पाने वाले विदेशी दंपतियों के लिए सबसे बेहतर कोख का बाजार भारत ही रहा है। यूके, आयरलैंड, डेनमार्क, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, बेल्जियम, मैक्सिको, थाइलैंड और नेपाल में पहले से ही कमर्शियल सरोगेसी प्रतिबंधित है। इसलिए इन देशों के लोग सीधे भारत का रुख कर रहे हैं। हालांकि, अब भारत भी कमर्शियल सरोगेसी प्रतिबंधित करने वाले देशों में शामिल हो गया है। लेकिन, भारत में अभी सरोगेसी हो सकती है। लेकिन, वो विदेशियों के लिए और एलजीबीटी, सिंगल पैरेंट के लिए पूरी तरह से प्रतिबंधित है। हां, सरकार ने ऐसे दंपतियों के लिए जो किसी स्वास्थ्य वजहों से अपना बच्चा पैदा नहीं कर सकते, उन्हें इस बात की इजाजत दी है कि वो किराए की कोख से अपना बच्चा पैदा कर सकते हैं। उसका भी बाजार न खड़ा हो जाए इसके लिए सरकार ने ढेर सारे नियम लगाए हैं। बच्चा किसी नजदीकी रिश्तेदार की कोख से ही पैदा सकता है। हालांकि, सरकार से ये संकेत साफ मिल रहे हैं कि नजदीकी रिश्तेदार की परिभाषा को विस्तार दिया जाएगा। और ये ठीक भी है।

प्रगतिशीलता और विकसित समाज की बात करने वाले भूल जाते हैं कि फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, पुर्तगाल, बुल्गेरिया और स्विट्जरलैंड जैसे विकसित देशों में सरोगेसी पूरी तरह से प्रतिबंधित है। इसलिए भारत जैसे देश में जो पहले से ही बढ़ती आबादी और ढेर सारे अनाथ बच्चों वाला देश है, वहां पर किराए की कोख से अपना बच्चा चाहने की बात शायद मानवता पर दूसरी बहस की जरूरत बताती है। विदेशियों को या फिर किसी भी गैरभारतीय को भारत आकर किसी की कोख से बच्चा लेकर जाना किस तरह की सभ्यता की ओर ले जा रहा है। बार-बार ये दलील दी जाती है कि गरीब महिलाओं के लिए अपनी जरूरत भर के पैसे कमाने का एक जरिया था, जो सरकार ने इस कानून के जरिए बंद कर दिया। नियंत्रित बाजार ज्यादातर मामलों में जरूरी और बेहतरी करने वाला होता है। लेकिन, किराए की कोख के बाजार की वकालत और भारत जैसे देश की छवि कुछ ऐसे कर देना कि यहां की गरीब महिलाएं अपनी कोख बेचकर जरूरत भर का कमा पा रही है। पता नहीं, इसे कैसे प्रगतिशीलता कहा जा सकता है। और ये अपने ही शुक्राणु से पैदा हुआ बच्चा पाने की चाहत पुरुषवादी मानसिकता का चरम ही तो है। जहां महिला तो अपने पति के शुक्राणु से पैदा बच्चे को अपना मान ले। लेकिन, पुरुष किसी भी बच्चे को अपनाकर उसे अपने बच्चे का दर्जा देने से बचना चाहता है। इसलिए मुझे लगता है कि एक बेहतर कानून बन रहा है। जरूरत हो तो इसमें कुछ नियम-शर्तों में ढील दी जाए। लेकिन, किराए की कोख के बाजार को महिमामंडित करना न तो सभ्य समाज के हक में है, न महिलाओं के और न ही देश के। और सबसे बड़ा सवाल ये कि अनाथ होते बच्चों को गोद लेने में आई कमी शायद इस कानून के बनने के बाद कुछ बेहतर हो। इसलिए किराए की कोख के कानून के बनने और इस बाजार के नियंत्रित होने का स्वागत कीजिए। हां, जो जरूरी है, वो संशोधन होना चाहिए और सरकार भी इसके लिए तैयार दिख रही है। मानवता का स्तर ऊंचा उठाने में मदद कीजिए। अनाथ बच्चों की चिंता कीजिए। बेटी हो या बेटा बच्चा एक ही अच्छा से आगे बढ़िए। अगर नहीं है अपना बच्चा तो एक अनाथ बच्चे के सिर पर हाथ रखिए। समाज में जिन महिलाओं को किसी वजह से मातृत्व सुख नहीं मिल सकता, उनके प्रति नजरिया सुधारने का भी एक मौका है ये किराए की कोख का कानून।

Wednesday, August 12, 2015

ये नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं है

ये पूरा सत्र साफ होता दिख रहा है। देश में भले ही कुछ ही इलाकों में बारिश से बाढ़ के हालात बने हों। लेकिन, अगर संसद की बात करें तो, पूरा का पूरा सत्र बाढ़ में बहता दिख रहा है। बड़े सुधारों को कानून का रूप देने की बात तो सोची भी नहीं जा सकती है। हालात ये हैं कि बमुश्किल बातचीत हो जाए यही बहुत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। 282 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत से आई सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। पार्टी के भीतर भी वो सर्वोच्च नेता हैं। संगठन में नरेंद्र मोदी के सिपहसालार अमित शाह कमान संभाले हैं। ऐसे में किसी भी तरह के दबाव की बात मानना संभव नहीं है। फिर क्या है कि ये नरेंद्र मोदी की सरकार लग नहीं रही है। अभी तक ऐसा मानने वाले मन ही मन ये बात कर रहे थे। लेकिन, अब ये खुली चर्चा का विषय है कि क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है, जिसे जनता ने पूर्ण बहुमत देकर मई 2014 में सत्ता में बिठाया था। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है जिसे जनता ने ये सोचकर सत्ता दी थी कि ये प्रधानमंत्री पहले के एक दशक के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह व्यवहार नहीं करेगा। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है जिसके आने की आहट से भारतीय शेयर बाजार बल्लियों उछल गया था। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है जिसके आने की आहट भर से दुनिया भर की रेटिंग एजेंसियों ने भारत को लेकर अपना रूख सकारात्मक कर लिया था। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है जो, दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को अपना दोस्त करता था। जिससे भारतीयों को गजब का गर्व बोध हुआ था। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है जिसके राज में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सपत्नीक आते हैं और अहमदाबाद के रिवरफ्रंट पर बैठकर भारत की बढ़ती ताकत स्वीकारते हैं। साथ चलने की बात करते हैं। क्या ये वही नरेंद्र मोदी की सरकार है जिसके आने भर से ये माना जा रहा था कि पाकिस्तान की नापाक हरकतों पर साबित लगाम लगेगी। इन सब सवालों का जवाब खोजेंगे तो, जवाब सीधे तौर पर आएगा कि नहीं ये नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं है। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं। और वही वाले नरेंद्र मोदी हैं। लेकिन, फिर भी ये नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं है।

अपने मन की बात बोलने के लिए जाने जाने वाले उद्योगपति राहुल बजाज ने जब कहा कि ये नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं है तो, ये सवाल और बड़ा हो गया। क्योंकि, राहुल बजाज उन उद्योगपतियों में से रहे हैं जो, यूपीए के शासन में रहते ही नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने की वकालत करते थे। सिर्फ नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की वकालत ही नहीं करते थे। राहुल बजाज साफ साफ कहते थे कि यूपीए के शासन के भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए मोदी का आना जरूरी है। वही राहुल बजाज अभी भी ये मान रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निजी तौर पर बेहद ईमानदार हैं। लेकिन, इस राज में भी बिना पैसे दिए काम नहीं हो रहा है। हां, ये बात खुलकर बोलने में सब डर रहे हैं। जब नरेंद्र मोदी सरकार की एक साल के कामकाज की समीक्षा हो रही थी तो, मोदी ने छाती ठोंककर एक बात कही थी कि और कुछ भी हुआ हो। लेकिन, एक बात पर तो कोई बहस नहीं है कि इस सरकार में कोई घोटाला नहीं हुआ। इस सरकार का कोई मंत्री दागदार नहीं है। ये आज भी सच्चाई है। लेकिन, इस सच्चाई पर नरेंद्र मोदी की सरकार से बिना वास्ते वाली बातें ऐसे चिपकी कि लग रहा है जैसे मोदी राज में सिर्फ और सिर्फ घोटाले हो रहे हैं। मध्य प्रदेश के व्यापम से लेकर सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे तक का मसला ऐसा ही है। इसमें कहीं भी नरेंद्र मोदी का न तो व्यक्ति के तौर पर या प्रधानमंत्री के तौर पर कोई योगदान है लेकिन, शक के दायरे में सीधे नरेंद्र मोदी आ जाते हैं। क्योंकि, उन्होंने कार्रवाई नहीं की। विरोधी छोड़िए, नरेंद्र मोदी के घोर समर्थक भी कार्रवाई करने में आड़े आने वाले राजनीतिक समीकरणों को जरा सा भी मानने को तैयार नहीं हैं। और जब नरेंद्र मोदी कार्रवाई नहीं करते हैं तो, ये सवाल खड़ा हो जाता है कि क्या ये नरेंद्र मोदी की सरकार है। जबकि, सच्चाई आज भी यही है कि खुद प्रधानमंत्री से लेकर उनके महत्वपूर्ण मंत्रियों में से किसी पर भी कोई गंभीर आरोप बेईमानी के नहीं हैं। फिर वो वित्त मंत्री अरुण जेटली हों, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज हों, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर हों, रेल मंत्री सुरेश प्रभु हों। भूतल परिवहन और राष्ट्रीय राजमार्ग के मंत्री नितिन गडकरी को भले ही आरोपों के चलते अध्यक्ष का कार्यकाल फिर न मिल हो। लेकिन, अभी तक कोई भी आरोप उनके ऊपर साबित नहीं हो पाया है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज सिंह को लेकर भले ही नाना प्रकार की चर्चाएं मीडिया में आईं। और उसके बाद खुद गृह मंत्री को बयान देना पड़ा। लेकिन, गृह मंत्री के तौर पर राजनाथ सिंह पर भी कोई आरोप नहीं साबित हुआ है। तो, फिर आखिर क्यों प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी संसद में बैकफुट पर दिखने लगते हैं। क्यों कल तक अपने जीजा रॉबर्ट वाड्रा के ऊपर लगे आरोपों से दबे राहुल गांधी अचानक चिल्ला उठते हैं कि सुषमा स्वराज और उनके परिवार को ललित मोदी को बचाने के लिए कितने रुपये मिले। इसलिए लगता है कि ये नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं है।

फैसले लेने में कमजोरी का मामला सिर्फ पार्टी के बड़े नेताओं पर कार्रवाई भर का नहीं है। दरअसल नरेंद्र मोदी क प्रधानमंत्री बनाने वाली जनता लोकतांत्रिक तरीके से भले ही उन्हें चुनकर लाई हो। वो, जनता नरेंद्र मोदी से कई मामलों में तानाशाही रवैये की उम्मीद करती है। क्योंकि, उस जनता को लगता है कि लोकतंत्र और खासकर गठजोड़ के लोकतंत्र की मजबूरियों ने फैसले लेने में इस देश का बड़ा नुकसान कर दिया है। इसीलिए नरेंद्र मोदी को पूर्ण बहुमत से सत्ता देने वाली जनता मोदी से ऐसे तानाशाही फैसलों की उम्मीद रखती है जिससे देश का भला हो। वो डेफिसिट पूरा हो जो, गठजोड़ के लोकतंत्र की मजबूरियों की वजह से बहुत ज्यादा हो गया है। इसीलिए जब पाकिस्तान की तरफ से गोलीबारी की खबरें आती हैं। पाकिस्तान की तरफ से तैयार करके भेजे गए आतंकवादी सामने आते हैं। तो, वही जनता सवाल पूछने लगती है कि क्या ये नरेंद्र मोदी की सरकार है। ऊफा में बातचीत के दरवाजे खोलने से हिंदुस्तान की जनता को बिल्कुल एतराज नहीं है। बल्कि, बहुतायत जनता इसी पक्ष में है कि बातचीत हो। पाकिस्तान के साथ बेहतर संबंध बनें। लेकिन, वही बहुतायत जनता ये भी चाहती है कि दाऊद, शकील और दूसरे ऐसे भारत विरोधी गुंडों, आतंकवादियों को पाकिस्तानी जमीन या दूसरी जगह पर मारा जाए। या उनको भारत लाकर उन पर कार्रवाई की जाए। यहां वही जनता मोदी को इजरायल और अमेरिका के राष्ट्राध्यक्षों की तरह व्यवहार करते देखना चाहती है। और जब ये नहीं होता है। तो, फिर वही सवाल खड़ा हो जाता है कि क्या ये नरेंद्र मोदी की सरकार है।

मामला सिर्फ इतना नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार के पुराने आरोपों पर उचित कार्रवाई कर पा रहे हैं या नहीं। मामला इतना भर भी नहीं है कि पाकिस्तान पर मोदी ने हमला क्यों नहीं कर दिया। इस मामले में भी ये नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं दिखती कि देश आर्थिक तरक्की का सपना जस का तस अंटका हुआ है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने वाली जनता गुजरात के उस मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री बना रही थी जिसके राज में तरक्की बिना प्रयास हो रही थी। दस प्रतिशत की तरक्की का आंकड़ा उद्योगों में तो था ही। कृषि क्षेत्र की तरक्की की दर भी दस प्रतिशत के आसपास की थी। इसीलिए जब नरेंद्र मोदी की सरकार आई तो, उनको वोट देने वालों से लेकर दुनिया भर के लोगों को भारत में फिर से दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार का आधार तैयार होता दिखने लगा। एफडीआई, एफआईआई के आंकड़ों ने तैयार होती बुनियाक को पक्का करना शुरू कर दिया। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जब कहा कि 2016 में जीएसटी लागू हो जाएगी तो, ये भरोसा और मजबूत हुआ। रेल मंत्री ने बजट में एक भी नई योजना का एलान न करके जब कहाकि पहले रेलवे की सुरक्षा, पुरानी योजनाओं का क्रियान्वयन तेजी से होगा। तो, भी भरोसा मजबूत हुआ। लेकिन, वित्त मंत्रालय से पहले साल के तेजी में लिए गए फैसलों के अलावा नए फैसले होते नहीं दिख रहे। सबसे बड़े आर्थिक सुधार भूमि अधिग्रहण बिल तो लगभग पुनर्मूषको भव वाली स्थिति में आ गया है। जीएसटी तक ये सरकार लागू नहीं करा पा रही है। आर्थिक सुधारों पर इतनी सांसत में तो एक दशक की मनमोहन सरकार भी नहीं दिखी।

अगर कांग्रेस की सरकार सुधारों पर इतनी सांसत में नहीं दिखी तो, इसकी सबसे बड़ी वजह यही थि कि वो दूसरे दलों को साधने में कामयाब रही। भले ही उस पर केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग से लेकर दूसरे कई तरह के आरोप लगते रहे। राजनीति में भला ये बात कहां कुछ मायने रखती है कि राजनीतिक संतुलन कैसे साधा गया। पूर्ण बहुमत की सरकार और राज्यों के लिहाज से ज्यादातर क्षेत्रीय दलों के समीकरण कांग्रेस से उलट होने के बावजूद बीजेपी की सरकार क्षेत्रीय दलों को साधने में पूरी तरह से नाकाम रही है। संसद का फ्लोर मैनेजमेंट पूरी तरह से फेल रहा है। क्षेत्रीय विपक्षी दलों की तो छोड़िए खुद अपने एनडीए के साथी भी सरकार का साथ नहीं देते दिख रहे। इस सत्र के खत्म होते होते मुलायम सिंह यादव का साथ थोड़ी उम्मीद जगाता है। लेकिन, जिस तरह से ये पूरा सत्र साफ होता दिख रहा है। उसमें ये सवाल उठना लाजमी है कि क्या ये नरेंद्र मोदी की सरकार है। और इस सवाल का जवाब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जल्द से जल्द खोजना होगा। क्योंकि, ये बड़ी उम्मीदों की सरकार है। ये उम्मीद टूटी तो, राजनीतिक घालमेल की स्थिति इस देश के लिए नियति बन जाएगी।  

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...