Thursday, July 16, 2015

धरातल पर उतरता मेक इन इंडिया

मेक इन इंडिया का बेहतर असर हो रहा है। मेक इन इंडिया अभियान की शुरुआत के बाद भारत में एफडीआई अड़तालीस प्रतिशत बढ़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल सितंबर में मेक इन इंडिया अभियान शुरू किया था। तब से अप्रैल तक के आंकड़े बता रहे हैं कि विदेशी निवेशकों को ये मेक इन इंडिया खूब लुभा रहा है। इसकी गवाही दे रहा है आजकल अखबारों और दूसरे जरिए से आ रहा बीएमडब्ल्यू का बड़ा सा विज्ञापन। ये विज्ञापन बीएमडब्ल्यू के मेक इन इंडिया अभियान में शामिल होने का खबर दे रहा है। इस खबर के साथ अच्छी खबर ये भी कि अब चेन्नई के नए प्लांट में बनेंगी बीएमडब्ल्यू कारें। कंपनी ने मेक इन इंडिया कारों की कीमत कम होने का विज्ञापन दिया है। विज्ञापन कह रहा है कि जर्मन तकनीक का नया घर भारत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मेक इन इंडिया असर करता दिख रहा है। सही समय पर ये अभियान प्रधानमंत्री ने शुरू किया है। ये समय है जब दुनिया भर में बड़ी-बड़ी कंपनियां खुद का मुनाफा बचाने के लिए जूझ रही हैं। यही वजह है कि जब ऐसे मौके पर दुनिया के सबसे ज्यादा संभावना वाले देश भारत के प्रधानमंत्री ने उनके लिए और मौके मेक इन इंडिया अभियान के साथ दिखाए तो, वो खुद को रोक नहीं पा रहे हैं। और ये मौके सिर्फ विदेशी कंपनियों को भारत में बुलाने के लिए नहीं है। ये मौका उन भारतीय कंपनियों को भी बड़े मौके की तरह दिख रहा है जो, यूपीए 2 में नीतियों में स्पष्टता न होने और स्थिरता की वजह से विदेशों में मौके तलाशने लगी थीं। अच्छी बात ये है कि रक्षा, ऑटो, स्मार्टफोन, पीसी बनाने वाली कंपनियां सबसे ज्यादा इस मौके को भुनाना चाह रही हैं। और ये साफ दिख रहा है कि मेक इन इंडिया की कामयाबी का बड़ा फायदा सिर्फ सरकार को नहीं भारतीय ग्राहकों को भी जमकर मिलने वाला है।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी नए सिरे से मेड इन चाइना अभियान शुरू किया है। कहीं न कहीं इस अभियान के पीछे मेक इन इंडिया अभियान से चीन का हिस्सा घटने का डर भी है। लेकिन, मुनाफा देखने वाली कंपनी वहीं जाएगी जहां उसे मुनाफा मिलेगा। इसी सिद्धांत पर चीन दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब बन गया। अब वही कोशिश भारत कर रहा है। इसका असर भी दिख रहा है। चीन की कंपनी अपने वीवो स्मार्टफोन अब भारत में ही असेंबल करके बेचेगी। अक्टूबर से कंपनी की असेंबलिंग यहां शुरू हो जाएगी। अब तक ज्यादातर मोबाइल फोन सीधे चीन से ही बनकर भारत आते रहे हैं। यहां तक कि एप्पल और सैमसंग मोबाइल भी ज्यादातर मेड इन चाइना होते हैं। देसी कंपनियां माइक्रोमैक्स और कार्बन के स्मार्टफोन भी मेड इन चाइना ही होते हैं। लेकिन, अब आप जल्द ही मेड इन इंडिया स्मार्टफोन इस्तेमाल कर सकेंगे। स्मार्टफोन बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी फॉक्सकॉन भारत में दस से बारह मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने वाली है। ये सभी इकाइयां 2020 तक काम करने लगेंगी। भारत की आयात नीति में बदलाव के बाद फॉक्सकॉन ने एलान किया है कि वो भारत में 2 बिलियन डॉलर का निवेश करेगी। फॉक्सकॉन एप्पल आईफोन और आईपैड बनाने के लिए दुनिया भर में मशहूर है। स्मार्टफोन बनाने के मामले में भारत में मेक इन इंडिया के जोर पकड़ने के एक और संकेत हैं। पिछले साल जून महीने से इस साल जून महीने में सेमी नॉक्ड डिवाइसेज का आयात चौंसठ प्रतिशत बढ़ गया है। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि अब पहले से इतना ही ज्यादा मोबाइल फोन भारत में असेंबल किए जा रहे हैं। सैमसंग और माइक्रोमैक्स ने जून महीने में 69 लाख सेमी नॉक्ड डिवाइसेज आयात किए हैं। इंटेक्स, लावा और कार्बन मोबाइल कंपनियां भी अब धीरे-धीरे भारत में ही स्मार्टफोन असेंबलिंग कर रही हैं। अभी तक ये कंपनियां पूरा फोन ही चीन से बनवाकर आयात करती रही हैं। कार्बन कंपनी तो अगले साल भर में नोएडा, बंगलुरू में असेंबली लाइन और हैदराबाद में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने की तैयारी कर चुकी है। लेनोवो और सोनी भी अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट भारत में लगाने जा रहे हैं। सेलकॉन की हैदराबाद मैन्युफैक्चरिंग यूनिट से तो फोन बनना भी शुरू हो गया है। एचटीसी भी अब अपने मोबाइल भारत में ही बनाएगी। यानी भले ही आपके हाथ में आने वाले दिनों में किसी भी कंपनी का स्मार्टफोन हो लेकिन, वो दरअसल मेड इन इंडिया ही होगा। मेक इन इंडिया में सिर्फ स्मार्टफोन कंपनियों को ही मौका है। ऐसा नहीं है। पीसी, लैपटॉप बनाने वाली कंपनी डेल चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा डेल के पीसी, लैपटॉप भारत से ही निर्यात कि जाएं। यानी मेड इन इंडिया पीसी, लैपटॉप दुनिया भर में बिकेगा।


बीएमडब्ल्यू साफ बता रही है कि भारत में ही कार बनाने की वजह से कार कंपनी अपनी कारों की कीमत कम कर रही है। लेकिन, दूसरी कार कंपनियां पहले से ही भारत में हैं। अब वो भारत के प्लांट से ही कारें बनाकर दुनिया भर में बेचना चाह रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मेक इन इंडिया इन कार कंपनियों के लिए सोने पर सुहागा जैसा है। यूरोपीय कंपनी एयरबस के सीईओ बर्नहार्ड जरवर्ट ने पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में मुलाकात की। मुलाकात का मकसद सरकार के मेक इन इंडिया अभियान में शामिल होकर इस मौके का फायदा उठाना है। एयरबस डिफेंस और स्पेस क्षेत्र में मेक इन इंडिया अभियान में शामिल होना चाहता है। एयरबस महिंद्रा के साथ मिलकर सेना के लिए हेलीकॉप्टर बनाएगा। सरकार को इस बात का भी अच्छे से अंदाजा है कि मेक इन इंडिया का ज्यादा फायदा विदेशी कंपनियों को ही न मिल जाए। इसीलिए रक्षा क्षेत्र में सरकार ने 56 भारतीय कंपनियों को लाइसेंस दिए हैं। यूपीए सरकार ने अपने पूरे कार्यकाल में इतने लाइसेंस नहीं दिए थे। मेक इन इंडिया अभियान मौके पर चौका मारने जैसा है। लेकिन, एक बड़ी सावधानी जरूर सरकार को रखनी होगी। और वो सावधानी है भ्रष्टाचार मुक्त मेक इन इंडिया। क्योंकि, अभी के हाल में एक छोटा सा धब्बा भी पूरे मेक इन इंडिया को मुश्किल में डाल सकता है। 

Tuesday, July 14, 2015

दो तस्वीरों में दिखता धर्मनिरपेक्षता का सच

असली तस्वीर
नकली तस्वीर
@narendramodi @PMOIndia ध्यान दें। ये दो तस्वीरें हैं। पहली असली तस्वीर है। दूसरी आधुनिक तकनीक का कमाल है। सवाल ये बिल्कुल नहीं है कि इबादत के वक्त मोदी के हाथ बंधे थे या हथेलियां खुली हुईँ थीं। लेकिन, ये खतरनाक सवाल है कि किसको इस तरह के फर्जीवाड़े से फायदा हो रहा है। नरेंद्र मोदी का मैं प्रशंसक इसलिए हूं कि वो जैसे हैं, वैसे रहते, दिखते हैं। और उन्हें छवि में बांधने की कोशिश वो हर बार तोड़ते हैं। अंधभक्तों के लिए भी एक सलाह है कि जिसकी अंधभक्ति रखो, उस पर भरोसा तो रखो। दोनों पक्ष उबल रहे हैं। दरअसल बड़ा छद्म धर्मनिरपेक्ष वर्ग है जिसकी दुकान पुरी तरह से खत्म होती दिख रही है। बहुतायत खत्म हो भी गई है। लालू प्रसाद यादव जब कभी धर्मनिरपेक्षता के लिए जहर पीने, जान देने जैसी बातें करते हैं तो, दरअसल वो वही लक्षण हैं। बड़ा वर्ग है जिसको लगता है कि किसी तरह नरेंद्र मोदी के सिर पर टोपी पहना दो जिससे हिंदू मोदी को दुश्मन मान ले। जिससे फिर ये साबित हो जाए कि सत्ता के लिए धर्मनिरपेक्षता का मतलब यही होता है। जिससे ये साबित हो जाए कि मोदी हिंदू-हिंदू या विकास-विकास बस सत्ता तक के लिए ही चिल्ला रहे थे। जिससे ये भी साबित हो जाए कि नरेंद्र मोदी भारत का सर्वधर्म समभाव वाला ढांचा तोड़कर टोपी पहनकर दिखावा कर रहे हैं। राजनीति खत्म होते उस बड़े वर्ग की मुश्किल यही है कि प्रधानमंत्री के तौर पर भी नरेंद्र मोदी उन्हें वो मौका नहीं दे रहे हैं। जिससे ये साबित हो सके कि मोदी के खाने और दिखाने वाले दांत अलग हैं। ये सारी कवायद वही वर्ग कर रहा है। ये तस्वीरें उसी धर्मनिरपेक्ष ताकतों की साजिश हैं। हिंदू भी इसे समझे और मुसलमान के लिए समझना तो बेहद जरूरी। ज्यादा नुकसान तो ये मुसलमान का ही कर रहे हैं।

Monday, July 13, 2015

भारत-पाकिस्तान रिश्ता, उबले आलू जैसा

तेरह साल की अबीहा ने दिल्ली के एक अस्पताल में दम तोड़ दिया। बीमार अबीहा के इलाज के लिए उसके पिता हामिद इमरान उसे लेकर पाकिस्तान से भारत आए थे। अबीहा नहीं बची लेकिन, भारत-पाकिस्तान के बीच का दबा प्यार हामिद इमरान के लिए और बढ़ गया। इमरान को भारत में इलाज कराने का रास्ता भी उनके स्कूल के जरिए आया जो, सरदार चेत सिंह कोहली ने 1910 में पाकिस्तान के चकवाल में बनवाया था। इसी स्कूल से पढ़े एक भारतीय साथी की वजह से हामिद इमरान अपनी बच्ची अबीहा को भारत इलाज के लिए लेकर आए। अबीहा भारत से बहुत प्यार करती थी। उसने अपनी डायरी में भारत के बारे में काफी कुछ लिख छोड़ा है। और यही प्यार है कि भारत में बच्ची की मौत होने के बावजूद हामिद इमरान ने पाकिस्तान लौटकर वहां के अखबार डॉन में लिखा – मैं अपनी बच्ची की अचानक मौत का दर्द भूल नहीं सकता। लेकिन, उसी तरह भारत में मिले प्यार को भी मैं कभी नहीं भूल सकता। इंटरनेट पर ये कहानी खूब पढ़ी जा रही है। ये छोटी सी कहानी भारत-पाकिस्तान की जुड़ी गर्भनाल की कहानी कह देती है। ये गर्भनाल इस कदर जुड़ी हुई है कि जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो, उन्होंने सबको चौंकाते हुए पाकिस्तान के वजीरे आला नवाज शरीफ को शपथ ग्रहण समारोह का न्योता भेज दिया। उसके बाद ढेर सारे भावनात्मक कदम आगे बढ़ने के बीच लगातार दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता रहा। इस तरीके से कि पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने कह दिया कि परमाणु बम हमने इन्हीं मौकों पर इस्तेमाल करने के लिए बनाया हुआ है। उसके जवाब में भारतीय रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने बड़े सलीके से कहा कि हमें अपनी सीमा की रक्षा बखूबी करनी आती है। इसके बाद लगा कि अब तो बस दोनों देशों की सेनाएं पूरी तैयारी में जुट जाएंगी। और युद्ध का समय आ गया है। वैसे भी नरेंद्र मोदी की अगुवाई में ये गलत धारणा पूरी तरह से स्थापित करने की कोशिश बार-बार होती है कि हिंदुओं के अलावा हिंदुस्तान में किसी को रहने नहीं दिया जाएगा। और मुसलमान देश होने की वजह से पाकिस्तान से आज नहीं तो कल लड़ाई होना पक्का है। लेकिन, हर बार की तरह इस बार भी नरेंद्र मोदी अनुमानों के उलट व्यवहार कर बैठे।


ब्रिक्स देशों की बैठक में शामिल होने गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस के ऊफा शहर में थे। वहां शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन की बैठक में उन्होंने न सिर्फ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से बात की बल्कि, इस्लामाबाद जाने का निमंत्रण भी स्वीकार कर लिया। चीन की पहल पर बने शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन में भारत और पाकिस्तान दोनों देशों को चीन ने स्थाई सदस्यता दी है। हालांकि, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पाकिस्तान दौरा वहां के कट्टरपंथियों के लिए पचाना संभव नहीं होगा। भारत में जो कट्टरपंथी हैं वो प्रधानमंत्री की निंदा करेंगे। सबसे बड़ी बात ये कि पहली बार ये हुआ है कि इस बार की बातचीत में कश्मीर की शर्त बाधा के तौर पर नहीं रखी गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस पहल और नवाज शरीफ के इस पहल को हाथ बढ़ाकर स्वीकारने को चीन दोनों हाथ में लड्डू वाले भाव से देख रहा है। हालांकि, चीन पाकिस्तान को इस्तेमाल करके भारत पर दबाव बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ेगा। लेकिन, बड़ी सच्चाई ये भी है कि आर्थिक तरक्की बनाए रखने के लिए अब चीन को भारत का सहयोग चाहिए ही चाहिए। चीन की चमत्कारिक तरक्की की रफ्तार ढलान वाला रास्ता पकड़ चुकी है। जबकि, भारत की तरक्की की रफ्तार अब ऊंचाई के रास्ते पर फिर तेजी से चढ़ने लगी है। ये अनुमान दुनिया भर की एजेंसियां बता रही हैं। चीन साढ़े छे प्रतिशत के नीचे लुढ़कता दिख रहा है। जबकि, भारत साढ़े सात प्रतिशत के ऊपर की तरफ। ये संदर्भ तथ्य है जिसकी वजह से चीन, भारत और पाकिस्तान दोनों के बीच रिश्तों का संतुलन बनाना चाह रहा है। यही वजह है कि चीन की अधिकारिक न्यूज एजेंसी शिनहुआ पर लिखा जाता है कि ये दोनों देशों की बड़ी उपलब्धि है। और ये भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शांति के रास्ते पर आगे बढ़ने को दिखाता है जो, भरोसा उन्होंने पिछले साल सितंबर में संयुक्त राष्ट्र संघ में दिया था। हालांकि, नरेंद्र मोदी के लिए ये रास्ता आसान नहीं होगा। क्योंकि, कांग्रेस और विपक्ष ने प्रधानमंत्री पर तीखे हमले बोल दिए हैं। कांग्रेस का कहना है कि सीमा पर सैनिक मारे जा रहे हैं और प्रधानमंत्री ट्रैक टू डिप्लोमेसी कर रहे हैं। कमाल की बात ये है कि ठीक यही आरोप पाकिस्तान में नवाज शरीफ पर भी लग रहे हैं। भारत में विपक्ष कह रहा है कि नरेंद्र मोदी झुक गए। जबकि, पाकिस्तान में विपक्ष हल्ला कर रहा है कि नवाज शरीफ ने ऊफा में मोदी से मुलाकात करके, उन्हें पाकिस्तान आने का न्योता देकर और कश्मीर को बातचीत में न शामिल करके पाकिस्तान की अवाम का अपमान किया है। कमाल ये है कि नवाज के अपमान से पूरा पाकिस्तानी विपक्ष उबल रहा है और इधर यही हाल भारतीय विपक्ष का है। इसलिए इस बातचीत से ऐसा न मान लिया जाए कि सब सही हो रहा है। अभी लगातार बाधा दौड़ नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ को दौड़नी पड़ेगी। ऐसा ही नजारा भारतीय टीवी चैनलों पर हो रही बहसों में भी दिखता है। अच्छी बात ये है कि अब टीआरपी की दौड़ की वजह से ही या ज्यादा निष्पक्ष दिखने की दौड़ की वजह से भारतीय न्यूज चैनल पाकिस्तानी न्यूज चैनलों के साथ साधा लाइव कार्यक्रम कर रहे हैं। दोनों तरफ के एंकर मध्यस्थ की भूमिका में होते हैं और दोनों तरफ के विश्लेषक इस तरह से बात कर रहे होते हैं कि लगता है कि बस इन्हीं की बात सही है। और उसमें भी जो भारतीय या पाकिस्तानी सेना के पूर्व अधिकारी होते हैं वो तो कभी-कभी इस कदर जोश में आ जाते हैं कि लगता है कि रिटायरमेंट से वापस लौटकर सीमा पर जाकर दे दनादन शुरू कर देंगे। लेकिन, इन बहसों से काफी कुछ साफ होता है। क्योंकि, बातचीत करते पक्षपाती होकर की गई बात और निष्पक्ष होकर की गई दोनों पक्षों की बात साफ समझ में आ जाती है। अब पता नहीं पाकिस्तान के न्यूज चैनल उस पूरी बहस को वहां भी ऐसे ही लाइव दिखाते हैं या नहीं। अच्छा हो कि अगर वहां भी ये पूरा का पूरा लाइव दिखाया जाए। इससे दोनों देशों के लोगों को खुद की असलियत और अपने नेताओं की असलियत समझने में आसानी होगी। समझ ये भी आसानी से आएगा कि दोनों देशों के नेता सरकार और विपक्ष में कैसे व्यवहार करते हैं। सरकार में समझौते करते हैं और विपक्ष में संग्राम का हुंकार भरते रहते हैं। एक न्यूज चैनल की बहस में पाकिस्तान के एक विशेषज्ञ ने कहाकि देखिए हमारी हर बात के जवाब में आपके पास उसका उल्टा जवाब मौजूद है। ऐसे ही आपकी हर बात के जवाब में हमारे पास भी उसका उल्टा जवाब मौजूद है। लेकिन, अच्छी बात है कि आतंकवाद से हम दोनों त्रस्त हैं। कई बार हकीकत समझ नहीं आती। और भारत-पाकिस्तान के रिश्ते में आतंकवाद की हकीकत भी कुछ ऐसी ही है। शायद ये हकीकत सरकार में आने पर साफ नजर आने लगती है। इसीलिए हर भारत सरकार पाकिस्तान सरकार से रिश्ते अच्छे रखना चाहती है। हर भारतीय विपक्षी पार्टी हर पाकिस्तानी विपक्षी पार्टी के सुर एक जैसे होते हैं। और उसी तरह जनता भी बराबर-बराबर पक्ष विपक्ष है। कुल मिलाकर भारत पाकिस्तान रिश्ते की पूरी कहानी यही है। इस समय पाकिस्तान के सूचना मंत्री परवेज राशिद का ये बयान बड़ा महत्वपूर्ण है कि अगर 1999 में परवेज मुशर्रफ ने तख्तापलट नहीं किया होता तो, कश्मीर का मुद्दा अब तक सुलझ जाता। अच्छी बात ये है कि फिर से वही नवाज शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हैं। उससे भी अच्छा ये है कि हिंदुत्ववादी नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं। अच्छा है कि एक हिंदुत्ववादी छवि वाला नेता बार-बार इस्लामिक देश पाकिस्तान के साथ अच्छे रिश्ते का हाथ बढ़ा रहा है। और इससे भी अच्छी बात ये है कि अपने देश के कट्टरपंथियों के लाख दबाव के बावजूद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भी अमन का हर मौका पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं। कुल मिलाकर भारत-पाकिस्तान के बीच आज के हालात में जंग तो होने से रही। हां, बेवजह हर दूसरे-चौथे दोनों देश अपने सैनिकों को गंवाकर छाती चौड़ी किए रखना चाहते हों तो, रहें। लेकिन, रास्ता तो यही है। इस रास्ते को पक्का कर देने की जरूरत है।

Saturday, July 11, 2015

बिहार में बदल गए हैं जाति के नेता

बिहार विधान परिषद के चुनाव नतीजों ने राजनीतिक पंडितों के लिए पुनर्निरीक्षण की बुनियाद बना दी है। ज्यादातर राजनीतिक पंडितों, अनुमानों ने लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल और नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड के गठजोड़ के बाद बिहार में बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए की नैया डूबी ही मान ली है। बिहार में नीतीश का ही जनता दल यूनाइटेड है, भले इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव हों। सामान्य राजनीतिक समीकरण यही कह रहा है कि बिहार में जाति की राजनीति इस कदर हावी है कि अब  बीजेपी के लिए रामविलास का साथ होने के बावजूद चुनाव जीतना मुश्किल है। सामान्य राजनीतिक समीकरण कहता है कि यादव और दलित अगर जुड़ जाएं तो, फिर बिहार में किसी को भी सिंहासन पर बैठा सकता है। उस मुसलमान साथ आ जाएं तो, सोने पर सुहागा जैसा हो सकता है। और राजनीतिक विद्वान लालू-नीतीश के गठजोड़ से इसी सोने पर सुहागा जैसी स्थिति की कल्पना में हैं। लेकिन, ये सामान्य राजनीतिक समीकरण की बात थी। जबकि, अब बिहार का राजनीतिक समीकरण सामान्य नहीं रहा है। यादव पूरा का पूरा न लालू प्रसाद यादव के साथ है। और न ही मुसलमान। कुर्मी और दलितों में भी एनडीए ने रणनीतिक सेंध लगा दी है। रही-सही कसर खुद नीतीश कुमार ने जीतन राम मांझी को पार्टी से निकालकर कर दी। लेकिन, राजनीतिक समीकरण सीधा जोड़, घटाना या गुणा, भाग नहीं होता। अब उसमें नया मोड़ ये है कि 23 प्रतिशत दलित और 15 प्रतिशत यादव वोट अब सीधे लालू या नीतीश के खाते में नहीं जा रहा है। बिहार विधान परिषद चुनावों ने ये साफ भी कर दिया है।

 
जीतनराम मांझी मुसहर जाति से आते हैं। ये बिहार में महादलित वर्ग है। दरअसल भारतीय जनता पार्टी ने बड़ी चतुराई से दलितों में भी महादलित का नारा इसलिए मजबूत किया है जिससे नीतीश कुमार के महागठजोड़ से मुकाबला किया जा सके। जीतनराम मांझी ने मुख्यमंत्री रहते कुछ बड़े शानदार फैसले किए हैं। उन्होंने महिलाओं को आरक्षण दिया। साथ ही ठेके पर नियुक्त शिक्षकों को नियमित कर दिया। विवादित बयान के लिए ज्यादा जाने गए जीतन राम मांझी कमजोर ब्राह्मण और राजपूतों को भी आरक्षण की वकालत करते हैं। ये ऐसे फैसले हैं जिसका असर मत देते समय लोगों के दिमाग में जरूर होगा। और सबसे बड़ी बात ये है कि भले ही जीतनराम मांझी अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ें, मतदाता के दिमाग में लगभग साफ है कि लालू-नीतीश एक साथ और बीजेपी-रामविलास और जीतनराम के साथ। रामविलास पासवान ने अपने जन्मदिन पर जीतनराम को केक खिलाकर ये साफ कर दिया कि कौन कहां खड़ा है।  और, सबके बाद बिहार में सारी लड़ाई जाति की ही है। लेकिन, अब इस जाति की लड़ाई में कई बड़े तथ्य जुड़ गए हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण देखने को मिला लोकसभा चुनाव में। जब रामकृपाल यादव ने बीजेपी के चुनाव चिन्ह पर लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा को हराया तो, साफ हो गया कि बिहार गोप समीकरण बदल रहा है। सिर्फ रामकृपाल यादव ही नहीं, बीजेपी के टिकट पर सीवान, उजियारपुर, और मधुबनी से भी जीतने वाले यादव ही हैं। और उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल के प्रत्याशियों को हराया है। आरजेडी के बाहुबली सांसद पप्पू यादव भी अब लालू का साथ छोड़ चुके हैं। पूर्णिया, सहरसा, मुंगेर और भागलपुर में पप्पू यादव का कितना प्रभाव है, इस पर बहस हो सकती है लेकिन, इसे नकारना संभव नहीं है। पप्पू यादव ने अपनी नई पार्टी बना ली है। और राज्य में पदयात्रा पर निकल पड़े हैं। पप्पू यादव की छवि राष्ट्रीय स्तर पर कितनी भी खराब हो लेकिन, सच्चाई यही है कि यादव जाति के लोगों में पप्पू यादव का प्रभाव कई बार लालू प्रसाद यादव से भी ज्यादा दिखा है। शायद यही वजह भी रही कि लालू प्रसाद यादव ने पप्पू यादव को पार्टी से निकाल बार किया। क्योंकि, लालू प्रसाद यादव के उत्तराधिकारियों, मीसा-तेजप्रताप-तेजस्वी, में से कोई भी पप्पू यादव के आसपास भी खड़ा नहीं होता है। ये वही पप्पू यादव हैं जिन्होंने मई 2014 के लोकसभा चुनाव में मधेपुरा से शरद यादव को हरा दिया। जबकि, लोकसबा चुनावों में मोदी लहर में खुद लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा भारती और पत्नी राबड़ी देवी चुनाव हार गईं।
 
भूमिहार ब्राह्मण और राजपूतों को स्वाभाविक तौर पर भारतीय जनता पार्टी का वोटर माना जाता रहा है। बावजूद इसके कि बिहार की राजनीति में राजपूत और भूमिहार एक दूसरे के कट्टर विरोधी हैं। भूमिहार ज्यादा प्रभावशाली वर्ग है। और, लोकसभा चुनाव के बाद किसी भूमिहार को मंत्री न बनाने से भूमिहारों में गस्सा था। लेकिन, गिरिराज सिंह को मंत्री बनाकर नरेंद्र मोदी ने भूमिहारों को गुस्सा कम कर दिया है। इसके अलावा लालू-नीतीश के हाथ मिला लेने से इन दोनों जातियों के पास बीजेपी के पाले में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिखता है। कुल मिलाकर बिहार की राजनीति में जाति खत्म नहीं हुई है। लेकिन, जातियों के नेता एक नहीं रह गए हैं। एक जाति के कई नेता हो गए हैं। और सबकी अपनी राजनीति है। इसलिए महागठजोड़ या महादलित कौन सा दांव इस विधानसभा चुनाव में हिट होगा। इसका अंदाजा लगाना सीधा तो नहीं है। कम से कम बिहार विधान परिषद के चुनाव ने तो ये साफ कर ही दिया है। विधान परिषद के चुनाव चाहे सीधे जनता के वोट से न चुने जाते हों। लेकिन, सच्चाई ये भी है कि ये इशारा महत्वपूर्ण इसलिए भी है कि ज्यादातर विधान परिषद चुनाव में सत्ता पक्ष के ही विधायक चुने जाते हैं। यहां सत्ता बदले भले न बदलने के तगड़े संकेत हैं, तभी ये परिणाम हैं।

Thursday, July 09, 2015

शिमला यात्रा, ड्राइवर रमेश के श्रीमुख से

यात्रा हमेशा सिखाती है। और यात्रा में मिलने वाले नए-नए लोग काफी कुछ नया सिखाते हैं। अकेले यात्रा करने वाले सबसे ज्यादा जानते सीखते हैं। उसकी वजह ये होती है कि हर नए से बोलने-बतियाने का अवसर रहता है। सीखने के लिहाज से ट्रेन की यात्रा सबसे कमाल की होती है। रेलगाड़ी के भीतर-बाहर काफी कुछ सीखने लायक मिलत-दिखता रहता है। लेकिन, आजकल एक और यात्रा होती है। टैक्सी की यात्रा। और टैक्सी की यात्रा में सिखाने का काम करता है टैक्सी का ड्राइवर। इस बार सपरिवार हम शिमला यात्रा पर खुद ही कार चलाकर गए। बढ़िया यात्रा रही। मजा आया। लेकिन, शिमला पहुंचकर हमने वहां घूमने के लिए एक टैक्स ले ली। वजह ये कि खुद कार चलाते रहे तो, पहाड़ का प्राकृतिक आनंद ले नहीं पाएंगे।

टैक्सी के साथ टैक्सी ड्राइवर रमेश आए। रमेश शिमला से थोड़ा आगे बिलासपुर का रहने वाला है। शिमला में टैक्सी चलाते हैं। इसी से आसानी से परिवार चल जाता है। मैंने पूछा हिमाचल प्रदेश के बाहर टैक्सी लेकर जाते हैं। रमेश बोले समय ही नहीं है। शिमला, मनाली और उससे ऊपर के पर्यटकों से ही फुर्सत नहीं मिलती। परिवार बिलासपुर में ही रहता है। खेती भी अच्छी हो जाती है। बात शुरू हुई तो हमारे टैक्सी ड्राइवर रमेश के श्रीमुख से आया कि शहर तो शहर ही होता है। तो पहाड़ के भी शहर में कुछ तो बेईमानी आ ही गई है। वैसे गांव एकदम ईमानदार हैं। चायल से घूमकर लौटते रमेश ने शिमला का अस्पताल दिखाते बताया कि बिलासपुर में एम्स आ रहा है। मैंने पूछा तो बताया कि हां, बेहतर तो हो ही जाएगा। और ये भी बता दिया कि सबसे बेहतर जगह एम्स के लिए बिलासपुर ही है। जाहिर है बड़ा संस्थान आता है तो वहां के लोगों के लिए अच्छी खबर लेकर आता है। रमेश ने कहाकि जे पी नड्डा भी हमारे यहां का है। स्वास्थ्य मंत्री है। हिमाचल में भाजपा का नेता अब वही बनेगा। हमारे देश में कोई भी राजनीति पर बराबर दखल रखता है। उस दखल के सिद्धांत को कायम रखते हुए ड्राइवर रमेश के श्रीमुख से आया कि मोदी की लहर में जाने कितने मुर्दे तर गए। रमेश ने कहाकि इस बार धूमल का लड़का जीतने वाला बिल्कुल नहीं था। हालांकि, रमेश ने ये भी भविष्यवाणी कर दी कि अगली सरकार फिर से बीजेपी की होगी। वजह बड़ी ये बताई कि राजा वीरभद्र सिंह की विरासत संभालने वाला कोई नहीं है।

ये सब सामान्य ज्ञान तो रमेश ने बढ़ाया ही। लेकिन, असल ज्ञान आया, चायल से लौटते कुफरी में घुड़सवारी का आनंद (आनंद कहने की बात है। कभी-कभी ऐसे ही पहाड़ों में जाकर घोड़ा चढ़ने वालों की जान सांसत में रहती है।) लेने के बाद। शिमला गेस्ट हाउस लौटते मैंने कहा घोड़ों ने आपस में लड़ते हमारा घुटना तोड़ दिया। उस पर हमारा घोड़े वाला बेहद बद्तमीज था। खुद को संभालना पड़ा। सामने से दूसरे घोड़े पर आ रहे परिवार के साथ उनके घोड़े वाले का झगड़ा चल रहा था। क्योंकि, पैर जिस पर रखते हैं, वो रस्सी टूट गई। पुरुष के साथ उसका बच्चा भी था। वो बुरी तरह से झगड़ रहे थे। पुरुष बोला बच्चा गिर जाता तो। बीच में दखल देते हमारा घोड़े वाला बोला- बच्चा तुम्हारा है तो तुम्हीं ख्याल रखोगे ना। फिर मुझसे भी रहा नहीं गया और मैंने अपने घोड़े वाले को डांटा। हालांकि, वो दूसरे के उदाहरण देकर उनको गालियां देता रहा। मैंने खुद पर नियंत्रण रखा। और बाद में ये घटना ड्राइवर रमेश को बताने पर जो उसने कहा, उससे खुद के समझदार होने का प्रणाणपत्र प्राप्त होने जैसा अहसास हुआ। रमेश ने कहा- अरे साहब जो कुछ नहीं कर पाता वही तो इन घोड़ों के साथ दिन भर ऊपर नीचे दौड़ता रहता है। वरना सोचिए कौन घोड़ों के साथ-साथ ऐसे दौड़ सकता है। फिर घोड़ों के साथ रहते इनका दिमाग भी घोड़े जैसा हो जाता है। अब बताइए घोड़े से कोई बहस की जा सकती है। झगड़ा जा सकता है। इतनी आसानी से ये बात रमेश कह गया। मुझे लगा सही बात है इस तरीके से कौन पर्यटक सोचता होगा। अगली बार अगर किसी घोड़े वाले से या किसी और से झगड़ने की नौबत भी आ जाए तो, ड्राइवर रमेश के श्रीमुख से निकली बात जरूर ध्यान में रखिएगा। 

Tuesday, June 23, 2015

शिमला, सोनिया गांधी और सुविचार

ये कल्पना से बाहर की बात थी। भला ये कैसे सोचा जा सकता है कि सोनिया गांधी हिंदी पर महान विचारक हो सकती हैं। वो भी केंद्र सरकार के अधीन एक सरकारी कंपनी के अतिथि विश्राम गृह में। शिमला में एनएचपीसी के अतिथि विश्राम गृह के तीनों तलों पर सीढ़ियों की शुरुआत में एक विचार पट्टिका लगी हुई है। 
सबसे पहले मेरा ध्यान मुंशी प्रेमचद के विचार पर गया। अच्छा लगा कि सरकारी कंपनी के अतिथि गृह में इस तरह के सद्विचार लिखने का यत्न किया है। लेकिन, एक दूसरी ऐसी ही सद्विचार वाली तख्ती पर नजर पड़ी तो पहले उस कहे को कहने वाले से मैं जोड़ने में थोड़ा असहज हुआ। 



उसके बाद में सोचने लगा कि आखिर सोनिया गांधी के ये विचार किस हैसियत से एक केंद्र सरकार की कंपनी के अतिथि गृह में लिखे हुए हैं। अब जरा सोचिए कि क्या बीजेपी के किसी राष्ट्रीय अध्यक्ष के विचार ऐसे किसी सरकारी कंपनी के अतिथि गृह में लिखे जा सकते हैं। अभी के संदर्भ में सोचिए तो बीजेपी पूर्ण बहुमत से केंद्र की सरकार में है। अब अगर सरकारी कंपनियों के दफ्तरों और अतिथि गृहों में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का कहा सुविचार के तौर पर ऐसे चिपका दिया जाए तो कैसा लगेगा। सुविचार का बड़ा मतलब होता है। इस मतलब को ही सोनिया गांधी का हिंदी पर कहा और एक केंद्र सरकार की कंपनी के अतिथि गृह में लिखा होना ध्वस्त कर देता है। कमाल ये भी है कि कांग्रेस की अब सरकार भी नहीं है फिर भी वो तख्ती वहां शोभा दे रही है। 
इसके बाद तो और कमाल हो गया। कोई जानसन साहब हैं उन्होंने भी कुछ कहा है कि जिसको एनएचपीसी ने अपने अतिथि गृह में लिखना जरूरी समझा है। 

Wednesday, June 03, 2015

ये अर्थव्यवस्था कमजोर हो तो, असल अर्थव्यवस्था मजबूत हो!

कुछ ही महीने में ये दूसरी बार हुआ। मैं फिर से धोखाधड़ी का शिकार हो गया। पहली बार एक पूरे परिवार ने मिलकर बेवकूफ बनाया था। इस बार अकेली बूढ़ी महिला ने बेवकूफ बना दिया। दोनों बार मेट्रो स्टेशन के बाहर मेरे साथ ये धोखाधड़ी हुई। पहली बार बॉटैनिकल गार्डेन मेट्रो स्टेशन से निकलते और दूसरी बार अभी ताजा-ताजा पटेल चौक मेट्रो स्टेशन से निकलते। मुझे धोखा हुआ ये मुश्किल नहीं है। मुश्किल ये है कि इन धोखेबाजों की वजह से किसी जरूरतमंद पर भी भरोसा नहीं होगा। रात में दिल्ली से लौटा। पार्किंग के पहले ही पूरा सामान लिए बैठे एक परिवार ने रोक लिया। कहा- ठेकेदार ने पैसे नहीं दिए। हम सब मजदूर हैं। महाराष्ट्र से आए हैं। खाने तक का पैसा नहीं है। वापस घर जाना है। खाने भर का पैसा मिल जाए तो, सुबह किसी भी ट्रेन से निकल जाएंगे। पत्नी, बच्चे सब थे। मैंने पूछा कितने में खान खा लोगे। बोला- पाँच सौ। मेरी करीब तीन सौ रुपये थे। पार्किंग के तीस रुपये छोड़कर सब मैंने उसे दे दिया। कई बार खुद को भरोसा दिलाता रहा। हालांकि, बार-बार लगता रहा कि ये मुझे बेवकूफ बना रहा है। लेकिन, बच्चे की शकल देखकर पैसे दे दिए। थोड़ी दूर जाकर फिर लौटा और मैंने कहा कि मेरे सामने खाओ। खैर, इस बात के कुछ महीने बाद अभी पिछले शुक्रवार को पटेल चौक मेट्रो स्टेशन से निकला तो, इस बूढ़ी महिला की करुण आवाज ने फंसा लिया। महिला ने कहा पानीपत की हूं। घर वापस जाना है, उतने पैसे नहीं है। उसने तीस रुपये किराया बताया। मैंने दे दिया। मैंने देखा कि पैसे लेने के बाद भी वो वहीं बैठी है। दूसरों से भी पैसे मांग रही है। मैं लौटा और उसे डांटा कि अब यहां से हटो- घर जाओ। बड़बड़ाते हुए वो बुढ़िया उठ गई।
 
मंगलवार को फिर वही बुढ़िया पटेल चौक मेट्रो स्टेशन के बाहर दिख गई। वही राग गा रही थी। मैंने कहा बुढ़ापे में सबका भरोसा क्यों उठा रही हो। उसने मेरी बात अनसुना करने की कोशिश की तो, मैंने मोबाइल से उसकी तस्वीर ली। उसने कोशिश की कि शक्ल न दिखे। लेकिन, तब तक शक्ल मोबाइल में कैद हो चुकी थी। एक मित्र ने बताया कि ऐसे ही सपरिवार महाराष्ट्र से आए मजदूरों ने उससे पाँच सौ रुपये वसूल लिए थे। एक तो भीख की अर्थव्यवस्था से देश परेशान है। उस पर इस अंदाज में ठगी करने वाले तो सारी अर्थव्यवस्था का तंत्र ही बिगाड़ रहे हैं। सोचिए, बस हर रोज जगह बदलनी है। बेशर्म बन जाना है। और शाम तक 4-6 भी फंस गए तो, हजार-दो हजार की ठगी कर ली। इनका सही इलाज मैं भी नहीं समझ पा रहा हूं। ये भी सलाह नहीं दे पा रहा हूं कि किसी की मदद मत करो। लेकिन, कुछ तो करना होगा। निकम्मों की अर्थव्यवस्था चलती रहेगी तो असल अर्थव्यवस्था तो मजबूत होने से रही।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...