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Wednesday, June 03, 2015

ये अर्थव्यवस्था कमजोर हो तो, असल अर्थव्यवस्था मजबूत हो!

कुछ ही महीने में ये दूसरी बार हुआ। मैं फिर से धोखाधड़ी का शिकार हो गया। पहली बार एक पूरे परिवार ने मिलकर बेवकूफ बनाया था। इस बार अकेली बूढ़ी महिला ने बेवकूफ बना दिया। दोनों बार मेट्रो स्टेशन के बाहर मेरे साथ ये धोखाधड़ी हुई। पहली बार बॉटैनिकल गार्डेन मेट्रो स्टेशन से निकलते और दूसरी बार अभी ताजा-ताजा पटेल चौक मेट्रो स्टेशन से निकलते। मुझे धोखा हुआ ये मुश्किल नहीं है। मुश्किल ये है कि इन धोखेबाजों की वजह से किसी जरूरतमंद पर भी भरोसा नहीं होगा। रात में दिल्ली से लौटा। पार्किंग के पहले ही पूरा सामान लिए बैठे एक परिवार ने रोक लिया। कहा- ठेकेदार ने पैसे नहीं दिए। हम सब मजदूर हैं। महाराष्ट्र से आए हैं। खाने तक का पैसा नहीं है। वापस घर जाना है। खाने भर का पैसा मिल जाए तो, सुबह किसी भी ट्रेन से निकल जाएंगे। पत्नी, बच्चे सब थे। मैंने पूछा कितने में खान खा लोगे। बोला- पाँच सौ। मेरी करीब तीन सौ रुपये थे। पार्किंग के तीस रुपये छोड़कर सब मैंने उसे दे दिया। कई बार खुद को भरोसा दिलाता रहा। हालांकि, बार-बार लगता रहा कि ये मुझे बेवकूफ बना रहा है। लेकिन, बच्चे की शकल देखकर पैसे दे दिए। थोड़ी दूर जाकर फिर लौटा और मैंने कहा कि मेरे सामने खाओ। खैर, इस बात के कुछ महीने बाद अभी पिछले शुक्रवार को पटेल चौक मेट्रो स्टेशन से निकला तो, इस बूढ़ी महिला की करुण आवाज ने फंसा लिया। महिला ने कहा पानीपत की हूं। घर वापस जाना है, उतने पैसे नहीं है। उसने तीस रुपये किराया बताया। मैंने दे दिया। मैंने देखा कि पैसे लेने के बाद भी वो वहीं बैठी है। दूसरों से भी पैसे मांग रही है। मैं लौटा और उसे डांटा कि अब यहां से हटो- घर जाओ। बड़बड़ाते हुए वो बुढ़िया उठ गई।
 
मंगलवार को फिर वही बुढ़िया पटेल चौक मेट्रो स्टेशन के बाहर दिख गई। वही राग गा रही थी। मैंने कहा बुढ़ापे में सबका भरोसा क्यों उठा रही हो। उसने मेरी बात अनसुना करने की कोशिश की तो, मैंने मोबाइल से उसकी तस्वीर ली। उसने कोशिश की कि शक्ल न दिखे। लेकिन, तब तक शक्ल मोबाइल में कैद हो चुकी थी। एक मित्र ने बताया कि ऐसे ही सपरिवार महाराष्ट्र से आए मजदूरों ने उससे पाँच सौ रुपये वसूल लिए थे। एक तो भीख की अर्थव्यवस्था से देश परेशान है। उस पर इस अंदाज में ठगी करने वाले तो सारी अर्थव्यवस्था का तंत्र ही बिगाड़ रहे हैं। सोचिए, बस हर रोज जगह बदलनी है। बेशर्म बन जाना है। और शाम तक 4-6 भी फंस गए तो, हजार-दो हजार की ठगी कर ली। इनका सही इलाज मैं भी नहीं समझ पा रहा हूं। ये भी सलाह नहीं दे पा रहा हूं कि किसी की मदद मत करो। लेकिन, कुछ तो करना होगा। निकम्मों की अर्थव्यवस्था चलती रहेगी तो असल अर्थव्यवस्था तो मजबूत होने से रही।

Sunday, April 06, 2008

अमेरिकी मान रहे हैं कि अमेरिका गलत रास्ते पर है

अमेरिका- दुनिया का दादा। एक ऐसा देश, जिसकी दुनिया में छवि ये है कि वहां के लोग दुनिया के दादा का ये खिताब अपने पास रखने के लिए अपने प्रतिनिधियों (राष्ट्रपतियों) के हर फैसले पर आंख-मूंदकर मुहर लगा देते हैं। यहां तक कि इराक को नेस्तनाबूद करने के अपने राष्ट्रपति के फैसले को भी उन्होंने दुनिया में अपनी बढ़ती ताकत के सुबूत के तौर पर मान लिया। लेकिन, अब शायद अमेरिकी बदल गए हैं या दुनिया में ताकत, कंज्यूमर, बाजार की बदलती ताकत ने उन्हें बदल दिया है।

The newyork times और CBS News अमेरिकी चुनाव से पहले पूछे गए पोल में शामिल अमेरिकियों में से 81 प्रतिशत कह रहे हैं अमेरिका इतने गलत रास्ते पर चल रहा है कि अब संभालना मुश्किल हो गया है। दरअसल इराक में अमेरिका की मचाई भारी तबाही और अमेरिका पर लादेन के हमले ने अमेरिकियों का डराया भी और चेताया भी है। शायद यही वजह है कि उन्हें ये लगने लगा है कि मामला गड़बड़ा गया है। अमेरिकी, अब अमेरिका से बाहर दुनिया के सबसे ज्यादा लोगों के दुश्मन हो गए हैं।

इसीलिए क्या महिलाएं-पुरुष, क्या बड़े-बच्चे, शहरी, कुछ गांव में बचे अमेरिकी और सिर्फ हाईस्कूल की पढ़ाई कर निकले छात्र- सब कह रहे हैं कि अमेरिका को सही रास्ता चुनना होगा। यहां तक कि राष्ट्रपति चुनाव के लिए आपस में और विरोधी पार्टी से लड़ रहे डेमोक्रैट और रिपब्लिकन भी मान रहे हैं अमेरिकी सरकार की नीतियों में बड़े सुधार की जरूरत है। 71 प्रतिशत लोग मान रहे हैं कि पांच साल में हालात अमेरिकियों के लिए बेहद खराब हुए हैं। सिर्फ 4 परसेंट को लगता है कि बीते 5 सालों में कुछ पहले से अच्छा हुआ है।

ये सब सुनने में बड़ा अच्छा लग रहा है कि अमेरिकी इतना बदलान पसंद कर रहे हैं। लेकिन, सच्चाई यही है कि अमेरिका के इन दो मीडिया हाउस के सर्वे में अमेरिकियों के ये भाव इसीलिए सामने आ रहे हैं अमेरिकी इस समय बुरी तरह डरे हुए अमेरिका की दुनिया में ताकत घटी है। अमेरिकियों की खर्च करने की ताकत कम हो रही है। एक-एक झटके में एक-एक लाख नौकरियां घट रही हैं। और, ये लगातार कई महीनों से हो रहा है। रियल एस्टेट सेक्टर बरबाद हो गया है।

कुल मिलाकर सीधी सी बात ये है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था में मंदी आ गई है (फिर भी अमेरिकी सरकार और अर्थशास्त्री, अमेरिकियों को ये दिलासा देने की कोशिस कर रहे हैं कि मंदी का खतरा है)। अमेरिका भारतीय दार्शनिक चार्वाक के सिद्धांत- ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, यावत जीवेत सुखम जीवेत- के शिकार हो गए हैं। क्रेडिट की ऑक्सीजन पर जिंदा अमेरिका का क्रेडिट मार्केट (साख तो रह ही नहीं गई है।) पूरी तरह ध्वस्त हो गया है।

इसको आप ऐसे समझ सकते हैं अच्छी नौकरी और अगले साल उस नौकरी से भी अच्छी नौकरी मिलने की उम्मीद में अमेरिकियों में बरसों से घर-गाड़ी खरीदनी की होड़ लगी है। उस घर खरीदने की भूख को तृप्त करने के लिए बिल्डर्स बिना सोचे बड़े-बड़े शानदार कंक्रीट के जंगल तैयार करते चले गए। उन जंगलों को तैयार करने के लिए बैंकों ने उन्हें बिना सोचे-समझे और सही आंकलन किए, मनचाहा लोन दे दिया। यहां तक बैंकों ने ऐसे लोगों को भी लोन देने शुरू कर दिए जिनके रिकॉर्ड लोन लौटाने के मामले में बेहतर नहीं हैं या यूं कहिए कि आगे उनकी खर्च करने और कर्ज चुकाने की उतनी बेहतर क्षमता नहीं दिख रही है।

तेजी के दौर में अमेरिकी बेतहाशा खर्च करते रहे और तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था के भरोसे अमेरिकी शेयर बाजार में शेयरों के भाव छलांग लगाते रहे। लेकिन, इस बीच मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में डिमांड में कमी आई और इसकी वजह से उन्हें कर्मचारियों को नौकरी से निकालना पड़ा। नौकरी से निकाले गए कर्मचारी घरों के कर्ज की स्त चुकाने में नाकाम होने लगे। कंक्रीट के जंगलों के खरीदार कम होने लगे। कई बड़े बिल्डर्स के प्रोजेक्ट रुक गए और बिल्डरों को दिया बैंकों का कर्ज एनपीए यानी ऐसा कर्ज बन गया जिसके लौटने की गुंजाइश कम ही दिखती है।

घर खरीदने वाले घटे तो, तेजी से घरों की कीमत घटी। जिन्होंने अपने घर गिरवी रखकर बैंकों से कर्ज लिया था। उसकी कीमत कर्ज से बहुत कम रह गई। बस भारतीय किसान के गरीबी के दुश्चक्र की तरह अमेरिकी फाइनेंशियल मार्केट क्रेडिट के दुश्चक्र में फंस गया। अमेरिका का पांचवां सबसे बड़ा बैंक बेयर स्टर्न्स, जिसके एक शेयर का भाव जनवरी में 150 डॉलर था। मार्च में सिर्फ 10 डॉलर शेयर के भाव पर बिक गया। अब मंदी के इससे बड़े लक्षण क्या होते हैं। लेकिन, अभी भी सफेद दाढ़ी वाला अमेरिकी सेंट्रल बैंक का चेयरमैन बेन बर्नानके और कार्टूनिस्ट की पहली पसंद वाली शक्ल वाला अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश दोनों ही कह रहे हैं कि अमेरिका को मंदी से बचाने की कोशिश जारी है।

खैर, हम फिर से लौटते हैं कि अमेरिकी कह रहे हैं कि अमेरिका गलत रास्ते पर है। वैसे इस सर्वे में शामिल 72 प्रतिशत अमेरिकी अभी भी मान रहे हैं कि उनके घर की आर्थिक स्थिति ठीक है। लेकिन, जब ये पूछा गया कि हाल के बरसों में आपकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है तो, ये कहने का दम सिर्फ 23 प्रतिशत अमेरिकियों में बचा है। 28 प्रतिशत खुद को पहले से गरीब मान रहे हैं (वैसे ये शब्द अमेरिकी सिर्फ विकासशील नाम के देशों के लोगों के लिए इस्तेमाल करते हैं) और 48 प्रतिशत कह रहे हैं कि पांच साल पहले जितने ही पैसे अब भी उनके पास हैं।

अपने स्वास्थ्य के लिए 42 प्रतिशत अमेरिकी बेहद चिंतित हैं। 29 प्रतिशत को थोड़ी बहुत चिंता है। 28 प्रतिशत ही हैं जो, पुराने अमेरिकियों जैसी बात कर रहे हैं कि उन्हें खास चिंता नहीं है। घर की कीमत को लेकर 31 प्रतिशत अमेरिकी बहुत चिंतित हैं, 38 प्रतिशत की चिंता अभी हल्की-हल्की है। लेकिन, 30 प्रतिशत को अब भी चिंता नहीं है। लेकिन, फिर भी 81 प्रतिशत अमेरिकी कह रहे हैं अमेरिका बहुत गलत रास्ते पर चला गया है। भीषण त्रासदी का समय है दुनिया के दादा के लिए।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...