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Thursday, July 16, 2015

धरातल पर उतरता मेक इन इंडिया

मेक इन इंडिया का बेहतर असर हो रहा है। मेक इन इंडिया अभियान की शुरुआत के बाद भारत में एफडीआई अड़तालीस प्रतिशत बढ़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल सितंबर में मेक इन इंडिया अभियान शुरू किया था। तब से अप्रैल तक के आंकड़े बता रहे हैं कि विदेशी निवेशकों को ये मेक इन इंडिया खूब लुभा रहा है। इसकी गवाही दे रहा है आजकल अखबारों और दूसरे जरिए से आ रहा बीएमडब्ल्यू का बड़ा सा विज्ञापन। ये विज्ञापन बीएमडब्ल्यू के मेक इन इंडिया अभियान में शामिल होने का खबर दे रहा है। इस खबर के साथ अच्छी खबर ये भी कि अब चेन्नई के नए प्लांट में बनेंगी बीएमडब्ल्यू कारें। कंपनी ने मेक इन इंडिया कारों की कीमत कम होने का विज्ञापन दिया है। विज्ञापन कह रहा है कि जर्मन तकनीक का नया घर भारत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मेक इन इंडिया असर करता दिख रहा है। सही समय पर ये अभियान प्रधानमंत्री ने शुरू किया है। ये समय है जब दुनिया भर में बड़ी-बड़ी कंपनियां खुद का मुनाफा बचाने के लिए जूझ रही हैं। यही वजह है कि जब ऐसे मौके पर दुनिया के सबसे ज्यादा संभावना वाले देश भारत के प्रधानमंत्री ने उनके लिए और मौके मेक इन इंडिया अभियान के साथ दिखाए तो, वो खुद को रोक नहीं पा रहे हैं। और ये मौके सिर्फ विदेशी कंपनियों को भारत में बुलाने के लिए नहीं है। ये मौका उन भारतीय कंपनियों को भी बड़े मौके की तरह दिख रहा है जो, यूपीए 2 में नीतियों में स्पष्टता न होने और स्थिरता की वजह से विदेशों में मौके तलाशने लगी थीं। अच्छी बात ये है कि रक्षा, ऑटो, स्मार्टफोन, पीसी बनाने वाली कंपनियां सबसे ज्यादा इस मौके को भुनाना चाह रही हैं। और ये साफ दिख रहा है कि मेक इन इंडिया की कामयाबी का बड़ा फायदा सिर्फ सरकार को नहीं भारतीय ग्राहकों को भी जमकर मिलने वाला है।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी नए सिरे से मेड इन चाइना अभियान शुरू किया है। कहीं न कहीं इस अभियान के पीछे मेक इन इंडिया अभियान से चीन का हिस्सा घटने का डर भी है। लेकिन, मुनाफा देखने वाली कंपनी वहीं जाएगी जहां उसे मुनाफा मिलेगा। इसी सिद्धांत पर चीन दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब बन गया। अब वही कोशिश भारत कर रहा है। इसका असर भी दिख रहा है। चीन की कंपनी अपने वीवो स्मार्टफोन अब भारत में ही असेंबल करके बेचेगी। अक्टूबर से कंपनी की असेंबलिंग यहां शुरू हो जाएगी। अब तक ज्यादातर मोबाइल फोन सीधे चीन से ही बनकर भारत आते रहे हैं। यहां तक कि एप्पल और सैमसंग मोबाइल भी ज्यादातर मेड इन चाइना होते हैं। देसी कंपनियां माइक्रोमैक्स और कार्बन के स्मार्टफोन भी मेड इन चाइना ही होते हैं। लेकिन, अब आप जल्द ही मेड इन इंडिया स्मार्टफोन इस्तेमाल कर सकेंगे। स्मार्टफोन बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी फॉक्सकॉन भारत में दस से बारह मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने वाली है। ये सभी इकाइयां 2020 तक काम करने लगेंगी। भारत की आयात नीति में बदलाव के बाद फॉक्सकॉन ने एलान किया है कि वो भारत में 2 बिलियन डॉलर का निवेश करेगी। फॉक्सकॉन एप्पल आईफोन और आईपैड बनाने के लिए दुनिया भर में मशहूर है। स्मार्टफोन बनाने के मामले में भारत में मेक इन इंडिया के जोर पकड़ने के एक और संकेत हैं। पिछले साल जून महीने से इस साल जून महीने में सेमी नॉक्ड डिवाइसेज का आयात चौंसठ प्रतिशत बढ़ गया है। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि अब पहले से इतना ही ज्यादा मोबाइल फोन भारत में असेंबल किए जा रहे हैं। सैमसंग और माइक्रोमैक्स ने जून महीने में 69 लाख सेमी नॉक्ड डिवाइसेज आयात किए हैं। इंटेक्स, लावा और कार्बन मोबाइल कंपनियां भी अब धीरे-धीरे भारत में ही स्मार्टफोन असेंबलिंग कर रही हैं। अभी तक ये कंपनियां पूरा फोन ही चीन से बनवाकर आयात करती रही हैं। कार्बन कंपनी तो अगले साल भर में नोएडा, बंगलुरू में असेंबली लाइन और हैदराबाद में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने की तैयारी कर चुकी है। लेनोवो और सोनी भी अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट भारत में लगाने जा रहे हैं। सेलकॉन की हैदराबाद मैन्युफैक्चरिंग यूनिट से तो फोन बनना भी शुरू हो गया है। एचटीसी भी अब अपने मोबाइल भारत में ही बनाएगी। यानी भले ही आपके हाथ में आने वाले दिनों में किसी भी कंपनी का स्मार्टफोन हो लेकिन, वो दरअसल मेड इन इंडिया ही होगा। मेक इन इंडिया में सिर्फ स्मार्टफोन कंपनियों को ही मौका है। ऐसा नहीं है। पीसी, लैपटॉप बनाने वाली कंपनी डेल चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा डेल के पीसी, लैपटॉप भारत से ही निर्यात कि जाएं। यानी मेड इन इंडिया पीसी, लैपटॉप दुनिया भर में बिकेगा।


बीएमडब्ल्यू साफ बता रही है कि भारत में ही कार बनाने की वजह से कार कंपनी अपनी कारों की कीमत कम कर रही है। लेकिन, दूसरी कार कंपनियां पहले से ही भारत में हैं। अब वो भारत के प्लांट से ही कारें बनाकर दुनिया भर में बेचना चाह रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मेक इन इंडिया इन कार कंपनियों के लिए सोने पर सुहागा जैसा है। यूरोपीय कंपनी एयरबस के सीईओ बर्नहार्ड जरवर्ट ने पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में मुलाकात की। मुलाकात का मकसद सरकार के मेक इन इंडिया अभियान में शामिल होकर इस मौके का फायदा उठाना है। एयरबस डिफेंस और स्पेस क्षेत्र में मेक इन इंडिया अभियान में शामिल होना चाहता है। एयरबस महिंद्रा के साथ मिलकर सेना के लिए हेलीकॉप्टर बनाएगा। सरकार को इस बात का भी अच्छे से अंदाजा है कि मेक इन इंडिया का ज्यादा फायदा विदेशी कंपनियों को ही न मिल जाए। इसीलिए रक्षा क्षेत्र में सरकार ने 56 भारतीय कंपनियों को लाइसेंस दिए हैं। यूपीए सरकार ने अपने पूरे कार्यकाल में इतने लाइसेंस नहीं दिए थे। मेक इन इंडिया अभियान मौके पर चौका मारने जैसा है। लेकिन, एक बड़ी सावधानी जरूर सरकार को रखनी होगी। और वो सावधानी है भ्रष्टाचार मुक्त मेक इन इंडिया। क्योंकि, अभी के हाल में एक छोटा सा धब्बा भी पूरे मेक इन इंडिया को मुश्किल में डाल सकता है। 

Saturday, May 02, 2015

मेक इन इंडिया का भगवान है ग्राहक!

ग्राहक भगवान है। ये ज्यादातर दुकानों पर लिखा दिख जाता है। अब थोड़ा आधुनिक भारत में मार्केटिंग के उस्तादों ने कंज्यूमर इज किंग में इसे बदल दिया है। अब कंज्यूमर इज किंग कहें या ग्राहक को भगवान। सच्चाई यही है कि ग्राहक देवता या किंग कंज्यूमर को अगर ठीक से समझ लिया जाए तो मेक इन इंडिया की प्रधानमंत्री की योजना अद्भुत तरीके से अर्थव्यवस्था के हक में असर दिखा सकती है। भारत में कंज्यूमर ड्यूरेबल पूरा सेक्टर है जिसकी तरक्की अगर सही तरीके से हो और इसका सही इस्तेमाल मेक इन इंडिया की महत्वाकांक्षी योजना में हो पाए तो, चमत्कार हो सकता है। देश में कंज्यूमर ड्यूरेबल्स लोगों के खर्च का चालीस प्रतिशत हिस्सा है। और सबसे बड़ी बात ये है कि कंज्यूमर ड्यूरेबल उद्योग जबर्दस्त तरीके से रोजगार के मौके बढ़ाने वाला है। कंज्यूमर ड्यूरेबल इंडस्ट्री में मिलने वाले हर एक रोजगार के मौके से तीन अप्रत्यक्ष रोजगार के मौके भी बनते हैं। इसका सीधा सा मतलब हुआ कि अगर कंज्यूमर ड्यूरेबल इंडस्ट्री में 100 लोगों को रोजगार मिला दिखता है तो, ये सीधे-सीधे चार सौ लोगों को रोजगार मिलता है। देश की कुल उद्योगों की तरक्की में कंज्यूमर ड्यूरेबल की हिस्सेदारी कितनी महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कंज्यूमर ड्यूरेबल सेक्टर औद्योगिक तरक्की के सूचकांक में 5.5% हिस्सेदारी रखता है। CAD यानी चालू वित्तीय घाटे को कम करने में दूसरा सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

ग्राहक देवता को साधने की बात मैं इसलिए कर रहा हूं क्योंकि, भारत में कंज्यूमर ड्यूरेबल का कारोबार 2015 आते-आते करीब एक लाख करोड़ रुपये में का हो गया है। और इसमें कंज्यूमर ड्यूरेबल सेक्टर के चार सबसे महत्वपूर्ण उत्पादों को ही मैं शामिल कर रहा हूं। टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन और एयरकंडीशनर। और सबसे अच्छी बात ये है कि तेजी से शहरीकरण वाले भारत में इन चारों ही उत्पादों में चमत्कारिक वृद्धि की उम्मीद की जा सकती है। भारत सरकार ने सौ से ज्यादा स्मार्ट शहर बनाने की बात कही है। उस पर काम भी शुरू हो गया है। इसके अलावा भी तेजी से बढ़ती औद्योगिक गतिविधियों की वजह से बड़े शहरों और उससे छोटे शहरों में भी तेजी से इन कंज्यूमर ड्यूरेबल्स का बाजार तेजी से बढ़ा है। और धीरे-धीरे कंज्यूरेबल्स की पहुंच गांवों तक भी बढ़ रही है। इस लिहाज से अगर ये समझना हो कि भारत में कंज्यूमर ड्यूरेबल सेक्टर की तरक्की कितनी हो सकती है तो, इसके लिए पहले दुनिया में कंज्यूमर ड्यूरेबल इंडस्ट्री की तरक्की की औसत रफ्तार जाननी होगी। कंज्यूमर ड्यूरेबल के चार सबसे महत्वपूर्ण उत्पादों की चर्चा करें तो, एक टेलीविजन का ही बाजार है जहां, भारतीय दुनिया के मुकाबबले में कुछ नजदीक दिखते हैं। मतलब ये हुआ कि भारतीयों के घरों में टीवी की पहुंच तेजी से बढ़ी है। फिर भी दुनिया के मुकाबले ये काफी कम है। भारत में साठ प्रतिशत घरों में टेलीविजन है। जबकि, दुनिया में औसत 89 प्रतिशत घरों में टेलीविजन है। इसका मतलब इस कंज्यूमर ड्यूरेबल इंडस्ट्री में भी अभी तरक्की की काफी संभावनाएं हैं। टीवी के बाद भारतीय दूसरा कोई उत्पाद खरीद रहा है तो वो है रेफ्रिजरेटर। इक्कीस प्रतिशत भारतीयों के घर में फ्रिज है। लेकिन, इसमें तरक्की की अपार संभावनाओं को इससे समझा जा सकता है कि दुनिया में औसत 85 प्रतिशत घरों में फ्रिज है। फ्रिज के बाद भारतीयों के घर में वॉशिंग मशीन का स्थान है। लेकिन, ये इतना कम है कि तरक्की की इसमें संभावनाएं ही संभावनाएं हैं। नौ प्रतिशत से भी कम भारतीयों के घर में वॉशिंग मशीन है। यानी 91 प्रतिशत भारत कपड़े धुलने के लिए अभी भी मशीन का इस्तेमाल नहीं करता है। जबकि, दुनिया में सत्तर प्रतिशत लोग कपड़े धुलने के लिए मशीन का ही इस्तेमाल करते हैं। कंज्यूमर ड्यूरेबल में सबसे ज्यादा संभावनाओं वाला उद्योग है एयरकंडीशनर। भारत में सिर्फ तीन प्रतिशत लोगों को ही अभी एयरकंडीशनर का सुख मिल रहा है। जबकि, दुनिया में औसतन साठ प्रतिशत लोग एयरकंडीशनर की ठंडी हवा ले रहे हैं।

कंज्यूमर ड्यूरेबल क्षेत्र के इन चारों महत्वपूर्ण उत्पादों में तरक्की की जबर्दस्त संभावनाएं हैं। लेकिन, सच्चाई ये भी है कि पिछले तीन वर्षों में टेलीविजन को छोड़ दें तो, बाकी तीनों उत्पादों का उत्पादन घटा है। सिर्फ टेलीविजन ही है जो, 2012 में सालाना 19 लाख उत्पादन से तरक्की करते हुए 2014 में सालाना 49 लाख तक पहुंचा है। और 2012 से 2013 में तेज तरक्की हुई जो, 19 लाख टीवी सेट से 31 लाख टीवी सेट तक पहुंच गई। हालांकि, टीवी का बाजार तीनों उन्य उत्पादों के मुकाबले लगभग उच्चतम स्थिति तक पहुंच गया है। यानी ये लगभग इसी के आसपास बना रहेगा। रेफ्रिजरेटर का उत्पादन भी 2012 में 77 लाख से बढ़कर 2014 में 84 लाख हो गया लेकिन, साल 2013 के मुकाबले रेफ्रिजरेटर के उत्पादन में 2014 में  गिरावट आई है। 2012 में सालाना 30 लाख वॉशिंग मशीन का उत्पादन हुआ था। 2013 में ये बढ़कर 32 लाख और 2014 में 34 लाख तक पहुंच गया। इस मामले में सबसे कमजोर प्रदर्शन एयरकंडीशनर क्षेत्र का रहा है। 2012 में 17 लाख एयरकंडीशनर का उत्पादन हुआ था। जो, 2013 और 2014 में भी 19 लाख एयरकंडीशनर का ही रहा। यानी सबसे ज्यादा संभावना वाले क्षेत्र में लगभग स्थिरता सी आ गई है।

 मेक इन इंडिया के लिए कंज्यूमर ड्यूरेबल क्षेत्र की इसी स्थिरता को गति देने की जरूरत है। लेकिन, इसके साथ ही एक और संतुलन बेहतर करने की जरूरत है। और वो है कंज्यूमर ड्यूरेबल क्षेत्र के उत्पादों के आयात-निर्यात का संतुलन। क्योंकि, मेक इन इंडिया के जरिए चालू खाते का घाटा भी दूर हो इसके लिए जरूरी है कि आयात-निर्यात का असंतुलन दूर किया जाए। जबकि, सच्चाई ये है कि ये असंतुलन दूर होने के बजाए बढ़ता ही जा रहा है। 2012 में टेलीविजन उद्योग ने तीन हजार करोड़ रुपये का सामान आयात किया। जबकि, निर्यात सिर्फ 170 करोड़ रुपये का रहा। 2014 में आयात बढ़कर 3300 करोड़ रुपये का हो गया। जबकि, निर्यात बढ़कर 220 करोड़ रुपये पर ही पहुंचा। एक रेफ्रिजरेटर के मामले ही ये संतुलन बेहतर दिखता है। 2012 में रेफ्रिजरेटर क्षेत्र ने 120 करोड़ रुपये का आयात किया तो, 340 करोड़ रुपये का निर्यात किया। 2014 में आयात बढ़कर 140 करोड़ रुपये हुआ तो, निर्यात भी तेजी से बढ़कर 720 करोड़ रुपये हो गया। वॉशिंग मशीन के मामले में भी आयात-निर्यात का असंतुलन बहुत ज्यादा है। 2012 में वॉशिंग मशीन उद्योग ने 800 करोड़ रुपये का आयात किया। जबकि, निर्यात सिर्फ 22 करोड़ रुपये का रहा। हालांकि, 2014 में आयात घटकर 700 करोड़ हुआ और निर्यात बढ़कर 146 करोड़ रुपये हो गया। लेकिन, अभी भी दोनों के बीच का अंतर तेजी से घटाने की जरूरत है। भारतीय बाजार के लिहाज से सबसे ज्यादा संभावना वाले उद्योग एयरकंडीशनर में ही सबसे ज्यादा आयात-निर्यात का भी असंतुलन है। 2012 में 3800 करोड़ रुपये का आयात 2014 में बढ़कर 4800 करोड़ रुपये सालाना हो गया। जबकि, 2012 में किया गया 351 करोड़ रुपये का निर्यात 2014 में भी 643 करोड़ रुपये तक ही पहुंचा। इसमें भी सबसे ज्यादा चिंता वाली बात ये है इन उद्योगों के लिए ज्यादातर सामान का आयात चीन से ही किया जा रहा है। अब अगर इसी आयात निर्यात के असंतुलन को मेक इन इंडिया उलटने में कामयाब हो जाए तो, हर साल सिर्फ इन्हीं चार उत्पादों से भारतीय अर्थव्यवस्था को शुद्ध दस हजार करोड़ रुपये के चालू खाते के घाटे में कमी आ सकती है। जाहिर है ये आंकड़ा सिर्फ अभी के आयात निर्यात के आंकड़े को उलटने भर से दिख रहा है। अगर भारतीय और दुनिया भर की कंपनियां भारत में सामान बनाती हैं और भारत की पूरी जरूरत के बाद दुनिया की भी जरूरत पूरी करने की वजह मेक इन इंडिया बनता है तो, ये आंकड़ा चमत्कारिक तौर पर बढ़ सकता है।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...