Tuesday, September 17, 2013

प्याज पत्रकारिता !


महंगाई देश की तरक्की की रफ्तार में सबसे बड़ा ब्रेकर है। ये सबको पता है फिर भी महंगाई बढ़ रही है। वैसे महंगाई के बढ़ने की असल वजह ज्यादातर बिचौलिए ही होते है। वैसे हम कह सकते हैं कि इस देश की ज्यादा जरूरत वाली आबादी के लिए तो सरकार खाद्य सुरक्षा बिल लेकर आई है। फिर चिंता किस बात की। लेकिन, ऐसे लोगों के बारे में सरकार शायद नहीं जानती कि खाली पेट और भूख लगती है। अब भूख लगती है तो लगती रहे। अगस्त महीने के महंगाई दर के जो आंकड़े आए हैं उनसे ये संकेत मिल रहे हैं कि महंगाई कम नहीं होने वाली। ये आंकड़े थोक महंगाई दर के हैं। हालांकि, आंकड़ों में ये 5.79% से बढ़कर 6.10% ही हुए हैं। लेकिन, खतरनाक बात इसमें जो छिपी थी वो ये कि महंगाई दर को करीब दशमलव दो प्रतिशत बढ़ाने में खाने-पीने के सामानों की बड़ी अहम भूमिका है। वैसे तो समय-समय पर सरकार की नीति से खाने-पीने के सामान की महंगाई बढ़ती रहती है। लेकिन, पहले की तरह इस बार भी तगड़ा मोर्चा प्याज ने संभाला है। प्याज ने किचन का बजट पीटकर पटरा कर दिया है। प्याज कीमतें 250 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ीं थीं। प्याज की कीमतें बढ़ी हैं इसमें कोई बहस नहीं है और इसकी खबरें भी मीडिया में आनी ही चाहिए। लेकिन, ये खबर जिस तरह से परोसी जा रही है वो खतरनाक है। प्याज किचन में काटते वक्त आंसू रुलाता है इसलिए टीवी चैनलों की खबर में जब प्याज और वो भी खूब महंगा प्याज आता है तो जाहिर है खबर देखने वालों की आंख से आंसू निकलेंगे ही। सोमवार को थोक महंगाई दर के आंकड़े क्या आए। मंगलवार के लिए टीवी चैनलों पर खबरों का प्राथमिक एजेंडा तय हो गया। प्याज। आंसू निकालने वाला प्याज। इसके बाद तय होता है कि प्याज पर हमारी खबर पर ही सबसे ज्यादा आंसू निकलना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि सबसे ज्यादा लगने वाली खबर हो। मतलब सबसे ज्यादा महंगी प्याज हमारे चैनल पर ही बिके।

एक चैनल पर खबर आई प्याज ने आंसू निकाले। दिल्ली में प्याज की कीमत 70 रुपये किलो पहुंची। ये नंबर एक वाला चैनल था तो उसके ठीक पीछे वाले चैनल ने खबर चलाई। दिल्ली में प्याज के भाव 80 रुपये किलो हुए। अब सवाल ये कि भैया दिल्ली में भाव या 70 होगा या 80 दो चैनलों पर अलग-अलग भाव के प्याज कैसे। खैर ये भी सवाल गलत क्योंकि, हो सकता है दोनों चैनलों के रिपोर्टर अलग-अलग दुकानों से अलग किस्म का प्याज लेकर आए हों। नंबर एक चैनल को बुरा लगा उसने हेडलाइन में ही डाल दिया महंगाई का शतक प्याजा! अब भले ही इस हेडलाइन का कोई मतलब न हो लेकिन, भाव तो समझ में आ रहा है कि इस चैनल पर प्याज 100 रुपये किलो तक बिक रही है। पक्का हो गया कि नंबर एक चैनल की प्याज ही सबसे महंगी है। तो अब इसी पर सबसे ज्यादा आंसू निकलेंगे। लोग आंसू पोछेंगे और फिर से भाव देखेंगे। टीआरपी भी देंगे। प्याज पर सरकारें पहले तो गिरी हैं। इस बार का पता नहीं। लेकिन, टीवी चैनल वालों को ये प्याज इतनी अच्छी लगती है कि हर तरह के प्रचार तंत्र की पारंपरिक धारणाओं को तोड़ देने वाले नरेंद्र मोदी का जन्मदिन और मां का आशीर्वाद भी टीवी चैनलों के प्याज पर भारी नहीं पड़ सका। अब समझ में ये नहीं आता कि क्या ऐसी खबरों पर किसी को भी मंडी भेजकर भाव तय करा लिए जाते हैं। या एक बार चैनल अपने आर्थिक पत्रकार से ये भी समझने की कोशिश करता है कि प्याज ने जो ये आंसू निकाले, ये जो किचन के बजट में आग लगाई, ये सब कब हुआ। लेकिन, ये पूछ लिया जाए तो सोमवार को ही मंगलवार का एजेंडा कैसे तय हो पाएगा। और न्यूजरूम के तय करने वाले लोग कैसे बढ़िया पैकेजिंग कर पाएंगे। देश के हर कोने से रिपोर्टर से तय तरीके से मंडी से महंगी प्याज का वॉकथ्रू करा पाएंगे। जाहिर है हर जगह से महंगी प्याज का वॉकथ्रू तो तय करके ही आ सकता है। दरअसल सोमवार को जो थोक महंगाई दर के आंकड़े आएं हैं वो 2 हफ्ते पहले खत्म हो गए महीने के हैं। और उस समय जो महंगाई थी उसमें प्याज का योगदान 250 प्रतिशत का था। किसी भी टीवी चैनल पर प्याज के आंसू रोकने के लिए ये बात नहीं बताई गई। जाहिर है टीवी तो थोक मंडी वाला भी देखता है और खुदरा मंडी वाला भी। उसे लगता है अरे ये टीवी चैनलों के पढ़े लिखे जानकार लोग तो टीवी पर 70-100 रुपये किलो प्याज बेच रहे हैं। जबकि, इनको न खरीदना है न बेचना है। तो हम क्यों पीछे रहें। 

थोक मंडी वाला 30-35 रुपये किलो वाली प्याज का भाव बढ़ाकर 40-45 कर देता है। खुदरा कारोबारी 70-100 के बीच में कहीं बेच लेगा। और इसका असर ये कि बड़ी मुश्किल से 50-60 के बीच के भाव तक लौटा प्याज फिर से 70-100 पर चला जाएगा। और सितंबर के महंगाई के आंकड़ों में प्याज रुलाने की अपनी शानदार भूमिका अदा करता दिखेगा। 20 सितंबर को रघुराम राजन गवर्नर बनने के बाद पहली बार मॉनिटरी पॉलिसी का एलान करेंगे। राजन के आने बाजार, रुपया सुधरा था। सब ये भी उम्मीद लगा बैठे थे कि राजन सुब्बाराव जैसा व्यवहार नहीं करेंगे और बढ़ती ब्याज दरें कुछ घटाएंगे। हालांकि, उसकी उम्मीद कम ही थी। लेकिन, टीवी चैनलों पर चल रही प्याज की हॉरर स्टोरी अर्थशास्त्र के सारे सिद्धांतों को ध्वस्त कर देगी। राजन सुब्बाराव वाले सुर में आ जाएंगे। विकास की जगह महंगाई रिजर्व बैंक के एंजेडे में आ जाएगी और हम महंगाई के दुष्चक्र में फंसे रहेंगे क्योंकि, टीवी चैनलों को व्यवस्थित तरीके से स्टोरी कराने के लिए व्यवस्थित खबर चाहिए। और वो तभी होगी जब 2 हफ्ते पहले के भाव को आज का भाव साबित किया जा सके। 

सरकार खुद पर भरोसा करो !




Monday, September 16, 2013

हर रोग का प्राकृतिक निदान

मीडिया चौपाल के बाद मेरे दाहिने प्रमोद वर्मा, बीके कुठियाला, अनिल सौमित्र
मीडिया चौपाल में शामिल होने के लिए 2 दिन भोपाल में था। मीडिया चौपाल में काफी कुछ नए मीडिया को लेकर बात हुई। विज्ञान को कैसे नए मीडिया में बेहतर तरीके से जगह मिले। लोगों को विज्ञान के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी मिली इस पर भी बात हुई। और ब्लॉगरों, सोशल मीडिया के संचालकों के बीच विज्ञान की बात होने की वजह साफ थी। इस पूरे आयोजन को कराने का जिम्मा पिछले साल की तरह इस साल भी मध्य प्रदेश के विज्ञान तकनीकी परिषद (MPCOST) ने ले रखा था।

2 दिन उसी परिसर में हम लोग रहे और इस परिसर में ही एक छोटा सा बगीचा भी था। इस बगीचे पर नजर गई तो मानव स्वास्थ्य हर्बल उद्यान जैसा कुछ लिखा था। इसमें बाकायदा शरीर के अलग-अलग अंगों के बारे में और उन अंगों में विकार के लिए कौन से प्राकृतिक तरीके से चिकित्सा हो सकती है। उसा भी संकेत था। अच्छा लगा कि कि विज्ञान प्रौद्योगिकी परिषद के परिसर में इस तरह का हर्बल उद्यान है। उत्सुकता बढ़ी तो बगीचे में जाकर घूमे। देखने से लगा कि काफी कुछ तो हम लोग भी जानते हैं कि इस पौधे-पेड़ से इस रोग का निदान हो सकता है। लेकिन, उस बगीचे का पूरा चक्कर मारने पर समझ में ये आया कि प्रकृति ने खुद ही सारा इंतजाम कर रखा है। कहीं जाने की जरूरत ही नहीं है। जाहिर है प्रकृति का इंतजाम है तो प्राकृतिक तरीके से ही उसका असर भी होगा।

बगीचे के अंदर की कुछ तस्वीरें भी लगा रहा हूं। लेकिन, एक बात अखरी कि छोटा उद्यान था। लेकिन, फिर भी ये महत्वपूर्ण है।





Thursday, September 12, 2013

आडवाणी जी मुश्किल तो है लेकिन ...

लालकृष्ण आडवाणी नहीं मानेंगे। किसी से नहीं मानेंगे। जनभावना से नहीं मानेंगे। पार्टी नेताओं से नहीं मानेंगे और यहां तक कि जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को वो अपने जीवन की सारी उपलब्धियों की सबसे बड़ी वजह मानते हैं उस संघ की भी नहीं मानेंगे। लोगों को लग रहा है कि ये लालकृष्ण आडवाणी को हो क्या गया है। यहां तक कि एक समय में आडवाणी खेमे के कहे जाने वाले और नरेंद्र मोदी के खिलाफ बिहारी मोदी बनने वाले सुशील मोदी भी अब आडवाणी को नसीहत दे रहे हैं। लेकिन, आडवाणी मान नहीं रहे हैं। अगर हम पुराने वाकयों पर नजर डालें तो साफ समझ में आ जाएगा कि आडवाणी न माने हैं न मानेंगे। वरना तीन बार पार्टी से बाहर-अंदर न हुए होते। लालकृष्ण आडवाणी 5 दशक से भारतीय जनता पार्टी चला रहे हैं और इस लिए वो इस उम्र में भूल सा गए हैं कि पार्टी कोई फैक्ट्री नहीं है कि जिसको अच्छे से चलाने वाला उसका मालिक होता है। यहीं आडवाणी जी मार खा रहे हैं। पिछली बार भी आडवाणी ने जब 2009 के लोकसभा चुनाव के पहले ही खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करा लिया था तब भी यही बात उनके खिलाफ चली गई थी। दिसंबर 2007 में ही हड़बड़ी में खुद को बीजेपी की ओर से पीएमइनवेटिंग घोषित करा लिया था। बिना किसी बहस के बीजेपी जो भी है उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बाद सबसे बड़ा योगदान अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी का ही है। लेकिन, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी में एक मूल भिन्नता जो थी वो हिंदूवादी या उदारवादी छवि की तो थी ही। एक और बड़ी भिन्नता थी जो अब खुलकर सामने आ गई है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी पार्टी में खुली लामबंदी नहीं की और न ही पार्टी से ज्यादा खुद की निष्ठा वाले नेता तैयार किए। जबकि, लालकृष्ण आडवाणी ने ये खुलकर किया। आडवाणी जिद्दी इतने हैं कि अपने गुरु की सलाह भी उन्होंने नहीं मानी थी। शायद आडवाणी ये मानते थे कि बिना कॉकस के बड़ा होना बहुत मुश्किल है। और आडवाणी की ये सोच लंबे समय तक काम भी करती रही। लेकिन, 2009 में जब आडवाणी मनमोहन सिंह को बार-बार कमजोर कहने के बाद भी कमजोर हो गए। और, बीजेपी की अगुवाई वाले गठबंधन की जगह यूपीए फिर से सत्ता में आ गया तो लालकृष्ण आडवाणी के कॉकस को तोड़ने की संघ की कोशिश तेज हो गई।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करने वाले डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार की तरह दिखने वाले सरसंघचालक मोहनराव भागवत ने तय कर लिया था कि अब चरित्र निर्माण की शाखा नए सिरे से लगानी ही होगी। संघ ने बड़े सलीके से ये किया। पहले नितिन गडकरी को ले आकर दिल्ली दरबार के डी 4 को तोड़ने की कोशिश की। लेकिन, गडकरी की कारोबारी शैली की राजनीति बीजेपी कार्यकर्ताओं को भी कम पची और उस पर आरोपों ने भी गडकरी की राह में गड्ढे कर दिए। लालकृष्ण आडवाणी को मौका मिल गया उन्होंने नितिन गडकरी के अलावा कोई भी वाली शर्त रख दी। और, जनभावना के लिहाज से समय-समय पर सटीक फैसले लेने वाले संघ ने भारी मन से गडकरी को दूसरा कार्यकाल नहीं दिया। लेकिन, सहमति के अध्यक्ष बने राजनाथ सिंह आडवाणी का सम्मान तो करते रहे लेकिन, कॉकस का हिस्सा नहीं बने। वो वही करते रहे जो सबको ठीक लगे और सबको इस समय तो नरेंद्र मोदी ही ठीक लग रहे हैं। इसीलिए गोवा में वो हो गया जो लालकृष्ण आडवाणी ने कभी सोचा भी नहीं था। आडवाणी गए और फिर लौटे।

लालकृष्ण आडवाणी लौटे लेकिन, तब तक तो अपनी शैली के बूते नरेंद्र मोदी औपचारिक तौर पर दिल्ली आ चुके थे। संसदीय समिति सदस्य के तौर पर और चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष के तौर पर। नरेंद्र मोदी की शैली ऐसी थी कि नरेंद्र मोदी ने कोई नेताओं का कॉकस नहीं बनाया लेकिन, समर्थकों का समूह बढ़ाते गए। और वो भी ऐसे समर्थक जो बीजेपी, संघ और हिंदू छवि की बात पर सिर्फ और सिर्फ मोदी को नेता मान रहा था। इसमें ऐसे समर्थक भी थे जो नरेंद्र मोदी की विकास यात्रा गुजरात से बाहर निकलकर पूरे देश में देखना चाह रहे थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बीजेपी कार्यकर्ता अब नरेंद्र मोदी के नाम पर थोड़ा भी पीछे हटने को  तैयार नहीं। ये सब स्वाभाविक तौर पर हो रहा है। हवा सब समझ रहे हैं। लेकिन आडवाणी जी अब समझने को तैयार नहीं। जबकि, वो नहीं माने तो त्यागी, संगठन के उस्ताद, हिंदुओं के गजब के नेता, अच्छे स्वयंसेवक- इन सब पर उनकी सत्तालोलुप आडवाणी वाली छवि भारी पड़ जाएगी। वही याद रहेगी। इसलिए आडवाणी जी मुश्किल तो है लेकिन, मान जाइए। मन मार के मान जाइए। सब ठीक रहा प्रणब दा की तरह रायसीना हिल्स के विशाल महल में रहने का मौका तो आपके पास रहेगा।

Monday, September 09, 2013

दंगा !


मुजफ्फरनगर का दंगा भी धर्म की लड़ाई है। ये साबित हो ही चुका है। लेकिन, क्या ये धर्म की लड़ाई है। दरअसल इस देश में एक बड़ी विचित्र बात जो हो बार-बार साबित हो चुकी है कि दंगा या फिर इस तरह का कोई तनाव हिंदु मुस्लिम वोट दिलाने में मददगार होता है। और इससे भी बड़ी बात ये साबित करने की कोशिश होती रही है कि दक्षिणपंथी पार्टियां ही इस सारे ध्रुवीकरण के लिए अकेले जिम्मेदारी निभाती हैं। ये बात कांग्रेस, बसपा, सपा, राजद और जाने कौन-कौन सी देश की पार्टियां लगातार साबित भी करती रहती हैं। दुखद ये नहीं है। देश की ज्यादातर पार्टियां धर्मनिरपेक्ष होने के नाम पर ही मुसलमान वोटों की लड़ाई लड़ती रहती हैं। और ठीक है अगर सिर्फ एकाध दक्षिणपंथी पार्टियों को पूरी तरह सांप्रदायिक बता भर देने से मुसलमान वोट मिल जा रहे हैं तो बुरा क्या है। लेकिन, दुखद बात ये है कि अब कई स्वानामधन्य संपादकों को भी एकाध दक्षिणपंथी पार्टियां उसमें भी राष्ट्रीय स्तर पर अकेली बीजेपी ही है जो देश के सारे दंगों की वजह दिखती है। जबकि, ये साबित होता रहा है कि दंगे या ऐसी किसी भी तनाव वाली स्थिति का मुसलमान वोटों के तौर पर थोक फायदा उन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों को ही होता रहा है। फिर भी दंगे या ऐसी धर्मों के बीच तनाव की स्थिति के लिए जिम्मेदार बीजेपी ही होती है। ये स्थिति ऐसी बिगड़ चुकी है कि अगर बीजेपी शासन वाले राज्य में दंगा हो तो राज्य सरकार कराती है और अगर किसी दूसरी पार्टी का शासन है तो मुख्य विपक्ष में या मुख्य विपक्ष से भी नीचे कहीं दिख रही बीजेपी साजिश करके कराती है।

और बीजेपी ही दंगे या हिंदु मुसलमान तनाव के लिए जिम्मेदार होती है इस बात को साबित करने में कई जिम्मेदार संपादक धर्मनिरपेक्ष पार्टियों से से भी कई हाथ आगे निकलने की कोशिश करते दिखते हैं। एक और महत्वपूर्ण तथ्य है कि हिंदु मुस्लिम के बीच के तनाव की खबर बने इससे पहले जब वो सीधे अपराध की भी खबर होती है तो भी मीडिया उसमें अल्पसंख्यक बहुसंख्यक के लिहाज से पहचान बता या छिपा रहा है। दो धर्मों से जुड़ा मसला है तो उसे बिल्कुल भी मीडिया में नहीं आना चाहिए। दंगा दिखाने से दंगा भड़कता है इस नैतिक नीति के तहत भारतीय मीडिया 2002 के बाद का कोई दंगा नहीं दिखाता #UPriots की चर्चा तो बिल्कुल नहीं। पत्रकारिता की ये नैतिक नीति काफी हद तक सही भी है। लेकिन, ये नीति जब अपनी सहूलियत के लिहाज से बदलती है तो, शायद दंगा भड़काने वालों को और आसानी हो जाती है। ये ऐसे कि कई स्वनामधन्य संपादक ऐसे मसलों पर हिंदुओं के खिलाफ लिखकर ये सोचते हैं कि वो अल्पसंख्यक मुस्लिमों का भला कर रहे हैं। अब एक उदाहरण देखिए आशुतोष की अच्छे पत्रकारों में गिनती है। देश के एक बड़े चैनल के संपादक हैं। लेकिन, मुजफ्फरनगर के मसले पर वो पहले से ही सारी गलती दक्षिणपंथियों पर थोपने लगते हैं। और एकाध उग्र दक्षिणपंथियों के ट्वीट पकड़कर सारा निष्कर्ष निकाल लेते हैं। उन्होंने मुजफ्फरनगर मसले पर ट्वीट किया - Hate tweets should be banned and  such persons should be arrested एकदम सही बात है किसी भी जिम्मेदार संपादक को यही लाइन लेनी चाहिए। लेकिन, इसके बाद की एक और ट्वीट पढ़ने पर लगा कि वो संपादकीय जिम्मेदारी निभाते-निभाते जल्दी से सहूलियत वाली दक्षिणपंथी विरोध की भूमिका चुन लेते हैं। उनका ट्वीट आता है - I repeat those who are writing anti Muslim tweets should be arrested. Unless they are put behind bars they will not change. Harmony is must. अब इस ट्वीट को देखने के बाद लगने लगता है कि वो सारी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के प्रवक्ता की जिम्मेदारी भी निभाने से चूकना नहीं चाहते। ऐसे माहौल में दंगा करना और दंगे की बात करना एक जैसा ही हो जाता है। लेकिन, किसके लिए। उनके लिए जिनके ऊपर दंगे का कोई असर नहीं होता या सकता। 

किसी भी दंगे में किसी की जान जाए ये दुखद है लेकिन, क्या दंगे और जान जाने में भी communal secular का फर्क हो जाता है। पता नहीं पत्रकार राजेश वर्मा का दंगों के कवरेज में मरना दंगा न दिखाने की नैतिक नीति में बदलाव लाता है या नहीं। हम भारतीय भी गजब हैं एक 2002 से @narendramodi कुछ के लिए राक्षस बन गए। हर दूसरे चौथे 2002 दोहराने वाले नियमित रक्षक। ऐसा क्यों? ये सवाल इसीलिए भी उठता है कि मुख्यमंत्री बनने के साथ ही दंगों को न्यौता देने वाली अखिलेश सरकार की बर्खास्तगी की मांग करने वाली पार्टियां भी सेक्युलरिज्म के नाम पर इसमें लगे हाथ बीजेपी की साजिश की जांच की मांग भी जोड़ देती हैं। ये जो दंगा हुआ ये एक अपराधिक घटना थी। जिसमें एक हिंदु लड़की के साथ छेड़खानी एक मुस्लिम लड़के ने किया। लड़की के भाइयों ने उस लड़के को मार दिया। फिर मारे गए लड़के के परिजनों ने लड़की के दोनों भाइयों को मार दिया। छेड़खानी और उसके बाद के किसी भी समय पर कानून व्यवस्था काबू करने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ राज्य सरकार की थी। इसके लिए जो खाप पंचायत बुलाई गई उसका भी आह्वान भारतीय किसान यूनियन और खापों ने मुख्य रूप से किया था। इसको समर्थन राजनीतिक वजहों से सिर्फ बीजेपी ने नहीं, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल ने भी दिया था। ये धार्मिक लड़ाई नहीं थी। न धार्मिक दंगा। ये पूरी तरह से अखिलेश सरकार की नाकामी है। 

मैं हिंदु हूं। पत्नी तीज का व्रत रखती है। उसी के साथ पूजा के लिए मंदिर गया था। दरअसल मैं पूजा तो कम ही कर रहा था। मुजफ्फरनगर की खबरें देख-पढ़ रहा था। आरती के बाद मंदिर के पुजारी ने ऊंचे स्वर में बोला और सबने दोहराया, मैंने भी। धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो प्राणियों में सद्भावना हो विश्व का कल्याण हो। आज ये काफी महत्वपूर्ण है।

Friday, September 06, 2013

भ्रमित भारतीय जनता से भ्रमित भारतीय जनता पार्टी !


पता नहीं मेरे अलावा और कितने लोग ये कहते मानते होंगे। मानते भी होंगे तो सार्वजनिक तौर पर कितने मानते होंगे। लेकिन, मैं सार्वजनिक तौर पर कहता हूं कि ये देश भ्रमित लोगों का देश है। पत्रकार हूं तो तुक्का भिड़ाने के लिहाज से मैं भ्रमित भारत बोलता हूं। भ्रमित भारत यानी क्या करना है किधर जाना है क्यों जाना है या ये सब पता भी है तो भी क्यों करें या कर भी लें तो करने से क्या होगा या हो भी गया तो भी क्या। कुछ इस टाइप वाला भ्रमित भारत। और इसी भ्रमित भारत और भारतीयों का सबसे मजबूत प्रतिबिंब अपने को समझने वाली पार्टी है भारतीय जनता पार्टी। यानी भ्रमित भारतीय जनता की पार्टी। यानी भ्रमित जनता की पार्टी। मतलब पक्के तौर पर बीजेपी मतलब भ्रमित जनता पार्टी लिख सकते हैं। चलिए जनता भी हटाते हैं सिर्फ जनता पार्टी लिखते हैं। वैसे इस समय ये लिखना खतरे से खाली नहीं है। क्योंकि, भ्रमित जनता पार्टी के पक्के नेता के समर्थक भ्रमित नहीं हैं। वो भ्रमित होते भी हैं तो पूरी तरह से। वो भ्रमित हैं कि उनका नेता गुजरात की सेवा करना चाहता है या देश की। 6 करोड़ गुजरातियों की सेवा करने में उसे मजा मिल रहा है या 122 करोड़ भारतीयों की सेवा करने का मजा लेना चाहता है। गर्वी गुजरात कहना चाहता है या जय भारत। लेकिन, कमाल ये है कि इस भ्रमित जनता पार्टी के नेता के समर्थक बिल्कुल भ्रमित नहीं हैं। वो एकदम उसे भगवान की तरह देखते हैं। जो भी वो बोला वही ब्रह्मवाक्य। लेकिन, ऐसे ही भगवान की तरह उस महान नेता को देखने वाला एक अधिकारी भ्रमित हो गया है। वो कह रहा है कि उसके भगवान ने उसे धोखा दे दिया। 

इस धोखे देने की बात उसके भगवान नेता को जोर से लगी। उसे फिर भ्रम हो गया कि वो 6 करोड़ गुजरातियों का ही कर्ज उतारने के लिए है। अरे अभी पक्के तौर पर 20 दिन भी नहीं बीते थे। जब टीवी न्यूज चैनलों पर भ्रम फैल गया था कि लाल किला दिखाएं या लालन कॉलेज। अच्छा हुआ कि लाल किले के बाद लालन कॉलेज दिखाने का विकल्प था। भ्रम को काफी लोगों ने सच्चाई मान लिया कि असली लाल किले वाला तो लालन कॉलेज पर है। लालन कॉलेज से भारतीयों का भ्रम ऐसा दूर हो रहा था कि पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु भी पहले लाल किले के भाषण में क्या भ्रम दूर कर पाए होंगे। भ्रम दूर हो गया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी भ्रम से बाहर निकल आया था। उसने कहा अब भारतीय जनता पार्टी को भ्रमित नहीं होने देना है। तय हुआ कि भ्रम दूर करने वाले नेता को प्रधानमंत्री का दावेदार बना दो। आधी लड़ाई तो ऐसे ही जीत लेंगे। लेकिन, भ्रमित भारत है भ्रमित भारतीय हैं और उन्हीं भ्रमित भारतीयों की जनता पार्टी है। उसके कुछ नेताओं ने भ्रम बढ़ा दिया। ये कहकर कि प्रधानमंत्री की लड़ाई तो 2014 में है फिर 2013 में हमारे मुख्यमंत्री बनने में भ्रम कयों फैला रहे हो। इस भ्रम के समर्थन में वो भ्रमित भारतीय जनता पार्टी के नेता आ गए जो इस भ्रम में हैं कि भ्रम बना रहा तो हम प्रधानमंत्री बन सकते हैं। कम से कम तब तक जब तक कोई दूसरा प्रधानमंत्री न बन जाए। लेकिन, संघ इस भ्रम में फंसने को तैयार नहीं। और इस बार वाला स्वयंसेवक तो पुराने प्रधानमंत्री स्वयंसेवक से भी कम भ्रमित है। उसे मुखौटे की भी जरूरत कम ही है। टोपी की भी। भ्रम दूर होने ही वाला था।

भ्रम दूर हो भी जाता कि वही भगवान मानने वाले अधिकारी की चिट्ठी आ गई। भ्रम बढ़ गया। भ्रम ऐसा बढ़ गया कि लालन कॉलेज को लाल किले से श्रेष्ठ करार देने वाले टीवी न्यूज चैनलों पर नामंजूरी की खबरें भी आ गईं। और, इस नामंजूरी की खबर का आधार बना वही 6 करोड़ गुजरातियों की सेवा का 2017 तक का करार। इसी 6 करोड़ गुजरातियों की सेवा के जज्बे को देखकर ही तो 122 करोड़ भ्रमित भारतीय अपना नेता मानने को तैयार बैठे दिख रहे थे। लेकिन, जब नेता ही भ्रम बढ़ाने लगे तो जनता भला कैसे बिना भ्रमित हुए रह सकती थी। वैसे भ्रमित होने से बचने की जरूरत है। इसी भ्रम की शिकार जनता को भ्रमित करके कांग्रेस हमारे भ्रमित भारतीयों को यहां तक लेकर आ गई है। अब देखिए ये भ्रम आगे हमें कितना भ्रमित करके रखता है।

Tuesday, September 03, 2013

मनमोहन सरकार ये तूने क्या किया !

हम भारतीयों को सपना देखने में बड़ा मजा आता है। ऐसा कि कोई भी हमें सपना दिखा दे तो हम मजे से उसके साथ हो लेते हैं। ये बात हमारे नेताओं को गजब समझ में आई। जवाहर लाल नेहरु ने नया भारत बनाने का सपना दिखाया। भारत एक खोज हो गई, हम भारतीय नेहरु के साथ हो लिए। इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का सपना दिखाया। फिर हम भारतीय इंदिरा के साथ हो लिए। राजीव गांधी ने इक्कीसवीं सदी में ले जाने का सपना दिखाया। हम भारतीय अब राजीव के साथ हो लिए। लेकिन, हम भारतीयों को सबसे तगड़ा सपना दिखाया  गैरराजनीतिक मनमोहन सरकार ने। मनमोहन सरकार कभी नेता नहीं रहे। लेकिन, हमेशा जीवन की सर्वोच्च सुख सुविधा का भोग करते रहे। उन्होंने भी एक सपना इस देश को दिखाया। और, वो अब तक का सबसे तगड़ा सपना था। हम भारतीय बिस्तर पर पड़े इस सपने की आहट भर से गुदगुदाने लगे। वो सपना था हम भारतीयों को अमेरिकी बनाने का। वो सपना था दुनिया की सारी सुख सुविधा भारत में जुटाने का। वो सपना था हम भारतीयों को जेब में जमकर रुपया भर जाने का। वो सपना था हम भारतीयों की देह पर दुनिया के सारे ब्रांडेड कपड़ों के सज जाने का। वो सपना था हम भारतीयों के पास दुनिया की सबसे शानदार कारों के होने का। वो सपना था हम भारतीयों के हंसते-खेलते बिना संयुक्त परिवार के तनाव के मियां-बीवी और बच्चे के साथ मॉल में घूमने का। वो सपना था हर गांव के शहर बन जाने का। वो सपना था हर भारतीय शहर में अमेरिकी शहरों जैसी चमक का। वो सपना था 10% की तरक्की का। हम मनमोहन सरकार के साथ हो लिए। 2004 में, फिर 2009 में। सपना टूट गया है। आधा रह गया है हमारी तरक्की की रफ्तार की तरह। अब देखिए सपने में जीने वाले भारतीय बिस्तर से बूथ तक पहुंचते हैं या इस सपने के लिए 2014 में मनमोहन सरकार का साथ देते हैं। क्योंकि, सपना तो बहुत बड़ा है। और, पूरे तो पहले के भी सपने नहीं हुए थे।

Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

 Harsh Vardhan Tripathi हर्ष वर्धन त्रिपाठी #Bangladesh में @trahmanbnp प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। @PMOIndia @narendramodi ने उन्हें बध...