अब जब अशोक गहलोत तक शशि थरूर को गरिया रहे हैं। भले सीधे-सीधे नहीं- गहलोत कह रहे हैं कि शशि थरूर ने जो, इकोनॉमी में सफर करने वाले लोगों को जानवर जैसा कहा है, उसके लिए उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए, इससे कम का कुछ नहीं चलेगा। कांग्रेसी मुख्यमंत्री गहलोत गुस्से में हैं, भाजपाई मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का हक बनता है वो, पहले ही बहुत गुस्सा चुके हैं। इतना सब कुछ देखकर मेरे अंदर भी मौका पाते ही गरियाने को उत्प्रेरित करने वाले विषाणु सक्रिय हो गए हैं। अरे भाई, गहलोतजी तो कभी न कभी मुख्यमंत्री, बड़े कांग्रेसी नेता होने की वजह से बिजनेस क्लास का आनंद लिए ही होंगे। नहीं लिए होंगे तो, ले सकते हैं, थे- लेकिन, हम तो भइया जब चले इकोनॉमी क्लास में ही चले। वो, भी कोई बहुत खुशी-खुशी नहीं। लेकिन, इस लिहाज से शशि थरूर को गरियाने का पहला जेनुइन हक हमारे जैसे लोगों का ही बनता है।
लेकिन, बड़ी एक मुश्किल हो गई है ई तीन दिन से मन में गरियाने का विचार संजोए जब अपनी शकल शीशे में देख रहा था तो, कुछ चेहरवा हमारा बदला-बदला सा दिखा। अरे ई कोई रात में सोए सुबह उठकर देखे जैसा फिल्मी बदलाव नही था। ई धीरे-धीरे होए रहा था नोटिसियाए करीब हफ्ता-दस दिन पहिलवैं। हमारा चेहरवा न ऊ हमारा जो गेहूंआ रंग है उससे ज्यादा कुछ गोरायमान हो रहा है। ऐसे ही एक दिन बदलाव दिखा था- ऑफिस में जरा ऊ साबुन से हाथ का धोए, पूरा हथवा लगा जइसे कटरीना कैफ से ज्यादा रंगत ले लिए हो। चेहरे पे गजब की लुनाई दिखने लगी है जइसे पहले टीवी-ऊवी पे दिखने वाले लोगों के चेहरे पे दिखती थी। रफ-टफ वाला हर्षवर्धन हेरा (गायब) रहा है।
याददाश्त पर जरा जोर डाले तो, पता चला कि बदलाव बड़ा तगड़ा-तगड़ा हुआ। लेकिन, ऊ तो, दिल्ली से इलाहाबाद, मुंबई से इलाहाबाद, देहरादून से इलाहाबाद, कानपुर से इलाहाबाद यानी पिछले दस साल में नौकरी के चक्कर में जहां भी रहे वहां से ऊ जो, दे दनादन इलाहाबाद का चक्कर लगाते रहे उससे, बदलाव ठीक से टाइम पे पल्ले नहीं पड़ा। अब देहरादून तक तो, तबौ ठीक था। मोटरसाइकिल से दिन भर एहर-ओहर की रिपोर्टिंग, संझा के बिना एसी वाले ऑफिस में बैठके टकपक-टकपक टाइप करके कंप्यूटर पे पेज की तरफ खबर बढ़ाए। ऐसहीं दिन चलता था। लेकिन, ऊ जो, टीवी में आने का मन बनाए तो, दिल्ली आए गए फिर टीवी की नौकरी में पहुंच गए बंबई नगरिया। बंबई नगरिया के करतन पहली बार ऊ शशि थरूर वाले जानवरों के क्लास में हवाई सफर किया (हमारे लिए त ऊ स्वर्ग जैसा ही अनुभव था।)। फिर वहां का मौसम भी ठीक था। ऑफिस के बगल में एक कमरा। औ, कमरे में रहना कमै होता था। लगभग सोने के लिए उसकी जरूरत थी। वरना ज्यादातर टाइम बढ़िया ऑफिस के एसी में कटता था।
गर्मी के भी टाइम में वैसे अकसर हमारे टीवी को चलाने वाले कक्ष PCR(प्रोडक्शन कंट्रोल रूम) के साथी अकसर जैकेट पहने दिख जाते थे। समझ में आया कि ऑफिस में एसी काम करने वालों से ज्यादा मशीनों को दुरुस्त रखने के लिए जरूरी है। इसलिए एयरकंडीशंड टीवी ऑफिस जरूरी है। वैसे अब अखबार के दफ्तर भी सब वातानुकूलित ही हैं। मुंबई में रहते थे तो, 24 घंटे से ज्यादा के इलाहाबाद के सफर के लिए एसी में रिजर्वेशन कराने लगे। एसी के तीसरे दर्जे में। फिर ब्याह हुआ तो, कुछ दिन बाद मुंबई के एक कमरे में भी एसी लग गया। फिर हाल ये करीब 12 घंटे ऑफिस के एसी में औ करीब 8 घंटा घर के एसी में। इसका मतलब आप समझ रहे हैं ना ! धीरे-धीरे अनजाने में हम जनरल cattle class से एसी cattle class में शामिल होते जा रहे थे।
वैसे दिल्ली आने के बाद घर से कार मंगाई तो, उसमें एसी नहीं लगवाई पूरी गर्मी बिना एसी के निकाल दी। लेकिन, कसक रहती थी। गर्मी इतनी पड़ रही थी कि हालत खराब हो जाती थी। सिर्फ 10 मिनट लगता है मेरे घर से ऑफिस आने में। ये वो रास्ता है जो, धीरे-धीरे ही सही उस शशि थरूर की तरफ ले जा रहा है जो, हम जैसे लोगों को cattle class बता रहा है। लेकिन, क्या इसका इलाज शशि थरूर को गाली देना है। अब मुझे शशि थरूर का ज्यादा बैकग्राउंड नहीं पता और मैं शशि थरूर का कच्चा-चिट्ठा जानने के लिए GOOGLE अंकल की मदद लेने की जरूरत भी नहीं समझ रहा। लेकिन, सोचिए कि अगर बचपन से शशि थरूर को वो, सुख सुविधाएं मिली हैं जो, हम cattle class के लोग खुद के लिए और अपने बाद की पीढ़ी के लिए जुटाने की कोशिश में लगे हैं तो, शशि थरूर को गाली हम क्यों दे रहे हैं। क्या गाली देने से कुछ इलाज निकलेगा।
ये सोचकर बताइए कि अगर इकोनॉमी क्लास के सारे लोगों के लिए बिजनेस क्लास का पैसा देने में उनकी जेब पर इकोनॉमी क्लास जितना ही झटका लगे तो, कितने लोग बिजनेस क्लास में न जाकर cattle class में सफर करना पसंद करेंगे। परिवार के साथ जाने पर कभी-कभी हम भी सेकेंड एसी में सफर कर लेते हैं तो, टिप्पणी करने वाले मेरे ब्लॉग पर लिखते हैं ये सेकेंड एसी में सफर करके हमको दिखा रहे हैं। वैसे बीसियों बार हमने अपने आसपास ही एसी में सफर करने वालों के मुंह से रेलवे के ही स्लीपर और जनरल क्लास के लिए जानवरों की तरह ठुंसा रहता है जैसी टिप्पणी सुनी है। अब ये न समझने लगिएगा कि हमारे आसपास के लोग कोई बहुत ऊंचे क्लास से, शशि थरूर टाइप, आते हैं। ये क्लास का ही चक्कर है कि राखी सावंत, मायावती, अमर सिंह जैसे लोगों को cattle class से बाहर निकलकर शशि थरूर वाले क्लास में शामिल होने के लिए जाने क्या-क्या करना पड़ता है और हम उन्हें दे दनादन बिना सोचे गरियाने लगते हैं।
इसलिए शशि थरूर से इस्तीफा जरूर मांगिए। जमकर गरियाए भी लेकिन, इससे पहले ये जरूर सोचिए कि हर कोई अपने से नीचे के cattle class से कितनी जल्दी ऊपर उठकर अपनी स्थिति में बचे रह गए लोगों को cattle class में जबरदस्ती शामिल कराने में जुट जाता है। सुविधा जुटाने, क्लास में शामिल होने की हमारी कोशिश, अपने बाद की पीढ़ी को और भी बेहतर क्लास में शामिल कराने, सुविधाभोगी बनाने की कोशिशि- वास्तविक स्थिति से अपने बच्चों-प्रिय लोगों को एकदम दूर करने की कोशिश लगातार करते जा रहे हैं। इसलिए शशि थरूर बनने से खुद को, अपने बच्चों को, आसपास वालों को रोकिए। कोई cattle class कहने वाला नहीं मिलेगा। कितना भी लंदन, अमरीका, बंबइया, दिल्ली वाले हो जाइए- अपनी जमीन को पकड़े रहिए-बच्चों को पकड़ाइए रहिए। जमीन की समझ, अहसास रखकर आसमान की तरफ देखेंगे, उड़ेंगे तो, ये cattle class जैसी चीज शायद न हो।
देश की दशा-दिशा को समझाने वाला हिंदी ब्लॉग। जवान देश के लोगों के भारत और इंडिया से तालमेल बिठाने की कोशिश पर मेरे निजी विचार
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Friday, September 18, 2009
Wednesday, September 09, 2009
ये अभी और शर्मसार करेंगे
5 star embarrassment – ये शब्द ठीक से मेरे अनुभव में कल पहली बार आया। वैसे अंग्रेजी भाषा ही है कि कब कौन प्रेम में लड़िया रहा है और उसी शब्द पर कौन गुस्से से लतिया रहा है। खास फर्क मालूम नहीं पड़ता। खैर, कल ये 5 star embarrassment हुआ है यूपीए सरकार को।
वजह बने हैं उनके 2 मंत्री। विदेश मंत्री एस एम कृष्णा और उनके डिप्टी साहब शशि थरूर। थरूर साहब तो बरसों यूनाइटेड नेशंस में रहे हैं और उन्हें महंगे होटलों की-शानो शौकत की आदत रही है। इसलिए शायद उन्हें अंदाजा ही नहीं लगा कि होटलों में रहने से कौन सा वो देश की जनता के साथ धोखा कर रहे हैं। भारतीय जनता के जरिए उनका चुनाव भी पहली बार हुआ है। इससे पहले के चुनाव तो, वो इलीट स्टाइल के लड़ते थे, कभी जीतते थे-कभी हारते थे। लेकिन, कृष्णा साहब तो, भारतीय जनता की नुमाइंदगी करते आ रहे हैं- क्या उन्हें भी समझ में नहीं आया कि वो, क्या कर रहे हैं। ...
वजह बने हैं उनके 2 मंत्री। विदेश मंत्री एस एम कृष्णा और उनके डिप्टी साहब शशि थरूर। थरूर साहब तो बरसों यूनाइटेड नेशंस में रहे हैं और उन्हें महंगे होटलों की-शानो शौकत की आदत रही है। इसलिए शायद उन्हें अंदाजा ही नहीं लगा कि होटलों में रहने से कौन सा वो देश की जनता के साथ धोखा कर रहे हैं। भारतीय जनता के जरिए उनका चुनाव भी पहली बार हुआ है। इससे पहले के चुनाव तो, वो इलीट स्टाइल के लड़ते थे, कभी जीतते थे-कभी हारते थे। लेकिन, कृष्णा साहब तो, भारतीय जनता की नुमाइंदगी करते आ रहे हैं- क्या उन्हें भी समझ में नहीं आया कि वो, क्या कर रहे हैं। ...
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जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव
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