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Friday, March 20, 2015

भारतीय शिक्षा का आइना हैं बिहार से आई नकल की तस्वीरें

बिहार में नकल की तस्वीरें और वीडियो देखकर देश सोच रहा है कि बिहार ऐसे पढ़ता-बढ़ता है। तस्वीरें दिखें, सामने आती हैं तो उत्तर प्रदेश के लोगों को भी ऐसी ही लजाना पड़ता हो। मुझे बचपन में इलाहाबाद के गांव के एक स्कूल में ऐसे ही नकल कराने का वाकया बड़े अच्छे से याद है। लगभग इसी तरह खिड़कियों से नकल की पुर्ची फेंकना और बीच-बीच में, कानून व्यवस्था कायम है का अहसास दिलाने के लिए, पुलिस वालों का डंडा लेकर नकल कराने वालों को दौड़ाना। बचपन में गर्मी की छुट्टियों में हम करीब डेढ़-दो महीने के लिए गांव जाते थे। हम सभी भाई-बहन इलाहाबाद में रहते—पढ़ते थे। नकल जैसी संस्थागत व्यवस्था से परिचय नहीं था। इसका मतलब ये भी नहीं है कि कभी नकल ही नहीं किया। हां, पढ़ाई के दौरान दो बार छोड़कर कभी नकल नहीं किया। एक बार वाला परिणाम अच्छा हुआ निराशाजनक रहा। एलएलबी में दाखिले के लिए की गई नकल काम नहीं आई। दोबारा वाली नकल काम आई। लेकिन, गांव में छेउंगा में जो विद्यालय था, वहां की पढ़ाई अद्भुत तरीके से होती थी। ऐसे ही सब जिस बोरे पर बैठते थे। उसी बोरे के नीचे पेपर में लिखे प्रश्नों के उत्तर खोजने का जुगाड़ होता था। उसमें भी ज्यादा जुगाड़ी/प्रतिष्ठित जुगाड़ी लोगों की तो पूरी कॉपी बाहर जाकर अंदर आ जाती थी। हां, उत्तर प्रदेश में अब बहुतायत में ये हाल नहीं है। लेकिन, ये किसे भूला होगा कि उत्तर प्रदेश में नकल विरोधी कानून भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार की जड़ में मट्ठा डालने में अहम भूमिका में था। सवाल ये है कि कौन लोग हैं जो, अपने बच्चों को इस तरह से पास कराकर डिग्री दिला देना चाहते हैं। सवाल ये है कि कौन सी सरकार और अधिकारी हैं, जिन्हें इस संस्थागत नकल व्यवस्था का पता नहीं है। सवाल ये है कि क्या ये सिर्फ बिहार की समस्या है। या ये यूपी-बिहार की समस्या है। अच्छा है कि मीडिया में बहुतायत उत्तर प्रदेश-बिहार के लोग हैं और वो खुद की बुराई करने में पीछे नहीं रहते। तो, देश देख रहा है कि देश कैसे पढ़ रहा है, कैसे पास हो रहा है और कैसे डिग्री ले रहा है।

लेकिन, क्या ये समस्या सिर्फ यूपी-बिहार की है। ऐसा होता तो उत्तर प्रदेश-बिहार के पढ़ने में कमजोर लड़के दक्षिण भारत, महाराष्ट्र, गुजरात जाकर कैसे डॉक्टर, इंजीनियर बनकर चले आते हैं। और ये आज से नहीं हो रहा है। इसीलिए जब इस तरह के पढ़ाकुओं में से ही कोई पढ़ाने वाला बन जाता है तो, क्या हाल होता है। हाल ये होता है कि नकल की तस्वीरें दिखा रहे टीवी चैनलों के कैमरे जब शिक्षकों से पूछते हैं कि गणतंत्र दिवस और स्वाधीनता दिवस में अंतर क्या है तो, वो खिसिया रहे होते हैं। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति तक का नाम नहीं जानते। कई लोग तो राज्य के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री बता देते हैं। ये बिहार की या यूपी की समस्या नहीं है। ये समस्या से आंख मूंद लेने की समस्या है। अगर ऐसा नहीं होता तो, दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों, विद्यालयों में भारत क्यों नहीं है। मेरा निजी मत इस मामले में साफ है कि डिग्री के आधार पर समाज में प्रतिष्ठा पाने का पैमाना भी इसकी बड़ी वजह है। हां, सचिन का हाईस्कूल ही पास होना किसी को सताता नहीं है। लेकिन, बगल का कोई बच्चा हाईस्कूल ही पास हो तो देखिए, गजब हो जाएगा। जब बुनियाद मजबूत नहीं होगी तो, हाईस्कूल पास या फेल, किस काम का। लेकिन, इस पर कौन सी सरकार सोच रही है। राज्य सरकारों के स्कूल आर्थिक कमजोरों को पढ़ने का अहसास कराने और इसी तरह नकल करके डिग्री पाने की संस्था बनकर रह गई हैं। और कमाल तो ये सरकारी स्कूलों की इसी बुनियाद को अब निजी शिक्षण संस्थाओं में नकल कारोबार बना दिया गया है। विद्यालय विद्या के लिए नहीं डिग्री बांटकर और कारोबार बढ़ाने के लिए खुल रहे हैं। और ये सरकार की चिंता का विषय नहीं है। इसलिए बिहार की तस्वीरों पर हंसने की जरूरत नहीं है। ये तस्वीरें भारत की उस बेबुनियाद प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद का सजीव चित्रण है, जिस पर गांव के बहुतायत बच्चे अपनी डिग्री की इमारत बनाते हैं। इस डिग्री के बूते उन गांव के बच्चों का देश बनाने की व्यवस्था में हिस्सेदारी होना तो लगभग असंभव ही है। फिर कैसे गांव के उन नकल कराकर डिग्री दिलाने वाली फैक्ट्रियों को बंद कराने के बारे में कोई चिंता कर सकता है। हां, सालाना दूसरी खबरों की तरह इस तरह की तस्वीरों का भी रुदन हो सकता है। टीवी पर बैठकर शिक्षा व्यवस्था पर चिंतित हुआ जा सकता है। बिहार को गरियाया जा सकता है। लगे हाथ उत्तर प्रदेश को भी। आखिर देश की सारी अव्यवस्था की जड़ तो यूपी-बिहार ही है। ऐसे लगता है कि यूपी-बिहार देश में नहीं होता तो, देश गजब, अद्भुत, अकल्पनीय होता। बस हमारा काम हो गया है।

Wednesday, October 21, 2009

ठीक-ठीक सोच तो लो कि क्या करना है

आप करना क्या चाहते हैं। कुछ ढंग का है दिमाग में या बस ये सोच रखा है कि कुछ-कुछ ऐसा करते रहना है जिससे लोग ये तो, जानें कि ये बड़े मंत्री जी हैं। या आपको किसी ने ये समझा दिया है कि जो लोग ये वाले मंत्री जी बन जाते हैं। आगे सबसे बड़े मंत्री जी यानी प्रधानमंत्री जी बनने की रेस में उनका नाम तो आ ही जाता है भले ही वो बने ना बने। वरना एक के एक बाद एक ऐसी ऊटपटांग हरकतें भला आप क्यों करते।


आप समझ तो गए ही होंगे कि मैं अपने मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल साहब की बात कर रहा हूं। बड़े वकील हैं तो, किसी भी बात जलेबी की तरह कितना भी घुमाने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। लेकिन, आपको कुछ तो समझना ही होगा सिब्बल साहब। अभी आप अपने पिछड़ने के ब्लू प्रिंट को जस्टीफाई नहीं कर पाए थे तब तक एक और फॉर्मूला ठेल दिया आपने। अब कह रहे हैं कि IIT’s में दाखिला कैसे हो ये तय करना IIT’s का काम है, सरकार का नहीं। फिर क्यों आपने लंतरानी मार दी कि हम कोचिंग संस्थानों की दुकान बंद कराने के लिए IIT’s के दाखिले में 12वीं की परीक्षा के नंबरों को ज्यादा वरीयता देंगे। कुछ 80 प्रतिशत नंबर लाने पर ही IIT’s में दाखिले लायक समझने की बात आई।


जब बिहार के सारे नेता राशन-पानी लेके चढ़ बैठे। और, सिब्बल के फॉर्मूले को anti poor टाइप कहने लगे तो, सिब्बल साहब डर गए। एक बात बड़ी अच्छी है हमारे देश में गरीबों का भला करने को कोई भले न सोचे। गरीबों के खिलाफ जाने से डरते सब हैं सो, सिब्बल साहब भी डर गए। नीतीश मुख्यमंत्री हैं बिहार के तो, आंदोलन नहीं किया। मंच से मीडिया के जरिए बोला कि ये बिहार के छात्रों को IIT’s में जाने से रोकने की साजिश है। लालू प्रसाद यादव की पार्टी सत्ता में नहीं है तो, उन्होंने आंदोलन शुरू कर दिया।


खैर, अच्छी बात ये है कि चाहे जैसे बिहारी आंदोलित होना नहीं छोड़ रहे हैं। ये अलग बात है कि एक देश के सबसे बड़े आंदोलन से निकले नेताओं ने ही बिहार को नर्क बना दिया। और, अजीब टाइप का बिहारी गौरव-बिहारी उपेक्षा में बदल गया था। अब ठीक बात है कि उसी छात्र आंदोलन से निकला एक नेता ही बिहार को कुछ बदलने की कोशिश कर रहा है। सिब्बल के बेतुके फॉर्मूले के खिलाफ भले ही सिर्फ बिहार के लोग आंदोलित हुए और इसे anti poor टाइप कह रहे हों। सच्चाई ये है कि ये फॉर्मूला anti poor states और anti state education board तो है ही। क्योंकि, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे पिछड़े राज्यों की छोड़िए महाराष्ट्र बोर्ड के भी बच्चों के नंबर शायद ही CBSE, ICSE बोर्ड के छात्रों के नंबर का मुकाबला कर सकें।


अब हो सकता है कि सिब्बल अपने देश भर में एक बोर्ड के फैसले को लागू करने का इस तरह का घुमाके काम पकड़ने वाला तरीका आजमाने की सोच रहे हों। क्योंकि, जब यूपी-बिहार बोर्ड का बच्चा सारी मेहनत करके भी बोर्ड की परीक्षा के तरीके की वजह से 50-60% से ज्यादा नहीं जुटा पाएगा तो, वो CBSE, ICSE बोर्ड के स्कूलों में दाखिला लेकर 80% लाने का रास्ता खोजेगा। धीरे-धीरे करके एक बोर्ड हो जाएगा। अंग्रेजी स्कूलों की दुकान और तेजी से विस्तार ले लेगी। राज्यों के बोर्ड के स्कूल सरकारी विद्यालय जैसे हो जाएंगे। सिब्बल की दिल्ली की इलीट क्लास मानसिकता की विजय हो जाएगी।


और, मैं तो स्वार्थी हूं। मैं यूपी बोर्ड से पढ़ा हूं। नियमित रूप से सेकेंड डिविजनर रहा। अब मैंने तो रास्ता ही ऐसा चुना लिया कि इनके फर्स्ट सेकेंड, डिवीजन से मैं ऊपर उठ गया। लेकिन, अब क्या मुझे जिंदगी के किसी मोड़ पर फर्स्ट डिवीजन की तरफ बढ़ने का हक सिर्फ इसलिए नहीं मिलेगा क्योंकि, हाईस्कूल, इंटर या फिर ग्रैजुएशन में मैं सेकेंड डिविजनर रहा। और, यूपी या राज्यों का बोर्ड खत्म होगा तो, फिर प्रेमचंद या स्थानीय महापुरुषों से परिचय तो होने से रहा। परिचय उनसे होगा जिनका भारत-भारतीयता से वास्ता ही नहीं होगा। पता नहीं देश के सबसे अहम मानव संसाधन विकास मंत्रालय – बार-बार हम ये कहते रहते हैं कि देश की पचास प्रतिशत से ज्यादा आबादी जवान है, उसी पर देश का भविष्य टिका है और जवान होती आबादी को हम ऐसे तैयार करने की सोच रहे हैं - में ऐसे बेतुके फैसले लेने से पहले सिब्बल साहब सोच भी रहे हैं या सिर्फ इसीलिए कि पिछले मानव संसाधन मंत्रियों से ज्यादा चर्चा में बने रहने की सनक सवार है।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...