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Thursday, October 29, 2020

विकल्पहीनता में विकल्प खोजने की कोशिश हैं बिहार विधानसभा के चुनाव

हर्ष वर्धन त्रिपाठी

 

लोकतंत्र में जनता ही माई बाप होती है, यह जुमला अकसर सुनने को मिल जाता है, लेकिन कमाल की बात है कि लोकतंत्र में नेता हरसंभव कोशिश करके धीरे-धीरे जनता से उसका चुनने वाला अधिकार ही छीनने की कोशिश में लगे रहते हैं। भारत में बहुदलीय लोकतंत्र है और इसे अलग-अलग विचारों के स्वतंत्र तौर पर बढ़ते हुए लोकतंत्र को ज्यादा मजबूत करने के तौर पर देखा जाता है और काफी हद तक यह सही भी है, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि अगर अलग-अलग सोच रखने वाले अलग-अलग तरीके से राजनीतिक धारा को आगे बढ़ाने की बात करने वाले एक दूसरे के साथ आकर जनता के सामने सरकार का विकल्प देने की बात करने लगें तो क्या यह लोकतंत्र के मजबूत होने का प्रमाण है। इस जवाब आ सकता है कि राजनीतिक तौर पर इसमें बुराई क्या है। और, अलग-अलग विचार की पार्टियों के साथ आकर सत्ता के लिए विकल्प देने की इस प्रक्रिया को हमेशा साझा कार्यक्रम की सरकार के तौर पर पेश करने की कोशिश होती है। एक बड़ा राजनीतिक विद्वानों का समूह है, जिसे गठजोड़ की सरकारों में ज्यादा जीवंत लोकतंत्र नजर आता है। इसे ऐसे भी कहा जाता है कि जब लोकतंत्र में एक दल बहुमत के साथ सत्ता में होता है तो धीरे-धीरे उसमें तानाशाही की भावना आने लगती है और इसीलिए गठजोड़ की सरकार लोकतंत्र में ज्यादा लोकतांत्रिक और जीवंत होती है, लेकिन कमाल की बात यह है कि ऐसे गठजोड़ की सरकारें जनता के विकल्प चुनने की स्वतंत्रता पर किस कदर चोट पहुंचाती हैं, इसका अनुमान ही नहीं लगता।

अभी बिहार में चुनाव हो रहा है और बिहार में किसी से भी बात कर लीजिए। तुरन्त यह जवाब आ जाएगा कि बिहार में हम बदलाव तो चाहते हैं, लेकिन विकल्प कहां है। दोनों राष्ट्रीय पार्टियां- भाजपा और कांग्रेस- बिहार की क्षेत्रीय पार्टियों- जदयू और राजद- की पिछलग्गू पार्टियां हैं। ऐसे में बिहार में सिर्फ गठजोड़ ही विकल्प है। और, इस गठजोड़ वाले विकल्प ने बिहार के लोगों से विकल्प चुनने का विकल्प ही छीन लिया। लोकतंत्र में विकल्प चुनना यह सबसे महत्वपूर्ण होता है और 5 वर्ष तक जनता प्रतीक्षा इसी बात की करती है कि बेहतरी की उम्मीद कितनी पूरी हुई, इस आधार पर किस विकल्प पर निशान लगाए। बिहार के मामले में कमाल की बात यह भी रही कि ढेरों राजनीतिक दल होने से भले ही विकल्पों की संख्या बढ़ती गई, लेकिन जनता का विकल्प सीमीत होता गया। बिहार में कांग्रेस का नेता कौन है, इसका पता ही नहीं है और भाजपा नेता सुशील मोदी की पूरी पहचान ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के उप मुख्यमंत्री (सहायक) के तौर पर होती है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति के दिनों में एक बार किसी नेता ने इस बात का गूढ़ जवाब दिया था कि उपाध्यक्ष की भूमिका छात्रसंघ में क्या होती है। जवाब इतना सटीक है कि अभी तक मन मस्तिष्क में बैठा हुआ है और वह जवाब था, उप मतलब चुप। इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के उपाध्यक्ष पद के लिए उप मतलब चुप की यह व्याख्या शायद उतनी सटीक उस समय नहीं लगी होगी, लेकिन अब जब बिहार में भाजपा के उप मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को देखता हूं तो विश्वविद्यालय के जमाने की वह बात सटीक लगती है।

बिहार में भाजपा का सबसे बड़ा नेता उप बनकर चुप हुआ तो पूरी भाजपा चुप हो गई। 2015 में चुप्पी तोड़ने का साहस किया तो नीतीश कुमार ने पलटी मारकर लालू प्रसाद यादव से हाथ मिला लिया और बहुविकल्पीय लोकतांत्रिक प्रश्न के उत्तर में भी बिहार की जनता को विकल्पहीनता के तौर पर नीतीश कुमार ही मिले। बिहार के डेढ़ दशक में यह भी साबित हुआ कि लोकतंत्र में भले ही जनता के माई बाप होने की अवधारणा स्थापित है, लेकिन गठजोड़ की सरकारों में जनता का महत्व कमतर होता जाता है। और, कई बार तो शून्य से भी नीचे चला जाता है। बिहार में एक समय सुशासन बाबू की छवि के साथ चमकने वाले नीतीश कुमार के निरंतर राज में अब जनता के माई बाप होने की अवधारणा शून्य से भी नीचे चली गई है, लेकिन हर गड़बड़ी के बावजूद लोकतंत्र जनता को अधिकार देने के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ अवधारणा है और इसी सर्वश्रेष्ठ अवधारणा में विकल्पहीनता में भी विकल्प की तलाश जनता कर लेती है।

बिहार विधानसभा के चुनाव में इस बार हर कोई यह कह रहा है कि भारतीय जनता पार्टी और लोकजनशक्ति पार्टी के बीच अंदरुनी गठजोड़ है और चिराग पासवान इसे चिल्लाकर कह भी रहें हैं क्योंकि इसकी उन्हें जरूरत भी बहुत ज्यादा है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी उतने ही जोर से यह स्पष्ट करने की कोशिश कर रही है कि भाजपा और लोकजनशक्ति का कोई ऐसा अंदरूनी समझैता नहीं है। दरभंगा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नीतीश कुमार को भावी मुख्यमंत्री बताकर राजनीतिक धंध छांटने की कोशिश की है, लेकिन यह धुंध प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिन भाजपा कार्यकर्ताओं के सामने से छांटना चाहते हैं, उनको जब कोई धुंध दिख ही नहीं रही है या कोई भ्रम है ही नहीं तो उनके लिए स्थिति में कोई बदलाव होने से रहा। दरअसल, लगातार नीतीश-भाजपा गठजोड़ में भाजपा कार्यकर्ता नीतीश कुमार को अपना नेता मान बैठा और उसके पीछे बड़ी वजह यही कि नीतीश कुमार भाजपा के सुशासन वाले एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन 2015 में भाजपा के उस कार्यकर्ता को बड़ा झटका लगा, जब नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव की पार्टी से हाथ मिला लिया और यह झटका सिर्फ भाजपा कार्यकर्ताओं को नहीं, उन सभी बिहारियों को लगा था जो बिहार की बेहतरी की राह पर नीतीश कुमार की अगुआई में आगे बढ़ रहे थे। बाद में जुलाई 2017 में नीतीश कुमार फिर से भाजपा के साथ आए गए, लेकिन करीब 20 महीने में विकल्पहीनता की अवस्था में नीतीश को विकल्प मान बैठे बिहार के लोगों ने विकल्प खोजने का मन बना लिया और इस बार तरीका अलग था।

बिहार में भाजपा कार्यकर्ता और नरेंद्र मोदी के आभामंडल की वजह से जुड़ा नया भाजपाई नीतीश कुमार को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। मोदी और शाह इसे अच्छी तरह से समझ रहे थे, लेकिन 2015 का असफल प्रयोग उन्हें दुस्साहसी होने से रोक रहा था और इसीलिए नीतीश कुमार को लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव के पाले में जाने से रोकना भी जरूरी थी। विकल्पहीनता में विकल्प खोज रही बिहार की जनता के लिए 2020 विधानसभा चुनाव एक ऐसा प्रयोग है, जिसकी सफलता की प्रतीक्षा देश के दूसरे राज्यों के विकल्पहीन मतदाता भी कर रहे हैं। बिहार विधानसभा के चुनाव नतीजे यह भी तय करेंगे कि लोकतंत्र में असली माई बाप तो जनता ही होती है।

यह लेख मनीकंट्रोल डॉट कॉम पर छपा है

Friday, November 06, 2015

चुनाव के शोर में दब गई अर्थव्यवस्था की अच्छी खबरें

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 6 नवंबर 2015 को छपा लेख
भारत में कोई भी चुनाव हों, उत्सव की तरह होते हैं। ऐसा उत्सव जिसके उत्साह और शोर में सबकुछ दब जाता है। उस पर अगर बिहार जैसे राज्य का चुनाव हों, तो जाहिर है कि ये शोर और उत्साह ज्यादा तेज हो जाता है। यही वजह रही कि पांच चरणों में हुए इस चुनाव के दौरान देश के लोगों को दूसरी कोई बात ज्यादा अहम नहीं दिखी। खासकर तरक्की और इससे जुड़े आंकड़े तो चुनावी माहौल में पूरी तरह से नीरस ही होते हैं। दाल की महंगाई के आंकड़े भी सीधे चुनावी भाषण में तड़का दे सकते थे। इसीलिए दाल की महंगाई की चर्चा तो मीडिया से लेकर चुनावी रैलियों तक खूब रही। लेकिन, इसके अलावा पूरे अक्टूबर महीने और कोई भी खबर सुर्खियां नहीं बन सकीं। लेकिन, यही अक्टूबर महीना रहा जिसमें तेजी से भारत की अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ती दिखने लगी है। और सबसे अच्छी बात ये है कि इन तेजी के संकेतों में संतुलन भी है। यानी लोगों की जेब में पैसे आते दिख रहे हैं। साथ ही कल कारखाने फिर से रफ्तार में आ रहे हैं। उद्योगों के कुछ ऐसे आंकड़ें जिन पर ध्यान कम ही जाता है। लेकिन, उन आंकड़ों में ही दरअसल अर्थव्यवस्था की कमजोरी या मजबूती के लक्षण छिपे होते हैं। उन आंकड़ों से समझने की कोशिश करते हैं।

भारत में सर्विस इंडस्ट्री अक्टूबर महीने में आठ महीने की सबसे तेज रफ्तार में रही है। ताजा सर्वे में ये बात सामने आई है। इसकी सबसे बड़ी वजह नए कारोबार का उभरना है। निक्केई इंडिया कंपोजिट इंडेक्स से ये बात साफ हो रही है। इसके मुताबिक, अक्टूबर महीने में भारत में ज्यादातर आर्थिक गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। साथ ही देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के एसबीआई इंडेक्स के मुताबिक, देश में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ भी अक्टूबर महीने में बेहतर हुई है। एसबीआई कंपोजिट इंडेक्स में मैन्युफैक्चरिंग डेढ़ प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा है। ये लगातार तीसरा महीना है जब मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में तेजी देखने को मिल रही है। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की इस तेजी को एक और आंकड़ा बल देता है। इकतीस अक्टूबर तक के आंकड़ों के मुताबिक, सरकारी खजाने में साढ़े छत्तीस प्रतिशत ज्यादा अप्रत्यक्ष कर आया है। इसका सीधा सा मतलब है कि कंपनियों की बैलेंसशीट बेहतर हुई है। वित्त मंत्री अरूण जेटली ने इसे मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में तेजी का बड़ा आधार बताया है। स्टेट बैंक की रिपोर्ट ये भी बता रही है कि आने वाली तिमाही में पावर, स्टील, ग्रीन एनर्जी, हाइड्रोकार्बन और टेलीकॉम सेक्टर में तेज क्रेडिट ग्रोथ देखने को मिलेगी। इसका सीधा सा मतलब हुआ कि इन क्षेत्रों में तेज हलचल होगी। बैंक घर और कार कर्ज में भी तेज मांग देख रहा है। इन छोटी-छोटी खबरों को जोड़कर आसान भाषा में समझें, तो इसका मतलब ये हुआ कि लंबे समय से मंदी की ओर बढ़ता दिख रहा भारतीय कारोबारी जगत बेहतरी की ओर बढ़ रहा है। पावर, स्टील, ग्रीन एनर्जी, हाइड्रोकार्बन और टेलीकॉम सेक्टर में तेज क्रेडिट ग्रोथ का सीधा सा मतलब हुआ कि कोल ब्लॉक और स्पेक्ट्रम घोटाले के बाद से ठप पड़ गए क्षेत्रों में फिर से नई संभावनाएं बन रही हैं। यानी इंडिया इंक हरकत में है। इसी तरह घर और कार कर्ज की मांग बढ़ने का मतलब ये हुआ कि इंडियन मिडिल क्लास फिर से अपनी जेब से पैसे निकालने लगा है। जो, वो पूरी तरह से बचाकर रखने लगा था। क्योंकि, यूपीए शासन में साढ़े पांच प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार ने इंडियन मिडिल को डरा दिया था। नरेंद्र मोदी की सरकार के लालफीताशाही को खत्म करने की कोशिशों के बाद फिर से भारतीय उद्योग बेहतरी करते दिखने लगे हैं। और इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ऑटोमोबाइल उद्योग का। सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स के ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि सितंबर महीने में देश में कार की बिक्री करीब दस प्रतिशत ज्यादा रही है। ये पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले है। सितंबर महीने में कार कंपनियों ने करीब एक लाख सत्तर हजार कारें बेच ली हैं। देश की अर्थव्यवस्था का असल हाल समझने में यात्री कारों से ज्यादा वाणिज्यिक वाहनों यानी ट्रकों की बिक्री मददगार होती है। सितंबर महीने में वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री में बारह प्रतिशत से ज्यादा की तेजी देखने को मिली है। इसका सीधा सा मतलब हुआ कि उद्योगों को अपने सामान लाने ले जाने के लिए ज्यादा ट्रकों की जरूरत पड़ रही है। लोगों का जीवन किस तरह चल रहा है। इसका अंदाजा भारत में त्योहारों के दौरान लगाना बेहद आसान होता है। अगर बाजार लोगों से भरे हुए हैं और बाजार से लौटते हुए लोग खरीदारी करके लौट रहे हैं, तो इसका सीधा सा मतलब हुआ कि लोगों का जीवन स्तर बेहतर हुआ है। शहरी लोगों की खरीदारी का तरीका ई कॉमर्स के आने से बदला है। भारत सात बिलियन डॉलर का डिजिटल बाजार बन चुका है। इसीलिए अक्टूबर महीने में फ्लिपकार्ट, स्नैपडील और अमेजॉन के बीच शहरी ग्राहक को पकड़ने की होड़ लगी थी। अक्टूबर महीने में फ्लिपकार्ट ने बिग बिलियन सेल में 30 करोड़ डॉलर यानी करीब दो हजार करोड़ रुपये के सामान बेच लिए। इन वेबसाइट पर आने वाले हर ग्राहक ने एक हजार से लेकर पांच हजार रुपये तक की खरीदारी की है। और भारत में वेबसाइट के जरिये सामान खरीदने वाले सिर्फ एक प्रतिशत लोग ही हैं। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस त्योहारी मौसम में भारतीय कितनी खरीदारी कर रहा है।


कारोबारी गतिविधियों के बेहतर होने का साफ असर महत्वपूर्ण आंकड़ों में दिख रहा है। तेरह अक्टूबर को आए आईआईपी यानी औद्योगिक उत्पादन आंकड़े साफ करते हैं कि अर्थव्यवस्था पर छाई धुंध काफी हद तक साफ हो चुकी है। तेरह अक्टूबर को आए औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े के मुताबिक, अगस्त महीने में उत्पादन करीब साढ़े छे प्रतिशत से ज्यादा की रफ्तार से बढ़ा है। ये इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि, औद्योगिक उत्पादन में ये तेजी करीब चौंतीस महीने के बाद देखने को मिल रही है। औद्योगिक उत्पादन के आंकड़ों में सबसे अच्छी बात ये है कि कैपिटल गुड्स यानी उद्योगों के काम में आने वाली मशीनरी का उत्पादन करीब बाइस प्रतिशत बढ़ा है। इस वित्तीय वर्ष के पहले पांच महीने के औद्योगिक उत्पादन के बढ़ने की कुल रफ्तार भी अर्थव्यवस्था की मजबूती का भरोसा दिलाती है। 2015-16 के पहले पांच महीने यानी अप्रैल से अगस्त के दौरान औद्योगिक उत्पादन के बढ़ने की रफ्तार चार प्रतिशत से ज्यादा रही है। 2014-15 के पहले पांच महीने में औद्योगिक उत्पादन के बढ़ने की रफ्तार तीन प्रतिशत ही रही थी। अच्छी बात ये भी है कि महंगाई में कमी की वजह से रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में कमी की है। और आगे भी ब्याज दरें घटने के संकेत हैं। इससे कारोबारी गतिविधि की बेहतरी में मदद मिलेगी। बिहार के चुनाव के शोर में देश में बेहतर हुए कारोबारी माहौल की बात बिल्कुल ही नहीं हुई। लेकिन, अक्टूबर महीने में आए आंकड़े साफ कर रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की कहानी दमदार हो रही है। 

Sunday, October 25, 2015

बिहार के भले की सरकार बननी जरूरी

बिहार में किसी सरकार बनेगी, ये आठ नवंबर को तय होगा। लेकिन, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कह रहे हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद देश में बीजेपी विरोधी मंच और मजबूत होगा। साथ ही नीतीश ये भी दावा कर रहे हैं कि ये नतीजे बिहार का भी भाग्य बदल देंगे। पहली बात सही हो सकती है कि अगर महागठबंधन की सरकार बनती है, तो देश में भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी विरोधी ताकतें एकजुट होंगी और पहले से मजबूती से होंगी। लेकिन, क्या महागठबंधन की जीत बिहार के लोगों, खासकर नौजवानों का भला कर पाएगी। इस सवाल का जवाब आंकड़ों से समझें, तो ना में ही मिलता है। नीतीश कुमार की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी के साथ चला एनडीए का बिहार देश का सबसे तेजी से तरक्की करना वाला राज्य बन गया था। 2012-13 में बिहार की तरक्की की रफ्तार पंद्रह प्रतिशत थी। जो, देश के किसी भी राज्य से ज्यादा थी। गुजरात, महाराष्ट्र जैसे देश के विकसित राज्य भी बिहार से पीछे छूट गए थे। जून 2013 में नीतीश कुमार ने बिहार में भारतीय जनता पार्टी से अलग होने का फैसला कर लिया। वजह गुजरात के उस समय के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाने का बीजेपी का फैसला था। नीतीश कुमार ने विधानसभा चुनावों के पहले अपनी सरकार का रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार को सबसे बड़ी उपलब्धि बताया। उसी रिपोर्ट में राज्य की बेहतर होती कानून व्यवस्था का भी जिक्र है। नीतीश कुमार के रिपोर्ट कार्ड के आधार पर देखें, तो मार्च 2013 तक पंद्रह प्रतिशत की तरक्की की दर मार्च 2015 तक दस प्रतिशत के नीचे आ गई है। सीधा सा मतलब है कि बिहार की तरक्की की रफ्तार में तेजी से कमी आई है। यही वो समय है जब नीतीश कुमार ने बीजेपी का साथ छोड़कर लालू प्रसाद यादव का साथ किया था।

नीतीश-बीजेपी गठबंधन टूटने के बाद से राज्य में अपराध के मामले तेजी से बढ़े हैं। सांप्रदायिक तनाव के मामले कई गुना बढ़े हैं। जनवरी 2010 से जून 2013 तक 226 सांप्रदायिक तनाव के मामले दर्ज हुए थे। जबकि, जून 2013 से 2015 के दौरान साढ़े छे सौ से ज्यादा सांप्रदायिकक तनाव के मामले दर्ज हुए हैं। सुशासन बाबू की छवि पर ये तगड़ा धक्का था। बिना बीजेपी के नीतीश की सरकार में बढ़ रहे अपहरण के मामले लालू प्रसाद यादव के जंगलराज की याद दिलाने लगते हैं। बिहार पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, 2010 में 924, 2011 में 1050, 2012 में 1188 अपहरण के मामले दर्ज हुए। 2013 से अपहरण के मामले तेजी से बढ़े हैं। 2013 में 1501, 2014 में 1982 और 2015 अगस्त महीने तक ही 1694 अपहरण के मामले दर्ज किए गए हैं। लेकिन, कमाल की बात ये है कि बिहार के चुनाव में तरक्की की रफ्तार या फिर अपराध, अपहरण के मामले चुनावी मुद्दा नहीं हैं। चुननावी मुद्दा पूरी तरह से जाति है। आरक्षण है। इस बहस में ये पूरी तरह से गायब है कि तरक्की रफ्तार बेहतर नहीं होगी और कानून-व्यवस्था की हालत दुरुस्त नहीं होगी तो, नौजवान को रोजगार कैसे मिल पाएगा। काबिल होने के बावजूद रोजगार न मिल पाना ही बिहार से पलायन की सबसे बड़ी वजह है। जो नौजवान बिहार में हैं। उनमें करीब आधे के लिए कमाई का जरिया सिर्फ और सिर्फ खेती ही है। बिहार में खेती की तरक्की की रफ्तार चार प्रतिशत से भी कम है। तो इसी से समझा जा सकता है कि खेती से नौजवान कितनी कमाई कर पा रहे होंगे। बचे-खुचे नौजवानों को कंस्ट्रक्शन क्षेत्र में मजदूरी का काम मिल रहा है।

खेती में खास तरक्की है नहीं और नए उद्योग भी नहीं लग रहे हैं। 2013 के आखिर के आंकड़ों के आधार पर पूरे राज्य में छोटे-बड़े सभी उद्योगों को जोड़ें, तो ये संख्या साढ़े तीन हजार से भी कम बैठती है। जो देश के उद्योगों का सिर्फ डेढ़ प्रतिशत है। देश के तेजी से तरक्की करने वाले राज्यों- तमिलनाडु (16.6%), महाराष्ट्र (13.03%), गुजरात (10.17%)- में ये दस प्रतिशत से ज्यादा है। विश्व बैंक के उद्योग लगाने के लिए भारत के बेहतर राज्यों की सूची में बिहार का स्थान इक्कीसवां आता है। इसलिए बिहार में उद्योगों का ना के बराबर होना चौंकाता नहीं है। गुजरात इस सूची में पहले स्थान पर है। झारखंड, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान का स्थान इसके बाद है। जाहिर है खेती में तरक्की की रफ्तार बेहद कम होने और उद्योगों के ना के बराबर होने से बिहार के नौजवानों के पास अपना घर, जमीन छोड़ने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं है। देश भर में उद्योगों में करीब तेरह करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है। बिहार में सिर्फ एक लाख सोलह हजार लोगों को उद्योगों में रोजगार मिला है। इसी से समझा जा सकता है कि बिहार में उद्योगों का हाल कितना बुरा है। इस वजह से बिहार पलायन कर रहा है। इस पलायन का भी सबसे दुखद पहलू ये है कि बिहार में ज्यादा पढ़ लेने का मतलब है कि बिहार में रोजगार मिलना मुश्किल है। बार-बार ये बात होती है कि बिहारी बिहार में नहीं टिक रहा है। लेकिन, इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि बिहार का नौजवान अगर अच्छे से पढ़ने के बाद रोजगार का बेहतर मौका खोज रहा है। तो उसे बिहार छोड़ना ही होगा। नीतीश कुमार भले ही दस साल के राज में देश के सबसे तेजी से तरक्की करने वाले राज्य का दावा पेश कर रहे हों। लेकिन, आंकड़े साफ बता रहे हैं कि बिहार एक राज्य के तौर पर अपने राज्य के नौजवानों को बेहतर जिंदगी देने का काम नहीं कर पाया है।


स्वास्थ्य के मामले में भी बिहार के हालात बहद खराब हैं। बच्चों का जीवन नहीं बच पा रहा है। बिहार में दस लाख लोगों पर एक भी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं है। बिहार में कुल 533 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र 2009 में थे। दुखद बात ये है कि 2014 तक एक भी नया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं बना है। लेकिन, इन बातों में से कोई भी बिहार के चुनावी मुद्दे में शामिल नहीं है। वहां जातीय भावना उभारने की लड़ाई हो रही है। रोजगार, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था कोई मुद्दा दिख नहीं रहा। लेकिन, बिहार में रह रहे बिहारी और बाहरी बिहारियों के लिए ये मुद्दा जरूर होगा। और आठ नवंबर को जिसकी भी सरकार बनेगी। इन्हीं मुद्दों के इर्द गिर्द बनेगी। बिहार की सरकार बिहार के भले के लिए बनेगी। 

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...