Skip to main content

राजनीति में खेलिये, क्रिकेट में क्यों खेलते हैं नेताजी?

भाजपा सांसद युवा मोर्चा के अध्यक्ष और #BCCI सचिव @ianuragthakur बड़ी मासूमियत से भारत-पाक सीरीज के पक्ष में बोल रहे हैं। उनके कहे का लिंक भी लगा रहा हूं। जो उन्होंने बार-बार ट्वीट किया है। जो वो कह रहे हैं वो इतना सीधा मासूम नहीं हैं। वो सीधे एक पक्ष हैं। इसलिए उनकी बात को गंभीरता से उतना ही लिए जाने की जरूरत है जितना सरकार उद्योग संगठनों की सुनती है और जैसे सुनती है। क्रिकेट जैसा उद्योग चूंकि सारे दलों के नेता मिलकर चलाते हैं। इसलिए ये चलता रहे। फिर चाहे भारत के पाकिस्तान से मानवीय और औद्योगिक रिश्ते कितने ही खराब रहें। क्योंकि, उससे सीधे-सीधे नेताओं का कुछ बुरा नहीं हो रहा। अब अगर पाकिस्तान से हमारे राजनयिक कारोबारी संबंध बेहतर नहीं हो रहे, तो क्रिकेट खेलकर कौन सी डिप्लोमेसी हो जाएगी। मैं निजी तौर पर किसी भी प्रतिबंध का विरोधी हूं। लेेकिन, अनुराग ठाकुर की मासूमियत में मुझे सारी पार्टियों का क्रिकेट कनेक्शन पैसे के ढेर पर भारतीय जनमानस की खिल्ली उड़ाता दिखता है। इसीलिए जब अनुराग कहते हैं कि सोशल मीडिया से ही हर बात तय नहीं की जा सकती। तो मुझे लगता है कि ये उस पार्टी का नेता कह रहा है जिसके पूर्ण बहुमत में #SocialMedia का बड़ा हाथ है। जिस सरकार के नेता, मंत्री, सासद से लेकर छोटे नेता तक सोशल मीडिया पर बड़े से बड़ा हो जाना चाह रहे हैं। उस पार्टी के सांसद का ये कहना कि सबकुछ सोशल मीडिया से ही तय नहीं होना चाहिए। उस चेहरे को बेनकाब करता है। जिसमें सबके हित छिपे हुए हैं। फिर से कह रहा हूं कि मैं निजी तौर पर प्रतिबंध के खिलाफ हूं लेकिन, अब तय होना चाहिए कि भारत के नेताओं को धनधान्य से भरपूर रखने के लिए क्रिकेट डिप्लोमेसी हो रही है या फिर सचमुच इससे भारत-पाक के रिश्ते कभी सुधरते हैं। इसलिए फिलहाल तो मैं #NoCricketWithPakistan कह रहा हूं। क्रिकेट डिप्लोमेसी की आड़ में नेताओं की अमरबेल की जड़ में मट्ठा पड़ना जरूरी है। पत्रकारिता के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए ही मैंने अनुराग ठाकुर के बयान का लिंक भी लगाया है। लेकिन, ये नेताजी लोग राजनीतति खेलते क्रिकेट क्यों खेलने लगते हैं। इनके बयान को सुनकर ये सीरीज कराने की आतुरता भी समझ में आएगी।

Comments

Popular posts from this blog

किसान राजनीति के बीच सरकार आधुनिक किसान नेता बनाने में जुटी है

हर्ष वर्धन त्रिपाठी दिल्ली की सीमा पर तीन तरफ़ सिंघु , टिकरी और ग़ाज़ीपुर पर कृषि कानूनों के विरोध में किसान संगठन बैठे हुए हैं और फ़िलहाल कोई रास्ता निकलता नहीं दिख रहा है। सरकार और किसानों के नाम आंदोलन कर रहे संगठनों के बीच में वार्ता भी पूरी तरह से ठप पड़ गयी है। किसानों के नाम पर संगठन चला रहे नेताओं ने अब दिल्ली सीमाओं पर स्थाई प्रदर्शन के साथ रणनीति में बदलाव करते हुए देश के अलग - अलग हिस्सों में किसान पंचायत , बंद और प्रदर्शन के ज़रिये सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाना शुरू किया है , लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार कृषि क़ानूनों को लेकर ज़्यादा दृढ़ होती जा रही है। चुनावी सभाओं से लेकर अलग - अलग कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों को आधुनिक कृषि व्यवस्था से जोड़कर उनकी आमदनी दोगुना करने के सरकार के लक्ष्य को बार - बार दोहरा रहे हैं , लेकिन बड़ा प्रश्न यही है कि आख़िर किसानों को यह बात समझाने में सरकार कैसे कामयाब हो पाएगी , जब

भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में दम तोड़ेगी यूनियनबाज किसानों की “अराजकता”

भारतीय संविधान निर्माताओं ने जब संविधान बनाया था तो स्पष्ट तौर पर उसमें यह व्यवस्था स्पष्ट करने की कोशिश की थी कि किसी भी हाल में विधायिका , न्यायापालिका और कार्यपालिका के बीच किसी तरह का टकराव न हो। हालाँकि , इसमें लोकतंत्र की मूल भावना का ख्याल रखते हुए विधायिका और न्यायपालिका को एक दूसरे पर इस नज़रिये से नज़र रखने का बंदोबस्त किया गया कि किसी भी हाल में निरंकुश व्यवस्था न हावी हो जाए , लेकिन सबके मूल में लोकतंत्र को ही सर्वोच्च भावना के साथ स्थापित करना था , इसीलिए कई बार भारतीय लोकतंत्र में इस बात की भी चर्चा होने लगती है कि भारत में अतिलोकतंत्र की वजह से सरकारें निर्णय नहीं ले पाती हैं। पहले नागरिकता क़ानून के विरोध में चले शाहीनबाग और अब कृषि क़ानूनों के विरोध में चल रहे सिंघु - टिकरी - गाजीपुर के आंदोलन को लेकर अतिलोकतंत्र की बहस फिर से छिड़ गई है और इसी अतिलोकतंत्र की बहस के बीच सर्वोच्च न्यायालय ने तीनों कृषि क़ानूनों को नि

किसान आंदोलन की आड़ ख़त्म हो चुकी है

  हर्ष वर्धन त्रिपाठी किसानों के हितों के नाम पर चल रहे आंदोलन का पाँचवा महीना चल रहा है। दुनिया में किसी भी आंदोलन के इतने समय तक लगातार चलने के कम उदाहरण हैं। ऐसा भी उदाहरण ध्यान में नहीं आता है कि इतने लंबे समय तक दिल्ली की सीमाओं को घेरकर कोई भी वर्ग बैठा हो। इससे दिखता है कि इस आंदोलन को चलाने वालों के इरादे कितने मज़बूत हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि इस आंदोलन को चलाने वालों के लिए सबसे महत्वपूर्ण यही आंदोलन है , उनके जीवन - मरण के प्रश्न जैसा दिख रहा है , लेकिन प्रश्न यह खड़ा होता रहा है कि आख़िर इतने मज़बूत आंदोलन और आंदोलन करने वालों के साथ देश भर का किसान क्यों खड़ा नहीं हो रहा है। इसकी वजह समझने की कोशिश करते हैं तो कुछ महत्वपूर्ण बिंदु ध्यान में आते हैं किसान नेताओं ने आंदोलन की शुरुआत ही धमकी से की थी और किसानों को भी धमकाकर ही दिल्ली की सीमाओं तक लाया गया था। यहाँ तक कि गाँवों से लोग आ नहीं रहे थे तो पं