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Saturday, July 22, 2017

‘कृष्णा’ के दौर में भी ‘कृष्ण’ बने रहना मामूली बात नहीं

रामनाथ कोविंद देश के 14वें राष्ट्रपति हो गए। आज रामनाथ की ही चर्चा का समय है। लेकिन, इस समय मैं कृष्ण की बात कर रहा हूं। हालांकि, मैं कृष्ण भगवान की चर्चा मैं कतई नहीं करने जा रहा हूं कि कैसे कृष्ण इस्कॉन और अग्रेजों की संगत में पहुंचकर कृष्णा हो गए हैं। भारत में अभी हाल तक बहुतायत नाम में राम और कृष्ण जरूर लगता था। हालांकि, अब शायद ही कोई बच्चों का नाम राम, कृष्ण के नाम पर रखता हो। लेकिन, बीजेपी के दिग्गज नेता, बुनियाद की सबसे मजबूत ईंटों में से एक लालकृष्ण आडवाणी की पैदाइश उसी दौर की है, जब राम, कृष्ण लगभग हर हिन्दुस्तानी के नाम में लगा रहता था। संयोगवश हमारे पिताजी का नाम भी कृष्ण चन्द्र है। खैर, इस संयोग का अभी मेरे लिखने से कोई वास्ता नहीं है, सिवाय इसके कि उस दौर की पैदाइश वाले तो लगभग सारे ही लोगों के नाम राम, कृष्ण के नाम पर ही होते थे। आज लालकृष्ण आडवाणी की कुछ तस्वीरें भेजी, देखी जा रही हैं, जिसे लेकर सोशल मीडिया में खूब मजाक चल रहा है।
ताजा तस्वीर है राष्ट्रपति चुनाव में मत डालते लालकृष्ण आडवाणी की। इस तस्वीर को लेकर सोशल मीडिया में चुटकुला चल रहा है कि अपनी गर्लफ्रेन्ड की शादी में 101 रुपए का लिफाफा देते लालकृष्ण आडवाणी। एक और तस्वीर है, जिसमें लालकृष्ण आडवाणी और फारुख अब्दुल्ला का हाथ पकड़े सुषमा स्वराज संसद के गलियारे में दिख रही हैं। ज्यादातर अखबारों ने भी इन दोनों तस्वीरों को छापा है। चूंकि, लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज दोनों ही राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति के दावेदार दिख रहे थे। और फारुख अब्दुल्ला भी विपक्ष के उम्मीदवार हो सकते थे। इसलिए संसद गलियारे में तीनों की एक साथ मिली तस्वीर सोशल मीडिया में चुटकी लेने की पक्की वजह देती है। 2009 के आसपास से भारतीय जनता पार्टी से जुड़े कार्यकर्ताओं को तो लालकृष्ण आडवाणी वैसे ही एक सत्तालोलुप नेता की तरह दिखते हैं। और, उन कार्यकर्ताओं के पास एक पक्का तर्क भी मौजूद है कि आखिर 2009 में तो पार्टी ने आडवाणी को ही चेहरा बनाया था। और, वो मनमोहन सिंह से हार गए। मनमोहन सिंह जैसी गैरराजनीतिक शख्सियत के सामने सीधी लड़ाई में हारने से लालकृष्ण आडवाणी के राजनीतिक कद का कितना क्षरण हुआ, इस पर एक स्वतंत्र शोध होने की जरूरत है। लेकिन, इस क्षरण का खतरा खुद आडवाणी का तैयार किया हुआ था। उन्होंने मनमोहन को आमने सामने बहस की चुनौती दे दी थी। लालकृष्ण आडवाणी उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति शैली में भारतीय प्रधानमंत्री का चुनाव कराने के पक्षधर हो चले थे। 
2004 का चुनाव हारने से बीजेपी कार्यकर्ताओं के मनोबल में कोई कमी नहीं आई थी। लेकिन, 2009 में अपने सबसे मजबूत नेता का ऐसे गैरराजनीतिक और कमजोर माने जाने वाले मनमोहन सिंह के सामन हारने से बीजेपी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा। वो मनोबल इस कदर टूटा कि फिर आडवाणी से लेकर देश के किसी भाजपा नेता में उनका भरोसा नहीं बन पा रहा था। गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर अकेले नरेंद्र मोदी ही थे जो, बीजेपी कार्यकर्ताओं के लिए उम्मीद की आखिरी किरण थे। इसलिए जब 2013 की सितम्बर में नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनावों के लिए उम्मीदवार बने, तो कार्यकर्ताओं को लगा कि संजीवनी मिल गई। हालांकि, उस समय आडवाणी ने उसका जमकर विरोध किया। इतना कि लगा पार्टी दोफाड़ हो जाएगी। लेकिन, अब ये बात अच्छे से समझी जा सकती है कि आडवाणी कभी बीजेपी को दो हिस्से में करने के बारे में सोच भी नहीं सकते।
भारतीय राजनीति में सफलता के चरण पर स्थापित हो चुकी आज की मोदी-शाह वाली बीजेपी में आडवाणी का चित्र एक सत्तालोलुप नेता या फिर सहानुभूति वाले नेता के तौर पर ही बनता है। लेकिन, बस 2009 से पहले की भारतीय राजनीति, उस समय की भारतीय जनता पार्टी और उसमें लालकृष्ण आडवाणी के बारे में पता करने पर चित्र बदल जाता है। तब आडवाणी का चित्र भारतीय राजनीति के उस महान नेता के तौर पर बनता है, जिसने अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मिलकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय की कांग्रेस के विकल्प पर रखी गई बुनियाद पर शानदार इमारत तैयार की। वो नेता जिसने इस देश में राष्ट्रीयता, धर्म को परदे के पीछे की राजनीति से पारदर्शी तरीके से करना शुरू किया। लालकृष्ण आडवाणी को उस नेता के तौर पर याद किया जाना चाहिए, जिसने आगे बढ़कर अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंपी। अगर आडवाणी को सत्ता का ऐसा मोह रहा होता, तो उस समय आडवाणी बीजेपी के सबसे ताकतवर नेता था। दिल्ली से लेकर हर राज्य तक उन्हीं की तैयार की पौध, पेड़ बन चुकी थी। उसी समय आडवाणी ने पार्टी तोड़ दी होती। लेकिन, आडवाणी अपने राजनीतिक विचार, मूल्य और आदर्शों की राजनीति करने वाले नेता हैं। इसीलिए हर लड़ाई के बाद आडवाणी ने कभी अपने विचार, मूल्य, आदर्श को धूल धूसरित नहीं किया। जाने कितनों को सांसद, विधायक बनाने वाले आडवाणी ने अपने परिवार, बच्चों के लिए कभी कुछ नहीं किया। ये वो लालकृष्ण आडवाणी हैं, जिन्होंने 1996 में जैन डायरी में नाम आने के बाद हवाला का आरोप लगने भर की वजह से इस्तीफा दे दिया था। वो लालकृष्ण आडवाणी आज के दौर में भी कृष्ण बने हुए हैं। ये कहा जा सकता है कि इस उम्र में अब जाएंगे भी कहां। और पार्टी ने उन्हें सबकुछ तो दिया है। इस तरह से सोचने वालों के लिए लालकृष्ण आडवाणी की 89 साल की उम्र सबसे बड़ा आधार बनती है। उनके लिए एक तथ्य ये है कि कांग्रेस के शासन में लगभग सबकुछ हासिल कर चुके एस एम कृष्णा 85 साल के होने के बाद भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। एस एम कृष्णा विदेश मंत्री, राज्यपाल, उप मुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री सब रह चुके हैं। ऐसे ढेरों उदाहरण हैं, जिनका जिक्र किया जा सकता है। लेकिन, उसकी शायद जरूरत नहीं है। 2009 के बाद से भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राजनीति देखने वालों से विनम्र निवेदन है कि विचार, मूल्य, आदर्श के लिए समर्पित भारतीय राजनीति के इस महानतम नेता का चित्र मजाकिया मत बनाइए। राजनीति के कृष्णा दौर में कृष्ण बने रहना आसान काम नहीं है।

Monday, June 19, 2017

मोदीराज में रायसीना पहाड़ी पर एक दलित के विराजने का मतलब

भारतीय जनता पार्टी के सांसदों को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए प्रस्तावक के तौर पर दस्तखत करने के लिए मुख्तार अब्बास नकवी के यहां जाना था। कमाल की बात ये थी कि उनमें से किसी को भी नहीं पता था कि दिल्ली की सबसे ऊंची और सम्वैधानिक तौर पर देश की सबसे ऊंची रायसीना पहाड़ी पर विराजने के लिए वो लोग किसके नाम पर मुहर लगाने जा रहे हैं। ज्यादातर सांसद लालकृष्ण आडवाणी के ही पक्ष में सहानुभूति रख रहे थे। लेकिन, राष्ट्रपति बनाने के लिए सांसदों की सहानुभूति नहीं, उनके मतों की जरूरत थी। और वो मत पार्टी के तय उम्मीदवार के ही पक्ष में जाना तय था। सांसद मुख्तार अब्बास नकवी के घर पहुंच रहे थे और ठीक उसी समय 11 अशोक रोड में भाजपा मुख्यालय पर राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बताया कि रामनाथ कोविंद एनडीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार होंगे। बिहार के राज्यपाल को राष्ट्रपति बनाने की नरेंद्र मोदी और अमित शाह की इस योजना की जानकारी किसी को नहीं थी।
भारतीय राजनीति नरेंद्र मोदी और अमित शाह को आगे कैसे याद करेगी ? एक शातिर राजनीतिक जोड़ी के तौर पर ? उनकी योजना से बाहर काम करने वाले हर नेता का खात्मा करने वाली जोड़ी के तौर पर ? भारतीय जनता पार्टी को देश की चक्रवर्ती पार्टी बनाने के तौर पर ? हिन्दू एकता के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाले नेता के तौर पर ?
अगर इतिहास में आज मुझे इस जोड़ी को दर्ज करने को कहा जाए, तो मैं इस जोड़ी को इन सारे जवाबों के मिश्रण के तौर पर याद करूंगा। भारतीय राजनीति में इस जोड़ी को एक क्रूर राजनीतिक जोड़ी के तौर पर याद किया जाएगा। और इसलिए भी कि इसी राजनीतिक जोड़ी ने भारतीय जनता पार्टी को भारत की सर्वशक्तिमान पार्टी कैसे बना दिया। 31 मई को अमित शाह गुजरात के छोटा उदयपुर विधानसभा में बूथ कार्यकर्ताओं के साथ थे। छोटा उदयपुर में अमित शाह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ, विस्तारक के तौर पर थे। अमित शाह की महत्वाकांक्षी विस्तारक योजना के तहत गुजरात में 48000 विस्तारकों को राज्य के सभी 48000 बूथ पर जाना था। इसी के तहत छोटा उदयपुर विधानसभा के बूथ पर अमित शाह लोगों के दरवाजे पहुंचे। छोटा उदयपुर विधानसभा में अमित शाह का विस्तारक के तौर पर जाना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि, यहां से कांग्रेस का विधायक 8 बार से चुना जा रहा है। आदिवासी बहुल इस इलाके में कांग्रेस की अभी भी मजबूत पकड़ है। अमित शाह सबसे कठिन काम खुद चुनते हैं। इसी कठिन काम चुनने में जब उन्होंने उत्तर प्रदेश चुना था, तो वहीं रामनाथ कोविंद भी उन्हें मिले थे।
अमित शाह ने कहाकिनरेंद्र मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री रहते बीजेपी ने 120 सीटें जीतीं, अब मोदी जी प्रधानमंत्री हैं, इसलिए हम 150 सीटें जीतेंगे।
लेकिन, ये अमित शाह को भी अच्छे से पता है कि गुजरात में राजनीतिक तौर पर हालात इधर बहुत बिगड़े हैं। इसलिए मोदी के मुख्यमंत्री के प्रधानमंत्री बन जाने भर से बीजेपी को गुजरात में 150 सीटें नहीं मिलने वाली। हार्दिक पटेल पहले से ही पूरे राज्य में पाटीदारों को लगातार ये समझाने में लगा हुआ है कि बीजेपी पाटीदारों का भला नहीं कर रही। लेकिन, पाटीदारों में बीजेपी के गहरे धंसे होने से हार्दिक पटेल बहुत कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। लेकिन, गुजरात में दलितों का एकजुट होना बीजेपी के लिए चिन्ता की वजह हो सकती है। जिग्नेश मेवानी दलितों के साथ मुसलमानों को लाकर भारतीय जनता पार्टी के लिए मुसीबत बनने की कोशिश कर रहा है। ऊना में दलित उत्पीड़न पूरे देश में दलितों को एक साथ लाने में मदद कर रहा है। सहारनपुर में भीम आर्मी का मजबूत होना भी बीजेपी के लिए बुरे संकेत की तरह है।
इस सबके बीच में गुजरात विधानसभा का चुनाव इसी साल के अन्त में होना है। ऐसे में 150 सीटें हासिल करने के लिए जरूरी है कि गुजरात में हिन्दू एकता का बीजेपी का आधार मजबूत बना रहे। और इसके लिए पिछड़े वर्ग से आने वाले प्रधानमंत्री के साथ दलित का राष्ट्रपति बनना बीजेपी के लिए सोने पर सुहागा जैसा दिखता है। रामनाथ कोविंद बिहार के राज्यपाल हैं। उम्मीदवारी घोषित होने के बाद जिस तरह से नीतीश कुमार की प्रतिक्रिया दिखी है, उसमें जेडीयू का साथ आना लगभग तय है। चंद्रबाबू नायडू, के चंद्रशेखर राव, रामविलास पासवान पूर्ण समर्थन दे चुके हैं। मुलायम सिंह यादव भी मोदी के उम्मीदवार के साथ ही रहेंगे। कोविंद उत्तर प्रदेश के कानपुर से आते हैं और कोली समाज से आते हैं। इसलिए मायावती के सामने भी विरोध का विकल्प बचता नहीं है। पहली प्रतिक्रिया में मायावती ने भी समर्थन के संकेत दे दिए हैं। कुल मिलाकर सीपीएम महासचिव सीतीराम येचुरी को छोड़कर अब तक आई सारी प्रतिक्रियाएं सकारात्मक रही हैं। 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी अपना आधार मजबूत करने के लिए रायसीना पहाड़ी पर किसी दलित के पक्ष में खड़ा है।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत लगातार हिन्दुओं के लिए एक कुंआ, एक मन्दिर, एक श्मशान की बात कर रहे हैं। अब एक गैर स्वयंसेवक दलित के रायसीना पहाड़ी पर विराजमान होने के संघ और मोदी के फैसले से संघ की बात का वजन दलितों में और बढ़ेगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए हिन्दू एकता का आधार और मजबूत होगा। देश में दलित-मुसलमान आन्दोलन को मजबूत करने की इच्छा रखने वालों पर रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी वज्रपात की तरह है। मोदी-शाह यूं ही नहीं, आज की तारीख की सबसे खतरनाक राजनीतिक जोड़ी है। इस जोड़ी ने एक दलित को रायसीना पहाड़ी पर चढ़ा दिया है, अब दलित भला किसी और की कहां सुनने वाला है।
(ये लेख QUINTHINDI पर छपा है)

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...